गाँठ पड़ी पिया बोले न हमसे
गाँठ पड़ी पिया बोले न हमसे!
निसिदिन जागूँ मैं पिया तोरी सेजिया,
नैन अलसाने निकसि गये घर से।
गाँठि पड़ि……..
जो मैं जनतिउँ पिया रिसिअइहैं,
काहे को नेह लगवतिउँ एहि जग से।
गाँठि पड़ि……..
अपने पिया को मैं बेगि मनइहौं,
सौ तक सीर होत हरि जन से।
गाँठि पड़ि……..
सुनि प्रिय वचन पिया मुसुकाने,
कहत कबीर पिया मिलैं बड़े तप से।
गाँठि पड़ि……..
पूज्य गुरु महाराजजी के पास सती अनुसुइया आश्रम में कभी बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय तो कभी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के रीडर, प्रोफेसर, वाइसचांसलर इत्यादि पहुँच जाया करते थे। पहले तो वे अपने अध्ययन-अध्यापन की चर्चा करते, पुन: निवेदन करते कि महाराज! साधन समझ में नहीं आता। साहित्य और दर्शनशास्त्र के शोध-प्रबन्धों पर हमलोग ही पी-एच.डी. की उपाधि स्वीकृत करते हैं किन्तु भजन समझ में नहीं आता।
महाराजजी ने उनसे कहा, ‘‘हो! सब बात सब कोई जानत है। दो-दो पैसे में वेदान्त बिकत है (उन दिनों गीता प्रेस से गीता दो पैसे में मिलती थी) लोग पढ़ते हैं और लिखते भी जाते हैं। न जाने का लिखत हैं लेकिन साधन ही एक ऐसी वस्तु है जो लिखने में नहीं आती बल्कि किसी अनुभवी सद्गुरु के द्वारा किसी-किसी अधिकारी, विरही साधक के हृदय में जागृत हो जाया करती है। भजन लिखने में नहीं आता! आप लाख बतायें कि ध्यान ऐसे धरो, नाम ऐसे जपो; यह भजन नहीं है, भजन का प्रयास मात्र है। भजन तो हरि-प्रेरित होता है।’’
जब हम महाराजजी की शरण में आये, ढाई महीने तक तो सब यथावत् रहा, कोई उल्लेखनीय घटना नहीं हुई किन्तु ढाई महीने के पश्चात् एँड़ी से चोटी तक आधा-आधा इञ्च की दूरी पर हमारा अंग फड़कने लगा और उसी के अनुरूप कुछ दृश्य भी दिखाई देने लगे। हमने सोचा कि हमें कोई बीमारी हो गयी! हमने महाराजजी से प्रार्थना किया कि महाराज जी! हमें कोई रोग तो नहीं हो गया? हमें ऐसे-ऐसे फड़क रहा है, ऐसा दृश्य दिखाई दे रहा है!
महाराजजी बोले– ‘‘बेटा! तुम्हारे भीतर अब राम-रावण युद्ध शुरू हो गया है। अब रावण मारा जायेगा, राम का राज्याभिषेक हो जायेगा तभी यह शान्त होगा। बेटा! भजन जागृत हो गया, शुरू हो गया।’’ अस्तु, साधन-भजन न तो कहने में आता है और न ही लिखने में आता है। अनुभवी सद्गुरु के प्रति मन-क्रम-वचन से समर्पण, उनके स्वरूप को हृदय में पकड़कर उनके द्वारा बतायी गयी साधना, टूटी-फूटी ही सही, जहाँ पार लगी, भजन का संचार आन्तरिक रूप से स्वत: हो जायेगा। भगवान आपको ग्रहण कर लेंगे, आत्मा से अभिन्न होकर रथी हो जायेंगे। जिस परमात्मा की हमें चाह है वही हृदय से जागृत हो जायेंगे। वह आपको उठायेंगे, बैठायेंगे, सुलायेंगे, भजन सिखायेंगे और आगे बढ़ायेंगे; कब खतरा होनेवाला है, कब नहीं!– यह समझायेंगे। उनके निर्देशों को समझते हुए आगे बढ़ना भजन है। इसलिए भजन सदैव हरिप्रेरित होता है। यह कहने में नहीं आता; जिसके हृदय में यह जागृति हो, वह जानता है– ‘कै जाने जिय आपना, कै रे जनावे पीउ।’; किन्तु कभी-कभी साधक उनके आदेश का उल्लंघन कर बैठता है। तब भगवान नाराज हो जाते हैं। इसी आशय का संत कबीर का यह भजन है–
गाँठ पड़ी पिया बोले ना हमसे।
गाँठ पड़ने का आशय होता है फर्क पड़ जाना, मनमुटाव हो जाना, नाराज हो जाना, बोलचाल बन्द हो जाना। गाँठ पड़ गयी का तात्पर्य है कि भगवान के आदेश का कहीं न कहीं उल्लंघन हो गया है, वे नाराज हो गये हैं। अब उन्होंने हमारा मार्गदर्शन करना बन्द कर दिया है। यह डाँट पड़ी तो क्यों पड़ी?
‘निसिदिन जागूँ मैं पिया तोरी सेजिया’– अहर्निश जागरण! किसी से कह दें कि रात-दिन जागो! क्या वह जग पायेगा? कभी नहीं! किन्तु भगवत्पथ का ऐसा ही विधान है–
जागत में सुमिरन करे, सोवत में लव लाय।
सुरत डोर लागि रहे, तार टूट न जाय।।
साधक जब तक जागे, उसे सुमिरन करते रहना चाहिए और शयन करते समय भी चरणों में लौ लगाकर ध्यान धरकर सोये जिससे जगने पर भी सुरत चरणों में ही लगी मिले, निद्रा में भी कोई अनर्थ न हो जाय, भजन का क्रम न टूटे– यही है निशिदिन का जागना!
‘निसिदिन जागूँ मैं पिया तोरी सेजिया’– परमात्मा की सेज कौन? अन्यत्र सन्त कबीर कहते हैं–
ज्ञान तखत संतोष बिछौना, सुरत की सेजिया बिछाय लो
अँधेरिया में का करिहौ?
यहिं उजिअरिया में बिछाय लो, अन्हरिया में का करिहौ?
