गयी झुलनी टूट
गयी झुलनी टूट।
दगा होइगा बालम, गयी झुलनी टूट।
पाँच रतन की मेरी झुलनिया,
बिचवा में ठगवे ले गइले लूट।
दगा होइगा……।
ऐसी झुलनियाँ बहुरि न बनिहैं,
बाँके सोनरवा से गई यारी छूट।
दगा होइगा……।
कहत कबीर सुनो भाई साधो!
अबकी झुलनियाँ पकड़ मजबूत।
दगा होइगा……।
सन्त कबीर का यह एक साधनापरक भजन है। साधक के जीवन में परीक्षा के क्षण आते ही हैं। यदि परीक्षा नहीं तो सफलता कैसी? उपाधि कैसी?
माता सीता पिछले जन्म में वेदवती नाम की कन्या थीं। उनके पिता तपस्वी थे। एक बार निशाचरराज की दृष्टि पड़ गयी। उसने कहा– ‘‘यह कन्या मुझे दे दो। मैं इसे महारानी बनाऊँगा।’’ तपस्वी ने कहा– ‘‘नहीं, वत्स! मैंने प्रतिज्ञा कर रखी है। मैं यह कन्या भगवान को अर्पित करूँगा।’’ राक्षस ने निकाली तलवार, उनकी गर्दन काट दी। वेदवती पिता की हत्या होते देख जंगल में ओझल हो गयी। उसने विचार किया कि पिता ने प्राण त्याग दिया। उनका संकल्प था, कन्या भगवान को अर्पित करेंगे। अस्तु, मैं पिता के संकल्प को पूर्ण करूँगी। वह भजन में लग गयी।
जब परीक्षा की घड़ी आयी, रावण की निगाह वेदवती पर पड़ गयी। उसने अपना पुष्पक विमान उसके समीप उतारा और लपककर उसके केश पकड़ लिये। वह बोला– ‘‘तपस्या तो लूली, लँगड़ी, बुढ़िया, अपाहिजों ऐसी स्त्रियों के लिए होती है। तुम जैसी सर्वाङ्ग सुन्दरी के लिये तपस्या का विधान कहाँ है? चलो, मैं तुम्हें लंका की पटरानी बनाता हूँ।’’
वेदवती ने हाथों से झटककर बालों को काटकर फेंक दिया और बोली, ‘‘तुम्हारे जैसे दुष्ट यहाँ आने-जाने लगे हैं। अब मेरा संयम सुरक्षित नहीं रह पायेगा, तपस्या सुरक्षित नहीं है। अतएव मैं इस देह का त्याग करती हूँ। इसका बदला मैं तुमसे लेकर रहूँगी और भगवान को भी प्राप्त करूँगी।’’ वेदवती ने कुटिया में संचित लकड़ियों में अग्नि प्रज्वलित किया और रावण के समक्ष ही आत्मदाह कर लिया।
आधुनिक विचारकों की दृष्टि में यह आत्महत्या थी जिसका परिणाम नरक है किन्तु वेदवती नरक नहीं गयी। अगले जन्म में उसने राम को प्राप्त किया, रावण से बदला भी लिया। यदि हमें किसी जीव से बदला लेना है तो जन्म लेना पड़ेगा। इसीलिए सन्त कबीर सावधान करते हैं–
राम नाम दुर्लभ अति, औरन ते नहिं काम।
आदि अन्त अरु जुग जुग, रामहिं ते संग्राम।।
राम नाम अत्यन्त दुर्लभ है। इतना कठिन है तो छोड़ो, क्यों झंझट मोल लें? कबीर कहते हैं– ‘औरन ते नहिं काम’– अन्य किसी भी विधि से कल्याण संभव नहीं है। इसलिए आदि अर्थात् भजन की शुरुआत और अन्त अर्थात् प्राप्तिकालपर्यन्त राम से ही संग्राम है। यदि आप केवल राम से लड़ेंगे, ‘भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ’ (रामचरितमानस, १/२७/१)– किसी भी भाव से परमात्मा राम का चिन्तन करेंगे तो राम का रामत्व प्राप्त कर लेंगे, स्थितप्रज्ञता प्राप्त कर लेंगे और जीवों से लड़ते रहने पर उनसे बदला लेने के लिए पुन: शरीर धारण करते रहना पड़ेगा,
पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननी जठरे शयनम्। (आदि शंकराचार्य)
राम से लड़नेवालों के लक्षण क्या हैं? सन्त कबीर के ही शब्दों में–
जे जन भीजे राम रस, विकसित कबहुँ न रूख।
अनुभव भाव न दरसिये, तेहिं नर सुख न दुख।।
जो जन, जो भक्त राम के रस में सराबोर हो गये वे सदैव विकसित रहते हैं, कभी उदास नहीं होते। सृष्टि में कोई जन्मा ही नहीं जो उन्हें खिन्नता दे दे। किन्तु रामरस में भींगे जन की पहचान क्या है? अनुभव अर्थात् भव से अतीत करनेवाली जागृति उसमें होती है। उसके प्रत्येक भाव और संकल्प के साथ-साथ इष्ट का निर्देश चलता रहता है। यदि ऐसा अनुभव न दिखायी पड़े, भगवान रोकथाम न करें, मार्गदर्शन न करें उसके लिए न सुख है, न दु:ख है। उसका राम नाम तोता रटन्त मात्र है।
लोक-व्यवहार में अपने अथवा दूसरे द्वारा किये गये कार्यों और उनसे मिलनेवाली शिक्षा को अनुभव कहा जाता है किन्तु अध्यात्म में अनुभव का आशय कुछ दूसरा ही है। भव कहते हैं संसार को और ‘अन’ उपसर्ग अतीत का द्योतक है। इस प्रकार अनुभव संसार से अतीत कर देनेवाली जागृति विशेष का नाम है। उस जागृति में ऐसा होता है कि जिस परमात्मा की हमें चाह है हमारी प्रार्थना, हमारी पुकार ऐसी हो कि वह प्रभु उस सतह पर उतर आयें जिस पर हम खड़े हैं। हमारी आत्मा से अभिन्न होकर वह खड़े हो जायँ, हमारे संकल्प के साथ-साथ रहें और हमारा मार्गदर्शन करते रहें कि यहाँ तुम गलत सोच रहे हो, अब चिन्तन ठीक है, अब सावधान हो जाओ, यहाँ खतरा है। इस प्रकार हमारे भाव के साथ-साथ भगवान रोकथाम न करें, अनुभव प्रदान न करें, भव से अतीत करनेवाली सूझबूझ न प्रदान करें तो न सुख है न दु:ख; अर्थात् पूर्ण निवृत्ति दिला देनेवाला भजन अभी जागृत ही नहीं हुआ।
वेदवती की ही तरह जड़भरत का भजन पूर्णता की ओर अग्रसर हुआ, परीक्षा का एक सूत्र दिखाई पड़ा। एक मृगशावक में किञ्चित् आसक्ति हो गयी। उन्हें अगला जन्म मृगयोनि में मिला। निवृत्ति के कगार पर पहुँचे महापुरुषों को भी आसक्ति और स्मृति के आधार पर जन्म लेना पड़ता है तो जनसाधारण की दुर्गति पर क्या आश्चर्य? इसी से सचेत करते हुए सन्त कबीर कहते हैं ‘दगा होइगा बालम! गयी झुलनी टूट।’– भगवन्! धोखा हो गया। परीक्षा की घड़ी आयी तो सँभलते नहीं बना, झुलनी टूट गयी।
संसार में झुलनी स्त्रियों का एक आभूषण है, सौभाग्य का प्रतीक है; किन्तु आध्यात्मिक रूपकों में झुलनी साधना के झूले पर बैठे हुए साधक की सहजावस्था या सुखमना स्थिति का परिचायक है। इसी झूले में,
ब्रह्मा झूले विष्णू झूले, सिव सनकादिक भाई।
सिद्ध अनन्त वहि झूला में झूले, विरले परमगति पाई।।
झूला रस्सी और लकड़ी से बँधा हुआ शून्य में लटकता उपकरण है जिस पर झूलनेवाले का पृथ्वी से सम्बन्ध नहीं रहता। इसी प्रकार जब ईश्वर से सुरत की डोर लग जाती है, सांसारिक संकल्प-विकल्प से चित्त ऊपर उठकर एक परमात्मा में लौ लगाकर अधर में झूलने और चलने की क्षमता पा जाता है, इस आकाशवत् अवस्था को सन्त कबीर ने झुलनी की संज्ञा दी। यह झुलनी है कैसी? इस पर वह कहते हैं–
