नाव बिच नदिया डूबी जाय

नाव बिच नदिया डूबी जाय

संसार में घटनायें घटती रहती हैं कि जहाज डूब गया, कहीं बेड़ा डूब गया, नाव डूब गयी; किन्तु अनादिकाल से आज तक ऐसा सुनने को नहीं मिला कि नाव के बीच में ही नदी डूब जाय। किन्तु आध्यात्मिक रूपकों में कुछ ऐसा ही है। यह भवसरिता है, नियम ही नौका है। यदि नियम भली प्रकार पार लग गया, मनसहित इन्द्रियों का संयम और संयम के साथ चिन्तन, भजन का नियम-पालन होने लगा, एक दिन ऐसा आता है कि इसी के अन्तराल में भवसरिता सिमटकर समाहित हो जाती है, समाप्त हो जाती है। जो डूब गया वह मर गया। उसकी जीवनलीला सदा के लिए समाप्त हो जाती है–

नामु लेत भव सिन्धु सुखाहीं।

करहु विचार सुजन मन माहीं।।  (रामचरितमानस, १/२४/४)

नाम लेते ही भवसागर सूख जाता है और सन्त कबीर कहते हैं कि डूब जाता है। बात एक ही है। सूख जाय तब भी मिट गया और डूब गया तब भी समाप्त हो गया– समानार्थक हैं। संसार नाम का कोई समुद्र प्रत्यक्ष नहीं है। आपके मन और इन्द्रियों की चेष्टाओं को समुद्र की उपमा दी गयी है। जिस किसी ने मनसहित इन्द्रियों को संयमित कर लिया, वह संसार-सरिता या भवसिन्धु से पार पा गया। संसार तो एक ही है किन्तु पात्रभेद से इसके कई रूप देखने को मिलते हैं; जैसे–

भव सिन्धु अगाध परे नर ते।

पदपंकज प्रेम न जे करते।। (रामचरितमानस, ७/१३/१०)

अथाह भवसिन्धु में वे लोग पड़े रहते हैं जो प्रभु के चरण कमलों में प्रीति नहीं करते अर्थात् जो कुछ भी नहीं करते, उनके लिए भवसागर अथाह है।

करउँ कथा भव सरिता तरनी। (रामचरितमानस, १/३०/४)– गोस्वामी जी ने अपने गुरु महाराज से जो राम-कथा सुनी अर्थात् ब्रह्मविद्या जब पकड़ में आती है तो वह कथा भवसरिता से नाव की तरह पार कर देती है। राम की कथा पकड़ में आने पर अथाह भवसागर सरिता हो जाता है।

यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा।  (रामचरितमानस, १/१९१ छन्द)

भगवान के चरित्र का जो सतत् चिन्तन करेंगे, ध्यान करेंगे (यह गायन श्वास से होता है) तो एक स्तर ऐसा आता है कि अथाह भवसागर कूप जितने आयतन में सिमट जायेगा। भगवान की कृपा बरसने लगती है, उस समय–

गरल सुधा रिपु करइ मिताई।

गोपद सिन्धु अनल सितलाई।। (रामचरितमानस, ५/४/२)

गरुड़ जी! भगवान यदि कृपा करके देख लें तो भवसिन्धु गोपद जितना ही रह जाता है। गोपद का अर्थ गाय के पाँव का खुर नहीं बल्कि गो अर्थात् मनसहित इन्द्रियाँ। उस समय मनसहित इन्द्रियों का जितना आयतन है उतना ही संसार है। बाहरी संसार, संग-दोष बाधक नहीं रह जाते। स्तर उन्नत होने पर–

बारक राम कहत जग जेऊ।

होत तरन तारन नर तेऊ।। (रामचरितमानस, २/२१६/४)

