राम कहत चलु भाई रे

राम कहत चलु भाई रे

सोइ पावन सोइ सुभग सरीरा।

जो तनु पाइ भजिअ रघुबीरा।। (रामचरितमानस, ७/९५/२)

बोलो श्रीराम जय राम जय जय राम।

तीर्थाटन साधन समुदाई।

जोग बिराग ग्यान निपुनाई।।

नाना कर्म धर्म ब्रत दाना।

संजम दम जप तप मख नाना।।

भूत दया द्विज गुर सेवकाई।

बिद्या बिनय बिबेक बड़ाई।।

जहँ लगि साधन बेद बखानी।

सब कर फल हरि भगति भवानी।। (रामचरितमानस, ७/१२५/४-७)

सम्पूर्ण तीर्थों का भ्रमण, सम्पूर्ण साधनों का समुदाय, योग और वैराग्य, ज्ञान में दक्षता, मानव-सेवा और संत सत्गुरु की सेवा सब कर फल हरि भगति भवानी।– इन सबका फल है एक हरि की भक्ति! तीर्थों के अवगाहन से, व्रतों के परिपालन से, ये साधन वेदवर्णित हैं। इन सबके अनुष्ठान से जब भक्ति जागृत हो गयी तो फिर उसे तीर्थ अपना फल दे चुके, उस परिधि से आप आगे बढ़ गये हैं। अब शांत-एकान्त में बैठकर चिन्तन करें।

प्राय: लोग सोचते हैं कि सद्गृहस्थ आश्रम में रहते हुए एकान्त कहाँ? लोग भ्रम में पड़ जाते हैं कि पहले घर-द्वार त्यागकर जंगल में जाकर कहीं एकान्त में बैठने से चिन्तन होता है। किन्तु जंगल में भी आप वहीं हैं जहाँ आपका मन है। एकान्त मन में होता है। नाम-जप का अभ्यास बढ़ाने पर इसमें उत्तरोत्तर समय देने के साथ ही मन में एकान्त होने लगता है। इसलिए चलते-फिरते, उठते-बैठते हर समय नाम-जप चलता रहना चाहिए। ईश्वर-पथ की साधना में नाम ही प्रथम है और अन्त में नाम ही परिणाम देकर शान्त हो जाता है। उस स्थिति में भजन हमारा हरि करें, हम पायो विश्राम।– आप पेंशनर हो जायेंगे। उसके पश्चात् नाम जपने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। साधना में लगन अर्थात् रुचि होनी चाहिए। उसके लिए आवश्यक है श्रद्धा और समर्पण! और फिर समर्पण के साथ सदैव चिन्तन करें। इसी आशय का एक प्रेरणादायक पद गोस्वामी तुलसीदासजी का है–

राम कहत चलु, राम कहत चलु, राम कहत चलु भाई रे।

नाहिं तौ भव बेगारि महँ परिहै, छूटत अति कठिनाई रे।।१।।

बाँस पुरान साज सब अठकठ, सरल तिकोन खटोला रे।

हमहिं दिहल करि कुटिल करमचँद, मंद मोल बिनु डोला रे।।२।।

विषम कहार मारमदमाते चलिंह न पाउँ बटोरा रे।

मंद बिलंद अभेरा दलकन पाइय दुख झकझोरा रे।।३।।

काँट कुराय लपेटन लोटन ठावहिं ठाउँ बझाऊ रे।

जस जस चलिअ दूरि तस तस निज बास न भेंट लगाऊ रे।।४।।

मारग अगम, संग नहिं संबल, नाउँ गाउँ कर भूला रे।

तुलसिदास भव त्रास हरहु अब, होउ राम अनुकूला रे।।५।।

इन महापुरुष का कथन है कि राम कहत चलु राम कहत चलु– बस केवल राम कहत चलु भाई रे।बस भैया इतना ही करो कि चलते-फिरते, उठते-बैठते, खाते-पीते, नहाते-धोते– हर समय तुम राम-नाम कहते चलो। ईश्वर का नाम जपने के लिए कोई जगह अपवित्र नहीं होती। कोई फूल बिछाकर बैठ जाय, यदि प्रेमपूरित हृदय से नाम का स्मरण नहीं होता तो वह जगह अपवित्र है। इसलिए हर परिस्थिति में, खेत जोतते हुए, ड्यूटी करते हुए, कारोबार में जाते हुए, पढ़ते हुए, खाना खाते, पानी पीते ‘राम कहत चलु भाई रे’। यदि ऐसा नहीं करोगे तो,

नाहिं तौ भव बेगारि महँ परिहै छूटत अति कठिनाई रे।

भव अर्थात् पैदा होना, जन्म लेना। पुनर्भव अर्थात् फिर पैदा हो जाना, जन्म की पुनरावृत्ति। शरीर गया और फिर शरीर मिला। इन शरीरों का क्रम इतना अधिक है कि भवसागर– जन्म-जन्मान्तरों का एक समुद्र तैयार हो गया। गोस्वामीजी कहते हैं कि यदि राम का सुमिरण नहीं करोगे तो भव बेगारि– आवागमन के बेगार में पकड़ लिये जाओगे, जहाँ से बच निकलना अत्यन्त कठिन है।

बेगार वह श्रम है जिसके बदले में श्रमिक को कोई पारिश्रमिक नहीं मिलता। संसार में लोग जो कुछ भी करते हैं, एक बेगार ही है। पिता बनकर, पुत्र बनकर, माता बनकर, भाई-बन्धु-सम्बन्धी बनकर जो कुछ किया जा रहा है, सब बेगार है। यह तो सृष्टि में जन्म-मरण के सम्बन्ध हैं। उनके व्यवहार पर दृष्टि है, सत्य पर दृष्टि नहीं है।

महाभारत युद्ध में कौरव सेनापतियों ने अभिमन्यु की हत्या कर दी। अर्जुन बौखला गया। अपने पक्ष के महारथियों को उलाहना देता हुआ वह बोला, ‘‘तुमलोग किस बात के शूरवीर हो! तुम सब मिलकर एक बालक की रक्षा भी नहीं कर सके।’’ भीम ने कहा, ‘‘हमलोग पूरे पराक्रम से लड़े लेकिन जयद्रथ के कारण एक कदम आगे नहीं बढ़ सके; क्योंकि जयद्रथ को शंकरजी का वरदान था कि जिस दिन अर्जुन युद्ध में नहीं रहेगा, उस दिन तुम चारो पाण्डवों पर भारी पड़ोगे। उस दिन वह वरदान लड़ रहा था।’’ अर्जुन को लगा कि सारे अनर्थों के मूल में जयद्रथ था इसलिए उसने प्रतिज्ञा की कि कल सूर्य अस्त होने से पूर्व यदि उसने जयद्रथ का वध नहीं किया तो वह दहकती हुई चिता पर बैठकर आत्मदाह कर लेगा।

