वा घर की कोई सुध न बतावे

वा घर की कोई सुध बतावे

वा घर की कोई सुध ना बतावे, जा घर से जीव आया है।

तत पर शून्य शून्य पर तत है, ता ऊपर मठ छाया है।

ब्रह्मा विष्णु महेसउ नाहीं, नहीं कर्म नहिं काया है।।

चाँद सूर्य दोउ बने दहीरा, दधिया मथि घिउ खाया है।

कहत कबीर भेद की बानी, बिरला कोउ लख पाया है।।

प्रस्तुत पद में संत कबीर ने बताया है कि मनुष्य का वास्तविक घर कौन-सा है? मनुष्य वहीं रहता है जहाँ उसका मन रहता है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी रामचरितमानस में इस तथ्य पर प्रकाश डाला है। लंका का निवासी विभीषण जब भगवान राम की शरण में आया तो सुग्रीव ने कहा कि– इसे बन्दी बना लिया जाय। यह उसी रावण का भाई है जिसने माता सीता की चोरी की है। अंगद ने कहा– इसे मार डाला जाय। किसी ने कुछ कहा। हनुमान तटस्थ खड़े थे यद्यपि विभीषण से वह पहले ही मिल आये थे। भगवान ने कहा कि नहीं, निसाचरों से हमें कोई भय नहीं है। जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते।।’ (मानस, ५/४३/६)– लक्ष्मण उन सबको एक ही पल में मार डालने में समर्थ हैं। किन्तु जौं सभीत आवा सरनाई। रखिहउँ ताहि प्रान की नाई।।’– यदि यह भयभीत होकर हमारी शरण में आया है तो मैं अपने प्राणों की तरह इसकी रक्षा करूँगा।

विभीषण सन्मुख आया तो भगवान ने कहा– ‘आओ लंकेश!’ और समुद्र के जल से उसका अभिषेक कर दिया। विभीषण ने कहा– प्रभो! लंकेश तो रावण है। भगवान बोले– उसकी आयु के दिन पूरे हो गये हैं। अब तो यह उत्तरदायित्व आपको ही वहन करना पड़ेगा। अपना समाचार बताइये कि आप कैसे हैं? खल मंडली बसहुँ दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती।।’ (मानस, ५/४५/५)– हे सखे! आप तो खलमंडली में निवास करते हैं। धर्म का निर्वाह कैसे कर पाते होंगे? विभीषण ने कहा–

तब लगि कुसल जीव कहुँ, सपनेहुँ मन बिश्राम।

जब लगि भजत राम कहुँ, सोक धाम तजि काम।। (मानस, ५/४६)

प्रभो! जब तक जीव कामनाओं का त्याग कर आपका भजन नहीं करता, तब तक उसके लिए सुख है ही नहीं। सपने में भी उसे विश्राम नहीं मिल सकता। सारे अनर्थ का मूल काम है।

तब लगि हृदयँ बसत खल नाना।

लोभ मोह मत्सर मद माना।।

जब लगि उर बसत रघुनाथा।

धरें चाप सायक कटि भाथा।।

ममता तरुन तमी अँधिआरी।

राग द्वेष उलूक सुखकारी।।

तब लगि बसति जीव मन माहीं।

जब लगि प्रभु परताप रबि नाहीं।। (मानस, ५/४६/१–४)

जब तक जीव आपका भजन नहीं करता, तब तक उसके हृदय में खलों का निवास रहता है। खल लंका में नहीं रहते। खल हृदय में बसते हैं। विभीषण ने खलों के नाम गिनाये– लोभ, मोह, मत्सर, मद, मान, ममता, राग और द्वेष। ममता घोर अंधकारपूर्ण रात्रि है। ये खल जीव के मन में तब तक निवास करते हैं जब तक प्रभु का प्रतापरूपी सूर्य हृदय में उदित नहीं हो जाता।

अब मैं कुसल मिटे भय भारे।

देखि राम पद कमल तुम्हारे।। (मानस, ५/४६/५)

प्रभो! आज आपका प्रताप सूर्य उदित हो गया है। अब मैं सकुशल हूँ। आपके चरण-कमलों का दर्शन करके मेरा महान भय मिट गया है। इस प्रकार हृदय में जब दैवी वृत्ति का बाहुल्य है तब जीव के लिए कुशल है अन्यथा आसुरी वृत्ति में जीव का कल्याण नहीं है।