जप करते-करते केवल एक नाम में तल्लीनता की अवस्था जिस क्षण आती है तो ‘नाम लेत भव सिन्धु सुखाहीं’– भवसिन्धु सूख जाता है, साधक तर जाता है और दूसरों को भी पार करने की क्षमता उसमें आ जाती है। अब पथिक को डूबने का, गिरने का, बह जाने का कोई खतरा नहीं रह जाता। इस प्रकार विविध दृष्टियों से महापुरुषों ने संसार की अगाधता को सम्बोधित किया।

गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने संसार को सागर कहा। अर्जुन! जो मेरा समर्पित भक्त है, उसे मैं संसार सागर से पार कर देता हूँ– तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।(गीता, १२/७)

इस प्रकार सन्त कबीर कहते हैं कि मनुष्य यदि मनसहित इन्द्रियों को समेटकर नियमरूपी नौका पर आरूढ़ हो जायेगा तो एक समय ऐसा आयेगा कि भवसरिता ही नियमरूपी नौका में डूब जायेगी। उनका भजन इस प्रकार है–

नदिया डूबी जाय।

नाव बिच नदिया डूबी जाय।।

एक अचम्भा ऐसा देखा, कुएँ में लागी आग।

पानी पानी जल गया, तब मछली खेले फाग।।

नाव बिच….।।

एक अचम्भा ऐसन देखा, बन्दर दूहे गाय।

दूध दही तो अपनै खावै, घिया बनारस जाय।।

नाव बिच….।।

एक अचम्भा औरउ देखा, गिरगिट गवने जाय।

सोलह गज की साड़ी पहने, पूँछ उघारे जाय।।

नाव बिच….।।

एक अचम्भा ऐसन देखा, मुर्दा रोटी खाय।

सनकारे ते बोलत नाहीं, मारे ते चिल्लाय।।

नाव बिच….।।

एक अचम्भा ऐसा देखा, गदहा के दो सींग।

चींटी के गले रस्सा लागल, खींचत अर्जुन भीम।।

नाव बिच….।।

एक चींटी के मूतले संतो, नदी नार बहि जाय।

पापी नैया पार उतरि गये, धरमी डूबैं मझधार।।

नाव बिच….।।

कहत कबीर सुनो भाई साधो, यह पद है निरबानी।

जो या पद को अरथ बिचारे, सोई सन्त सुजान।।

नाव बिच….।।

नाव में नदी डूब जाती है! कैसे? अनायास डूब जाती है या कुछ करना पड़ता है? अकस्मात् डूब जाती है या क्रमश:? इस पर वे कहते हैं– कुएँ में लागी आग– संसाररूपी कूप में योगाग्नि का संचार हो गया। अग्नि दो प्रकार की है– एक तो विषयाग्नि जो जीव को त्रय-तापों की ज्वाला में जलाती है; और दूसरी है योगाग्नि जो हमारे विकारों को, संस्कारों को जलाती है। संसार में रहते हुए अभ्यास इतना उन्नत हुआ कि कुएँ में लागी आग– ज्ञानरूपी योगाग्नि प्रज्ज्वलित हो गयी जिससे पानी पानी जल गया– विषयरूपी वारि सदा के लिए समाप्त हो गया। तब मछली खेले फाग– भक्तिरूपी जल में मनरूपी मछली क्रीड़ा करने लगती है। आरम्भिक स्तर पर भक्ति करने में कष्ट ही कष्ट प्रतीत होता है किन्तु विषयरूपी वारि समाप्त होते ही मनरूपी मछली भक्ति-सरोवर में हिलोरे लेने लगती है। इसी आशय का संत कबीर का ही एक सोरठा है–

समँदर लागी आगि, पानी जलि कोइला भई।

देख कबीरा जागि, मछली रूखा चढ़ि गईं।।

अब उस मछली के जीवन में सदा बहार है, सदा बसन्त खिलने लगता है, फिर उसके जीवन में कोई दु:ख नहीं रह जाता।