जब वह प्रतिज्ञा कर चुका तब भगवान ने टोंका, ‘‘अर्जुन! तुम प्रतिज्ञा क्यों करते हो?’’ भगवान का तात्पर्य था कि कर्ता-धर्ता तो मैं हूँ। तू केवल आदेश का पालन करता जा, विजय तुम्हारी है। युद्ध आरम्भ होने से पहले गीता का उपदेश सुनते समय अर्जुन भगवान का विराट स्वरूप देख चुका था। उस समय भगवान ने दिखाया भी था कि वह सूतपुत्र कर्ण, वह जयद्रथ, वे भीष्म और द्रोण अस्त्र-शस्त्र बरसाते हुए बड़े वेग से भगवान के मुख में प्रवेश करते जा रहे थे, कुछ भगवान की दाढ़ी में चिपके दिखाई दे रहे थे। भगवान उन सबको चट करते जा रहे थे। अर्जुन ने पूछा था, ‘‘भगवन्! यह सब क्या है?’’ भगवान ने कहा था, ‘‘ये सब मेरे द्वारा मारे गये मुर्दे हैं। मेरे द्वारा पहले ही मारे गये इन मुर्दों को मार और यश ले। काम मैं कर दूँ, यश तू ले ले, विजय तुम्हारी होगी। कर्ता-धर्ता तो मैं हूँ। तू निमित्त मात्र हो जा। मैं बढ़ा हुआ काल हूँ। तुम युद्ध नहीं करोगे तब भी ये जीवित नहीं बचेंगे।’’

अर्जुन पूर्ण आश्वस्त हो गया। वह भगवान के निर्देशन में युद्ध भी कर रहा था लेकिन जीवन में कभी-कभी कुछ घटनायें ऐसी होती हैं कि मनुष्य अपना संतुलन खो बैठता है। इन परिस्थितियों में सर्वोपरि है पुत्र-मोह! पुत्र-मोह में द्रोणाचार्य की मृत्यु हो गयी। उन्हें वरदान था कि उनके हाथ में शस्त्र रहते हुए उन्हें कोई मार नहीं सकता था। आवश्यकता पड़ने पर भगवान ने उनकी मृत्यु का संयोग उपस्थित कर दिया। एक हाथी का नाम था अश्वत्थामा। वही नाम द्रोणपुत्र का भी था। भगवान ने भीम से कहा, ‘‘उस हाथी को मारकर घोषणा करो कि अश्वत्थामा मारा गया।’’ द्रोणाचार्य विश्वास कर लें, इसके लिए युधिष्ठिर को यह कहने का कार्य सौंपा गया। युधिष्ठिर ने कहा, ‘‘मैं असत्य नहीं बोल सकता। मैं बता दूँगा कि अश्वत्थामा मनुष्य या हाथी मारा गया।’’ भगवान ने कहा, ‘‘आप जैसा कहना चाहते हैं, वैसा ही कहें।’’ योजनानुसार भीम उस हाथी को मारकर उछलने लगा कि अश्वत्थामा मारा गया। द्रोण संशय में थे कि युधिष्ठिर ने भी कहा, ‘‘अश्वत्थामा हतो…’’ वह ‘नरो वा कुंजरो’ कहते, इसके पहले ही भगवान ने शङ्ख बजाकर उनकी आवाज को आगे सुनने नहीं दिया। ‘अश्वत्थामा हतो’– इतना सुनना था कि द्रोण की मुट्ठी ढीली पड़ गयी। धनुष उनके हाथ से गिर गया। वह किंकर्त्तव्यविमूढ़ होकर युद्धभूमि में युद्ध से विरत होकर बैठ गये। इतने में उनका गला कट गया। पुत्रमोह में महाराज दशरथ मर गये। पुत्रमोह में ही अंधे धृतराष्ट्र ने अपने सौ पुत्रों को इस दुराशा में मरवा डाला कि वे और समृद्धिशाली राजा हों, जबकि उनके पास कोई कमी नहीं थी। एक बाप की सारी ममता पुत्र पर होती है। आदि शंकराचार्य के शब्दों में–

के शत्रवो मित्रवदात्मजाद्या: (प्रश्नोत्तरी, २९)

शत्रुओं में भी सबसे दुर्जय शत्रु जो मित्र की तरह प्रतीत होते हैं, कौन हैं? उन्होंने स्वयं बताया– अपनी आत्मा से उत्पन्न पुत्र इत्यादि! इसीलिए अर्जुन भी पुत्र-मोह से विचलित होकर भूल गया कि कर्ता-धर्ता तो भगवान हैं, मैं तो उनके हाथ का यंत्र मात्र हूँ। उसने भगवान से पूछा भी नहीं और तैश में आकर प्रतिज्ञा कर बैठा।

भगवान ने टोका, ‘‘अर्जुन! तुमने प्रतिज्ञा क्यों की?’’ अर्जुन ने कहा, ‘‘केशव! प्रतिज्ञा तो मैं कर चुका।’’ श्रीकृष्ण बोले, ‘‘अरे, विचार तो कर लो। प्रतिज्ञा से भी अधिक कल्याणकारी विकल्प हो सकते हैं। इससे भी अच्छा परिणाम निकल सकता है। विचार तो कर लो कि समस्या क्या है?’’ अर्जुन ने कहा, ‘‘कुछ नहीं केशव! रथ को युद्धभूमि की ओर ले चलिये।’’ भगवान ने कहा, ‘‘अरे, सोच तो ले!’’ अर्जुन बोला, ‘‘बस प्रभो! प्रण पूरा होना चाहिए।’’ भगवान ने कहा, ‘‘हमें क्या? मैं रथ ले चलता हूँ।’’

दूसरे दिन भगवान ने कुछ दूर रथ दौड़ाया और उसे खड़ा कर दिया। अर्जुन ने पूछा, ‘‘प्रभो! क्या हुआ?’’ श्रीकृष्ण ने कहा, ‘‘घोड़े थक गये हैं। इन्हें आराम चाहिए, इनको मालिश चाहिए, इन्हें पानी चाहिए।’’ अर्जुन महान पराक्रमी था। उसने धरती में बाण मारकर तत्काल जलस्रोत बना दिया। बाणों का ऐसा घेरा डाल दिया कि श्रीकृष्ण, रथ और घोड़े सभी सुरक्षित हो गये। कौरवों ने कहा, ‘‘दो दिन पहले हम सब महारथियों ने अभिमन्यु को मार डाला था, जबकि वह रथ पर था। आज उसका पिता अर्जुन पैदल है। इसे इसी समय मार डालो।’’ कौरव सेना ने हमला कर दिया। अर्जुन फिर अर्जुन था! उसने दिव्य अस्त्रों से सबको तितर-बितर कर दिया। दो घड़ी तक भगवान मन बहलाते रहे (ढाई घड़ी का एक घण्टा होता है), तब वह बोले, ‘‘अर्जुन! रथ तैयार है।’’ अर्जुन लपककर रथ पर चढ़ गया।

