पनघट पर गगरिया फूटल हो।

पनघट पर गगरिया फूटल हो।

अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्। (गीता, ९/३३)

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि सुखरहित, क्षणभंगुर किन्तु दुर्लभ मानव-शरीर को पाकर मेरा भजन कर! अर्थात् भजन करने का अधिकार उन सबको है जिन्हें मनुष्य शरीर उपलब्ध है; पशु को नहीं, पक्षी को नहीं, अन्य किसी को भी नहीं। परमात्मा राम कहते हैं– नर तन भव बारिधि कहुँ बेरो।(मानस, ७/४३/७)– मनुष्य-शरीर भवसागर से पार होने के लिए जहाज है, एक उपाय है। इसी आशय का सन्त कबीर का एक भजन इस प्रकार है–

पनघट पर गगरिया फूटल हो।

कौनो ठगवा नगरिया लूटल हो।।

चन्दन खाट का बना खटोलना, तापर दुलहिन सुतल हो।

पनघट पर गगरिया………।।

हाड़ जरे जस लाकड़ी, केश जरे जस घास।

सब जग जलता देख के, भया कबीर उदास।।

उठो री सखी मोरि माँग सँवारो, प्रियतम मो सन रुठल हो।

पनघट पर गगरिया………।।

चलती चकिया देख के, दिया कबीरा रोय।

दो पाटन के बीच में, साबित बचा न कोय।।

आये जमराज पलँग चढ़ि बैठे, चहुँ दिशि धू धू उठल हो।

पनघट पर गगरिया………।।

घर द्वारे तक औरत जइहैं, करमकाण्ड तक भाई।

लोग कुटुम्ब मरघट लौं जइहें, हंस अकेला जाई।।

कहतकबीरसुनो भाई साधो, जग से नाता टूटल हो।

पनघट पर गगरिया………।।

सन्त कबीर का यह एक चेतावनी पद है। उनका कोई भजन साधना की शुरुआत का है, कोई साधना में मिलनेवाली विभूतियों का चित्रण करता है तो किसी-किसी भजन में प्राप्ति के पश्चात् महापुरुष की रहनी का विवरण है। प्रस्तुत पद अचेत प्राणियों को जागृत करने के लिए चेतावनी के रूप में है।

संसार में सुखी कौन है? इस पर प्रकाश डालते हुए कबीर कहते हैं–

कुशल कहत कहत जग बिनसे, कुशल काल की फाँसी।

कह कबीर सब दुनिया बिनसे, रहे राम अबिनासी।।

संसार में परस्पर कुशलक्षेम पूछने का प्रचलन है। किसी से मिलने पर लोग पूछते हैं– कुशल तो है? उत्तर मिलता है– हाँ, सब ठीक-ठाक है। फसल अच्छी है, नौकरी में प्रमोशन मिल गया, व्यवसाय अच्छा चल निकला– सब कुशल ही तो है। कबीर कहते हैं कि कुशल-कुशल कहते-कहते जग बिनसे– संसार नष्ट होता जा रहा है। एक दिन युधिष्ठिर चक्रवर्ती सम्राट तो दूसरे दिन हिमालय पर स्वर्गारोहण करते दिखाई पड़े। लोग कुशल-कुशल कहते जा रहे हैं और नष्ट भी होते जा रहे हैं। यह क्षुद्र कुशल है। सच कहें तो यह कुशल के रूप में काल की फाँसी है, एक धोखाधड़ी है। कबीर कहते हैं कि सारी दुनिया नश्वर है, केवल रहे राम अबिनासी– राम ही रहनेवाला है, शाश्वत है, अविनाशी है। उसकी शरण में जाओ, तुम्हारी कुशल वहाँ पर है।

यही चेतावनी कबीर के इस भजन में भी है– पनघट पर गगरिया फूटल हो। कौनो ठगवा नगरिया लूटल हो।– अनन्त योनियाँ अवघट घाट हैं, केवल मनुष्य योनि ही भवसागर से पार होने का उपाय है। घाट जल तक जाने के लिए तट का वह स्थल है जहाँ यातायात के साधन सुगमता से पहुँच सकें। जहाँ से जल तक पहुँचने के लिए कोई मार्ग ही नहीं है उसे अवघट घाट कहते हैं। पनघट वह घाट है जहाँ से लोग पीने के लिए जल प्राप्त करते हैं।

