मोरे सैंया निकसि गये मैं ना लड़ी
वर्षों पूर्व की घटना है। हम मुम्बई हवाई अड्डे के प्रतीक्षालय में बैठे थे। साफ-सुथरी जगह पर ठीक सामने, जहाँ सबकी दृष्टि पड़ रही थी, सन्त कबीर के भजन की उक्त पंक्ति लिखी हुई थी। इस एक पंक्ति में ‘पढ़ा-न-लिखा’ कहे जानेवाले उन महापुरुष ने उस दर्द को व्यक्त कर दिया जो मनुष्य के हृदय में छिपा है। एरोड्रम के व्यवस्थाकारों ने इस पंक्ति को अत्यन्त उपयुक्त स्थल पर लिखवाया था, क्योंकि वहाँ के बाद लोगों को जाना है, प्लेन पकड़ना है। आत्मीय स्वजन तो वायुयान से उड़ गये- कोई अमेरिका, कोई यूरोप तो कोई अरब के लिये! जो विदा करने आये थे वहीं से देखते रह गये। प्रेम शंकालु होता है। वे सशंकित हैं कि विदेश जानेवाले कहीं वहीं रह न जायँ। कुछेक को चिन्ता होती है कि वहाँ वह विवाह न कर लें। वह आत्म-निरीक्षण करते हैं कि हमने उनसे कभी लड़ाई तो नहीं की, उन्हें कभी शिकायत का मौका तो नहीं दिया! स्वजनों को विदाई देने के पश्चात् लोग अपना अध्ययन करते हैं कि उनके साथ हमारा व्यवहार कैसा था।
हमने भजन की अन्य पंक्तियों पर भी विचार किया कि लोक-व्यवहार में इस भजन को प्रयोग किस सीमा तक हो सकता है? पूरा भजन इस प्रकार है–
मोरे सैंया निकसि गये मैं ना लड़ी।।
ना मैं बोली ना मैं चाली, ओढ़ के चदरिया अकेले पड़ी।
मोरे सैंया……।।
सीस महल के दस दरवाजे, ना जाने खिड़की कौन खुली।
मोरे सैंया……।।
मोरे संग की सात सहेली, ना मैं जाना न उनसे कही।
मोरे सैंया……।।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, यहि ब्याही ते कुमारी भली।
मोरे सैंया……।।
ऊपर की पंक्तियों में वह विचार करते हैं, कदाचित् घर की कोई खिड़की खुली रह गयी हो! खिड़की से बिल्ली कूद जाती है, चूहे निकल जाते हैं, मच्छर आ जाते हैं; किन्तु आदमी तो खिड़की से नहीं निकलेगा! मुबई-जैसे महानगरों में तो वह खिड़की से निकलने की कभी सोच भी नहीं सकेगा; क्योंकि मान लें वह छठीं मंजिल पर है। वहाँ से वह कूदेगा भी, तो राम नाम सत्य हो जायेगा। हमने कुछ कहा नहीं, कोई माँग भी नहीं रखी, किसी प्रकार की कोई भूल भी नहीं हुई, फिर निकल कैसे गये?