एक अचम्भा ऐसा देखा, बन्दर दूहै गाय।

वैराग्यरूपी हनुमान, अनुरागरूपी अंगद, साधनरूपी जामवन्त, ब्रह्म आचरणमयी प्रवृत्ति वानरी सेना– युद्ध में ये मरते-जीते रहते हैं। अन्त में असुर सदा के लिए मर जाते हैं और ब्रह्म आचरण, जो मर गये थे, सब जीवित हो जाते हैं, सचेत हो जाते हैं।

सुधा वृष्टि भै दुहु दल ऊपर।

जिए भालु कपि नहिं रजनीचर।। (रामचरितमानस, ६/११३/६)

इतने दिनों के युद्ध में जितने भी भालू, कपि वीरगति को प्राप्त हुए थे, जीवित हो उठे; किन्तु राक्षस जीवित नहीं हुए। अमृत अर्थात् मृत्यु से परे जो सत्ता है, परमात्मा जो अजर-अमर, नित्य और शाश्वत है, जब उसका सूत्रपात होता है तब आसुरी सम्पद् सदा के लिए शान्त और दैवी सम्पद् सदा-सदा के लिए विकसित हो जाती है।

तीव्र वैराग्य द्वारा गो अर्थात् मनसहित इन्द्रियों को दुहा जाता है। दूध दही तो अपनै खावे– मनसहित इन्द्रियों के अन्तराल में ही ब्रह्म-पीयूष की अनुभूति होने लगती है। दही ध्यान का प्रतीक है, ध्यान लगने लगता है। ज्ञान और ध्यान की मस्ती का वह स्वयं उपभोग करता है और घिया बनारस जाय– सारतत्व परमात्मा कायारूपी काशी में संग्रहीत होता चला जाता है। यही घी का बनारस जाना है।

एक अचम्भा ऐसा देखा गिरगिट गवने जाय।

चौरासी लाख योनियों में छिपकली जैसा एक जीव गिरगिट है। वह शादी-विवाह के पश्चात् पतिगृह गौने क्या खाक जायेगा? अध्यात्म में गिर-गिर के सँभलना ही गिरगिट है। कदम चूम लेती है आकर के मंजिल, मुसाफिर अगर अपनी हिम्मत न हारे।प्रभु की मंजिल उसे ही मिलती है जो पथ के तूफानों से लड़ता जाय। चाहे प्रलय के बादल घिरे हों, आगे ही आगे बढ़ता जाय। ईश्वरपथ फूलों की सेज नहीं है। यह काँटों का रास्ता है। महात्माओं को संसार से प्राय: कष्ट मिला है। संत ज्ञानेश्वर, नरसी मेहता, कबीर, मीरा, तुलसी इत्यादि किसी को समाज ने चैन से रहने नहीं दिया। स्वामी दयानन्द को जहर मिला। विश्वामित्र की तीन बार दुर्दशा हुई। माया का संघर्ष आता ही है। यह आपको धकेलेगी, खींच लेगी, ठोकर लगायेगी, धक्का देगी, गिरा देगी; फिर भी गिर-गिरकर सँभलनेवाला, लाख मुसीबतों के बावजूद लक्ष्य से चलायमान न होनेवाला अन्तत: अपने स्वरूप की ओर गमन कर जाता है। गिरने पर और भी वेग से, अनुराग से प्रभु का भजन करना चाहिए। उसे सोचना चाहिए कि जैसा रोग था, उस अनुपात से औषधि नहीं ली गयी। अत: पतन के पश्चात् भी निराश, हताश जो नहीं होता, गिरा और सँभला– इस प्रकार गिरगिट भी गवने चला जाता है। वह परमात्मा की ओर बढ़ जाता है तो–