सन्त कबीर ने मनुष्य शरीर को पनघट की संज्ञा दी है। भवसिन्धु से पार होने का उपाय न तो पशु-पक्षी, कीट-पतंगादि योनियों में है, न देवता ही पार हो सकते हैं; वे भी मनुष्य शरीर से आशावान हैं। भवसागर से पार होने का कोई उपाय है तो केवल नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो।(मानस, ७/४३/७)– मनुष्य शरीर भवसागर से पार होने के लिए जहाज है। तुलसी कहते हैं– पार जाने का बेड़ा है। कबीर कहते हैं– पार जाने का घाट है।

बड़े भाग मानुष तनु पावा।

सुर दुर्लभ सब ग्रन्थन्हि गावा।। (मानस, ७/४२/७)

यह देवताओं को भी दुर्लभ है। मनुष्य के पास देवताओं से एक वस्तु अधिक है– नर तन! वे जानते हैं कि एक दिन स्वर्ग से उनका पतन निश्चित है। उस दिन भगवान करुणा करके हमें मनुष्य का शरीर प्रदान करें। इन्द्र-पद का दावेदार राजा नृग गिरगिट हो गया। इन्द्र-पद से नहुष गिरा तो अजगर हुआ। इन्द्र-पद का कोई प्रत्याशी भेंड़ा बन गया। स्वर्ग से गिरना है अवश्य! न जाने किस योनि में जाना पड़े। प्रभु कृपा करें कि हमें मनुष्य का शरीर प्राप्त हो।

हम देवता परम अधिकारी।

स्वारथ रत प्रभु भगति बिसारी।। (मानस, ६/१०९/११)

परम अधिकारी होते हुए भी हम देवता स्वार्थ से विवश होकर आपकी भक्ति को भूल गये। देवता भी विषयों के गुलाम! विषय भोग पर प्रीति सदाई। (मानस, ७/११७/१५) और अन्त में क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति(गीता, ९/२१)– पुण्य क्षीण होने पर मृत्युलोक में आकर गिरना और फिर चढ़ना; इस प्रकार देवता भी आवागमन की एक योनि है। लेकिन मनुष्य योनि एक ऐसी योनि है जो आवागमन से मुक्ति दिलाने में सक्षम है। भटकते-भटकते कूकर-शूकर योनियों से चक्कर मारते हुए दुर्लभ मनुष्य शरीर हमें मिल भी गया, हम पनघट पर आ गये किन्तु शरीररूपी घड़ा इतना कच्चा है कि कल तक के लिए भी इसके रहने की गारण्टी नहीं दे सकते–

यह तन काचा कुंभ है, लिये फिरे तू साथ।

ढबका लागा फूट गया, बहुरि न आवे हाथ।।

इसकी क्षणभंगुरता की तुलना कबीर ने पानी के बुलबुले से की है। ऐसा देव-दुर्लभ किन्तु क्षणभंगुर मानव-तन उपलब्ध होने पर भी पनघट पर गगरिया फूटल हो– यह गगरी धोखे-धोखे में ही फूट गयी। क्या आपने जानबूझकर फोड़ दिया? महापुरुष कहते हैं– नहीं! धोखा हो गया। कौनो ठगवा नगरिया लूटल हो– जन्म लेते ही सम्बन्ध के धागे जुड़ जाते हैं– यह माता है, यह मौसी है, यह भैया हैं, पापा हैं….। सज्ञान हुए तो यह तुम्हारा यह हमारा! बड़े हुए तो नन्हे-मुन्ने! वरिष्ठ हो गये तो हमारी इज्जत, प्रतिष्ठा! तब तक वह क्षण आ गया जो इस स्वाँस का अन्तिम काल है। सभी सम्बन्धी और हमारी अर्जित उपलब्धियाँ ऐसी बिछड़ीं कि पुन: कभी उनसे मेल नहीं हो सका। यह धोखा नहीं तो क्या है! हमारी वस्तु अनायास हमसे ओझल हो गयी, फिर कभी देखने को नहीं मिली। हमारे हृदय-देश की नगरी को, जहाँ परमात्मा का निवास है, उस संयम की प्रक्रिया को किसी ने लूट लिया– कौनो ठगवा नगरिया लूटल हो– एक ठगाई हो गयी।

