गइया एक बिरंचि दियो है

गइया एक बिरंचि दियो है

ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं

     द्वन्द्वातीतं गगन सदृशं तत्त्वमस्यादि लक्ष्यम्।

एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधी साक्षिभूतं

     भावातीतं त्रिगुणरहितं सदगुरुं तं नमामि।। (गुरुगीता, १११)

आज हमलोग महान् सन्त कबीरदासजी के एक पद को हृदयंगम करने का प्रयास करते हैं। पद इस प्रकार है–

भाई रे! गइया एक बिरंचि दियो है।

गइया भार अभार भौ भारी।

नौ नारी का पानी पियतु है, त्रिखा तैयो न बुझाई।।

गइया एक…..।।

कोठा बहत्तर औ लौ लाये, वज्र कीवार लगाई।

खूँटा गाड़ि दवरि दिढ़ बान्हे, तैयो तोरि पराई।।

गइया एक…..।।

चार ब्रिछ छ: शाखा वाके, पत्र अठारह भाई।

एतिक ले गम कीन्हेसि गइया, गइया अति हरहाई।।

गइया एक…..।।

ई सातों औरों हैं सातों, नौ और चौदा भाई।

एतिक गइया खाय बढ़ायो, गइया तयो न अघाई।।

गइया एक…..।।

पुरता में रातीप है गइया, सेंत सगी है भाई।

अबरन बरन किछउ नहिं वाके, खद्ध अखद्धहिं खाई।।

गइया एक…..।।

ब्रह्मा विष्णु खोजि ले आये, सिव सनाकादिक भाई।

सिध अनंत वाके खोज परे हैं, गइया किनहूँ न पाई।।

गइया एक…..।।

कहत कबीर सुनो हो संतो, जे ये पद अरथावै।

जो यह पद को गाय बिचारे, आगे होइ निरवाहै।।

गइया एक…..।।  (बीजक, सबद, २८)

इस पद में सन्त कबीर ने बताया कि विधाता ने सबको गाय प्रदान किया है; किन्तु व्यवहार जगत् में ऐसा देखने में नहीं आता। वस्तुत: यह एक कूटपद है। कूटपद उसे कहते हैं जिसमें कोई सन्देश छिपाकर कहा जाता है जिससे केवल अधिकारी ही उसे समझ सकें, अनधिकारी उस ज्ञान का दुरुपयोग न कर सकें। गाय और उसके पर्याय गो, सुरभि, धेनु इत्यादि शब्दों का ऐसा ही प्रयोग गोस्वामी तुलसीदासजी के रामचरितमानस के गोरक्षा प्रसंग में है। सन्दर्भ के लिए संक्षेप में यहाँ भी प्रस्तुत है–

मानस में सत्तर बार गाय और उसके पर्यायों का प्रयोग है जिसमें सत्रह बार गाय उदाहरण है, तेरह बार यह वस्तु के लिए है और चालीस बार ‘गो’ शब्द इन्द्रियों का सम्बोधन है जिसके लिए भगवान का अवतार होता है। उदाहरण के रूप में इस शब्द का प्रयोग देखें–

अधम निसाचर लीन्हें जाई।

जिमि मलेछ बस कपिला गाई।। (मानस, ३/२८/६)

जब सीता चोरी चली गयीं, मानसकार कहते हैं– वह अधम निशाचर सीता को उसी प्रकार ले जा रहा था जैसे किसी कसाई के बस में कपिला गाय हो। यहाँ गाय एक उदाहरण है। इसी प्रकार–

स्याम सुरभि पय बिसद अति, गुनद करहिं सब पान।

गिरा ग्राम्य सिय राम जस, गाविंह सुनहिं सुजान।। (मानस, १/१०ख)

श्याम रंग की सुरभि यद्यपि काली है किन्तु उसका दूध श्वेत और गुणकारी होता है इसलिए सभी उसका सेवन करते हैं; ठीक इसी प्रकार हमारी कविता भी ग्रामीण भाषा में है किन्तु इसमें सीता और रामजी का पवित्र यश है इसलिए सभी इसका अवश्य ही आदर करेंगे। यहाँ गाय से कविता की तुलना की गयी; ‘गो’ शब्द एक उदाहरण है। वस्तु के रूप में गाय का उदाहरण देखें–

जब भरत ने पिता की अन्त्येष्टि की तो,

भये बिसुद्ध दिये सब दाना।

धेनु बाजि गज बाहन नाना।। (मानस, २/१६९/६)

भरतजी ने दान की वस्तुओं में गाय दिया, घोड़ा दिया, हाथी दिया, पालकी-रथ इत्यादि नाना वाहन दान में दिया अर्थात् यह लेन-देन की वस्तु है। जो स्थान गज का है, वाहन का है, वही गाय का भी है। इसी प्रकार रामजन्म के समय–

नन्दीमुख सराध करि, जात करम सब कीन्ह।

हाटक धेनु बसन मनि, नृप बिप्रन्ह कहँ दीन्ह।। (मानस, १/१९३)

[पुत्रजन्म से विवाहपर्यन्त के अवसरों पर नान्दीमुख पितरों का दधि और घृत मिले भोजन-पिण्डों से पूजन किया जाता है। इन पितरों में माता-पितामही-प्रणितामही, पिता-पितामह-प्रपितामह तथा नाना-परनाना और बड़े परनाना, जो भी दिवंगत हों, आते हैं। नान्दी का शाब्दिक अर्थ है समृद्धि। इन पितरों से समृद्धि का आशीर्वाद माँगा जाता है। कुछ लोगों के अनुसार नान्दीमुख नाम इसलिए पड़ा कि पितर इन अवसरों पर पिण्ड लेने के लिए नाँद की भाँति अपना मुँह फैलाये रहते हैं। इस मांगलिक श्राद्ध में काले तिलों और स्वधा का प्रयोग नहीं होता।]

गोस्वामीजी के अनुसार पुत्र-जन्म से अवसर पर महाराजा दशरथ ने नान्दीमुख श्राद्ध के उपरान्त जातकर्म कर विप्रों को हाटक माने सोना, धेनु, वस्त्र, मणियाँ इत्यादि दिया। यहाँ जो स्थान मणि का है, वस्त्र का है, वही स्थान गो का है। यह सब देने-लेने की वस्तु अर्थात् एक सम्पत्ति है।

जब महर्षि विश्वामित्र दशरथ जी से राम-लक्ष्मण को माँगने आये तो उन्होंने कहा– भगवन्!

