मन मस्त हुआ तो क्यों डोले।
मन मस्त हुआ तो क्यों डोले।।
हीरा पाया धरि गठियाया, बार-बार फिर क्यों खोले।
मन मस्त हुआ तो क्यों डोले।।
हंसा पाया मानसरोवर, ताल तलैया क्यों डोले।
मन मस्त हुआ तो क्यों डोले।।
हलकी थी तो चढ़ी तराजू, पूर भई तब क्यों तोले।
मन मस्त हुआ तो क्यों डोले।।
सुरत कलारी भइ मतवारी, मदवा पी गयी बिन तोले।
मन मस्त हुआ तो क्यों डोले।।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, साहब मिलि गये तिल ओले।
मन मस्त हुआ तो क्यों डोले।।
साधक लाख भजन करे, यदि हृदय से भगवान की सहायता नहीं मिलती तो मन किस बात पर मस्त होगा? हमारी प्रार्थना ऐसी हो कि जिस परमात्मा की हमें चाह है, जिस सतह पर हम हैं वह प्रभु अपनी ऊँचाई से उतरकर हमारी आत्मा से अभिन्न होकर जागृत हो जायँ, हमारा मार्गदर्शन करने लगें। उन्हीं के निर्देशन में चलकर भक्त वहाँ तक की दूरी तय कर लेता है। यह अनुभवी सद्गुरु के द्वारा ही सम्भव है।
जो आनन्द सिन्धु सुखरासी।
सीकर तें त्रैलोक सुपासी।।
सो सुखधाम राम अस नामा।
अखिल लोकदायक बिश्रामा।। (रामचरितमानस, १/१९६/६)
प्रभु जब कृपा करते हैं, ‘सीकर तें त्रैलोक सुपासी’– वे एक बूँद कृपा कर दें तो तीनों लोकों में सुपास हो जाता है। उसके लिए सृष्टि में कहीं कोई उलझन, कोई अवरोध नहीं रह जाता। माया में ऐसी शक्ति नहीं कि उसे रोक ले।
वह आनन्द-सिन्धु हैं, सुख की राशि हैं। राम के जीवन में दु:ख है ही नहीं; किन्तु उनके जीवन पर दृष्टिपात् करें तो आप पायेंगे कि उनका सम्पूर्ण जीवन दु:खमय व्यतीत हुआ। राम का जन्म हुआ। उन्होंने अभी होश सँभाला ही था कि महर्षि विश्वामित्र उन्हें वन में ले गये। उन्हें दुर्दान्त राक्षस सुबाहु एवं ताड़का से लड़ा दिया। स्वयंवर में सफलता मिली, राज्याभिषेक का अवसर आया तो मन्थरा गले पड़ गयी। उन्हें चक्रवर्ती का पद मिलनेवाला था कि चौदह वर्षों के लिए वनवास मिला, दर-दर भटकना पड़ा। वनवास तो था ही, ऊपर से सीता चोरी चली गयी। राम ‘हाय सीते’, ‘हाय मृगलोचनी’ करते रह गये। रावण मारा गया। राम अयोध्या के सिंहासन पर विराजमान हुए तो एक धोबी ने लांछन लगा दिया। राम ने मर्यादा पर विचार कर सीता का परित्याग कर दिया।