ज्ञान अर्थात् ईश्वरीय आदेश मिलता रहे, यह है तख्त! आदेश के अनुरूप साधना से संतुष्टि मिले– यह हो गया बिछौना और सुरत की सेज सजा लो। सुरत कहते हैं मन की दृष्टि को! आप यहाँ बैठे हैं। अचानक मन में विचार आ गया कि तिजोरी का ताला तो खुला रह गया। उसमें दो लाख रखा था, कहीं लड़के दाहिने-बायें न कर दें। फिर तो यह सत्संग सुनाई नहीं पड़ेगा। छत्तीसों रागनियाँ बज रही हों, कान खुले हैं फिर भी सुनाई नहीं पड़ेगा और तिजोरी का दृश्य सामने नाचने लगेगा। वस्तु नहीं है और वस्तु का सजीव चित्र मन खींच लेता है। इस दृष्टि का नाम सुरत है। भगवान का सुमिरन भी इस सुरत से ही होता है–
सूरत में गुरु मूरती, स्वाँसा में सतनाम।
उर अन्दर निरखत रहे, अनुभव सारे काम।।
इस प्रकार भगवान की शय्या सुरत के अन्तराल में है जब चरणों में लौ लग जाती है। यही सुरत का निशिदिन जागना है। ‘नैन अलसाने निकसि गये घर से’– चूक कहाँ हुई? ‘नैन अलसाने’, नेत्र जरा-सा अलसा गये। कौन-से नेत्र? इन आँखों से तो हम भगवान को देख भी नहीं सकते। उनका आसन तो मन की दृष्टि में लगा है तो आलस्य किन नेत्रों में आया? भगवान को देखनेवाले नेत्र हैं ज्ञान और वैराग्य!
मर्मी सज्जन सुमति कुदारी।
ज्ञान बिराग नयन उरगारी।।
भाव सहित खोजइ जो प्रानी।
पाव भगति मनि सब सुख खानी।। (रामचरितमानस, ७/११९/१४-१५)
जो प्रभु प्रदान करते हैं आत्मा की उस आवाज को परखना, समझना ज्ञान है और देखी-सुनी वस्तुओं में राग अर्थात् लगाव का त्याग वैराग्य है। यही दो नेत्र अलसा जाते हैं। आदेश मिला उसमें कुछ अवहेलना हो गयी। वैराग्य क्षीण हो गया अर्थात् अन्यत्र कहीं राग जुड़ गया। आदेशों के निर्वाह में प्रमाद आ गया। इस प्रकार जहाँ ‘नैन अलसाने’ तो प्रभु ‘निकसि गये घर से’– जिस सुरत से हम प्रभु को पकड़े रहते थे, मन की उस दृष्टि में जहाँ अन्य राग हुआ तो वह पकड़ में आ गया और हृदय से भगवान चले गये। अब गाँठ पड़ गयी, उन्होंने मागदर्शन करना बन्द कर दिया।
जो मैं जनतिउँ पिया रिसिअइहैं,
काहे को नेह लगवतिउँ एहि जग से।
यदि मुझे इसका रंचमात्र भी पूर्व आभास होता कि भजन के अतिरिक्त जरा-सा दाहिने-बायें ताकने से भगवान रूठ जायेंगे, अपनी महिमा समेट लेंगे तो इस संसार से लगाव ही क्यों रखती?
तुलसी मन तो एक है, भावै जहाँ लगाव।
भावै हरि की भक्ति कर, भावै विषय कमाय।।
मन तो एक था। जो सुरत चरणों में लगी थी, वह संसार की विलासिता में भटक गयी। इधर भटकने का आशय है कि वैराग्य हलका हो गया और राग संसार की ओर हो गया। यही है नैन का अलसाना। इससे प्रियतम नाराज हो गये। यदि मुझे इसका पता होता तो मैं जगत् की ओर दृष्टि ही क्यों घुमाती?
इसी आलस्य के क्षण पूज्य गुरु महाराजजी के भी साधन-काल में आये। वैसे तो शुरू-शुरू में गुरु महाराज का घर आकाशवाणियों के माध्यम से छूटा। भगवान ने ही उनसे घर छुड़ाया। आरम्भ में वह गाँव के बाहर एक झाड़ी में बैठकर भजन करते थे। भोजन पर ध्यान न देने से शरीर कृश हो चला। राह चलते पुरुष-महिलायें आपस में कहते कि ‘सोचते हो सन्त जी भजन कर रहे हैं? इन्हें तो पीलिया, टी.बी. हो गई है। घड़ी टल रही है, जब न मर जायँ। देखोगे चार दिन में फूँके जा रहे हैं।’ महाराज जी बताते थे– हो! जब ये शब्द हमारे कान में पड़े, हमने भगवान से पूछा, ‘प्रभो! क्या यह ठीक कहते हैं?’ भगवान ने बताया, ‘उन्हें कहने दो। तुम लगे भर रहो। तुम्हारा भावी मंगलमय है।’ महाराजजी ने बताया– इतना आश्वासन मिलने से हम निश्चिन्त हो गये। हमें पता ही न रहे कि कौन क्या कह रहा है? कौन क्या सुन रहा है? अपने भजन में लगे ही रह गये।
क्रमश: भक्तों ने महाराजजी के निवास-स्थान पर कुटी बना दी; कुछ पेड़-पौधे, एक बगीचा जैसा लगा दिया। गुरु महाराज जीवन के आरम्भिक वर्षों में प्रख्यात पहलवान थे, अपने अखाड़े के उस्ताद थे। उनके शागिर्द पट्ठे ही दाहिने-बायें आकर बगीचा लगाने लगे। बगीचे में बौर आने लगा। गुरु महाराज बताते थे कि पहले रोज इच्छा हो कि भगवान जल्द आदेश देते कि हम यह जगह छोड़ देते, गाँव के पास रहना ठीक नहीं है; लेकिन भगवान आदेश ही न दें। किन्तु जब बगीचे में बौर आने लगा तब महाराज जी के मन में यह भाव आया कि अब कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है। बौर आ रहे हैं तो फल भी आयेंगे ही! फल-फूल खायेंगे और यहीं भजन करेंगे, कहीं नहीं जायेंगे। बगीचे में किञ्चित् लगाव-सा हो गया।
