नैहर दाग लगल मोरि चुनरी
ॐ जय गुरुदेवम् जय गुरुदेव!
ॐ अशरण शरण शरण प्रभु लेव,
ॐ जय गुरुदेवम् जय गुरुदेव!
राखइ गुर जौं कोप बिधाता।
गुर बिरोध नहिं कोउ जग त्राता।।
(रामचरितमानस, १/१६५/६)
गुर कें बचन प्रतीति न जेहीं।
सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेहीं।।
(रामचरितमानस, १/७९/८)
कबीर वे नर अन्ध हैं, गुरु को कहते और।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहिं ठौर।।
!! बोलिये, श्री सद्गुरुदेव भगवान की जय !!
आप सबकी जिज्ञासा पर प्रस्तुत है कबीर के एक भजन का आशय! पद की पंक्तियाँ इस प्रकार हैं–
नैहर दाग लगल मोरि चुनरी।
पहिन ओढ़ि गोरी चली ससुरारी,
मायके के लोग कहैं बहू फुहरी।
नैहर दाग…..।।
यह चुनरी धोबी घर पठइन,
बहुत धुलायो तबौं न भई उजरी।
नैहर दाग…..।।
उजली क्यों नहीं हुई? इस पर कहते हैं–
भाई बरेठा दूर बसत हैं,
साबुन महँग बिकाय वहि नगरी।
नैहर दाग…..।।
कहत ‘कबीर’ सुनो भाई साधो!
एहि जनम की बिगरी कबौं ना सुधरी।
नैहर दाग…..।।
यह सन्त कबीर का भजन है। कबीर एक महापुरुष थे– वैसा ही महापुरुष जैसा अनादिकाल से होते आये हैं। वह पूर्ण पुरुष थे। संत कबीर ने जब अपनी वाणी का प्रसार किया, लोगों ने उन्हें आड़े हाथों लिया कि यह तो अनपढ़ है, गँवार है; किन्तु इससे उन सन्त की लोकप्रियता कम नहीं हुई।
लोगों ने अटकल लगाया कि यह भी कविता रचने की कोई शैली है, तो उन्होंने कबीर के नाम से अश्लील रचनाएँ करनी शुरू कर दीं जो प्राय: फाल्गुन मास में होली के अवसर पर यत्र-तत्र आज भी सुनने को मिल जाती हैं। इन सबके होते हुए भी उनकी वाणी का प्रभाव कम नहीं हुआ।
कबीर के अनेक पदों को ‘उलटवाँसी’ कहा जाता है। उलटवाँसी– जो सुनने में विपरीतार्थक, अटपटा प्रतीत हो या जिसके कई अर्थ होते हों। आप जो अर्थ कहें वह सही, हम उससे भिन्न अर्थ बतावें तो वह भी सही और कोई कुछ कह गुजरा तो वह भी सही! मान लें, हमें नासिक जाना है। किसी ने कहा- पूरब जाइये; दूसरे ने कहा- नहीं, पश्चिम जाइये; तीसरे ने कहा ‘उत्तर’ तो चौथे ने दक्षिण जाने का निर्देश दिया। कदाचित् आप विपरीत दिशा में चल पड़ें तो शायद इस जीवन में कभी नहीं पहुँच पायेंगे। अस्तु उलटवाँसी नाम की किसी शैली का प्रवर्तन उन्होंने नहीं किया। सन्त कबीर ने सीधा-सटीक उपदेश दिया है किन्तु समझ में न आने से लोगों ने उलटवाँसी कहा। कबीर ने उस वैदिक तथ्य को, आँखों देखे हाल को छिपाकर प्रस्तुत किया जिससे अधिकारी समझ लें और अनधिकारी दुरुपयोग न करें। उन्होंने जो अनुभव में पाया था वह प्रस्तुत किया। यह अनुभवगम्य है इसलिए समझ में न आने से लोग कुछ भी कह सकते हैं।
वह महापुरुष यह भी जानते थे कि मैं जिस स्तर की बात कहता हूँ, उसको समझने की क्षमता सबमें नहीं हो सकती। इस विशाल जनसमूह में जिनमें वह क्षमता पायी गयी, उनको उद्देश्य बनाकर सन्त कबीर ने अपनी वाणी का प्रसार किया; जैसे– ‘कहत ‘कबीर’ सुनो भाई साधो!’, ‘अवधू! बेगम देश है मेरा।’ अथवा ‘कोई पण्डित ज्ञानी’। लगभग ९५ प्रतिशत पद कबीर के ऐसे हैं जो सन्तों को उद्देश्य बनाकर प्रसारित किये गये हैं। वह जानते थे कि इस सूक्ष्मता को वही पकड़ सकते हैं जो इस पथ पर चलनेवाले हैं।