यह शरीर है कैसा? चन्दन काठ का बना खटोलना– अनन्त योनियों में, सर्वत्र कण-कण में भगवान व्याप्त हैं। चन्दन तरु हरि सन्त समीरा। (मानस, ७/११९/१७)– भगवान चन्दन-वृक्ष हैं और उस चन्दन की खुशबू चराचर जगत् में, कण-कण में, सबमें व्याप्त है लेकिन किसी शरीर में कभी खुशबू नहीं मिली। प्रभु की खुशबू मिली है तो इस मनुष्य-शरीर के द्वारा ही मिली है। इसी मानव-शरीर में महर्षि अगस्त्य हुए, अत्रि हुए, महासती अनुसुइया हुईं, मदालसा हुईं, मीरा हुईं, तुलसी हुए। यह मानव-तन इतना दुर्लभ, इतना महत्वपूर्ण कि यह चन्दन काठ का बना है, खुशबू फैलानेवाला है, प्राप्ति करानेवाला है। जब कभी परमात्मा की खुशबू फैली है, इस मनुष्य-शरीर से ही प्रस्फुटित हुई है। तापर दुलहिन सूतल हो– इस मानव-तन के अन्तराल में आपकी सुरत, भजन करने की लव प्रसुप्त है। अन्य पद में सन्त कबीर कहते हैं–

जाग री! मोरी सुरत सुहागिन जाग री।

का सोवत है मोहनिशा में, उठि के भजनिया में लागु री।।

हमारी इष्टोन्मुखी लौ, सुरत सोई हुई है। इसे जगाना होगा, तभी कल्याण संभव है। प्राय: लोग सोचते हैं कि इस शरीर में खान-पान, रहन-सहन इत्यादि की सारी व्यवस्था अनुकूल दिखायी दे रही है। ऐसी परिस्थिति में सुरत न भी जगे तो हानि क्या है? इसी तरह जीवन काट ले जायँ तो आपत्ति क्या है? इस पर कहते हैं–

हाड़ जरे जस लाकड़ी, केश जरे जस घास।

सब जग जलता देख के, भया कबीर उदास।।

चिता की पहली लपट में बाल घास की तरह झुलस गये, जल गये; हड्डियाँ लकड़ी की तरह जल गयीं। सुन्दर शरीर की ऐसी दुर्दशा! केवल झोपड़ीवाले गरीब जलते हों– ऐसी भी बात नहीं है। चक्रवर्ती राजा-महाराजाओं से रंक तक, देवलोक, ब्रह्मापर्यन्त– सबको उसी घाट पर आते देखकर कबीर उदास हो गये कि जीवनयापन में समय काट लेने से काम नहीं चलेगा। इससे बचने का कोई उपाय करना चाहिए। कौन-सा उपाय?

उठो री सखी! मोरी माँग सँवारो– सखी, सखा, मित्र पर्यायवाची शब्द हैं। आदि शंकराचार्य की प्रश्नोत्तरी में है– के शत्रव: सन्ति निजेन्द्रियाणि। तान्येव मित्राणि जितानि यानि।– सृष्टि में शत्रु कौन है? अपनी इन्द्रियाँ! यही जीव को आवागमन में भटकानेवाली हैं; किन्तु यदि यही जीत ली जाती हैं तो मित्र बनकर मित्रता में बरतती हैं, परमकल्याण को करनेवाली होती हैं, कैवल्य पद प्रदान करने वाली होती हैं। इसलिए सन्त कबीर अपनी अचेत इन्द्रियों से कहते हैं कि उठो, सचेत हो जाओ, जागो। सदा सजग रहो, चिन्तन में लापरवाही न हो।

मेरी माँग सँवारो– मेरी मानसिक प्रवृत्ति को सुधारो! संसार में सिन्दूर सुहाग का प्रतीक मानकर माँग में सँवारा जाता है। माँग परम प्रभु प्रियतम परमात्मा को सन्तुष्ट करने का प्रतीक है। यहाँ माँग सँवारने का आशय मन को सँवारना, शुद्ध करना है; क्योंकि–