मागहु भूमि धेनु धन कोसा।

सर्बस देउँ आज सहरोसा।। (मानस, १/२०७/३)

आप धरती माँग लें, धेनु माँग लें, धन अर्थात् पूरा खजाना माँग लें, मैं सबकुछ सहर्ष देने को तैयार हूँ। यहाँ पर भी गाय, धरती, धन, खजाना सब लेने-देने की वस्तु है। गाय वस्तु के रूप में है।

अब उन पंक्तियों पर विचार करें जिनमें गो इन्द्रियों का सम्बोधन है जिसके लिए प्रभु का अवतरण होता है। देवतागण स्तुति करते हैं–

जय जय सुरनायक जय सुखदायक प्रनतपाल भगवंता।

गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिन्धुसुता प्रियकंता।। (मानस, १/१८५ छन्द)

देवताओं के नायक की जय हो! सारे सुखों को देनेवाले प्रभो! आप गो और द्विज के हितैषी हैं, सिन्धुसुता लक्ष्मी के स्वामी हैं।

अबिगत गोतीतं चरित पुनीतं मायारहित मुकुंदा। (मानस, १/१८५ छन्द)

आप अविज्ञेय, गो से अतीत, माया से रहित और मुक्तिदाता हैं। इस एक ही स्तुति में राम गो के हितैषी हैं और गो से अतीत भी हैं। विचारणीय है कि गो क्या है जिसमें संसार उलझा है और राम उससे अतीत हैं? इसी प्रकार अनवद्य अखंड न गोचर गो। (मानस, ६/११०/१५)– भगवान दोषरहित हैं, अखण्ड हैं, वह गो नहीं है, गोचर भी नहीं है। गोचर अर्थात् इन्द्रियों का विषय यह संसार, जहाँ इन्द्रियाँ अपनी करनी के कारण बार-बार जन्म लेती हैं, अपना भोग ढूँढ़ती हैं, सृष्टि में विविध प्रकार के भोग भोगती हैं। सृष्टि विधाता का गोचर है। यहाँ गो इन्द्रियों का सम्बोधन है। इन्हीं इन्द्रियों का संयम करके महापुरुष ध्यान में प्रभु को पाते हैं।

जिति पवन मन गो निरस करि मुनि ध्यान कबहुँक पावहीं। (मानस, ४/९ छन्द)

पवन को जीतकर, गो को निरसकर मुनि ध्यान में प्रभु को पाते हैं। गो को कैसे निरस करें? क्या गाय का दूध सुखा दें अथवा उसका रक्त सुखा कर अस्थिपंजर बना दें? क्या इस प्रकार भगवान ध्यान में आयेंगे? ऐसी बात नहीं है। यहाँ गाय से कुछ लेना-देना नहीं है। पहले आप श्वास को जीतें, श्वास में विचरनेवाली वायु को सम करें। इसके साथ ही आपको गो-संयम करना है, इन्द्रियों को विषय-रस से अलग करना है। जिस क्षण ये इन्द्रियाँ विषय-रस से अलग होंगी, तत्क्षण भगवान ध्यान में उतर आयेंगे। यह अभ्यास लम्बा है, इसीलिए मुनि ध्यान कबहुँक पावहीं– कभी ध्यान में सफलता पाते हैं।

महर्षि वशिष्ठ के पास नन्दिनी थी और देवताओं के पास कामधेनु थी। वस्तुत: ऋषियों के पास नन्दिनी होती है। जहाँ इन्द्रियाँ भली प्रकार संयत हुईं, ध्यान में प्रभु उतर आयें तो यही इन्द्रियाँ आनन्द प्रदान करनेवाली होती हैं। जो इच्छा करिहहु मन माहीं। हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं।। (मानस, ७/११३/४) उनके मन में इच्छा होते ही भगवान वैसी व्यवस्था देते रहते हैं, कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता। एक कथानक में इसी तथ्य का निरूपण किया गया है।

विश्वरथ नामक सम्राट महर्षि वशिष्ठ के यहाँ आये। महर्षि ने उन्हें आतिथ्य प्रदान किया। जो आह्लाद राजभवन में नहीं मिला था, वह सब ऋषि के आश्रम में मिल गया। उन्हें आश्चर्य हुआ कि इतना अच्छा प्रबन्ध कैसे हुआ? क्या अच्छी खेती होती है? कोई बड़ा व्यवसाय है या कोई राजकीय अनुदान? महर्षि ने बताया– ‘‘ऐसा कुछ भी नहीं है। यह सब नन्दिनी की कृपा है।’’ सम्राट ने कहा– ‘‘तब तो नन्दिनी विलक्षण रत्न है। इसे तो राजाओं के पास होना चाहिए।’’ महर्षि ने कहा– ‘‘ऐसा सम्भव नहीं है। यह तो तपस्या का फल है।’’ राजा ने कहा– ‘‘कुछ नहीं! इसे घसीटकर ले चलो।’’ सैनिकों ने बड़ा बल लगाया, फिर भी वह नन्दिनी को नहीं प्राप्त कर सके। राजा ने तपस्या की, अस्त्र-शस्त्र अर्जित किया, विश्वामित्र के नाम से प्रसिद्ध हुए फिर भी नन्दिनी को प्राप्त करने में सफल नहीं हुए। उन्होंने निश्चय किया कि क्षात्र-बल को धिक्कार है, ब्रह्मतेज ही सर्वोपरि बल है, अत: अब मैं ब्रह्मर्षि बनूँगा। वह भजन में लग गये, ब्रह्मर्षि भी हो गये और नन्दिनी भी पा गये। यह गाय नामक किसी पशु के लिए संघर्ष नहीं बल्कि इन्द्रियों के संयम का प्रतिपादन है।

इसी प्रकार जब दैवी सम्पद् हृदय में भली प्रकार ढल जाती है, जो परमदेव परमात्मा का देवत्व अर्जित कराती है, उस समय यही इन्द्रियाँ कामधेनु बन जाती हैं, मनचाहा भोग प्रदान करने लगती हैं। हाथी-घोड़ा इत्यादि कुछ भी कामना आयी, वह सब पहले से ही तैयार मिलती है। यदि कामधेनु किसी प्रकार की गायसंज्ञक पशु होती तो वह केवल दूध देती; ये वस्तुएँ कहाँ से देती? वस्तुत: जब दैवी सम्पद् के गुण हृदय-देश में भली प्रकार सध जाते हैं, उस समय परमदेव परमात्मा का देवत्व उतर आया करता है। उस समय यही इन्द्रियाँ समस्त कामनाओं की पूर्ति स्वत: करने लग जाती हैं। आप संकल्प बाद में करेंगे, वस्तु पहले ही उपलब्ध रहेगी। इस प्रकार वैदिक ऋषियों से लेकर आद्योपान्त गो-शब्द इन्द्रियों का सम्बोधन रहा है। गो-सम्बन्धी अनेकानेक कथायें इसी गोरक्षा पर बल देती हैं।

कृष्णयजुर्वेद की कठशाखा के उपनिषद् का आख्यान है कि गौतमवंशीय वाजश्रवात्मज महर्षि अरुण के पुत्र उद्दालक ऋषि विश्वजित नामक यज्ञ में अपना सारा धन दान में दे रहे थे। उन्हें नचिकेता नामक एक पुत्र था। ऋषियों के शिष्य भी गुरुपुत्र ही कहलाते हैं (देखें, गुरुगीता, २४३-२४४)। उसने दान के लिए लायी जा रही लाखों कृशकाय गायों को देखा जो अन्तिम बार जल पी चुकी थीं, अन्तिम तृण चुन चुकी थीं, अन्तिम बार जिनका दूध दुह लिया गया, जिनकी इन्द्रियाँ नष्ट हो चुकी थीं। इन मरणासन्न अनुपयोगी दयनीय गायों को दान के नाम पर दिया जाता देख उसने पिता से कहा– मैं भी तो आपका धन हूँ, मुझे आप किसे देंगे? कई बार उसे ऐसा कहते हुए देख ऋषि को क्रोध आ गया। उन्होंने कहा– तुझे मैं मृत्यु को देता हूँ। नचिकेता यमराज के पास गया। यमराज ने उसे विशाल भोगों का प्रलोभन दिया किन्तु उसने कहा– भगवन्! यदि आपकी मुझ पर सौम्य दृष्टि पड़ ही गयी है तो मुझे आत्मज्ञान प्रदान करें। सैकड़ों वर्षों की आयुवाले पुत्र-पौत्रों, हाथी-घोड़ों, सुवर्ण और विशाल साम्राज्य के प्रलोभनों से भी विचलित न होने पर स्वर्ग के दैवी भोगों से भी आकर्षित न हो वह अपने निश्चय पर अटल रहा, तब यमराज धर्म ने उसे वह आत्मज्ञान दिया जिसे जान लेने के बाद कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता।

