अवधू! ऐसा ज्ञान न देखा
आज का प्रश्न है– ज्ञान? तुलसीदास जी कहते हैं–
जोगु कुजोगु ग्यान अग्यानू।
जहँ नहिं राम पेम परधानू।। (रामचरितमानस, २/२९०/२)
वह जोग नहीं, कुजोग है; ज्ञान नहीं अज्ञान है जहाँ राम के प्रेम की प्रधानता न हो। गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं–
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्।
असंमूढ: स मर्त्येषु सर्वपापै: प्रमुच्यते।। (गीता, १०/३)
जो मुझ अजन्मा, अनादि, सम्पूर्ण लोकों के महान् ईश्वर को विदित कर लेता है वह मरणधर्मा मनुष्यों में ज्ञानवान् है। वह सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है। ज्ञान कोई ऐसी वस्तु है कि इधर ज्ञान और उधर पापों से छुटकारा। ज्ञान मुझ अजन्मा, अनादि, लोकमहेश्वर को विदित कर लेना है अर्थात् परमात्मा की प्रत्यक्ष जानकारी के साथ मिलनेवाली अनुभूति का नाम ज्ञान है। गीता में ही है–
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थ दर्शनम्।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा।। (गीता,१३/११)
आत्मा के आधिपत्य में निरन्तर चलना अर्थात् आत्मा के आधिपत्य में निरन्तर आचरण करना, उन प्रभु के निर्देशों पर चलते-चलते परमतत्त्व परमात्मा को विदित कर लेना ज्ञान है और इसके विपरीत सृष्टि में जो कुछ है अज्ञान है।
पूज्य गुरुदेव का कहना था कि जब तक इष्ट तुम्हारे हृदय से रथी न हों, भगवान तुम्हें भजन न पढ़ायें तब तक पूर्ण निवृत्ति दिला देनेवाला भजन जागृत ही नहीं हुआ। भजन ही एक ऐसी वस्तु है जो कहने में नहीं आती, लिखने में नहीं आती; किसी अनुभवी सद्गुरु के द्वारा किसी श्रद्धालु के हृदय में जागृत हो जाया करती है। उस जागृति का परिणाम यह होता है कि जिस परमात्मा की हमें चाह है, हमारी पुकार ऐसी हो कि वह परमात्मा जिस सतह पर हम खड़े हैं उस सतह पर उतर आयें, हमारे पास आ जायँ, आत्मा से अभिन्न होकर खड़े हो जायँ और हमारा मार्गदर्शन करने लगें।
यही है ‘अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं’– अंतरात्मा के आधिपत्य में निरन्तर चलना; जैसा इशारा मिले, जो आदेश मिले, उस पर चलना! उन प्रभु के संरक्षण में निरन्तर चलते-चलते उन परमतत्त्व परमात्मा का दर्शन ज्ञान है। इस प्रकार ज्ञान की निम्नतम सीमा वह है जब इष्टदेव आपके हृदय से निर्देशन करने लगें और इसकी अधिकतम सीमा वहाँ है कि वह प्रभु जहाँ से निर्देशन कर रहे हैं, उनका स्पर्श और उनमें स्थिति। अत: ज्ञान परमात्मा के प्रत्यक्ष दर्शन के साथ मिलनेवाली अनुभूति है। इसके अतिरिक्त सृष्टि में ज्ञान-अज्ञान की अनेकों परिभाषाएँ और कसौटियाँ हैं वे जीवनयापन के तौर-तरीके हैं, शिष्ट संस्कृति हैं। संत कबीर भी ज्ञान को आध्यात्मिक सन्दर्भ में लेते हैं। अपने एक भजन में वह कहते हैं–
ऐसा ज्ञान ना देखा रे अवधू! ऐसा ज्ञान न देखा।।
पहिले मोरी माई मरि गई, पीछे जनम हमार।
बाबा चले हैं ब्याह करन को, हमहूँ चले बरात।।
रे अवधू! ऐसा ज्ञान न देखा।।
पाँच भाइ हम एक संग जनमे, चारि के मरते देखा।
पाँच पचिस भौजइया मरि गईं, हमहीं लगावत लेखा।।
रे अवधू! ऐसा ज्ञान न देखा।।
एक चिंउँटी के मृत्यु भये ते, नौ लख गिद्ध अघायँ।
कुछ खइलें कुछ भुइयाँ गिरवलें, कुछ छकड़न ले जायँ।।
अवधू! ऐसा ज्ञान न देखा।।
सन्तोष तखत पर जन राजा, विवेक लगी दरबानी।
जगमग ज्योति जले घट भीतर, मुक्ति भरे तहँ पानी।।
रे अवधू! ऐसा ज्ञान न देखा।।
सुन्ने आइल सुन्ने गइले, सुन्न भइल परवेसी।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, कमी रही ना बेसी।।
रे अवधू! ऐसा ज्ञान न देखा।।
ज्ञानेन्द्रियों द्वारा संग्रहीत सांसारिक जानकारियाँ ज्ञान नहीं हैं। संसार में आये दिन कहीं सत्ता परिवर्तन, कहीं जन्म-शादी-विवाह की खबरें, कहीं बुजुर्गों की शव-यात्रा से समाचार-पत्र भरे पड़े हैं। उत्थान-पतन की घटनाओं से मानव पल-पल परिचित हो रहा है। लेकिन कबीर साहब इसे ज्ञान नहीं मानते। वह बताते हैं कि ज्ञान का आरंभ कहाँ से है?