कबीर कोई सम्प्रदाय प्रवर्तक नहीं थे। जब वह अपने स्वरूप की मस्ती में आये तो लोगों ने कहना आरम्भ किया कि कबीर साहब सिद्धपुरुष हैं, उनकी वाणी में ओज है, उनकी शरण में जाने से अमुक लाभ हुआ– किसी को सन्तान की प्राप्ति हुई तो किसी की दरिद्रता दूर हो गयी। कबीर साहब ऐसे, कबीर साहब वैसे! सन्त कबीर के संज्ञान में आया तो वह हँस पड़े और बोले–
कबिरा कबिरा क्या करे, सोधो सकल सरीर।
आसा तृष्णा वश करे, सोई दास कबीर।।
कबीर अच्छे….कबीर महात्मा….! क्या रट लगा रखा है! सम्पूर्ण शरीरों की शोध करो! सकल अर्थात् बहुत से शरीर होने चाहिए। जो दृष्टिगोचर होता है वह आपका स्थूल शरीर है। पंचभूतों से निर्मित यह एक शरीर है। इसके अन्तराल में है सूक्ष्म शरीर जो मन का संसार है और उसके भी अन्तराल में एक शरीर और है– कारण शरीर, जिसके द्वारा सूक्ष्म शरीर संचालित होता है– परमात्मा की वह प्रशक्ति जो सबको धारण करके स्थित है; क्रमश: तीनों शरीरों की शोध कर लो। किन्तु आशा और तृष्णा के रहते वह शोध सम्भव नहीं है। इसलिए ‘आसा तृष्णा वश करे, सोई दास कबीर।’– इतना हमने किया है इतना आप भी कर लें, आप भी कबीर हैं। इस प्रकार कबीर एक स्थिति है न कि कोई अकेला व्यक्ति! कबीर आपकी सम्भावना हैं, प्रेरणा हैं। हर महापुरुष यही है।
कबीर की भाषा समझ में नहीं आती तो लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि वह निर्गुण उपासक थे लेकिन सृष्टि में निर्गुण नाम की कोई उपासना होती ही नहीं– न कभी थी, न है और न कभी भविष्य में होगी। प्रत्येक महापुरुष सगुण से ही चलता है और चलकर जब उन प्रभु के अंक में प्रवेश पा जाता है तो अपने को गुणातीत स्थिति में पाता है। यह सन्तों की एक रहनी है न कि उपासना। संत कबीर की ही साखी देखें–
साहिब का घर दूर है, लम्बा पेड़ खजूर।
चढ़े तो चाखे राम रस, गिरे तो चकनाचूर।।
परमात्मा का घर कहीं बहुत दूर है, साधक स्वयं कहीं अलग खड़ा है। ‘चढ़े तो चाखे राम रस’– चढ़ना शेष है और ‘गिरे तो चकनाचूर’– प्रभु अलग, अपने अलग! चढ़ना और गिरना लगा हुआ है तो आप ही विचार करें कि सगुण उपासक के और क्या लक्षण होते हैं! यही तो कि परमात्मा कहीं अन्यत्र हो, हम अलग हों और शोध बाकी हो। कबीर की उपासना का आरम्भ सगुण से था। निर्गुण तो प्राप्ति के पश्चात् संतों की रहनी है। सगुण साहब का घर ढू़ँढने वाले कबीर एक दिन घर पा गये, प्रवेश भी पा गये, गुणातीत स्थिति भी मिल गयी। उसका उन्होंने चित्रण किया–
अवधू! बेगम देश है मेरा।
तहाँ न उपजे मरे न बिनसे, नहिन काल का फेरा।।
तहाँ न ईश्वर जीव न माया, पूजक पूज्य न चेरा।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, नहिं तहँ द्वैत बखेड़ा।।