वास्तव में उद्दालक का अर्थ है अभ्युदय की ओर गमन करना, सहज प्रकाशस्वरूप परमात्मा की ओर गमन करना। प्रभु के स्वरूप की ओर बढ़ते-बढ़ते सहज प्रकाश की स्थिति आ जाती है–

न तद्भासते सूर्यो न शशांको न पावक:

यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।। (गीता, १५/६)

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– अर्जुन! उस सहजस्वरूप को न अग्नि, न सूर्य और न चन्द्रमा ही प्रकाशित कर सकता है। वह परमात्मा स्वयं ही प्रकाशस्वरूप है। जब अभ्युदय वहाँ तक हुआ, ये इन्द्रियाँ जो गणना में दस हैं किन्तु इनकी प्रवृत्तियाँ लाखों हैं, अनन्त हैं; इनकी लाखों विषयोन्मुख प्रवृत्तियाँ सिमटकर शान्त सम खड़ी हो जाती हैं। वह अन्तिम तृण ले चुकी हैं, अन्तिम भजन कर चुकी हैं, अन्तिम दूध दे चुकी हैं; जन्मान्तरों के संस्कारों के संग्रह का त्याग हो चुका, वे अन्तिम परिणाम दे चुकीं हैं। अब वे न शुभ परिणाम देंगी, न अशुभ। ऐसे योगी के कर्म अशुक्ल और अकृष्ण होते हैं। उनके क्रियाकलापों का न शुभ और न अशुभ ही संस्कार पड़ता है। जब गो इस कसौटी पर आ गयी तब उनका दान विप्र को दिया जाता है। तभी ब्रह्मस्थित महापुरुष, सद्गुरु के प्रति भली प्रकार समर्पण की स्थिति आ जाती है। उस समय यम अनुकूल हो जाते हैं, संयम सहज ढल जाता है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह– ये पाँच यम हैं। यम शब्द आज बदनाम हो चुका है। यम का अर्थ लोक में प्रचलित है– यमराज, जो मृत्यु देता है; किन्तु ऐसी कोई बात नहीं है। यम की अनुकूलता का अर्थ है सर्वांगीण संयम। जहाँ संयम सधा, साधक नचिकेता बन जाता है – न चित्त कर्ता – अर्थात् चित्त अकर्त्ता हो जाता है। चित्तवृत्तियों का ऐसा निरोध जिस क्षण हुआ, संयम पूर्ण हुआ तो इसके ओट में जो सत्ता है, उसी का नाम है परमात्मा। परमात्मा की वह प्रशक्ति जो न्याय करती है, वह है धर्म। भगवान पहले परीक्षा लेते हैं कि यह ले लो, वह ले लो, स्वर्ग लो, धन-वैभव-ऐश्वर्य लो किन्तु साधक की श्रद्धा जब लक्ष्य से चलायमान नहीं होती तब वह स्वयं साधक में दृष्टि बनकर खड़े हो जाते हैं और अपनी स्थिति का बोध करा देते हैं। इसी का नाम है आत्मदर्शन!

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– अर्जुन! इस कर्म को किये बिना न कोई भगवान को प्राप्त कर सका है और न ही भविष्य में कोई कर सकेगा; किन्तु कर्मों की पूर्ति में आत्मा जहाँ विदित हो गयी, साधक आत्मतृप्त हो गया, आत्मस्थित हो गया, उस पुरुष के लिए किञ्चित् भी कर्त्तव्य शेष नहीं रह जाता, कोई प्राप्त होने योग्य वस्तु उसे अप्राप्त नहीं रह जाती। उसे कर्म करने से कोई लाभ नहीं और छोड़ देने से कोई हानि भी नहीं होती; फिर भी वह महापुरुष पीछेवालों के मार्गदर्शन के लिए भली प्रकार कर्म में बरतते हैं (गीता, ३/२२)। स्वयं के लिए उनका कोई प्रयोजन नहीं रह जाता। अस्तु, नचिकेता को जब आत्मदर्शन ही हो गया तो वह स्वरूपस्थ हो गया, उसे किञ्चित् भी प्राप्त होने योग्य वस्तु अप्राप्त नहीं रही। इस प्रकार नचिकेतोपाख्यान एक आध्यात्मिक रूपक है। यह संयम के साथ साधना पर बल देने का कथानक है न कि पशु-योनि की पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रिया:’–लाखों गायों का दान हो रहा था (कठोपनिषद्, प्रथम अध्याय, प्रथम वल्ली, तृतीय मंत्र)।

जर्मनी के अनेक विद्यानुरागियों ने भारतीय वेदों पर गहन मनन-चिन्तन किया है। कहा जाता है कि एक विद्वान् को ऐसा एक मंत्र मिला जिसमें है कि गाय जब पृथ्वी से ऊपर उठ जाती है तो आकाश में खो जाती है, लौटकर पृथ्वी पर नहीं आती। वह दार्शनिक महीनों बन्द कमरे में इस पर विचार करता रहा और अन्त में निर्णय दिया कि भारत में गो नामक कोई पक्षी होता है। वह यदा-कदा उड़ जाता है तो पुन: लौटकर नहीं आता। क्या भारत में ऐसा कोई पक्षी है? बौद्धिक धरातल पर निर्णय लेनेवाले ऐसा ही आशय निकालेंगे। वस्तुत: गो इन्द्रियों का सम्बोधन है। ये इन्द्रियाँ जब सिमटकर संयत हो जाती हैं, देहाध्यास से ऊपर उठ जाती हैं। आकाश कहते हैं पोल को, शून्य को। मनसहित इन्द्रियाँ जब संकल्प-विकल्प से रहित होने लगती हैं तो वे शनै:-शनै: आकाशवत् होती ही चली जाती हैं। वृत्तियाँ सर्वथा शान्त होने पर यह परमतत्त्व परमात्मा का दर्शन और उसमें प्रवेश पा जाती हैं और फिर लौटकर आवागमन में कभी नहीं आती हैं, इन्द्रियाँ पिण्डरूप में कभी आकार ग्रहण नहीं करतीं। उस समय गो पृथ्वी पर नहीं आतीं अर्थात् शरीररूपी पृथ्वी का आकार प्राप्त नहीं करतीं। वे भवबन्धन से मुक्त हो जाती हैं।

आज हमें कहना पड़ रहा है कि गो माने इन्द्रियाँ; किन्तु वैदिककाल में गो शब्द जहाँ मुख से निकलता था, लोग समझ जाते थे कि हाथ-पाँव, नाक-कान इन्हीं की ओर इंगित किया जा रहा है। कालान्तर में भाषाएँ और शब्दों के निहितार्थ बदल गये किन्तु वैदिककाल से आज तक जितने महापुरुष हुए, उन सबकी दृष्टि में गाय केवल इन्द्रियों का सम्बोधन रहा है। इन इन्द्रियों का संयम हम-आप अपने बल पर कर भी तो नहीं पाते; क्योंकि हमारे पास है क्या?

