कबिरा कब से भया बैरागी
कबिरा कब से भया बैरागी।
तेरी हेत काहि संग लागी, कबिरा कब से भया बैरागी।
मेरी हेत धनी संग लागी, कबिरा तब से भया बैरागी।।
आसमान नहीं तब टोपी दीन्ही, धरती नहिं तब टीका।
शिव शक्ति का जनम नहिं, तबै योग हम सीखा।।
सतयुग में हम पहिनी पाँवरी, त्रेता लीन्हेउँ डंडा।
द्वापर में हम अड़बड़ बाँच्यो, कलिउ फिरेउँ हम नंगा।।
काल नहीं तहँ धुंधाकारी, नहीं गुरु नहिं चेला।
जा दिन कबिरा आसन मारा, ता दिन पुरुष अकेला।।
कबीर काशी (भारत) के एक महान संत हुए हैं जैसा कि एक संत को होना चाहिये। विचारकों ने संतों में से किसी को द्वैतमार्गी, किसी को अद्वैतमार्गी इत्यादि श्रेणियों में विभाजित कर रखा है, किन्तु ईश्वरपथ में कई मार्ग नहीं होते। ईश्वर एक है, उसे पाने की विधि एक है। हाँ, भजनेवालों के दृष्टिकोण दो होते हैं।
गीता के अनुसार साधना को भगवान के प्रति समर्पित होकर करना, उन पर निर्भर होकर चलना निष्काम कर्मयोग कहलाता है। यह भक्तिमार्ग है। और उसी साधना को समझकर लाभ-हानि का निर्णय स्वयं लेकर चलना, अपने बलाबल का निर्णय लेकर कर्म में प्रवृत्त होना ज्ञानमार्ग कहलाता है। क्रिया एक ही है, परिणाम भी एक ही है; केवल कर्ता के दृष्टिकोण दो हैं। स्वावलम्बी ज्ञानमार्गी कहलाता है और इष्ट पर निर्भर होकर चलनेवाला भक्तिमार्गी। कबीर भी भक्तिमार्गी थे। उन्हें निर्गुण उपासक समझने की भूल लोग करते हैं जबकि निर्गुण नाम की कोई उपासना नहीं होती। निर्गुण तो प्राप्ति के बाद संत की एक रहनी है।
सभी संत हैं राम के, सबहिं राम की आस।
सरगुन राम प्रसाद भे, निरगुन पलटू दास।।
सभी संत राम के हैं, राम से आशावान हैं किन्तु उन राम का सगुण स्वरूप, उनका प्रसाद कि वह अजर, अमर, शाश्वत, कण-कण में व्याप्त हैं, ज्योतिर्मय हैं, जिन विभूतिवाले हैं वह विभूति साधक में प्रकट हो जाय – यहाँ तक उपासना सगुण है। और जब उसे जानकर उसी में समाहित हो गया, उसी में पलट गया, गोता लग गया तो ‘निरगुन पलटू दास’– जो पलट गया, उस दास की रहनी निर्गुण है।
कबीर से भक्तों ने प्रश्न किया कि आप बैरागी कब से हो गये? किसी ने कहा कि संन्यास तो केवल ब्राह्मणों के लिए लिखा है, आप तो हिन्दू भी नहीं हैं, जुलाहे हैं, इसलिए ‘कबिरा कब से भया बैरागी, तेरी हेत काहे संग लागी।’ आपने किसे हितैषी समझ लिया? किससे प्रीति जोड़ ली? घर-द्वार छोड़कर, फलता-फूलता परिवार छोड़कर आप बैरागी कब से हो गये? इससे भी बड़ी वस्तु आपको मिल गयी क्या?