जिस दिन मन में ऐसा विचार आया, उसी दिन भगवान से आदेश मिला, ‘‘प्रयागराज जाओ।’’ बड़े सवेरे आप प्रयाग जाने की तैयारी करने लगे तो गाँव के ही पाँच-सात लोग साथ हो लिये। प्रयाग आ गये। महाराजजी ने भगवान से पूछा– ‘अब क्या करें?’ भगवान का निर्देश मिला– ‘इन लोगों का साथ छोड़ दो।’ महाराजजी उन लोगों से बिना कुछ बताये चुपचाप गायब हो गये। रात नौ बजे चले तो चलते ही रह गये। सवेरा हो गया। गंगा में थोड़ा डुबकी लगाया। पुन: आपने पूछा– ‘अब क्या आदेश है?’ भगवान ने कहा– ‘शरीर पर जो वस्त्र पहने हो, उतारकर गंगा किनारे रख दो।’ महाराज एकदम दिगम्बर हो गये। निवेदन किया– ‘प्रभो! अब?’ भगवान ने कहा– ‘कमण्डल उठाओ और गंगा के किनारे-किनारे चलते जाओ।’ बस, न जान न पहचान! महाराजजी चल पड़े। दो उपवास-तीन उपवास आये दिन की घटना बन गयी परन्तु प्राय: तीसरे दिन भोजन का कोई न कोई अयाचित प्रबन्ध हो ही जाता। महाराजजी पेट के लिए कभी भिक्षा नहीं करते थे। वह सोचते थे कि जब भगवान ने मुझे साधु बनाया है तो व्यवस्था भी वही करेंगे। हम चिन्ता क्यों करें? कभी महुआ के पेड़ के नीचे रात बीते तो कभी बाँस की कोठी में! कभी कोई कुटिया मिल जाय तो उसके समीप रात्रि व्यतीत हो जाय। इस प्रकार वर्षों विचरण चलता ही रहा। महाराजजी कहा करते थे, ‘‘हो! बगीचे में थोड़ी-सी ममता आ गयी तो भगवान ने लँगोटी भी खोलवा के फेंकवा दिया, दिगम्बर बनाकर वहाँ से भगा दिया।’’
विचरण करते-करते गुरु महाराज अयोध्या की ओर निकल गये। सरयू नदी पार कर लकड़मण्डी के आगे जा रहे थे। वर्षा ऋतु आ गयी थी। महाराजजी ने भगवान से निवेदन किया– ‘वर्षा में विचरण में कष्ट होता है। आदेश होता तो कहीं चातुर्मास कर लेते।’ उस दिन अनुभव में आदेश मिला– आपको दिखाई पड़ा कि सड़क पर चले जा रहे हैं, जंगल में पहुँच गये। एक ओर पिताजी का घर है, सड़क के दूसरी ओर माताजी का घर है। पास में एक बेल का पेड़ है। उसी के नीचे बैठकर चतुर्मास करना है।
महाराजजी ध्यान-समाधि से जब सचेत हुए, अनुभव निर्देश पर विचार करने लगे। उन्हें प्रतीत हुआ कि भगवान भी अच्छा विनोद करते हैं। माता-पिता को मरे न जाने कितना समय हो गया और भगवान बता रहे हैं इधर माता का घर है, उधर पिता का घर! जिधर मुख था उसी दिशा में चल पड़े। कहीं जाना तो था नहीं। भजन ही तो करना था। स्वाँस में सुरत को लगा लिया। स्वभाववश पाँव आगे बढ़ रहे थे। सड़क की पटरी से चलते-चलते सुबह से शाम हो गयी। कितनी गाड़ियाँ निकलीं, कितने लोग निकले, कुछ पता नहीं। वह तो सचेतावस्था में ध्यानस्थ होकर चल रहे थे। अचेत रहने पर ठोकर लग सकती है, मन जो भजन में लगा है, बाहर भागने लगेगा। अपने लक्ष्य के अनुरूप जागृत होकर चलना सचेतावस्था कहलाती है।
शाम होते ही अँधेरा छाने लगा, आगे कम दिखने लगा तब महाराजजी ने आँख खोला। उन्हें सड़क के एक ओर देवी मन्दिर और दूसरी ओर शंकर जी का मन्दिर दिखाई पड़ा। महाराजजी को अपना अनुभव याद आया। वह विचार करने लगे, कहीं यही माताजी-पिताजी तो नहीं हैं? सगुन मिला– ‘हाँ, यही है।’ महाराजजी को याद आया, ‘तब तो यहाँ बेल का पेड़ भी दिखायी पड़ना चाहिए।’ अनुभव में जितनी दूरी पर दिखायी पड़ा था, बेल का पेड़ ठीक उतनी ही दूरी पर था। महाराजजी पेड़ के नीचे बैठकर भजन करने लगे।
देवी के पुजारी ग्रामवासी थे। महिलायें देवी को पूड़ी-हलवा चढ़ाने आतीं तो उनके साथ दो व्यक्ति लाठी लेकर आते कि एक पगला वहाँ बैठा है, कहीं उपद्रव न कर दे। जंगल में एक प्राइमरी पाठशाला थी। छोटे बच्चों के संज्ञान में आया। उन्हें मनोरंजन का साधन मिल गया। स्कूल आते-जाते वे महाराजजी के ऊपर कंकड़-पत्थर फेंकते। पत्थर कभी इधर गिरें कभी उधर; महाराजजी ने ध्यान ही नहीं दिया। क्रमश: बच्चे प्रगल्भ हो चले। एक लड़के ने समीप आकर पत्थर मारा। वह आपको लग गया, रक्त निकल आया।
महाराजजी ने सोचा, लड़के लहगर होते जा रहे हैं। वह उठकर खड़े होकर बिगड़े, ‘‘धत् तेरे की! खड़ा तो रह!’’ सभी बच्चे एक-दूसरे से उलझकर गिर पड़े, धूल-धूसरित हो गये। गिरते-पड़ते, चीखते-चिल्लाते वे अपनी माताओं की गोद में दुबक गये; बोले– ‘पगला मारा, पगला खा गया।’ गाँववालों ने कहा– पहले बच्चों को तो गिन लो! कौन आया, कौन नहीं? जब सब के सब सुरक्षित मिले तो वह आश्वस्त हुए। फिर भी उन्होंने सोचा, बच्चों को रोज ही आना-जाना है, उस पागल को भगाओ। लाठी-डण्डा लेकर वे समूह बनाकर चले कि यदि उसने बच्चों को मारा है तो अब तक भाग गया होगा। दूर से लोग एक-दूसरे से कहते, ‘‘घेरो रे! भागने न पाये। तुम इधर से, तुम उधर से बढ़ो!’’ महाराज जी बैठे ही थे। सब पहुँच गये। महाराजजी को शान्त देख लोग असमंजस में पड़े कि यह साधू है या पागल है? कौन है यह? किसी ने कहा– इसे लाठी मारो तभी इसका कण्ठ फूटेगा। लोग आपस में व्यंग करने लगे। एक ने कहा– कहीं यह सन्त न हों। गाँव से पदारथ काका को बुला लो। वह अनुभवी और सुलझे हैं। उन्होंने सन्तों की बड़ी सेवा की है। वह अवश्य पहचान कर लेंगे।
ठाकुर राम पदारथ सिंह गाँव से बुलाकर लाये गये। उन्होंने आते ही महाराजजी को साष्टांग दण्डवत् करते हुए एक दोहा कहा–
एक बार हरि घोड़ा भये, ब्रह्मा भये लगाम।
चाँद सुरुज रबिका भये, चढ़ि गये चतुर सुजान।।