गो गोचर जहँ लगि मन जाई।

सो सब माया जानेहु भाई।। (मानस, ३/१४/३)

इन्द्रियों और इन्द्रियों के विषयों में जहाँ तक मन कल्पना कर सकता है, बुद्धि निर्णय ले सकती है–सो सब माया जानेहु भाई।–वह माया है, मायिक क्षेत्र का ही छोटा-बड़ा निर्णय है, सत्य कदापि नहीं। मनुष्य के पास इन्द्रियाँ और मन छोड़कर और है ही क्या? इनसे हम कुछ भी निर्णय लें, वह माया है। ऐसी परिस्थिति में हम सत्य को, परमात्मा को कैसे जानें? उसके लिए एक ही तरीका है कि हमारा संयम ऐसा हो कि प्रभु उतर आयें, आत्मा से अभिन्न होकर खड़े हो जायँ, हमारा मार्गदर्शन करने लगे। उनके संरक्षण में चलकर पुरुष उन परमात्मा तक की दूरी तय कर पाता है। इसीलिए अवतार गो के लिए होता है। अवतार लेकर भगवान इन्द्रियों को दिशा देते हैं कि तुम यह करो और यह न करो। अपने बल पर, बौद्धिक स्तर से कोई कुछ जान भी नहीं सकता। यही कारण है कि इस पथ में लौकिक शिक्षा-दीक्षा का बहुत उपयोग नहीं है। शबरी पढ़ी-लिखी नहीं थी। वाल्मीकि भी अनपढ़ थे। संत कबीर भी पढ़े-लिखे नहीं थे किन्तु यह सभी अभ्यासी थे। उन्होंने आँखों देखा हाल कहा है। इस पद में इन्द्रिय-समूह को उन्होंने गाय की संज्ञा दी।

कबीर का दृष्टिकोण वही है जो वैदिक ऋषियों से अद्यावधि महापुरुषों का रहा है। वह कहते हैं कि गइया एक बिरंचि दियो है।–विधाता ने सबको एक गाय प्रदान कर दिया है। कैसी है यह गाय? सभी गायें पाँव से चलती हैं लेकिन यह गाय आपके शिर पर लदी है। गइया के भार अभार भौ भारी।–गाय इतनी वजनी कि अभार है, असह्य है बोझ उसका। उसका भार है कितना? ‘भौ भारी’–पूरे संसार का भार इस गाय का भार है। गो का भार इतना भयंकर है कि जो भी इन्द्रियों के दायरे में जीवनयापन कर रहा है, त्राहि-त्राहि कर रहा है–

राजा रंग सभी दुनिया के, छोटे बड़े मजूर।

हरिश्चन्द हरि भजन बिनु, अन्त धूरि के धूर।।

– – –

राजा दुखिया परजा दुखिया, साधू के दुख दूना।।

आसा तृष्ना सब घट व्यापी, कोइ महल न सूना।।

किसी ने कुछ प्राप्त कर लिया, तब भी इच्छाएँ तृप्त नहीं होतीं, चौगुनी भड़क जाती हैं। इसलिए व्यक्ति उत्तरोत्तर वस्तु ढूँढ़ता ही रहता है। वह एक पग आगे बढ़ गया, थोड़ी सन्तुष्टि हुई; और जो उसका स्तर है, उससे एक कदम नीचे हो गया तो त्राहि-त्राहि करने लग जाता है, ब्लड प्रेशर हाई हो जाता है, सब दुर्दशा हो जाती है। इच्छा इन्हीं इन्द्रियों का, गो का दबाव है। यह गाय खाती क्या है? पीती क्या है? इस पर कहते हैं–

नौ नारी का पानी पियत है, तृषा तेऊ न बुताई।

नवद्वारे पुरे देही (गीता, ५/१३)– यह नौ दरवाजोंवाला शरीर है। इन नवों इन्द्रियों से रात-दिन विषयरस का स्राव होता रहता है। यह विषयरस पीती रहती हैं लेकिन इच्छातृप्त कभी नहीं हुई। रावण को पूरा विश्व एक साथ मिल गया था–ब्रह्म सृष्टि जहँ लगि तनु धारी। दसमुख बसवर्ती नर नारी।।(मानस, १/१८१/१२)–फिर भी उसे एक औरत की कमी रह ही गयी। इतनी इच्छा अधूरी लेकर वह मर गया; क्योंकि एक प्राप्ति आगे अनन्त इच्छाओं को जन्म देती है। इसका कभी अन्त नहीं है। फिर भी इस गइया को महापुरुषों ने ढूँढ़ निकाला। इसके लिए,

कोठा बहत्तर औ लौ लाये, वज्र किवाड़ लगाई।

कोठा माने कमरा! हृदय एक कक्ष है। यह बहुत गन्दा है, मल-आवरण-विक्षेप से भरा है। इसमें जन्म-जन्मान्तरों के संस्कारों की रीलें पड़ी हुई हैं। न जाने अगली रील कैसी और किस योनि में फेंक दे; अत: इसकी सफाई कर इसे बेहतर अर्थात् अति उत्तम समेटकर, इन्द्रियों की प्रवृत्ति को समेटकर हृदय के अन्दर लौ लगा दिया। द्वार को दृढ़ता से बन्द कर दिया, फिर भी यह टिकी नहीं। तब खूँटा गाड़ि दवरि दिढ़ बाँधे। खूँटा गड़ी वस्तु का नाम है जो स्थिर रहता है। स्वाँस ही खूँटा है। सन्त कबीर ने साखी में कहा–

चलती चकिया देखि के, दिया कबीरा रोय।

दो पाटन के बीच में, साबित बचा न कोय।।

कबीर के एक प्रिय शिष्य थे कमाल! उन्होंने कहा– नहीं गुरु महाराज! साबित बचने का भी तरीका है–

चलती चकिया देखि के, हँसा कमाल ठठाय।

कील सहारे जो रहा, ताहि काल न खाय।।

कीली है श्वास। श्वास के सहारे यदि कोई लग जाय, मन को सब ओर से समेटकर श्वास में सुरत लगा दे तो उसे काल नहीं खायेगा। यह श्वास ही खूँटा है। श्वास चलायमान है। इसमें भली-बुरी तरंगें उठा करती हैं। पहले इस खूँटे को गाड़ो, श्वास स्थिर करो, निरोध करो और सुरत की डोरी से श्वास में मन को बाँध दो। इसे बाँधने में आपको दिन-रात प्रयत्न करना पड़ेगा। दवरि दृढ़ बाँधो– रात-दिन दौड़ लगाओ और बाँधो।

जागत में सुमिरन करे, सोवत में लौ लाय।

सुरति डोर लागी रहे, तार टूट ना जाय।।

जब तक जागो, सुमिरन करो। सोओ तो लौ लगाकर सोओ। सोकर उठो तो सुरत वहीं लगी मिले। आठ पहर लागा रहे, तार टूट न जाय।–अहर्निश श्रम करो। यही है दौड़ लगाना। श्वास में इसे दृढ़ता से बाँधा; तइयो तोरि पराई– तब भी किसी-न-किसी बहाने से यह तुड़ाकर भाग ही जाती है। साधक समझता है कि श्वास स्थिर है, तब तक पुनर्जन्म का कोई संस्कार आकर धक्का देता है – गाय भाग खड़ी हुई। कभी किसी भक्त ने गहरा दु:ख बताया तो महापुरुष लोग भी दो मिनट के लिए चौंक जाते हैं, सुरत बहक जाती है।