उनका समाधान करते हुए कबीर ने कहा– ‘मेरी हेत धनी संग लागी, कबिरा तब से भया बैरागी।’ धनी माने जो सबका मालिक है, जो कण-कण में व्याप्त है, जिनके संकेत के बिना पत्ता भी नहीं हिलता, उस धनी के साथ मेरी प्रीति लग गयी, उससे लगन लग गयी तब से यह संसार फीका लगने लगा और हम विरक्त हो गये।
कहिअ तात सो परम बिरागी।
तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी।। (मानस, ३/१४/८)
गोस्वामीजी कहते हैं कि साधना में सिद्धियाँ आती ही हैं किन्तु परम बिरागी वह है जो इन सिद्धियों को और सत्-रज-तम तीनों गुणों को तिनके के समान त्याग दे। गुरु महाराज की बारहमासी में है–
भोग लोक परलोक का, सबही त्यागे राग।
रहे न इनकी कामना, ताहि कहे बैराग।।
संसार में जो कुछ दिखाई दे रहा है और परलोक के सुख जिनके बारे में सुनने में आता है, इन सबकी कामना ही न रह जाय उसे वैराग्य कहते हैं। जब भोगों के स्थान पर एक परमात्मा में लौ लग जाय, वही वैराग्य है। कबीर भी यही कहते हैं कि ‘मेरी हेत धनी संग लागी, कबिरा तब से भया बैरागी।’ वैराग्य में आपने क्या-क्या स्थितियाँ प्राप्त कीं? इस पर संत कबीर कहते हैं–
आसमान नहीं तब टोपी दीन्ही, धरती नहिं तब टीका।
आसमान कब नहीं था? यह तो सदा से ही है क्योंकि सृष्टि अनादि है। आकाश कहते हैं शून्य को। जब चित्त अभ्यास करते-करते संकल्प-विकल्प से रहित शून्य में टिक जाता है, इसका नाम है चिदाकाश। चित्त आकाशवत् हो गया, लौ लग गयी, श्वास बाँस की तरह खड़ी हो गयी, श्वास आयी तो ओम्, गयी तो ओम्। यदि राम जपते हैं तो श्वास आयी तो ‘रा’, गयी तो ‘म’। अन्य संकल्प मन में न उठें और न वाह्य वायुमण्डल के संकल्प भीतर प्रवेश कर पायें, इसका नाम है चिदाकाश। प्रकृति से सम्बन्ध टूट जाता है तो परमात्मा ही शेष बच रहा। उस समय भगवान जिन विभूतियों से युक्त हैं, आपमें दृष्टि बनकर संचारित हो जायेंगे। उन्हें जानते ही ‘जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।’ अब आकाश में सुरत लगाकर टिके रहने की आवश्यकता नहीं रह गयी। उस समय पहले जो भगवान अलग थे, अब वही भगवान मन में प्रसारित हो गये, साधक उसी स्वरूप में समाहित हो गया।
कबीर से किसी ने पूछा– आप किसका भजन करते हैं?–
कोह ज्ञान है कोह ध्यान है, को है पारखबानी।
काहि लिये तुम ज्ञान कुटत हो, को है अन्तरयामी।।
कबीर ने उसी के स्वर में उत्तर दिया–
मनै ज्ञान है, मनै ध्यान है, मन है पारखबानी।
मनै लिये हम ज्ञान कूटत, मोर मनवै अन्तरयामी।।
वह मन परम चेतन का प्रतिबिम्ब पा गया, मन मिट गया, उस स्थान पर परमात्मा ही प्रसारित हो गये, भगवान एक टोपी की तरह छा गये।
‘धरती नहिं तब टीका’
‘धड़ धरती का एकै लेखा, जो बाहर सो भीतर देखा।’ धड़ कहते हैं शरीर को, धरती कहते हैं इस पृथ्वी को। दोनों का एक ही गुणधर्म है। जो शरीर के भीतर है, वही बाहर संसार में भी है।
मन ही आपै जगत बना के ऊँच नीच तन पाया।
