बूझो बूझो पण्डित अमरित बानी।
बूझो बूझो पण्डित अमरित बानी।।
बरसै कम्बल भीजे पानी।।
लौकी बूड़े सिल उतराय। मछली धरि के बकुलवै खाय।।
धरती बरसे सुरुज नहाय। ओरिया क पानी बड़ेरियै जाय।।
तर भइ घड़ा ऊपर पनिहारी।
बूझो बूझो पण्डित अमरित बानी।।१।।
तर भइ छानि ऊपर भई भीत। यह दुनिया की उलटी रीत।।
चिल्हवा के थट पर टेंगनी बियानी।
बूझो बूझो पण्डित अमरित बानी।।२।।
ठाढ़े डोमवा के फारे बाँस। बकरा बेंचे चीक कर मांस।।
हुँड़रा के घर में बकरिया रानी।
बूझो बूझो पण्डित अमरित बानी।।३।।
तवा के ऊपर चूल्ह चढ़ि जाई। पकवन वाला के रोटियै खाई।।
चले बटोहिया थाकल बाट। सोवनहार पै उलटा खाट।।
कह कबीर यह उलटा ज्ञान। मूते इन्द्री बाँधे कान।।
लरिका के गोद में खेले महतारी।
बूझो बूझो पंडित अमरित बानी।।४।।
‘अमरित बानी’– मृत नाशवान को कहते हैं; जहाँ मृत्यु न हो, जो मृत्यु से परे हो। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में बताया– अर्जुन! आत्मा अमृतस्वरूप है, अविनाशी है, अपरिवर्तनशील है, अखण्ड है, एकरस है, अजन्मा है। इस प्रकार मृत्यु से परे केवल आत्मा है। आपके अन्त:करण के अन्तराल में वह प्रभु सदा विद्यमान रहते हैं इसलिए उन्हें एक नाम ‘आत्मा’ दिया गया। प्रकृति में होते हुए भी वे प्रकृति से अत्यन्त परे हैं इसलिए ‘परमात्मा’ हैं। पुरुषों में वही उत्तम सत्ता है इसलिए पुरुषोत्तम; व्यापक हैं इसलिए ब्रह्म; वही सनातन हैं, शाश्वत हैं। कबीर कहते हैं– अमृत तत्त्व को दिला देनेवाली उस वाणी को सुनो, बूझो अर्थात् समझो।
हिन्दी की भोजपुरी शैली में ‘बुझले बानी’, ‘बूझतानी’, ‘बूझलऽ’ जैसे प्रयोग मिलते हैं। बूझने का अर्थ है भली प्रकार समझना। कोई पण्डित हो, ज्ञाता हो तो उस अमृत दिला देने वाली वाणी को जरा समझो। वह वाणी है क्या?
बरसे कम्बल भीजे पानी।
एक कम्बल वह है जिसे आप जाड़े में ओढ़ते हैं किन्तु कबीर इसे शाब्दिक अर्थ में न लेकर प्रतीकात्मक आशय में लेते हैं। कम बल अर्थात् अल्प बल! पूर्वकृत कर्त्तव्य ही कम्बल है। यदि पूर्वजन्म में ही कर्त्तव्य पूर्ण हो गया होता, साधना पूर्ण हो गयी होती हम स्वरूप पा जाते; जहाँ द्वैत का बखेड़ा नहीं, उस भगवत्ता को प्राप्त हो जाते। यदि कर्त्तव्य रंचमात्र भी न होता तो सत्संग में आने का औचित्य ही न होता। वह पाप आने ही न देता। तब तो आप वहाँ मिलते–
रिन्दों की नज़र में मयख़ाना, काबे के बराबर होता है।
साकी की गली का हर फेरा, एक हज के बराबर होता है।।