सोलह गज की साड़ी पहिने– प्रियतम के घर पहली बार जानेवाली नववधू का शृंगार भी चाहिए। सत्य ही साड़ी है। सत्य मात्र परमात्मा है। वह सोलह तत्त्वों के सूक्ष्म शरीर से घिरा है। यह सूक्ष्म शरीर अन्त:करण या मन का संसार है जिसमें हैं– दस इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, तेजस और प्राज्ञ! इस सम्पूर्ण सूक्ष्म शरीर में, अन्त:करण में सत्यरूपी साड़ी को साधक धारण करके प्रियतम के घर जाता है। यदि अन्त:करण में परमात्मा का तेज आया, उसका पराग, खुशबू नहीं उतरा तो साधक गमन नहीं कर पायेगा। सत्यरूपी साड़ी को धारण करके अन्त:करण में परमात्मा के अतिरिक्त अन्य चिन्तन, स्फुरण न रखनेवाला साधक प्रभु के धाम में पहुँच जाता है।

पूँछ उघारे जाय– वह तो पहुँच ही जाता है, साथी ही पीछे वालों के लिए कीर्तिमान, पथ की पहचान छोड़ जाता है। उसी के पदचिह्नों से भावी समाज प्रेरणा ग्रहण करता और चलने का प्रोत्साहन प्राप्त करता है। आज भी लोग कबीर का नाम लेते हैं, तुलसी का नाम लेते हैं, मीरा का उदाहरण देते हैं, अपने गुरु महाराज के जीवनादर्श और आत्मानुभूति के प्रसंगों से अपना रास्ता प्रशस्त कर लेते हैं।

संसार में लोग नाम के लिए ही पद-प्रतिष्ठा-ऐश्वर्य संग्रह करते जाते हैं। अच्छी से अच्छी उपाधियाँ रखनेवालों को इतिहास में कहीं कोई लेखा-जोखा नहीं मिलता। आप अपना आचरण सही करें, वही आपका नाम है, वही शेष रहेगा, उसी से आपकी पूछ रहेगी। महापुरुष अपने अन्त:करण में, सूक्ष्म शरीर में सत्य मात्र परमात्मा की साड़ी धारण कर लेता है, अन्य संकल्प, संस्कार शान्त हो जाते हैं। उस अवस्था में वह परमात्मा के धाम पहुँच जाता है, उन्हीं का कीर्तिगान रह जाता है। मीरा को उसकी सास ने कुलनाशी की उपाधि दे रखा था। आज उस कुलवन्ती सास को कोई नहीं जानता; मीरा को पूरा विश्व जानता है, उससे लोग प्रेरणा पाते हैं।

एक अचम्भा ऐसन देखा, मुरदा रोटी खाय।

सन्त कबीर ने एक घनघोर आश्चर्य देखा, जैसा पहले किसी ने देखा-सुना भी न था कि मुर्दा रोटी खाता है। उनकी मान्यता थी–

जीवत में मरना भला, जो मर जाने कोय।

मरने से पहले मरे, अजर अमर सो होय।।

जीते जी मर जाना अच्छा होता है, यदि कोई मरने की कला जान ले। मरने से पहले मरे– यदि कोई शरीर छूटने से पहले मर जाय तो अजर अमर सो होय– वह अजर-अमर परमात्मा में स्थिति पा जाता है। वास्तव में,

मन मरा माया मरी, हंसा बेपरवाह।

जाका कछू न चाहिए, सोई शाहंशाह।।

शरीर की मृत्यु वास्तविक मृत्यु नहीं है। यह तो मात्र कलेवरों का परिवर्तन है। आज यह शरीर छूटा, तत्काल दूसरा शरीर आरक्षित है। भगवान की करुणा या अपने संस्कारों के अनुरूप शरीर छूटते ही पुनर्जन्म मिलता है किन्तु यदि शरीर की आयु रहते मन और मन के अन्तराल के संस्कार यदि मिट जायँ तो शरीर धारण करने का कारण ही समाप्त हो जाय। वही मृत्यु सराहनीय है जिसके पीछे जन्म नहीं है और इसी प्रकार वही जन्म सराहनीय है जिसके पीछे मृत्यु नहीं है। संस्कारों का यह उन्मूलन जीते जी होता है, मरने के बाद नहीं–