वस्तुत: सन्त कबीर का यह भजन आध्यात्मिक है। उन्होंने अपने आराध्यदेव को साईं, पिया या प्रियतम कहकर सम्बोधित किया। उनके चिन्तन का नाम राम था। उनके आराध्य राम थे। वह राम दशरथ का बेटा नहीं; बल्कि जो घट-घट में निवास करता है, कण-कण में व्याप्त है। चिन्तनरत कबीर से जब किसी ने पूछा– ‘आप क्या कर रहे हैं?’; वे बोले– मैं पिया को मना रहा हूँ। ‘प्रियतम मोसन रुठल हो।’ घर में खटपट होने से कोई रूठकर दाहिने-बायें चला ही जाता है; किन्तु भगवत्पथ में साधना की सर्वोच्च अवस्था में एक स्थिति आती है कि भगवद्-दर्शन, स्पर्श के साथ साधक उन्हीं में विलीन हो जाता है, साधक का अन्त:करण भगवान से भिन्न नहीं रह जाता, भगवान अलग नहीं रह जाते – ‘जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।’ (मानस, २/१२६/३)– सेवक सदा के लिए खो जाता है और परमात्मा ही शेष बचता है। अब परमात्मा कहीं अलग नहीं है जिसे ढू़ँढे। जिसे ढू़ँढ रहे थे, वह आत्मा से अभिन्न होकर स्थित हो जाता है।
श्रीकृष्ण कहते हैं– अर्जुन! संन्यासी या भक्त जिस विधि से तत्त्व को प्राप्त करता है, उसे सुनो। योग की विधि को धारण करके, एकान्त देश का सेवन करते हुए, वैराग्य में स्थिर रहते हुए चित को ध्यान में लगायें। सतत अभ्यास करने से काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, राग, द्वेष– ये विकार सर्वथा शान्त हो गये; ध्यान-धारणा-समाधि– इष्ट में प्रवेश दिलानेवाली स्थिति आ गयी, संयम सध गया, ध्यान परिपक्व हो गया, समाधि की स्थिति आ गयी, विकार शान्त हो गये उस समय वह पुरुष ब्रह्म को जानने के योग्य होता है। आवश्यकता थी तत्त्व को जानने की; लेकिन श्रीकृष्ण कहते हैं– वह ब्रह्म को जानने के योग्य होता है। संसार में भटकानेवाली प्रवृत्ति सदा के लिए शान्त हो गयी, भगवान में विलय दिला देनेवाली साधना परिपक्व हो गयी, चित्त के अन्तराल में यह अवस्था जिसके हृदय में आयी ब्रह्म को जानने के योग्य होता है।
इसी योग्यता का नाम पराभक्ति है अर्थात् भक्ति अपनी पराकाष्ठा पर है, परिणाम देने की स्थिति में है। इसी पराभक्ति के द्वारा पुरुष तत्त्व को जानता है। वह तत्त्व है क्या? भगवान कहते हैं– वह मुझे जानता है अर्थात् भगवान जो हैं – अजर-अमर हैं, कण-कण में व्याप्त हैं, शाश्वत हैं, अकाट्य हैं, अशोष्य हैं, काल से अतीत हैं अर्थात् जिन अलौकिक गुणधर्मोंवाला मैं हूँ, मुझे जानता है और मुझे जानकर वह तत्क्षण मुझमें समाहित हो जाता है। प्राप्तिकाल में तो भगवान मिलते हैं और प्राप्ति के दूसरे ही क्षण पुरुष अपनी आत्मा को ही उन अलौकिक गुणधर्मों से परिपूर्ण पाता है। फिर भगवान भिन्न नहीं रह गया। जो इस स्थिति मेंं हैं, वह हैं तत्त्वदर्शी। परमतत्त्व परमात्मा उन्हें विदित है। वह उसी में स्थितिवाले हैं। फिर भगवान भिन्न नहीं रह जाते जिनकी हम शोध करें। इसी को संत कबीर एक अन्य कूटपद में कहते हैं–
अरघे देले चली सुहासिन, चौके राँड़ भई संग साँईं।
जब तक भगवत्-पथ में अधकुचली अवस्था है तब तक तो भगवान उठायेंगे, बैठायेंगे, चलायेंगे, परितोष देंगे; आप घबड़ायेंगे तो वह सहलायेंगे, भूल करेंगे तो वह थोड़ी ताड़ना भी देंगे। यह सुहागन या सुहासिन की अवस्था है, तब तक भगवान निरन्तर आगे-पीछे रहते हैं, बातें करते हैं; किन्तु ‘चौके राँड़ भई संग साँईं’– चौके पर बैठते ही वह सुहासिनि राँड़ हो गयी। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार– ये चारों जहाँ कूटस्थ हो गये, अचल स्थिर ठहर गये, वही चौका है, कबीरचौरा है। मन में संकल्प करनेवाली प्रवृत्ति शान्त हो गयी, चित्त में बार-बार चिन्तन करनेवाली प्रशक्ति शान्त हो गयी, बुद्धि ने अपने से निर्णय लेना बन्द कर दिया, अब अहंकार आये भी तो किस पर? इस प्रकार इन चारों के निरुद्ध होते ही, चौके पर बैठने के दूसरे ही क्षण वह सुहागन राँड़ हो गयी। क्यों, क्या हो गया? क्या पिया मर गये?