मदिरा पीकर जो जपा जाता है, आप भी वही करते होते। अत: ईश्वर-चिन्तन का संस्कार लेशमात्र नहीं है तब भी साधना में प्रवेश नहीं है और साधना पूर्ण हो गयी तब तो पार ही हो गये। इसलिए पूर्वकृत कर्त्तव्य ही कम्बल है, अल्प बल है। जहाँ से साधना छूटी है वहीं से अगले जन्म में शुरुआत होनी है। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा– अर्जुन! थोड़ा भी साधन जिससे पार लग गया, अगले जन्म में जहाँ से साधन छूटा था, वहीं से आरम्भ करता है। विषयों में आकण्ठ डूबा होने पर भी वह अनायास ही पिछले जन्म के बुद्धि-संयोग को प्राप्त कर लेता है और कुछेक जन्मों के अन्तराल से वहाँ पहुँच जाता है जिसका नाम परमगति है, परमधाम है जो मेरा सहज स्वरूप है। इस ईश्वरपथ में बीज का नाश नहीं है। ‘स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्।’ (गीता, २/४०)– स्वल्प साधन भी जन्म-मृत्यु के महान भय से उद्धार करनेवाला होता है। सन्त कबीर पढ़े-लिखे तो नहीं थे, फिर भी आँखों देखा हाल उन्होंने वही व्यक्त किया कि बीज का नाश नहीं अर्थात् ‘बरसे कम्बल भीजे पानी’– पूर्वकृत कर्त्तव्य ही कम्बल है और वह जब इस जन्म में साथ देता है, प्रस्फुटित होता है तो ‘भीजे पानी’।
राम भगति जल मम मन मीना।
किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना।। (रामचरितमानस, ७/११०/९)
वह भक्तिरूपी जल में भींगने लगता है, सराबोर हो चलता है। दूसरा कुछ भी उसे अच्छा नहीं लगता। ऐसे संस्कारी पुरुष अनायास ही गृह-त्याग कर देते हैं, उनका वह संस्कार ही उन्हें संसार की ओर से भगवान की ओर घूमा देता है। पूज्य गुरु महाराज जी बताया करते थे कि हमने साधु होने की कभी कल्पना भी नहीं की थी। सहसा मुझे आकाशवाणी हुई कि यह पाप है और यह पुण्य है, इस मन्दिर में गुरु महाराज हैं, जाओ भजन करो। हमने सोचा कि यह आकाशवाणी मुझे क्यों हुई तो भगवान ने मेरे अनुभव में सात जन्मों का विवरण बताया कि सातों जन्मों में हम लगातार साधु थे। यही पूर्वकृत कर्म ही कम्बल है। भक्तिरूपी रस में वह भींग जाता है। अब भींगनेवाले के लक्षण क्या हैं?
लौकी बूड़े सील उतराय।
लौ रूपी लौकी! प्रभु के प्रति ज्यों-ज्यों वह लौ लगाता है, चित्तवृत्ति को सब ओर से समेटकर चिन्तन में डूबने लगता है, त्यों-त्यों ‘सील उतराय’– शील अर्थात् साधुता के गुणधर्म उभरकर ऊपर आने लगते हैं। साधु बनने की जरूरत नहीं है। ज्यों-ज्यों चिन्तन में आप डूबेंगे, साधुता में मिलनेवाला ईश्वरीय प्रतिबिम्ब, ईश्वरीय आभा उभरकर ऊपर आने लगती है। नंगे रहेंगे तो साधु, कुवेष में रहेंगे तो साधु रहेंगे, केवल लौ में डूबें! जब कर्त्तव्य ने साथ दिया, लौ में डूबने लगे, मन अन्तराल में सिमटने लगा, शील-साधुता के गुणधर्म उभरकर ऊपर आने लगे, तब–
मछली धरि के बकुलवै खाय।
भक्तिरूपी रस में डूबनेवाली मनरूपी मछली बकध्यानी प्रवृत्ति को खा जाती है। फिर ऐसा भक्त कभी ढोंग नहीं कर सकता, उससे दिखावा होगा ही नहीं। इस स्थिति से पूर्व लोग कभी वेष बनाते हैं और कभी कुछ भी कर बैठते हैं। अब भक्तिरूपी जल की वृष्टि कहाँ पर होती है? तो–
धरती बरसे सुरुज नहाय।
