बिरहिनी मंदिर दियना बार
(प्रस्तुत पद के रचयिता यारी साहब का मूल नाम यार मुहम्मद था। यह बावरी साहिबा के शिष्य बीरू साहब के शिष्य थे। इनका जीवनकाल सन् १६६८ से १७२३ ई० के बीच बताया जाता है। इनकी समाधि दिल्ली शहर में है। यारी साहब के एक शिष्य बूला साहब ने इनके मत की एक शाखा भुरकुड़ा, जिला– गाजीपुर, उत्तर प्रदेश में स्थापित की जो आज तक चल रही है।)
रामचरितमानस में एक आध्यात्मिक रूपक है। रावण के आतंक से पृथ्वी घबड़ा गयी। गो का रूप धारण कर वह देवताओं के पास गयी। देवता भी रावण से त्रस्त थे–
कर जोरे सुर दिसिप बिनीता।
भृकुटि बिलोकत सकल सभीता।। (मानस, ५/१९/७)
वे रावण की निगाह देखते रहते थे कि उनके उठने-बैठने, चलने-देखने या सेवा करने में कहीं अशिष्टता न हो जाय और यह दुष्ट बेगारी बढ़ा दे। उन्होंने कहा– माते! दु:खी तो हम भी हैं, हम तुम्हारे साथ हैं। वे गये मुनियों के पास। उन्होंने बताया कि रावण तो उनसे भी कर के रूप में रक्त वसूल करता है। आजकल चिकित्सा में एक का खून दूसरे को चढ़ाते हैं। रावण के समय में यह आविष्कार जोरों पर था। आजकल बोतल-दो बोतल खून चढ़ाते हैं, रावण के निशाचर घड़ा-दो घड़ा रक्त पी जाते थे। महात्माओं का रक्त उन्हें अधिक प्रिय था इसलिए वे उन्हें मारते नहीं थे। मर ही जायेंगे तब तो कारखाना ही समाप्त हो जायेगा। जब महात्मा कम पड़ने लगे तो वह ब्राह्मणों का रक्त लेने लगा।
तेहि बहु बिधि त्रासइ देस निकासइ जो कह बेद पुराना।। (मानस, १/१८२ छन्द)
वेद-पुराण तो पंडितजी ही कहते थे इसलिए उनके भी पीछे वह पड़ा था। सब मिलकर ब्रह्माजी के पास गये–
सुर मुनि गन्धर्बा मिलि करि सर्बा गे बिरंचि के लोका।
सँग गोतनुधारी भूमि बिचारी परम बिकल भय सोका।
ब्रह्माँ सब जाना मन अनुमाना मोर कछू न बसाई।
जा करि तैं दासी सो अबिनासी हमरेउ तोर सहाई।। (मानस, १/१८३ छन्द)
ब्रह्मा ने कहा– मेरा भी कोई वश नहीं है। जिसकी तुम दासी हो, वह अविनाशी है। हमारे, तुम्हारे, सबके सहायक वे ही हैं। उन प्रभु की शरण जाओ। ब्रह्मा ने इतना ही बताया। शरण जाने की विधि क्या है? – यह ब्रह्मा भी नहीं जानते थे। सभी लगे अनुमान लगाने–
पुर बैकुंठ जान कह कोई।
कोउ कह पयनिधि बस प्रभु सोई।। (मानस, १/१८४/२)
किसी ने कहा– भगवान बैकुण्ठ में रहते हैं, बैकुण्ठ चला जाय। दूसरे ने कहा– नहीं, वह तो क्षीरसागर में रहते हैं।
तेहिं समाज गिरिजा मैं रहेऊँ।
अवसर पाइ बचन एक कहेऊँ।।
शंकरजी ने कहा– हे पार्वती! उस समाज में मैं भी था। वक्ताओं की भीड़ में अवसर ही नहीं मिल रहा था। सुझाव देनेवालों की लाइन लग गयी। निर्णय कुछ भी नहीं हो सका। जहाँ अवसर मिला, उन्होंने बताया–
हरि ब्यापकु सर्बत्र समाना।
प्रेम तें प्रकट होहिं मैं जाना।। (मानस, १/१८४/५)
भगवान सर्वत्र विद्यमान हैं। वह यहाँ भी हैं। उन्हें खोज निकालने की विधि है प्रेम! प्रेम से भगवान प्रकट हो जाते हैं। मैंने यह पढ़ा नहीं, सुना नहीं, जाना है; इस सत्य का साक्षात् किया है। वह चराचर जगत् में हैं–
देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं।
कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं।।
अग जग मय सब रहित बिरागी।
प्रेम तें प्रभु प्रगटइ जिमि आगी।। (मानस, १/१८४/६-७)
भगवान कहाँ नहीं हैं? प्रेमपूर्वक श्रद्धापूर्वक उनका सुमिरण करो। सबने स्तुति की, तत्काल सुनवाई हो गयी। आकाशवाणी हुई–
जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा।
तुम्हहि लागि धरिहउँ नर बेसा।। (मानस, १/१८६/१)
डरो मत! तुम्हारे हित के लिए मैं नर-वेष धारण करूँगा। तुम लोग निश्चिन्त हो जाओ।
इस प्रकार भगवान को ढूँढ़ने की विधि केवल प्रेम है और अनन्तकाल से यह विधि विद्यमान है। माता मीरा ने इसी विधि का अवलम्बन लिया–
हे री मैं तो प्रेम दिवानी मेरा दरद न जानै कोय।
मानस में है–
मम गुन गावत पुलक सरीरा।
गदगद गिरा नयन बह नीरा।। (मानस, ३/१५/११)
प्रेम का स्तर जब उन्नत हो जाता है तो वह विरह-वेदना में परिवर्तित हो जाता है। इसी का नाम है इष्टोन्मुखी लगन।
भजन शरीर नहीं करता। ‘साधन धाम मोच्छ कर द्वारा।’ (मानस, ७/४२/८)– शरीर तो एक धाम है, मकान है। मकान भजन करता है क्या? हाँ, यह साधन-धाम अवश्य है। कौन-सा साधन? जो मोक्ष प्रदान कर दे! मोक्ष के लिये भगवान के प्रति प्रेम, श्रद्धा, लगन, इन्द्रियों का दमन, मन का शमन, मन की टेक इत्यादि जो भी चाहिये, भगवान ने सब इस तन में सजाकर, सँवारकर दिया है। आप स्त्री हों, पुरुष हों या नपुंसक ही क्यों न हों, भजन जब भी किसी से पार लगा तो इष्टोन्मुखी लगन जागृत हो गयी, लौ रूपी लड़की! यही भजन कराती है। जिसमें यह विरह-वेदना जागृत है, ऐसे साधकों को यह सन्त कहते हैं–
बिरहिनी मंदिर दियना बार।
बिन बाती बिन तेल जुगुत सों, बिन दीपक उजियार।
प्रान प्रिया मेरे गृह आये, रचि–पचि सेज सँवार।।
सुखमन सेज परम तत रहिया, पिय निरगुन निरकार।
गावहु री मिलि आनँद–मंगल, ‘यारी’ मिलके यार।।
जब विरह-वेदना जग ही गयी तो मंदिर में दीप जलायें। दीपावली के अवसर पर गृहस्थ लोग मंदिरों में घी के दीप जलाकर लक्ष्मीनारायण की पूजा करते हैं। एक मन्दिर में लगभग पचासों दीपक जल रहे थे। भाविक भक्त शान्त होकर भजन कर रहे थे। पुजारीजी की दृष्टि घी की ओर गयी तो उन्होंने सोचा– सब दीपकों में ५-७ किलो घी तो होगा ही, अकारण ही जल जायेगा। यदि इसे बचा लें तो दाल में डालने के लिए महीने भर के लिए पर्याप्त होगा। पुजारीजी लालच में पड़कर बोले– भक्तजनो! अब आप लोग घर जायँ। घर में बैठकर आप सभी भजन, सुमिरण करें। हम भी एकान्त में यहाँ मंत्र सिद्ध करेंगे।
