सेवा
आज का प्रश्न है सेवा! सेवा हम किसकी करें और कैसे करें?
साधु वहीं जो सेवा जीते, सेवा सदगुरु पावै।
कहत कबीर सुनो भाई संतो, जो वह गुफा लखावै।।
शब्द सों प्रीति करे सोइ पावे।।
जो सद्गुरु की सेवा को जीतते हैं वही दुनिया में साधु हैं। सेवा एक संग्राम है। यह सबके वश का नहीं है। चार दिन बाद कहीं न कहीं लोग उलझ कर खड़े हो जाते हैं कि किसकी सेवा करें? जो ‘सेवा सद्गुरु पावे‘–यदि सद्गुरु की सेवा मिल जाय। क्या पहचान है सद्गुरु की?
कहत कबीर सुनो भाई संतो, जो वह गुफा लखावै।।
शब्द सों प्रीति करे सोई पावै।।
जो उस गुफा को लखा दे, जहाँ से शब्द प्रसारित होता है और फिर शब्द से जो प्रीति करे, वह प्राप्त कर लेता है। भगवान कैसे समझाते-बुझाते हैं, उसका नाम है शब्द। भगवान् की अपौरुषेय वाणी का नाम है शब्द। शब्द से जो प्रीति करेगा, अवश्य प्राप्त कर लेगा, इसमें कोई संदेह नहीं है। सेवा सद्गुरु की करनी चाहिए।
बाल्मीकि से भगवान श्रीराम ने पूछा कि– मैं रहूँ कहाँ? तो बाल्मीकि जी ने कहा कि– कहाँ नहीं है आप? एक जगह खाली बता दें, जहाँ आप न हों?
पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाउँ।
जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ।।
जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना। कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना।।
भरहिं निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे।।
लोचन चातक जिन्ह करि राखे। रहहिं दरस जलधर अभिलाषे।।
निदरहिं सरित सिंधु सर भारी। रूप बिंदु जल होहिं सुखारी।।
तिन्ह कें हृदय सदन सुखदायक। बसहु बंधु सिय सह रघुनायक।।
जसु तुम्हार मानस बिमल हंसिनि जीहा जासु।
मुकताहल गुन गन चुनइ राम बसहु हियँ तासु।।
प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुबासा। सादर जासु लहइ नित नासा।।
तुम्हहि निबेदित भोजन करहीं। प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं।।
सीस नवहिं सुर गुरु द्विज देखी। प्रीति सहित करि बिनय बिसेषी।।
कर नित करहिं राम पद पूजा। राम भरोस हृदयँ नहिं दूजा।।
चरन राम तीरथ चलि जाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं।।
मंत्रराजु नित जपहिं तुम्हारा। पूजहिं तुम्हहि सहित परिवारा।।
तरपन होम करहिं बिधि नाना। बिप्र जेवाँइ देहिं बहु दाना।।
तुम्ह ते अधिक गुरहि जियँ जानी, सकल भाव सेवहिं सनमानी।।
सबु करि मागहिं एक फल राम चरन रति होउ।
तिन्ह कें मन मंदिर बसहु सिय रघुनंदन दोउ।।
भगवान्! आप से भी बढ़कर सद्गुरु को जानकर, सम्पूर्ण भावों से जो भजता है और बदले में एक वर मांगता है कि प्रभु! आपका दर्शन हो। उनके मन-मंदिर में आप निवास करें। वही आपके लिए पवित्र घर है। तो सद्गुरु की ही सेवा का विधान है।
— नवधा भक्ति का उपदेश प्रभु राम ने दिया माता सबरी को–
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।।
भक्ति का प्रथम चरण है संतों का संग। द्वितीय चरण है, जब संतों का ही संगत है तो वे अवश्य बताएंगे भगवान का भजन कैसे करें? वे कहाँ रहते हैं? कैसे ढूँढ़े? वह है कथा और प्रसंग, उसमें प्रीति। और कथा-प्रसंग का जब सारांश निकला तो वही सेवा सद्गुरु की।
गुरु पद पंकज सेवा, तीसरी भगति अमान।
चौथी भगति मम गुन गन करहिं कपट तजि गान।।
गुरु के चरण कमलों की सेवा – ये तीसरी भक्ति है। और चौथी भक्ति है– कपट का त्याग करके मेरा गुनगान। और, ‘मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा।’- गुरु से मंत्र जागृत हो जाएगा और एक प्रभु में सुदृढ़ विश्वास हो जायेगा। क्रमश: स्तर उठता ही जायेगा।
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा।।
उत्तरोत्तर अवस्था बढ़ती गई। तो भजन की जागृति सतगुरु से। यह है सेवा। सेवक कितना भी अवगुणी हो फिर भी महापुरुष, भगवान कभी नहीं त्यागते। ‘जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें। सेवक प्रभुहि परे जनि भोरें।।’ सेवक को प्रभु कभी भूलते ही नहीं, कारण कि–
सेवक सुत पति मातु भरोसें। रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें।।
सेवक और सुत ‘पति मातु’ भरोसे रहते हैं। पति माने परमात्मा, मालिक, स्वामी। करोड़पति माने करोड़ों रुपयों का मालिक। गृहपति = घर का मालिक, और सब का पति। भगवान का एक संबोधन है मालिक। सेवक उस स्वामी के भरोसे और सुत माता के भरोसे निश्चिन्त रहते हैं। ‘रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें।– असोच रहते हैं, प्रभु को परवरिश करना ही पड़ता है।
भगवान की एक विरदावली है कि–
समदरसी मोहि कह सब कोऊ। सेवक प्रिय अनन्यगति सोऊ।।
मुझे सब समदर्शी कहते हैं लेकिन एक जगह मेरी समदर्शिता लड़खड़ा जाती है। सब दिखाई पड़े और सेवक दिखाई पड़ जाए तो सीधी दृष्टि उसी पर पड़ती है। ‘सेवक प्रिय अनन्यगति सोऊ’– वह सेवक मुझे प्रिय है जिसकी अनन्य गति हो, मुझे छोड़कर अन्य किसी देवी-देवता को न भजता हो, केवल मेरे आश्रित हो।
सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत।
मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत।।
वह अनन्य है जिसकी ऐसी बुद्धि कभी विचलित नहीं होती कि मैं हूँ सेवक और हमारे प्रभु चराचर में, सर्वत्र व्याप्त हैं। सर्वत्र, सब समय मुझे देखते हैं, सब समय सुनते हैं। आप सोचोगे कि गुरु महाराज तो आश्रम में हैं, यहाँ है ही नहीं तब तो भूल कर बैठोगे।
हमारे गुरु महाराज कहा करें– होऽ गुरु, भगवान और माया – तीनों सर्वत्र, सब समय रहते हैं। तिल भर भी कोई ऐसी जगह नहीं है, जहाँ वह न हों!