अवधू! ऐसा ज्ञान न देखा।
अवधूत योगी का पर्याय है। वधू अर्थात् माया! जिस पर इस माया का प्रभाव कम हो, अवध्य स्थिति के लिये जो प्रयत्नशील हो। योगियों के लिये इस सम्बोधन का प्रयोग गोरखनाथ जी के शिष्यों तथा बौद्ध-परम्परा के तांत्रिकों में अधिक पाया जाता है। वहाँ सुख-दु:ख के भान और बाह्य आचार से ऊपर श्रेष्ठ योगियों को अवधूत कहने का प्रचलन है। सन्त कबीर अवधू को उसकी वेशभूषा और साधना-पद्धति की व्यर्थता बताते हुए योग के रहस्य पर प्रकाश डालते हैं–
अवधू! जोगी जग से न्यारा।
मुद्रा निरति सुरति करि सींगी, नाद न खंडै धारा।।
अवधू……।।
बसै गगन में दुनीं न देखे, चेतनि चौकी बैठा।
चढ़ि अकास आसन नहिं छांड़ै, पीवै महारस मीठा।।
अवधू……।।
परगट कंथा माहैं जोगी, दिल में दरपन जोवै।
सहस्र इकीस छ: सै धागा, निहचल नाकै पोवै।।
अवधू……।।
ब्रह्म अगिनि में काया जारै, त्रिकुटी संगम जागै।
कहे कबीर सोई जोगेस्वर, सहज सुँनि ल्यौ लागै।।
अवधू……।।
हे अवधूत! योगी तो संसार से अलग होता है। सन्त कबीर के समकालीन गोरखपन्थी योगी कान में मुद्रा (कुण्डल) और गले में सींग की तुरही (शृंगीनाद) पहनते थे। इस वेष को महत्व न देकर सन्त कबीर कहते हैं कि वैराग्य ही योगी की मुद्रा है, सुरत ही शृंगी है। उसे बजाकर वह चिन्तन की धारा को खण्डित नहीं करता। वह चिदाकाश में रहता है, दुनिया से अपेक्षा नहीं रखता। वह सचेतावस्था की चौकी पर बैठता है। चिदाकाश में विचरण करते हुए भी वह आसन नहीं छोड़ता, मधुर रस का पान करता रहता है। देखने में वह कन्था, गुदड़ी ओढ़े रहता है लेकिन वस्तुत: वह दिल के दर्पण में देखता रहता है। वह रात-दिन में इक्कीस हजार छ: सौ श्वास के धागों को नाम में पिरोता है, ब्रह्मरूपी अग्नि में शरीर को जलाता रहता है, त्रिकुटी के संगम में वह जागता है, सहज शून्य में लौ लगाये रहता है।
इसी प्रकार वह अवधू को ज्ञान का रहस्य बताते हैं कि ‘ऐसा ज्ञान न देखा।’– हे अवधूत! ज्ञान आँखों से देखने की वस्तु नहीं है, बुद्धि से जाँचने की वस्तु नहीं है अर्थात् वह अचिन्त्य है, अगोचर है। उस ज्ञान की शुरुआत कहाँ से है? इस पर सन्त कबीर कहते हैं–
पहिले मोरी माई मरि गई, पीछे जनम हमार।
यावन्मात्र जगत्– चाहे राम जन्मे हों, चाहे कृष्ण– सबका जन्म माताओं से होता है; लेकिन कबीर का कहना है– ‘पहिले मोरी माई मरि गई’। भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं– ‘‘अर्जुन! त्रिगुणमयी प्रकृति ही गर्भ को धारण करनेवाली माता है और मैं परम चेतन ही बीजरूप से पिता हूँ।’’ सांसारिक माता-पिता तो निमित्त मात्र हैं। प्रकृति ही माता है। माताओं से ही शरीर का जन्म होता है लेकिन इसके विपरीत एक जन्म ऐसा भी है जिसके पीछे मृत्यु नहीं है। आदिशंकराचार्य जी से शिष्यों ने पूछा– ‘‘भगवन्! कौन-सा जन्म सराहनीय है?’’ उन्होंने उत्तर दिया– ‘‘वही जन्म सराहनीय है जिसकी मृत्यु न हो और वही मृत्यु सराहनीय है कि पुन: जन्म न हो।’’ वह है आत्म-दर्शन और स्थिति! द्रष्टा की स्वरूप में स्थिति!
एक जन्म तो हम सबका हो चुका है। शरीर का एक कलेवर हम सबके पास है। भगवान श्रीकृष्ण ने इसे वस्त्र की संज्ञा दी है–
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा–
न्यन्यानि संयाति नवानि देही।। (गीता, २/२२)
पुराने वस्त्र को त्यागकर मनुष्य जैसे नया धारण कर लेता है, इसी प्रकार भूतादिकों का स्वामी यह आत्मा जिस शरीररूपी वस्त्र को त्यागता है, त्यागकर नवीन शरीर धारण कर लेता है। आप पर हमला होने पर कोई आपका वस्त्र छिपाकर रख दे तो क्या आपकी रक्षा हो गई? शरीर का वस्त्र तो सर्प के केंचुल की तरह बदलना ही है। यह जन्म वस्त्रों का परिवर्तन मात्र है जो आज हम सबको उपलब्ध है। आपके हृदय में आपका सहज स्वरूप छिपा हुआ है, वही आपका रूप है। उस स्वरूप की प्राप्ति तब है जब पहले मायारूपी माता मर जाय। यही है– ‘पहिले मोरी माई मरि गई’। जब तक माया रंचमात्र भी शेष है, तब तक स्वरूप और आपके बीच में एक पर्दा पड़ा हुआ है। माया का अंतिम अस्तित्व जिस दिन शान्त हुआ तत्क्षण यह आत्मा अपने सहज स्वरूप को प्राप्त कर लेती है। माया के रहते यह कदापि सम्भव नहीं है। माई के मरते ही ‘पीछे जन्म हमारा’– वही जन्म हो गया जिसके पीछे मृत्यु नहीं है; जैसा कि गीता में है–
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्। (गीता, १८/६२)