महाराजजी ने हाथ उठाकर उन्हें आशीर्वाद दिया। सात दिनों में यह पहला प्रणाम था। पहले तो सब पागल समझकर दूर ही दूर रहते रहे। ठाकुर साहब ने आग्रह किया, ‘‘महाराज! जरा इस दोहे का अर्थ बता दें।’’ गुरु महाराज ने कहा– बेटा! यह मन ही घोड़ा है, बड़े वेग से दौड़नेवाला है। भगवान जब मन की लगाम अपने हाथ में ले लेते हैं, स्वयं संचालक बन जाते हैं यह मन उस समय मन नहीं रह जाता। भगवान ही मन में ढल जाते हैं। यही है हरि का घोड़ा बनना। और ‘ब्रह्मा भये लगाम’ तो ‘अहंकार सिव बुद्धि अज’– बुद्धि ही ब्रह्मा है। साधारण बुद्धि ब्रह्मा नहीं होती बल्कि ईश्वरीय आदेशों को धारण करनेवाली बुद्धि ब्रह्मा है। बुद्धि उनके हाथ का यन्त्र बन जाती है कि भगवान चाहते क्या हैं, कहते क्या हैं? उसे समझना और उसके अनुसार आगे कदम बढ़ाते जाना। उस समय बुद्धि ही ब्रह्मा है।
‘चाँद सुरुज रबिका भये’– दाहिने स्वर को सन्तों ने पिंगला या सूर्य नाड़ी और बायें स्वर को इड़ा या चन्द्र नाड़ी कहा है। स्वाँस आई तो ओम्, गयी तो ओम्– यही रकाब है, पाँव रखनेवाला पायदान है जो घोड़े पर लटकता रहता है। ‘चढ़ि गये चतुर सुजान’– जो चतुर हैं, वास्तविकता के ज्ञाता हैं वह इसी श्वास-प्रश्वास के भजन के सहारे मन पर चढ़ जाते हैं, दौड़नेवाले मन को निरुद्ध कर लेते हैं। इस पद में भजन की एक अवस्था का चित्रण है।
वयोवृद्ध पदारथ काका गाँववालों पर बिगड़ पड़े– जल्दी दूध लाओ! सात दिन से एक महापुरुष भूखे-प्यासे बैठे हैं। अरे, गाँव का नाश हो जायेगा। जल्दी जाओ, हमारे घर से दूध लाओ। फिर तो सारा गाँव सेवा में लिपट पड़ा।
आकाश में बादल उमड़-घुमड़ रहे थे। गरज के साथ हल्की बूँदा-बाँदी भी होने लगी। सबने कहा– कल महाराजजी की कुटिया इस बेल के नीचे बन जायेगी। कल हमलोग कोई काम नहीं करेंगे, महाराजजी की सेवा में रहेंगे। शाम को ऐसा संकल्प कर ग्रामवासी क्रमश: घर चले गये और प्रात: अपना-अपना हल लेकर खेतों में चले गये। महाराज ने सोचा– अच्छे भक्त मिले; रात में कुछ, सवेरे कुछ और! अभी लोग हल बैलों के कंधे पर रख एकाध हराई ही जोत पाये थे कि लगा पानी बरसने। मूसलाधार वर्षा होने लगी। अब ऐसे में जुताई कैसे होती? उन लोगों ने हल पुन: घर में रखा और भींगते हुए महाराजजी के पास आये, कुटिया बनाने का उपक्रम करने लगे। महाराजजी ने कहा– नहीं बनाना है कुटिया! भागो यहाँ से। जाओ अपना काम करो। हर जोतो! लोग हँसते रहे, सुनते रहे। तीन दिन, तीन रात पानी बन्द ही नहीं हुआ और भींगते हुए लोग कुटिया बनाने के काम में लगे ही रह गये। जब कुटिया सज गयी, पानी बन्द हो गया। लोग अपने-अपने काम में लग गये।
यह सौभाग्यशाली स्थल गोण्डा जिले का मधवापुर ग्राम था। जमींदारों का गाँव और उन्हीं का जमाना! भारत अभी स्वतन्त्र नहीं हुआ था। एक जमींदार बोले, महाराज! आज हमारी तरफ से भण्डारा! लेकिन उसमें केवल लड़के-लड़के ही खायेंगे तो वृद्ध उस दिन भण्डारे से वंचित रह गये। दूसरे दिन लड़कियाँ ही लड़कियाँ खायेंगी, दूसरे लोग न पायें। तीसरे दिन सयानों का तो अगले दिन वयोवृद्धों का! दो-एक सप्ताह इसी तरह के भण्डारे चले। एक बार श्रीमद्भागवत की कथा का आयोजन हुआ। पूर्णाहुति के दिन भण्डारे में कई गाँव के लोग उत्साहपूर्वक सम्मिलित हुए। पंगती चल रही थी। महाराज जी बेलवृक्ष के नीचे बैठे थे। वह उस क्षेत्र का सबसे बड़े फलवाला बेल था किन्तु कभी किसी को खाने के लिए नहीं मिलता क्योंकि वह इतना मीठा था कि पकने से पूर्व ही सड़-सड़कर गिर जाया करता था। एक बेल लगभग ढाई-तीन किलो का सीधे महाराजजी के शिर के ऊपर गिरा– धड़ाम! महाराजजी शिर पकड़कर बैठ गये। पंक्ति में प्रसाद पाने बैठे लोग भागकर महाराजजी के पास एकत्र हो गये। वे कहने लगे– महाराजजी के ऊपर बेल गिर गया। थोड़ी देर में महाराजजी प्रकृतस्थ हुए तो उठाया सड़ँसा और पेड़ के तने के पास आकर बिगड़े, ‘‘क्यों रे अधम! इतनी जगह अगल-बगल थी, हमारे शिर पर ही तुम्हें गिरना था? बेलवृक्ष को तीन सड़ँसा मारकर बोले, ‘‘आज से यदि सड़ेगा तो हम सधुआई छोड़े देंगे।’’ उसके बाद वह बेल कभी सड़ा नहीं, आज भी है। क्षेत्र में प्रसाद-स्वरूप जाया करता है। वृक्ष ने भी महाराजजी की आज्ञा को शिरोधार्य किया।
मधवापुर निवास की अवधि में कई विलक्षण घटनाएँ घटित हुईं। उस समय मधवापुर का जंगल मनकापुर स्टेट के अन्तर्गत आता था। राजा के वनविभाग के वनरक्षक एक मिश्राजी थे। वह बड़े साधुसेवी और भाविक व्यक्ति थे। एक दिन महाराजजी से उन्होंने निवेदन किया कि जाड़े में धूना तापने में जितनी लकड़ी लगेगी, यह साधारण-सी सेवा मुझे मिले, मैं करूँगा। महाराजजी ने कहा– जैसी तुम्हारी इच्छा! वह अपनी बैलगाड़ी में लक्कड़ भरकर स्वयं चलाकर लाते और कुटिया के समीप गिरा दिया करते। महाराजजी के यहाँ पर्याप्त लकड़ी सदैव जमा रहती। पास में ही मिश्राजी का गाँव था। वह यथाशक्ति अन्य सेवा भी करते रहे। उन्होंने चार महीने जाड़ापर्यन्त खूब धूनी तपाया।
चैत के महीने में उस क्षेत्र में हैजा फैल गया। उन दिनों इलाज की इतनी अच्छी व्यवस्था न थी जैसी आजकल है। हालात यह हो गये कि इस गाँव से दो लाश चली गयी तो उस गाँव से एक! हर गाँव में तड़प तो कई-कई रहे थे। उस हैजे की चपेट में मिश्राजी भी आ गये। लोगों ने सूचना दिया कि गुरु महाराज! मिश्राजी को तो हैजा हो गया! मर गये!