धरती क्या है? ‘धड़ धरती का एकै लेखा। जो बाहर सो भीतर देखा।।’– धड़ कहते हैं शरीर को, धरती पृथ्वी को कहते हैं। कबीर कहते हैं– दोनों एक ही जैसे हैं, दोनों का एक ही माप-तौल है। जो कुछ बाहर है, वह सब मन के अन्तराल में है। तुलसीदास कहते हैं–
असन, बसन, पसु बस्तु बिबिध बिधि, सब मनि महँ रह जैसे।
सरग, नरक, चर अचर लोक बहु, बसत मध्य मन तैसे।।
एक बहुमूल्य मणि में असन माने भोजन, वसन अर्थात् वस्त्र-आभूषण, विविध प्रकार के पशु, रहन-सहन, मान-मर्यादा– सब कुछ विद्यमान है। ठीक इसी प्रकार मन के अन्तराल में स्वर्ग-नरक-अपवर्ग की सारी परिस्थितियाँ और समूची सृष्टि विद्यमान है। जब जिस संस्कार का क्रम आता है, पिण्डरूप में बाहर फेंकता रहता है, यह जीव भोगता रहता है। अत: ‘धरती बरसे’– शरीररूपी धरती में वह वृष्टि होती है, हृदय-देश में वह वृष्टि होती है। ज्यों-ज्यों वह वृष्टि होगी, ‘सुरुज नहाय’– सूर्य परमात्मा के सहज प्रकाशस्वरूप का बोधक है। जीव और परमात्मा के बीच जो मल-आवरण विक्षेप पड़ा हुआ है, धुलने लगता है। अपने और आत्मा के मध्य जो मायिक पर्दा पड़ा है, स्वरूप के बीच का आवरण धुलने लगता है। ऐसी स्थिति में–
ओरिया क पानी बँड़ेरियै जाय।
छप्पर का जल जहाँ से नीचे गिरता है, उसे ओरी कहते हैं। शरीर में उर हृदय को, अन्त:करण को कहते हैं। उर के अन्दर ज्यों-ज्यों ब्रह्म-पीयूष संग्रहित होता जायेगा, उसका परिणाम ‘बँड़ेरियै जाय’– बँड़ेर छप्पर का ऊपरी सिरा है। ‘प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी।’ (रामचरितमानस, ७/७१/७)– प्रकृति छप्पर का निचला हिस्सा ओरी है तो परमात्मा उसका ऊपरी सिरा बँड़ेरी है। उर में ज्यों-ज्यों भजन-भक्तिरूपी रस संग्रहित होता चला जायेगा, त्यों-त्यों वह आपको ब्रह्म के धरातल की ओर फेंकता जायेगा।
तर भई घड़ा ऊपर पनिहारी। बूझो बूझे पण्डित अमरित बानी।।
घड़ा? शरीर ही कच्चा घड़ा है। कबीर की साखी में है–
यह तन काचा कुंभ है, लिये फिरे तू साथ।
धक्का लागा फूट गया, बहुरि न आवे हाथ।।
है तो यह कच्चा घड़ा लेकिन यह मानव-तन देवताओं को भी दुर्लभ है। जब भक्तिरूपी रस में घट, आपका हृदय तर हो गया, सराबोर हो गया तो प्रणपथ पर चलनेवाले पनिहारी की रहनी ऊर्ध्वरेता हो जाती है। उसकी रहनी प्रकृति की पहुँच से ऊपर उठने लगती है। इस संसार से उसका कोई लगाव नहीं रह जाता।
तर भइ छानि ऊपर भइ भीति।
छानी या छप्पर ऊपर होता है, भीति या दीवाल नीचे होती है। छानी का आधार तो भीत ही है। इसी प्रकार जिस स्तर पर हम खड़े हैं, जिस परमात्मा की हमें चाह है, हमारी पुकार ऐसी हो कि परमात्मा उसी स्तर पर उतर आये, यहीं उसकी छत्रछाया मिल जाय, वह अपना वरदहस्त रख दे तो ‘ऊपर भइ भीति’– जिस क्षण छाया मिली, उनका हाथ ऊपर हुआ, उसी क्षण से परमात्मा के धाम में भक्त के मकान की बुनियाद तैयार होने लगती है। उस भक्त का घर उसके धाम में बनने लगता है। पूज्य गुरु महाराज को अनुभव में आया था कि अब परमात्मा के दरबार में नौकरी लग गयी।