अर्जुन! तुम परमशान्ति प्राप्त कर लोगे, उस घर को पा जाओगे जो शाश्वत है – तुम्हारा घर रहेगा और तुम्हारा जीवन। अर्थात् वह आत्मभाव को प्राप्त हो जाता है। यह स्थिति कैसे मिलेगी? माया पिण्ड छोड़े कैसे? उसका उपाय बताते हैं–
बाबा चले है ब्याह करन को।
परिवार में बुजुर्ग पिता के भी पिता को ‘बाबा’ कहा जाता है; किन्तु आज घर-द्वार छोड़कर कोई सन्त हो गया है तो वह भी बाबाजी कहलाता है; क्योंकि वह भी पुराण पुरुष परमात्मा की ओर अग्रसर है। इस प्रकार सत्गुरु उस परमात्मा से सम्बन्ध जोड़ने की कुंजी है। ब्याह का आशय है सम्बन्ध जोड़ना! ‘बाबा चले है ब्याह करन को’– उस परमात्मा से सीधा सम्बन्ध जोड़ने चले। आरम्भ में साधक बड़ा गरियार (अड़ियल) होता है। जैसे नया बछड़ा जब पहली बार हल में जोता जाता है, उसे संकेत करें इधर तो वह भागेगा उधर! वह कभी अपना पाँव तुड़ा लेता है, कभी मालिक का, तो कभी हल का जुआ ही तोड़ देता है। किसी नौसिखिया ड्राइवर को आप ट्रैक्टर की स्टेयरिंग पकड़ा दें, पाँच मिनट उधर ध्यान न दें तो वह खड्ढ में गिरा देगा, स्वयं भी गिर जायेगा। इसी तरह साधना के प्रवेशकाल में साधक ढकेले-ढकेले चलता है। ‘हमहूँ चले बरात’– हम भी बलात् अर्थात् ढकेले-ढकेले चले।
आदि शंकराचार्य दिग्विजय करते प्रयाग पहुँचे। वहाँ एक कर्मकाण्डी महात्मा कुमारिल भट्ट धान की भूसी पर आग लगाकर बैठे हुए थे। वह शरीर को तिल-तिल जलाकर प्रायश्चित करने में लगे थे। शंकराचार्य जी ने उनसे कहा– ‘‘इस प्रकार चमड़ी जलाने से मोक्ष कैसे मिलेगा? आइये, शास्त्रार्थ कीजिए।’’ कुमारिल ने कहा– ‘‘अब तो मैं व्रत ले चुका हूँ। मेरा शिष्य मण्डन मिश्र मेरे ही समान है, आप उससे शास्त्रार्थ करें।’’ शंकराचार्य मण्डन मिश्र के पास पहुँचे तो वे बिगड़ खड़े हुए– ‘‘कल के लड़के ! तुम्हें संन्यास लेने का अधिकार कहाँ है?’’ शंकराचार्य ने कहा– ‘‘महोदय! बालक तो आप हैं। शरीर के बाल पक गये तो इस चमड़ी के बाल पक गये, झुर्रियाँ पड़ गयीं तो वस्त्र में पड़ गयीं। महान् वह है जो आत्मतृप्त और आत्मस्थित है। बड़ा मैं हूँ। आपको तो अभी बहुत कुछ सीखना है।’’ कई दिन सत्संग चला और अंतत: मण्डन मिश्र को पराजय स्वीकारना पड़ा। उस समय मण्डन मिश्र की आयु ७५ वर्ष और शंकराचार्य की आयु १८ वर्ष के लगभग थी। तात्पर्य यह है कि जो पुराण पुरुष परमात्मा को प्राप्त, आत्मस्थित है ऐसा महापुरुष ही सत्गुरु होता है, बाबा होता है। वह भटके हुए पथिक को पकड़कर सीधे परमात्मा से सम्बन्ध जोड़ देता है और ‘हमहूँ चले बरात’– साधक बलात् चलता है। लाख सिखायें, बालक भूल करते ही हैं।
माता के मरने के पश्चात् आपका जन्म हुआ। प्रश्न उठता है कि क्या आपका अकेले जन्म हुआ? कबीर कहते हैं– नहीं,
पाँच भाई हम एक संग जनमे, चार के मरते देखा।
पहले हमारी पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गंध के पीछे भागती रहती थीं; उन सत्गुरु के आदेश के अनुसार ये पाँचों सिमटकर अहर्निश इष्टोन्मुख प्रवाहित हो गयीं। पहले ये बहिर्मुखी थीं, अब अंतर्मुखी हो गयीं। इन्द्रियाँ बाहर रूप देख रही थीं, अब हृदय में इष्ट का स्वरूप पकड़ने लगीं। ये सुख के लिये संसार में रस ढूँढ़ रही थीं, अब हृदय में ब्रह्म-पीयूष ढूँढ़ने लगीं, प्रभु की दिव्य गंध पकड़ने लगीं, पावन-चरणों का स्पर्श पाने लगीं, भगवान की आवाज पकड़ने लगीं। ‘पाँच भाई हम एक संग जनमे’– आँख बाहर देखती हो, कान भीतर सुनें– यह असम्भव है। सभी इन्द्रियाँ सिमटकर एक साथ लगती हैं; किन्तु क्रमश: चलकर चार इन्द्रियों के क्रियाकलाप शान्त हो जाते हैं, मात्र शब्द रह जाता है। शब्द ब्रह्म है, जहाँ से परमात्मा निर्देश देता है वह मूल मात्र रह जाता है। इसके साथ ही–
पाँच पचिस भवजइया मरि गईं, हमहीं लगावत लेखा।
रे अवधू! ऐसा ज्ञान ना देखा।।
पाँच तत्त्व– छिति-जल-पावक-गगन-समीर इस शरीर के निर्माता हैं। पचीस प्रकृति इन पाँच का पाँचों में संचारित होना है; जैसे– पृथ्वी में आकाश भी है, अग्नि है, वायु है, जल भी है लेकिन बहुतायत पृथ्वी की है। इसी प्रकार आकाश में भी अग्नि, वायु, पृथ्वी, सभी तत्त्व विद्यमान हैं लेकिन मूल आकाश है। इस प्रकार पाँचों में पाँचों का संचार होने से इनमें क्रिया आरम्भ हो जाती है। ये हैं पचीस प्रकृति। कबीर कहते हैं– ‘पाँच पचिस भवजइया मरि गईं’– भव माने होता है संसार! संसार में बार-बार जन्म देनेवाले पाँच तत्त्व और पचीस प्रकृति मिट गये। कब? पहले पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ इष्टोन्मुखी हुईं, शब्द मात्र रह गया। शब्द ही ब्रह्म है, उस समय पाँच तत्त्व और पचीस प्रकृति जो आवागमन में भटकानेवाली थीं, वह भी शान्त हो गयीं लेकिन ‘हमहीं लगावत लेखा। रे अवधू! ऐसा ज्ञान ना देखा।’ यह स्थिति भक्त के हृदय की है। इसे वही जानता है जिसके हृदय में यह स्थिति आ गई है।