महाराजजी बताते थे– हो! सुनते ही हमारा दिमाग सन्न हो गया, जैसे मस्तिष्क है ही नहीं! कुछ देर में महाराज को बात समझ में आयी तो बोले– ‘‘क्यों रे! सचमुच मर गये? जो साधु की सेवा करे वह मर ही जाय तो साधु भाड़ में न जइहैं? ऐसी सेवा से क्या फायदा? भगवान को उनसे सेवा करवाना चाहिए था जिनके पास जीवन था! मरनेवालों से हमारी सेवा क्यों कराई? हमारी बदनामी कराके रख दिया।’’ सब चुप थे, क्या बोलते?
महाराज पुन: बोले– ‘‘क्यों रे! मर गया कि अभी जीवित है? जाओ देखकर आओ।’’ मिश्राजी का गाँव वहाँ से दो-ढाई किलोमीटर दूर था। दो लड़के सपाट दौड़कर उनके गाँव तक तो गये किन्तु उनके घर की ओर जाने का साहस नहीं कर पा रहे थे क्योंकि हैजा संक्रामक रोग है। उसके कीटाणु हवा के साथ भी उड़ते हैं। इसलिए उन्होंने दूर से ही मिश्राजी के लड़कों का नाम लेकर पुकारा। लड़कों ने घरवालों से कहा– रोना-धोना बन्द करो! कोई पुकार रहा है। वे लड़कों के पास गये।
लड़के बोले– गुरु महाराजजी ने पूछा है कि मिश्राजी कैसे हैं? हमें भेजा है देखकर आओ! घरवालों ने बताया– मिश्राजी को चारपाई से नीचे उतार दिया गया है। गाय-बछिया का दान उनसे करा दिया गया है। उनकी स्वाँस बन्द हो जाती है, थोड़ी देर में लौट आती है। कभी-कभी स्वाँस दो-दो मिनट तक बन्द रहती है। बच्चे पुन: दौड़ते हुए लौटे और महाराजजी को बताया कि अब उनके जीवन की आशा समाप्त ही हो गयी है। गऊ दान हो चुका है। चारपाई से नीचे उतार दिया गया है।
महाराज ने कहा– यह विभूति लेकर जाओ। उसको खिला देना, उसके शरीर में भी लगा देना। यदि जीते-जी वह विभूति पा जायँगे तो मरेंगे नहीं। वे लड़के पुन: दौड़कर गये, दूर से ही आवाज लगायी। घर के लोग आये, बोले– अब क्या है? बच्चों ने बताया कि गुरु महाराज ने यह विभूति भेजी है। उन्होंने कहा है, ‘इसे खिला दो, शरीर में लगा दो। यदि जीते जी विभूति पा गये तो मरेंगे नहीं! आकर हमें बताओ।’’ वह लोग गये। विभूति मुँह में डाला, मिश्राजी के शरीर में लगाया और लौटकर बताया कि वह जीते जी विभूति पा गये। उन्होंने कहा– हमारे पिताजी भाग्यशाली थे जो अन्तिम समय में गुरु महाराज की विभूति पा गये। लड़के दौड़कर आये और महाराजजी को बताया कि वह जीते जी विभूति पा गये।
महाराजजी ने उन बच्चों से कहा, ‘‘अच्छा, अब भागो! घर जाओ।’’ बच्चों ने प्रणाम किया और चल पड़े। उन्हें महाराजजी का यह आदेश खटका। रोज तो वे महाराजजी के पास साढ़े नौ-दस बजे तक रहते थे। आज रात आठ बजे ही घर भेज रहे हैं! बात क्या है? लगता है अल्टीमेटम बहुत बड़ा दिया है कि विभूति पा जायँगे तो मरेंगे नहीं! और मिश्राजी को बचना नहीं है, अब मरें कि तब! हमलोगों को हटाकर महाराजजी लज्जा के कारण रात में ही भाग जाना चाहते हैं। मिश्राजी मरें या जियें! यह तो दुनिया है। मरने-जीने का नाम ही तो संसार है लेकिन यह महात्मा बहुत अच्छे हैं। यह भागने लगेंगे तो हमलोग उनके चरणों में गिरकर उन्हें रोक लेंगे। बच्चों ने गाँव में बताया। सबने आपस में सलाह किया और गाँव के ठाकुरों ने रातभर के लिए महाराजजी की रखवाली के लिए दो-दो आदमियों का दो-दो घंटे के लिए पहरा लगा दिया– दस से बारह, बारह से दो, दो से चार– कि आपलोग देखते रहना, यह जाने लगें तो संकेत कर देना। हम सभी मिलकर रोक लेंगे। लड़के दूर से ही कुटी की निगरानी करने लगे। जब वे यह देखने कुटी के पास आये कि देखें, महाराज हैं या भाग गये? महाराजजी की श्वास भारी हो जाय। वह उठकर बैठ जाते, धूनी खोदकर प्रज्वलित करते, सोचते कि बात क्या है? पास में कौन-सी समस्या है? इतने में पास आनेवाले लड़के आहट पाकर रुक जाते। उनके संकल्प-विकल्प रुक जाते तो महाराज जी को भी अपशकुन होना बन्द हो जाता। रातभर में ऐसा तीन बार हुआ।
प्रात: के चार बज गये। महाराजजी की सेवा में उपस्थित रहनेवाले भाविक आने लगे। कोई जल लाकर रख रहा है, कोई कमण्डल में जल भरने लगा। सूर्योदय होते-होते पूरा गाँव महाराज जी के पास आकर बैठ गया। स्त्री-पुरुष-बच्चे, सभी कुटिया में एकत्र हो गये। कोई किसी से बोल नहीं रहा हैं। महाराजजी की चिलम चढ़ रही थी। गाँजा पीनेवाले दो चार पास में थे। गाँव के लोगों में से कोई-कोई उठकर सड़क पर चला जाता और देखता कि मिश्राजी के गाँव की ओर से कोई आता तो पूछते, वह मर गये या अभी जीवित हैं? किन्तु उधर से कोई आता दिखायी नहीं पड़ रहा था।
अचानक एक आदमी बोल पड़ा, ‘‘वह देखो! मिश्राजी चले आ रहे हैं! वह बैलगाड़ी में बैठे हैं। उनका लड़का बैलगाड़ी चला रहा है। सब के सब सड़क की ओर दौड़ पड़े। मिश्रा जी आये। महाराजजी को सादर प्रणाम किया और बोले, ‘‘महाराज! आप रातभर हमारी खटिया पर बैठकर शिर से पाँव तक हमें सहला रहे थे और कह रहे थे– ‘घबड़ैहै न! मैं आ गया हूँ। अब तू मरेगा नहीं।’ रातभर आप हमारे पास बैठे रहे। मैं सीधे खुली आँख से प्रत्यक्ष दर्शन कर रहा था। बीच-बीच में आप हमारे शिर पर हाथ फेर देते थे। सबेरे पाँच बजे दस मिनट के लिए मेरी आँख लग गयी। जहाँ आँख खुली, आप वहाँ नहीं थे। महाराज! आप किस रास्ते से इतना शीघ्र आ गये।’’
तब ठाकुरों ने कहा, ‘‘अरे! रातभर हमलोगों ने पहरा दिया है। हमलोगों को महाराज यहीं बैठे मिले, चिमटे से धूना खोद रहे थे। यह तो रातभर यहीं बैठे थे!’’ महाराजजी ने पूछा, ‘‘क्यों रे! पहरा क्यों दे रहे थे?’’ उन लोगों ने कहा, ‘‘महाराज! आपने अल्टीमेटम बहुत बड़ा दे डाला था क्योंकि मिश्राजी के जीने की कोई आशा नहीं थी। हमलोगों ने सोचा, मिश्राजी भले मर जायँ, महाराज जी भागने लगेंगे तो हमलोग रोक लेंगे, इसलिए पहरा दे रहे थे।’’