जनता तो भोली-भाली और श्रद्धालु होती ही है। सबने उन पुजारीजी को प्रणाम किया और घर चले गये। पुजारीजी दीपक बुझाकर घी एक कनस्तर में भरने लगे। एक सेविका बाहर झाड़ू लगा रही थी। उसकी दृष्टि पड़ी तो उसने शोर मचाया– ‘पण्डितं घृतं चोरं।’ पण्डित जी बिगड़े– ‘चुप रह दासी। मर कर शोरं। अर्द्धं तोरं, अर्द्धं मोरम्।’ आप सब जानते ही हैं कि भारत की गुलामी का एक बड़ा कारण मन्दिरों में संग्रहित अपार सम्पत्ति का आकर्षण ही था। सोमनाथ का मन्दिर लूटकर लुटेरे साढ़े सात सौ ऊँट अशरफी (सोने के सिक्के) ले गये थे।
स्मारक या मन्दिर गलत नहीं हैं। इनकी स्थापना का उद्देश्य जन-कल्याण ही होता है। ये परमात्मा की पाठशालायें हैं। ये पूजाघर हैं, नामघर हैं, लेकिन कालान्तर में जब इन स्थलियों पर भोजन-पानी ताव से मिलने लगा तो पुजारियों को लालच ने घेर लिया, थोड़ा घी बचाने में लग गये, कुरीतियाँ पनप गयीं, लेकिन जिस मन्दिर में हमें दीपक जलाना है वह मन्दिर है हृदय। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है–
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमस: परमुच्यते।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्।। (गीता, १४/१७)
अर्जुन! वह ईश्वर ज्योतियों का भी ज्योति, अंधकार से अत्यन्त परे, ‘ज्ञानं’– परमात्मा के साक्षात् सहित जानकारी ज्ञान के द्वारा सुलभ है। वह रहता कहाँ है? तो ‘हृदि सर्वस्य विष्ठितम्’– सबके हृदय में समाविष्ट होकर सदा निवास करता है। हृदय में बैठकर वह करता क्या है?–
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो
मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो
वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्।। (गीता, १५/१५)
अर्जुन! मैं ही सब प्राणियों के हृदय में अन्तर्यामी रूप से स्थित हूँ। बुद्धि, स्मृति, ज्ञान और विकारों से निर्लेप रहने की क्षमता मुझसे होती है अर्थात् साधना जागृत होने पर भगवान ही बुद्धि देते हैं, दर्शन देते हैं और विकारों को काटने की क्षमता भी देते हैं। सभी वेदों से अर्थात् अनुभवी संचार की सभी विद्याओं से मैं ही जानने में आता हूँ, मैं ही एक जाननेयोग्य हूँ और ‘वेदान्तकृत्’– जानकारी के अन्त में वेदान्त का कर्ता भी मैं ही हूँ। वेद या वेदान्त से यहाँ इन नामों से प्रचलित पुस्तकों का आशय नहीं है, वेदान्त तो साधना का परिणाम है।
अठारहवें अध्याय में भगवान बताते हैं–
ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।। (गीता, १८/६१)
अर्जुन! ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय-देश में निवास करता है। हृदय के अन्दर! इतना समीप, तब लोग उसे देखते क्यों नहीं? लोग मायारूपी यन्त्र में आरूढ़ होकर भ्रमवश भटकते ही रहते हैं, इसलिये नहीं देख पाते। जब ईश्वर हृदय में है तो हम शरण किसकी जायँ? अगले ही श्लोक में भगवान आदेश देते हैं– ‘तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।’– अर्जुन! उस हृदयस्थित ईश्वर की ही शरण जाओ। सम्पूर्ण भावों से जाओ। अभी तो हमारा कुछ भाव पशुपतिनाथ में, कुछ हरसू ब्रह्म में, कुछ गड़बड़ा देवी, कुछ पिशाचमोचन, डीह बाबा और चौरा माई में है। हमारी श्रद्धा तो बिखर गयी। ईश्वर के लिए तो हमारे मन की श्रद्धा दस प्रतिशत भी नहीं बची तो कल्याण कैसे होगा? यहाँ भगवान कहते हैं– सम्पूर्ण भाव से, मन-कर्म-वचन से उस ईश्वर की शरण जाओ। मान लें, हमने सारी मान्यतायें तोड़ दीं, ईश्वर की शरण सम्पूर्ण भाव से चले ही गये तो उससे लाभ क्या होगा? भगवान कहते हैं– ‘तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।।’ (गीता, १८/६२)– ईश्वर के कृपा-प्रसाद से तुम परम शान्ति प्राप्त कर लोगे और उस निवास-स्थान को पा जाओगे जो शाश्वत है, अजर-अमर है। तुम रहोगे, तुम्हारा अनन्त जीवन, सदा रहनेवाला घर रहेगा। हर साल उसमें मरम्मत करो, चूना पोतो, इसकी कोई जरूरत नहीं रह जाती। इस प्रकार गीता आपको अपने सहज स्वरूप में स्थिति दिलाती है, लेकिन इसके लिये जिस मन्दिर में हमें-आपको पूजा करनी है, वह मन्दिर है हृदय। जब कभी किसी ने परमात्मा को पाया है तो हृदय में ही पाया है। वाह्य मन्दिर आरम्भिक प्रार्थना-स्थली है। वहाँ से हमारी प्रार्थना आरम्भ होती है लेकिन हृदय-स्थल में जब साधना जागृत हो गयी, विरह जग गया, वेदना जग गयी, तो–
बिरहिनी मन्दिर दियना बार।
हृदय ही मन्दिर है। इसी में दीपक जलाना है। हृदय में दीपक जलाने का उपक्रम करने पर नस-नाड़ियाँ जल सकती हैं। यह सन्त कैसा दीपक जलाने को कहते हैं?–
बिन बाती बिन तेल जुगुत सों, बिन दीपक उजियार।।
आरम्भ में दीपक जलाना पड़ता है। वह दीपक है नाम का। ‘नाम का दीप जला ले अँधेरा पल भर में मिट जाय।’ नाम का अभ्यास क्रमश: मणि-दीप का रूप ले लेता है जिसमें बाती तेल और दीप की आवश्यकता नहीं रह जाती। यह दीपक योग-युक्ति से प्रकाशित होता है–
जोग जुगुत जाना नहीं, कपड़ा रँगा गेरुआ बना।
जाना न निज दरवेश को, जोगी हुआ तो क्या हुआ?