अवधूत! मेरा देश अगम है अर्थात् वाणी का, इन्द्रियों का विषय नहीं है– अनिर्वचनीय है। वहाँ न ईश्वर है न जीव, न माया है और न पूजने योग्य सत्ता है, न पूजनेवाला पथिक। आप ही विचार करें, कौन किसकी पूजा करेगा? अंतत: वहाँ है क्या? कुछ शेष बचा? कबीर कहते हैं– हाँ, है। मेरा अस्तित्व है। ‘नहिं तहँ द्वैत बखेड़ा’– वहाँ द्वैत नहीं है अर्थात् मैं हूँ। वहाँ माया और ईश्वर दोनों की भिन्नता समाप्त हो जाती है। यह तीनों गुणों से अतीत संतों की एक रहनी है। निर्गुण एक प्रमाण-पत्र (सर्टिफिकेट) और स्थिति है, न कि कोई उपासना! सबको सगुण से ही चलना होगा। कबीर के चिन्तन का नाम ‘राम’ था–
जीव शीव सब प्रकटे, वे ठाकुर वे दास।
कबीर और जाने नहीं, एक राम नाम की आस।।
इधर जीवों की अपार शृंखला है, उधर कल्याणतत्त्व शिव की मान्यता है। कबीर किसी को नहीं जानता। ‘एक राम नाम की आस’– केवल राम नाम से आशावान है। होंगे भगवान, लेकिन ढूँढ़ने का स्रोत तो नाम है! कबीर ने यह भी बताया कि नाम-जप रहस्यात्मक है–
राम नाम में अन्तर है।
कहीं हीरा है कहीं पत्थर है।।
नाम का निराकरण कर लेना चाहिए कि नाम है किस प्रकार! कहीं हम पत्थर में ही जीवन न काट लें। इतना बड़ा अन्तराल! ‘रा और म के बीच में कबिरा रहा लुकाय’– इन दोनों अक्षरों के अन्तराल में कबीर सिमट गया।
राम नाम अति दुर्लभ, औरन ते नहिं काम।
आदि अंत औ युग–युग, रामहिं ते संग्राम।।
राम नाम अत्यन्त दुर्लभ है। तो छोड़ें झंझट, क्यों परेशान होते हैं! किन्तु कबीर कहते हैं, ‘औरन ते नहिं काम’– दूसरे किसी विधि से कार्य-सिद्धि होगी नहीं, कल्याण सम्भव नहीं। इसलिए ‘आदि’ अर्थात् भजन की शुरुआत, ‘अन्त’ अर्थात् प्राप्तिकाल– इन दोनों के बीच चाहे युग-युगान्तर बीत जायँ, जन्म-जन्मान्तर बीत जायँ; यदि संघर्ष है तो केवल राम से है। अर्थात् कबीर के चिन्तन का नाम ‘राम’ था। वह स्वयं इसे जपते थे और दूसरों को भी इसे जपने के लिए प्रेरित करते थे।
राम न रमसि कवन दण्ड लागा।
मरि जइबे का करिबे अभागा।।
रे हतभाग्य! राम का भजन क्यों नहीं करते हो? ‘कवन दण्ड लागा’– इसमें कौन-सा कर देना पड़ता है? मर जाओगे तब क्या होगा? इस दुर्लभ मानव-तन को तुमने व्यर्थ खो दिया! ‘अबकी पासा ना पड़ा, फिर चौरासी जाय।’– इस शरीर से भवसागर पार नहीं कर लिया तो पुन: चौरासी लाख योनियों का चक्कर लगाना पड़ेगा। इस प्रकार कबीर के चिन्तन का नाम राम! इष्ट एक परमात्मा! किन्तु जब किसी ने पूछा– हजरत क्या कर रहे हो? तो वे बोले– मैं अपने पिया को प्रसन्न करने में लगा हूँ– ‘प्रियतम मोसन रूठल हो।’
परमात्मा को उन्होंने प्रियतम कहा, साईं और पति कहकर सम्बोधित किया। प्रियतम- ‘प्रिय उत्तम’ से प्रियतम! जो प्रीति का सर्वोपरि माध्यम है। एक बार जिससे सम्बन्ध जुड़ जाने के पश्चात् फिर कभी विछोह नहीं होता।