पुराणों में एक कथा आती है। भोलेनाथ ध्यानस्थ थे। पार्वती ने निरीक्षण किया कि भोलेनाथ हैं नहीं, शरीर बैठा है। प्रभु गये कहाँ? उन्होंने ध्यान लगाकर देखा कि वह आकाश में मृत्युलोक की स्त्रियों के साथ दौड़-धूप कर रहे हैं। पार्वती जी क्रुद्ध होकर आकाश में गयीं, उन औरतों को तलवार से काट गिराया और भोलेनाथ को पुन: उनके आसन पर ला दिया। यह कथा भी एक रूपक ही है। ‘शंका अरि: स शंकर।’ शंकाओं से उपराम होकर कोई ध्यान में लगता है। कभी-कभी ऐसा होता है कि शरीर तो बैठा है, शान्त है, जग भी रहे हैं किन्तु सुरत भाग जाती है। वह किसी विकार को लेकर चिदाकाश में, शून्य में नक्शे बनाने लगती है, मरणधर्मा वृत्तियों के साथ तालमेल बिठाने लगती है। प्रेम ही पार्वती है। वृत्ति में प्रेम का प्रादुर्भाव है तो तुरन्त निरीक्षण होगा कि शरीर तो बैठा है, सुरत गायब है। त्याग की तलवार से प्रेम की वृत्ति उन कुप्रवृत्तियों को, जिनसे संयोग है, काटकर सुरत को पुन: ध्यान में स्थिर करती है। जहाँ-जहाँ सुरत जाती है, वहाँ-वहाँ से उसे लाकर ध्यान में स्थिर करना पड़ता है। इसी का नाम अभ्यास है। खूँटा गाड़ि दवरि दिढ़ बाँध्यो, तइयो तोरि पराई।यह तुड़ाती किन माध्यमों से है? सन्त कबीर कहते हैं– पहले तो यह सांसारिक दृश्यों से विचलित होती है और यदि भजन पकड़ में आ गया, कुछ बोलने की क्षमता आयी तो बहकने लगती है कि शास्त्र में तो ऐसा लिखा है–

चार वृक्ष छ: शाखा वाके, पत्र अठारह भाई।

चार वेद, छ: शास्त्र और अठारहों पुराण! ‘एतिक ले गम कीन्हिसि गइया’–इन सबको लेकर गाय भाग गयी। लोग कहने लगते हैं– मेरे जैसा विद्वान् और कौन है! अब मैं वेदवाक्यों से ही चर्चा करूँगा। इतना लेकर गाय अहं में आ गयी। गयी तो थी भगवान को ढूँढ़ने, पोथा लेकर ऐंड़ गयी, उतने से ही सन्तुष्ट हो गयी इसलिए गइया अति रे हरहाई। हरहाई गाय उसे कहते हैं जो मार्ग छोड़कर बिना मार्ग के ही इधर-उधर दौड़े। जब भजन सही होता है तब भी मैं ज्ञानी हूँ, ध्यानी हूँ – यह भी इधर-उधर भागना हुआ। साधक को चाहिए कि जब तक प्रभु न मिल जायँ, लक्ष्य के अतिरिक्त अन्य विषयों में न उलझे। अब इस गइया के विचरण का स्थान बताते हैं और यह खाती क्या है?–

ई सातों औरों हैं सातों, नौ अरु चौदह भाई।

शास्त्रों में आता है सात पतन के लोक हैं– तल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल। गाय यहाँ तक तो नीचे जाती है, अधोगति प्रदान करती है और सात ही उत्थान के रास्ते हैं जिन्हें योगपथ की सात भूमिकाएँ कहा जाता है– शुभेच्छा, सुविचारणा, तनुमानसी, सत्त्वापत्ति, असंसक्ति, पदार्थभावना और तुर्यगा। ईश्वर की ओर अग्रसर होने में पहले शुभ के लिए प्रबल इच्छा का उदय होता है, फिर सुविचार! जहाँ विचार स्थिर हुआ तो तनुमानसी। अब तक तो हम शरीर में तनवाले थे, अब मन में शरीरवाले हो गये। ‘सत्त्वापत्ति’ अर्थात् नित्य सत्व परमात्मा का पक्ष सुदृढ़ हो गया। इसके उपरान्त असंसक्ति – सबसे उदासीन, निर्लेप रहना। भजन संसार में रहकर करना होता है। संग तो गली-गली में, कदम-कदम पर है। संग आवे किन्तु उनसे असंग रहने की क्षमता आ जाय। ‘पदार्थभावना’–संसार पदार्थ है, इन्द्रियों का खाद्य पदार्थ। इस संसार का अभाव हो जाय, खो जाय। ऐसा स्तर आता है कि सीय राम मय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी।।(मानस, १/७/२)– जहाँ माया दिखाई देती थी, वहाँ भगवान का संचार दिखाई देने लगता है। पदार्थ का अभाव हो जाता है, दृष्टि अन्यत्र जायेगी भी तो कहाँ जायेगी! निज प्रभु मय देखहिं जगत केहि सन करहिं विरोध।(मानस, ७/११२ ख)– जहाँ भी दृष्टि पड़ी, अपने आराध्यदेव को खड़ा पाया। अब भोग ढूँढ़े तो कहाँ ढूँढ़ें? इस अवस्था का नाम पदार्थभावना है जिसका आशय है संसार के भोग पदार्थों का अभाव और ईश्वरीय तेज का संचार। इसके पश्चात् अन्तिम भूमिका तुर्यगा है। मन एक तुरंग है। इस पर जीवात्मा असवार है। पहले मन हमें भटकाता था, अब हम जिधर चाहें, इसे उधर लगा सकते हैं। योग की इन सात भूमिकाओं को पार कर लेने पर भगवत्ता है। इस पर कबीर बल देते हैं कि नीचे-ऊपर के ये सात-सात आयाम गो का ही क्षेत्रफल हैं। सातों पतन के लोकों में गइया ही विचरति है। औरों है सातों–ऊध्वरेता स्थिति की सात भूमिकाओं में भी वही है। नौ औ चौदह भाई– पृथ्वी के नौ खण्ड और विधाता के चौदहों भुवन। एतिक लै गइया खाय बढ़ायो–एक गाय का यह सब भोजन है। समस्त लोकों का भ्रमण कर आयी हैं इन्द्रियाँ – यह गाय। इन सबका उपयोग इसने किया है। गइया तऊ न अघाई–यह गाय तब भी तृप्त नहीं हुई। कागभुसुण्डि कहते हैं–

कवन जोनि जनमेउँ जहँ नाहीं।

मैं खगेस भ्रमि भ्रमि जग माहीं।।

देखेउँ करि सब करम गोसाँई।

सुखी न भयउँ अबहि की नाईं।। (मानस, ७/९५/८-९)

देव-दानव, ऊँच-नीच, ब्रह्मपर्यन्त दूरी हमने तय किया है। सब योनियों में मैं भटका लेकिन इस योनि में मैं जितना सुखी हूँ, ऐसा किसी अन्य योनि में नहीं हुआ। क्यों?–

राम भगति एहिं तन उर जामी।

ताते मोहि परम प्रिय स्वामी।। (मानस, ७/९५/४)

इस कौवे के शरीर में राम की भक्ति मुझे प्राप्त हुई है इसलिए यह मुझे प्रिय ही नहीं, परमप्रिय है। अत: विधाता की समस्त सृष्टि को इस गइया ने खाया है, हर योनि का इसे अभ्यास है। सबको खा-खाकर इसने समाप्त कर दिया लेकिन इसका पेट कभी नहीं भरा। यह गाय है बड़ी खतरनाक! इस गाय का स्वभाव कैसा है? इसका प्रीतिकारक घर कौन-सा है?