मन ही सरग नरक भुगतावै, मन से आया जाया।।
संतो! मन सबको भरमाया।।
मन ने सबको भरमा रखा है। यह कभी स्वर्ग भेज देता है, कभी नरक दे देता है और कदाचित् भगवान का स्पर्श कर ले तो भगवत्स्वरूप में खड़ा कर देता है। मन ही विधाता की सृष्टि में आने-जाने का कारण बनता है। ‘धरती नहिं तब टीका’ धरती कब नहीं होती? भगवान श्रीकृष्ण कहते हैंं–
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
य: प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्।। (गीता, ८/१३)
अर्जुन! ‘ओम्’ अक्षर ब्रह्म का परिचायक है। तू इसका जप कर और ‘मामनुस्मरन्’– मेरे स्वरूप का ध्यान धर। अभ्यास इतना सूक्ष्म हो गया कि ‘त्यजन्देहं’। देह के त्याग का क्या आशय है? देहाध्यास का जिस पल त्याग करेंगे, तत्क्षण परम गति को प्राप्त कर लेंगे। शरीर त्यागना देह-त्याग नहीं है। शरीर त्याग भी देंगे तो फिर शरीर मिल जायेगा। देहाध्यास को त्यागना अर्थात् अन्तिम संस्कार का विलय, सुरत का भगवान में समाहित हो जाना एक साथ घटित होता है। तो जिसमें सुरत समाहित हुई, उसे प्राप्त हो जाओगे। उस समय ‘धरती नहिं तब टीका’– उस स्वरूप में साधक अभिषिक्त हो गया, भगवत्स्वरूप में टिक गया और–
शिव शक्ति का जनम नहिं, तबै योग हम सीखा।।
जब भजन की जागृति, परवरिश तथा संहार करनेवाली प्रशक्ति शिव के द्वारा अन्तिम संस्कार का भी संहार हो गया वहाँ शिव-तत्त्व, कल्याण-तत्त्व, ज्योतिर्मय तत्त्व शेष बच रहता है वह उसी में समाहित हो गया। योग अब पूर्ण है। अब न संस्कार बनेंगे, न संहार होगा, न संहार करनेवाली प्रक्रिया जागृत होगी। इसी प्रकार शिव शक्ति के जन्म की आवश्यकता नहीं रह जाती, ‘तबै योग हम सीखा। कबिरा तब से भया बैरागी।।’
कबीर का जन्म अभी छ:-सात सौ वर्ष पहले हुआ था; किन्तु वह कहते हैं कि–
सतयुग में हम पहिनी पाँवरी, त्रेता लीन्हेउँ डंडा।
साधना के चार क्रमोन्नत सोपान हैं– कलियुग, द्वापर, त्रेता और सतयुग। संसार में ज्योतिषाचार्यों ने इसकी लम्बी-चौड़ी गणना दी है कि चार लाख वर्ष का कलियुग है, आठ-नौ लाख वर्ष का द्वापर है, लगभग बारह लाख वर्ष का त्रेता है और सत्रह लाख वर्ष के लगभग सतयुग है। इतना न हमें जीना है और न उन ज्योतिषाचार्यों को; तो इस अटकल का क्या औचित्य? यह तो दन्तकथा हो गयी। महापुरुषों ने इन बिना सिर-पैर की बातों पर ध्यान नहीं दिया। युग का अर्थ होता है दो। स्वामी भगवान और सेवक, ये दोनों जिस दिन आमने-सामने हो जाते हैं, उसी दिन से युगधर्म की शुरुआत हो जाती है। युगधर्म कभी था, आज नहीं–ऐसी कोई बात नहीं। युगधर्म का उतार-चढ़ाव मनुष्य के हृदय में होता है।
बुध जुग धर्म जानि मन माहीं।
तजि अधर्म रति धर्म कराहीं।। (मानस, ७/१०३/६)
विवेकी, प्रत्यक्षदर्शी महापुरुषों ने युगधर्म के उतार-चढ़ाव को मन के अन्तराल में जाना है इसलिए वे अधर्म का त्याग कर धर्म में अनुरक्त हो जाते हैं। मन के अन्तराल में इन युगधर्मों का उतार-चढ़ाव किस आधार पर होता है? इस पर कहते हैं–