‘मेरी पत राखो गिरधारी’– पत कहते हैं मर्यादा को, इज्जत को। लोक-व्यवहार में मान-अपमान से इज्जत घटती-बढ़ती रहती है किन्तु आपकी आत्मा, जो परमात्मा का विशुद्ध अंश है, बार-बार मल-मूत्र से सनी हुई गर्भवास की अनन्त यातनाओं में भ्रमण कर रही है, इससे बड़ी बेइज्जती क्या होगी? इस अमर्यादित स्थिति से उबारकर शाश्वत, सनातन, अविनाशी शान्त जीवन प्रदान करने में यदि कोई सक्षम है तो वह मात्र परमात्मा है। इसीलिए कबीर ने उन आराध्यदेव को पति कहकर सम्बोधित किया। प्राय: प्रत्येक महापुरुष ने परमात्मा को पति कहने में संकोच नहीं किया। गोस्वामी तुलसीदास के शब्दों में, ‘अस अभिमान जाइ जनि भोरे। मैं सेवक रघुपति पति मोरे।’ (रामचरितमानस, ३/१०/२१)– यह अभिमान न जाय कि मैं सेवक हूँ, प्रभु राम मेरे पति हैं। प्रश्न उठता है कि सुतीक्ष्ण जी क्या स्त्री थे जो पति पा गये? वास्तव में पति परमात्मा के सहस्रों नामों में से एक नाम है जो इस जीवात्मा को मर्यादित स्वरूप प्रदान करता है।
अब आइए भजन की शुरुआत पर! आप स्त्री हों या पुरुष, भजन शरीर कभी नहीं करता। शरीर तो ‘साधन धाम’– भजन करने के लिए आपको स्थान मिला है इसलिए सन्तों ने इसे धाम या घर की संज्ञा दी। आपसे अथवा माताओं से जब कभी भजन होगा तो पहले इष्टोन्मुखी लगन जागृत होगी। वह लगन या लव ही आपसे भजन करायेगी। यही है लवरूपी लड़की! इसी पर सन्त कबीर का यह भजन आधारित है– ‘नैहर दाग लगल मोरि चुनरी।’
अब लोग इसे उलटवाँसी न कहें तो क्या कहें? लोक में प्रचलित है कि ‘यह दुनिया मेरे बाबुल का घर, वह दुनिया ससुराल।’– यह संसार मायका है और परमात्मा का धाम ससुराल कहा जाता है। संसार में माता-पिता सयानी पुत्री के कौमार्य और मर्यादा की रक्षा करते हुए उसे सुयोग्य वर के हाथों सौंपते हैं। नैहर में कन्या के चरित्र पर उँगली उठे, यह स्वयं कन्या, माता-पिता तथा समाज के ऊपर बहुत बड़ा लांछन है; किन्तु सन्त कबीर कहते हैं कि ‘नैहर दाग लगल मोरि चुनरी।’ आइए देखते हैं कि उनका आशय क्या है? वे कहना क्या चाहते हैं? उनकी दृष्टि में नैहर क्या है? दाग कैसा? दाग छुड़ाने का उपाय क्या है? तो–
नेह निभाया ही सरे, छोड़े सरे न आन।
तन दे धन दे सीस दे, नेह न दीजे जान।।
नेह कहते हैं स्नेह को! स्नेह का निर्वाह करने पर ही कल्याण है तभी सरेगा अर्थात् सफलता मिलेगी। स्नेह त्याग देने से कल्याण कभी सम्भव नहीं है इसलिए स्नेह के निर्वाह में तन देना पड़े, धन देना पड़े, यहाँ तक कि शीश देना पड़े किन्तु ‘नेह न दीजे जान’- स्नेह को न जाने दें। इस नेह के हरने वाले षड्विकारों का नाम है ‘नैहर’। ईश्वर के प्रति स्नेह का अपहरण करने वाले शत्रु कौन हैं? यही काम-क्रोध, लोभ-मोह, षड् विकार, इन्द्रियों में स्थित राग और द्वेष! ये दुर्जय शत्रु हैं। स्नेह का अपहरण करने वाले इन दुर्जय शत्रुओं में फँसकर इस निर्मल चित्तरूपी चुनरी में दाग लग गया। अब वही झिझक है कि ‘मैली चादर ओढ़ के कैसे, द्वार तुम्हारे आऊँ।’