महाराज जी बिगड़े, ‘‘धत् तेरे खलों की! रातभर हमारे भजन में व्यवधान डालते रहे। अब यह जगह रहने लायक नहीं है।’’ लोगों ने बहुत अनुनय-विनय करके महाराज को मनाया।
मधवापुर में जब कई मरती-जीती घटनायें हो गयीं, पेड़ भी कहना मानने लगा, महाराज जी की जुबान से जो निकले, वही हो जाय। (महाराज जी कहते थे– हो! सिद्धि कुछ नहीं है, वाक्सिद्धि है; जो मुख से निकल जाता है, भगवान को करना पड़ता है।) तब महाराज जी के मन में यह विचार आया कि जब हम गाँव के पास कुटिया में भजन कर रहे थे तब गाँव के लोग, माई-दाई रास्ता चलते कहा करते थे, ‘तुमलोग सोचते हो संतजी भजन कर रहे हैं। अरे! इन्हें टी.बी. हो गयी है या पीलिया हो गया है। यह हैं रोगी, जब न मर जायँ!’ अब तो सधुआई में रंग आ गया है। क्यों न गाँववालों को अपना चेहरा दिखा दूँ। सब जान तो जायँ कि ये बीमार नहीं हैं, भजन कर रहे हैं, सिद्धपुरुष हैं, महात्मा हैं। ऐसा विचार करते ही महाराज जी को अपशगुन हुआ। महाराज जी रुक गये।
दूसरे दिन महाराजजी पुन: ऐसा विचार बनाकर खड़े हुए, चलने को तैयार हुए तो भगवान ने मना किया। महाराज रुक गये। एक महीने तक मन नये-नये तरीके से गाँव चलने का उपक्रम करता, चलने को तैयार भी होते किन्तु प्रतिदिन भगवान मना करते रहे। एक दिन एक भक्त घोड़े के बाल का चमर बनाकर लाया, कहा– भगवन्! यह आपके लिए है। महाराज के मन में आया कि चमर गुरु महाराज के लिए अच्छा रहेगा। उनके पैर में फोड़ा हो गया है, मक्खियाँ बैठती हैं, वह इससे उड़ाया करेंगे और इसी बहाने उनका दर्शन भी कर लूँगा। लोगों से भेंट भी हो जायेगी। दो-चार लोगों से मिलते हुए निकल आऊँगा। उठकर वे चलने लगे। अपशगुन होता रहा कि मत जाओ! फिर भी महाराज जी रेलगाड़ी के डिब्बे में बैठ ही गये। रास्तेभर अपशगुन होता रहा और जब वह रामकोला स्टेशन पर आ गये तब आकाशवाणी हुई। भगवान ने कहा– ‘‘आ तो गये हो, प्लेटफार्म पर पाँव मत रखना; नहीं तो तुम्हारे सभी करम हो जायेंगे।’’
महाराजजी ने बताया कि ऐसा निर्देश मिलने पर वह डिब्बे का सिकचा पकड़कर थोड़ा लटककर प्लेटफार्म पर देखने लगे कि गाँव का कोई हमें देख लेता, वह सबको बता देता कि हाँ, वह साधु हैं। फिर तो प्लेटफार्म पर उतरने की आवश्यकता नहीं रह जायगी। गाँव से सटा हुआ रेलवे स्टेशन! गाँव के पन्द्रह-पचीस आदमी वहाँ नित्य ही पहुँच जाया करते थे किन्तु भगवान की ऐसी व्यवस्था कि उस दिन कोई दिखायी न पड़ा। महाराज जी ने बहुत झुककर देखा फिर भी कोई दिखायी न पड़ा। लगभग बीस-चौबीस मिनट गाड़ी रुकी रही। वह पैसेन्जर ट्रेन अब चलने लगी; धीरे-धीरे गति पकड़ने लगी। तब महाराज ने मन में विचार किया– हमें तो यहीं तक आना था। आगे तो हमें जाना नहीं है। न हो तो यहीं उतर जाऊँ। गाँव नहीं जाऊँगा। गाँव के बाहर ही बाहर निकल जाऊँगा। कदाचित् कोई मिल ही जाय! महाराजजी चलती ट्रेन से कूद पड़े, कुछ चोट भी लगी। ट्रेन निकल गयी।
उस घटना को बताते हुए महाराजजी ने कहा– प्लेटफार्म पर उतरते ही हमारे शरीर से एक पुतला निकला– हमारे ही आकार का, इसी ऊँचाई का! वह बोला– ‘‘घर जाओ! तुमसे भजन नहीं होगा। देखो, घर इसी झाड़ी की आड़ में है।’’ महाराजजी डर गये, काँप गये। दूसरी बार एक पुतला निकला– ‘‘देखते क्या हो? चले जाओ। यह पगडण्डी वहीं तक जाती है।’’ तीसरी बार एक पुतला और निकला, बोला– ‘‘अब खड़े रहने से कोई लाभ नहीं! तुम साधु नहीं हो सकते। अब आगे-पीछे क्या देखते हो? आ तो गये! यही तो है।’’
महाराजजी ने सोचा, यह जमीन रामकोला गाँव में आती है। पटरी के उस पार की जमीन दूसरे गाँव की है। इसलिए वह उछलकर पटरी के दूसरी ओर चले गये और जिधर मुँह था, उधर चल दिये। तब भगवान ने डाँटा– ‘‘कहाँ भागा जाता है? अब तुम साधु कभी नहीं हो सकते। जाओ घर जाओ!’’ महाराजजी सड़क से सौ-डेढ़ सौ मीटर की दूरी पर खड़े हो गये। महाराजजी प्रार्थना करने लगे– भगवन्! गलती हो गयी। अब कभी भूल नहीं होगी, क्षमा करें। किन्तु कोई सुनवायी नहीं हो रही थी। दिन के चार बजे से रात के ग्यारह बजे तक महाराज वहाँ खड़े ही रहे, रोते रहे, आँसू बन्द ही न हो। गाँव से लगा हुआ स्टेशन किन्तु उस बीच उधर कोई आया ही नहीं। महाराजजी के मन में आया कि जब भगवान लौटने ही नहीं दे रहे हैं तब भी घर तो नहीं जायँगे, भले ही प्राण निकल जायँ। धीरे-धीरे चलकर वह अपनी उस कुटिया में आ गये जहाँ पहले भजन करते थे।
पहले महाराज जब उस कुटिया में रहते थे, एक ऐंतल गैंतल काला और कंजा कुत्ता वहाँ आया और टिक गया। लोग उसे कुइरा कहते थे। महाराज तो वहाँ से चले गये थे किन्तु वह दिनभर कहीं खा-पीकर रातभर कुटिया में बैठा रहता था। ज्योंही उसने महाराज जी को देखा, उनके चरणों में लोटने लगा, फिर वह सपाट दौड़कर गाँव की ओर गया और महाराजजी के समय में जो दर्शनार्थी भक्त आते थे उनकी रजाई, उनका कम्बल पकड़कर खींचने लगा, कूँ-कूँ करने लगा। वह उनलोगों से लिपट पड़ रहा था। कभी इधर गिरता तो कभी उधर! वह उन्हें जगाकर पुन: दौड़कर महाराज के पास आता और पुन: दूसरे घरवालों को जगाता। इस प्रकार वह पाँच पलोटन आया और पाँच पलोटन गया तो लोगों ने कहा– बात क्या है? आज कुइरा बहुत खुश है। कहीं सन्तजी तो नहीं आ गये? कुतूहलवश लोग इकट्ठे होकर आये तो संतजी कुटिया में बैठे-बैठे आँसू बहा रहे थे। लोगों ने बहुत पूछा– संत जी! बात क्या है? बस, कोई उत्तर नहीं!