यहाँ वहाँ कुछ देर तक रथ दौड़ाकर भगवान ने कहा, ‘‘अर्जुन! तुम्हें ज्ञात है कि जयद्रथ यहाँ से बारह कोस दूर है। बीच में कौरवों की व्यूहबद्ध सेना खड़ी है। इन सबको मारने-काटने के पश्चात् ही जयद्रथ तक पहुँचा जा सकता है।’’ अर्जुन ने कहा, ‘‘भगवन्! वह दुष्ट चाहे समुद्र पार ही क्यों न हो, आप रथ ले चलिए।’’ रथ चल पड़ा। भगवान ने सोचा, व्यर्थ का इतना श्रम क्यों किया जाय? जरा-सी तो बात है– जयद्रथ-वध! ऐसा कुछ उपाय करूँ कि स्वयं जयद्रथ मरने के लिए यहीं चला आये। भगवान ने रथ खड़ा कर दिया। अर्जुन ने कहा, ‘‘भगवन्! अब क्या हुआ?’’ भगवान बोले, ‘‘अर्जुन! सूर्य अस्त हो गया।’’

युद्ध रुक गया। कौरव सेना में हर्ष की लहर दौड़ गयी। अर्जुन के लिये चिता तैयार हो गयी। अर्जुन चिता पर बैठ गया। आग लगाने के उपक्रम होने लगे। अर्जुन धैर्य खोकर बोल पड़ा, ‘‘वाह! कैसा कह रहे थे ‘निमित्त मात्रं भव सव्यसाचिन्’– अर्जुन! तुम निमित्त बनकर खड़े भर रहो। कर्ता-धर्ता तो मैं हूँ। विजय तुम्हारी होगी। कैसी बड़ी-बड़ी डींगे हाँक रहे थे। मुझे अपने इस अन्त का पता होता तो मैं आप पर विश्वास ही क्यों करता? अब हम मान गये कि भगवान कुछ नहीं, गुरु कुछ नहीं होता, भाग्य ही बलवान है। अब तो अपना बैर साधने के लिए मुझे फिर से जन्म लेना होगा।’’ भगवान शिर झुकाते जा रहे थे, अर्जुन खरी-खोटी सुनाता जा रहा था।

शकुनि ने कहा, ‘‘प्रिय दुर्योधन! ध्यान से इस ग्वाले की ओर देखो। इसका शिर कैसा लटकता जा रहा है! इसका सारा ज्ञान समाप्त हो गया लगता है। ऐसा करो, जयद्रथ को बुला लाओ। प्रिय भांजे! पुत्र के जन्म पर जो सुख होता है, उससे भी सहस्रों गुना सुख संकट में पड़े हुए शत्रु को मरते हुए देखकर होता है। जा, उसे शीघ्र बुला।’’ जयद्रथ भी सुख भोगने चला आया। वह अर्जुन के ठीक सामने खड़ा होकर बोला, ‘‘गाण्डीवधारी अर्जुन! प्रण पूरा करो। वीर! शीघ्र जलो। इस ग्वाले के माथे फूल रहे थे। दिव्य अस्त्रों के ज्ञाता अर्जुन! द्रोणशिष्य! प्रतिज्ञा पूरी करो।’’

भगवान ने धीरे से गर्दन उठाया। उन्होंने देखा कि जयद्रथ सबसे अलग अर्जुन के ठीक निशाने पर खड़ा है। वह बोले, ‘‘अर्जुन! तुम यह भी भूल गये कि एक शूरवीर महारथी कैसे चितारोहण करता है। वीर आसन से बैठकर जिस बाण से शत्रु का वध करना था उसका संधान करो, शत्रु के गले का निशाना साध कर, प्रत्यंचा खींचकर एक वीर की तरह चितारोहण करो।’’ कौरव बहुत हँसे। उन्होंने कहा, बेचारा मरने जा रहा है लेकिन यह उपदेश देने से अब भी बाज नहीं आ रहा है। है तो ग्वाला लेकिन यह बुद्धि का बड़ा चपल है। अर्जुन भी भुनभुनाया कि अब वीर आसन से मरूँ या वैसे, जलना ही तो है। किन्तु बाल्यकाल से ही आज्ञाकारी सेवक होने से अर्जुन ने आदेश का पालन किया। ज्योंही उसने वीरासन से बैठकर निशाना साधा, भगवान ने कहा, ‘‘अर्जुन! देख वह सूर्य और यह रहा जयद्रथ। मार पापी को, निकलने न पाये।’’

जयद्रथ का गला कट गया। भगवान ने कहा, ‘‘इसका सिर पृथ्वी पर गिरने न पाये, दिव्यास्त्रों से इसे आकाश में ही रोके रखना। इसके पिता उस जलाशय में संध्या-वंदन कर रहे हैं। जब वह अंजलि में जल लेकर तर्पण कर रहे हों उसी क्षण इसका मुख नीचे रखते हुए उनकी अंजलि में डाल दो जिससे वह इसे पहचान न सकें।’’ अर्जुन ने दिव्यास्त्रों का प्रयोग कर वैसा ही कर दिया। शिर हथेली में गिरते ही वह वयोवृद्ध बिगड़े– मर पापी! यही समय था तुम्हें हमारे हाथ में गिरने का! ज्योंही वह शिर नीचे गिरा, एक विस्फोट हुआ। उस पिता के सहस्रों टुकड़े हो गये। जयद्रथ के पिता ने भी वरदान प्राप्त किया हुआ था कि जब वह कहें तभी उसके पुत्र की मृत्यु हो और जो भी उसके पुत्र का शिर जमीन पर गिराये, उसके भी शिर के सहस्रों टुकड़े हो जायँ। कोई पिता क्या कभी कहता है कि उसका पुत्र मर जाय? भगवान ने ऐसा अवसर उपस्थित कर दिया कि उसने कह दिया और स्वयं उसके ही सहस्रों टुकड़े हो गये। यही है कि जाके रथ पर केसो, ता कहँ कौन अँदेशो।

प्रतिज्ञा तो पूरी हो गयी लेकिन अर्जुन को यह बड़ी मँहगी पड़ी। युद्ध जब समाप्त हो गया, भगवान ने अर्जुन से कहा, ‘‘हमारे बहुत से भक्त हैं। चलें उनकी परीक्षा हो जाय कि वे कैसे भक्त हैं?’’ अर्जुन को गर्व था कि मैं ही सर्वोपरि भक्त हूँ। भगवान ने स्वयं तो सन्त का वेष बनाया, अर्जुन को अपना शिष्य बना लिया, साथ में एक शेर को पालतू बनाकर ले लिया और मणिपुर के समीप रत्नपुर के महाराज मोरध्वज के पास पहुँचे। मोरध्वज ने स्वयं सिंहासन से उठकर महर्षि का स्वागत-सत्कार किया, उनके चरण पखारे, बैठाया और आग्रह किया, ‘‘भगवन्! सेवा’’ सन्त ने कहा, ‘‘राजन्! केवल भिक्षा! किन्तु पहले भिक्षा हमारा शेर ग्रहण करेगा।