कबीर कहते हैं– नहीं, ‘संग साँईं’– अभी तक जो पिया अलग थे, मार्गदर्शन कर रहे थे, वह भिन्न नहीं रह गये। अब वह अलग से दिखा नहीं सकता कि हमारा पिया यहाँ बैठा है। अब वह भगवान कहीं अलग दिखाने के लिये नहीं बचा। भगवान गये कहाँ? वह कहते हैं– ‘संग साँईं’– वह मुझसे भिन्न नहीं है। कबीर कहते हैं– ‘कोई अपने में देखा साँईं सन्त अतीत।’ यही स्थिति कैवल्यपदप्राप्त विकारों से मुक्त अरिहन्त परमपुरुष की है। यही अवतार कहलाते हैं। इसीलिए महापुरुषों के पीछे जहाँ-तहाँ ‘भगवान’ शब्द जुडा हुआ है।
‘भयो विवाह’– परमात्मा से सम्बन्ध तो हो गया; किन्तु ‘चली बिनु दुलहा’– अब साधक अलग से दिखाये कि ‘यह रहा दूल्हा’–ऐसी बात नहीं रह गयी; क्योंकि साँईं जो साधक से अलग थे, अभिन्न हो गये। ‘बाट जात समधी समुझाई’– भगवत्-पथ में चलते-चलते जहाँ यह अवस्था आयी तो समधी– जो सम तत्त्व है, धी अर्थात् बुद्धि उसमें प्रवाहित हो गयी, तहाँ समझ आ गयी। जो स्वरूप अविदित था, विदित हो आया। जिसे साधक जानना चाहता था उसकी जानकारी हो गयी। अब,
कहैं कबीर हम गवने जइबै तरब कंत लै तूर बजाई।।
कबीर कहते हैं– मैं इस पथ पर गमन करूँगा। किसलिए? ‘तरब’– तर जाने के लिये, भवसागर पार हो जाने के लिये! तरना कब सिद्ध है? ‘तरब कंत लै’– कंत माने स्वामी, मालिक, इष्ट! उन प्रभु को अपने में सँजोकर तरना होता है और जब सँजो ही लिया, उस समय पथिक की क्या अवस्था होती है? वह ‘तूर बजाई’– तुरीयावस्था में सदा निमग्न रहता है। फिर उसकी मस्ती में घटाव-बढ़ाव नहीं होता।
सुख दुख से एक परे परम सुख, ता सुख रहा समाई।
सन्तो! सहज समाधि भली।
जो सहज है, स्वयंसिद्ध है, ‘बिधि न बनाये हरि आप बनि आये।’ अर्थात् जिसे उस आदितत्त्व के साथ समत्व प्राप्त हो गया, वह है सहज समाधि! वहाँ भगवान खो गये। जो अब तक हमें बोध करा रहे थे वह खतम हो गये। इस पूर्णत्व की स्थिति को सम्बोधित करते हुए महापुरुष कहते हैं– ‘सैंया निकसि गये मैं ना लड़ी।’
सुतीक्ष्ण से भगवान ने कहा– वर माँगो। रामचरितमानस में है-
मुनि कह मैं बर कबहुँ न जाचा।
समुझि न परइ झूठ का साचा।। (मानस, ३/१०/२४)
मुनि ने कहा– भगवन्! वर के लिये तो हमने कभी विचार ही नहीं किया। हमारी तो समझ में ही नहीं आता कि सृष्टि में क्या झूठ है क्या सच? आपको जो अच्छा लगे, दे दें। भगवान ने कहा– हमने अपनी अविरल भक्ति आपको दी। मुनि ने कहा– फिर भी भगवन्! आप हृदय में बने रहना। भगवान ने कहा- हाँ, हाँ, वही दिया है। अत: माँग करना तो झगड़ा है। कबीर कहते हैं– हमने कोई माँग नहीं की?–‘मैं ना लड़ी’; फिर क्यों निकल गये? आपकी रहनी क्या थी?
