का कहीं, केसे कहीं, को पतिआई

का कहीं, केसे कहीं, को पतिआई

का कहीं, केसे कहीं, को पतिआई।

फुलवा को छुवत भँवर मरि जाई।।

जोतिए न बोइये सींचिये न सोई।

बिनु डार बिनु पात फूल एक होई।।

गगन मंडल बीच फूल एक फूला।

तर भव डार ऊपर भव मूला।।

फूल भल फूलल मालिन भल गाँछल।

फुलवा बिनसि गयो भँवर निरासल।।

कहत कबीर सुनो सन्तों भाई।

पंडितजन फुलवा के रहलें लुभाई।।

सन्त कबीर की उलटवाँसी का यह प्रतीक पद पूज्य गुरुदेव को बहुत प्रिय था। इस पद के माध्यम से सन्त कबीर ने स्पष्ट किया कि साधना की जागृति कहने में नहीं आती, अनिर्वचनीय है। साधन लिखने में नहीं आता जबकि ध्यान ऐसे धरो, नाम ऐसे जपो, बैखरी, मध्यमा, पश्यन्ती और परा– सबकुछ तो लिखा है फिर भी वास्तविकता यही है कि साधन लिखने में नहीं आता; क्योंकि साधना के दैनिक अभ्यासक्रम की सूची भगवान स्वयं निर्धारित कर साधक को देते हैं। उसके समक्ष अनुभवी निर्देश आते रहते हैं जिसका पालन उसे करना होता है। आज आपकी वृत्ति में कौन-सा, कब का संस्कार उभरने वाला है– यह किसी पुस्तक में आप कैसे लिख देंगे? इसीलिए अनुरागी, समर्पित साधक अनपढ़ होते हुए भी भगवान को देखे पाये जाते हैं और अनुरागविहीन प्रकाण्ड विद्वान तर्क-कुतर्क में भटकते ही रह जाते हैं। पार्थिव शिक्षा का क्रियात्मक साधना में बहुत उपयोग नहीं है–

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पण्डित भया न कोय।

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पण्डित होय।।

सन्त कबीर का मानना है कि पोथियाँ पढ़ते-पढ़ते संसार भर के लोग मरते जा रहे हैं, कोई पण्डित हो ही नहीं सकता जबकि उक्ति है कि पण्डितों के ‘बात बात में बात’ श्लोक पर श्लोक होते हैं किन्तु यह शिक्षा का उन्माद हो सकता है, पाण्डित्य नहीं। पण्डित वह है जिसे सत्य का ज्ञान हो, जिसे प्रतिक्षण अनुभूति का समर्थन मिले। पण्डिता: समदर्शिन:’ (गीता, ५/१८)- सम है एकमात्र परमात्मा; जिसने उसका दर्शन कर लिया वह पण्डित है।

कबीर कहते हैं– ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पण्डित होय।– राम, ओम्, शिव, पेट, पीठ, नाक, कान सब ढाई अक्षर ही तो हैं! कौन-सा ढाई आखर? ढाई आखर प्रेम का– प्रेम शब्द में भी तो ढाई अक्षर हैं। कबीर इस प्रेम को ही इंगित करते हैं। प्रेम आपसे क्या माँग करता है? प्रेमी को कैसा होना चाहिए? अपने अन्त:करण में आप वैसी ही व्यवस्था बना लें, आप भी पण्डित हो जायेंगे। उस प्रेम के द्वारा ही प्रभु रीझेंगे, अन्य कोई मार्ग है ही नहीं!

अब रही बात साधना के आरम्भ की! इसके लिए सन्त कबीर कहते हैं–का कहीं, केसे कहीं, को पतिआई। फुलवा को छुवत भँवर मरि जाई।।– क्या कहें? वह कहने में नहीं आता, अनिर्वचनीय है; ‘केसे कहीं’- वह अधिकारी के लिए है, सबके लिए है भी नहीं; को पतिआई– केवल वाणी से कह देने मात्र से विश्वास होता नहीं, जब तक देखने को न मिले। वह कथ्य क्या है?