अवधू! जीवत में कर आसा।

मुए मुक्ति गुरु कहै स्वार्थी, झूठा दे विश्वासा।।

जीयत मन बस हुआ नहीं, तो पुनि देवे बहु त्रासा।

जहँ आसा तहँ बासा, अवधू! मन का यही तमासा।।

इस प्रकार शुद्ध मृत्यु है मन की मृत्यु, मन के अन्तराल में संस्कारों की मृत्यु! कबीर कहते हैं– एक अचम्भा ऐसन देखा, मुरदा रोटी खाय– जहाँ मन मिट गया, वह रोटी खाने लगता है। इस शरीर का पोषण रोटी-दाल-अन्न इत्यादि हैं किन्तु आत्मा की खुराक हृदय की धारा में रहना, स्वाँस में रमण करना है। भजन ही भोजन है जो आत्मा की खुराक है, जो इस आत्मा को सदा-सदा के लिए पूर्ण तृप्त, शाश्वत जीवन और अनन्त धाम प्रदान करता है। जब मन सब ओर से सिमट कर हृदय की चिन्तन-धारा में रमण करते हुए मृतप्राय हो गया तब मुर्दा रोटी खाय– यह मुर्दा मन आत्मा की खुराक भजन को प्राप्त करने लगता है। जब तक मन जीवित है, तब यह विषयों का चक्कर काटता रहता है; रोटी कहाँ, भजन कहाँ?

सनकारे से बोलत नाहीं– भजन में अनुरक्त मन संकेत करने पर भी संसार की ओर ध्यान नहीं देता। उसमें कितना ही विक्षोभ पैदा करें, उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। गाली भी दें, उसे पता ही नहीं चलेगा। उसे आप भला कहें, बुरा कहें– कोई अन्तर नहीं पड़ता; किन्तु मारे ते चिल्लाय– कोई संगदोष जब इन्द्रियों में विकार जागृत कर देता है, यह योगी के लिए सबसे बड़ी मार है, वह विकल हो जाता है। यह मार काम की है, क्रोध की है, लोभ की, राग-द्वेष की है। इनमें से कहीं जब कोई ठोकर मार देता है तब वह चिल्लाता है कि ‘प्रभु बचायें! रक्षा करें! मैं आपकी शरण हूँ।’ इस निवेदन के साथ यदि नियम का सुचारु रूप से पालन करते जायँगे तो भव नदी सिमटते-सिमटते नियम के अन्तराल में डूबती चली जायेगी और एक दिन सर्वथा डूब जायेगी।

एक अचम्भा ऐसा देखा, गदहा के दो सींग।

गधे को सींग होती ही नहीं! गधा जड़ता का प्रतीक है। कहते हैं कि रावण का एक सिर गधे का था। मोहरूपी रावण! मोह के ऊपर एक मूढ़ता का सिर रहता है। मनसहित इन्द्रियों में जब तक जड़ता है, द्वैत के दो भयंकर सींग अर्थात् शूल विद्यमान रहते हैं जो जीवों को छेदते रहते हैं। मैं अलग हूँ, ईश्वर भिन्न है; यह संसार सत्य है या वह परमात्मा?– यही द्वैत का भान जीव के लिए फाँसी है।

जो निज मन परिहरै विकारा।

तौ कत द्वैत जनित संसृति दुख संसय सोक अपारा।। (विनयपत्रिका, १२४)

गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं यदि अपना मन विकारों का त्याग कर दे तो द्वैत से उत्पन्न अपार सांसारिक दु:ख, अपार शोक भला क्यों रहे? मन में जब तक जड़ता है, तभी तक ये शूल विद्यमान रहते हैं। जहाँ जड़ता मिटी, द्वैत का अन्त हो जाता है। द्वैत के इन शूलों से बच निकलने का उपाय क्या है? इस पर कहते हैं–