योग एक युक्ति है जिसकी जागृति सद्गुरु से मिलती है। इस दीपक की चर्चा गोस्वामी तुलसीदासजी भी करते हैं–
राम नाम मनि दीप धरु जीह देहरीं द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहु जौं चाहसि उजिआर।।
राम-नामरूपी मणि-दीप को जिह्वा की देहरी पर रख दें तो भीतर अन्त:करण में तथा वाह्य वायुमण्डल में सर्वत्र प्रकाश ही प्रकाश हो जायेगा। न भीतर से भले-बुरे संकल्प उठेंगे और न वायुमण्डल में फैले दुर्विचार ही आपमें प्रवेश कर पायेंगे; यदि राम-नामरूपी मणि-दीप में लव लग गयी तो मणि-दीप थोड़ा और सूक्ष्म होने पर भक्ति-मणि में बदल जाता है–
राम भगति चिंतामनि सुन्दर।
बसइ गरुड़ जाके उर अंतर।।
परम प्रकास रूप दिन राती।
नहिं कछु चहिअ दिआ घृत बाती।।
मोह दरिद्र निकट नहिं आवा।
लोभ बात नहिं ताहि बुझावा।।
प्रबल अबिद्या तम मिटि जाई।
हारहिं सकल सलभ समुदाई।। (मानस, ७/११९/२-५)
भक्तिरूपी दीपक के परम प्रकाश में आवागमन का मूल अविद्यारूपी अंधकार तिरोहित हो जाता है।
राम भगति मनि उर बस जाकें।
दुख लवलेस न सपनेहुँ ताकें।। (मानस, ७/११९/९)
भक्तिरूपी मणि जिसके हृदय में बसती है, लेशमात्र भी दु:ख उसके लिए होता ही नहीं। अस्तु नाम-दीप, मणि-दीप और भक्ति-मणि में न तेल लगता है, न दिया और न बाती ही; जैसा यह सन्त कहते हैं– ‘बिन बाती बिन तेल जुगत सों, बिन दीपक उजियार।’ यह जागृति सन्तों से मिलती है, सद्गुरु से मिलती है। जहाँ भक्तिरूपी मणि-दीप प्रज्ज्वलित हुआ, उस प्रकाश में भगवान दिखायी पड़ जायेंगे।
प्राण पिया मोरे गृह आये रचि पचि सेज सँवार।
प्राणों के आधार, जीवन के आधार और जिन प्रभु को प्राप्त कर लेने के बाद इस जीव की प्यास सदा के लिए मिट जाती है, उन्हें पिया कहकर सम्बोधित किया गया, जिनकी प्राप्ति के पश्चात् फिर किसी प्रकार की तृष्णा नहीं रह जाती क्योंकि भगवान के आगे कोई सत्ता है ही नहीं तो चाह किसकी करेंगे। साथ ही दुनिया की सभी आशायें, तृष्णायें विलुप्त हो जायेंगी। क्योंकि,
जेहि जानें जग जाइ हेराई।
जागे जथा सपन भ्रम जाई।। (मानस, १/१११/२)
उन्हें जानने के पश्चात् जगत् खो गया। जगत् है ही नहीं तो चाह किसकी करेंगे? वह प्रभु जब हृदय में आ गये, तो ‘रचि पचि सेज सँवार।’– अभ्यास में शिथिलता न आने पाये। भगवान को बैठने की शय्या रच डालें, सजा डालें और सजाने में ‘पचे’–परिश्रम करें अर्थात् सतत् अभ्यास में लग जायँ, अभ्यास बढ़ा लें।
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा– अर्जुन! माना कि मन वायु से भी तेज चलनेवाला है, किन्तु ‘अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।’ (गीता, ६/३५)– वैराग्य और अभ्यास के द्वारा यह भली प्रकार स्थिर हो जाता है। राग का अर्थ है आसक्ति, लगाव। वैराग्य का अर्थ है देखी-सुनी वस्तुओं में राग का त्याग। वैराग्य के द्वारा आनेवाले आघातों को रोका जाता है तथा अभ्यास के द्वारा अन्त:करण में संस्कारों की परत को काटा जाता है। यही उपाय है मन को रोकने का। सतत् अभ्यास के लिए–
जागत में सुमिरन करे, सोवत में लव लाय।
सुरत डोर लागी रहे, तार टूट ना जाय।।
आप जब तक जगें, सुमिरन करें। सोने लगें तो लव लगाकर निद्रालाभ करें। इस प्रकार आठों पहर अर्थात् दिन-रात चौबीसों घण्टे भजन का तार टूटने न पाये। यही है पचना! अभ्यास को बढ़ाते जायँ। भगवान के लिए जिस शय्या को सजाना है, उसका स्वरूप क्या है?–
सुखमन सेज परम तत रहिया पिया निरगुन निराकार।।
सुखमन नामजप की उन्नत अवस्था की उपलब्धि है। एक ही नाम को चार श्रेणियों से जपा जाता है– बैखरी, मध्यमा, पश्यन्ती और परा। ‘राम-राम’ या ‘ओम्-ओम्’ की ध्वनि हम स्वयं सुनें और दूसरों को भी सुनाई पड़े, ध्वनि व्यक्त होती रहे इसलिए इसे बैखरी कहते हैं। शुरुआत यहीं से है। यह नितान्त आवश्यक है। जब शिशु और प्राथमिक कक्षाओं को उत्तीर्ण ही नहीं किया तो उन्नत कक्षाओं में प्रवेश कैसे मिलेगा? बच्चे अभी संकीर्तन कर रहे थे, यह भी बैखरी वाणी का जप है। गुणानुवाद, कथा इत्यादि बैखरी जप के ही अन्तर्गत हैं।