निर्मल मन जन सो मोहिं पावा।

मोहिं कपट छल छिद्र न भावा।।

विशुद्ध मनवाले ही परमात्मा को प्राप्त होते हैं। किञ्चित् भी कपट, छल-छिद्र मन में होने पर भगवान नहीं मिलते। यही माँग सँवारने का भी आशय है कि मेरी मानसिक प्रवृत्ति को सुधारो; क्योंकि प्रियतम मो सन रूसल हो। प्रिय उत्तम स प्रियतम– प्रीति का जो सर्वोपरि केन्द्र है, एक बार उससे सम्बन्ध जुड़ जाने के पश्चात् पुन: जिससे विछोह नहीं होता वह है परमात्मा! वे परम प्रभु मुझसे रूठ गये हैं। उन्हें अनुकूल करने के लिए मानसिक प्रवृत्ति को सँवारें। कहीं धोखे ही धोखे में पनघट पर यह शरीररूपी घट फूट न जाय!

मान लें हमने मानसिक प्रवृत्ति को सुधारना आरम्भ किया; किन्तु यहाँ भी दुविधा हमारा पीछा करती है, संशय बना रहता है कि भौतिक व्यवस्थाएँ सत्य हैं या भगवान?

चलती चकिया देख के, दिया कबीरा रोय।

दो पाटन के बीच में, साबित बचा न कोय।।

कबीर ने संसार की उपमा एक चक्की से दी है जिसका एक पाट ब्रह्म और दूसरा पाट माया है। इन दोनों पाटों के बीच सभी पिस रहे हैं, कोई भी सुरक्षित नहीं है। कभी तो हम सोचते हैं कि यह जगत् सत्य है, सर्वत्र भगवान का ही संचार है, भली प्रकार परिवार में जीवनयापन करते हुए सबकी सेवा करनी चाहिए। कभी ऐसा देखने में आता है कि हमारे न चाहते हुए भी स्वजन साथ छोड़कर चले जा रहे हैं। कहीं इनमें आसक्ति भूल तो नहीं है? कदाचित् भगवान ही सत्य हैं। इन दो पाटों के बीच की दुविधा की चक्की में कोई सुरक्षित बचा ही नहीं। ईस्बर अंस जीव अबिनासी। (मानस,७/११६/२)– जीव ईश्वर का विशुद्ध अंश है, अविनाशी है इसलिए सर्वथा नष्ट तो नहीं हो सकता; किन्तु यह अधकुचला अवश्य हो जाता है, कुछेक योनियों की परतें घट-बढ़ जाती हैं– यही इसका अधूरापन है। इसी से कोई सुरक्षित नहीं बचा। वे चले कहाँ गये?

आये जमराज पलँग चढ़ि बैठे, चहुँ दिशि धू धू उठल हो।।

ऊपापोह में, संशय और दुविधा में आयु के दिन पूरे हो गये, मृत्यु के देवता यम छाती पर सवार हो गये, जीव को बलात् लेकर चले जाते हैं। पूरा परिवार, स्वजन समुदाय उपस्थित रहकर भी जीव की रक्षा नहीं कर पाता।

आस पास योधा खड़े, सबै बजावत गाल।

मंझ महल से ले चला, ऐसा काल कराल।।

मृत्यु-शय्या के चतुर्दिक योद्धाओं की कतार लगी है। सभी डींग हाँकते हैं कि एक बार हम काल को भी पीछे ढकेल देंगे– इस प्रकार सभी बजावत गाल। लेकिन सुविधाओं और सुरक्षा-व्यवस्था के मध्य से वह काल-कराल जीव को लेकर चला जाता है। आयु के क्षण पूरे होने पर हर व्यवस्था काल से आवेशित हो जाती है। फिर तो पाँव की पनही भी काल, सुन्दर शय्या काल, उत्तम भोजन काल, सुरक्षा-व्यवस्था काल…. जो कुछ है काल है।