पुरता में राती है गइया, सेत सगी है भाई।

पुरता तीन पुर हैं। इसी त्रिगुणमयी प्रकृति में यह गाय अनुरक्त रहती है। इन्द्रियाँ भोग चाहती हैं। यह सदैव सुख चाहती हैं, भगवान को कभी नहीं चाहतीं, इसलिए केवल इस माया नगरी में ही अनुरक्त रहती हैं यह गाय। और सेंत सगी है भाई– यह झूठ-मूठ की बिना पैसे की सगी रिश्तेदार बनी हुई है। इस मनसमेत इन्द्रियों के भोगों की व्यवस्था जहाँ-जहाँ बन जाती है, वहाँ-वहाँ से सम्बन्ध जुड़ जाता है। लेकिन ये सारे रिश्ते-नाते झूठे हैं। जहाँ श्वास की डोरी टूटी तो सोइ पुर पाटन सोइ गली बहुरि न देखा आइ।– ये व्यर्थ के रिश्ते यहीं छूट जाते हैं। यदि ये सच होते, कोई तो साथ चलता। इन्द्रियाँ सेंत अर्थात् मुफ्त की रिश्तेदार हैं। यदि इनकी मर्यादा पर विचार करें, वह भी इसके पास नहीं है–

अबरन बरन किछउ नहिं वाके, खद्ध अखद्धहिं खाई।।

इसका कोई शुद्ध वर्ण नहीं है, न इसके लिए कोई आवरण है। यह जिस योनि में गयी, वही भोजन किया और वही उसका स्वभाव हो गया। ऋषभदेव के पुत्र महाराजा भरत चक्रवर्ती सम्राट थे। चक्रवर्ती होने का इतना नशा था कि कहा– महामंत्रि! इस महेन्द्र पर्वत की शुभ्र शिलाओं में मेरा यशोगान अंकित करा दो। मंत्री ने लौटकर निवेदन किया– राजन्! एक भी शिला ऐसी नहीं है जिस पर किसी-न-किसी राजा की प्रशस्ति अंकित न हो। आज्ञा हो तो उनका नाम मिटाकर आपकी यशोगाथा उत्कीर्ण करा दूँ। सम्राट को आश्चर्य हुआ। वह स्वयं पर्वत शिखर पर गये और देखा, एक से बढ़कर एक राजा-महाराजाओं का यशोगान अंकित है कि इन महाराजाधिराज ने इन्द्र का कान पकड़कर झटक दिया और स्वयं इन्द्रासन सुशोभित करते रहे। भरत ने पाया कि यह यशोगाथा भी एक भ्रम है। जिनका यशोगान अंकित है, वे नरेश किंवदन्तियों में नहीं हैं, इतिहास उन्हें जानता तक नहीं। इन मूल शिलाओं पर कुछ लिखा अवश्य है। उन्हें तत्काल वैराग्य हो गया। वह एक महापुरुष की वंशलता के अन्तर्गत भी थे, वैराग्य के संस्कार थे ही, दिगम्बर वेष में रहने लगे।

साधन करते-करते भरत की निवृत्ति हो चली थी, किन्तु जब परीक्षा की घड़ी आयी तो जंगल में शेर की दहाड़ सुनाई पड़ी। एक आसन्नप्रसवा मृगी भयवश छलाँग लगाकर भागी। उसका बच्चा कुटिया के ठीक सामने ही पैदा हो गया। वह शावक मुनि के सामने घूमने लगा। भरत को दया आ गयी, उसे पाल लिया। वह बड़ा सुहावना था। जब वह थोड़ा युवा हुआ, छलाँग लगाकर जंगल में ओझल हो गया। भरत चिन्तित हो उठे। अभी तो शावक अबोध है, वह तो चीते का भी मुख सूँघ लेगा। वह बहेलिये के पास भी चला जायेगा। वह अभी तक लौटा क्यों नहीं? कहीं उसे शेर न खा गया हो। वह इन्हीं बातों में तन्मय थे कि उनका अन्तिम क्षण आ गया। अन्तिम क्षण में भी यही सोचते-सोचते उनका देहावसान हो गया। उन्हें अगला जन्म मृग का मिला। मृगयोनि में भी उन्हें ज्ञान था कि मैं भरतमुनि हूँ, एक आसक्ति के कारण मैं चौपाया बन गया हूँ। उन्होंने हठ करके शरीर का त्याग कर दिया। एक विप्र के घर उन्होंने जन्म लिया। वहाँ भी उनका नाम भरत ही पड़ा। निवृत्ति के समीप पहुँचे, महापुरुष को जब इन योनियों में आना पड़ता है तो हम-आप इतर योनियों में गये हों तो आश्चर्य ही क्या है? या जाना ही पड़े तो कौन-सी बात है? उस योनि में मालपुआ तो मिलेगा नहीं, बेड-टी भी नहीं मिलेगा। कदाचित् गिद्ध बन गये तब तो सड़ा-गला मांस ही मिलेगा। अत: गो इन इन्द्रिय समुदाय का न तो वरण है, न आवरण। आज आपके लिए जो अखाद्य है, दूसरे जन्मों में वही आपका भोजन है। कोई सुअर हो गया तो प्रात: होते ही मैले में जाकर डट गये। आज हम-आप जिससे नाक-भौं सिकोड़ते हैं, किसी जन्म में वही पौष्टिक पदार्थ है। सुअर का शरीर तो देखें, चर्बी झुलने लगती है, सुअर के लिए वही पौष्टिक पदार्थ है। इसलिए इन इन्द्रिय समुदायों का न कोई उत्तम वर्ण है, न अवर्ण! यह खाद्य-अखाद्य सभी कुछ खाती रहती हैं।

ब्रह्मा विष्णु खोजि लै आये, शिव सनकादिक भाई।

ब्रह्मा और विष्णु! बुद्धि ही ब्रह्मा है, चित्त विष्णु है। जब तक साधना में बुद्धि और चित्त का भान है, तब तक ही इन्द्रियों का अस्तित्व है। इससे ऊपर स्वरूप में स्थिति, सनकादिक की बालवत् रहनी में साधक प्रभु के हाथ का यंत्र मात्र रह जाता है। इन्द्रियों का अपना अस्तित्व समाप्त हो जाता है। उस समय यह गाय विलीन हो जाती है। सिद्ध अनन्त वाके खोज पड़े हैं–अनन्त सिद्ध अनादिकाल से इसी गइया की खोज के लिए निकले किन्तु गइया किनहूँ न पाई–आज तक इसे कोई देख नहीं पाया, पकड़ नहीं सका; क्योंकि साधना की पूर्तिकाल में जहाँ इन्द्रियाँ संयत हुईं और जब सर्वदा निरुद्ध हुईं तो मिट गयीं। कबीर की साखी है– जप मरे अजपा मरे–इन्द्रियों को संयत करने के लिए प्रमुख साधन है – नाम-जप! किन्तु जप की भी कई श्रेणियाँ हैं। जप अनिवार्य है लेकिन यह जप भी मर जाता है। कब? जब अजपा जागृत हो जाय। अजपा मरे कब? जब अनहद की पकड़ आ जाय। अनहदहूँ मरि जाय–एक स्तर आता है कि अनहद की भी आवश्यकता नहीं रह जाती; किन्तु कब? जब सुरत समानी सबद में, ताहि काल न खाय।– सुरत कहते हैं मन की दृष्टि को। जब श्वास में विचरनेवाले शब्द को सुनते-सुनते सुरत शब्द में समा गयी, शब्दमात्र शेष रह गया, ताहि काल न खाय–काल से अतीत अकाल पुरुष, परम सत्य वही शेष बच रहता है। भगवान को काल खा लेता होगा तो आपको भी खा लेगा। अत: सुरत के समाहित होते ही इन्द्रियों का आकार मिट जाता है, प्रकृति पुरुषोत्तम में विलीन हो जाती है। फिर तो,

ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। (यजुर्वेद)

सर्वत्र ईश्वर का ही वास है, लेशमात्र भी कहीं जगत् है ही नहीं। उस समय गो अपना स्वरूप खो देती है। कब? जब सुरत शब्द में समा जाती है। इसलिए ये सभी गइया को खोजने निकले अवश्य; किन्तु जब भली प्रकार संयम सधा, सुरत शब्द में समाहित हो गयी तो गइया भी उसी में विलीन हो गयी इसीलिए गइया किनहूँ न पाई– किसी ने प्राप्त नहीं किया। उसे ढूँढ़ते-ढूँढ़ते जब उसके समीप पहुँचे तो वह भगवान की भगवत्ता में विलीन हो गयी। इसके विलीन होने में ही मुक्ति है।

मन मरा माया मरी, हंसा बेपरवाह।

जाको कछू न चाहिए, सोई शाहन्शाह।।

मन मरा तो माया मर गयी; क्योंकि माया जिस धरातल पर प्रसारित होती थी वह मन था। जब वह धरातल ही मिट गया तो माया किस पर प्रसारित हो? तहाँ हंसा बेपरवाह–भक्त निश्चिन्त हो जाता है; क्योंकि जाको कछु न चाहिए सोई शाहन्शाह– यदि परमात्मा अलग होता तो उसकी चाह अवश्य होती। जब वह भी अलग नहीं रहा तो चाह करें भी तो किसकी? मन के मिटते ही माया मिट जाती है। पहले इन्द्रिय-समूह का दमन होता है, फिर मन का शमन होता है और निरुद्ध मन भी जहाँ विलीन हुआ तो इन्द्रियों और मन का आकार शान्त हो जाता है। तहाँ फिर परमतत्त्व परमात्मा सर्वत्र व्याप्त हो जाता है इसलिए गइया तिनहू न पाई– अन्त में यह गइया मिलती ही नहीं बल्कि मिट अवश्य जाती है। जब तक यह जीवित है, तब तक तो यह कष्ट देगी ही।

अंत में सन्त कबीर कहते हैं कि मोक्ष का रास्ता यही है कि आप इन्द्रिय-संयम करें–

कहत कबीर सुनो भाई संतो! जो यह पद अरथावै।

कबीर कहते हैं कि सन्तो! सुनो, ध्यान दो। वे जानते थे कि मैं जितने गोपनीय ढंग से इस रहस्य को प्रस्तुत कर रहा हूँ, सबमें उसे समझने की क्षमता नहीं हो सकती। इस मानव-समाज में जिनमें वह क्षमता है, वे हैं सन्त। कबीर की कक्षा के छात्र संत हैं। उन संतों को उद्देश्य बनाकर कबीर ने अपनी वाणी का प्रसारण किया। जो यह पद अरथावै– जो इस गाय की विशेषताओं को जान ले कि यह नौ नाली का पानी पी गयी, खूँटा गाड़ के कोठरी में बाँधा, वज्र की किवाड़ लगायी, तब भी यह भाग गयी। चराचर जगत् इसका भोजन है, फिर भी यह तृप्त नहीं हुई। ब्रह्मा, विष्णु, सिद्धजन खोजते रह गये, पाया किसी ने नहीं। जो यह पद अरथावै– जो उसे प्राप्त कर ले, जान ले, या पद की जो गाय विचारे–इस पद में वर्णित गाय पर जो विचार कर ले, आगे होई निरबाहै– वह आगे होकर सबका निर्वाह करता है। वह स्वयं सद्गुरु है, दूसरों को निवृत्ति प्रदान करने की उसमें क्षमता है। इस जगत् में जीने की कला वह जानता है और वही सिखा सकता है। वह सद्गुरु की स्थिति है।

महापुरुषों की दृष्टि में यावन्मात्र जगत् उनका अपना होता है। अत: वह कहते हैं– भाइयो! सुनो! एक ऐसी गइया है जो विधाता ने हम सबको दी है। गइया का वजन कितना? तो गइया भार अभार–उसका वजन असह्य है। कितना भार है? तो भौ भारी–सारा भव, आवागमन, जन्म-मृत्यु का चक्कर इस गो का ही वजन है। जो इसके आश्रित है वह तड़पता ही रहता है किन्तु उसे घूम-फिरकर प्यारा वही लगता है। इससे छुटकारा पाने के लिए जाये कहाँ? इसके लिए वह कहते हैं कि जो यह पद अरथावैवही आगे होइ निरबाहै–आगे बढ़कर सबका निर्वाह कर सकता है, गो अतीत स्थिति दिला सकता है। एक अन्य साखी में कबीर ने इंगित किया है–

माता मारि परम पद पावे, पिता बधे सुख होय।

गो काटे बैकुण्ठ सिधावै, संत कहावै सोय।।

माता को जो मार देगा, वह परम पद को पा जायेगा। सुनने में बड़ा अटपटा लगता है और पिता को मार डालो तो सहज सुख पा जाओगे। यह क्या है? वस्तुत: ये यौगिक शब्द हैं, साधना के स्तर-विशेष को इंगित करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– अर्जुन! यह त्रिगुणमयी प्रकृति गर्भ को धारण करनेवाली माता है और मैं ही परम चेतन बीजरूप से पिता हूँ। सांसारिक माता-पिता तो निमित्त मात्र हैं। स्वयं परमात्मा ही बीजरूप से पिता और प्रकृति ही गर्भ को धारण करनेवाली माता है। अत: इस माता का जो दमन कर लेगा, वह परम पद प्राप्त कर लेगा। परम पद है आत्मा! प्रकृति के दमन के पश्चात् जो दिखायी पड़ेगा, वह है परम तत्त्व, शाश्वत तत्त्व, परम धाम। उन्हें जानकर वह वही हो जाता है। भगवान जीव को अपनाकर यदि अलग रख दें तो बेचारा जीव का जीव ही रह गया; किन्तु वे उसे अपनी विभूतियों से आप्लावित कर देते हैं, अपने स्वरूप में समाहित कर लेते हैं, अपना सर्वस्व प्रदान कर देते हैं। अत:

सुरसरि मिले सो पावन कैसे।

ईस अनीसहिं अंतर जैसे।।

एक गिलास जल का गंगा से स्पर्श करा दें। बतायें, अब गिलास भर जल रहा कि गंगा भर! गिलास की संज्ञा मिट जायेगी और गंगा की धारा का प्रवाह सबके सामने विदित होगा। ठीक इसी प्रकार ईश्वर का अंश है जीवात्मा। साधना के सही दौर में पड़कर इन्द्रिय-संयम की कसौटी पूर्ण होने पर जहाँ आत्मा विदित हुई, स्थिति मिली तो अंश समाप्त; अंशी ही शेष बच रहता है। जीव, जो गिलास के जल के रूप में था, खो गया। परमात्मा का ही प्रवाह शेष बचा। यही है जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई। जब वही स्थिति मिली तो परमात्मा भी भिन्न नहीं रह गया। यहाँ पिता भी अलग नहीं है इसलिए पिता बधे सुख होय। उसके बाद वह भी शेष नहीं बचा जिसकी हम शोध करें। तहाँ ‘सुख होय’–जो शाश्वत सुख है, सहज सुख है, उसमें वह स्थित हो गया, वह वहाँ मिलता है।