यह दुनिया की उलटी रीति।
रीति अर्थात् विधि! यह दुनिया में फँसानेवाली नहीं बल्कि दुनिया से उलटकर परमात्मा में प्रवेश दिला देनेवाली विधि है।
चिल्हवा के थट पर टेंगनी बियानी।
चित्त की प्रवृत्तियाँ जो बारम्बार आवागमन, जन्म-मृत्यु के कारण हैं, चील हैं। बहुत ऊँची उड़ान भरने पर भी इनकी दृष्टि सड़े-गले मांस पर ही रहती है। इस चित्तवृत्तियों को संयत करके इनके थट अर्थात् सिर के ऊपर ‘टेंगनी बियानी’। बहुत छोटी मछली को टेंगनी कहते हैं। थोड़ी-सी टेक आ गयी, थोड़ा टिकते बना तो ‘टेंगनी बियानी’– उस टेक का विस्तार होने लगता है। परमात्मा की ओर साधना गति पकड़ लेती है अर्थात् इस पथ में बीज का नाश नहीं है। आगे कहते हैं–
ठाढ़े डोमवा के फारे बाँस। बकरा बेंचे चीक कर मांस।।
हुँड़रा के घर में बकरिया रानी।
बूझो बूझो पण्डित अमरित बानी।।
इन तीनों दृष्टान्तों का एक ही सन्दर्भ है। आप देखते हैं कि डुमार बाँस को चीर-चीर कर टोकरी पर टोकरी फेंकता है। चिकवा बकरे का माँस काट-काट कर बेचता रहता है। हुँड़रा अर्थात् बड़ी प्रजाति का शृगाल बकरियों को चट कर जाता है किन्तु अध्यात्म में कुछ विपरीत जैसा है, डोम को बाँस ही फाड़ देता है। सन्त कबीर ने काल को डोम की, हुँराड़ की और चिकवा की संज्ञा दी। काल की गति एक डोम जैसी है। काल आपके निर्मल श्वास को चीर-चीर कर उसमें संस्कारों के तमाम प्रपंच प्रविष्ट कर टोकरी पर टोकरी, आपको कूकर-शूकर इत्यादि अनन्त योनियों में फेंकता रहता है–
कवन जोनि जनमेउँ जहँ नाहीं।
मैं खगेस भ्रमि भ्रमि जग माहीं।। (रामचरितमानस, ७/९५/८)
कूकर-शूकर, ऊँच-नीच, देव-दानव-मानव, कीट-पतंग, जड़-चेतन– ये सभी टोकरियाँ हैं। कलेवर परिवर्तन टोकरी है। काल की इतनी पहुँच है कि वह बार-बार स्वाँस की इस निर्मल अवस्था को चीर-चीरकर टोकरी पर टोकरी, योनि पर योनि, आकृति पर आकृति करता चला जा रहा है किन्तु यदि आपको परमात्मा का वरदहस्त मिल गया, प्रभु के धाम में आपकी बुनियाद पुष्ट हुई, वृत्तियों पर जहाँ थोड़ी टेक आई, धाम का विस्तार होने लगा, तहाँ स्वाँस में प्रभु के चिन्तन का निरन्तर सञ्चार हो जाता है।
सन्त कबीर ने स्वाँस को बाँस का रूपक दिया है। कतिपय महापुरुषों ने इसी को बासुदेव कहा क्योंकि स्वाँस में परमदेव परमात्मा का निवास है। स्वर के निरोधकाल में उन्होंने परमात्मा को पाया इसलिए प्रभु का एक नाम ईश्वर भी है। जब वृत्तियों में टेक आ जाती है (हठ ही हनुमान है), परमात्मा का वरदहस्त मिल जाता है, तहाँ फिर स्वाँस इतनी निर्मल और उन्नत हो जाती है कि डोम अर्थात् काल की गति को चीरने लगती है, काल के प्रभाव को काटने लगती है। यही है ‘ठाढ़े डोमवा के फाड़े बाँस।’, और–