बैखरी जपते-जपते जब मन जप में लगने लगे, जप में मन के टिकने की क्षमता आ जाय तो यही बैखरी का जप मध्यमा में प्रवेश पा जाता है। मध्यम अर्थात् धीरे-धीरे, आहिस्ता-आहिस्ता! ध्वनि क्षीण होने लगती है। यह उच्चारण कण्ठ से होता है। जिह्वा की किंचित् सहायता लेते हुए उच्चारण इस प्रकार करें कि समीप में कोई बैठा हो तो उसे सुनायी न दे किन्तु आपका उच्चारण चलता रहे और आप उसे सुनें भी।
मध्यमा वाणी में मन की थोड़ी स्थिरता आते ही पश्यन्ती के जप में प्रवेश मिल जाता है। पश्य का अर्थ है देखना अर्थात् अब आप न जोर से जपें, न धीरे से। वाणी से जपना बन्द कर केवल श्वास पर दृष्टि रखें कि श्वास कब अन्दर गयी, कब लौट कर आयी– इसे जानें! वह बाहर कितनी देर तक रुकी? (लगभग एक सेकण्ड यह श्वास बाहर रुकती है।) फिर कब यह अन्दर आई, उसे पहचानें। अन्दर कितनी रुकी, उसे समझें। कब लौटकर आयी, उसे देखें। मन को द्रष्टा के रूप में खड़ा कर दें। श्वास को देखा भर करें। दो-चार बार श्वास को देखते-देखते इस श्वास में चिन्तन से नाम ढाल दें। श्वास आयी तो ‘ओम्’, गयी तो ‘ओम्’…‘ओम्’। आप राम जपते हैं तो श्वास आने पर राम या केवल ‘रा’ और श्वास बाहर निकलते समय राम या केवल ‘म’। ‘रा’ और ‘म’ की एक धुन लग जाय, श्वास से उसे देखते रहें।
सृष्टि में एक परमात्मा ही सत्य है। उसे भाषा-भेद से कुछ भी पुकारें, इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। उदाहरण के लिए जल को यहाँ पानी कहते हैं, मद्रास में इसे तन्नी कहते हैं; अंग्रेजी में इसे वाटर, फारसी में आब कहें तो क्या कोई दूसरी वस्तु मिलेगी? भाषा कुछ भी हो, सत्य तो एक है। भगवान श्रीकृष्ण ने बताया– अर्जुन! तू ‘ओम्’ का जप कर (गीता, ८/१३)। वेदोक्त महापुरुष भी ‘ओम्’ ही जपते थे। ‘ओम्’ जपने के अधिकार-अनधिकार के विवाद में न पड़कर भक्तिकालीन महापुरुषों ने राम जपना शुरू किया। घट-घट में जो रमण करता है वह है राम! ‘ओ’ अर्थात् अविनाशी परमात्मा, ‘अहं’ अर्थात् आप स्वयं; जिसका निवास आपके हृदय में है। ओम् कहो या राम, आशय एक ही है। इनमें से जो अधिक रुचिकर हो, आप जप सकते हैं।
‘पश्यन्ती’ नामजप का तीसरा स्तर है। इस वाणी का उतार-चढ़ाव श्वास पर है जैसा कि अभी बताया गया कि श्वास को देखें। श्वास को मन जहाँ देखने लगे, चिन्तन से उसमें नाम ढाल दें कि श्वास आयी तो ओम्, गयी तो ओम्; अन्य संकल्प या चिन्तन बीच में आने न पाये। कुछ दिन तो नाम को देखने का अभ्यास करना पड़ता है फिर यह नाम श्वास में ढला-ढलाया मिल जायेगा, ढालना नहीं पड़ेगा, क्योंकि आप पायेंगे कि श्वास सिवाय नाम के और कुछ कहती ही नहीं है। हम-आप श्वास की निर्मल अवस्था से भटक गये हैं इसी से श्वास में नाम आरम्भ में सुनायी नहीं पड़ता। इस जागृति के पश्चात्– ‘उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना।।’ (मानस, ५/३३/३)– भगवान का स्वभाव अर्थात् वह कैसे साधक को उठाते-बैठाते, भजन कराते, योगक्षेम का निर्वाह करते हैं, भगवान का यह स्वभाव जिन्हें जानने में आ गया, उन्हें भजन छोड़कर कुछ अच्छा लगता ही नहीं। भजन की सुखमनी अवस्था का भी यही अभिप्राय है। आज मन भजन से भाग रहा है लेकिन नाम-जप के सतत अभ्यास से पश्यन्ती की परिपक्व अवस्था में वही मन बिना लगाये ही भजन में लग जायेगा, मन का सहज धरातल वही हो जायेगा। इसी का नाम है सुखमन अर्थात् मन सुखपूर्वक श्वास में प्रवाहित हो जाय, भजन करने में मन को सुख मिलने लगे। एक बार मन श्वास में नाम देखने लग गया तो सुरत बाँस की तरह खड़ी हो जाय, वृत्ति तैलधारावत् श्वास से जपने में लग जाय। यह संत यहाँ कहते हैं कि घर में दीपक जल गया, प्रभु का स्वरूप झलका तो अभ्यास बढ़ाकर प्रभु के लिए शय्या लगा लें। कौन-सी शय्या? ‘सुखमन सेज’– मन सुखपूर्वक भजन में डूबता चला जाय। यह शय्या ‘परम तत रहिया’– परम तत्त्व भगवानपर्यन्त दूरी तय करने की साधना है। परम तत्त्व परमात्मा है कैसा? तो, ‘पिया निरगुन निराकार।’– वह प्रभु हैं कैसे? सत्-रज-तम तीनों गुणों से अतीत त्रिगुणातीत, निराकार! उनका कोई आकार नहीं है। ‘सोइ जानइ जेहि देहु जनाई।’– उस परमात्मा को वही जान पाता है जिसे वह जना देते हैं। ‘जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।’ (मानस, २/१२६/३)– उन्हें जानकर साधक भी वही हो जाता है; कौन किससे क्या कहे?