सांसारिक जीवनयापन सत्य है या भजन? यह सही है कि वह सही?– इस दुविधा को हल करते-करते आये जमराज पलँग चढ़ि बैठे– और फिर अँखियों से अँसुआ छूटल हो– चारो तरफ रोना-धोना शुरू हो जाता है। चहुँ दिशि धू धू उठल हो– देखते-देखते सब कुछ विनष्ट हो जाता है। पनघट पर गगरिया फूटल हो– कितनी दूर यात्रा कर घड़ा लेकर पनघट पर पहुँच तो गये, जल से भरकर चले नहीं कि गगरी फूट गयी। अब पुन: घर जायँ, गागर की व्यवस्था हो, पुन: घाट पर जाकर जल भरकर सकुशल घर पहुँच जायँ, कितना समय-साध्य, व्यय-साध्य और श्रम-साध्य है? सतत् सतर्कता तो तब भी अपेक्षित है कि पनघट पर गगरी पुन: फूट न जाय! इतना दुरूह है मनुष्य शरीर! अनन्त योनियों का भ्रमण करते-करते दुर्लभ मानव-तन मिला, हम घाट पर तो पहुँचे किन्तु धोखे ही धोखे में आयु के दिन पूरे हो गये। दाँत गिर गये, आँखों में चश्मा लग गया फिर भी केश रँगते जा रहे हैं। घर-परिवार, सुहृद-सम्बन्धी कहाँ तक साथ देते हैं?– इस पर कहते हैं–

घर द्वारे तक औरत जइहैं, करमकाण्ड तक भाई।

लोग कुटुम्ब मरघट लौं जइहें, हंस अकेला जाई।।

जहाँ गगरिया फूटी, यमराज पलंग पर चढ़े, सारी सुख-सुविधाओं के बीच से निकल यह प्राण-पखेरू उड़ा, तब क्या हुआ? पत्नी बहुत जोर मारेगी तो घर के दरवाजे तक ‘हाय हमारे देवता, हाय हमारे प्राण, हाय हमारे सर्वस्व!’ विलाप करती रह जायेगी; करमकान्ड तक भाई– सगा भाई अधिक से अधिक भली प्रकार कर्मकाण्ड सम्पन्न कर देगा, वर्ष-दो वर्ष पुण्यतिथि मना लेगा; लोग कुटुम्ब मरघट लौं जइहें– समाज के लोग श्मशान तक विदा करेंगे कि हमारे क्षेत्र के सम्मानित पुरुष थे, राजनीति का स्तम्भ ही टूट गया, समाज की अपूरणीय क्षति हो गयी, श्रद्धाञ्जलि दी और लौट गये। अब हंस अकेला जाई– इसके पश्चात् जीवात्मा इस हंस को अकेला ही जाना है। वहाँ पर आपके साथी मात्र भगवान हैं, अन्य कोई नहीं। इसलिए हर साधक को, हर मनुष्य को स्वाँस के रहते इतना अवश्य कर लेना चाहिए कि आत्मा अनुकूल हो जाय, वह हमारी मार्गदर्शक हो जाय। इसके पश्चात् तो–

करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी।

जिमि बालक राखइ महतारी।। (मानस, ३/४२/५)

भगवान राम कहते हैं कि सबसे सम्बन्ध तोड़कर जो सचमुच मुझसे हृदय से सम्बन्ध जोड़ लेता है, मैं उसकी रक्षा सदैव उसी प्रकार करता हूँ जैसे छोटे शिशु की रखवाली माता करती है। सांसारिक माताएँ झोपड़ी या सीढ़ियों की ओट में बालक की भली प्रकार रक्षा भी नहीं कर पातीं। ओट में वह सर्प से लिपट सकता है, अग्नि में गिर सकता है क्योंकि वहाँ तक उनकी दृष्टि नहीं पहुँच रही है; किन्तु भगवान एक ऐसी माता हैं जिनकी दृष्टि सर्वत्र है। वह कण-कण में व्याप्त हैं, सब जगह से देखते हैं, सर्वत्र से सुनते हैं, वह सब जगह से हाथ-पैरवाले हैं। जब वही रक्षक के रूप में खड़े हो गये तो मारेगा कौन? जीव के वही वास्तविक साथी हैं; क्योंकि जिनको हमने अपना माना था, उन सबका साथ छूट गया, सबसे सम्बन्ध विच्छेद हो गया, हंस को अकेले जाना है। पाप का संग्रह पतन के गर्त में ले जाता है, अनन्त योनियों का भ्रमण कराता है। अध:पतन का नाम पाप है। पुण्य उसे कहते हैं जो पूर्णत्व प्रदान कर दे। मृत्यु के उपरान्त इसके आगे भजन ही है साथी, भजन के बिना तू अकेला रहेगा।यदि आपके साथ भजन नहीं है तो आप नितान्त अकेले हैं, वहाँ आपका कोई सम्बल नहीं है। इसलिए,