‘बकरा बेंचे चीक कर मांस’– काल की अधिकृत भूमि इस सृष्टि में आत्मा का अस्तित्व एक बकरे जैसा है। काल उसे टुकड़े-टुकड़े कर बेंचता रहता है। काल एक चिकवा (कसाई) जैसा है। काल इस जीव को काट-काट कर योनि पर योनि, संस्कार पर संस्कार, नीचे-ऊँचे भाव में बेचता रहता है। जो आत्मा बकरे की तरह पराधीन और दुर्बल थी, भगवान की छत्रछाया पाकर इतनी सबल हो जाती है कि वह चीक का मांस बेचने लगती है अर्थात् उपदेश भी करने लगती है कि नश्वर होते हुए भी आपलोग काल को जीत सकते हैं। साहस करें, आप भी काल का पार पा सकते हैं।
कबीर ने काल की तीसरी उपमा हुँराड़ या वीग– बड़ी प्रजाति के सियार से की है। बकरी वीग के साधारण भोजन की वस्तु है। उसी वीग के घर में, काल के वातावरण में रहते हुए भी महापुरुष की आत्मा रानी की तरह विहार करती है। उसके लिए कोई प्रतिबन्ध, कोई विधि-निषेध नहीं रह जाता। वह महात्मा इच्छाशक्तिसम्पन्न हो जाता है– ‘जो इच्छा करिहउ मन माहीं। हरि प्रसाद कुछ दुर्लभ नाहीं।।’ तुलसी के अनुसार–
सो गोसाइँ बिधि गति जेहिं छेंकी।
सकइ को टारि टेक जो टेकी।। (मानस, २/२५४/८)
अन्त में सन्त कबीर कहते हैं–
तवा के ऊपर चूल्ह चढ़ि जाई।
त्याग ही तवा है और चित्त ही चूल्हा है। त्याग की कसौटी पर चित्त को कसना पड़ता है, चित्त को परखते रहना है। यह कठिन है इसीलिए इसे तपस्या कहते हैं; तपाना पड़ता है, लोहे की तरह लाल कर अनुकूल आकार देना पड़ता है। ठीक इसी प्रकार ईश्वर-पथ में मनसहित इन्द्रियों को भली प्रकार तपाया जाता है, ज्ञानाग्नि-योगाग्नि में तपाया जाता है। त्याग एक ज्वाला है जिसकी आँच सभी सहन नहीं कर पाते–
लाखों योजन पर्वत ऊँचा, घाटी विकट करूर।
करि करि जतन फिरे बहुतेरे, पहुँचे बिरला सूर।
निरंजन घर का पंथ कठिन है दूर।।
लाखों लोग आये और ठोकर खाकर लौट गये। त्याग की कसौटी बड़ी कठिन है। पूज्य महाराज जी कहते थे– ‘‘हो! भगवान ने मोरे चूतड़े की लँगोटी तक छुड़वा लिया।’’ किन्तु त्याग की इस कसौटी पर आप भली प्रकार आरूढ़ हो गये, स्थिर हो गये, खरे उतरे तो ‘चूल्हि चढ़ जाई’– चित्त पर त्याग चढ़ बैठता है, भोजन तैयार हो जाता है। भजन ही भोजन है।
इस शरीर का पोषण रोटी-दाल अथवा जिससे आपका शरीर-निर्वाह हो सके वह खाद्य पदार्थ है किन्तु इस आत्मा का भोजन केवल भजन-चिन्तन है जो इसको परिपूर्ण और तृप्त करता है। फिर कभी वह पुरुष, वह आत्मा अतृप्त नहीं होता। त्याग की कसौटी पर जहाँ चित्त आरूढ़ हुआ, वहाँ आपका भजन पूर्णता की अवस्था में है, परिपक्व है। भोजन इस प्रकार पक कर तैयार तो हुआ लेकिन पकते ही परिणाम कुछ विचित्र निकला–
पकवन वाला के रोटियै खाई।
पकानेवाला तो मन था जो भजन करता था किन्तु भजन ज्यों परिपक्व हुआ, मन को ही खा गया; मन का निरोध हो जाता है, निरुद्ध मन का विलय हो जाता है।
मन मिटा माया मिटी हंसा बेपरवाह।
जाका कछू न चाहिए सोई शाहंशाह।।