पंच रतन की मेरी झुलनियाँ, बिचवा में ठगवे ले गइले लूट।
संसार में तरह-तरह के रत्न बिकते हैं किन्तु योग-पथ में पाँच रत्न हैं। कुछ लोग शरीर-निर्माण के उपादान ‘छिति जल पावक गगन समीरा’– इन पंच तत्त्वों को पाँच रतन कहते हैं क्योंकि साधन-धाम नर-शरीर इन्हीं की देन है; किन्तु ये योग-पथ के रतन नहीं हैं। इस शरीर से भले-बुरे, दोनों प्रकार के कर्म होते हैं, अत: ये रतन नहीं हैं। कुछ लोग पंच ज्ञानेन्द्रियों और पंच कर्मेन्द्रियों को रतन कहते हैं; किन्तु इनके साथ भी वही कठिनाई है कि ये भगवान की ओर भी जाती हैं और विपरीत दिशा में भी भागती हैं।
वस्तुत: भजन चिन्तन करते-करते अन्त:करण में पंचकोशों का संचार ही पाँच रतन है– अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनन्दमय कोश। प्रथम कोश अन्नमय है। इस आत्मा के लिये ब्रह्म-पीयूष ही एकमात्र अन्न है। उपनिषदों में है– ‘अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्’। भजन-चिन्तन करते-करते जब ब्रह्म-पीयूष हृदय में प्रकट होने लगे, प्रभु पास बुलाने लगें, यह अन्नमय कोश एक उपलब्धि है, रतन है।
प्राणमय कोश के अन्तर्गत लोग पंच प्राण– प्राण, अपान, उदान, व्यान और समान की गणना करने लगते हैं। ये कोई रतन नहीं हैं, जीवमात्र में पाये जाते हैं। गीता में भगवान श्रीकृष्ण प्राणों के व्यापार को अन्त:करण का व्यापार कहते हैं। यह मन अन्त:करण में ही सिमटकर निरुद्ध हो जाय, बाहर सुख की तलाश शान्त हो जाय, प्राणमय कोश है। पहले मन सुख की अनन्त योजनाएँ बनाता ही रहता था, अब वह अपने अन्तराल में ही सुख का स्रोत पा जाता है। यह उपलब्धि भी एक रतन है।
भजन के द्वारा मन के अन्तराल में ही प्रभु का स्वरूप झलकने लगा, यह मनोमय कोश है। विज्ञान कहते हैं अनुभव को। ‘तुलसी मन बस होहि तबहिं, जब प्रेरक प्रभु बरजे।’– यह बेज्ञान का ज्ञान, बेतार का तार है, प्रभु की आवाज है। प्रभु हमारी उँगली पकड़कर रोकथाम करने लगें, वह विज्ञानमय कोश है। विज्ञानमय कोश प्रभु प्रदत्त निर्णय है। पहले हम बुद्धि से निर्णय लेते थे जो कभी सफल तो कभी विफल हो जाते थे; किन्तु किसी विषय में यदि भगवान कुछ कह देंगे तो वह शत प्रतिशत ही नहीं, अनन्त प्रतिशत सत्य होगा। सृष्टि में ऐसा कोई नहीं जो उसकी सीमा को लाँघ जाय। अन्त में आनन्दमय कोश–
जो आनन्द सिन्धु सुखरासी।
सीकर तें त्रैलोक सुपासी।। (रामचरितमानस, १/१९६/५)
सम्पूर्ण आनन्द की राशि तो केवल परमात्मा हैं। इस आनन्द-सागर से भगवान एक बूँद प्रदान कर दें तो तीनों लोक सुपास पा जाता है। उनके जीवन में पुन: कोई खतरा नहीं रहता। लोग संसार में सुख ढूँढ़ने का प्रयास करते हैं; जैसे मकान में सुख के लिए खिड़की खोल देते हैं, फिर सुख के लिए झाड़-फानूस लगाते हैं। पुन: मान-प्रतिष्ठा आई तो सुख मानते हैं; किन्तु ‘राम विमुख सपनेहुँ सुख नाहीं’– राम से विमुख सपने में भी सुख नहीं है तो कोई पायेगा कहाँ से?