महर्षि वाल्मीकि के प्रयास से सीता के पक्ष में प्रबल जन-समर्थन उठ खड़ा हुआ, धोबी का षड्यन्त्र विफल हो चला। राम ने सीता को पुन: अपनाने का निर्णय लिया, उन्होंने अनुरोध किया, ‘‘सीते! मैं जानता था कि तुम निर्दोष और निर्मल हो, आदिशक्ति हो, चिन्मय हो। लोकापवाद का परिमार्जन करने के लिए राजधर्म के अनुसार हमने तुम्हें वन में भेजा जिससे जनता में कोई कुरीति न फैले। राजधर्म का पालन कठोर होता है किन्तु अब तुम्हारे जीवन में कष्ट नहीं है। चलो, सिंहासन की शोभा बढ़ाओ।’’ राम ने आदेशों का ताँता लगा दिया किन्तु सीता देखते-देखते पृथ्वी में समा गयीं। राम अथाह दु:ख-सागर में डूब गये।
एकाकी जीवन व्यतीत करते हुए एक भूल पर उन्होंने लक्ष्मण का परित्याग कर दिया। लक्ष्मण ने सरयू तट पर आमरण अनशन कर प्राण त्याग दिया। राम इस आघात को सहन न कर सके कि जब भाई ही न रहा तो प्राण रखकर क्या करेंगे? प्रिय भक्तों के साथ राम भी सरयू में समाहित हो गये। राम के जीवन का आरम्भ दु:ख से था और मध्य तथा अन्त भी दु:खों से परिपूर्ण था किन्तु महर्षि वशिष्ठ ने उनका नामकरण ही इसी आधार पर किया कि जो आनन्द के समुद्र हैं (नदी-नाला मात्र नहीं), परम सुख की राशि हैं, उस आनन्द की मात्र एक बूँद से तीनों लोकों को परमशान्ति मिल जाती है। ‘सो सुख धाम राम अस नामा।’ वह सुख के धाम हैं इसलिए उनका नाम राम है। जैसा महर्षि वशिष्ठ ने कहा, वैसा कार्यक्षेत्र में नहीं पाया गया।
वस्तुत: यह मानस-कथा है, अन्त:करण की कहानी है। ‘रमन्ते योगिन: यस्मिन् स राम’– जिसमें योगी लोग रमण करते हैं, उसका नाम राम है। योगीजन किसमें रमण करते हैं?–
जद्यपि ब्रह्म अखण्ड अनन्ता।
अनुभवगम्य भजहिं जेहि सन्ता।। (रामचरितमानस, ३/१२/१२)
वह ब्रह्म अखण्ड है, अनन्त है किन्तु अनुभव के द्वारा गम्य है, जाना जा सकता है। अस्तु, अनुभव के आश्रित जो भजते हैं, वही सन्त हैं। यदि अनुभव जागृत नहीं हुआ तो निवृत्ति दिलानेवाली साधना अभी आरम्भ ही नहीं हुई। ‘विज्ञानरूपी राम’– अनुभव का ही दूसरा नाम विज्ञान है। मन चंचल है, वायु से भी तेज चलनेवाला है किन्तु हृदय में भगवान का आदेश पा गया तो मन मस्त हो जाता है, स्थिर हो जाता है, फिर इसमें डगमग नहीं रहता।
‘मन मस्त हुआ तो क्यों डोले!’– मन किसलिए डोलेगा? क्या खोजने के लिए संकल्प करेगा, जब उस प्रभु से बड़ी सत्ता है ही नहीं! ‘हीरा पाया धरि गठियाया, बार बार फिर क्यों खोले।’ उन महापुरुष ने परमात्मा को हीरे की संज्ञा दी है। हीरा एक रत्न है। ऐसा बहुमूल्य रत्न पाने पर बार-बार उसे देखने, परखने या उसका मूल्य आँकने की आवश्यकता नहीं रह जाती। अब उसे कमी किस वस्तु की?