राजा ने कहा, ‘‘जो आज्ञा भगवन्! वधशाला से मांस आ जायेगा।’’ उन महात्मा ने कहा, ‘‘नहीं, वधशाला का मांस हमारा शेर नहीं खाता। तुम कोई अपनी वस्तु दो। राजा ने कहा, ‘‘मैं अपना शिर देने को प्रस्तुत हूँ।’’ महात्मा वेषधारी भगवान ने कहा, ‘‘तुम जीवित रहो…..और किसी को दे दो। अपने पुत्र को दे दो।’’ मोरध्वज ने कहा, ‘‘पुत्र पर आधा अधिकार हमारा है, हमने अपना हिस्सा अर्पण किया, आधा महारानी साहिबा का है।’’ महारानी ने कहा, ‘‘जब आपने दे दिया तो मैंने भी दे दिया।’’ उन महात्मा ने कहा, ‘‘राजकुमार का वध कौन करेगा? आपलोग ही इसे मारें। एक बात और, मेरा शेर दाहिने अंग का मांस खाता है इसलिए आपलोग इसे आरे से चीरिए।’’

राजदम्पत्ति आरा लेकर खड़े हुए। माँ का हृदय तो बच्चों में बसा रहता है। महारानी की आँखों में अश्रु छलक आये। भगवान ने कहा, ‘‘यह रो-धोकर दी हुई भिक्षा हमारा शेर नहीं करेगा।’’ महारानी ने कहा, ‘‘भगवन्! पुत्र तो जा ही रहा है, धर्म भी जाना चाहता है। ऐसी कृपा करें कि मेरे आँसू जमीन पर न टपकने पायें।’’ अश्रु रुक गये। बालक का दाहिना अंग शेर को दे दिया, वामांग महल के भीतर रखवा दिया। दोनों महात्माओं का भोजन आया तो उन्होंने कहा, ‘‘राजन्! पुत्र के लिये भी भोजन परोसो।’’ एक थाली उसके लिये भी आ गयी। उन्होंने आनाकानी नहीं की कि अभी तो आधा काटकर शेर को खिला दिया, किसके लिए थाल लगाऊँ? महात्मा ने कहा, ‘‘नाम लेकर पुत्र को बुलाओ।’’ महारानी ने बुलाया तो बालक भीतर से दौड़ता हुआ आ गया और उन महात्माओं के साथ भोजन करने लगा।

श्रीकृष्ण तो भोजन करने लगे किन्तु अर्जुन का हाथ जहाँ का तहाँ रुका ही रह गया। वह बोला, ‘‘भगवन्! जब इतनी क्षमता आप में है कि आधा अंग शेर खा गया, फिर भी आपने इसे जीवित कर दिया तब आपने हमारे अभिमन्यु को क्यों नहीं जिलाया?’’ भगवान बोले, ‘‘अर्जुन! तुमने हमारी सुनी कब थी? हमने कहा था, अर्जुन! विचार तो कर लो, इससे भी अच्छा परिणाम निकल सकता है; लेकिन तू कह रहा था– नहीं केशव! प्रण पूरा होना चाहिए, अब तो मैं प्रतिज्ञा कर चुका हूँ।’’ अर्जुन ने कहा, ‘‘प्रभो! मुझसे महान भूल हो गयी। क्या अब भी कोई उपाय है?’’ भगवान ने कहा, ‘‘अर्जुन! समय बहुत व्यतीत हो गया है, अब वह जीवित तो नहीं हो सकता। हाँ, तुम उसे देख अवश्य सकते हो।’’ अर्जुन ने कहा, ‘‘केशव! प्रिय अभिमन्यु को दिखा ही दीजिए।’’

मोरध्वज से विदा लेकर भगवान अर्जुन को एक रथ में बिठाकर दिव्य वायुमण्डल से गुजरते हुए वहाँ ले गये जहाँ एक भव्य आसन पर अभिमन्यु विराजमान था। पुत्र को देखते ही अर्जुन रथ से कूद पड़ा, भगवान से अनुमति भी नहीं ली और ‘प्रिय अभिमन्यु’, ‘प्रिय पुत्र’ कहता लगा दौड़ लगाने! अभिमन्यु ने शिर उठाकर देखा तो बोला, ‘‘भगवान के धाम में भी पिता-पुत्र! कौन हो तुम?’’

अर्जुन ने सोचा– सात-सात महारथियों ने इसके शिर पर एक साथ प्रहार किया था। प्रतीत होता है इसकी स्मृति लुप्त हो गयी है। इसकी माँ का नाम लें तो अभी सब कुछ याद आ जायेगा। उसने पुकारा, ‘‘सुभद्रापुत्र अभिमन्यु!’’ अभिमन्यु बोला, ‘‘न मैं सुभद्रापुत्र हूँ और न ही तुम्हारा बेटा हूँ। सात बार मैं पिता और तुम पुत्र हुए। केवल एक बार तुम पिता और मैं पुत्र हुआ। आठ जन्मों से हमारे बदले चले आ रहे हैं। इन भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से मैं अपना स्वरूप, अपना धाम प्राप्त कर सका हूँ। तुम भी इनकी शरण जाओ, अन्यथा हजारों जन्मों तक ‘हाय बेटा’, ‘हाय बेटा’ कहकर बिलखते ही रहोगे।’’ उस दिन से अर्जुन का मोह छूटा। फिर तो अर्जुन ने इतना चिन्तन किया कि वह सो भी जाता तो उसके रोम-रोम से ओम्-ओम् की ध्वनि प्रवाहित होती थी। यह गुण या तो हनुमानजी में था (हनुमानजी के भी रोम-रोम से राम-राम की ध्वनि प्रवाहित होती थी) या फिर अर्जुन में यह गुण आया।

सारांशत: पुत्रमोह अन्तिम क्षणों तक पीछा करता है। अभिमन्यु यदि बदला चुका रहा था तो हमारा भी संसार में है ही क्या? संसार में जीव किसी का पिता तो किसी का पुत्र या सम्बन्धी बनकर अपना बदला ही चुकाता है। जिस क्षण एक बदला पूर्ण होता है, दूसरे ही क्षण अन्य बदलों की ओर जीव की यात्रा बढ़ जाती है। इस अंतहीन यात्रा को विराम देनेवाला साधन है प्रभु का नाम। इसीलिए इन महापुरुष का कहना है–

राम कहत चलु राम कहत चलु राम कहत चलु भाई रे।

मेरे भाई! अभी से राम कहते चलो। यदि ऐसा नहीं करोगे तो,

नाहिं त भव बेगारि महँ परिहै, छूटत अति कठिनाई रे।

अन्यथा आवागमन की बेगार में पड़ जाओगे जिससे छूट पाना अत्यन्त कठिन है। बेगार वह श्रम है जिसे विवशता में करना पड़ता है। इसमें श्रमिक अपना खाता-पीता है, श्रम दूसरों के लिए करता है जिसका कोई पारिश्रमिक नहीं मिलता। राजा या जमींदार की बेगार दो-चार दिनों की होती रहती है। बेगार करनेवाला कुछ दिनों बाद पुन: स्वतन्त्र रहता है किन्तु संसार के सम्बन्धों का बेगार जन्म-जन्मान्तरों तक चलता ही रहता है, आपस के बदले चलते ही रहते हैं।