माता पार्वती ने भगवान भोलेनाथ शिव से प्रश्न किया कि भगवान कैसे हैं? शंकरजी ने बताया– ‘बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना।’– बिना पैरों के वह चलता है, बिना कानों से वह सुन लेता है। क्या कोई चित्रकार ऐसा चित्र बना सकता है? इतना ही नहीं, ‘कर बिनु करम करइ बिधि नाना।‘– बिना हाथ के तरह-तरह के कार्य करता है।
आनन रहित सकल रस भोगी।
बिनु बानी बकता बड़ जोगी।।
तन बिनु परस नयन बिनु देखा।
ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा।।
असि सब भाँति अलौकिक करनी।
महिमा जासु जाइ नहिं बरनी।। (मानस, १/११७/५-८)
वह बगैर शरीर के स्पर्श करता है, बगैर मुँह के बोलता है, बिना आँख के देख रहा है, बिना नासिका के गंध ग्रहण कर रहा है। उसके कार्य अलौकिक हैं। लौकिक वह है जो दुनिया में घटित होता है; अलौकिक वह जो दुनिया में है ही नहीं।
जेहि इमि गावहिं वेद बुध जाहि धरहिं मुनि ध्यान।
सो दसरथ सुत भगत हित कोसलपति भगवान।। (मानस, १/११८)
जिसे वेद और बुध इस प्रकार गायन करते हैं जिसका मुनि लोग ध्यान धरते हैं। किसका? जो बिना पैरों के चलता है, बिना शरीर के स्पर्श करता है उसका ध्यान धरते हैं। भगवान जब मिलते हैं तो किस रूप में मिलते हैं?–
पिया निरगुन निराकार। बिरहिनी मंदिर दियना बार।
जब निर्गुण निराकार पिया मिल ही गये, कहीं कोई कमी, कोई कसक रह ही नहीं गयी, तो–
गावहु री मिलि आनँद मंगल, यारी मिल के यार।
अब जब वृत्ति सिमट गयी, इन्द्रियाँ संयत हो गयीं, मन सुखपूर्वक लगने लगा, संयम इतना सधा कि निराकार निर्गुण प्रभु विदित हो गये तभी मंगल है, आनन्द है।
जो आनंद सिंधु सुखरासी।
सीकर तें त्रैलोक सुपासी।। (मानस, १/१९६/५)
जो आनन्द के समुद्र हैं, सहज सुख की राशि हैं, उस सुखराशि में से एक बूँद जिस पर छिड़क दें वह तीनों लोक में सुपास पा जाता है।
सो सुख धाम राम अस नामा।
अखिल लोक दायक बिश्रामा।। (मानस, १/१९६/६)
उनका नाम राम है। जब वह मिल ही गये तो ‘गावहु री मिलि आनंद मंगल’। अमंगल माने अकल्याण, मंगल माने कल्याण। अब कल्याण ही कल्याण है। कब? ‘यारी मिल के यार’– यार अर्थात् वह प्रेमास्पद जिसके लिए हम तड़प रहे थे, जिसमें प्रीति प्रवाहित थी, उन प्रभु से मिलकर आनन्द मनायें, मंगल गायन करें।
संक्षेप में, भगवत्प्राप्ति का पथ विरह का, वेदना का है–
हँसि हँसि कंत न पाइयाँ जिन पाया तिन रोय।
हँसी खुशी जौ पिय मिलैं कौन दुहागिन होय।।
प्रियतम की प्राप्ति की तड़प इतनी बढ़ जाती है कि,
कै बिरहिन को मीचु दे कै आपा दिखराय।
रात दिवस का दाझना मो पै सह्यो न जाय।।
इतनी बेचैनी पर वह निष्ठुर मिलता है किन्तु इसके लिए प्रेमपूरित हृदय से एक प्रभु में श्रद्धा स्थिर करके नाम का जप करें, नाम का दीप जलायें। हाँ, निवृत्ति प्रदान करनेवाले भजन की जागृति सद्गुरु से है।
हमारे पूज्य गुरु महाराज कहा करते थे कि ‘‘भगवान आदेश न दें तो घर छोड़ना पाप है और यदि वह आदेश दे दें तो घर में रहना पाप है। हमार तनिकौ मन नहीं रहा घर छोड़ने का। हो! भगवान ने कान पकड़ के घर छुड़ा दिया।’’
अपने बचपन का संस्मरण सुनाते हुए गुरु महाराज कहते थे कि वह मात्र दो-तीन दिन पाठशाला गये थे। इसी बीच किसी भूल पर उनके शिक्षक ने एक चटकना मार दिया। वह लगे मचलकर रोने। माँ ने कहा– भाड़ में जाय ऐसी पढ़ाई। आज से मेरा बेटा नहीं पढ़ेगा। पार्थिव शिक्षा का पाठ उसी दिन से महाराजजी के जीवन से उठ गया।
महाराजजी का जन्म-स्थान रामकोला उन दिनों एक गाँव ही था। क्षेत्रीय वातावरण के अनुसार महाराजजी की अभिरुचि दण्ड-बैठक, कसरत और कुश्ती में हो गयी। गाँव में लगभग बारह अखाड़े थे और महाराज क्रमश: हो गये सबके उस्ताद। समीपवर्ती पन्द्रह-पचास गाँवों में वह कुश्ती में कभी हारे ही नहीं। उनका अरमान था कि बगल के गाँव में महीने–दो महीने में भारतप्रसिद्ध पहलवान गामा आनेवाला था। वह तैयारी कर रहे थे कि हाथ मिलाकर देखूँगा, उसमें और हममें कितना अन्तर है। प्रतिदिन पाँच किलो दूध, मनचाहा पिस्ता-बादाम, मनचाहा घी और दिन-रात व्यायाम…..मस्ती भरा जीवन था।
महाराजजी की माताजी ने दौड़-धूप कर उनका विवाह करा डाला लेकिन जिसे शरीर का शौक होता है, उसे कहाँ की शादी और कहाँ का ब्याह! महाराज जी को भी शादी से कोई मतलब ही न था। महाराज बड़े स्पष्टवादी थे, कहते थे– ‘‘हो! हमार महतरिया हमारी गर्दन पकड़कर उस कोठरी में धकेल दे जहाँ हमारी पत्नी घूँघट डाले बैठी रहती और बाहर से दरवाजा बन्द कर देती।’’