इसलिए वह अनन्य है कि मैं सेवक सचराचर… चराचर माने चर-अचर सबमें व्याप्त। ‘रूप स्वामि भगवंत‘–वहाँ स्वामी का रूप, भगवान का रूप विद्यमान है। सेवा के भी कुछ नियम होते हैं। सेवक के पीछे भी खतरे ही मँडराया करते हैं। लक्ष्मण वन में भगवान राम की सेवा में जाने लगे तो उनकी माता सुमित्रा ने आदेश दिया कि–
रागु रोषु इरिषा मदु मोहू। जनि सपनेहुँ इन्ह के बस होहू।।
राग है, रोष है…. राग माने लगाव। और वस्तु न मिलने पर रोष हो जाता है…. क्रोध, रोष, ईर्ष्या, मद, मोह। ‘जनि सपनेहुँ इन्ह के बस होहू‘- स्वप्न में भी इनके वश में न होना।
सकल प्रकार बिकार बिहाई। मन क्रम बचन करेहु सेवकाई।
सभी प्रकार से विकारों को त्यागकर मन, क्रम और वचन से सेवा करना। लक्ष्मण! सीता ही माता है, राम जी तुम्हारे पिता हैं, जाओ।
— शूर्पनखा–
पंचवटी में शूर्पनखा पहुँच गई, बोली– आओ हमसे विवाह कर लो। साधकों के सामने घोर जंगल में भी विघ्न आते हैं।
सूपनखा रावन कै बहिनी। दुष्ट हृदय दारुन जस अहिनी।।
पंचबटी सो गइ एक बारा। देखि बिकल भइ जुगल कुमारा।।
भ्राता पिता पुत्र उरगारी। पुरुष मनोहर निरखत नारी।।
होइ बिकल सक मनहि न रोकी। जिमि रबिमनि द्रव रबिहि बिलोकी।।
रुचिर रूप धरि प्रभु पहिं जाई। बोली बचन बहुत मुसुकाई।।
तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी। यह सँजोग बिधि रचा बिचारी।।
मम अनुरूप पुरुष जग माहीं। देखेउँ खोजि लोक तिहु नाहीं।।
तातें अब लगि रहिउँ कुमारी। मनु माना कछु तुम्हहि निहारी।।
भगवान श्रीराम ने कहा– हमारा विवाह हो चुका है, ये सीता है। शूर्पनखा बोली– यह कौन है? भगवान राम बोले– यह मेरा अनुज है। शूर्पनखा बोली– यह भी तो ठीक ही है। लक्ष्मण ने कहा–
सुंदरि सुनु मैं उन्ह कर दासा। पराधीन नहिं तोर सुपासा।।
मैं उनका दास हूँ – सदा पराधीन — यहाँ तुम्हें सुविधा नहीं मिलेगी। क्यों महारानी बनते-बनते दासी बनना चाहती हो? सेवा का ऐसा नियम है कि ‘सेवक सुख चह मान भिखारी। ब्यसनी धन सुभ गति बिभिचारी।।’-सेवक सुख चाहता हो, भिखारी मान चाहता हो, व्यसनी धन चाहता हो, व्यभिचारी सद्गति चाहता हो, ‘लोभी जसु चह चार गुमानी। नभ दुहि दूध चहत ए प्रानी।।’–लोभी यश की कामना करे और अभिमानी चारो फल (अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष) की आशा करे तो ये सभी प्राणी आकाश को दुहकर दूध लेना चाहते हैं।
— भरत–
भरत जब पहुँचे राम जी के पास, वशिष्ठ ने परिचय दिया–
भरतहि धर्म धुरंधर जानी। निज सेवक तन मानस बानी।।
भरत को धर्म की धुरी धारण करने वाला समझो। भरत मन-क्रम-वचन से आपका अंतरंग सेवक हैं। भरत ने पहले तो अपना तर्क दिया, लेकिन बाद में सँभल गये। भरत ने स्वयं निर्णय लिया कि,
जो सेवकु साहिबहि सँकोची। निज हित चहइ तासु मति पोची।।’
जो सेवक स्वामी को संकोच में डालकर अपना हित चाहता है, उसकी बुद्धि भ्रष्ट है, गयी गुजरी है, निकृष्ट है।
सेवक हित साहिब सेवकाई। करै सकल सुख लोभ बिहाई।।
सेवक का हित है साहब की सेवा, स्वामी की सेवकाई करने से। स्नेह के साथ इस ढंग से सेवा करें कि सकल सुख और सारे लोभ को दूर हटा दे।
सहज सनेहँ स्वामि सेवकाई। स्वारथ छल फल चारि बिहाई।।
सहज सनेह से स्वामी की सेवा करें, प्रेम से करें। स्वार्थ, छल और कपट दूर फेंक कर सेवा करें।
अब सेवा कैसे करें?–
अग्या सम न सुसाहिब सेवा। सो प्रसादु जन पावै देवा।।
भरत ने कहा– आज्ञा पालन के समान अच्छे साहब की कोई सेवा नहीं। प्रभो! हमें आदेश दें कि मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँ। हे देव! यही प्रसाद ये सेवक चाहता है। भगवान ने कहा– भरत! तुम जाओ, चौदह वर्ष बाद मैं आऊँगा, तुम्हारा भार हल्का कर दूँगा, मैं अपना राजपाट ले लूँगा। भरत ने खड़ाऊँँ लिया और चले आये।
सोइ सेवक प्रियतम मम सोई। मम अनुशासन माने जोई।।
वह सेवक है, प्रिय से भी प्रिय है, अति प्रियों से भी उत्तम है जो मेरे आदेश का पालन करे।