ना मैं बोली ना मैं चाली, ओढ़ि के चदरिया अकेले पड़ी।
‘ना मैं बोली’– न तो मैं बोली कि हमें यह चाहिए, वह चाहिए; और ‘ना मैं चाली’– न चलने का अर्थ है कि चित्तवृत्ति शान्त है। आप यहाँ बैठे हैं लेकिन मन कभी घर, कभी मकान, कभी दुकान और कभी-कभी तो मन इतना विकल हो जाता है कि तीन सेकेण्ड में सृष्टि की परिक्रमा करके लौट आता है। – यह है चलना और न चलने का अर्थ है वृत्ति का अचल स्थिर ठहर जाना। कबीर कहते हैं कि हमने भगवान से कोई कामना नहीं की, निष्काम भाव से कर्म में लगे रहे और हमारी वृत्ति भी चलायमान नहीं हुई। ‘ओढ़ि के चदरिया अकेले पड़ी’– चित्त ही चदरिया है। इस चित्त में अनन्त सृष्टि के जितने भी नमूने हैं सब अंकित हैं–
बिटप–मध्य पुतरिका, सूत महँ कंचुकि बिनहिं बनाये।
मन महँ तथा लीन नाना तनु, प्रगटत अवसर पाये।। (विनयपत्रिका, १२४)
एक वृक्ष के अन्दर तरह-तरह के काष्ठोपकरण– चाहे आप उससे दियासलाई बनायें, कुर्सी-मेज बनायें या चाहे जो बना लें। इसी प्रकार धागे में नाना प्रकार के वस्त्रों की संरचना है। उस धागे से आप धोती बनायें या कुर्ता, पैराशूट बनायें या कुछ भी बना लें। ठीक इसी प्रकार मन के अंतराल में विधाता की सृष्टि के अनन्त शरीर विद्यमान हैं। जब जिस संस्कार का समय आता है उसी के अनुरूप शरीर बनाकर यह मन फेंकता रहता है। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा–
इहैव तैर्जित: सर्गो येषां साम्ये स्थितं मन:।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिता:।। (गीता, ५/१९)
उन पुरुषों के द्वारा जीवित अवस्था में ही सारा संसार जीत लिया गया। किनके द्वारा?– जिनका मन समत्व में स्थित है। अब, समत्व की स्थिति से और संसार जीतने से क्या सम्बन्ध है? इस पर भगवान कहते हैं– ‘निर्दोषं हि समं ब्रह्म’– क्योंकि वह ब्रह्म निर्दोष और सम है और इधर साधक का मन भी सिमटकर निर्दोष और सम स्थितिवाला हो गया, इसलिए वह ब्रह्म में स्थित हो जाता है। मन का विस्तार ही जगत् है। कबीर कहते हैं– ‘ओढ़ि के चदरिया अकेले पड़ी।’– चित्त ही चदरिया है। पहले तो यह चारों ओर दौड़ता रहता है, जैसा संस्कार वैसा बहकता रहता है, उन पिण्डों का आकार ले लेता है। किन्तु जब चादर ओढ़ लिया, चित्त सब ओर से समेट लिया, अंतराल में एकान्तसेवी होकर पड़ रहा, फिर कभी उद्वेग उत्पन्न ही नहीं हुआ; फिर सैंया क्यों निकल गये? हो सकता है, घर की कोई खिड़की खुली रह गयी हो!
‘सीस महल के दस दरवाजे’– शरीर एक मकान है। यह ‘साधन धाम मोच्छ कर द्वारा।’ (मानस, ७/४२/८)– यह साधना के लिये निवास-स्थान है, मुक्ति का दरवाजा है। ऐसा दुर्लभ तन पाकर जिसने अपना परलोक नहीं सुधारा, वह जन्म-जन्मान्तरों तक दु:ख पाता है और सिर पीट-पीटकर पश्चाताप करता है। मान लिया शरीर मकानमात्र है, लेकिन इसमें मलावरण-विक्षेप, अनेक जन्मों के संस्कार संचित हैं। जब चित्त सब ओर से सिमटकर अपने अन्तराल में गुप्त होकर पड़े रहने की क्षमता प्राप्त कर लेता है तहाँ यह पारदर्शी हो जाता है, क्योंकि एक भी संस्कार का आवरण नहीं है। यदि एक भी संस्कार है तो आप शान्त होकर नहीं बैठ सकते। जैसा संस्कार है वैसा ही उद्वेग पैदा होगा। पहले चित्त पर मलावरण-विक्षेप के अनन्त धब्बे थे, जग का अंधकार था; लेकिन चित्त को समेटकर उसी के अंतराल में स्थिर होकर एकान्त-सेवन की क्षमता आने पर यह शरीर शीशमहल हो जाता है, पारदर्शी हो जाता है।