फुलवा को छुवत भँवर मरि जाई।

सन्त कबीर ने ईश्वर को पुष्प की संज्ञा दी है। उस ईश्वर का स्पर्श करते ही मनरूपी भ्रमर मिट जाता है। परमात्मा ही शेष बच रहता है और भजने वाले मन का अस्तित्व समाप्त हो जाता है–

मन मिटा माया मिटी, हंसा बेपरवाह।

जाको कछु न चाहिए, सोई शाहंशाह।।

मन निरुद्ध नहीं होता, मिटता है। मन समाप्त होता है। जहाँ मन मिटा, माया भी मिट जाती है। मन के द्वारा ही माया का प्रसार है। माया जिसके द्वारा प्रसारित होती है वह यन्त्र ही समाप्त हो गया तो भला माया आये तो किस रास्ते से आये? उस समय हंस यह जीवात्मा निर्द्वन्द्व हो जाती है, स्वरूपस्थ हो जाती है। इससे आगे कुछ पाने योग्य नहीं रह जाता तो जीवात्मा चाह करे भी तो किसकी? इसलिए जाका कछु न चाहिए– वही बादशाहों का भी बादशाह जो जाता है। इस प्रकार उस फूल परमात्मा का स्पर्श करने पर ही मन शान्त होता है, पहले नहीं। वह फूल है कैसा?–

जोतिए न बोइये सींचिये न सोई।

बिनु डार बिनु पात फूल एक होई।।

वनस्पति जगत् के लिये बीज की व्यवस्था की जाती है, उसे बोया जाता है, खेत तैयार किया जाता है, समय-समय पर सींचना पड़ता है किन्तु परमात्मा ऐसा पुष्प है कि उसे जोतकर, सींचकर उगाया नहीं जाता। उसमें डाल, पत्ते भी नहीं हैं और फूल भी दो-चार नहीं, फूल एक होई– केवल एक पुष्प खिलता है। स्पष्ट है कि सांसारिक पुष्प की ओर संत कबीर का संकेत नहीं है। यह फूल होता कहाँ है? किस वाटिका में होता है?–

गगन मंडल बीच फूल एक फूला।

तर भव डार ऊपर भव मूला।।

आकाश शून्य को कहते हैं। भजन-चिन्तन का उत्थान इतना सूक्ष्म हो जाय कि मन संकल्प-विकल्प से रहित होकर रिक्त स्थान में पहुँचकर स्थिर हो चले, शून्य में टिकने की क्षमता पा जाय, चिदाकाश में प्रवेश पा जाय, तहाँ फूल एक फूला– परमात्मा हृदय में विकसित हो जाता है। सांसारिक संकल्प-विकल्प जहाँ शान्त हुआ, परमात्मा के चिन्तन की डोरी लगी तो फूल एक फूला– परमात्मा विकसित हुए, वह पकड़ में आ जाते हैं, जागृत हो जाते हैं। इसलिए यह फूल धरती पर नहीं, वासनाओं में कभी नहीं, गगन मण्डल में विकसित होता है और वह भी एक! व्यापक एक ब्रह्म अविनाशी। (रामचरितमानस, १/२२/६)- परमात्मा एक है। भगवान एक से दो कभी हुए ही नहीं। शिव भजें या राम? कौन बड़ा?– यह झगड़ा अविवेकियों का है, अज्ञानियों का है। जब तक साधना जागृत नहीं है तभी तक यह झगड़ा है। जागृति के पश्चात् कोई शंका या विवाद का स्थल नहीं रह जाता क्योंकि फूल खिल ही गया, वह तो एक ही है। जिसे ढूँढ़ना था वह साथ हो गया तो झगड़े समाप्त हो जाते हैं। इसलिए साधना के आरम्भ में इन्द्रिय-संयम करें, दैवी सम्पद् को बलवती बनायें, नाम जपें, रूप देखें, सत्संग सुनें, नियम का निर्वाह करते जायँ। जब आपकी साधना इतनी उन्नत हो गयी कि संकल्प-विकल्प से रहित शून्य में मन के टिकने की क्षमता आ गयी, तत्काल परमात्मा आपमें जागृत हो जायगा। फूल आकाश में पहुँचने पर ही है और अभ्यासी के लिए सम्भव भी है।