एक महात्मा रामेश्वरम जा रहे थे। रास्तें में उन्हें छ: डाकुओं ने घेर लिया। महात्मा ने कहा, ‘‘मेरे पास जो कुछ है, सब ले लो लेकिन मुझे रामेश्वरम जाने दो। लौटकर आने पर भी हमारे पास जो कुछ रहेगा, वह सब ले लेना।’’ डाकुओं ने कहा, ‘‘नहीं महाराज! हमलोग आपका वध करेंगे, तभी लेंगे।’’ महात्मा ने कहा, ‘‘मेरा वध करने से तुम्हें क्या मिलेगा?’’ दस्युओं ने कहा, ‘‘हमलोगों का नियम है कि अपने शिकार को काटे बिना उसकी सम्पत्ति नहीं लूटते।’’ महात्मा ने कहा, ‘‘ठीक है, हमें आधा घण्टा भजन कर लेने दो, फिर काट डालना।’’

वह महात्मा भजन में बैठ गये। उन्होंने भगवान से पूछा, ‘‘प्रभो! जब मैं सब कुछ दे रहा हूँ फिर ये मुझे क्यों काटना चाहते हैं?’’ भगवान ने कहा, ‘‘बेटा! पिछले जन्म में तुमने इन छहों को काटा था। यदि तू इस जन्म में भजन न करता तो तुम्हें छ: बार जन्म लेना पड़ता और यह लोग छ: बार तुम्हें काटते। यह भजन का ही प्रभाव है कि सब साथ होकर एक ही स्थान पर आ गये, एक बार तुम्हें काटेंगे, फिर छहों बार के बदले समाप्त हो जायेंगे। पुन: जब तुम जन्म लोगे, ठाट से भजन करना।’’ महात्मा बहुत प्रसन्न हुए। भजन से निवृत्त होकर उन्होंने डाकुओं से कहा, ‘‘चलो, अब मैं तैयार हूँ। आपलोग शीघ्रता करें।’’

दस्युओं ने कहा, ‘‘महाराज बात क्या है? पहले तो आप इतने उदास थे, अब इतना प्रसन्न क्यों हैं?’’ महात्मा ने कहा, ‘‘इसे जानकर तुमलोग क्या करोगे? इसे तुमलोग समझ भी नहीं सकोगे। चलो, जल्दी करो। उठाओ खड्ग।’’ डाकुओं ने कहा, ‘‘महाराज! जब तक आप बतायेंगे नहीं तब तक हम काटेंगे ही नहीं, न आपको जाने देंगे चाहे महीना ही क्यों न बीत जाय।’’ महात्मा ने कहा, ‘‘आप अपना काम करो।’’ दस्युओं ने कहा, ‘‘चाहे बरस बीत जाय, जब तक आप बतायेंगे नहीं, तब तक हम नहीं काटेंगे और न जाने ही देंगे।’’

महात्मा ने बताया, ‘‘बेटा! भगवान से हमने यही पूछा था कि जब मैं इन्हें सब कुछ दे रहा हूँ तो ये हमें काटना क्यों चाहते हैं? इस पर भगवान ने कहा कि पिछले जन्म में मैंने तुम सबको काटा था। मैं छ: बार जन्म लेता और तुम बारी-बारी से छ: बार मुझे काटते तब वह बदला पूरा होता। किन्तु राम-नाम के प्रभाव से तुम सब आज एकत्र हो गये हो। अब हमें एक बार कटना पड़ेगा, हमारा बदला समाप्त हो जायेगा।’’

दस्युओं ने कहा, ‘‘जब यह बदला ही है और जब तक संस्कार समाप्त नहीं होते, बदले किसी न किसी रूप में चलते ही रहेंगे तो हमलोग आपको नहीं काटेंगे। आप हमें भी वह युक्ति बताने की कृपा करें जिससे हमारे संस्कार समाप्त हों। जंगल में भटककर हमलोगों ने बहुत सारे संस्कार अर्जित किये हैं। कृपया हमें भी उनसे निवृत्ति दिलायें। हमें अपना शिष्य बना लें।’’ वे सभी सन्त हो गये।

सारांशत: संसार में जो कुछ है, बेगार है। घोर परिश्रम से अर्जित की हुई मान-प्रतिष्ठा-वैभव सब यहीं छूट जाता है। इस व्यवस्था को कोई मरने के बाद देखने भी नहीं आता,

कबिरा अपनी नौबत दिन दस लेहु बजाइ।

सोइ पुर पाटन सो गली बहुरि न देखा आइ।।

लौटकर कोई नहीं देखता। अगले जन्मों में दूसरे ही माता-पिता, दूसरे ही पुत्र-सम्बन्धी, अलग इज्जत, अलग ही रहन-सहन– सब कुछ बदल जाता है। यहाँ की बेगार करते ही रहेंगे– नाहिं तौ भव बेगारि महँ परिहै, छूटत अति कठिनाई रे।अग्रेतर पंक्तियों में बताते हैं कि शरीर है क्या?

बाँस पुरान साज सब अठकठ, सरल तिकोन खटोला रे।

यह शरीर सीधा तिकोन खटोले जैसा है। पाँव के दो कोने और बीच में शिर! एक तिकोना खटोला (तीन गुणों से संचालित शरीर) है। बड़ी पुरानी बाँस-बल्लियाँ इसमें लगी हैं। जन्म-जन्मान्तरों के पुराने संस्कार इकट्ठे होकर, सब सिमटकर इस शरीर का निर्माण करते हैं। इसके सभी साज अंट-संट, अव्यवस्थित, बेतरतीब, कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा जैसे है। इसे कभी भोग प्यारा लगता है तो कभी योग रुचिकर लगता है। कभी यह लोभ-मोह-राग-द्वेष-काम-क्रोध में बहकने लगता है तो कभी यह धारणा-ध्यान-श्रद्धा-समर्पण और चिन्तन में चलने लगता है। जब जैसे संस्कार उदित होते हैं, व्यक्ति वैसा ही आचरण कर बैठता है। ऐसा शरीर क्यों मिला?

हमहिं दिहल करि कुटिल करमचँद मंद मोल बिनु डोला रे।

हमारे ही किये हुए किसी जन्म के कुटिल कर्म हमें बार-बार संसार में डालते हैं। इसका प्रारब्ध अत्यन्त मंद है। तामस प्रधान शरीर होने से बुरे कर्म स्वभावत: होते हैं। यह मोल बिनु– किसी मूल्य का नहीं है। कोई आदमी काम का नहीं होता है तो लोग कहते हैं, यह दो कौड़ी का भी नहीं है। यह इतना क्षणभंगुर, नश्वर कि साधारण-सी ठोकर से समाप्त। यह बिना मोल का डोल रहा है। इस शरीर की चाल कैसी है?