‘दस दरवाजे’– पाँच कर्मेन्द्रियाँ और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ– यही दस दरवाजे हैं। ‘ना जाने खिड़की कौन खुली’– जानबूझकर तो हमने कोई भूल नहीं की; किन्तु अनजाने शायद कोई खिड़की खुली रह गयी हो। आँखों ने बाहर कुछ देख लिया हो, कानों ने बाहर कुछ सुन लिया हो, रसना ने कुछ गलत उच्चारण कर लिया हो, कुछ अलग ही टेस्ट ढूँढ़ लिया हो – यह है खिड़की का खुलना! शायद कोई खिड़की खुली रह गयी हो। ऐसा समझ में तो नहीं आता फिर हमारे प्रभु क्यों खिसक गये, मार्गदर्शन करना क्यों बन्द कर दिया? अगली पंक्ति में एकांत-सेवन का राज बताते हैं–
मोरे संग की सात सहेली।
भजन यह शरीर नहीं करता। यह तो निवास-स्थान मात्र है। भजन जब भी आपसे पार लगेगा, एक इष्टोन्मुखी लगन पैदा होगी, वह आपसे भजन कराती है। यदि लगन नहीं है तो आप चाहे तीर्थ में बैठे, चाहे मन्दिर-मस्जिद में, मन तो खुराफात करता रहेगा। यदि लगन है तो आप चाहे कूड़े पर खड़े रहेंगे तब भी सुरत वहीं टिकी मिलेगी जिसमें लगन लगी है। इसीलिये इष्टोन्मुखी वृत्ति को स्त्री की संज्ञा दी जाती है। इष्ट का भजन कैसे किया जाता है? इसके लिये योग-पथ की सात भूमिकाएँ हैं जिन्हें ‘योगवाशिष्ठ’ नामक ग्रन्थ के उत्त्पत्ति और निर्वाण-प्रकरण में ज्ञान की सात भूमिका के रूप में कहा गया है। इन्हीं सातों से होकर वह इष्टोन्मुखी प्रवृत्ति अर्थात् लवरूपी लड़की गुजरती है।
योग-पथ की पहली भूमि है ‘शुभेच्छा’– शुभ के प्रति इच्छा; विषयों के वैराग्य के साथ यह इच्छा हो कि मैं परमतत्त्व का साक्षात् करूँ। दूसरी भूमिका है ‘सुविचारणा’; शुभ के विषय में चिन्तन और जब विचार स्थिर हो गया कि ‘साधन ऐसे करो’, तहाँ तीसरी भूमिका ‘तनुमानसी’ आती हैं। अभी तक हम शरीर में विचरण करते थे, जब चिन्तन द्वारा समझ काम कर गयी तो साधक मन में ही तनवाला हो जाता है। मानस माने मन, अंत:करण! वह अंत:करण में सिमटने लगता है। इससे वह चौथी भूमिका ‘सत्त्वापत्ति’ में पहुँचता है। सत्त्व अर्थात् परमात्मा में बुद्धि स्थिर होने लगती है, उनका पक्ष सुदृढ़ होने लगता है। पाँचवीं भूमिका ‘असंसक्ति’ है; पदार्थों से संसर्ग क्षीण हो जाता है, उनमें आसक्ति समाप्त हो जाती है। कैसा भी संग मिले, उनसे असंग रहने की क्षमता ‘असंसक्ति’ है। भजन जागृत हो जाता है, परमात्मा की अनुकूलता प्रतीत होने लगती है कि संसार है ही नहीं। छठीं भूमिका ‘पदार्थभावना’ में पदार्थों का अभाव हो जाता है कि संसार है ही नहीं। संसार ही पदार्थ है, धोखे की एक टटिया भर है, जादू का खिलौना है। मानस में भगवान शिव की उक्ति है–
उमा कहउँ मैं अनुभव अपना।
सत हरि भजनु जगत सब सपना।। (मानस, ३/३८/५)
उमा! जगत् एक सपना है– आया और गया; इसलिये संसार के पदार्थ स्वप्नवत् प्रतीत होने लगते हैं। अब संगदोष हो तो किसमें? गिरेगा तो किसमें? वस्तु तो है ही नहीं! तब सातवीं भूमिका ‘तुर्यगा’ आती है। मन ही तुरंग (घोड़ा) है। साधक इसे भली प्रकार नियन्त्रित कर इस पर सवार होकर घूमता है। वह आत्मा में ही रमण करनेवाला हो जाता है। महापुरुष ने उस साधक को ‘ब्रह्मविद्वरिष्ठ’ भी कहा है।
जब लगन इष्टोन्मुखी प्रवाहित हुई तो योग की इन सात सीढ़ियों से गुजरना होता है। यही उसकी संगी, सहेलियाँ हैं। इन सातों के अतिरिक्त ‘ना मैं जाना’– हमने बाहर कुछ जाना ही नहीं, ‘ना उनसे कही’– हमने भगवान से कोई याचना भी नहीं की, फिर सैंया क्यों निकल गये?