महाराजजी बताते थे, ‘‘हो! साधु होने को हमने कभी सोचा भी न था। घर में खाने का खूब आराम! पत्नी भी गोरी-गोरी नीक लागत रही। किसी प्रकार का कष्ट न था। मन्दिर में हम कभी गये नहीं, महात्माओं को नजदीक से कभी प्रणाम भी नहीं किया। भागवत या रामायण क्या पढ़ते जब कभी पढ़े-लिखे नहीं! दिनभर मस्ती, दण्ड-बैठक-कसरत।’’
महाराजजी ने बताया कि उन्हें अनायास तीन बार आकाशवाणी हुई। पहली आकाशवाणी तब हुई जब वह कुछ घरेलू सामान खरीदने बाजार जा रहे थे। उनके मस्तिष्क में जोरों की आवाज गूँजी– ‘इन महात्मा को भोजन कराओ।’ आवाज इतनी तेज थी कि महाराजजी वहीं शिर पकड़कर खड़े हो गये। थोड़ी देर बाद संयत होने पर देखा, वह महात्मा वहाँ से जा चुके थे। दिनभर वह उन्हें ढूँढ़ते रह गये। सायंकाल वह मिले, उन्हें भोजन कराया।
दूसरी आकाशवाणी के पीछे गाँव की एक घटना थी। महाराजजी कहते थे–
लीला करन चहत प्रभु जबहीं।
कारन खड़ा करत हैं तबहीं।।
भगवान जिसे बुलाना चाहते हैं, उसकी ऐसी नस दबा देते हैं कि वह सीधे उनकी गोद में जा गिरता है, उसे अगल-बगल देखने का अवसर भी नहीं देते। रामकोला बड़े-बड़े जमींदारों का गाँव था। उनमें आठ-दस तो ऐसे थे जिनकी आठ-आठ, दस-दस हजार एकड़ जमीन नेपाल की तराइयों तक फैली थी। अब उन रईस के लड़कों को काम-धाम तो करना नहीं था, ठाठ-बाट से घूमा करते थे। उन्हीं दिनों एक गरीब दर्जी के घर में बहू आई तो रईसों के लड़के उसके घर का चक्कर लगाने लगे। उसने सबको डपट कर भगा दिया।
इस घटना के पश्चात् महाराज उस गली से निकले। उसकी निगाह इन पर पड़ी तो उसने एक अधेड़ महिला से एक पत्र भेजा कि आप चाहें तो मैं जन्मभर आपसे सम्बन्ध रख सकती हूँ। महाराजजी बताते थे कि ‘‘हो! हम चरित्र के कच्चे कभी न थे, किसी की बहू-बेटी को कभी नजर उठाकर देखा तक न था, न मन में कभी इस तरह की कल्पना ही थी लेकिन जब हमने यह सुना कि उसने उन बाबू को भगा दिया, उन साहब को डाँट दिया, बड़े ठाकुर के लड़के को दुत्कार दिया और हमको पसन्द किया! इतना मन में आया कि बस कुतूहल जग उठा।’’ महाराज जी कहते थे– ‘‘हो! दो बजे दिन में चिट्ठी मिली। उसी संदेशवाहिका से पढ़वाकर सुना, उसी ने अर्थ समझाया।’’
अब दो बजे दिन से शाम तक का समय काटे नहीं कट रहा था। तीसरे प्रहर से ही वह सजने-सँवरने लगे। थोड़ा तेल फुलेल लगाया, रेशमी गंजी पहन ली, एकाध फूल खोंस लिया! देहाती आदमी भला कौन-सा शृंगार करते। किसी तरह से शाम हुई। जब भली प्रकार अँधेरा हो गया तब वह घर से निकले। उन्हें भय था कि कोई उनकी भावना भाँप न ले। लोग क्या कहेंगे? ‘इत उत चितइ चला भड़िहाईं।’ (मानस, ३/२७/९) कुत्ता सूने घर में दबे पाँव जाता है, बर्तन-भाँड़े में मुँह डालकर खाने-पीने की वस्तु लेकर भाग जाता है। दबे पाँव वह चले जा रहे थे।
एक लम्बे चौड़े घने बगीचे के दूसरी छोर पर संकेत-स्थल था। बगीचे के मध्य पहुँचते ही अकस्मात् आपके मन में एक विचार आया कि मैं कभी भयभीत हो रहा हूँ, कभी आगे बढ़ रहा हूँ। कहीं मैं पाप करने तो नहीं जा रहा हूँ। इतना सोचना था कि बड़ी जोर से आकाशवाणी हुई– ‘भयंकर पाप करने जा रहे हो। घोर नरक में जाओगे।’
इतना सुनते ही महाराज के रोयें फूट गये, पाँव मन-मन भर के बोझिल हो गये, उठाने से उठते ही न थे जैसे पाँव हैं ही नहीं। अाधा घण्टा तक वह इसी प्रकार जड़वत् खड़े रहे। ऐसा लगने लगा जैसे कुछ लोग अँधेरे में खड़े हैं, उन्हें अभी पकड़कर खा जायेंगे। काली-काली भयंकर आकृतियाँ दिखायी पड़ने लगीं। आधे घण्टे में चेतना लौटी, पाँव हिलाया तो हिले। महाराजजी बिना कुछ सोचे-समझे वापस लौट पड़े। जब बगीचे के किनारे आ गये तो पुन: आकाशवाणी हुई– ‘इस मंदिर में तुम्हारे गुरु महाराज हैं।’
महाराजजी मंदिर में चले गये। यह एक खण्डहर हो चला शिवालय था। पचासों साल से कोई पुजारी उसमें गया ही न था। आप उसमें घुसकर शिवलिंग की परिक्रमा कर बाहर निकल आये। उन्हें बड़ी झुँझलाहट हुई कि कौन हमारे पीछे पड़ा है? कौन जोर से बोलता है? कौन आहिस्ता बोल रहा है? अभी आकाशवाणी हुई कि इसमें गुरु महाराज हैं, किन्तु इसमें तो कोई नहीं है। इतने में मन्दिर के भीतर से खाँसने की आवाज आयी। वास्तव में एक महापुरुष भीतर एक अँधेरे कोने में बैठे थे। महाराजजी ने वहाँ प्रकाश की व्यवस्था की और तीन दिन-रात उनकी सेवा में लगे ही रह गये।