गुरु महाराज जब देहरादून की ओर विचरण में थे, जंगल में एक कच्ची सड़क दिखाई पड़ी। वे चलने लगे। महाराज ने कहा- मैं यह सोचा करूँ कि सड़क है तो कहीं गाँव-ग्राम भी अवश्य होगा। लेकिन वह वन विभाग वालों का जंगली रास्ता था। आगे ज्यों-ज्यों बढ़ें, जंगल और भी घना होता चला गया। हाथियों की ताजी लीद पड़ी थी।
सुबह से चलते-चलते शाम हो गई। जंगल में एक विशाल वृक्ष के नीचे महाराज ध्यान में बैठ गए। महाराज का चलना भी भजन ही था। वे कहीं जाते नहीं थे। मन-क्रम-वचन से सुरत को हृदय में लगाकर, प्रभु के चरणों के ध्यान में लगे रहते थे, और शरीर से एक भाव से आगे बढ़ते रहते थे। यही उनके विचरण का तरीका था। इसका नाम है सचेतावस्था का ध्यान, चलित ध्यान। अपने लक्ष्य के लिए सदा जागरूक रहते हुए कदम बढ़ाओ, भूल ना जाओ, भगवान से सुरत हट न जाए ।
जब पेड़ के नीचे बैठ गए तब भगवान ने कहा– बैठना चाहते थे बैठो फिर यहीं पर! यहाँ तुम्हारे लिए बढ़िया आश्रम बन जाएगा। पत्ते-पत्ते में लट्टू लग जाएंगे। लट्टू माने बल्ब लग जाएंगे, नया आविष्कार था बल्बों का। और कहा– तुम्हें यहाँ स्थिति मिलेगी, स्वरूप का दर्शन होगा। तुम्हारे द्वारा लोगों का बहुत कल्याण होगा। भगवान ने बहुत कुछ बताया।
निश्चिन्त होकर महाराज बैठ गए। चार दिन बीत गए, ना पानी पिए, न खाना खाए, न कहीं गए। चौथे दिन भगवान ने ब्रह्मबेला में कहा– बैठे भर रहो, सब वैसे ही होगा, यथावत् होगा, लेकिन एक सिपाही दूध लेकर आ रहा है उसको पीना मत।
महाराज ने सुन लिया और थोड़ी देर में भूल भी गए। इतने में सिपाही पहुँचा दूध का कटोरा भर के। महाराज! दूध का सेवन कर लें! तब महाराज को याद आया कि भगवान ने कहा है कि सिपाही दूध लेकर आएगा, पीना मत। अब इससे कैसे कह दें कि भगवान ने मना किया है। कोई विश्वास करेगा क्या? कभी नहीं ! यह तो वही विश्वास कर पाता है जब आपको भी भगवान वह जागृति दें, तब समझ में आए। तो महाराज ने कहा– देखो, फिर कभी कुछ लाओगे हम ले लेंगे, हमारा व्रत है, हमें ऐसे ही बैठे रहने दो। आज हम दूध नहीं पियेंगे, न कुछ लेंगे।
तब सिपाही बोला– अरे महाराज! हम लोग इतने पापी हैं? जब साधारण सेवा भी आप स्वीकार नहीं करोगे तो हम गरीबों का कल्याण कैसे होगा? अट्ट-बट्ट लगा बोलने– महाराज! मैं फारेस्ट का सिपाही हूँ। चार दिन से रोज दूर से, नजदीक से आपको देखा करता हूँ। आप इस पेड़ के नीचे से उठकर कहीं नहीं गए। भगवन्! क्षमा करें, कृपा करें, दूध पी लें, नहीं तो कल्याण कैसे होगा।
वह एक घंटा अट्ट-बट्ट कुछ ना कुछ बोलता ही चला गया। बड़ा वाचाल रहा। तो झुँझलाहट में महाराज उससे जीव छुड़ाने के लिए बोले– ससुरा ना तो चुप्पई रहत है न चलइ जात है! यह कहते हुए महाराज ने उठाया कटोरा, दूध पी लिया और कटोरा दे दिया। सिपाही बहुत खुश हुआ, सादर प्रणाम किया और चल दिया। सिपाही थोड़ी दूर ही गया होगा, भगवान ने गुरु महाराज से कहा– उठो, अब यहाँ कुछ नहीं होगा। न आश्रम बनेगा, न तुम्हें भगवान का दर्शन होगा, न स्थिति मिलेगी और न ही कल्याण होई। भागो यहाँ से…! कहा था न कि दूध मत पीना… पी लिया न…
रेख लाँघि सिय बाहर आई। बिधि बस कर्म काल कठिनाई।।
भगवान जो सीमारेखा निश्चित कर दें उनका कभी उल्लंघन नहीं करना चाहिए। वह पाँव यहाँ रखने को कहते हैं तो चार इंच बाएं मत रखो, दाएं मत रखो, सीधे चलो। आज्ञापालन…. अक्षरश: आज्ञापालन – इसी का नाम सेवा है। आज्ञापालन का नाम ही भजन है।
महाराज कहैं– होऽ चार दिन के भूखे थे, पेट भर खाना भी नहीं मिला और भगवान डांट-फटकार के भगा दिए। बस हम चूक गए यार…। हमें कोई भूख नहीं थी, जिउ छुड़ाने के लिए कि ससुरा न तो चुप्पई बैठत है और न चलेउ जात है, झुंझलाहट में उसको दूर करने के लिए पी गए। पी रहे थे तब तक भगवान मना नहीं किये। जब पी लिया तब डाँटना शुरू किए– एक बार आदेश दे दिया तो क्यों पिया? इसीलिए आज्ञापालन ही भजन है।