सन्त कबीर उस वास्तविक घर का परिचय एक अन्य पद में देते हुए कहते हैं–

तवन घर चेतिहे रे भाई, तोहरा आवागमन मिटि जाई।

हे भाई! उस घर के लिए तैयारी करो जिस घर में प्रवेश करते ही आवागमन मिट जाय। आना अर्थात् जन्म, जाना अर्थात् मृत्यु; यह जन्म-मृत्यु का बंधन कट जाय। उस घर की व्यवस्था कैसी है? इस पर कहते हैं–

जा घर लक्ष्मी झाड़ू देत हैं, शम्भु करें कोतवाली।

जा घर ब्रह्मा बने टहलुआ, विष्नु करें रखवाली।।

तवन घर चेतिहे रे भाई।।

उस घर में सेवा के लिए आपको कुछ खर्च भी नहीं करना पड़ेगा। वहाँ लक्ष्मी झाड़ू देती हैं, शिवजी न्याय करते हैं, ब्रह्माजी सेवा कर रहे हैं और पालन-पोषण की जिम्मेदारी भगवान विष्णु देख रहे हैं।

चलहु हंसा वा घर चलहु, जहाँ आवागमन होई।

उस घर में रहने के पश्चात् आवागमन सदा-सदा के लिए समाप्त हो जायेगा। तुम रहोगे, तुम्हारा शाश्वत घर रहेगा, शाश्वत जीवन रहेगा। वह घर है कैसा? इस पर कहते हैं–

कहत कबीर सुनो भाई संतो, अचरज कहलो जाई।

तवन घर चेतिहे रे भाई।।

संत कबीर कहते हैं कि वह घर एक आश्चर्य है, वाणी का विषय नहीं है। वह बाहरवाले घर जैसा नहीं है, अनुभवगम्य है। उसे वही जानता है जिसे वह उपलब्ध है। वह घर कैसे मिलेगा?

घर कीन्हे घर जात है, घर छाँड़े घर जाय।

तुलसी घर बन बीच में, प्रेमपुरी सरसाय।।

घर में चिपककर रहने से भी वह घर नहीं मिलेगा। घर छोड़ने से भी वह घर नहीं मिलेगा। घर और बन के बीच में प्रेम अर्थात् श्रद्धाभाव, प्रेम की कुटिया बना लो और उसी में रहो; क्योंकि–

हरि ब्यापकु सर्बत्र समाना।

प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना।।

अग जग मय सब रहित बिरागी।

प्रेम तें प्रभु प्रगटइ जिमि आगी।। (मानस, १/१८४/५, ७)

इसलिए केवल प्रेमपूरित हृदय से उन प्रभु का स्मरण करें, भगवान अवश्य मिलेंगे। इसी भाव का यह पद भी है–

वा घर की कोइ सुध बतावे, जा घर ते जीव आया है।

संत कबीर कहते हैं कि उस घर का मार्ग कोई नहीं बताता जहाँ से यह जीव आया है। यह जीव किस घर से आया है?

ईस्वर अंस जीव अबिनासी।

चेतन अमल सहज सुखरासी।। (मानस, ७/११६/२)

यह जीवात्मा ईश्वर का विशुद्ध अंश है इसलिए इसका विशुद्ध घर तो परमात्मा ही है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– अर्जुन! प्रकृति गर्भ धारण करनेवाली माता है और मैं परम चेतन बीजरूप से पिता हूँ। शेष सब तो निमित्त मात्र हैं। पञ्चभौतिक शरीर का जन्म तो माता-पिता से होता है लेकिन स्वरूप के जन्म में भक्ति ही माता है और ज्ञान ही पिता है। गीता में है–

त्वमादिदेव: पुरुष: पुराण-

        स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।

वेत्तासि वेद्यं परं धाम

        त्वया ततं विश्वमनन्तरूप।। (११/३८)