अनेक महापुरुषों ने चित्त के ही अन्तराल में सम्पूर्ण सृष्टि का समावेश पाया है। गोस्वामी तुलसीदास के अनुसार–
विटप मध्य पुतरिका, सूत महँ कंचुक बिनहिं बनाये।
मन महँ तथा लीन नाना तनु, प्रगटत अवसर पाये।।
(विनयपत्रिका, पद १२४)
एक वृक्ष में नाना प्रकार के काष्ठोपकरण (फर्नीचर) हैं, सूत में नाना प्रकार के वस्त्र बिना बनाये सदा ही रहते हैं, ठीक इसी प्रकार मन के अन्तराल में अनन्त सृष्टि के शरीरों की संरचना निहित है। जब जिस शरीर का संस्कार-क्रम आता है, उसी के अनुरूप बाहर रचना होती रहती है। संस्कार के अनुसार वैसा ही रूप मन बाहर फेंकता रहता है।
असन बसन पसु बस्तु बिबिध बिधि, सब मनि महँ रह जैसे।
सरग नरक चर–अचर लोक बहु, बसत मध्य मन तैसे।।
(विनयपत्रिका, पद १२४)
एक बहुमूल्य मणि में भोजन, वस्त्र, पशु, आवास-प्रवास, सवारी-साधन, मर्यादा सब विद्यमान हैं, मनचाही वस्तुएँ आप उससे क्रय कर सकते हैं। ठीक इसी प्रकार इस मन के अन्तराल में स्वर्ग, नरक, अपवर्ग, चर और अचर- सारी सृष्टि विद्यमान है। जब जिसका क्रम आता है पिण्डरूप में मन फेंकता रहता है। सभी प्रकार के चित्र इसी चित्त में चित्रित होते हैं। इस चुनरिया में सारे नक्शे विद्यमान हैं किन्तु सन्त कबीर की उक्ति है– ‘नैहर दाग लगल मोरि चुनरी’– स्नेह का अपहरण करने वाले काम-क्रोधादि षड्विकारों से विवश होकर निर्मल चित्त में दाग लग गया। जीवात्मा इस दाग को छुड़ाने का प्रयास करती है–
पहिन ओढ़ि गोरी चली ससुरारी।
ब्रह्मविद्यारूपी वस्त्र और आभूषणों से सज्जित होकर ‘गोरी’ अर्थात् इष्टोन्मुखी लगन ‘ससुरारी’ अर्थात् स्वरूप की ओर चली, ‘स्व’सुरा में प्रवेश दिलाने को उद्यत हुई तो–
मायके के लोग कहैं बहू फुहरी।
मायके के लोग कन्या का ही पक्ष लेते हैं, उसे बहू नहीं कहते; किन्तु इस अध्यात्म पथ पर ‘मायके के लोग कहैं बहू फुहरी’– जिनकी दृष्टि माया तक ही सीमित है अथवा इस शरीर से जिनका मायिक सम्बन्ध, कुछ स्वार्थ छिपा है, वे लोग साधक-साधिका की निन्दा करते हैं कि यह फूहड़ है, मूर्ख है, बुद्धिहीन है! अभी उम्र ही क्या है! बच्चे ने अभी पाठशाला जाना आरम्भ किया है, उसे अपने पाँव पर खड़ा तो होने देते! ऐसी परिस्थिति नहीं है तो कहेंगे- वयोवृद्ध माता-पिता की सेवा तो करते! इससे करते नहीं बना, नासमझ है, जबकि वह विचारयुक्त कार्य कर रहे हैं। इस प्रकार ‘नैहर दाग लगल मोरि चुनरी’– नेह-सनेह को हरने वाले राग-द्वेष, काम-क्रोध इन्हीं से आक्रान्त होकर निर्मल चित्त में दाग लग गया। ये ऐसे शत्रु हैं, बरबस घसीट ही लेते हैं। इनसे पार पाने को महापुरुषों ने युद्ध की संज्ञा दी है।