इसी अल्प अवधि में महाराजजी ने साधना की विधि समझा और भजन में लग गये। गाँव से एकाध फर्लांग की दूरी पर एक झाड़ी में वे बैठ गये, फिर लौटकर घर गये ही नहीं। उनके गुरुदेव सत्संगी महाराज भी उन्हें उपदेश देकर चले गये। वस्तुत: भजन करनेवाली क्रिया को बहुत दिनों तक समझना-रटना नहीं पड़ता। भगवान राम को बहुत समय तक नहीं पढ़ना पड़ा– ‘गुरु गृहँ गये पढ़न रघुराई। अलप काल बिद्या सब आई।।’ (मानस, १/२०३/४)– क्रियात्मक साधना समझकर क्रिया में संलग्न हो जाना होता है। महाराजजी चिन्तन में डूब गये। अब गाँवभर परेशान! पहलवानी के शिष्य परेशान हो गये कि उस्ताद गये कहाँ? छ: दिन पर लोगों ने देखा कि वह झाड़ी में बैठे हैं। पूरा गाँव इकट्ठा होकर पूछने लगा। महाराजजी ने किसी से बात नहीं की। एक ने कहा– वह लँगड़ा जो साधु है, उसके साथ हमने इनको देखा था। दूसरे ने कहा– वह लँगड़ा तो बड़ा जादूगर है, लगता है उसी ने कुछ कर दिया। ऐसा करो कि उसे ढूँढ़ो। उसका एक पाँव टूटा है, दूसरा भी तोड़ डालो। पचीस-तीस जवान लाठी लेकर उन्हें ढूँढ़ने लगे किन्तु उनका कहीं पता न चला। धीरे-धीरे एक माह व्यतीत हो गये। सबकी लाठियाँ घरों में रख गईं तब सत्संगी महाराज वहाँ प्रकट हो गये। लोगों की भीड़ एकत्र हो गयी। वे पूछने लगे– कहो लँगड़ू बाबा! इस लड़के की बुद्धि को क्यों भ्रष्ट कर दिया? वह महात्मा तड़के– क्यों? बुद्धि भ्रष्ट करने का हमने ठेका ले रखा है क्या? उस औरत को हमने ही पागल बनाया था क्या? उन बाबू साहब का लड़का पागल है तो हमने ही उसकी बुद्धि को भ्रष्ट कर दिया था क्या? अपने कर्मों को लोग देखते नहीं, कहते हैं बुद्धि को भ्रष्ट कर दिया। अब लोग करते भी क्या! वस्तुत: वह महापुरुष थे लेकिन क्षेत्र में सभी उन्हें पागल ही समझते थे।
महाराजजी भजन में लगे ही रह गये। चार महीने में भजन जागृत हो गया। महाराज बताते थे कि ऐसा प्रतीत हुआ कि जैसे कोई अपने घर के आँगन में गड़ा करोड़ों का धन अनायास पा जाय। इस प्रकार भजन की जागृति हो गयी, योग-साधना जागृत हो गयी। भगवान उठाने-बैठाने लगे, चलाने लगे, भजन कराने लगे।
हमने पूछा– ‘‘महाराजजी! सबको आकाशवाणी नहीं होती। आपको क्यों हुई?’’ महाराजजी ने बताया– ‘‘हो, यह शंका हमें भी हुई थी। इस पर भगवान ने हमारे पिछले सात जन्मों का दृश्य दिखाया। पिछले सात जन्मों से मैं लगातार साधु रहा हूँ। इनमें से भी चार जन्म साधुओं के बीच कमण्डल लेकर झूठ-मूठ का ही घूम रहा हूँ।’’ हमने पूछा– ‘‘झूठ-मूठ से आपका क्या आशय है?’’ महाराजजी ने बताया– ‘‘हो! उन जन्मों में हमें आता-जाता कुछ भी न था। नाम भी जपता था तो कभी ‘ॐ तत् सत्’, कभी ‘अलख निरंजन’ तो कभी ‘सीताराम’। उन जन्मों में हम तिलक लगाते थे, विभूति भी रमाया, भगवा कपड़े पहन कमण्डल धारण किया, तो कहीं सन्तों के बीच परम त्यागी बनकर खड़ा हूँ। महात्मा लोग अपने सम्प्रदाय की जो भाषा बोलते हैं, वह सब याद था। इन्द्रिय संयम और मनोनिग्रह में कमी नहीं थी लेकिन भजन जागृत नहीं था। पिछले तीन जन्मों से अच्छा साधु रहा हूँ जैसा कि होना चाहिये। इष्टदेव रथी थे, योग-साधना जागृत थी। पिछले जन्म में निवृत्ति हो चली थी लेकिन दो-तीन इच्छायें मन में रह गयी थीं जिनसे निवृत्ति के लिए जन्म लेना पड़ा। एक कुतूहल था कि यह शादी-विवाह क्या होता है? दूसरा कुतर्क था कि गाँजा पीकर संतलोग बहुत झूमते हैं, इसमें कौन-सा सुख है? यद्यपि हमने इसे पीया नहीं किन्तु मन में जिज्ञासा थी। कुछ देहाभिमान भी बना हुआ था कि मैं कुलीन हूँ, बड़े घराने का हूँ, पहलवान हूँ, धनवान हूँ, विद्वान हूँ। गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि अर्जुन! देहाभिमानियों की गति नहीं होती। भगवान जब देखते हैं कि देहाभिमान किसी भी तरह से छूट नहीं रहा है तो भगवान एकाध जन्म ऐसा भी दे देते हैं; जैसे– सन्त कबीर लहर तालाब पर मिले, ईसा कुआरी कन्या के पुत्र हुए, व्यास कुआरी कन्या-पुत्र, नारद दासीपुत्र, हनुमानजी ‘पवनसुत…शंकरसुवन….केसरीनन्दन’, शृंगी ऋषि मृगों के झुण्ड में, भरद्वाज कर्ण की तरह सन्दूक में बहाये गये बालक के रूप में प्रयाग में मिले – कुछ ऐसा जन्म कि बालक अभिमान भी करे तो किस पर? इस जन्म में भगवान ने थोड़े ही समय में सब दिखा-सुनाकर, शादी-विवाह कराकर दो चटकना मारा कि यह पाप और यह पुण्य! यह रास्ता और यह गुरु महाराज! और कर भजन! हो, भगवान ने हमारा कान पकड़कर बलपूर्वक हमें साधु बना दिया।’’
इष्टदेव के निर्देशन में भजन और निराधार विचरण के क्रम में महाराजजी सती अनुसुइया के घनघोर जंगल में पहुँच गये। खाने-पीने की कोई व्यवस्था नहीं। वहीं एक शेर का भी निवास था। भगवान यदि आपको शेर की गुफा में बैठा दें तो बैठना ही पड़ेगा। पूज्य सत्संगी महाराज भक्तों से प्रश्न किया करते थे– ‘‘सृष्टि में सबसे गरीब कौन है?’’ लोग बताते– ‘‘कन्या। उस बेचारी का हाथ लूले-लँगड़े चाहे जिसे पकड़ा दो, वह कुछ नहीं बोलेगी। उसके साथ चली जायेगी।’’ सत्संगी महाराज कहते थे– ‘‘नहीं हो, उससे भी गरीब सोचकर बताओ।’’, तो लोग कहते– ‘‘गाय; क्योंकि उसे कसाई के हाथ दे दो तो भी वह विरोध नहीं करती।’’ फिर वह पूछते– ‘‘उससे भी गरीब कोई है?’’ लोग प्रार्थना करते कि, ‘‘आप ही बतायें भगवन्!’’ वह बताते कि, ‘‘सृष्टि में सबसे गरीब वह साधक है जिसके ऊपर इष्टदेव रथी हैं। वह तुम्हें शेर की गुफा पर ही क्यों न बैठा दें, तुम्हें बैठना ही पड़ेगा। तुम्हारे लिये दुनिया में दूसरी जगह है ही नहीं।’’