कै जाने जिउ आपना कै रे जनावे पीउ।
या तो वह जानता है जिसमें यह स्थिति आयी या भगवान करुणा कर किसी को बता दें, वह भी जान जाता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश की घटना है। हमारे गुरुदेव के भी गुरुदेव एक पागल, विक्षिप्त और उन्मत्त की तरह घूमा करते थे। महाराज जी ने बताया कि पचासों बार हमने उन्हें सड़क पर आते-जाते देखा था। लोग उन्हें कहते कि यह पागल हैं, मैं भी जानता था कि यह पागल हैं। लेकिन हमारे गुरु महाराज को आकाशवाणी हुई कि इस मन्दिर में तुम्हारे गुरु महाराज हैं। महाराज जी खण्डहर हो चले उस मन्दिर में गये और घूमकर लौट आये, वहाँ कोई न दिखा क्योंकि मन्दिर में धुप्प अँधेरा था। महाराज जी को बड़ी झुँझलाहट हुई कि पता नहीं कौन हमें आवाज देता है कि इसमें गुरु महाराज हैं। इसमें तो कोई नहीं है। इतने में भीतर से खाँसने की आवाज आयी। वास्तव में उसमें वही महापुरुष बैठे थे। गुरु महाराज ने वहाँ प्रकाश की व्यवस्था की, तीन दिन तीन रात उनकी सेवा में लगे ही रह गये। इस अल्प अवधि में गुरु महाराज से साधन-क्रम सीखा और भजन में लगे रह गये। कुछेक वर्षों में ही महाराज जी ‘महाराज’ हो गये। उनके हृदय में वह स्थिति थी। प्रकृति उनके लिये समाप्त थी। वह शब्द-ब्रह्म में स्थिति पा गये। यह सब ‘हमही लगावत लेखा’– वही जानता है जिसके हृदय में यह घटित होता है अथवा प्रभु कृपा करके जिसे बता दें। महाराज जी बताते थे कि हम उन्हें पागल जानते थे, भगवान ने आदेश दिया ‘यह तुम्हारे गुरु महाराज हैं।’ इस प्रकार भगवान जिसे समझा दें, वह भी जान जाता है। अगली पंक्ति में कहते हैं–
एक चिंउँटी के मृत्यु भये ते, नौ लख गीध अघायँ।
योगी के सिमटे हुए संयत चित्त को, निरुद्ध चित्त को चींटी की संज्ञा दी जाती है। चित्त तो इतना बड़ा है जितना संसार! तुलसीदास जी कहते हैं–
असन, बसन, पसु बस्तु बिबिध बिधि, सब मनि महँ रह जैसे।
सरग, नरक, चर अचर लोक बहु, बसत मध्य मन तैसे।। (विनय-पत्रिका, १२४)
असन माने भोजन; बसन माने वस्त्र, विविध प्रकार की सामग्री, सवारी-साधन, इज्जत-प्रतिष्ठा, बाग-बगीचा, खेत-क्यारी– यह सबकुछ एक मूल्यवान मणि में अंतर्निहित है। उससे सभी वस्तुएँ खरीदी जा सकती हैं, ठीक इसी तरह से मन के अंतराल में स्वर्ग-नरक, चर और अचर, सम्पूर्ण लोक विद्यमान है। ‘चिदबिलास जग’– जगत् इस चित्त का विलास है। चित्त इतना बड़ा है जितना संसार है। विधाता की सृष्टि इस चित्त में समायी है। जब जिसका क्रम आता है यह चित्त वही आकार फेंकता रहता है। किन्तु सद्गुरु की शरण में सतत अभ्यास करते-करते प्रकृति का आवरण शान्त होने लगता है, शब्दमात्र रह जाता है। उस समय चित्त इतना सूक्ष्म हो जाता है जितना बारीकवाली चींटी। लेकिन अभी चित्त जिन्दा है। निरुद्ध चित्त भी जब शान्त हो जाय, परमात्मा में समाहित हो जाय, यह है चित्त का मरना! स्थिर चित्त योगी का जब चित्त भी मर जाय–
मन मरा माया मरी, हंसा बेपरवाह।
जाका कछू न चाहिए, सोई शाहंशाह।।
जहाँ मन मरा तो माया मर गयी; क्योंकि माया जिस पर अंकित होती थी वह धरालत था मन! जब वही मिट गया तो माया कहाँ असर करे? माया टिके कहाँ? मन मरा तो माया मरी, ‘हंसा बेपरवाह’– उस समय हंस निश्चिन्त हो जाता है। ‘संत हंस गुन गहहिं पय, परिहरि बारि बिकार।’ (रामचरितमानस, १/६)– मन मरते ही साधक निश्चिन्त हो जाता है। ‘जाका कछू न चाहिए, सोई शाहंशाह’– यदि भगवान अलग हैं तो चाह अवश्य होगी अर्थात् वह परमात्मा भी अब भिन्न न रहा, अत:–
दु:ख हरे सुख को दिये, मन का कर दे अन्त।
कह कबीर कब मिलहिंगे, परम सनेही सन्त।।