कहत कबीर सुनो भाई साधो! यह ब्याही ते कुमारी भली।
कबीर कहते हैं– संतो! ध्यान दो। कबीर ने अपनी अधिकांश वाणियों का प्रसारण संतों को उद्देश्य बनाकर किया। कहीं उन्होने पंडित-ज्ञानी से कहा, तो कहीं साधु-संतों से कहा; क्योंकि वह जानते थे कि जिन स्थितियों का वे चित्रण कर रहे हैं, उसे समझने की क्षमता सबमें नहीं हो सकती। जिनमें यह क्षमता पायी गयी वे संत हैं क्योंकि वे इस पथ के पथिक हैं और उनके सामने भी वही दृश्य गुजर रहा है इसलिए वे अवश्य जानेंगे। इस पद की अंतिम पंक्ति में कबीर कहते हैं कि ऐसी ब्याही से तो कुमारी ही रहना अच्छा था। ब्याही अर्थात् भगवान आगे-पीछे राह बतायें, साथ चले, आप घबड़ा जाओ तो सन्तोष दें, भटक जाओ तो पकड़कर रास्ते पर ले आवें – यह है सौभाग्यवती, अहिवाती। ‘कुमारी’– ‘कु’ कहते है दूषित को; ‘मारी’ अर्थात् उन्हें मारनेवाला! कुमारी अर्थात् संसार के शुभाशुभ सस्कारों को मिटानेवाला; ‘शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्य: स मे प्रिय:।’ (गीता, १२/१७) शुभ वह जो परमात्मा की ओर ले चले, मुक्ति दिलाये; अशुभ वह है जो भटकाये, अनन्त योनियों में ले चले। इन दोनों का अंत करनेवाला भक्त मुझे प्रिय है। यही अवस्था है सैंया के निकलने का; क्योंकि विकार बचे ही नहीं तो किसे मारे? विकार सर्वथा कट गये तहाँ भगवान जो अलग थे, दर्शन और स्पर्श के साथ आत्मा में ही प्रवाहित हो गये। आत्मा के स्थान पर परमात्मा को खड़ा पाया– ‘कोई अपने में देखा साँईं सन्त अतीत।’ अब विलग कहीं प्रभु बचा ही नहीं! ‘राम न कहूँ खुदाई।’– वहाँ न कहीं राम बचा है, न खुदा। महापुरुष ही कल्याण के स्रोत रहे हैं। महापुरुषों ने तो घोषणा कर दी–
राखइ गुर जौं कोप बिधाता।
गुर बिरोध नहिं कोउ जग त्राता।। (मानस, १/१६५/६)
गुर बिनु भवनिधि तरइ न कोई।
जौं बिरंचि संकर सम होई।। (मानस, ७/९२/५)
गुरु के बिना कोई भवसागर पार हो ही नहीं सकता, चाहे विधाता और शंकर की स्थितिवाला ही क्यों न हो। गुरु से दुराव हो गया और जरा-सी भी दूरी शेष है, वह भी तय नहीं कर पायेंगे। यदि तकदीर रूठ जाय, विधाता आपके कर्मों में घोर यातना लिख दें तब भी गुरु आपको बचा लेंगे; क्योंकि जैसे-जैसे होनी का निर्माण होता है वह उस पथ पर ले चलेंगे। जिससे कुसंस्कारों का निवारण होता है, वे उस साधना-पथ पर आपको ले चलेंगे। वे आपको रख लेंगे, आपकी रक्षा कर ले जायेंगे।