हिम ते अनल प्रगट बरू होई।
विमुख राम सुख पाव न कोई।। (रामचरितमानस, ७/१२१/१९)
सांसारिक व्यवस्था तो जीव के पड़ाव मात्र हैं। इस पड़ाव का रहन-सहन छोड़ जीव अचानक दूसरे पड़ाव पर अपने को पाता है। यहाँ की व्यवस्था यहीं रह जाती है। सुख-दु:ख से परे आनन्द परमात्मा की उपलब्धि है। जहाँ इन पंचकोशों का संचार साधक, भक्त के हृदय-देश में मिला तब सृष्टि में ऐसा कुछ भी नहीं है जो साधक को भुलावा दे दे। महाराजा मनु के पास–
बिधि हरि हर तप देखि अपारा।
मनु समीप आए बहु बारा।।
मागहु बर बहु भाँति लोभाये।
परम धीर नहिं चलहिं चलाये।। (रामचरितमानस, १/१४४/३)
मनु के पास विधाता पहुँचे कि ब्रह्मलोक ले लो; विष्णु ने कहा– विष्णुधाम ले लो; शिव ने अपने धाम का प्रस्ताव रखा; ‘बहु भाँति लोभाये’– वे कुछ दे नहीं रहे थे, केवल लोभ को बढ़ावा दे रहे थे। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर– ये षड्विकार हैं। इन्हीं में से एक विकार लोभ को आगे कर रहे थे। विश्वामित्र काम से गये, नारद अभिमान से गये; किन्तु परम धैर्यशाली महाराजा मनु विचलित नहीं हुए। भगवान ने देखा कि मन-क्रम-वचन से यह मेरा भक्त है तो मनु को आकाशवाणी दी। भगवान ने कहा– वर माँगो। मनु बोले– भगवन्! केवल आप जैसा पुत्र चाहिए। भगवान ने कहा– मेरे जैसा कोई है ही नहीं, मैं दूँ कहाँ से! मनु, मैं तुम्हारे साथ हूँ। मनु को प्राप्ति हुई। कोई साधक भगवान के लिए निकला हो और कुछ भी पाकर संतुष्ट हो गया तो माया कामयाब हो गयी। ‘व्युत्थाने सिद्धय:’ (पातञ्जल योगदर्शन, विभूतिपाद, ३७)– योग से मन विचलित करने के लिए सिद्धियाँ प्रकट होती हैं। वे वास्तव में सिद्धियाँ हैं किन्तु कैवल्य की प्राप्ति के लिए उतना ही बड़ी विघ्न हैं जितने काम, क्रोध, लोभ इत्यादि।
‘पंच रतन की मेरी झुलनियाँ’– जहाँ इन पंचकोशों से संयुक्त अवस्था आई, मन संकल्प-विकल्प से रहित होकर देहाध्यास को भी छोड़कर अधर में टिकने की क्षमता पा जाता है, अब साधक और परमात्मा के बीच केवल मिलन भर शेष है। ऐसी अवस्था में भगवत्प्रेरणा से कुछ परीक्षायें प्रकट हो जाती हैं,
छोरत ग्रंथि जानि खगराया।
विघ्न अनेक करइ तब माया।। (रामचरितमानस, ७/११७/६)
माया देखती है कि जीव अब हमारे चंगुल से निकल जाना चाहता है, माया का बन्धन छूट जाना चाहता है, यह मुक्त होना चाहता है तो वह अनेक विघ्न उपस्थित कर देती है। यही नहीं,
रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई।
बुद्धिहि लोभ दिखावहिं आई।। (रामचरितमानस, ७/११७/७)
वह रिद्धियाँ प्रदान कर देती है, सिद्ध बना देती है। ऐसी अवस्था का साधक समीप से निकल भर जाय तो मरणासन्न व्यक्ति की स्वाँस भी एक बार लौट आयेगी। उसका स्वरूप ही ऐसा है। स्वाँस भले ही लौट आये, कैसी भी अनहोनी घटना भले घट जाय किन्तु साधक उनकी ओर घूमा कि यह मेरे द्वारा हो रहा है तो माया कामयाब हो गयी।