भगवान ही परम धाम हैं। यह संसार तो एक भटकाव है। आज जन्म है तो कल मृत्यु। आज सुख है तो कल दु:ख। जिन सूरमाओं ने बहुत कुछ अर्जित किया, आज उनमें से किसी का भी अस्तित्व नहीं है। सिकन्दर महान, अशोक महान, महाराणा प्रताप, शिवाजी इत्यादि के पराक्रम की कहानियाँ सुनने को मिलती हैं किन्तु उनकी उपलब्धियाँ आज दृष्टिगोचर नहीं होतीं। भीष्म ने कहा था– हस्तिनापुर को जब तक मैं चारों ओर से सुरक्षित नहीं देख लूँगा, तब तक प्राण नहीं त्यागूँगा। जब भगवान कृष्ण महाभारत युद्ध के पश्चात् पाण्डवों को साथ लेकर उनके पास गये कि पितामह! आपके पौत्र युधिष्ठिर गद्दी पर विराजमान हैं। कहीं कोई विवाद नहीं है। हस्तिनापुर चारों ओर से सुरक्षित है। भीष्म ने कहा– कृष्ण! अब मैं सुख से शरीर का त्याग कर सकूँगा। वह चले गये। उसी हस्तिनापुर पर मुसलमानों का राज्य हुआ, ईसाइयों का राज्य हुआ। इस समय पुन: जनता की निर्वाचित सरकार वहाँ है।

धरा को प्रमाण यही तुलसी, जो फरा सो झरा जो बरा सो बुताना।

इस संसार में सब कुछ अस्थिर है। स्थिर है तो एकमात्र परमात्मा। जब तक जीव अपने उसी परमात्म-स्वरूप का दर्शन, स्पर्श और उसमें विलय प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक वह अपूर्ण है। इस घर का एक ही रास्ता है–

तत पर शून्य शून्य पर तत है, ता ऊपर मठ छाया है।

परम तत्त्व परमात्मा है। उसके ऊपर शून्य है अर्थात् कुछ है ही नहीं। लेकिन जब तक भजन करते-करते मन संकल्प-विकल्प से शून्य न हो जाय, तब तक वह तत्त्व विदित नहीं होगा। आपके और उस परम तत्त्व के बीच यदि कोई रुकावट है तो वह है चित्तवृत्ति। सद्गुरु की शरण में अभ्यास करते-करते यह शून्य में स्थिर हो जाती है, तब वह तत्त्व विदित होता है।

शून्य पर तत है’– भजन करने में पहले मन नहीं लगता, किन्तु अभ्यास और वैराग्य के द्वारा चित्तवृत्ति का भली प्रकार निरोध हो जाता है। जहाँ श्वास में अथवा चरणों के ध्यान में मन को लगाया जाय, वहाँ वृत्ति का एकतार चलना, क्रम न टूटना ध्यान कहलाता है–

तत्र प्रत्यैकतानता ध्यानम्। (योग., ३/२)

तदैवार्थमात्रनिर्भासम् स्वरूप शून्यमिव समाधि। (योग., ३/३)

जहाँ ध्यान स्थिर है वहाँ लक्ष्यमात्र का आभास रह जाय, जिसे देखना है केवल वह दिखाई पड़े, देखनेवाले चित्त का स्वरूप शून्य हो जाय – इसका नाम समाधि है। इस निरोध का नाम है शून्य। यही है ‘तत पर शून्य’। इस निरोध के साथ प्रकृति से सम्बन्ध टूट जाता है। प्रकृति जिस मन और चित्त के धरातल पर काम करती थी, टिकती थी वह धरातल समाप्त हो गया तो प्रकृति कहाँ टिके? इसलिए वहाँ ज्योतिर्मय परमात्मा प्रसारित हो जाता है जिसका नाम है तत्त्व। यही ‘शून्य पर तत’ है। उसे जानकर वह वही हो जाता है– जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।’ उसी में समाहित हो जाता है।

ता ऊपर मठ छाया है।

उसे जानते ही तत्क्षण वही उसका घराना हो जाता है। भगवान कहते हैं कि अर्जुन! न तो मैं वेद से, न यज्ञ से, न कठोर तप से ही प्राप्त होनेवाला हूँ। लेकिन–

भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।

ज्ञातुं द्रष्टुं तत्त्वेन प्रवेष्टुं परन्तप।। (गीता, ११/५४)

अनन्य भक्ति के द्वारा, अनन्य अर्थात् अन्य न, किसी देवी-देवता को न भजते हुए जो मुझे भजता है, ऐसी अनन्य भक्ति के द्वारा मैं प्रत्यक्ष देखने के लिए, जैसा कि तूने देखा है, स्पर्श करने के लिए और विलय के लिए भी सुलभ हूँ। कबीर कहते हैं– वही उसका घराना हो जाता है। वही उसी मठ का निवासी हो जाता है।