अनुसुइया में आपका निवास उपवास से आरम्भ हुआ। उपवास के चौदहवें दिन लघुशंका में महाराजजी को रक्त दिखायी पड़ा तो शरीर के प्रति थोड़ी करुणा हो आयी। वह भगवान पर ही बिगड़ पड़े– इष्टदेव बने बैठे हो! घोर जंगल में लाकर पटक दिया, खाने-पीने के लिए कुछ है ही नहीं। अभी खून गिर रहा है, चार दिन में शरीर भी छूट जायेगा। जब शरीर ही नहीं रहेगा तो भजन कौन करेगा! भगवान ने उस दिन आदेश दिया– ठीक है जब खाने का ही मन है तो कल से खाओ। दूसरे दिन से उस घनघोर जंगल में भी खाने-पीने की अयाचित व्यवस्था हो गयी तो महाराज को चिन्ता हुई कि प्रभु ने यह रूखा वचन क्यों कहा कि खाना है तो कल से खाओ। वस्तुत: भगवान चाहते क्या थे? उस दिन भगवान ने बताया कि यदि इक्कीस दिन न खाते तो जीवनपर्यन्त उन्हें खाने की आवश्यकता न होती। शरीर ज्यों-का-त्यों बना रहता, चेहरे पर हवा भर भी शिकन न होती। तुम्हारे द्वारा जनता का सबसे अधिक कल्याण होता। सिद्धियाँ मिलतीं, स्वरूप मिलता, स्थिति मिलती। यहाँ पहरा लग जाता। जल्दी कोई मेरा दर्शन भी न पाता। अब तो मेरा खुला दरबार हो गया।
महाराजजी जब इसकी चर्चा करते तो अपने शिर के बाल तक उखाड़कर फेंक देते और कहते– ‘‘हो! क्या बतायें! चौदह दिन बीत गये थे। सात ही दिन तो बाकी था, वह भी बीत जाते। भगवान भी इतनी कड़ी परीक्षा लेते हैं। अरे, उनको कह देना चाहिये था कि बेटा, सात दिन और धीरज धर तो उनका क्या बिगड़ जाता? बेटा! आज्ञापालन ही भजन है। आज्ञापालन में गुंजाइश नहीं निकालनी चाहिए। भजन जागृति के पश्चात् इष्ट सदैव साथ-साथ चलते हैं। भगवान ऐसे ही बतियावत हैं जैसे हम तुम बैठकर घण्टों बातें करें और क्रम न टूटे। भजन की यह जागृति सबके लिए सुलभ है। इसके लिये आरम्भ में चाहिये कि एक प्रभु में श्रद्धा स्थिर कर उन प्रभु को पुकारो, उनके दो-ढाई अक्षर के एक नाम का जप करो। चलते-फिरते, खाना खाते, खुरपी चलाते, लड़का खेलाते हर समय उनका स्मरण बना रहे, नामजप चलता रहे।’’
जो धर्म शास्त्र पर आधारित होता है, वह अक्षुण्ण होता है। जो धर्म किंवदंतियों पर, दंतकथाओं पर, रीति-रिवाजों पर आधारित होता है वह कुछ समय बाद तिरोहित हो जाता है। पिछले दो-ढाई हजार वर्षों से यह भारतभूमिवासी दंतकथाओं और रूढ़ियों को धर्म कहते चले आ रहे हैं, जिसके कारण आपके पूर्वजों ने अत्याचारों को झेला, जजिया कर देकर जीवित बचे। धर्म के नाम पर इतनी भ्रान्ति कि विधर्मियों ने कुएँ का पानी दूषित कर दिया जिसे पीकर सभी धर्मभ्रष्ट घोषित कर दिये गये। विश्व को प्रथम धर्मशास्त्र प्रदान करनेवाला भारत अपने ही घर में धर्मशास्त्रविहीन भटकने लगा। विश्व की सबसे समृद्ध भाषा संस्कृत! उसका पठन-पाठन एकांगी हो गया। सिवाय ब्राह्मण के उसे कोई पढ़ नहीं सकता। शिक्षा पर प्रतिबन्ध, शास्त्र पर प्रतिबन्ध, शस्त्र पर प्रतिबन्ध, इतिहास पर प्रतिबन्ध लग गया। लार्ड मैकाले ने कहा– किसी देश को गुलाम रखना हो, हजारों वर्ष गुलाम रखना हो तो उसका इतिहास, शिक्षा, शास्त्र, भाषा और संस्कृति छीन लो। वह स्वाधीन होने की प्रेरणा कहाँ से पायेगा? मैकाले ने नया कुछ नहीं कहा। जो घटना भारत में घट चुकी थी, उसी को योजनाबद्ध तरीके से उसने लागू करा दिया।
आज शास्त्र पुन: आपकी पलकों के सामने है। गीता आपका धर्मशास्त्र है। सृष्टि का यह आदिशास्त्र भगवान के श्रीमुख से प्रसारित है। ७०० श्लोकों का यह शास्त्र मूलरूप से संस्कृत में है। संस्कृत आज हम सबके बोलचाल की भाषा नहीं रह गयी है इसलिए इसके आशय को ज्यों-का-त्यों जानने के लिए इसका यथावत् भाष्य ‘यथार्थ गीता’ गुरु महाराज की प्रेरणा से लिखी गयी है। इसमें है कि एक परमात्मा को श्रद्धा से धारण करना धर्म है। उसे कैसे धारण किया जाय?–इसकी नियत विधि गीतोक्त कर्म का आचरण ही धर्माचरण है। हम कौन हैं? अस्पृश्य हैं या पवित्र? धर्म क्या है? वर्ण क्या है? साधना किस प्रकार की जाय?– इन सारे प्रश्नों का समाधान इस ‘यथार्थ गीता’ से हो जायेगा। यह आपका धर्मशास्त्र है इसलिए सबके पास यह होना चाहिये।
।। ॐ श्री सद्गुरुदेव भगवान की जय ।।
(‘अमृतवाणी भाग-7’ से उद्धृत)