हंसा पाया मानसरोवर, ताल-तलैया क्यों डोले।
अध्यात्म में संत को हंस कहते हैं– ‘संत हंस गुन गहहि पय, परिहरि वारि विकार।’ (रामचरितमानस, १/६)। वे सन्त हंस हैं जो ईश्वरीय गुणरूपी दूध ग्रहण कर लेते हैं और मायारूपी वारि का त्याग कर देते हैं। जब साधक में यह क्षमता आ जाय कि ईश्वरीय गुणों के बाहर जीवन ही न धारण कर सके तो वह हंस की स्थितिवाला है। मछली को जल से बाहर रखें तो क्या वह जीवित रहेगी? असम्भव! ठीक इसी प्रकार हंस का भोजन दूध या मोती है अन्यथा वह प्राण त्याग देता है। संत भी ईश्वरीय गुणरूपी दूध को ग्रहण कर लेते हैं और विषयरूपी वारि का सदा के लिये त्याग कर देते हैं। हंस मोती चुगने के लिए मानसरोवर पा गया, संत मन के अन्तराल में ईश्वरीय प्रवाह पा गया तो वह ताल-तलैया अर्थात् क्षुद्र वस्तुओं में क्यों भटकेगा? ‘राम सिन्धु घन सज्जन धीरा’– उस सिन्धु को पा गया, प्रभु का स्वरूप पा गया तो क्षुद्र वस्तुएँ उसे आकर्षित नहीं कर पातीं।
‘हलकी थी तब चढ़ी तराजू’– जब साधना क्षीण थी तब भक्त को शिक्षा की कसौटी पर चढ़ने को मिलता है किन्तु साधना परिपूर्ण होते ही न माया परीक्षक के रूप में रह गयी और न आगे पाने को ही कुछ रह गया इसलिए माप-तौल की आवश्यकता ही नहीं रह जाती – ‘पूर भयी तब क्यों तोले।’
‘सुरत कलारी भइ मतवारी’– भजन में सुरत का बड़ा महत्व है। मन की दृष्टि का नाम सुरत है। आप यहाँ बैठे हैं, अकस्मात् आपको याद आ जाय कि घर का दरवाजा तो खुला ही रह गया। न जाने कौन आ जाय? क्या छू ले! आप बैठे तो यहाँ हैं किन्तु घर का ताला, घर की सामग्री दिखाई पड़ने लगेगी; कारण कि न तो ये आँखें देखती हैं न ये कान सुनते हैं। इनके पीछे जो विचार हैं, उन्हीं के माध्यम से वस्तुएँ दिखाई और ध्वनि सुनाई पड़ती है। वस्तु नहीं है किन्तु मन वस्तु का नक्शा खड़ा कर लेता है, इस दृष्टि का नाम सुरत है। इसी दृष्टि से भजन किया जाता है जब संसार की सारी भावनाएँ शान्त हो जायँ, एक ईश्वर और नाम का सुमिरन मात्र शेष रह जाय!
भजन एक नशा है। जड़भरत जब मस्त हो गये तो उन्हें आगे-पीछे कुछ दिखाई नहीं पड़ा। मीरा मस्त हो गयीं तो उन्हें यह भान समाप्त हो गया कि लोग हमें क्या कह रहे हैं! ‘लोग कहै मीरा भइ बावरी, सास कहै कुलनाशी रे!’ सास ने कहा– इसने कुल में कलंक लगा दिया, लोगों में चर्चा थी कि मीरा पागल हो गयी। उस कुलवन्ती सास को आज कोई नहीं जानता, जबकि मीरा को विश्व जानता है। सूफी सन्तों का भी यही निर्णय था–
न मर भूखा न रख रोजा, न जा मस्जिद न कर सिजदा।