मन मिटा तब माया मिटी। पहले माया नहीं मिटती। मिटानेवाला कौन था? आपकी लगन! आप सम्पूर्ण मन से सम्पूर्ण हृदय से लगे थे। भजन की परिपक्व अवस्था में भजनकर्ता ही उसमें समाहित हो गया, मैला चित्त भी विलीन हो गया। यही है ‘पकवन वाला के रोटियै खाई।’।
अन्त में कबीर निर्णय देते हैं कि केवल मैंने यह स्थिति पायी हो, ऐसी बात नहीं है। इस सम्भावना का द्वार सबके लिए खुला है।
चले बटोहिया थाकल बाट।
सांसारिक मार्गों पर आप रात-दिन चलते रहिये, आप थक सकते हैं, पीढ़ियाँ थक सकती हैं, घोर जंगल में भी निरन्तर चलते रहने पर नये रास्ते तैयार हो सकते हैं, रास्ता कभी नहीं थकता! किन्तु भक्ति-पथ ही एकमात्र ऐसा पथ है यदि चलनेवाला कोई पथिक है तो एक समय ऐसा आता है कि रास्ता ही थक जाता है। प्रभु के दर्शन, स्पर्श और उनमें स्थिति के साथ ही आगे बढ़ने का मार्ग ही समाप्त हो जाता है– ‘भजन हमार हरि करें, हम पायौं विश्राम।’ ऐसा महापुरुष पेंशनीयर हो जाता है। आगे कोई सत्ता नहीं जिसके लिए वह आगे बढ़े। जहाँ उन प्रभु को जाना तो ‘जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।’ (रामचरितमानस, २/१२६/३)– सेवक सदा के लिए खो जाता है, स्वामी ही शेष बचता है। यदि प्राप्ति के पश्चात् भी प्रभु अलग और सेवक अलग है तो बेचारे जीव का कल्याण कैसा? प्रभु करुणा कर जब अपनाते हैं तो अपने ही रूप में समाहित कर लेते हैं, अपना ही रूप प्रदान कर देते हैं जिसे कबीर कहते हैं– ‘चले बटोहिया थाकल बाट।’ और–
सोवनहार पर उलटा खाट।
मान लें किसी ने चल तो दिया किन्तु मार्ग में सो गया कि भजन तो करना ही है, चार ईंट और सजा लें, सेवा भी तो भजन ही है। भजन कल कर लेंगे, परसों कर लेंगे…. टालता रहता है, वह जगत्-रूपी रात्रि में झपकी लेता रहता है। इस प्रकार लापरवाही से चलनेवाले के लिए, सोवनहार के लिए ‘उलटा खाट’– उसका ख्याल, विचार ही उलटकर उसे दबोच लेता है, फिर वह उठ नहीं पाता।
कह कबीर यह उलटा ज्ञान।
कबीर कहते हैं– यह ज्ञान संसार से उलटा है। सीधा तो लोक-व्यवहार है जो आँखों के सामने है। इससे पलटकर ‘किले में उलट लड़े सो शूर! पाँच पचीसों चूर….किले में….’। पहले तो हम माया की ओर बहते चले जा रहे थे। जब हमें याद आया कि यह भ्रम है तहाँ हम उधर से घूमकर आत्मस्वरूप, अपने सहज स्वरूप की ओर चल पड़ते हैं। इसी को कबीर ने उलटना कहा है। यह संसार में फँसानेवाला ज्ञान नहीं है बल्कि पलटकर अपने स्वरूप की ओर, अपने घर की ओर ले चलनेवाला ज्ञान है; किन्तु इस ज्ञान-पथ में यदि ‘मूते इन्द्री बाँधे कान’– यदि इन्द्रियों से कहीं लीक हो गये, आसक्त हो गये तो कर्म-संस्कार पुन: आपको बाँध लेंगे।
तब फिरि जीव बिबिधि बिधि, पावइ संसृति क्लेस।
हरि माया अति दुस्तर, तरि न जाइ बिहगेस।। (रामचरितमानस, ७/११८-क)