सिद्धियाँ वास्तव में होती हैं। यदि हम उस रास्ते से चल रहे हैं जिसमें किसी नदी को पड़ना है तो पड़ेगी। इसी प्रकार भगवत्पथ में सिद्धियों को पड़ना है, वह हर हालत में पड़ेंगी; किन्तु साधक सँभल जाता है कि हमारा मार्ग संयम का है। सिद्धियाँ कैवल्य-प्राप्ति में विघ्न हैं। सिद्ध भगवान नहीं बनाते। जब बन्धन छूटने की घड़ी आती है, माया ही चारा फेंकती है। जहाँ साधक उनके झाँसे में आया, ‘ग्रंथि न छूटि मिटा सो प्रकासा।’ (रामचरितमानस, ७/११७/१४)। इसी आशय को प्रकट करते हुए कबीर कहते हैं कि पंचकोशों से संयुक्त मन की शून्य में टिकने की क्षमता हो गयी, भगवान में डोरी लग गयी, सिद्ध है कि बन्धन छूटने की घड़ी आ गयी; किन्तु बीच में ‘ठगवे ले गइले लूट’– ऋद्धि-सिद्धियों जैसे परीक्षा-सूत्र सामने से गुजरने लगे। हम उनकी चकाचौंध में आ गये, अधर में टिकने और विचरने की हमारी अवस्था टूट गयी। भगवन्! धोखा हो गया। हमने जानबूझकर कोई भूल नहीं की। हम बुद्धि से निर्णय ले ही रहे थे कि धोखा हो गया।
ऐसी झुलनियाँ बहुरि नहिं बनिहैं, बाँके सोनरवा से गई यारी छूट।
जेवर कैसा भी टूटा हो, स्वर्णकार उसे पुन: वही रूप देने में सक्षम है किन्तु ईश्वर-पथ में च्युत होने पर साधक हताश हो जाता है। ‘तेहिं विधि दीप को बार बहोरी’– उसकी क्षमता क्षीण हो जाती है। सुरतरूपी सुनार! वह भी बाँका अर्थात् विलक्षण! ऐसे सुरत के अन्तराल में अनुरागरूपी यारी छूट गयी, वह क्षमता समाप्त हो गयी। भगवन्! धोखा हो गया।
कबीर कहते हैं, धोखा तो हुआ किन्तु ईश्वर-पथ में निराशा का कोई स्थान नहीं है–
कहत कबीर सुनो भाई साधो, अबकी झुलनियाँ पकड़ मजबूत।।
सन्त कबीर प्रोत्साहन देते हैं कि जो बीती बीत गई। सन्तो! सुनो, ‘अबकी झुलनियाँ पकड़ मजबूत’– अब से सचेत रहो। मान लें दरवाजे पर पाँव में ठोकर लगी, दूसरी बार द्वार आने पर पाँव अपने आप अँधेरे में भी ऊपर उठकर पड़ेंगे। दुबारा ठोकर लगने या गिरने की संभावना समाप्त! यही सन्त कबीर कहते हैं कि जब जान लिया कि भगवत्पथ में यहाँ आते-आते माया के विक्षेप आते हैं, यह समझ में आ गया तो इस बार धैर्य के साथ मजबूती से झुलनी को पकड़ो और लगो– ‘कहै कबीर जनम की उढ़री। जबै से चेते तबै से सुधरी।’
इस सम्बन्ध में महर्षि विश्वामित्र का आख्यान लिया जा सकता है। एक बार उनके मन में विचार आया कि क्षात्र-बल को धिक्कार है। मैं ब्रह्मर्षि बन कर रहूँगा। वह भजन में लग गये। इन्द्र देवता ने उनके समीप एक अप्सरा मेनका को भेज दिया। मेनका कुछ दिनों तक महर्षि के साहचर्य में रही। उससे एक कन्या पैदा हुई और मेनका जंगल में तिरोहित हो गयी। विश्वामित्र उसे जंगल में ढूँढ़ने लगे, ‘‘मेनके! तुम कहाँ चली गई? तुम्हारे न रहने से इस अबोध बालिका को कोई वन्यजीव उठा ले जायेगा।’’ इतने में आकाशवाणी हुई– मेनका महाराज! वह तो माया थी, तुम्हें ठगने आयी थी, गयी। तुम नष्ट हो गये! इसी तपस्या से ब्रह्मर्षि बनोगे?