नित जुग धर्म होहिं सब केरे।
हृदय राम माया के प्रेरे।।
युगधर्म सबके हृदय में निरन्तर होते रहते हैं, राममाया की प्रेरणा से होते हैं। माया के दो रूप हैं। एक तो अविद्या माया है–
एक दुष्ट अतिसय दु:खरूपा।
जा बस जीव परा भवकूपा।। (मानस, ३/१४/५)
यह अविद्या अतिशय दुष्ट है जिसके वशीभूत होकर यह जीव भवकूप में पड़ा है। दूसरी ओर विद्या माया है– ‘एक रचइ जग गुन बस जाके।’ अर्थात् एक रचना करती है। कैसी रचना? गुणों को नियन्त्रित करती है। जगत् की उत्पत्ति के कारण त्रिगुण उसके बस में हैं लेकिन वह विद्यामाया प्रभु प्रेरित है, ‘नहिं निज बल ताकें’– स्वयं में उसका अपना बल कुछ भी नहीं है। उस विद्या के बल से ‘नित जुग धर्म होहिं सब केरे।’
अब कैसे ज्ञात हो कि कब कौन-सा युग कार्यरत है? इसे बताते हैं–
सुद्ध सत्त्व समता बिग्याना।
कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना।। (मानस, ७/१०३/२)
शुद्ध सत्त्वगुण कार्य करता हो तो यह सतयुग का प्रभाव है। उस समय मन में प्रसन्नता होगी। उस समय भजन की क्षमता क्या होगी?
कृत जुग सब जोगी बिग्यानी।
करि हरि ध्यान तरहिं भव प्रानी।। (मानस, ७/१०२/१)
उस समय सब योगी और विज्ञानी होते हैं, सहज ध्यान धर के वह पार हो जाते हैं। इसी प्रकार –
सत्त्व बहुत रज कछु रति कर्मा।
सब बिधि सुख त्रेता कर धर्मा।। (मानस, ७/१०३/३)
हर प्रकार से सुख– यह त्रेतायुगीन पुरुष के लक्षण हैं। उस समय साधना का स्तर कैसा होता है?–
त्रेतां बिबिध जग्य नर करहीं।
प्रभुहि समर्पि कर्म भव तरहीं।। (मानस, ७/१०२/२)
विविध यज्ञ! आज शास्त्र भूल जाने से लोग जग्य का नाम सुनते ही वेदी बनाकर ‘स्वाहा-स्वाहा’ बोलने की ओर चले जाते हैं, किन्तु गीता के अनुसार योगविधि यज्ञ है। श्वास का प्रश्वास में हवन करना यज्ञ है–
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणा:।। (गीता, ४/२९)
भगवान ने वहाँ १३-१४ विधियों से यज्ञ का वर्णन किया और यह भी बताया कि भौतिक द्रव्यों से सिद्ध होनेवाले यज्ञ यज्ञ तो हैं किन्तु अत्यल्प हैं। आरम्भिक कक्षाओं के लिए वे अनिवार्य हैं लेकिन अति अल्प हैं। वास्तविक यज्ञ मन और इन्द्रियों के संयम से सम्पन्न होनेवाले हैं। यज्ञ के परिणाम में मन का निरोध और विलय होता है। वाह्य यज्ञों से तो मन का निरोध होते नहीं दिखता। गीता (४/३१) में है कि यज्ञ के पूर्तिकाल में यज्ञ जो अवशेष छोड़ता है, उस ज्ञानामृत का पान करनेवाला योगी सनातन ब्रह्म में स्थित हो जाता है। बाहर यज्ञ से जो बचता है, घी या आटा, यह अवशेष नहीं है। अवशेष है ज्ञानामृत। सृष्टि मरणधर्मा है। एक आत्मा ही अमृत तत्त्व है। यज्ञ उस अमृत को प्रदान करता है, सनातन ब्रह्म में स्थिति दिलाता है। उससे निम्न स्तर पर है द्वापर–