मनुष्य स्वर्ग, बैकुण्ठ, सिद्धियों की वार्ता सुनकर कामनाओं में फँस जाता है इसलिए कान कर्णेन्द्रिय पर अधिक बल दिया गया है। रूप, रस, गन्ध, शब्द और स्पर्श– किसी की वासना जगी, पुन: कर्म-संस्कार आपको बाँध लेंगे। प्राप्ति के मार्ग की दूरी बढ़ जायेगी क्योंकि इस पथ में बीज का नाश नहीं होता किन्तु यदि स्खलन नहीं हुआ, कोई प्रलोभन आकर्षित न कर सका तो–
लरिका के गोद में खेले महतारी।
बूझो बूझो पंडित अमरित बानी।।
बरसे कम्बल भीजे पानी।।
बच्चे माँ की गोद में खेलते हैं किन्तु यहाँ कबीर कहते हैं कि भजन की परिपक्व अवस्था में लड़के की गोद में माँ खेलती है। वास्तव में इस पंचभौतिक शरीर का जन्म माताओं से है; किन्तु आपके आत्मस्वरूप का जो आविर्भाव है उसमें भक्ति ही माता है। आरम्भ से भक्ति पराकाष्ठा तक पहुँच गयी तो लक्ष्य ही लड़का है। लक्ष्य है आपका स्वरूप, आत्मानुभूति! जो कण-कण में व्याप्त है, जहाँ उसकी अनुभूति मिली उसी लक्ष्य के अन्तराल में भक्ति किलोले करने लगती है। अब उसे कोई खतरा नहीं है। आगे करने योग्य भजन शेष नहीं, पीछे कुछ माया शेष नहीं जिसे काटे; इसलिए लक्ष्य के अन्तराल में अर्थात् ईश्वरप्राप्ति के पश्चात् भक्त निर्द्वन्द्व है, निश्चिन्त है, अब खेलता है।
पूज्य गुरु महाराज जी बताया करते थे– हो! भगवान जब स्वरूप देते हैं तब कुछ अस्त्र-शस्त्र भी दे दिया करते हैं। उन्हीं के द्वारा मारते-काटते साधक निर्द्वन्द्व और मस्त रहता है। मुझे जब स्वरूप मिला तो भगवान ने कुछ हथियार भी प्रदान किये; जैसे बताया कि तेरी वाणी में यह गुण है कि आप कुछ भी कह दें, वह हो जायेगा। किसी को कल फाँसी होनी है और तुम दाहिने हाथ से छड़ी मार दोगे तो सजा चाहे जो हो जाय, फाँसी नहीं हो सकती, उसे कोई मार नहीं सकता। किसी को तुम अपने बायें हाथ से मार दोगे तो उसके सभी करम हो जायेंगे। तेरी विभूति में यह गुण, तेरी वाणी में यह गुण, तेरी गाली में यह गुण है। इसीलिए मैं गाली देता हूँ। हो, नहीं तो ‘गाली देत न पावहु सोभा।’– संत को गाली कहाँ शोभा है! लेकिन मुझे आदेश है। यदि मैं उसे गाली न दूँ तो जिस कामना को लेकर वह आया है, उसका भला ही न हो।
कोई याचना लेकर गुरु महाराज के पास पहुँचता तो महाराज जी उसे बड़ी खरी-खोटी सुनाते थे– मरने की घड़ी में मेरे माथे आ गये! पाप करें सार अपने और भोगें बाबाजी! दो छड़ी किसी को लगा दें तो वह ठीक हो जाय और महाराज जी को चढ़ जाये बुखार! यही है हथियार! उन्हीं के सहारे महापुरुष लड़ते-झगड़ते निर्द्वन्द्व निकल आते हैं। उनका शेष जीवन इसी प्रकार कल्याण करते व्यतीत हो जाता है। यही है ‘लरिका के गोद में खेले महतारी।’। ‘बूझो बूझो पण्डित अमरित बानी।’– कोई पण्डित हो, ज्ञाता हो तो इस अमृत तत्त्व को दिला देनेवाली वाणी को समझो। पण्डित साधक योगी का एक उन्नत स्तर है। उन्हीं को उद्देश्य बनाकर कबीर ने अपनी वाणी का प्रसार किया।
!! ॐ श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय !!
(‘अमृतवाणी भाग-2’ से उद्धृत)