चींटी के गले रस्सा बाँधे– योगी के संयत चित्त को महापुरुषों ने चींटी की संज्ञा दी है। चित्त तो इतना बड़ा है जितना बड़ा संसार– तुलसीदास कह चिदविलास जग, बूझत बूझत बूझै।– लेकिन अभ्यास करते-करते चित्त सिमटते-सिमटते इतना सूक्ष्म हो जाता है जैसे बारीकवाली चींटी; किन्तु तब भी द्वैत विद्यमान रहता है। उस चित्तरूपी चींटी के गले में सुरत की रस्सी लगाकर खींचत अर्जुन भीम– अनुराग ही अर्जुन और भाव ही भीम है। अनुराग और भाव के द्वारा इस चित्त को इष्ट के चरणों में खींचो। उस अवस्था में द्वैत के सींग समाप्त हो जायँगे, प्रभु ही शेष बचेंगे। सेवक खो जाता है, स्वामी ही शेष बचता है।

एक चींटी के मूतले सन्तों, नदी नार बहि जाय।

स्थिर चित्त, प्रभु में स्थितिप्राप्त योगी के मुख से जो शब्द निकलते हैं प्रत्यक्ष दर्शन है, अनुभवगम्य वाणी है। महापुरुष की बुद्धि मात्र यन्त्र होती है। वह जो कुछ कहता है, परमात्मा प्रदत्त है। उसके माध्यम से परमात्मा ही प्रसारण करता है। वह गीता बन जाता है, वेद बन जाता है, उपनिषद् और रामायण बन जाता है।

पापी नैया पार उतरि गये, धरमी डूबें मझधार।

सामाजिक रीति-रिवाज, लोक-मर्यादा और सांसारिक व्यवस्थाओं को तिलाञ्जलि देनेवाले, भले ही समाज उन्हें पापी कहता रहे कि अभी इनकी क्या साधु बनने की उम्र है? अभी तो छोटा पुत्र स्तनपान ही कर रहा है, उसे अपने पैरों पर खड़ा तो हो लेने देते! अपनी माँ को कन्धा तो दे देता! कोई भजन करने निकल भर जाय, आक्षेपों की झड़ी लग जाती है। घर में कोई भूखों मर रहा हो, समाज के लोग आगे बढ़कर उसके लिए दो रोटी का प्रबन्ध नहीं करते। लड़का अच्छा-बुरा कुछ भी हो, साधु न बनने पाये। समाज की दृष्टि में ऐसे पापी व्यक्ति महापुरुषों की वाणी पकड़कर भवसागर से पार हो जाते हैं; किन्तु मातृ-ऋण, पितृ-ऋण, लोक-ऋण, देशभक्ति, मानव-सेवा इत्यादि तथाकथित धर्मों में अनुरक्त भवसागर की मध्य धारा में डूब जाते हैं।

महापुरुष की वाणी में परमात्मा के दर्शन का विधान रहता है। उन्होंने कृपापूर्वक जिन-जिन को सहयोग दिया, वे भवसागर के पार चले गये। इसीलिए पूज्य गुरु महाराज कहते थे– ‘‘हो! सब दानी ही तो बने हैं। हाथी स्वान लेवा देई– हाथी लेकर बदले में कुत्ते का दान करते हैं। माँगनेवाले भी सौ रुपये के बदले हाथी माँगते हैं। शुद्ध दाता तो मैं हूँ जो मुक्ति-दान देता हूँ और वह भी निष्प्रयोजन! केवल उसके हित के लिए! हमारा कोई प्रयोजन नहीं। साधक हमें कुछ नहीं देता।’’

एक बार गुरु महाराज ने कहा– ‘‘गुरु का धन नहीं खाना चाहिए। गुरु का धन खाने से नरक होता है।’’ इतना सुनते ही दो-एक साधक प्रात: उठकर गायब हो गये और दोपहर में लौट आये। गुरु महाराज ने पूछा, ‘‘कहाँ गये थे?’’ उन्होंने कहा– ‘‘महाराज जी! हम भिक्षा करने गये थे। आपने कहा था कि गुरु का धन नहीं खाना चाहिए।’’