वजू का तोड़ दे कूजा, शराबे शौक पीता जा।।
भौतिक शराब का नशा तो क्षणिक है। कोई अभी पी ले तो कुछ समय पश्चात् उसका नशा उतर जायेगा किन्तु भजन का नशा ऐसा है कि साधक जब तक भगवत्ता को नहीं प्राप्त कर लेगा तब तक उत्तरोत्तर उसकी लगन बढ़ती जायेगी, उसकी खुमारी घटेगी। नहीं,
सभी नशे संसार के, उतर जायँ परभात।
नाम खुमारी नानका, चढ़ी रहे दिन रात।।
संत कबीर ने सुरत को कलारी अर्थात् मद्य परसनेवाली कहा। मन की दृष्टि सुरत सब ओर से सिमटकर जिसका चिन्तन कर रही है, उसी को देखती रहे, उन्मत्त की तरह एक ही धुन रहे, वह ‘मदवा पी गयी बिन तोले’– कोई सौ, दो सौ ग्राम पीता है तो कोई पूरी बोतल पी जाता है किन्तु यहाँ तो सुरत ने नाप-तौल से भी अधिक पी लिया है। असीम अतुलनीय तो केवल एक परमात्मा है। सुरति ने ब्रह्मपीयूष पा लिया, भक्त भजन का नशा पा गया, अतएव माया भी नष्ट हो गयी, तौलने में आ गयी। माया क्षणिक है। परमात्मा ही असीम है, अखण्ड है। कबीर कहते हैं– हमने उस भक्ति का नशा पा लिया। सुरत ज्यों-ज्यों लगती जायेगी, ईश्वरीय गुणों का संचार बढ़ता जायेगा और भजन के नशे में मतवाले होते चले जायँगे। फिर आनन्द के लिए दाहिने-बायें झाँकने की आवश्यकता नहीं रह जाती।
महर्षि अगस्त्य के शिष्य सुतीक्ष्ण की सुरत इसी प्रकार लग गयी थी। उन्हें सुनाई पड़ा कि प्रभु आ गये तो वे अपने भाग्य को ही कोसने लगे–
हे बिधि दीनबंधु रघुराया।
मोसे सठ पर करिहहिं दाया।। (रामचरितमानस, ३/९/४)
वे दीनबन्धु प्रभु क्या मुझ जैसे मूर्ख पर भी दया करेंगे?–
मोरे जियँ भरोस दृढ़ नाहीं।
भगति बिरति न ज्ञान मन माहीं।।
नहिं सत्संग जोग जप जागा।
नहिं दृढ़ चरन कमल अनुरागा।। (रामचरितमानस, ३/९/७)
एक तो मेरे हृदय में दृढ़ भरोसा नहीं है, न सत्संग है न योग है, न जप है और न उनके चरण-कमल में स्थिर अनुराग ही है! तब किस भरोसे आप प्रतीक्षा कर रहे हैं?–
एक बानि करुनानिधान की।
सो प्रिय जाकें गति न आन की।। (रामचरितमानस, ३/९/८)
प्रभु की एक मर्यादा है कि उन्हें वह प्रिय होता है जिसे किसी अन्य का भरोसा नहीं है। मुझे भी वास्तव में प्रभु के अतिरिक्त अन्य किसी का भरोसा नहीं है, इसलिए
होइहैं सुफल आजु मम लोचन।
देखि बदन पंकज भव मोचन।। (रामचरितमानस, ३/९/९)
‘आज अवश्य ही मेरे नेत्र सफल होंगे।’ जहाँ इतना विश्वास मन में हुआ,
दिसि अरु बिदिसि पंथ नहिं सूझा।
को मैं चलेउँ कहाँ नहिं बूझा।। (रामचरितमानस, ३/९/११)
मुनि को दिशाओं का भी बोध न रहा कि पूरब किस ओर, पश्चिम किधर? मैं कौन हूँ, कहाँ जा रहा हूँ?– किसी से पूछा भी नहीं!