हम जब गुरु महाराज की शरण में गए तो भजन हमारी समझ में आया, सेवा न समझ में आवे। यह झाड़ू लगाओ, यह करो, वह करो… हम सोचें कचरा पड़ा है तो हर्जा क्या है? कैसे साधु हैं, कहते हैं कि झाड़ू लगाओ। हम उस समय नवाड़ी थे। हम सोचें– जब हम झाड़ू ही लगाते रहेंगे तो भजन कब करेंगे?
तीन साल बीत गया, चौथे साल में यह आदेश हुआ– तुम्हारी अपेक्षा जो साधक सेवा में लगे हैं इनकी साधना और आगे है। तूँ पिछड़ता जा रहा है। हम घबड़ा गए, सोचा– रात-दिन भजन कर रहे हैं लेकिन ये सेवा करनेवाले हम से आगे चल रहे हैं। इसीलिए महाराज सेवा करवाते हैं….
तब हम लगे रास्ते पर दिन के बारह बजे झाड़ू लगाने। हमें ये भान ही ना रहे कि कहाँ सेवा करै के चाही। महाराज कहें– ई पगला के देखो! करे, झाड़ू सुबह लगत है कि दोपहर में? तब हम बोले– महाराज! सफाई तो हो ही जाती है, हमें समय से क्या मतलब! हमें आपकी सेवा से मतलब है।
गुरु महाराज हँसने लगे, बोले– एही बौचट के देखो, कइसन-कइसन बतियावत है।
और हम लगे रहें सेवा में कुछ ढूँढ़ के। फिर ड्यूटी भी मिली सेवा की – भंडारी के साथ रहो, तो भंडारी जी की मदद किया करें उल्टी-सीधी। गुरु महाराज ने एक दिन बुलाया, बोले– देख, यह सेवा जरूरी है। बाहरवाली सेवा के बिना भीतरवाली जागृति ना होई। हमसे श्रद्धा से सम्बन्ध जुड़ जाएगा तो भीतरवाली जागृति हो जाएगी। श्रद्धा में कमी आ जाएगी तो भीतर से भगवान बताना बंद कर देंगे। यदा-कदा कहेंगे, शिथिलता आ जाएगी। भीतर भी मैं ही बोलता हूँ, बाहर भी मैं ही कहा करता हूँ। दोनों एक है, दो नहीं है। तू सोचत है, भीतर से भगवान् बोलत हैं, बाहर से गुरु महाराज बोलते हैं – इस मूर्खता में मत पड़ना। भीतर भी मैं ही बोल रहा हूँ, बाहर भी मैं ही बता रहा हूँ। यह बात हमें बहुत देर से समझ में आई।
गुरु महाराज ने आगे कहा– बाहर सेवा कर लेकिन इससे भी सूक्ष्म, प्रत्यक्ष फल वाली सेवा है – हमारे स्वरूप को हृदय में पकड़। शीशे में जैसे मुँह दिखाई देता है, वैसे ही स्वरूप हृदय में दिखाई पड़े। चरण देखो, नाखून देखो, सुरत को स्थिर कर लो। दो-चार ग्रास भोग-राग लगा दिया, पानी पिला दिया, धूप भी कर दिया। फिर लग जाओ स्वरूप में, चरण में।
श्रीगुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती।।
पद और चरण के अगूँठे के नाखून में सूरत को स्थिर कर लो। शीशे में जैसे अपना मुँह दिखाई देता है, ऐसे ही चरण स्पष्ट दिखाई दें तो ध्यान बढ़िया है।
यह है मानस सेवा। स्वांस में सूरत को लगाओ। स्वास आई तो ओम्… ओम्… ओम्…. ओम्….। राम कहते हो तो राम-राम-राम। नाम, रूप, लीला और धाम – कहीं न कहीं मन को लगाए रखो। मन को छुट्टी मत दो। मन को यदि भजन से छुट्टी दोगे तो यह माया में जाएगा। मन एक ऐसा यंत्र है कि छुट्टी लेता ही नहीं। इसको छुट्टी नहीं दी जा सकती। यह अपनी हरकत तब छोड़ता है, जब मर जाता है। तो–
मन मरा माया मरी, हंसा बेपरवाह।
जाका कछु न चाहिए सोई शहंशाह।।
इसलिए हर समय चिंतन में मन लगाए रहो।
जागत में सुमिरन करै, सोवत में लव लाय।
सुरत डोर लागी रहै, तार टूटि ना जाए।।
यह अंतरंग सेवा है। यह सुरत से, चितंन से, श्रद्धा से, चित को ध्यान में लगाने से संपन्न होती है। हम बाहर जो सेवा करते हैं, इससे भजन की पटरी पर गाड़ी आ गई तो रात-दिन करो। उससे सूक्ष्म और प्रत्यक्ष फलवाली यह हमारी ही सेवा है। यह हमारा आदेश है।
हमने सोचा कि हमसे सेवा पार नहीं लगी कायदे से, इसीलिए संतोष दे रहे हैं गुरु महाराज। हम बोले– संतोष तो नहीं दे रहे कहीं..? यदि सेवा ही से भगवान मिलते हो तो हम रात-दिन फरसा चलाएंगे।
फिर आहिस्ते-आहिस्ते समझ में आई यह बात कि सेवन करने का मतलब सेवा है।
कागभुशुण्डि को भगवान् श्रीराम ने दर्शन दिया तो आदेश दिया–
सत्य कहउँ खग तोहि, सुचि सेवक मम प्रानप्रिय।