तर भव डार ऊपर भव मूला– वह ऐसे वृक्ष का फूल जिसके नीचे की डाल यह संसार और ऊपर का भव अर्थात् संसार देवलोक, ब्रह्मलोकपर्यन्त मूल है। भव अर्थात् संसार तो संसार ही है, ऊपर हो या नीचे– तीनों लोकों में वह कहीं भी चक्कर काटता है तो संसार में ही है।

अग जग जीव नाग नर देवा।

नाथ सकल जग काल कलेवा।।

(रामचरितमानस, ७/९३/७)

अग अर्थात् जो गमन नहीं करना, जग अर्थात् जो गमन करता है, सारांशत: चर-अचर सृष्टि, नाग, नर और देवता– सब जगत् के ही अन्तर्गत हैं और काल की जलपान सामग्री मात्र हैं। पर्याप्त भोजन हो, उतना भी नहीं हैं; मात्र कलेवा हैं। देवता भी कलेवा से आगे नहीं हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा– अर्जुन! देवलोक में भी ऐसा कोई नहीं है जो प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुणों से बचा हो। इस प्रकार ऊपर के संसार में देवलोक से ब्रह्मलोकपर्यन्त मूल और नीचे का संसार चर-अचर की जीव-शृंखला शाखा-प्रशाखा हैं। ऐसे वृक्ष में गगन मण्डल बीच फूल एक फूला।– जिसके भी मन में चिदाकाश में टिकने की क्षमता आ गयी, मन में स्थिरता आयी तो परमात्मा जागृत हो जाता है, भँवरा उसका संस्पर्श पाने लगता है, ब्रह्मपीयूष से आप्लावित होने लगता है।

परमात्मारूपी पुष्प की इतनी बड़ी विशेषता है कि उसी से सृष्टि का संचार है। वही तर भव के रूप में कीट-पतंगपर्यन्त नीचे का संसार डाल-पात के रूप में है और वही ऊपर भव– देवलोक, ब्रह्मलोकपर्यन्त ऊपर संसार के मूल तक है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा– अर्जुन! सूर्य में तेज मैं हूँ, पृथ्वी में क्षमता मैं हूँ, चन्द्रमा में शीतलता मैं हूँ। बहुत कुछ सुनने-समझने से तेरा क्या प्रयोजन? सृष्टि में जो कुछ भी तेजयुक्त वस्तु है, मेरे तेज के अंशमात्र से तेजवान है अर्थात् सृष्टि मेरे अंशमात्र से है। त्रिगुणमयी प्रकृति गर्भ को धारण करने वाली माता और मैं परम चेतन बीजरूपी से पिता हूँ। मेरे तेज के अंशमात्र से सृष्टि का सृजन, विकास और परिवर्तन है! उसी परमात्मा को सन्त कबीर एक पुष्प की संज्ञा देते हैं जिसका डाल-पात तर भवऔर मूल ऊपर का भवहै; परमात्मा ही उसका मूल है।