कबहुँक फिरि पाछे पुनि जाई।
कबहुँक नृत्य करइ गुन गाई।। (रामचरितमानस, ३/९/१२)
वे कभी पीछे घूमते और आगे चलते हैं, तो कभी प्रभु के गुणों का गायन कर नृत्य करने लगते हैं।
अबिरल प्रेम भगति मुनि पाई।
प्रभु देखैं तरु ओट लुकाई।। (रामचरितमानस, ३/९/१३)
अविरल भक्ति– जिसका क्रम कभी न टूटे, वह भक्ति जो लक्ष्य तक पहुँचाकर ही दम ले, ऐसी प्रेमाभक्ति मुनि ने प्राप्त कर ली।
अतिसय प्रीति देखि रघुबीरा।
प्रगटे हृदयँ हरन भव भीरा।। (रामचरितमानस, ३/९/१४)
अत्यन्त प्रेम देख प्रभु मुनि के हृदय में प्रकट हो गये। जहाँ हृदय में स्वरूप आया तो वे ध्यानस्थ होकर बैठ गये–
मुनि मग माझ अचल होइ बैसा।
पुलक सरीर पनस फल जैसा।। (रामचरितमानस, ३/९/१५)
मग अर्थात् अरण्य की पगडंडी में नहीं बल्कि भक्ति-पथ में अचल होकर बैठ गये। भगवान ने उन्हें जागृत करने का उपक्रम किया। मुनि सचेतावस्था में आ गये। उन्होंने देखा, बाहर भी वही स्वरूप था जो हृदय में था। साधक की भक्ति से भगवान जब द्रवित होते हैं तो हृदय में स्वरूप को भली प्रकार जगा देते हैं। अस्तु, हम सबको उतना ही श्रम करना है जितना सुतीक्ष्ण ने किया।
संत कबीर ने सुतीक्ष्ण की इसी मस्ती का चित्रण अपनी शैली में किया है। ‘सुरत कलारी भई मतवारी, मदवा पी गई बिन तोले’– सुरत लगाते-लगाते जब लौ लग ही गयी तो इष्ट के अतिरिक्त अन्य कोई संकल्प-विकल्प, तर्क-कुतर्क नहीं रह जाता। हृदय में स्वरूप आ जाने के पश्चात् मन की रहनी का यह चित्रण है।
अन्त में सन्त कबीर बताते हैं कि साधक को मिला क्या? उन्हीं के शब्दों में देखें–
कहत कबीर सुनो भाई साधो, साहब मिली गये तिल ओले।
छोटा-सा काला तिल ध्यान केन्द्र का सम्बोधक है। चित्त सब ओर से सिमटकर इतना सूक्ष्म हो गया जितना तिल! अब भले-बुरे संकल्प चित्त में पैदा नहीं होते, जिस क्षण यह चित्त स्थिर हुआ। इस चिन्तन की ओट में जो वस्तु छिपी है, उसका नाम परमात्मा है, साहब है, स्वामी है, आत्मदर्शन और स्थिति है। चित्त जब तक इतना सूक्ष्म न हो जाय तब तक साधक को संतुष्ट नहीं होना चाहिए, भजन में उत्तरोत्तर प्रवृत्ति बनी रहनी चाहिए। जब कभी किसी ने परमात्मा को पाया है, भजन करके पाया है।
भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि अर्जुन! इस कर्म को किये बिना न किसी ने परमात्मा को पाया है और न भविष्य में प्राप्त कर सकेगा। किन्तु कर्म के परिणामस्वरूप जहाँ आत्मा विदित हो गयी, साधक आत्मा से ओत-प्रोत है, आत्मा में स्थित है उस पुरुष के लिए कर्म किये जाने से न कोई लाभ है और न कर्म छोड़ देने से कोई हानि; परन्तु ऐसी अवस्थावाले महापुरुष भी पीछेवालों के हित की इच्छा से भली प्रकार क्रिया में बरतते हैं, स्वयं करते हुए उनसे करवाते हैं क्योंकि जब किसी ने पाया है तो करके ही पाया है। इसलिए भजन नितान्त आवश्यक है। जब तक चित्त स्थिर न हो जाय, अचल स्थिर न ठहर जाय, ‘तिल ओले’ तिल बराबर एक सूक्ष्म अवस्था पर केन्द्रित न हो जाय, तब तक साहिब नहीं मिलते।
!! ॐ श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय !!
(‘अमृतवाणी भाग-2’ से उद्धृत)