विषम कहार मार मद माते चलिंह न पाउँ बटोरा रे।

शरीर एक खटोला, एक पालकी! इसको ले चलनेवाले कहार पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। इनकी जोड़ी नहीं है, विषम हैं। ये एक दिशा में नहीं चलते, अपने-अपने विषयों की ओर भागते हैं। कभी इनकी सजातीय प्रवृत्ति है तो कभी विजातीय। समभाव से ये चल ही नहीं सकते। आँख दृश्य देखना चाहती है, कान मधुर शब्द सुनना चाहते हैं, त्वचा अनुकूल स्पर्श तो रसना अनुकूल भोजन चाहती है। न्यारो न्यारो भोजन चाहैं, पाचों अधिक सवादी।इनको अपने-अपने स्वाद का भोजन चाहिए। ये जैसी भावना देते हैं, शरीर को वैसा ही जाना पड़ता है। ये कहार काम के मद में मतवाले हैं, विषय-भोगों के पीछे मतवाले हो रहे हैं। ये चलहिं न पाउँ बटोरा रे। कहार कदम से कदम मिलाकर एक दिशा में बढ़ते हैं किन्तु इन्द्रियरूपी कहार अपने-अपने विषयों की ओर दौड़ते हैं। जिससे,

मंद बिलंद अभेरा दलकन पाइय दुख झकझोरा रे।

ये विषम कहार कभी मंद अर्थात् नीचे, कभी बिलंद अर्थात् ऊँचे चलते हैं जिससे अभेराअर्थात् धक्का और दलकनअर्थात् झटका लग रहा है। इस खींचतान में जीव को बड़ा दु:ख हो रहा है। कभी सन्तों में श्रद्धा तो कभी अश्रद्धा जीव को झकझोर कर रख देती है। इन्द्रियों और मन की वृत्ति एक दिशा और दशा में, एक धारा में नहीं है। सांसारिक विषय-भोगों की मृगतृष्णा में कदम-कदम पर कठिनाइयाँ हैं।

काँट कुराय लपेटन लोटन ठावहिं ठाउँ बझाऊ रे।

विषय-भोगों के मार्ग में काँटे बिछे हैं, सुख के साथ दु:ख लगा है, कुराय अर्थात् कंकड़ पड़े हैं। सुख के प्रलोभन में कोई काँटा, कहीं कंकड़ चुभ जाता है, व्यक्ति अपना कदम पीछे खींच लेता है। इसमें सांसारिक सम्बन्धों के मोह और ममता की बेल व्यक्ति को लपेट लेती है। लोटन– रेंगनेवाले सर्प इत्यादि जीव-जन्तु कामना, तृष्णा और चिन्ता उत्पन्न करके पथिक को उलझा देते हैं। इतना ही नहीं,

जस जस चलिअ दूरि तस तस निज बास न भेंट लगाऊ रे।

इस भव-बेगार में जैसे-जैसे व्यक्ति आगे बढ़ता है, रास्ता और भी लम्बा होता जाता है, अपना घर दूर होता चला जाता है। न भेंट लगाऊ रे– अपने घर से भेंट करानेवाला, परमात्म-पथ को बतानेवाला भी नहीं है। संसार के लोग तो विषयासक्ति में ही अनुरक्त हैं, वही बताते हैं।

 मारग अगम संग नहिं संबल नाउँ गाउँ कर भूला रे।

अपने धाम का मार्ग अगम है। विषयों के झाड़-झंखाड़ गृह कारज नाना जंजाला– ऐसे दुर्गम पहाड़ और जंगल से भरा है; मन, बुद्धि के बल पर इस रास्ते पर चला नहीं जाता, मन और बुद्धि का निरोध करते हुए ही इस राह पर बढ़ा जा सकता है; क्योंकि वह परमात्मा अचिन्त्य है, अगोचर है। संग नहिं सम्बल– साथ में कोई सहारा देनेवाला भी नहीं है, न पुण्य पुरुषार्थ, न मार्गदर्शक सद्गुरु जो ‘‘लाद दे लदाय दे और साथ चले, यदि गठरिया गिर जाई तो कौन लदायेगा?’’–जैसा पूज्य गुरुदेव कहा करते थे। नाउँ गाउँ कर भूला रे– माया-मोह में भूले जीव को अपने गन्तव्य गाँव का नाम भी भूल गया है कि उसे जाना कहाँ है, पहुँचना कहाँ है? तुलसीदासजी अंत में भगवान से प्रार्थना करते हैं–

तुलसिदास भव त्रास हरहु अब होउ राम अनुकूला रे।

प्रभो! अपने बल पर तो हम चल चुके। हे भगवन्! भव त्रास हरहु– आवागमन की विपदा हर लीजिए और होउ राम अनुकूला रे– आप अनुकूल हो जायँ। जब प्रभु अनुकूल हो जाते हैं तो,

गरल सुधा रिपु करहिं मिताई।

गोपद सिंधु अनल सितलाई।। (रामचरितमानस, ५/४/२)

गरल अर्थात् विष अमृत में परिवर्तित हो जाता है, शत्रु मित्र हो जाते हैं, अथाह भवसागर गाय के खुर रखने से बने गड्ढे में भरे हुए जल जितना रह जाता है। कब?

गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही।

राम कृपा करि चितवा जाही।। (रामचरितमानस, ५/४/३)

गरुड़जी! जब भगवान कृपा करके देख लेते हैं तो यदि किसी के शिर पर पहाड़ गिरनेवाला है तो वह रजकण जितना स्वल्प होकर निकल जायेगा। वह पहाड़ शिर पर आयेगा अवश्य; वह किसी ने फेंका नहीं है बल्कि वह किसी जन्म की हमारी ही कमाई है जो पहाड़ बनकर हमारे ऊपर गिरने आ रहा है किन्तु वह भारहीन होकर निकल जायेगा। कब? जब प्रभु की सीधी अनुकम्पा हो जाती है। ईश्वर-पथ में यम, नियम, आसन, प्राणायाम इत्यादि की लम्बी-चौड़ी साधनायें हैं किन्तु सर्वोपरि साधना और साधना का आरम्भ नाम से है। यह नाम भी अंत में लक्ष्य का दर्शन कराकर ही शान्त होता है, अन्त तक साथ देता है। इसलिए नाम का जप अनिवार्य है। खाते-पीते, उठते-बैठते, चलते-फिरते नाम याद आया करे तो सोने में सुहागा है।

एक सेठजी थे। नाम जपने में उनका इतना मन लग गया कि दुकान-दौरी सब चौपट हो गयी। घरवाले लगे झाँव-साँव करने। सेठानी कहती– क्या बताऊँ बहनजी! हमारे सेठजी की तो बुद्धि ही भ्रष्ट हो गयी। जब देखो तब माला टालते रहते हैं। सेठ ने गुरु महाराज से पूछा– प्रभो! घरवालों ने तो जीना मुश्किल कर दिया है। कोई उपाय बतायें। गुरु महाराज ने कहा– घरवालों को दिखाने के लिए कहीं छोटी-मोटी दुकान खोल लो। सेठ ने एक ऐसी गली में दुकान खोली जिसमें लोगों का आना-जाना बहुत कम होता था। सेठ ने सोचा, इस गली में कोई आयेगा नहीं, हम शान्ति से बैठकर भजन करेंगे और घरवाले भी समझेंगे कि आखिर सेठ कुछ तो कर रहे हैं।