इसीलिए गुरुनानक जी ने कहा– ‘वाहे गुरुजी दा खालसा! वाहे गुरुजी दी फतह।’– गुरु महाराज वाह! वाह! धन्य हैं! हम सब उनकी शरण हैं। और जहाँ गुरुजी हैं वहीं फतह है, विजय है। यह विजय तब होती है जब दर्शन, स्पर्श और स्थिति मिल जाय, द्रष्टा आत्मा अपने ही सहज स्वरूप में स्थित हो जाय। इसके आगे कोई सत्ता नहीं बची जिसकी हम शोध करें; इसलिए भगवान ने मार्गदर्शन करना, बोलना बंद कर दिया। हमारे पूज्य गुरु महाराज को जब यह स्थिति आयी, भगवान ने मिलना-जुलना, बोलना बन्द कर दिया तो वह उदास हो गये कि हो क्या गया? भगवान कहाँ चले गये? जैसे कुछ खो गया हो। लगभग छ: महीने के पश्चात् महाराज जी को स्थिति का बोध हुआ कि सैंया कहीं से निकले नहीं, बल्कि साधक ही उनमें समाहित हो गया।
भगवान महावीर में अपने शिष्यों को पंच नवकार (नमस्कार) सूत्र दिया- ‘ॐ णमो अरहंताणं’– जिन्होंने शत्रुओं का अन्त कर दिया है (वही है कुमारी), उनके प्रति समर्पित हो जाओ। ‘णमो सिद्धाणं’– सिद्धि उसे कहते हैं कि जिस परमात्मा को हम साधते थे, वह सध जाय। जिन्हें वह सचमुच प्राप्त है, उनकी शरण जाओ। ‘णमो आयरियाणं’– आर्य वह है इष्ट के अनुरूप जिसकी मनसहित इन्द्रियाँ संयत हैं, वृत्ति स्थिर है, जो सत्पथ पर है, निष्कपट है, छलहीन है, साधना में कभी प्रमाद नहीं करता वह आर्यत्व प्राप्त है। जो टेढ़ा है, वक्र है, अजितेन्द्रिय है, जिसकी दृष्टि यथार्थ नहीं है वह अनार्य है। आर्य एक व्रत है, साधना है। जो अस्तित्व को साधने चला है, आर्य है। जो नश्वर के पीछे भटकता है, अनार्य है। इसलिए आर्य-संस्कृति भारत से विश्वभर में फैली। लोगों ने अनुमान लगाया कि आर्य कोई प्रजाति रही होगी। वस्तुत: यह कोई जाति नहीं। आर्य वह है जो अस्तित्ववान् मात्र अविनाशी ईश्वर का उपासक हो। उसके व्रत को जो धारण कर ले, संयम को साध ले, आर्य है। इसीलिये ‘णमो आयरियाणं’– ऐसे आर्यपुरुष के प्रति समर्पित हो जाओ। अन्य कोई मार्ग नहीं है।
‘णमो उवज्झायाणं’– जो उपाध्याय है, उपदेशक है, उस सत्पथ का उपदेश देनेवाले है उनके चरण में जाओ, उपदेश श्रवण करो। और अंत में कहा- ‘णमो लोए सव्व साहूणं’– संसार में जितने साधु है उनको नमन करो। भले ही वह आज ही साधुवेश में आया हो, साध्य की ओर उसने दो कदम रखा तो! उनकी सेवा करो। ‘एसो पंच णमोक्कारो सव्व पावप्पणासणो।’– इस प्रकार ये पाँच नमस्कार सम्पूर्ण पापों से भव-बन्धन से तुम्हें मुक्ति दिला देंगे। ‘मंगलाणं च सव्वेसिं पढमं हवइ मंगलं।’– यही सर्वश्रेष्ठ और प्रथम मंगल है। जो नानक कह रहे हैं, तुलसी कह रहे हैं, वही भगवान महावीर कह रहे हैं। इसके बाहर कोई महापुरुष जा ही नहीं सकता। इसका पालन करें। यदि सत्य की जरूरत है तो किसी सद्गुरु की शरण जायँ; अन्यथा आज तक किसी दूसरे उपाय से हृदय में साधना जागृत ही नहीं हुई।
!! ॐ श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय !!
(‘अमृतवाणी भाग-4’ से उद्धृत)