यह मन के मिटने-मिटानेवाली योग्यता भी अपने बस की नहीं है, सद्गुरु की देन होती है। दु:ख को तो हर लें, बदले में सुख प्रदान कर दें और मन का निरोध मात्र न करें बल्कि मन को मार डालें– ऐसे परम सनेही संत कब मिलेंगे? वही सन्त परम सनेही हैं जिनका अपना स्वयं का मन मिट गया हो और आपके भी मन को शनै:-शनै: पकड़कर मिटा सकते हों क्योंकि आज चित्त निरुद्ध है तो कल फिर पनप सकता है इसलिये चित्त ही समाहित हो जाय। यह निरुद्ध चित्त भी जहाँ मृतप्राय हुआ, मर गया, परमात्मा के रूप में समाहित हो गया, तो ‘नौ लख गीध अघायँ’। ‘नवद्वारे पुरे देही’ (गीता, ५/१३) इनके द्वारा विषयोन्मुख प्रवाह की लाखों प्रवृत्तियाँ हैं, तरंग पर तरंग लगी है। किसी भी योनि में इन दरवाजों से भोग भोगकर जीवात्मा आज तक तृप्त नहीं हुआ। यह जीव तृप्त होता है जिसकी यह सन्तान है, अपने ही उद्गम परमात्मा का दर्शन, स्पर्श और स्थिति पाने पर। इसके पूर्व–
कवन जोनि जनमेउँ जहँ नाहीं।
मैं खगेस भ्रमि भ्रमि जग माहीं।।
देखेउँ करि सब करम गोसाईं।
सुखी न भयउँ अबहिं की नाईं।। (रामचरितमानस, ७/९५/८-९)
विगत जन्मों का अपना संस्मरण सुनाते हुए कागभुशुण्डिजी कहते हैं– गरुड़ जी! ऐसी कौन-सी योनि है जहाँ सुख के लिये मैं बार-बार न जन्मा। वहाँ हमने सभी कर्म करके देख लिये, इन्द्रियाँ सदैव अतृप्त रहीं, मन सदैव भूखा रहा। लेकिन यह निरुद्ध चित्त जहाँ शान्त हुआ, परमात्मा में समाहित हो गया, ईश्वर का प्रवाह चतुर्दिक छा गया तो, ‘नौ लख गीध अघायँ’– इन्द्रियों की लाखों प्रवृत्तियाँ सदा-सदा के लिये तृप्त हो जाती हैं; और,
कुछ खइले कुछ भुइयाँ गिरवले, कुछ छकड़न ले जायँ।
अवधू! ऐसा ज्ञान न देखा।।
‘कुछ खइले’ अर्थात् वर्तमान, ‘कुछ भुइयाँ गिरवले’ अर्थात् भूतकाल और ‘कुछ छकड़न ले जायँ’ अर्थात् भविष्य; इस प्रकार जीव भूत, भविष्य, वर्तमान तीनों कालों में तृप्त हो जाता है। जैसा कि वैदिक ऋषियों की अनुभूति है–
ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।
पूर्ण में से पूरा का पूरा दान देने पर भी शेष पूर्ण ही बच रहता है। इसी आशय को सन्त कबीर इन पंक्तियों में व्यक्त करते हैं कि निरोध चित्त भी जब समाहित हुआ तो इन्द्रियों की लाखों प्रवृत्तियाँ, जो किसी भी योनि में कभी तृप्त नहीं हुई थीं; बहुत-सा भू-भाग समेटा किन्तु कभी मन का पेट नहीं भरा; वह चित्त के मिटते ही सदा-सदा के लिये तृप्त हो गयीं क्योंकि चित्त के मिटते ही माया का अस्तित्व मिट गया, प्रकृति पुरुषोत्तम में परिवर्तित हो गयी, ‘ईशावास्यमिदं सर्वम्’ की स्थिति आ गयी। ऐसे महापुरुष की रहनी कैसी होती है? इस पर कहते हैं–
संतोष तखत पर जन राजा, विवेक लगी दरबानी।।
समाज में सन्तोष शब्द का प्रयोग कई अर्थों में होने लगा है। घी गिर गया तो कहते हैं– ‘बेटा, संतोष कर ले! सूखा ही खा ले।’, ‘इस साल फसल अच्छी थी लेकिन ओले पड़ गये।’; किसी के खलिहान में आग लग गई, लोग सान्त्वना देते हैं– ‘भैया! सन्तोष करो, दैव आगे देगा न।’ यह कोई सन्तोष नहीं है, परिस्थिति से समझौता मात्र है। संतोष का अर्थ है– पूर्ण तृप्ति। ‘आठवँ जथा लाभ सन्तोषा।’ (रामचरितमानस, ३/३५/४)– भक्ति के नौ सोपानों में से आठवें स्तर पर लाभ मिलने लगा। साधक जिसे खोजता था, उस प्रभु का लाभ मिलने लगा, सन्तोष आने लगा। अत: जहाँ निरुद्ध चित्त भी मिटा, जो सम है, जिसमें विषमता नहीं है, उससे तोष मिलने लगा तो जो आज तक जन था, सेवक था, आज वह राजा अर्थात् स्वामी हो गया। कारण कि ‘जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।’ (रामचरितमानस, २/१२६/३)– भगवन्! तुम्हें जानकर जाननेवाला तुम ही हो जाता है। सेवक खो जाता है, स्वामी ही शेष बचता है।
एक शब्द सम शब्द ताकर जानै भेऊ।
नानक ताका सर नवै सोइ निरंजन देऊ।।
वह निरंजन देव की स्थितिवाला हो गया। ‘विवेक लगी दरबानी’– सत्य क्या है? असत्य क्या है?– इसकी पहचान और फिर सत्य पर आरूढ़ रहने की क्षमता का नाम विवेक है। इस महापुरुष के यहाँ ऐसे विवेकियों का दरबार लगा रहता है। शराब-जुआ जैसे व्यसनवाले वहाँ नहीं पहुँचते।
जगमग ज्योति जले घट भीतर मुक्ति भरे जहँ पानी।
रे अवधू! ऐसा ज्ञान न देखा।।
परमात्मा ज्योतिर्मय है। जैसा कि भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा–
न तद्भासयते सूर्यो न शशांको न पावक:।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।। (गीता, ५/६)