बहु रज स्वल्प सत्त्व कछु तामस।
द्वापर धर्म हरष भय मानस।। (मानस, ७/१०३/४)
साधना के समय कभी हर्ष और संस्कारों के दबाव में साधक कभी भयभीत होता है। ऐसी परिस्थिति में वह भजन कैसे करे? तो–
द्वापर करि रघुपति पद पूजा।
नर भव तरहिं उपाय न दूजा।। (मानस, ७/१०२/३)
इसी प्रकार कलियुग में–
तामस बहुत रजोगुन थोरा।
कलि प्रभाव बिरोध चहुँ ओरा।। (मानस, ७/१०३/५)
जब चारो ओर बैर-विरोध ही है तो हमारा कल्याण कैसे होगा? ऐसी परिस्थिति में ‘कलिजुग केवल हरिगुन गाहा। गावत नर पावहिं भव थाहा।।’ (मानस, ७/१०२/४)– प्रभु का गुणगान करें।
कबीर कहते हैं कि जब सात्त्विक गुण मात्र शेष था, तब जहाँ भी हम कदम रखते थे भगवान अपना हाथ बढ़ा देते थे। ‘जहाँ भगत मेरो पग धरे, तहाँ धरूँ मैं हाथ। पाछे लागा सदा रहूँ, कबहुँ न छोड़ूँ साथ।।’ कहीं गड्ढे में पाँव जा रहा है तो भगवान सँभाल लेंगे, काँटों पर पाँव रखेंगे तो भगवान हाथ बढ़ा देंगे। भगवान अपनी पाँवरी रख देते हैं। कुमार्ग में आप जा ही नहीं सकते। विभीषण ने कहा–
जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि, भरतु रहे मन लाइ।
ते पद आज बिलोकिउँ, इन्ह नयनन्हि अब जाइ।।
पहले हम उनका चरण-पूजन करते हैं, फिर भगवान करुणार्द्र हो जाते हैं, अपनी पादुका ही भक्तों को पहना देते हैं। भगवान सम्हाल-सम्हाल कर पाँव रखवाने लगते हैं। गुरु महाराज कहते थे कि हम पतित होना चाहें तो भगवान मोके होखै ना दिहैं। हो, कहाँ जाओगे! भगवान पीछे डण्डा लेके खड़े हैं। भगवान अपनी पादुका दे देते हैं। और जब साधना त्रेतायुगीन हुई तो डण्डा मिल गया।
दण्ड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज।
जितहु मनहीं सुनिअ अस रामचंद्र के राज।।
दण्ड यतियों की पहचान है कि किसी का दण्ड-निवारण कर दें, कष्ट- निवारण कर दें। कोई उद्दण्ड है तो उसे दण्ड भी दें। कोई गुरु महाराज के यहाँ निवेदन करता कि उसे बुखार आ रहा है, वे पूछते कब से बुखार आ रहा है? वह कहता– तीन महीने से। महाराज कहते– ले खा विभूति! वह कहता– महाराज! कल पारी है। महाराज कहते– ठीक है, पारी बिता कर आना। वह उसके बाद आता और कहता कि बुखार तो नहीं आया महाराज। कोई उच्छृंखल आता, महाराजजी उसे डाँट देते तो उसके सब करम हो जाते। इस प्रकार महापुरुषों में दण्ड-निवारण और दण्ड देने दोनों की क्षमता आ जाती है।
द्वापर में हम अड़बड़ बाँच्यो…..
द्वापर में मन में दुविधा बनी है। कभी भजन में मन लग गया तो यह मन ठीक पढ़ने लगता है, कभी मन नहीं लगा, पुराने संस्कारों की रील में कुछ गड़बड़ी आ गयी तो उथल-पुथल मच जाती है। कभी सेवा में मन लगा, कभी नहीं लगा– यही है ठीक से पढ़ना, न पढ़ना।
कलिउ फिरेउँ हम नंगा।
सेवा के शुरुआत में जब केवल तामसी गुण हैं, उसके पास न संयम है न साधना; कुछ भी नहीं है। हाँ, याद सब है तो अभी साधना नंगी है। ‘कबिरा तब से भया बैरागी।’
काल नहीं तहँ धुंधाकारी…..