भगवान का मन! उस क्षेत्र में जितने भी ग्राहक थे, उसी दुकान पर आने लगे। लोगों में एक धारणा घर कर गयी कि चाहे पाँच साल का बच्चा सामान ले आये सेठ कम नहीं तौलते, अधिक पैसा नहीं लेते। भले ही कोई भूल जाय, सेठ उसका अनुचित लाभ नहीं लेते और सामान भी सबसे अच्छा देते हैं। जनमानस में उनकी एक साख जम गयी। दिनभर तौलते-तौलते सेठ परेशान हो जाया करते कि भगवन्! यह किस जन्म का पाप प्रकट हो गया है जिससे आपका पवित्र नाम छूट जाना चाहता है।

रात को दुकान बन्द कर सेठ लोटा लेकर नित्यक्रिया से निवृत्त होने नाले की ओर निकल जाते। नाले में बैठकर वह शौच करते और उसी समय राम-राम-राम-राम जपना आरम्भ करते। ऐसा करने में रात्रि के बारह बज जाते। दिनभर की छटपटाहट कि नाम नहीं जप पा रहे हैं, जब शान्त होती तो कभी-कभी रात्रि के एक भी बज जाते थे। जब दिनभर का जप पूरा होता, मन को सन्तोष हो जाता तब वह घर आते और रूखा-सूखा जो भी उनके लिये ढँककर रखा रहता, उसी को खाकर बड़े सबेरे पुन: अपने काम पर चले जाया करते थे। उनका यह अभ्यास दीर्घकाल से चल रहा था। सेठजी की साधना उन्नत हो चली थी।

एक बार नाम जपते सेठ पर हनुमानजी की दृष्टि पड़ गयी। उन्होंने सोचा– यह बनिया बक्काल की जात! हमारे प्रभु के पवित्र नाम को भी भ्रष्ट करने में लगा है। दिन के पूरे चौबीस घण्टे पड़े हैं। भला टट्टी फिरते समय ही इसको नाम जपना था। ऐं…..इसे थोड़ी नसीहत दे दूँ। उन्होंने उसकी पीठ पर एक लात मारी। केवल इतना ही बल लगाया कि यह मुँह के बल गिर जाय, बहुत हो तो इसके दो-चार दाँत टूट जायँ। लेकिन बनिया टस से मस नहीं हुआ। वह उसी तरह शान्त बैठकर राम-राम जपता रहा।

हनुमानजी को रोष आ गया कि हमारी लात लगी और यह हिला तक नहीं! तब उन्होंने दुपट्टा फेंका, लगाया दण्ड-बैठक, शरीर को विशाल बनाया और उछलकर वह लात मारी जिसका प्रहार कभी मेघनाद और कुम्भकर्ण की छाती पर किया था। फिर भी वह बनिया टस से मस नहीं हुआ और शान्ति से राम-राम जपने में लगा ही रह गया।

उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन– तुरन्त हनुमान में प्रेरणा हुई कि अरे! हमने किस कुपात्र को छू दिया। लो, हम भी अशुद्ध हो गये। अब तो भगवान की सेवा में पहुँचने में भी देर हो जाना चाहता है। हनुमान ऐसे सेवक थे जिन्हें सेवा में कभी देर हुई ही नहीं। अर्द्धरात्रि को आदेश मिला कि सूर्योदय से पहले संजीवनी चाहिए तो उससे पहले ही ले आये। उन्होंने तुरन्त दौड़कर सरयू में एक डुबकी लगायी, पवित्र हुए और भगवान की सेवा में जा पहुँचे।

किन्तु आज तो वहाँ का वातावरण ही कुछ और था। पूरा महल झनझना रहा था, रामजी आह-आह कराह रहे थे। राजवैद्य उपचार में लगे थे। हनुमान ने कहा, ‘‘प्रभो! ऐसा कौन-सा रोग हो गया?’’ भगवान ने कहा, ‘‘हनुमान! पूछो मत, आज हम लात ही लात बहुत मारे गये हैं।’’ हनुमान तुरन्त आवेश में आ गये, ‘‘प्रभो! सृष्टि में ऐसा कौन जीवित है जो आपकी ओर लात उठाये? आप बता भर दें, मैं अभी उसका सफाया किये देता हूँ।’’ भगवान ने कहा, ‘‘अरे हनुमानजी, आपने ही तो मारा था।’’ हनुमान बोले, ‘‘प्रभो! सेवक से इतनी बड़ी भूल कैसे हो सकती है? रामजी बोले, ‘‘क्या उस बनिये को नहीं मारा था?’’ हनुमान चकित हो बोले, ‘‘लेकिन प्रभो! वह आपको कैसे लग गयी?’’ भगवान बोले, ‘‘देख हनुमान!

जननी जनक बंधु सुत दारा।

तन धनु भवन सुहृद परिवारा।।

सब कै ममता ताग बटोरी।

मम पद मनहि बाँध बरि डोरी।। (रामचरितमानस, ५/४७/४-५)

जननी माने माता, जनक माने पिता, बंधु, सुत, प्रिय परिवार, परम हितैषी, इज्जत-प्रतिष्ठा– इन सबमें ममत्व के जो धागे लगे हुए हैं, उन धागों को समेटकर सबकी एक रस्सी बनाकर अपने मन को जो मेरे चरणों में बाँध देता है–

अस सज्जन मम उर बस कैसे।

लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसे।। (रामचरितमानस, ५/४७/७)

ऐसा सज्जन मेरे हृदय में उसी प्रकार निवास करता है जैसे लोभी के हृदय में धन निवास करता है। हनुमानजी! वह ममत्व के धागों को समेटकर मन को मेरे चरणों में बाँधकर बैठा था। वह मेरे हृदय में था। उसके कवच के रूप में मैं था। आपने जमकर जितने प्रहार किये, वे मुझको ही झेलने पड़े। हमारी तो कमर टूट गयी और कहते हो किसने मारा?’’