धीरे-धीरे उस कुटिया में दिन कटने लगे। महाराजजी भजन करने लगते तो भगवान से झिड़की मिलती– ‘‘ना! भजन तोसे ना होई, घर जा! यहाँ क्या मूड़ी लटकाकर बैठा है?’’ महाराजजी की रुलाई बन्द ही न हो। कोई गाँव से आने लगता तो अवसर मिलने पर पानी का छींटा मारकर महाराजजी मुख धो लेते और अवसर न मिले तो आँसू पोंछ लें किन्तु बातचीत किसी से नहीं होती थी। इसी तरह डेढ़ वर्ष व्यतीत हो गये। वह प्रतिदिन भगवान से क्षमा-याचना करते कि भगवन्! चाहे प्राण निकल जायँ, घर तो नहीं जाऊँगा। हमसे बड़ी भूल हो गयी। प्रभो! अब भविष्य में कभी भूल नहीं होगी। गाँव के लोग भी व्यंग कसते– जब साधू हो गये तब यहाँ क्यों चले आये? आपको कहीं मर-खप जाना चाहिए था। रोनी-सी शक्ल लेकर दिनभर बैठे रहते हो? आपको लज्जा भी नहीं आती। महाराज सोचते थे, हम अपनी सधुआई दिखाने आये थे यहाँ सबने हमारी रुलाई देखा।
डेढ़ वर्ष पश्चात् भगवान ने सुनवायी की, बोले– अब तो कभी नहीं आयेगा? महाराज ने अनुभव में ही कहा– कभी नहीं। भगवान बोले– थूको और चाटो। अनुभव में ही महाराज से उन्होंने थुकवाया, चटवाया। भगवान ने आदेश दिया– उठो और इसी समय यहाँ से निकल जाओ। उस समय रात के दो बजे थे। महाराजजी अनुभव से सचेत हुए और चल पड़े; जैसे कोई पक्षी पिंजरे से छूट जाय! जैसे जाल में फँसा हुआ पशु छूटने पर भागता है, उसी प्रकार महाराजजी तेजी से चल पड़े। उस समय भी गाँव का एक व्यक्ति मिल गया। वह बोला– ‘‘संत जी कहाँ?’’ आपने कहा– ‘‘अब जा रहे हैं?’’ उसने कहा– ‘‘उचित है! जब साधु हो गये तो चेहरा दिखाने यहाँ क्यों चले आये? अब आपको यही उचित है।’’ उसने भी व्यंग्य किया।
महाराजजी ने विचार किया कि घर तो क्या इस मैदानी इलाके में मैं कभी नहीं आऊँगा। पता नहीं किन-किन तरीकों से मोह खींच ही लेता है। मन में साधुता की महिमा दिखाने का मोह था। यह चमत्कार भी एक खतरा है। अब हम कश्मीर की ओर, हिमालय की ओर चले चलते हैं। वहीं किसी खोह-खन्दक में भजन कर जीवन व्यतीत कर लेंगे। महाराजजी ने ट्रेन पकड़ा और जम्मू निकल गये। अब भगवान बताने लग गये कि इधर चल, उधर चल। जम्मू में निर्देश मिला कि चित्रकूट जाओ। उसी क्रम में काशी, जौनपुर, इलाहाबााद होते हुए महाराज मानिकपुर पहुँचे। मानिकपुर में भगवान ने कहा– ‘‘चल, तोर नौकरी लग गयी मोरे यहाँ।’’ भजन जहाँ से छूटा था, वहीं से आरम्भ हो गया। भजन में सम्पूर्ण गति, भगवान की अनुकूलता मानिकपुर में हुई। भगवान पुन: खुश हो गये।
इस प्रकार साधक से कभी-कभी भूल हो जाती है तो भगवान अपने बोलने का सूत्र बन्द कर देते हैं– ‘गाँठ पड़ी पिया बोले ना हमसे!’ जरा-सी गाँठ पड़ी, भगवान ने कहा इधर मत जाना और वह उधर चले गये! बात इतनी सी! शरीर से कोई भूल नहीं हुई, अपराध कुछ भी नहीं हुआ, केवल आज्ञा की अवहेलना–
बिधि बस करम काल कठिनाई।
रेख लाँघि सिय बाहर आई।। (विश्रामसागर)
भगवान ने जो रेखा निश्चित कर दिया, जहाँ उसका उल्लंघन किया तो दैव बलवान है, काल की करालता है, जो कुछ है सब धोखा है।
अपने पिया को मैं बेगि मनइहौं, सौ तक सीर होत हरिजन से।
मैं अपने प्रभु को शीघ्र मना लूँगा। भक्तों से एक-दो नहीं सौ-सौ भूलें होती आयी हैं। नारद देवर्षि का पद पा गये; किन्तु जरा-सी भूल उनसे भी हो गयी। अहंकार हो गया कि हम भी जितेन्द्रिय हो गये। परिणामस्वरूप एक जन्म उन्हें और लेना पड़ा। इसी प्रकार मैं भी उन्हें अवश्य मनाऊँगा। लाख भूल हो, लाख बार भगवान नाराज हों; वह नाराज इसलिए नहीं होते कि तुम नष्ट हो जाओ! पिता इसलिए नाराज नहीं होता कि बेटा सचमुच नालायक है तो उसे घर से भगा दिया जाय! वह कभी घर से भगाता है, कभी ताड़ना देता है उसके सुधार के लिए! उस बच्चे के अन्दर जो और प्रतिभा छिपि हुई है उसे निखारने के लिए! भगवान इसलिए नाराज नहीं होते कि भक्त खो जाय! सैकड़ों भूलें भगवान क्षमा करते हैं। मैं शीघ्र अपने प्रभु को मना लूँगा। जहाँ यह शब्द भगवान ने सुना–
सुनि मृदु वचन पिया मुसुकाने।
कौन-सा मृदु वचन कह दिया? यही कि सब काम छोड़कर मैं प्रभु को मनाऊँगा। सब ओर से एक प्रभु में विश्वास दृढ़ किया, एक टेक, एक प्रण पर जहाँ आरूढ़ हुए, संकल्प मन में स्थिर कर जहाँ चले, इस टेक को सुनकर भगवान प्रसन्न हो गये कि अब तो इसके हृदय में एक मेरा ही आसरा रह गया है। भगवान ने हृदय से यह जाना तो प्रसन्न हो गये।