धुंध अर्थात् द्वन्द्व पैदा करने-करानेवाले काल की गति साधना की सम्पूर्णता में नहीं रह जाती। उस समय ‘काल न खाय कलप नहीं व्यापै, देह जरा नहीं छीजै।’ एक अन्य स्थल पर कबीर कहते हैं– ‘कह कबीर निज घर चलो, जहाँ काल न जाई।’ मानस में है, गोस्वामी तुलसीदासजी ने गरुड़ के माध्यम से प्रश्न किया– ‘तुम्हहि न व्यापत काल अति कराल कारन कवन।’– भगवन्! यह आपके योग का बल है या ज्ञान का प्रभाव, काल आपको क्यों नहीं व्यापता? वहीं कबीर कहते हैं कि ‘काल नहीं तहँ धुंधाकारी‘– द्वन्द्व पैदा करनेवाला काल वहाँ नहीं है। ‘नहीं गुरु नहिं चेला।’– उस समय शिष्य भी पूर्ण। ‘गुरु न चेला पुरुष अकेला।’ गुरुजी चेले को किससे बचायेंगे? और अन्त में कहते हैं–
जा दिन कबिरा आसन मारा, ता दिन पुरुष अकेला।।
आसन से प्राय: लोग आशय लेते हैं किसी मुद्रा में बैठ जाना। किन्तु यह आसन नहीं है; क्योंकि –
आसन मारे क्या भया, मुई न मन की आस।
ज्यों कोल्हू के बैल को घर ही कोस पचास।।
आसन मारने से क्या होगा यदि मन की आशा समाप्त नहीं हुई। कोल्हू का बैल दस मीटर की कोठरी में चक्कर लगाता रहता है, बाहर देखता ही नहीं। दिनभर में पचासों कोस की यात्रा हो जाती है। थक-हारकर वह बैठ जाता है। इसका नाम आसन नहीं है; क्योंकि मन तो हवा से बातें कर रहा है। भगवत्-पथ में मन के स्थिरीकरण का नाम आसन है।
महर्षि पतंजलि कहते हैं– ‘स्थिरसुखमासनम्।’ (योगदर्शन, २/४६)– स्थिर और सुखपूर्वक बैठने का नाम आसन है। लोग बैठे ही तो रहते हैं किन्तु मन उड़ रहा होता है। यह आसन नहीं है। महर्षि कहते हैं– ‘प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम्।’ (योगदर्शन, २/४७)– यम-नियम में, शौच-सन्तोष-तप-स्वाध्याय में, अहिंसा-सत्य-अस्तेय-ब्रह्मचर्य-अपरिग्रह में जो प्रयत्न चल रहा है, हमारे इस प्रयत्न में शिथिलता आ जाय, यह सहज होने लगे और एक परमात्मा में मन लगाने से आसन सधता है। यदि बाहर बैठने का नाम आसन होता तो परमात्मा में मन लगाने की क्या आवश्यकता थी? अच्छी बिक्री होने पर बहुत से व्यापारी दिन-दिनभर बैठे रहते हैं, हिलते-डुलते भी नहीं – यह आसन नहीं है। वास्तव में मन का स्थिरीकरण ही आसन है। जहाँ आसन सधा, ‘तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेद: प्राणायाम:।’ (योगदर्शन, २/४९)– आसन के सधते ही श्वास-प्रश्वास की गति का रुक जाना अर्थात् न भीतर से कोई उद्वेग उठे, न वाह्य वायुमंडल के कोई संकल्प मन में प्रवेश कर पायें – इसका नाम है प्राणायाम। प्राणों की गति पर विराम लग गया। आपने किया था आसन, हो गया प्राणायाम। किया था यम-नियम का चिन्तन और सध गया आसन। यह क्रमिक है। प्राणायाम के सधते ही उसके और ज्योतिस्वरूप परमात्मा के बीच जो आवरण था वह शान्त हो जाता है। ‘जबसे कबिरा आसन मारा, तब से पुरुष अकेला।’ आसन के सधते ही परम पुरुष परमात्मा का दर्शन, स्पर्श और उसमें स्थिति मिल गयी, ‘कबिरा तब से भया बैरागी।’