प्रभु को न सूर्य प्रकाशित करता है न चन्द्रमा और न अग्नि ही; वह स्वयं प्रकाशस्वरूप, ज्योतिर्मय है। सद्गुरु के सान्निध्य में साधक पहले बरियाई चला। फिर चित्त का निरोध हुआ। निरुद्ध चित्त भी जब मिट गया तब सम से तोष मिला। वही सेवक स्वामी बन गया, द्रष्टा स्वरूप में स्थित हो गया, जन राजा हो गया, विवेकियों का दरबार लगा और उस महापुरुष की रहनी क्या? ‘जगमग ज्योति जले घट भीतर’– ज्योतिर्मय परमात्मा हृदय में सदा एकरस जगमगाने लगा। वह ज्योति न घटती है न बढ़ती है, न उसके लिये ईंधन लगना है। भौतिक उपकरणों के बिना ही उसका अंत:करण प्रकाशित रहता है।
‘मुक्ति भरे जहँ पानी’– मुक्ति ऐसे महापुरुषों की सेवा करती है। मुक्ति का कार्य केवल इतना है कि जो विवेकी महापुरुष के संसर्ग में आये उनको तृप्ति प्रदान करे, उनकी प्यास बुझाये, मोक्षपर्यन्त दूरी तय कराये। पूज्य गुरु महाराज कहते थे– ‘‘हो! दुनिया में सब दानी ही तो बने हैं– ‘हाथी श्वान लेवा देई।’– कुत्ता देकर बदले में हाथी माँगते हैं। असली दाता तो मैं हूँ जो मोक्ष का दान देता हूँ।’’ यह क्षमता केवल उन सत्गुरुओं में होती है जो समत्व से तृप्त हैं, जो जन से स्वामी की स्थिति में आ गये हैं, जिनके हृदय में जगमग ज्योति सदा जलती रहती है। उन्हीं के यहाँ मुक्ति सेविका के रूप में रहती है कि उनके यहाँ जो विवेकी आया, उसकी श्रद्धा और संस्कार के अनुपात में मुक्ति की आपूर्ति करें। ऐसे महापुरुषों के यहाँ आप मुक्ति चाहें न चाहें, मुक्ति स्वत: संचारित हो जाती है, मुक्ति के संस्कारों का सूत्रपात हो जाता है। कागभुशुण्डि जी के आश्रम में हंस पहुँचते थे। कबीर कहते हैं– वहाँ विवेकियों का दरबार लगा रहता है। मदिरा पीनेवाले वहाँ नहीं बैठेंगे; क्योंकि वहाँ मिलती ही नहीं। अन्त में कहते हैं–
सुन्ने आइल सुन्ने गइले, सुन्न भइल परवेसी।
भारतीय जनश्रुतियों में है कि स्वामी विवेकानन्द धर्मसंसद में भाग लेने शिकागो (अमेरिका) गये। वहाँ के व्यवस्थापकों ने सोचा, ‘‘गुलाम देश का पादरी संन्यासी, धर्म के विषय में यह क्या बतायेगा? इसे कौन-सा विषय दिया जाय? अच्छा तो होगा कि इससे प्रश्न ही न किया जाय।’’ उन्होंने बोर्ड पर उनके लिये जीरो लगा दिया। विवेकानन्द असमंजस में पड़े, आँख बन्द करके गुरु महाराज का ध्यान किया। रामकृष्ण परमहंस जी ने ध्यान में ही दर्शन देकर कहा– ‘‘तू घबड़ाता क्यों है? तू अपनी बात कह। बोलूँगा तो मैं!’’ निर्द्वन्द्व होकर विवेकानन्द ने बोलना आरम्भ किया कि ‘जीरो इज गॉड!’
वस्तुत: चित्त इतना बड़ा है जितना बड़ा संसार; किन्तु योग-साधना के द्वारा यह संयत होकर संकल्प-विकल्परहित शून्य में अचल स्थिर ठहर जाता है। वहीं पर भगवान हैं। यह जीवात्मा उस परमात्मा का अंश है इसलिए शून्य से आता है। उस परमात्मा को ही उद्देश्य बनाकर भजन-साधन, भक्ति का मार्ग तय होता है– अन्य किसी को भजा भी तो नहीं जा सकता! ‘ईस्वर अंस जीव अबिनासी’– वह शान्त है, सम है, हलन-चलन से रहित है। उसी से इसकी उत्पत्ति है और उसी को उद्देश्य बनाकर वहाँ तक का रास्ता तय किया जाता है इसलिए ‘सुन्ने गइले’ और ‘सुन्न भइल परवेसी’– जब चित्त सब ओर से सिमटकर शान्त ठहर गया, शून्य की अवस्था आयी, लव भर के लिये उन चरणों में सुरत लग गई, तत्क्षण भगवान आपको अपनी विभूति प्रदान कर देते हैं। वह आपमें दृष्टि बनकर संचारित हो जायेंगे, सामने स्वयं खड़े हो जायेंगे। आप नहीं समझेंगे, तब भी समझा लेंगे। यही है ‘सुन्न भइल परवेसी’। फिर वह भगवान हैं कैसे? कबीर कहते हैं कि प्रकृति की तरह उनमें घट-बढ़ नहीं है–
कहत कबीर सुनो भाई सन्तो! कमी रही ना बेसी।
रे अवधू! ऐसा ज्ञान न देखा।।
कबीर कहते हैं– जहाँ शून्य में प्रवेश मिल गया, स्थिति मिल गयी तो न कभी कमी आना है, न अधिक होना है। वहाँ घट-बढ़ नहीं है। जो स्वयंसिद्ध है, सहज है, ‘विधि न बनाये, हरि आप बनि आये’ वह स्थिति मिल जाती है।
उस ज्ञान को प्राप्त करने के लिये आप सब किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष की शरण जायँ। आप घर बैठे शरण जायँ। उनके पास शरीर से जाने की बहुत जरूरत नहीं है। उनको आपने दो-एक बार देख लिया है, इतना पर्याप्त है। शरीर कहीं भी रहे, आप मन से आयें-जायें, सुबह-शाम उनके उपदेश के अनुसार अभ्यास करें। दो-चार मिनट नियम से उनका स्वरूप देख लिया करें। जिस दिन श्रद्धा से डोरी लगी, एक मिनट भी उनका स्वरूप हृदय में रोकते बना तो जिसका नाम अनुभव है, जिसे कहते हैं कि आत्मा रथी हो जाती है, भगवान रथी हो जाते हैं, भजन जागृत हो जाता है– यह सब जागृत हो जायेगा। भजन की जागृति का अन्य कोई उपाय है ही नहीं।