अस बिचारि भजु मोहि, परिहरि आस भरोस सब।।
काग! मैं तुम्हें सत्य कहता हूँ, शुद्ध सेवक मुझे प्राणों के समान प्यारे होते हैं–ऐसा विचार करके मेरा भजन कर। सारी आशाएं और भरोसा त्यागकर, ‘अस बिचारि भजु मोहि’ अर्थात् मेरा भजन कर। प्रभु के चितंन से मन भागे न। भजन से भागो मत। इसका नाम है भजन। तो कैसे करें सेवा? ‘परिहरि आस भरोस सब’ अर्थात् अनन्य चिन्तन का नाम सेवा है।
— महाराज मनु–
सृष्टि चक्र उन्हीं का था। जो कुछ था, सब उनका था। देवलोक उनका बसाया हुआ। धन-धान्य की तो कमी नहीं लेकिन–
होहि न बिषय बिराग भवन बसत भा चौथपन।
हृदयँ बहुत दुख लाग जनम गयउ हरिभगति बिनु।।
हृदय में अपार दुख लगा- ‘हृदयँ बहुत दुख लाग’–बगैर भजन के जन्म बीत जाना चाहता है। विषयों से तो वैराग्य ही नहीं होना चाहता। बरबस राजपाट पुत्र को दिया और भजन के लिये निकल गये।
दु:ख किस बात का था? सृष्टि में जो कुछ था – देवलोक, स्वर्गलोक, मृत्युलोक – सब उन्हीं का बसाया हुआ था। धन की तो कभी कमी ही नहीं थी, दु:खी पता नहीं क्यों थे? दु:ख इस बात का था कि विषयों से वैराग्य नहीं हो रहा है, और बगैर हरि के भजन के जीवन बीत जाना चाहता है। बरबस राजपाट दिया पुत्र को और गए नैमिषारण्य। वहाँ साधकों से मिले, ऋषियों से मिले, भजन-साधना की विधि समझा और शांत-एकांत में भजन में लग गए। जहाँ भजन में लग गए तो विचार करने लगे– मैं किसका पुजारी हूँ? आखिर भजन किसका करना चाहिए?
अगुन अखंड अनंत अनादी। जेहि चिंतहिं परमारथबादी।।
वह गुणों से अतीत है, अखंड है, अनन्त है, अनादि है। परमार्थ के पथिक सदा जिसका चिन्तन किया करते हैं, और,
संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना। उपजहिं जासु अंस तें नाना।।
ये अनन्त ब्रह्मा, विष्णु और महेश जिसके अंस से उत्पन्न और विलीन होते रहते हैं,
ऐसउ प्रभु सेवक बस अहई। भगत हेतु लीलातनु गहई।।
ऐसे भी कोई प्रभु हैं जो सेवक के बस में होते हैं। भक्तों के हित के लिए लीला से यह शरीर को धारण कर लेते हैं, भक्त के शरीर को अपना निवास बना लेते हैं।
जौं यह बचन सत्य श्रुति भाषा। तौ हमार पूजिहि अभिलाषा।।
वेद का यह वाक्य सत्य है कि भगवान ऐसे सेवक के बस में हैं तो मेरी अभिलाषा अवश्य पूर्ण होगी।
पुनि हरि हेतु करन तप लागे। बारि अधार मूल फल त्यागे।।
फिर तपस्या में लग गए। अब तक सेवन कर रहे थे… मन-क्रम-वचन से काम का, क्रोध का, लोभ का, मोह का, राग का, द्वेष का। संयमित किया इन्द्रियों को, मन को; और सब ओर से समेट के लगा दिया हरि के चिन्तन में। अब तक सेवन करते थे वासनाओं का; अब सेवन कर रहे हैं प्रभु का। यही है विशुद्ध सेवा। सेवक को गद्दार, धूर्त, कपटी नहीं होना चाहिए।
सेवक सठ नृप कृपन कुनारी। कपटी मित्र सूल सम चारी।।
— सेवक कैसा होना चाहिए?-
सेवक कर पद नयन से, मुख सो साहिबु होइ।
तुलसी प्रीति कि रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ।।
सेवक तो हाथ-पाँव-आँख-कान जैसा होना चाहिये और स्वामी मुख जैसा होना चाहिए। मुख खाना खाता है, हाथ-पाँव-नाक-कान, एड़ी से चोटी तक सबको बराबर तरोताजा कर देता है, सबको उचित पौष्टिकता दे देता है। मुख जैसा स्वामी होना चाहिए, ‘कर पद नयन’ जैसा सेवक होना चाहिए। कहीं सिर में खुजली हुई तो हाथ सेवा कर देता है। जब कहीं काँटा लगा तो हाथ पहुँच जाते हैं। आगे चलना है तो पाँव पहुँच गया। आँख सब देखकर सूचना देती है, कान सुनकर। सेवक को इस प्रकार सदा तत्पर होना चाहिए। विद्वतजन ऐसे ही सेवकों की सराहना करते हैं। फिर प्रभु की सेवा में एक चीज और है– ‘सेवक सेब्य भाव बिनु….’– मैं सेवक हूँ, प्रभु मेरे सेव्य हैं, मेरे आराध्य हैं, मैं उनके चरणों में समर्पित सेवक हूँ – यह भाव हर समय होना चाहिए। तो,
सेवक सेब्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगारि।
तो सेवक भाव है तो सेवा कैसे करें?