इस फूल की प्राप्ति का उपाय क्या है? इस पर सन्त कबीर कहते हैं–

फूल भल फूलल मालिन भल गाँछल।

फुलवा बिनसि गयो भँवर निरासल।।

भल अर्थात् बहुत अच्छी तरह, बहुत ही विलक्षण, अत्यन्त दर्शनीय फूल खिला। उसे इष्टोन्मुखी मानसिक प्रवृत्तिरूपी मालिन ने भली प्रकार अपने में सँजोया-सँवारा और गूँथ लिया। साधना अन्तिम सोपान पर पहुँची तो फुलवा बिनसि गयो’- फूल ही विनष्ट हो गया! क्या परमात्मा नष्ट हो गया? नहीं, परमात्मा भी अब भिन्न नहीं रह गया। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई। (रामचरितमानस, २/१२६/३)- साधक परमात्मा में समाहित हो गया। सेवक सदा के लिए खो जाता है, स्वामी ही शेष बचता है। जीव अलग और स्वामी अलग तो बेचारे जीव का विलय कहाँ हुआ! इसलिए यदि प्रभु करुणा कर अपनाते हैं तो अपने में जीव को समाहित कर लेते हैं। अब अलग कोई सत्ता नहीं जिसकी हम शोध करें, इसलिए भँवर निरासल– यह मनरूपी भँवरा, भजने वाला पथिक सदा-सदा के लिए आशारहित हो जाता है। वह आशा करे भी तो किसकी? आशा का स्थान ही नहीं रह गया। प्राप्त होने योग्य कोई वस्तु अप्राप्त नहीं है इसीलिए फुलवा बिनसि गयो भँवर निरासल

कहत कबीर सुनो सन्तों भाई।

पंडितजन फुलवा के रहलें लुभाई।।

सन्तों को अपना भाई सम्बोधित करते हुए सन्त कबीर कहते हैं (भाई समकक्ष होता है। कबीर जानते हैं कि आज का पथिक उपलब्धि के समय हमारे समकक्ष स्थिति प्राप्त कर लेगा। जो रूप या प्राप्ति हमारी है, वही उनकी भी होनी है इसलिए उन्हें बराबर का पद प्रदान करते हुए कहा) कि अनुज सन्तगण सुनें! पण्डितजन फूलवा के रहलें लोभाई– पण्डित जो ज्ञाता हैं, विवेकी हैं, इस पथ पर चलने वाले पथिक हैं, वह इस फूल में लुभाए रहते हैं, रात-दिन खोए रहते हैं। यदि लौकिक पुष्प होता तो वाटिका का माली लुब्ध होता, किसान का होता तो वह लुब्ध होता किन्तु इस फूल के लिए वे लालायित रहते हैं जिन्होंने हृदय में प्रभु की कुछ झलक पायी है। जिन्होंने हृदय में कुछ जानकारी संचित किया है, वही इस फूल में भली प्रकार लुभाये रहते हैं और पा जाते हैं।

सन्त कबीर के अनुसार इस पुष्प की उपलब्धि के लिए पण्डित होना आवश्यक है। पण्डित होने के लिए सत्संग आवश्यक है। सत्संग जहाँ नियमित होता है, आप पायेंगे कि दो-चार महीने में ही आपके पास कोई प्रश्न नहीं रह गया, मन शान्त होता जायेगा।

रामचरितमानस में है– सास्त्र सुचिन्तित पुनि पुनि देखिअ।(३/३६/८)- भली प्रकार मनन किया हुआ शास्त्र भी बार-बार देखना चाहिए। इसलिए सत्संग नितान्त आवश्यक है। दिनभर प्रकृति के थपेड़ों से जूझते-जूझते हमारे मस्तिष्क में बहुत कुछ विजातीय चिन्तन भर गया है। उस कालिमा की धुलाई के लिए सत्संग अपरिहार्य है, भले ही वह अल्प समय ही क्यों न मिलता हो। कदाचित् संत-संग और उनसे सत्संग, कुछ भी न मिले तो घर पर आडियो-विडियो कैसेट्स, सी.डी. इत्यादि लगाकर सत्संग सुन लिया करें। महापुरुषों की वाणियों का अध्ययन-मनन भी इस दिशा में उपयोगी है।

!! बोलिये श्री सद्गुरुदेव भगवान की जय !!

(अमृतवाणी भाग-1से उद्धृत)

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