रामचरितमानस में प्रसंग आता है कि वनवासकाल में लक्ष्मण ने भगवान राम से पूछा– सुख का स्रोत क्या है? भगवान ने बताया–
भगति तात अनुपम सुखमूला।
मिलइ जो सन्त होइँ अनुकूला।। (रामचरितमानस, ३/१५/३)
सम्पूर्ण सुख का मूल तो भक्ति है लक्ष्मण! किन्तु उसे सीधा मैं भी नहीं दे सकता। वह तभी मिलेगी जब सन्त अनुकूल हों। इसलिये कैसे भी वेष में सन्त आयें, उनका सत्संग और उनकी सेवा अनिवार्य है। उन्हें दो रोटी देने से नहीं चूकना चाहिए। क्योंकि,
मति कीरति गति भूति भलाई।
जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं पाई।।
सो जानब सतसंग प्रभाऊ।
लोकहुँ बेद न आन उपाऊ।। (रामचरितमानस, १/२/५-६)
कभी-कभी संत वेष में कालकेतु, कालनेमि भी पहुँच जाया करते हैं तो भी क्या कर लेंगे? वे बहुत करेंगे तो एक कम्बल चुरा ले जायेंगे। सेवा करनेवाले ने तो सन्त समझकर ही उसकी सेवा की है इसलिये संतों की सेवा से चूकना नहीं चाहिए। साधुसेवा से कल्याण ही होता है–
साधु ते होइ न कारज हानी।
देवर्षि नारद के सम्बन्ध में ऐसी ही प्रसिद्धि है कि जहाँ उनका सत्संग होता, भक्तों की किसी-न-किसी कमजोरी को बतलाया करते थे। एक बार रुक्मणी देवी को अहंकार हो गया कि हमारे बराबर भक्त भला कौन है? नारद जी को इस कमजोरी का पता चला तो उनके पास पहुँच गये और कहा– रुक्मणी जी! आप चाहे जितनी आत्मप्रशंसा कर लें, भगवान के हृदय में स्थान तो गोपियों का है। आपका स्थान तो शून्य है, न के बराबर है।
रुक्मणी ने कहा– अरे नहीं नारद जी! मैं मूर्धाभिषिक्त नरेश भीष्मक की कन्या! मेरी इतनी तपस्या न होती तो भगवान स्वयं चलकर हमारे यहाँ क्यों जाते? हमें वहाँ से वरण कर क्यों लाते? नारद ने कहा– रुक्मणी जी! कुछ भी कह लें लेकिन सभा-सोसाइटी में, इष्ट-मित्रों में भगवान के मुख से जब भी निकलता है तो ‘गोपियाँ….राधिका….गोपियाँ….।’ बस! आपका नाम तो हमने कभी सुना नहीं। प्रभु के हृदय में गोपियों की तुलना में आपका स्थान दस प्रतिशत भी नहीं है।
इतना सुनते ही रुक्मणीजी तैश में आ गयीं। उसी आवेश में उन्होंने आभूषण इधर फेंका, दुपट्टा उधर फेंका, बाल छिटकाया और चल पड़ीं कोपभवन की ओर! जनसामान्य परिवार में कोई नाराज होता है तो सबके सामने ही रोना शुरू कर देते हैं। राजा-महाराजाओं के यहाँ सबके सामने रुलाई होने लगे तो राज-काज चौपट हो जाय। यदि वहाँ नाराजगी प्रकट करना है तो जायें कोपभवन!
रुक्मणी जी कोपभवन की ओर चल पड़ीं। भगवान श्रीकृष्ण की दृष्टि पड़ गयी। वह बोले– आज तो कुछ अलग ही दृश्य है। कहीं नारद जी की दृष्टि तो नहीं पड़ गयी? सेवकों ने बताया– हाँ भगवन्! आज नारद जी ही अतिथि थे, खूब सत्संग चला है। श्रीकृष्ण ने कहा– तब तो शीघ्रता करो। दो-चार रजाई ले आओ। सेवक दौड़ पड़े। रजाइयाँ आ गयीं। उनको ओढ़कर भगवान लगे डुग-डुग काँपने! राजवैद्य की दवा से भी आराम नहीं मिला।
समाचार रुक्मणीजी तक भी पहुँचा कि भगवान असाध्य रोग से पीड़ित हैं। रुक्मणी ने सोचा– कोपभवन में जिन्हें हमें नाराजगी दिखानी थी उन्हें तो अब-तब लगा है। पहले वह स्वस्थ हो लें, तब कोपभवन अटेन्ड करना उचित होगा। वह भगवान के पास आ गयीं। नारद जी भी पहुँच गये, पूछा– भगवन्! क्या हो गया?
भगवान ने कहा– कुछ पूछो मत नारद! बड़े मौके से पहुँच गये हो। लगता है मेरा अंतिम समय आ गया है। नारद ने कहा– प्रभो! हुआ क्या है? भगवान ने कहा– नारद! यह मस्तिष्क ज्वर है। इसके उपचार का आविष्कार आज तक हुआ ही नहीं। नारद जी बोले– प्रभो! कोई तो इलाज होगा? भगवान ने कहा– नारद! इलाज तो नहीं है। एक उपाय है। यदि कोई अपना पुण्य दान कर दे तो जान बच सकती है। नारद ने पूछा– प्रभो! वह कैसे होगा? श्रीकृष्ण ने कहा– मुझमें स्नेह रखनेवाली कोई रानी अपनी पवित्र चरणधूलि दे दे और मैं सिर पर धारण कर लूँ तो उस पुण्य से प्राण बच सकते हैं। अन्य कोई दवा नहीं है।
नारद जी रुक्मणी, जामवन्ती, सत्यभामा इत्यादि आठों पटरानियों की ओर घूम पड़े और बोले– जल्दी चरणधूलि दो। वे सब की सब पीछे हट गयीं और बोलीं– नारद जी! यह हमारे पूज्य हैं। इनकी चरणधूलि हम अपने सिर पर रखती हैं। हम अपनी चरणधूलि इन्हें सिर पर रखने के लिए कैसे दे सकते हैं? कल को लोग क्या कहेंगे कि रानियाँ अब सिर पर पाँव रखकर चलने लगी हैं। मर्यादा भी तो कुछ होती है नारदजी!