कबिरा मन निर्मल भया, जैसे गंगा नीर।
पाछे लागा हरि फिरें, कहत कबीर कबीर।।
एक सेठजी थे। उनका नियम था कि प्रतिदिन पूरी कथा सुनकर ही उठते थे। ऐसा नहीं कि कथा के प्रति उनमें भाव था, बल्कि सारा गाँव वहीं एकत्र होता था और सेठ चाहते थे कि गाँववाले उनका चेहरा देख लें कि वे कितने धर्मात्मा हैं। इससे उनके व्यापार पर अच्छा प्रभाव पड़ता था। एक दिन गाँव के एक समृद्ध रईस उनकी दुकान पर आ गये। उनके यहाँ कन्या का विवाह था। उन्हें लाख-डेढ़ लाख का माल लेना था। सेठानी ने अपने छोटे पुत्र से सन्देश भेजा कि ठाकुर साहब लाख-दो लाख का सामान लेने आये हैं। सेठ ने कहा कि अपनी माताजी से कहो कि उन्हें जलपान करायें, चाय पिलायें, पान-सुपारी खिलावें, मधुर-मधुर बोलें। कथा पूरी करके ही हमें आना है, तब तक उन्हें रोक रखें।
कुछ देर पश्चात् बालक पुन: आ गया, बोला– वह कह रहे हैं कि बहुत सारे काम हैं, हमें देर हो रही है। हम फिर आ जायेंगे। सेठ ने कहा– कैसा बनिया का लड़का है! कुछ उपाय कर। उस दिन कथा कुछ लम्बी ही रही। लड़के ने भी सुना–
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिन:।। (गीता, ५/१८)
भगवान हर जीव में होते हैं। गाय में भी, कुत्ते में भी….सबमें हैं। कथा सम्पन्न होने पर सेठजी दौड़ते हुए दुकान पर आये, देखा– एक गाय गल्ले में खा रही है। लड़के ने भी देखा था किन्तु उसने सोचा कि जब सबमें भगवान हैं तो दुकान भगवान की है, भगवान ही खा रहे हैं। वह शान्त बैठा रहा। सेठजी ने देखा तो बिगड़े– कैसा मूर्ख लड़का है! यह सब बर्बाद कर देगा। मेरे बाद तुझे खाने तक को नहीं मिलेगा। उन्होंने उठाई छड़ी और दो छड़ी सटाक-सटाक गाय को लगा दिया।
गाय तो भागी, लड़का चीख मारकर गिर पड़ा। बेहोश हो गया। मुनीम लोग दौड़ पड़े। बच्चे की माँ भी आ गयी। कपड़े उतारकर देखा तो बच्चे की पीठ पर छड़ी के निशान पड़े हुए थे। लड़के को भी तब तक होश आ गया था। सेठ ने पूछा कि मैंने तो गाय को मारा था, ये तुम्हें कैसे लग गयी? उसने कहा– पिताजी! पण्डितजी कह रहे थे कि गाय में भगवान, कुत्ते में भगवान, तो मैं गाय में भगवान को देख रहा था। आपने उसे मारा, वह छड़ी हमको ही लग गयी। सेठ ने कहा– तू कैसा मूर्ख है! मुझे कथा सुनते २० साल हो गये लेकिन जो कथा हम सुनते हैं, वहीं झाड़कर चले आते हैं; तू कथा को गाँठ बाँधकर चला आया। बनिया का कैसा लड़का है तू! लड़के ने कहा– पिताजी! आप कथा को इसी तरह से छोड़कर आते रहें, हम तो चले। लड़का साधु हो गया।
न जाने किस घर में किसी संस्कारी का जन्म हो जाय, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को श्रद्धा और समर्पण के साथ नाम का स्मरण करते रहना चाहिए; क्योंकि वैराग्य का आरम्भ यहीं से है।
।। ॐ श्री सद्गुरुदेव भगवान की जय ।।
(‘अमृतवाणी भाग-7’ से उद्धृत)