मान लें किसी ने युद्ध के लिए मन बना ही लिया, निरन्तर चिन्तन के लिए गृह-त्याग का विचार बनाया तो लोग फूहड़ की संज्ञा देने लगते हैं। क्या सद्गृहस्थ आश्रम में रहते हुए कोई उपाय नहीं है? कबीर अन्यत्र कहते हैं– ‘सदगुरु धोबिया से परिचय नाहीं।’। वस्त्र के दाग धोबी छुड़ा देता है। कदाचित् कपड़े का कोई दाग इन सांसारिक धोबियों से न छूटे किन्तु आपके चित्त पर जन्म-जन्मान्तरों के मल-आवरण और विक्षेप के दागों को सद्गुरु छुड़ा लेने में सक्षम हैं। उस दाग को छुड़ाकर, चित्त को भली प्रकार निर्मल कर इस चित्तरूपी चुनर में परमात्मा का प्रतिबिम्ब दिलाने में सद्गुरु समर्थ हैं। सद्गुरु ही धोबी हैं। इस चुनर को हमने धोबी के घर भेजा, सद्गुरु के आश्रम में भेजा, उनके समक्ष समर्पण किया; किन्तु–
बहुत धुलायो तबौं न भई उजरी।
नैहर दाग लगल मोरि चुनरी।।
चित्तरूपी चुनरी को बहुत धुलाया– सत्संग सुना, टूटी-फूटी सेवा की, उनके उपदेश के अनुसार साधना आरम्भ किया, कुछ अनुभव मिलने लगे, अलौकिक आवाजें मिलने लगीं, दृश्य दिखायी देने लगे, मार्गदर्शन होने लगा, हमने-आपने श्रम भी किया, बहुत धुलाया फिर भी ‘तबौं न भई उजरी’– जैसी उज्ज्वलता इसमें सुनी जाती है कि आत्मा अजर-अमर है, शाश्वत है, इसे शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल गीला नहीं कर सकता, वायु सुखा नहीं सकता, सदा रहने वाला और अपरिवर्तनशील यह आत्मा अविनाशी, शान्त और सम है– यह है इसकी निर्मलता! जैसी निर्मलता शास्त्रों में बतायी गयी है, वैसी निर्मलता देखने को नहीं मिली। इसका कारण बताते हैं–
भाई बरेठा दूर बसत हैं।
धोबी का पर्याय है बरेठा। बरेठा कहें चाहे धोबी! नैहर का भाई है तो समीप होना चाहिए किन्तु उलटा है कि ‘भाई बरेठा दूर बसत हैं’। सद्गुरु के दो रूप हैं– शरीर से तो सद्गुरु आँखों के सामने बैठे हैं लेकिन स्वरूप से उनकी रहनी आकाशवत् है। वह परमात्म-भाव में हैं, अद्वैत-अभिन्न स्थिति में उनका प्रवेश है– वह उनका स्वरूप है। वह स्वरूप हृदय में नहीं आ रहा है, अभी वह बहुत दूर है, सक्रिय नहीं है। सद्गुरु का स्वरूप सक्रिय नहीं हुआ तो उसे क्रियाशील करें! इसमें एक कठिनाई है–
साबुन महँग बिकाय वहि नगरी।
साबुन बड़ा महँगा है! साबुन में कौन-सी महँगाई है?–
जननी जनक बन्धु सुत दारा।
तनु धनु भवन सुहृद परिवारा।।
सब कै ममता ताग बटोरी।
मम पद मनहि बाँध बरि डोरी।।
(रामचरितमानस, ५/४७/४-५)
(रामचरितमानस, ५/४७/३)
जननी अर्थात् माता, जनक अर्थात् पिता, बन्धु, सुत, प्रिय परिवार, हितैषी, धन-धाम– इन सबमें जो हमारा ममत्व का संचार है, उन सबके सूत्र समेटकर उनकी रस्सी बनाकर मन को मेरे चरणों में बाँध दे, तो परमात्मा राम कहते हैं– ‘करउँ सद्य तेहि साधु समाना।’– तत्काल मैं उसे साधु के समानान्तर स्थिति दे देता हूँ, निर्मल पद प्रदान कर देता हूँ। यही साबुन की महँगाई है। माता-पिता, प्रिय परिवार, मर्यादा क्या छोड़ते बनता है? क्या इन सबकी आहुति देते बनता है? इतना मूल्य हम चुका ही नहीं पाते, इसे चुकाने में अपने को सक्षम नहीं पाते इसलिए उस नगरी का साबुन महँगा है।
जब साबुन इतना ही महँगा है कि इसका मूल्य चुकाने में हम अपने को सक्षम नहीं पाते तो छोड़िए झंझट! सन्त कबीर कहते हैं– नहीं, इसे छोड़ा नहीं जा सकता–
कहत कबीर सुनो भाई साधो!