कहतकबीरसुनो भाई साधो, जग से नाता छूटल हो।

पनघट पर गगरिया……।।

सन्त कबीर कहते हैं कि जिस जगत् को हम कभी छोड़ना नहीं चाहते थे, जिन्हें देखे बिना जीना नहीं चाहते थे, उन मासूम बच्चों से, उस फुलवारी से, प्रिय परिवार, परम हितैषियों से नाता छूटल हो– सहसा सम्बन्ध टूट जाता है, जाने कब गगरी फूट जाती है।

सारांशत: अनन्त योनियाँ अवघट घाट हैं। इसमें मनुष्य शरीर भवसागर से पार होने का उपाय है। इस शरीर में आने पर भी धोखे ही धोखे में ठग लिये गये। हमने सोचा, यह सम्पत्ति हमारी; फिर भी वह हमारी नहीं रही। धोखे ही धोखे में गगरी फूट गयी। अस्तु, सबको ऐसा उपाय करना चाहिए कि श्वास के रहते-रहते साधना-क्रम समझें; प्रात:-सायं, चलते-फिरते प्रभु का नाम याद आता रहे तो सोने में सुहागा है। इसे आचरण में ढाल लें, इतना ही करना है। आप सभी कार्य यथावत् करते रहें, कुछ भी नहीं त्यागना है। केवल एक परमात्मा के प्रति दृढ़ संकल्प हो जायँ। कोई अच्छे महापुरुष हों, सद्गुरु हों, उनसे उस परमात्मा की प्राप्तिवाली विधि, क्रिया समझें और लग भर जायँ। श्वास के रहते हुए आप लग गये तो यह धोखा नहीं होगा, भले ही आपको एक-दो जन्म और लेना पड़े, कल्याण निश्चित है।

पूज्य गुरु महाराज जी के आदर्श जीवन-वृत्त से भी यही प्रमाणित होता है। बाल्यावस्था में वे तीन दिन पाठशाला गये। किसी बात पर गुरुजी ने मार दिया। बालक लगा रुदन करने! माँ ने कहा– भाड़ में गयी शिक्षा! आज से मेरा बेटा नहीं पढ़ेगा। माँ के वात्सल्य का इतना दबाव पड़ा कि पढ़ने-लिखने का पाठ जीवन से उठ ही गया। क्षेत्रीय वातावरण दण्ड-बैठक, कसरत और अखाड़े का था। आप उसी में लग गये। सीने में मिट्टी पोतकर, दण्ड-बैठक लगाकर दस गाँव में आप नामजद पहलवान हो गये। कुश्ती में कभी पराजित नहीं हुए।

सहसा आपको तीन बार आकाशवाणी हुई– ‘इन महात्मा को भोजन कराओ।’ उन्हें भोजन कराया। बाद में ज्ञात हुआ कि वे सात दिन के भूखे थे। दूसरी बार आकाशवाणी हुई कि ‘महान पाप करने जा रहे हो, घोर नरक में जाओगे।’ वह जिधर जा रहे थे, उधर से सहसा घूम पड़े। तीसरी बार आकाशवाणी हुई– ‘इस खण्डहर मन्दिर में तुम्हारे गुरु महाराज बैठे हुए हैं।’ आप मन्दिर में गये। वहाँ घोर अन्धकार में कोई दिखाई ही नहीं पड़ा। आपके मन में किञ्चित् झुंझलाहट हुई कि पता नहीं हमारे मस्तिष्क में कौन जोर से बोलता है, कौन धीरे से! अभी आवाज आयी थी कि इसमें गुरु महाराज हैं, किन्तु इसमें तो कोई नहीं है। इतने में मन्दिर से खाँसने की आवाज आई। आप पुन: मन्दिर में गये। वास्तव में वह महापुरुष बैठे थे। आप तीन दिन, तीन रात लगातार उनकी सेवा में लगे ही रह गये। इसी अल्पावधि में आपने साधना-क्रम समझा और भजन में लग गये। गुरु महाराज महापुरुष हो गये। कालान्तर में वे ही अनुसुइया के परमहंस जी हुए।