भजहु राम पद पंकज अस सिद्धांत बिचारि।
राम के चरण-कमलों का भजन करो। वे हमारे स्वामी हैं और मैं सेवक हूँ–ऐसा सिद्धांत सुदृढ़ करके, फिर उन्हीं प्रभु का भजन करो, उनका सेवन करो। वृत्ति दाहिने-बाएं बहकने न पाए। यह है सेवा। यह चिन्तन से, सुमिरन से, सुरत को ध्यान में लगाने से सम्पन्न होगी।
प्रभु को तो हमने देखा नहीं, सेवा शुरू कहाँ से करें? सेवा की शुरुआत नाम से ही होती है।
सेवक सुमिरत नामु सप्रीती। बिनु श्रम प्रबल मोह दलु जीती।।
फिरत सनेहँ मगन सुख अपनें। नाम प्रसाद सोच नहिं सपनें।।
सेवक प्रेमपूरित हृदय से नाम का सुमिरन करता है- ‘सेवक सुमिरत नामु सप्रीती…’, और बगैर श्रम के ही प्रबल मोह के दल को जीत लेता है।
‘फिरत सनेह मगन सुख अपने’–प्रभु के स्नेह में मगन अपने ही सुख में निमग्न होकर घूमता है। ‘नाम प्रसाद सोच नहिं सपनें।’– नाम की कृपा से सपने में भी सोच नहीं करता। सेवक को सदा ही मन-क्रम-वचन से साफ होना चाहिए। जो भीतर हो, जबान पर हो। भीतर खराबी है तो वह ही कह डालो, छुपाओ मत। क्योंकि हम खराब नहीं होना चाहते, हमारे पास खराबी थी भी नहीं…. कहीं संस्कार में पड़ी चली आ रही है तो बता देना चाहिए।
भरत जब राम जी से मिलने गए शृंगवेरपुर में, पता चला कि वे नंगे पाँव गए, खड़ाऊँ भी दे दिया तो,
रामु पयादेहि पायँ सिधाए। हम कहँ रथ गज बाजि बनाए।।
सिर भर जाउँ उचित अस मोरा। सब तें सेवक धरमु कठोरा।।
‘सिर भर जाऊँ…’–सिर के बल कोई चल सकता है क्या? हाथों के बल तो लड़के चलते ही हैं। कदाचित् सिर जमीन से छू गया तो वहीं जाम हो जाएगा, एक इंच आगे नहीं बढ़ पाएगा। भला सिर के बल कैसे जाओगे? सिर माने मस्तिष्क। मन, बुद्धि, चित्त व अहंकार – यह मस्तिष्क का कार्य है। इस अंतःकरण को, मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार को समर्पित कर दो, उनके हाथ का यंत्र बना दो। अपनी बुद्धि लगाना बंद कर दो। वो जो अकल देते हैं उसको ले लो। ये है सिर भर जाना। तो,
सिर भर जाउँ उचित अस मोरा। सब तें सेवक धरमु कठोरा।।
ऐसा उचित है, सबसे सेवक का धर्म कठोर होता है। और भरत उसी भाव से समर्पण के साथ आगे बढ़ रहे थे। और जितने भी पुराने सेवक थे वे यह समझ पाए कि हमारी सेवकाई को धिक्कार है, भरत जी श्रेष्ठ हैं।
देखि भरत गति सुनि मृदु बानी। सब सेवक गन गरहिं गलानी।।
जो पुराने सेवक थे वो ग्लानि से गलने लगे– हमारे में बहुत कमी है, भैया भरत के विचार और आगे हैं। देवता घबड़ा गए कि भरत का इतना प्रेम होगा तो राम जरूर लौट आएंगे तो सरस्वती को बुलाया, कहा– षड्यंत्र करो। तो वह भाग गई, बोली– मैं यह नहीं कर सकती।
सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही। देबि देव सरनागत पाही।।
फेरि भरत मति करि निज माया। पालु बिबुध कुल करि छल छाया।।
बिबुध बिनय सुनि देबि सयानी। बोली सुर स्वारथ जड़ जानी।।
मो सन कहहु भरत मति फेरू। लोचन सहस न सूझ सुमेरू।।
भरत के हृदय में सीता और राम का निवास है।
भरत हृदयँ सिय राम निवासू। तहँ कि तिमिर जहँ तरनि प्रकासू।।
जहाँ सूर्य पूर्ण कलाओं से विकसित हो वहाँ भी कहीं अंधकार फैलाया जा सकता है क्या? तुम्हारे एक हजार आँखें हैं सुरेश, फिर भी तुम्हें यह सूर्य नहीं दिखाई देता। प्रणाम किया भरत जी को, चली गईं। लेकिन देवता सदा के स्वार्थी थे। उनको जो कुछ आता था उटाँग-पटाँग, षड्यंत्र रचने लगे। तब गुरु वृहस्पति ने उनको समझाया कि,
मायापति सेवक सन माया। करइ त उलटि परइ सुरराया।।