इसी प्रकार गो काटे बैकुण्ठ सिधावै–गो माने मनसहित इन्द्रियाँ। इन्द्रियाँ जो दौड़-धूप कर रही हैं, उनकी दौड़ को रोको। इन्हें काटो। जिस क्षण इन्द्रियाँ भली प्रकार संयत हुईं, तब बैकुण्ठ सिधावै। कुण्ठ कहते हैं सीमा को; बैकुण्ठ कहते हैं असीम को, जिसकी सीमा निर्धारित न किया जा सके। इसी को बेहद, अनहद भी कहते हैं। जहाँ इन्द्रियों की भाग-दौड़ शान्त हुई; पहले भजन करने पर मन उच्चाटन कर जाता था क्योंकि इन्द्रियाँ किसी-न-किसी रस में खींचती हैं। जहाँ इन्द्रियाँ भली प्रकार संयत हुईं, इनकी भाग-दौड़ कट गयी, तहाँ बैकुण्ठ सिधावै–भजन माप-तौल से ऊपर उठ जाता है, धारावाही हो जाता है। सोते-जागते एकरस भजन! यह भजन की बैकुण्ठ, बेहद अवस्था है और जब तक इन्द्रियाँ खींचती रहेंगी, आप दो घण्टे भजन में बैठकर भी दस मिनट अपने पक्ष में नहीं पायेंगे। जिस मन को रुकना चाहिए, वह तो हवा से बातें करेगा। किन्तु भली प्रकार जहाँ संयम सधा तो आप जो समय देंगे, पूरा-का-पूरा आपके साथ है।

माना कि गाय नामक एक पशु भी हमारे पास है। हम उसके ऋणी भी हैं। सभ्यता के आरम्भ से लेकर आज तक इस गाय ने हमारा भरण-पोषण किया है। भगवान शिव ने पहली बार स्थिति पायी इसलिए उनका नाम ही पड़ गया पशुपतिनाथ। वह चलते थे बैल पर। क्या गजब की सवारी थी भोलेनाथ की! तब से इस गो-वंश का उपयोग इस ढंग से हुआ कि पूरे विश्व में खेती, अन्न का उपार्जन बैलों के ऊपर; उर्वरक गो-वंश के ऊपर। मक्खन, दूध, घी, दही – सृष्टि में इससे पौष्टिक आज भी कुछ नहीं है। डेनमार्क इत्यादि देशों में गायें ६० से ८० लीटर तक दूध देती हैं। गो-वंश से पानी खींचना, चर्म-उद्योग, सिंचाई भी उन्हीं पर और पूरे विश्व में व्यापार-सामग्री ढोयी जाती थी बैलों की पीठ पर। जो एक लाख बैल रखता था, बनजारा कहलाता था, वणिक सम्राट कहलाता था। इस प्रकार गाय ने मनुष्य को हर तरीके से जिलाया है। भारत के दयालु साम्राज्य में गाय को माता का सम्मान दिया। आप माताजी की भरपूर सेवा करके मातृऋण से तो उरिन हो जायेंगे किन्तु मोक्ष नहीं होगा। मोक्ष तो माताजी और आपका– दोनों का हरि के सुमिरन से ही होगा, अन्य कोई तरीका है ही नहीं।

रामचन्द्र के भजन बिनु जो चह पद निर्बान।

ज्ञानवंत अपि सो नर पसु बिन पूँछ बिषान।।

राम, एक परमात्मा के भजन के बिना जो कल्याण चाहता है, वह बिना सींग-पूँछ का पशु है। उसमें और पशु में कोई अन्तर नहीं है। अंतर है तो केवल इतना कि उसे सींग और पूँछ नहीं है।

बारि मथे घृत होय बरु सिकता ते बरु तेल।

बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धान्त अपेल।।

पानी मथने से भले ही घी निकल आये, बालू पेरने से तेल निकल आये– यह असम्भव भी कदाचित् सम्भव हो जाय किन्तु बिना हरि के भजन के कोई भव-सिन्धु पार नहीं हो सकता। यह सिद्धान्त अकाट्य है।

भगवान का एक नाम हरि है। वह जिस भक्त को अपनाते हैं, उसका शुभाशुभ सब हर लेते हैं, बदले में अपना स्वरूप प्रदान कर देते हैं। इसलिए परमात्मा का एक नाम हरि भी है। भव पार करने का अन्य कोई तरीका है ही नहीं। अत: यदि कोई कहता है– गाय की पूँछ पकड़ो, बैकुण्ठ जाओ; भूत पूजो, तंत्र ले लो, मंत्र ले लो – यह सब भावुकता मात्र है, परम्परा और रूढ़ि हो सकती है, गीतोक्त विधि कदापि नहीं।

गीता के अनुसार यज्ञ द्वारा देवताओं की उन्नति करने अर्थात् दैवी-सम्पद् को अर्जित करने, उसे बलवती बनाने का निर्देश है (गीता, ३/११)। ज्यों-ज्यों दैवी सम्पद् सधता जायेगा, इन्द्रियों में उसकी आभा प्रस्फुटित होगी। यही गौ के रोम-रोम में देवता होने का आशय था। परमदेव परमात्मा का देवत्व स्पर्श कराकर देवता उसी में विलय पा जाते हैं और संयम की परिपक्व अवस्था में गौ भी विलीन हो जाती है। थी तो यह अन्त:करण की वस्तु; किन्तु धर्मशास्त्र गीता विस्मृत हो जाने से श्रद्धालुजन इसे यत्र-तत्र ढूँढ़ने लगे और कालान्तर में वाह्य देवता और पशु-पक्षी, वनस्पति, गाय इत्यादि की पूजा में आ गये। गाय आदरणीय अवश्य है लेकिन पूजा परमात्मा की ही होनी चाहिए।

इसलिए भ्रान्तियों को छोड़कर आप एक हरि का भजन कीजिए। चलते-फिरते, उठते-बैठते नाम याद आया करे। सुबह-शाम बैठकर आधा घण्टा-बीस मिनट समय अवश्य दें। बच्चों को खेलाते, खुरपी चलाते हर परिस्थिति में नाम याद आया करे – तब भजन ठीक है। भगवान बैकुण्ठ से भाग कर नहीं आते। वह आपके हृदय में विराजमान है। आप संकल्प बाद में करते हैं, वह पहले से ही जानते हैं। वह जानते हैं कि जीव प्रेमपूरित हृदय से श्रद्धा से मुझे पुकार रहा है; तुरन्त सुविधा देने लगेंगे। कुछ ही दिनों में वह आपसे बातें करने लगेंगे। आपको वह सोते से जगायेंगे, कहेंगे– बेटा बैठ! भजन कर। अब जाके रथ पर केशो। ता कहँ कौन अँदेशो।। उस दिन से सारे सन्देह दूर हो जाते हैं कि धर्म क्या है? भजन कैसे करें? इसलिए सब लोग एक परमात्मा का सुमिरन करें। भगवान एक से दो कभी हुआ ही नहीं, होंगे भी नहीं। हाँ, प्रभु के नाम अनन्त हैं, पूरा नाम तो कोई नहीं है। वह अनिर्वचनीय है।

।। ॐ श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय ।।

(अमृतवाणी भाग-4’ से उद्धृत)

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