 ब्रह्मा विष्णु महेसउ नाहीं, नहीं कर्म नहिं काया है।

साधना के आरम्भ में भजन की जागृति का नाम ब्रह्मा है। परमात्मा की वह शक्ति जो परवरिश करती है, पालन-पोषण करती है, विष्णु है और साधक के शुभाशुभ संस्कारों का संहार करनेवाली परमात्मा की प्रशक्ति का नाम शिव है। आरम्भ में सभी प्राणी अचेत हैं– या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।’ (गीता, २/६९)– अर्जुन! इस जगत्रूपी रात्रि में संयमी पुरुष जाग जाता है। गोस्वामीजी कहते हैं–

मोह निसाँ सबु सोवनिहारा।

देखिअ सपन अनेक प्रकारा।।

एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी।

परमारथी प्रपंच बियोगी।। (मानस, २/९२/२-३)

मोहरूपी रात्रि में सब सोये हुए हैं। रात-दिन जो दौड़-धूप करते हैं, मात्र स्वप्न देखते हैं। कोई स्वप्न घड़ी-दो घड़ी का होता है तो यह ८०–९० वर्ष का है। है तो स्वप्न ही। अपनी अर्जित मान्यताओं को देखने कोई लौटकर नहीं आता– सोइ पुर पाटन सोइ गली, बहुरि देखा आइ।’ किन्तु संयमी पुरुष जाग जाता है। उसे विधि प्रदान करनेवाली शक्ति ब्रह्मा, उसको योगक्षेम प्रदान करनेवाली शक्ति विष्णु और संस्कारों का संहार करनेवाली परमात्मा की शक्ति शंकर से साधना का उत्कर्ष होता है। अन्तिम संस्कार के कटते ही वह परमात्मा स्वरूप में समाहित हो जाता है, ईश्वरीय विभूति फैल जाती है। वह शिव-तत्त्व में स्थित हो जाता है, विभूत्िायाँ उतर आती हैं; जैसे– कण-कण में व्याप्त है, ज्योतिर्मय है, सर्वज्ञ है, एकरस है। इसी स्थितिवाले पूर्ण सद्गुरु होते हैं। वे ब्रह्मतत्त्वनिष्ठ है इसलिए ब्राह्मण कहलाते हैं। ब्राह्मण एक स्थिति है। वे तत्त्वज्ञ हैं इसलिए तत्त्वदर्शी कहलाते हैं। अब सब कर्म समाप्त हो गये तो भविष्य में जन्म कौन देगा? काया फिर नहीं मिलेगी। कबीर कहते हैं– नहिं कर्म नहीं काया है’

 चाँद सूर्य दोउ बने दहीरा, दधिया मथि घिउ खाया है।

इस स्थिति के लिए आरम्भ में चन्द्रमा और सूर्य दधि रखने के पात्र बन गये और कबीर कहते हैं कि उन्होंने दधि मथकर घी खा लिया है। पिंगला– दाहिने स्वर को सूर्य नाड़ी और इंगला– बायें स्वर को चन्द्र नाड़ी कहते हैं। इसी को भगवान बुद्ध प्राण-अपान या श्वास-प्रश्वास कहते थे। गीता में इस साधना को स्पष्ट किया गया है–

अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे।

प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणा:।। (४/२९)

अपान = जिसे हमें त्यागते हैं, पान = जिसे हम ग्रहण करते हैं, इस श्वास का निरीक्षण करते हैं। प्राण का अपान में और अपान का प्राण में योगीजन हवन करते हैं। प्राण और अपान की गति रोककर प्राणायाम-परायण हो जाते हैं। इस प्रकार श्वास-प्रश्वास पर जब सुरत टिक जायेगी, नाम-जप पश्यन्ती की अवस्था में पहुँच जायेगा तो श्वास धीरे-धीरे अचल स्थिर ठहर जायेगी। न भीतर से संकल्प उठेंगे, न बाहर के संकल्प टकरायेंगे। इस प्रकार मंथन करते बन गया तो दधिया मथि घिउ खाया है’– वह सार-तत्त्व प्रकट हो गया, प्रकृति से सम्बन्ध टूट गया। शेष बचा परमात्मा! वही सार-तत्त्व है। कबीर ने उस सार-तत्त्व का सेवन किया है। वह कहते हैं–

कहत कबीर भेद की बानी, बिरला कोऊ लख पाया है।

यह रहस्य कोई विरला ही पहचान पाता है। जिसके हृदय में साधना जागृत है, वही इसे समझ पाता है।

।। श्री सद्गुरुदेव भगवान की जय ।।

(अमृतवाणी भाग-7’ से उद्धृत)

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