मायापति हैं भगवान और उनका सेवक है भरत। इसके साथ तुम जाल बिछाओगे तो कहीं उलट के तुम्हारे ही ऊपर न गिर पड़े।
सुनु सुरेस उपदेसु हमारा। रामहि सेवक परम पिआरा।।
हे सुरेश! हमारा उपदेश सुन! राम को सेवक परम प्यारा होता है। भगवान सुख मानते हैं जब उनके सेवक की तुम सेवा करो।
मानत सुखु सेवक सेवकाईं। सेवक बैर बैरु अधिकाईं।।
और प्रभु के सेवक से बैर करोगे, भगवान उससे सौ गुना ज्यादा बैर बाँध लेते हैं। तुम्हारा ठिकाना नहीं लगेगा। और फिर यदि सेवक की कोई रुचि है तो भगवान उसको अवश्य रखते हैं।
राम सदा सेवक रुचि राखी। बेद पुरान साधु सुर साखी।।
भगवान तो सेवक की रुचि में बँधे हुए हैं। सुरेश! तुम भरत की स्तुति करो, सेवा करो। फिर भी कुछ कुटिलता कर ही दिया। लेकिन भरत को, वशिष्ठ को, विश्वामित्र को, जनक को पता ही नहीं चला कि यहाँ माया भी फैली है क्योंकि हरि भक्तन के पास ना आवे, भूत प्रेत पाखंड।… जादू-टोना-मंत्र-तंत्र-यंत्र कुछ भी नहीं लगता।
दो चेला आ गए गुरुजी के पास। जब भ्रमण में गए तो वृद्ध गुरुजी बोले– भोजन बनाओ। वे बोले– गुरु महाराज! भोजन तो हम लोगों ने कभी नहीं बनाया। तब गुरु महाराज ने ही किसी तरीके से बनाया। तब गुरुजी ने एक चेले से कहा– जाओ, तुलसी के पत्ते ले आओ भोग लगाने के लिए। वह टालमटाल करने लगा, इधर-उधर देखने लगा तब दूसरे चेले ने सोचा कि यह तो टालमटाल कर रहा है और गुरु जी अब हम ही को कहेंगे कि जाओ, पत्ता ले आओ। क्यों नहीं पहले से ही प्रबन्ध कर लूँ। वह बड़ी जोर से बिगड़ा– क्या दाहिने-बाएं देख रहा है, इतना बड़ा हो गया तुलसी का पत्ता नहीं जानता? अरे, केले की तरह बड़े-बड़े पत्ते होते हैं। जा, ला दौड़कर! तब गुरु बाबा बोले– मैं ही ले आता हूँ। गुरु बाबा स्वयं तुलसी ले आये, भोग लगाया, फिर बोले– भोजन करोगे? चेले बोले- गुरु महाराज की आज्ञा का कहीं उल्लंघन किया जाता है।
राम नाम के आलसी भोजन के होशियार।
तुलसी ऐसे नरन को कोटि बार धिक्कार।।
तो सेवा के कुछ नियम हैं।
— गुरु अमरदास –
गुरु नानक जी की गद्दी पर बैठे थे अंगददास। उनके शिष्य हुए अमरदास। वो इतने भगत थे कि घर में रहते हुए ही तीस बार पंजाब से पैदल, नंगे पांव हरिद्वार आए, गंगा-स्नान किया और वैसे ही नंगे पांव वापस गए। तीस बार आए और गए। यह नियम चल रहा था।
एक बार वापस घर लौटे तो उन्हीं की पुत्रवधू भजन गा रही थी। एक भजन उसका कान में पड़ गया तो बोले– बेटा, यह भजन कहाँ पाया? वह बोली– गुरु अंगददास जी के हैं। वे बोले– ये अंगददास गुरु कहाँ रहते हैं? तो उसने बताया। वो उनके रिश्ते में भी थे, लेकिन इस भगत को पता ही नहीं, कहाँ रिश्तेदारी है, कौन हमारा है, कौन पराया है। बोले– अच्छा, तो वहाँ रहते हैं…. चुपचाप चले गए।
बताया कुछ नहीं, झाड़ू लगाना शुरू कर दिया। आश्रम में जाकर सेवा करने लगे तो पहले से जो सेवक लगे थे, उनको राहत मिल जाती है। वह सोचते हैं– यह नया सेवक रुक जाता तो अच्छा रहता। किसी ने उसे टोका ही नहीं। धीरे-धीरे पुराने सेवक शिथिल होने लगे, अपनी सेवा से वे मुख मोड़ने लगे और अमरदास उन सबकी सेवा पकड़ने लगे। आहिस्ते-आहिस्ते सुबह चार बजे अमृतसर से पानी लाना और गुरु महाराज को नहलाना, धुलाना, बैठाना, वस्त्र बदलवाना…. सब काम शुरू कर दिये।
एक बार दस-पन्द्रह दिन से भयंकर बरसात हो रही थी। कभी-कभी झड़ियार लग जाता था पुराने जमाने में तो रास्तों पर काई जम जाती थी। जहाँ पाव रखो, फिसलने लगता। तो बरसते हुए पानी में अमरदास गया। नियम का वह पक्का था। चार बजे घड़ा भर पानी लेकर चला, पाँव फिसला और गिर गए। गिर जरूर गए लेकिन घड़े को नहीं गिरने दिया, बचा लिया।