महाराज जी बोले– ‘‘हूँ! करे भीख माँगे गया रहा?’’ साधक ने कहा– ‘‘हाँ महाराज! चेतावै गये रहे।’’ महाराज जी ने उन्हें समझाते हुए कहा– ‘‘देखो! गुरु के ऋण से इस प्रकार उऋण नहीं हुआ जा सकता। गुरु की विद्या पकड़ो, योगविधि समझो, उसका आचरण करके जो अधिकतम सीमा है वहाँ तक की दूरी तय कर लो। तब हमारा जो खाओगे, चुकता होता चला जायेगा। भजन में कटौती करके भीख माँगने से गुरु का कर्ज पटा ही नहीं।’’ बस उसी दिन से सबका भ्रम दूर हो गया और सभी साधक तल्लीन होकर भजन में लग गये।

गुरु महाराज ने उदर-पोषण के लिए कभी भीख नहीं माँगा था जबकि दो उपवास, तीन उपवास आये दिन की घटना थी। कभी-कभी सात-सात दिनों तक और एक बार तो चौदह दिनों तक निराहार रहना पड़ा। कभी किसी को भगवत्प्रेरणा हो जाती कि इन महात्मा की सेवा करो, किसी को स्वप्न में दिखाई पड़ता तो कोई स्वभावत: महाराज जी को भोजन करा देता; किन्तु महाराज जी ने याचना नहीं की। उनकी मान्यता थी कि जब भगवान मोके साधु बनाये हैं तो हमारे लिए भोजन की व्यवस्था भी जब वे आवश्यक समझेंगे, करेंगे।

कहत कबीर सुनो भाई साधो, यह पद है निरबानी।

इस पद में जो तथ्य प्रस्तुत किया जा रहा है, वह वाणी का विषय नहीं। यह तो क्रियात्मक है, अनुभवगम्य है। इसे वही जान सकता है जिसके हृदय में वह प्रभु जागृत हो जायँ। जो इस पद का अर्थ विचारे, सोई सन्त सुजान।– इस पद में बताया हुआ जो अर्थ है, इस पर विचार कर उसके अनुसार साधना में लगें। वही सन्त है, वास्तविकता का ज्ञाता है।

सुनो भाई गप्प गुनो भाई सफ्फ, नाव बिच नदिया डूबी जाय।

सुनने में तो यह सब सरासर गप्प ही लगता है कि नाव में नदी डूब जाती है या चींटी के गले में रस्सा बाँधकर अर्जुन और भीम खींचते हैं या कुएँ में आग लग गयी, पानी जल गया तब मछली मस्ती काटने लगी, पानी था तब दु:खी थी। वाह्य दृष्टि से इससे झूठा कोई प्रलाप नहीं हो सकता किन्तु गुनने अर्थात् विचार करने पर सब कुछ स्पष्ट है, साफ-सुथरा प्रशस्त पथ है कि नाव बिच नदिया डूबी जाय– यदि आप सद्गुरु द्वारा प्रदत्त नियम का पालन करते जायँ तो एक समय ऐसा भी आयेगा कि भव-सरिता इसके अन्तराल में समाप्त हो जायेगी। ईश्वर-प्राप्ति के साथ ही प्रकृति पुरुषत्व में विलीन हो जाती है, परमात्मा ही शेष बच रहता है। इसी का नाम है मोक्ष! कबीर की यह वाणी अटपटी नहीं है। उन्होंने वैदिक तथ्य को छिपाकर प्रस्तुत किया जिससे अधिकारी उसे प्राप्त कर लें और अनधिकारी उसका दुरुपयोग न कर सकें।