नारद ने कहा– आपको मर्यादा की पड़ी है, यहाँ जान जा रही है। आप सबको वैधव्य सहना पड़ सकता है। रानियाँ बोलीं– नारद! भाग्य का लिखा कौन टाल सकता है? रुक्मणी पीछे हट गयीं। श्रीकृष्ण ने और भी कड़वा मुँह बनाया, रुआँसे होकर बोले– नारद! वृन्दावन चले जाओ। कदाचित् किसी को तरस आ जाय।
नारद वृन्दावन की ओर भागे। वहाँ उन्होंने देखा– राधिका के संरक्षण में करील के कुंजों में बैठकर गोपियाँ श्रीकृष्ण के वियोग में कीर्तन कर रही थीं। उन्होंने नारद को देखा तो उठ खड़ी हो गयीं। गोपियों ने नारद जी को सादर प्रणाम किया और कहने लगीं– ‘‘देवर्षि! आप तो भ्रमणशील हैं। कहीं मेरे कन्हैया को देखा।’’
नारद बोले– हाँ, वहीं से तो आ रहा हूँ। कैसे हैं कन्हैया?– उन्होंने पूछा। नारद ने कहा– अभी तो ठीक हैं, लौटकर जाने पर उनसे भेंट हो भी सकती है, नहीं भी हो सकती। गोपियों ने कहा– बात क्या है, वे स्वस्थ तो हैं? नारद ने कहा– वह अत्यन्त बीमार हैं, साँस आ-जा रही है, अब-तब लगा है! गोपियों ने कहा– नारद जी! व्यर्थ की बातें न करें। यह बतायें कि हमलोगों लायक कोई सेवा तो नहीं है?
नारद ने कहा– आपकी चरणधूलि माँगा है। शायद उससे उनके प्राण बच जायँ। तुरन्त सब गोपियाँ रमण-रेती में पाँव पीटने लगीं। कहीं पाँव के स्पर्श के बिना कोई कण चला न जाय अन्यथा इन महापुरुष को मिट्टी ढोनी पड़ेगी और हमें पाप लगेगा। एक गोपी दौड़कर, खोजकर बड़ा-सा चीनीवाला बोरा ले आई। चरणधूलि से बोरा भरा और सबने उसे उठाकर नारद जी के सिर पर रख दिया।
नारद ने कहा– भगवान इसे अपने सिर पर रखेंगे, इसका भी तो विचार कर लो। इससे आपलोगों को नरक जाना पड़ सकता है। आपका परलोक नष्ट हो सकता है। राधिका ने कहा– नारद जी! समय नष्ट न करें। प्रभु जिएँ, प्रभु खुश रहें, हम अनन्तकाल तक नरक में रहें! बस, आप शीघ्र जायँ। बातों में आप जितना समय नष्ट कर रहे हैं उतना ही प्रभु को कष्ट हो रहा होगा। नारद सीधे भागे। वीणा ढोनेवाले बाबा; भेंट हो गई चीनीवाले बोरे से। वह भी रेतीली मिट्टी से भरा! किसी तरह काँखते-कूँखते वे द्वारका पहुँचे, बोरा पटकते हुए कहा– लीजिये चरणधूलि। भगवान उठकर बैठ गये, चरण-रज अपने सिर पर डाल लिया और बोले– नारद! इन पटरानियों और गोपियों का भला कौन मुकाबला। गोपियों की चरणधूलि मेरी चरणधूलि है। गोपियों में मै हूँ और वे मुझमें हैं, वे मेरा ही स्वरूप हैं। वे स्वरूपस्थ हैं। इन बेचारियों को तो अभी एकाध जन्म भटकना पड़ेगा।
उस दिन से रुक्मणी का अहं तिरोहित हो गया, भक्ति का अहंकार चला गया। पहले तो अपने बनाव-शृंगार में ही समय व्यतीत करती थीं, इधर-उधर चहलकदमी ही करती रहती थीं, कोई सेवा नहीं करती थीं, भक्त शिरोमणि जो ठहरीं! किन्तु उस दिन से झाड़ू-चौका सबकुछ अपने हाथों करतीं। उस दिन से भगवान की गृहस्थी सुधर गई। आज कोई आपके घर में कुटिलता के बीज बोता है तो आप उससे मुँह फुला लेंगे। नारद ने तो श्रीकृष्ण का घर ही बिगाड़ दिया था किन्तु श्रीकृष्ण ने उनसे मुँह नहीं फुलाया बल्कि कहा– नारद! बड़े मौके से आये हो। बैर से बैर बढ़ता है। प्रेम से सदा के लिये बैर की धुलाई हो जाती है। नारद जी आये थे आपस में बिगाड़ कराने; किन्तु रुक्मणी का भी कल्याण हो गया, गोपियों की महिमा स्थापित हो गई। नारद की श्रद्धा बढ़ गयी और भगवान की गृहस्थी सँवर गयी। पहले रुक्मणी भोजन की थाल भी भगवान के पास नहीं ले जाती थीं, दासियों से संकेत से भेजती थीं; अब काफी लेकर स्वयं दौड़ने लगीं।
इसलिए माताओं को चाहिए कि अपने कर्त्तव्य का पालन करें। कर्त्तव्यपालन का ही नाम जीवन है। कर्त्तव्यपालन से ही शुभ संस्कारों का सृजन है। बैठकर जीवन काटने की अपेक्षा सेवा मूल्यवान् है। माताओं को घर में भजन-कीर्तन करना-कराना चाहिए। इससे मासूम बच्चे-बच्चियों में सात्त्विक संस्कारों का उदय होता है। सेवा में कटौती नहीं करनी चाहिए। बड़ों का अदब और छोटों से स्नेह– यदि इतना व्रत कोई ले ले तो घर में सदैव सुख और शान्ति रहेगी। यदि टिन्न-टिन्न करके बिस्तर पर पड़े रहे तो दो दिन, चार दिन, दस दिन तो लोग सहन करेंगे; फिर आपका जीवन नरक और पूरे परिवार का भी जीवन नरक हो जायेगा। सन्त-सत्पुरुषों की सेवा और प्रभु के दो-ढाई अक्षर के किसी नाम का स्मरण सुखी जीवन की आधारशिला है।
!! ॐ श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय !!
(‘अमृतवाणी भाग-3’ से उद्धृत)