हमने पूछा, ‘‘महाराज जी! आपको आकाशवाणी क्यों हुई, सबको तो नहीं होती?’’ गुरु महाराज ने बताया– हो! ई शंका मुझे भी हुई थी कि मुझे आकाशवाणी क्यों हुई? तब अनुभव में भगवान ने मुझे बताया कि पिछले सात जन्मों से मैं साधु रहा हूँ। चार जन्मों तक तो मैं झूठ-मूठ का साधु था। हमने जानना चाहा कि झूठ-मूठ से आपका क्या आशय है? महाराज जी ने बताया कि वेष तो साधु का था किन्तु उन दिनों भजन-क्रिया जागृत नहीं थी किन्तु टेक का पक्का रहा हूँ। गत तीन जन्मों से बढ़िया साधु रहा हूँ, इष्टदेव रथी थे, भगवान सदा साथ में थे, योगक्रिया जागृत थी। पिछले जन्म में निवृत्ति हो चली थी किन्तु दो-एक इच्छाएँ मन में रह गयी थीं इसलिए मुझे जन्म लेना पड़ा। एक तो गाँजा पीने की इच्छा थी; दूसरा कुतूहल था कि शादी-विवाह क्या होता है? तीसरा किञ्चित् देहाभिमान भी था कि मैं कुलीन हूँ तो भगवान ने ऐसा जन्म दिया कि ‘कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा’। अब गर्व भी करें तो किस पर? वेदव्यास किस पर गर्व करते? शृंगी ऋषि किस पर नाज करते?

माई धोबिन बाप चमार, ता कर जनमल हम बनवार।

कबीर किस पर नाज करते? इसी प्रकार महाराज जी का जन्म थोड़ा टेढ़ा-मेढ़ा था। भगवान ने शादी-विवाह कराकर थोड़े ही दिनों में सब दिखा-सुना कर बता दिया– यह गुरु महाराज और यह रास्ता! पूज्य गुरु महाराज कहा करते थे, ‘‘हो! भगवान ने मुझसे घर छुड़वाया है। मैं सचमुच का साधु हूँ। भगवान ने मुझे साधु बनाया है।’’ और बात भी सही थी, तरीका यही है। अस्तु,

इसके तो आगे भजन ही है साथी,

भजन के बिना तू अकेला रहेगा।

यह भजन ही साथी था जिसने महाराज को खींचकर घर से निकाला। गृहत्याग के पश्चात् महाराज को पूर्णत्व प्राप्ति में केवल आठ साल लगा लेकिन इन आठ वर्षों में न जाने कितने उपवास हुए। दिगम्बर वेष में रात-रात भर जगकर वह भजन करते ही रह गये। इसी प्रकार वर्षों व्यतीत हो गये। प्रभु जब रथी हो जाते हैं, वह भजन करवा लेते हैं। इसके पश्चात् साधक का केवल इतना दायित्व है कि आदेश का पालन करें। भगवान कहते क्या हैं? उस आदेश पर खरे उतरते जायँ, इतना ही भजन है। इस अवस्था से पूर्व जो हमलोग करते हैं या करेंगे, वह सारा प्रयत्न भजन में प्रवेश के लिए है। कोई प्रयास नहीं करेगा तो प्रवेश कैसे होगा?

भजन की प्रवेशिका यहीं से है कि दो-ढाई अक्षर का कोई नाम– ॐ अथवा राम– जो उस परमात्मा का परिचायक हो, उसका आप जप करें, एक परमात्मा में दृढ़ संकल्प हो जायँ और उसके अर्थस्वरूप कोई अच्छे महापुरुष हों, जो उस पथ के ज्ञाता हों, उनसे साधना-क्रम समझें।

एक घड़ी आधी घड़ी, आधे में पुनि आध।

तुलसी संगत साधु की, हरै कोटि अपराध।।

!! ॐ श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय !!

(अमृतवाणी भाग-2’ से उद्धृत)

Q & A
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