हनुमान भागकर सेठ के पास गये और बोले, ‘‘सेठ! तुम धन्य हो, तुम भाग्यवान हो।’’ सेठ का ध्यान टूटा। उसने देखा, हनुमानजी सामने खड़े हैं। वह तुरन्त उनके चरणों में साष्टांग लेट गया और कहा, ‘‘प्रभो! आप कब आये?’’ हनुमान बोले, ‘‘अभी लात ही लात मारकर गये थे, नहीं देखा?’’ सेठ ने कहा, ‘‘नहीं भगवन्! आप आते और मैं आपको दण्डवत न करता, भला ऐसी भूल मुझसे क्यों होती! क्षमा करे प्रभु! हमें पता ही नहीं चला।’’ इस प्रकार एक सीमा तक भजन करके भगवान को हृदय में बैठाना होता है। एक निश्चित दूरी तय कर लेने पर भगवान स्वयं कवच बनकर आपकी सुरक्षा में लग जाते हैं–

करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी।

जिमि बालक राखइ महतारी।। (रामचरितमानस, ३/४२/३)

इसलिए नाम-जप के द्वारा मन को प्रभु के चरणों में लगायें। एक बात स्मरण रखें कि नाम जपने के लिए कोई जगह अपवित्र नहीं होती। कितना ही फूल बिछा लें, इत्र छिड़क लें, यदि हृदय में श्रद्धा नहीं, कण्ठ पर नाम नहीं तो वह जगह अपवित्र है इसलिए सबको नाम जपना चाहिए।

भगवान दो-चार नहीं होते। जो अनन्त अवतार हुए हैं, महापुरुषों के हैं। उन्होंने हृदय-देश में उस परमतत्त्व को विदित किया था, दर्शन-स्पर्श और प्रवेश पाया था, स्थिति पायी थी। वह नारायणस्वरूप थे, सद्गुरु थे। सृष्टि में अनेकानेक मन्दिर पाये जाते हैं। इन्होंने प्राय: भ्रान्तियों को ही जन्म दिया है कि हमारे भगवान श्रीकृष्ण, आपके भगवान श्रीराम या उनका भगवान शिव! अलग से भगवान का कोई मंदिर नहीं होता। ये सभी स्थलियाँ भगवत्स्वरूप प्राप्त सद्गुरुओं की हैं।

भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में बताया कि आत्मा ही सत्य है, अजर-अमर-शाश्वत और सनातन है। इन विभूतियों से युक्त आत्मा को तत्त्वदर्शियों ने जाना। न दस भाषा के विद्वान ने जाना, न ही किसी समृद्धिशाली ने जाना, न किसी राजा या चक्रवर्ती सम्राट ने ही जाना। उसे केवल तत्त्वदर्शियों ने जाना। अब एक नवीन प्रश्न सामने आ गया कि तत्त्वदर्शिता क्या है? अध्याय अठारह में भगवान ने बताया कि तत्त्व की चाहवाले पुरुष को चाहिए कि एकान्त देश का सेवन करे, गीतोक्त योगविधि को हृदय में धारण कर चित्त को ध्यान में लगाये। इसके सतत अभ्यास से काम-क्रोध, लोभ-मोह, मद-मत्सर, राग-द्वेष ये विकार सर्वथा शान्त हो जाते हैं; धारणा, ध्यान और समाधि ये परिपक्व हो जाते हैं, उस समय वह पुरुष ब्रह्म को जानने के योग्य होता है। इसी योग्यता का नाम पराभक्ति है, भक्ति अपनी पराकाष्ठा पर है, भक्ति अपना परिणाम देने की स्थिति में है। इस पराभक्ति के द्वारा वह ‘तत्त्व’ को जानता है। ठीक है वह तत्त्व को जानता है लेकिन वह तत्त्व है क्या? भगवान बताते हैं– मैं जो हूँ, जिन विभूतियों से युक्त हूँ, इसे जानता है कि तत्त्व या भगवान अजर-अमर हैं, मैं अजर-अमर हूँ। वह परमात्मा जिस प्रकार शाश्वत है, कण-कण में व्याप्त है, ज्योतिर्मय, काल से अतीत, अपरिवर्तनशील इत्यादि जिन अलौकिक गुणधर्मोंवाला मैं हूँ, इसे जानता है और इसे जानकर वह तत्क्षण मुझमें ही स्थित हो जाता है। प्राप्तिकाल में भगवान दिखायी पड़ते हैं; किन्तु दूसरे ही क्षण वह महापुरुष अपनी आत्मा को भी उन्हीं ईश्वरीय गुणधर्मों से परिपूर्ण पाता है। यही है द्रष्टा की स्वरूप में स्थिति! यही है निज धाम। इसलिए जो यह स्थिति पा गया, वह महापुरुष है, सद्गुरु है, नारायणस्वरूप है। यदि कल प्राप्ति हो जायेगी तो आज अभी वह जीव है, साधक है, पथिक है। मन्दिर और मूर्तियों द्वारा इन्हीं महापुरुषों की स्मृति सँजोयी जाती है कि कैसे उन्होंने उस परमात्मा को प्राप्त किया। वे हमारे आदर्श हैं, प्रेरणास्रोत हैं कि हम भी उन्हीं की तरह भजन करें। बिना भजन किये अपने को तत्त्वदर्शी कहने से कुछ भी नहीं मिलेगा।

पूज्य गुरु महाराज कहा करते थे– बेटा! संसार तुम्हें साधू कहे, इससे तुम्हें कुछ भी नहीं मिलेगा, रोने को आँसू नहीं पाओगे; किन्तु यदि भगवान तुम्हें साधु कह दें, तुम सब कुछ पा जाओगे, दुनिया कहे चाहे न कहे। यह प्रमाणपत्र आश्रम या मन्दिर बनाने से नहीं मिलेगा। यह कपड़ा रँगने या साइनबोर्ड लगाने से भी नहीं मिलेगा। आजकल सन्तों की उपाधियाँ विलक्षण होने लगी हैं; कोई-कोई तो श्री श्री और कई हजार श्री तो कोई नारायणस्वरूप और पता नहीं क्या-क्या विशेषण लगा लेते हैं। कितना भी लगा लें, यदि साधना नहीं है, कुछ भी नहीं मिलेगा। तुम्हारी आत्मा तुम्हें साधु कह दे तभी आश्वस्त हुआ जा सकता है।

अवतारस्वरूप जितने भी महापुरुष हुए हैं जब कभी किसी ने परमात्मा को पाया है तो हृदय-देश में पाया है और वह परमात्मा साधना के परिणाम में सबको सुलभ है। साधना के नाम पर लम्बी-चौड़ी, तरह-तरह की साधनायें सीखने की जरूरत नहीं है। केवल एक साधना सीख लें, सोते-जागते, चलते-फिरते, भला करते, बुरा करते– हर समय श्रद्धापूरित हृदय से समर्पण के साथ दो-ढाई अक्षर के किसी भगवन्नाम ‘ॐ’ या ‘राम’ – एक नाम का जप चलता रहे। यही गोस्वामीजी भी कह रहे हैं कि राम कहत चलु भाई रेअन्यथा भव बेगार में पकड़ लिये जाओगे, दिन-रात श्रम करोगे, पारिश्रमिक मिलना नहीं है और छूटत अति कठिनाई रे। छूटने का एक ही तरीका है– भगवान का अनुकूल होना। वह प्रेम के भूखे हैं। आप श्रद्धा से लग भर जायँ, वह तुरन्त मिल जायेंगे।

।। बोलिये श्रीगुरुदेव भगवान की जय ।।

(अमृतवाणी भाग-6’ से उद्धृत)

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