विश्वामित्र का कलेजा काँप उठा। बालिका शिशु को वहीं छोड़कर सुदूर पुष्कर क्षेत्र में तपस्या करने लगे। भजन उन्नत होने पर उनके समक्ष परीक्षा का सूत्र आया। उनके भाँजे शुन:शेप को राजकर्मचारी बलि चढ़ाने ले जा रहे थे। मार्ग में विश्वामित्र को देख उसने उनसे अपने प्राणों की रक्षा की प्रार्थना की। विश्वामित्र द्रवित हो गये। उस समय उनके एक सौ पुत्र उनका दर्शन करने आये थे।
विश्वामित्र ने पुत्रों से कहा, ‘‘यह शुन:शेप यज्ञ में बलि चढ़ने जा रहा है। हमने इसे अभयदान दिया है। तुम सौ भाइयों में से कोई एक इसके स्थान पर बलि चढ़ने चला जाय।’’ पुत्रों ने कहा, ‘‘आप कैसे पिता हैं! संसार में पिता झूठ-सच बोलकर पुत्रों के लिए सुख-सुविधा का प्रबन्ध करते हैं, और आप कहते हैं कि बलि चढ़ जाओ। हम अपनी जान नहीं दे सकते।’’
विद्रूप हँसी हँसते हुए विश्वामित्र ने कहा, ‘‘बचोगे तो तुम तब भी नहीं! जाओ, सबके सब जल जाओ, नष्ट हो जाओ।’’ सब मर गये। आकाशवाणी हुई कि तुम नष्ट हो गये। विश्वामित्र इस बार क्रोध से नष्ट हो गये। उन्होंने शुन:शेप से कहा, ‘‘यह हमारी परीक्षा का षड्यन्त्र था अत: तुम बच जाओगे। वरुण की स्तुति करना, वह तुम्हें मुक्त कर देगा।’’
एक बार परीक्षा हुई तो लगे स्वर्ग रचने; ये रिद्धि-सिद्धि का प्रकोप था। तब उन्होंने विचार किया कि बहुत फूँक-फूँककर पाँव रखता हूँ फिर भी माया इतनी सूक्ष्म! न जाने किस रास्ते से घुस जाती है। इस बार उन्होंने समर्पण किया उन परमात्मा के प्रति जो उस युग-जमाने की भाषा में इस प्रकार था–
ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।
अर्थात् ‘ॐ’ शब्द से उच्चरित ‘भू: भुव: स्व:’ तीनों लोकों में तत्त्वरूप से व्याप्त ज्योतिस्वरूप हे परमप्रभु! आप मेरी बुद्धि में निवास करें जिससे मैं आपको तत्त्व से जान सकूँ। इस बार उन्होंने हनुमानजी की शरण, गंगाजी की शरण या देवताओं की शरण न ली, न अपनी बुद्धि का भरोसा किया; उस प्रभु की शरण गये जो तीनों लोकों में तत्त्वरूप से व्याप्त, सहज प्रकाशस्वरूप है। समर्पित होकर जब विश्वामित्र लगे, माया आयी तो लेकिन कवच के रूप में स्वयं भगवान थे इसलिए आयी और ठोकर खाकर चली गयी।
‘करहुँ सदा तिन्हकी रखवारी।’– इस बार रखवाली हो रही थी क्योंकि उन्होंने अपनी बुद्धि से सोचना ही बन्द कर दिया था। तपस्या उन्नत होने पर ब्रह्मा आये, बोले– आज से आप महर्षि हुए। विश्वामित्र बोले ही नहीं। तीसरी बार ब्रह्मा आये तो विश्वामित्र ने कहा– हमें जितेन्द्रिय ब्रह्मर्षि कहें। ब्रह्मा ने कहा– अभी तुम जितेन्द्रिय नहीं हो। विश्वामित्र भजन में लगे ही रह गये।
अन्तत: ब्रह्मा सम्पूर्ण देवताओं के साथ पधारे और बताया, ‘‘आज से तुम ब्रह्मर्षि हुए।’’ विश्वामित्र ने कहा, ‘‘यदि मैं ब्रह्मर्षि हुआ तो वेद हमारा वरण करे।’’ तत्काल वेद उनके हृदय में उतर आया अर्थात् जो परमात्मा अविदित था, विदित हो गया। इसीलिए वेद अपौरुषेय है। यह भजन की पूर्तिकाल में प्रकट होने वाली एक निधि है, एक अवस्था है, उपलब्धि है। केवल किताब पढ़कर वेदज्ञ बनना एक भ्रान्ति है। विश्वामित्र ने कहा, ‘‘यदि मैं ब्रह्मर्षि हुआ तो वशिष्ठ इसका समर्थन करें। वशिष्ठ भी आये, गले मिलें।
अस्तु, समर्पण के साथ जो लगता है, उसके सामने माया के खतरे प्रभावी नहीं होते। उनकी झुलनी नहीं टूटती। जो साधक अपने भरोसे चलते हैं, अपनी बुद्धि से निर्णय लेते रहते हैं, परीक्षा-सूत्र आने पर उन्हें धक्का लग ही जाता है।
!! बोलिये गुरुदेव भगवान की जय !!
(‘अमृतवाणी भाग-2’ से उद्धृत)