बगल में एक तेली और उसकी पत्नी रहती थी। आवाज सुनकर पत्नी ने कहा– अरे, इतनी रात को कौन बेचारा गिर गया? तो तेली बोला– जिसका धनी धूरी कोई नहीं, जिसका मालिक मुख्तियार कोई नहीं, वही अनाथ अमरुआ होगा बेचारा।
गुरु महाराज ने यह वाक्य सुन लिया। सुबह जब स्नान करके गद्दी पर बैठे, दरबार लग गया तब बोले– बुलाओ उस तेली दम्पति को। दोनों आए। गुरु महाराज बोले– यह बताओ, रात में तुमने क्या कहा था? तब घबराए दोनों। उन्होंने सोचा– अरे, गुरु जी ने तो सुन लिया। वे बोले– गुरु महाराज, जो सजा मिलनी हो मिले। फिसलकर गिरने की आवाज आई तो मुँह से निकला– अरे! इतनी रात को कौन गिरा होगा, कौन निकला होगा बाहर? तो हमारे मुँह से निकला… वही होगा अमरुआ बेचारा जिसका मालिक मुखत्यार धनी-धोरी कोई नहीं।
तब गुरु महाराज ने अमरदास को बुलाया, बोले– जो गुरु की सेवा करता है, वह अनाथ नहीं है। संसार में वही एक सनाथ है। वह दास नहीं, वह स्वामी है। चद्दर ओढ़ाया और गद्दी में बैठा दिया, बोले– आज से सिख गद्दी के गुरु हुए। गुरु अमरदास ने भी गद्दी को बड़ी बढ़िया चलाया।
इस प्रकार साधु वही होता है दुनिया में जो सेवा को जीत ले। किसकी सेवा?
जो सेवा सतगुरु पावे…..
बलिहारी उस सत्यगुरु की, जो वह गुफा लखावे।
जो कुछ है, साधना करने की चीज है। तो सबको करनी चाहिए सत्गुरु की सेवा, संतों की सेवा और भगवान की सेवा। सभी ने शुरुआत में महापुरुषों की सेवा की है। सेवा जब जागृत हो जाय तो अहर्निश भगवान का सुमिरन, नाम का जप करना और ध्यान करना चाहिए।
सेवक सेब्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगारि।
भजहु राम पद पंकज अस सिद्धांत बिचारि।।
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सत्य कहउँ खग तोहिं सुचि सेवक मम प्रानप्रिय।
अस बिचारि भजु मोहिं परिहरि आस भरोस सब।। (७/८७ ख)
सेवक सुमिरत नामु सप्रीती। बिनु श्रम प्रबल मोह दलु जीती।।
फिरत सनेहँ मगन सुख अपने। नाम प्रसाद सोच नहिं सपने।।
सबको चलते-फिरते, खाना खाते, खुरपी चलाते… किसी भी परिस्थिति में, कोई भी काम करते हों, नाम याद आया करे, स्मृति-पटल पर सुमिरन चलता रहे। जीभ से भी उच्चारण करो। सुबह-शाम बैठकर समय जरूर दो। करो जाप और पाँच मिनट गुरु महाराज का धाम कैसा… आश्रम कैसा… महाराज कैसे…- थोड़ा याद कर लें मन ही से, शरीर से कहीं रहे तो श्रद्धा से जहाँ डोरी लगी तो गुरु में जो गुरुत्व है वह आपको मिलने लगेगा।
पहली है सेवा। अमरदास जी की तरह झूमकर करो। और जब साधना जागृत हो गई तो मन-क्रम-वचन से जो वासनाओं का सेवन करते थे, उधर से इंद्रियों का दमन करके, मन से सुरत लगाओ प्रभु के चरणों में, प्रभु के चिन्तन में।
सेवक सेब्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगारि।
भजहु राम पद पंकज अस सिद्धांत बिचारि।।
विशुद्ध सेवक मुझे प्राणों की समान प्यारा होता है। तो कैसे सेवा करें? ‘अस बिचारि भजु मोहिं’- भजन सेवा है। यह मानस सेवा है। वो तन की सेवा थी, ये मन की सेवा है। मन से हम प्रभु का ही सेवन कर रहे हैं। सेवा का फल है अमृतमय पद की प्राप्ति।
ब्रह्मवेत्ता वक्ता सुरति गुरु के लच्छन जान।
इच्छा राखे मोक्ष की ताहि शिष्य पहिचान।।
उसके अंदर इच्छा होती है तो केवल मोक्ष की, कल्याण की; और कुछ नहीं। इसलिए सेवा सद्गुरु की ही करनी चाहिए। भगवान के एक नाम का जाप – उठते-बैठते, सोते-जागते हर समय याद आता रहे।
।। ॐ श्री सद्गुरुदेव भगवान की जय ।।
(‘अमृतवाणी भाग-8’ से उद्धृत)