सन्त कबीर की ख्याति जब बढ़ने लगी, बहुत-से श्रद्धालु भाविक उनकी वाणी सुनने के लिए एकत्र होने लगे। राजा, महाराजा भी उनके दर्शनों से अपने को धन्य मानने लगे। रोगी भागकर रोगमुक्ति के लिए आने लगे। एक ने निश्चय किया– मैं कबीर साहब से ही गुरुमंत्र लूँगा क्योंकि मैंने सुन रखा है कि बिना गुरु के कल्याण नहीं होता और कबीर साहब महापुरुष हैं।

वह काशी पहुँचा और अन्वेषण क्रम में सीधा कबीर से ही जा टकराया। उन्हीं से पूछ बैठा, ‘‘सन्त कबीर साहब कहाँ निवास करते हैं?’’ कबीर ने कहा, ‘‘होगा कहीं कबीरवा!’’ कबीर का अपमान वह भाविक सहन न कर सका। एक चाँटा कबीर के गाल पर मारते हुए कहा, ‘‘इतने बड़े महापुरुष को ‘कबीरवा’ कहता है! तुम्हारी जिह्वा गलकर गिर जायेगी।’’

कबीर ने मुँह घुमाकर दूसरी ओर का गाल उसकी ओर कर दिया और कहा, ‘‘एक चाँटा इधर भी लगा लो।’’ वह व्यक्ति झल्लाते हुए बोला, ‘‘बड़े निर्लज्ज हो।’’ आगे बढ़कर एक अन्य व्यक्ति से कबीर साहब का पता पूछने लगा। उसने बताया, ‘‘वह क्या कबीर साहब बैठे हैं।’’

अन्य लोगों ने भी वही बताया। जब उसे पक्का निश्चय हो गया, वह दौड़कर कबीर साहब के पास आया और साष्टाङ्ग दण्डवत् करते हुए बोला, ‘‘मुझ मूर्ख से अनजाने ही भयानक भूल हो गयी। मैं तो मंत्र लेने आपकी शरण में आया था और आपको मार बैठा, क्षमा करें।’’ कबीर ने कहा, ‘‘तुमसे कोई भूल कहाँ हुई! लोग दो पैसे की हँड़िया खरीदते हैं, उसे तीन-चार बार ठोंक बजाकर देख लेते हैं कि कहीं सौदा कच्चा तो नहीं है। तुम तन-मन-धन मुझे अर्पित कर गुरु बनाने आये, ठोंक बजा लिया– अच्छा ही तो किया। एकाध बार और ठोंक बजा लो।’’ अस्तु,

सम मान निरादर आदरही, सब सन्त सुखी विचरन्त मही।

सन्तजन संसार के आक्षेपों, आदर और तिरस्कार– दोनों में समान भाव रखते हैं इसीलिए सुखपूर्वक विचरणरत रहते हैं।

ईश्वरपथ में केवल श्रद्धा लगती है। जिस भाव से सरभंग के पास राम पहुँचे, जिस लगन से सुतीक्ष्ण के पास पहुँचे, उसी लगन से राम शबरी के पास भी पहुँचे। यहाँ स्त्री-पुरुष का भेद नहीं है, जातिगत कुलीनता का प्रश्न नहीं है, केवल श्रद्धा का मूल्य है–

श्रद्धावांल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:

ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति।। (गीता, ४/३९)

श्रद्धावान संयतेन्द्रिय तथा तत्पर पुरुष ज्ञान प्राप्त करता है और ज्ञान प्राप्त करते ही तत्काल परम शाश्वत शान्ति को प्राप्त कर लेता है। श्रद्धाविहीन किया हुआ कर्म, दिया हुआ दान, भजन-चिन्तन-संयम सब व्यर्थ चला जाता है। ‘भावे विद्यते देवा’ इसीलिए श्रद्धा के साथ गुरु महाराज के निर्देशन के अनुसार साधन में प्रवृत्त हो जायँ तो भगवान अपनी सब अनुकूलताओं से आपको आप्लावित कर देंगे, मार्गदर्शन करने लगेंगे और आप समझते जायेंगे।

!! ॐ श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय !!

(अमृतवाणी भाग-2’ से उद्धृत)

Q & A
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