एहि जनम की बिगरी कबहौं ना सुधरी।
सन्त कबीर कहते हैं– सज्जनों सुनें! यदि इस जन्म में बिगड़ गयी तो ‘कबहौं ना सुधरी’– मनुष्य योनि ही भवसागर से पार होने का उपाय है–
नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो।
सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो।।
करनधार सदगुर दृढ़ नावा।
दुर्लभ साज सुलभ करि पावा।।
जो न तरै भवसागर, नर समाज अस पाइ।
सो कृत निन्दक मंदमति, आत्माहन गति जाइ।।
(रामचरितमानस, ७/४४)
मनुष्य शरीर भवसागर पार होने के लिए जहाज है, उपाय है। परमात्मा कहते हैं कि मेरी अनुकूलता ही अनुकूल वायु है, सद्गुरु कर्णधार हैं, ड्राइवर हैं जो समुद्र पार करेंगे। ऐसा दुर्लभ साधन-समूह प्राप्त होने पर भी जो अपना परलोक सुधार नहीं लेता, वह मंदबुद्धि है और अपनी आत्मा का हत्यारा है। यही सन्त कबीर भी कहते हैं कि इस ‘जनम की बिगड़ी’– मनुष्य जन्म मिला और इसमें बिगड़ गयी तो ‘कबहौं न सुधरी’– तो फिर कभी नहीं सुधरेगा। अनन्त योनियाँ अवघट घाट हैं। अन्य किसी शरीर में पार होने का उपाय नहीं है। यहाँ तक कि देवयोनि में भी कोई उपाय नहीं है–
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति।
(श्रीमद्भगवद्गीता, ९/२१)
देवता अपने सत्कर्मों के फलस्वरूप देवलोक प्राप्त करते हैं, विशाल उत्तम भोग भोगते हैं किन्तु पुण्य क्षीण होने पर गिरकर वहीं आ जाते हैं जहाँ से चलना आरम्भ किया था। वे नवीन साधना करके परमात्मा तक की दूरी तय नहीं कर पाते। देवता लोग भी मनुष्य शरीर से आशावान हैं। कारण? नहुष जब इन्द्रपद से च्युत हुआ तो उसे अजगर होना पड़ा। देवता जानते हैं कि वे कीट-पतंग कुछ भी हो सकते हैं। वे देवलोक से गिरेंगे तो किसी न किसी योनि में ही जायेंगे। इसलिए वे प्रार्थना करते हैं कि यदि गिरें भी तो प्रभु ऐसी कृपा करें कि उन्हें मानव-तन मिले। क्यों? इसलिए कि भवसागर से पार होने का उपाय एकमात्र मानव-तन ही है।
‘कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके’ (श्रीमद्भगवद्गीता, १५/२)- मनुष्य शरीर कर्मों का रचयिता है, कर्मों के अनुसार शुभ अथवा अशुभ बन्धन तैयार करता है। इसलिए सन्त कबीर इस पद के अन्त में निर्देश देते हैं कि यदि ऐसा दुर्लभ मनुष्य शरीर पाकर भी भवसागर पार करते नहीं बना, ईश्वर-पथ में दस कदम रखते नहीं बना तो अनन्त योनियाँ तो केवल भोग भोगने के लिए हैं, भटकाव हैं। फिर तो ‘कबहौं न सुधरी’– अन्य किसी भी शरीर में सुधार की कोई सम्भावना नहीं है।
!! बोलिये श्री सद्गुरुदेव भगवान् की जय !!
(‘अमृतवाणी भाग-1’ से उद्धृत)