सुनि मृदु वचन पिया मुसुकाने।
कहत कबीर पिया मिलैं बड़े तप से।।
कबीर कहते हैं पिया मिलते हैं, अवश्य मिलते हैं किन्तु बड़े तप से मिलते हैं। मनसहित इन्द्रियों को इष्ट के अनुरूप तपाने का नाम तप है। पहले मन कदाचित् ठीक रहता हो किन्तु घण्टा-डेढ़ घण्टा भजन में बैठकर देखें कि मन कितना एकाग्र होता है? जब यह मन किसी तरीके संयत नहीं होता दिखता, लोग शान्त-एकान्त वन की शरण लेते हैं, वेशभूषा भी बदलना पड़ता है। कभी-कभी ऐसे महापुरुषों को लोग विक्षिप्त पागल समझकर ढेले भी मारते हैं किन्तु जो टेक पर आरूढ़ हैं, भगवान को मनाकर ही दम लेते हैं। बुद्ध ने चालीस उपवास किया– ‘पिया मिलैं बड़े तप से।’
भगवान महावीर सर्पों के बिल पर खड़े हो जाया करते थे। सर्प निकलेगा और काट लेगा– इस भय से हमारे मन में उद्वेग पैदा होता है या नहीं! जब मन शान्त है, सम है तो आगे परिणाम क्यों नहीं दिखाई देता? जब वह बैठकर भजन करते तो कमर टेढ़ी हो जाती, कभी पीठ दीवाल से लग जाती। इससे बचने के लिए उन्होंने गो-दोहन आसन से बैठना प्रारम्भ किया, पंजे के बल बैठने लगे जिससे नींद न आये। ‘कहत कबीर पिया मिलैं बड़े तप से’– तप की परिपक्व अवस्था में चित्त अचल स्थिर शान्त ठहर जाय– तब भगवान मिलते हैं। भगवान अवश्य मिलते हैं लेकिन चित्त के निरोध और विलयकाल में!
सारांशत: ईश्वर के आदेश का पालन भजन है। उस आदेश की जागृति न पुस्तक पढ़ने से, न पाठ-पारायण करने से, कुछ भी करने से नहीं होती। वह जागृति किसी तत्त्वदर्शी, महापुरुष, जीवनमुक्त, पूर्णत्वप्राप्त सन्त की टूटी-फूटी सेवा, उनके द्वारा निर्दिष्ट साधना के यत्किञ्चित् परिपालन से तथा श्रद्धा-समर्पण से होती है। जहाँ आपके मन की डोर उनमें लगी, तत्क्षण वह आपमें प्रसारित हो जायँगे।
जल्दबाजी में जिस किसी को सद्गुरु नहीं बना लेना चाहिए। सद्गुरु प्राप्ति का सरल उपाय है– ‘सन्त विशुद्ध मिलहि परि तेही। राम कृपा करि चितवा जेही।।’– विशुद्ध सन्त उसी को मिलते हैं जिसे राम, वह प्रभु, कृपा करके एक निगाह देख लें। अब भगवान को कौन गरज पड़ी है देखने की! इसलिए अच्छा तो यह होगा कि उनकी शरण हो जायँ, उनका सुमिरन करें, एक परमात्मा में दृढ़ संकल्प समर्पित होकर लग जायँ–
कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी।
जागत सोवत सरन तुम्हारी।।
तुम्हहि छाड़ि गति दूसरि नाहीं।
राम बसहु तिन्ह के मन माहीं।। (मानस, २/१२९/४-५)
सोते-जागते, खाना खाते, शौच जाते, खुरपी चलाते– जीवन के हर मोड़ पर समर्पण व श्रद्धा के साथ नाम याद आया करे– यह है शरण तुम्हारी– तुम्हें छोड़कर अन्य किसी का भरोसा न हो– ‘राम बसहु तिन्ह के मन माहीं।’ सर्वांगीण समर्पण के साथ प्रार्थना करें। आपके और परमात्मा के बीच में माया का जो पर्दा पड़ा है जहाँ वह हल्का हुआ तो भगवान आपके हृदय से रथी हो जायेंगे, आत्मा क्रियाशील हो उठेगी, मार्गदर्शन करने लगेगी और बता देगी कि वह रहे आपके गुरु महाराज! फिर तो,
सदगुर मिलें जाहिं जिमि, संसय भ्रम समुदाइ। (रामचरितमानस, ४/१७)
सन्देह खत्म! भ्रम समाप्त! उन सद्गुरु के माध्यम से जहाँ श्रद्धा की डोरी लगी, साधना जागृत हो जाती है। पहले यह जागृति आंशिक रूप में होती है। ज्यों-ज्यों हमारा संयम सधता जायेगा, प्रकृति का सम्बन्ध घटता जायेगा त्यों-त्यों ईश्वरीय आलोक बढ़ता जायेगा। एक दिन इतना विस्तार हो जायेगा कि–
सगुन होहिं सुन्दर सकल, मन प्रसन्न सब केर।
प्रभु आगवन जनाव जनु, नगर रम्य चहुँ फेर।।
(रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा, मंगलाचरण)
रामचरितमानस में प्रसंग आता है कि राम-रावण युद्ध में जब सभी निशाचर मार डाले गये, केवल रावण जीवित था; वह जब दुर्ग से युद्ध के लिए निकला तो उसके साथ अपार सेना थी। सब तो मर गये थे! यह अपार अभी जीवित ही थे? अध्यात्म में कुछ ऐसा ही है–
मोह सकल व्याधिन्ह कर मूला।
तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहुसूला।। (रामचरितमानस, ७/१२०/२९)
मोहरूपी रावण! और मोह सम्पूर्ण व्याधियों का मूल है, उद्गम है। आप किसी वृक्ष की सब टहनियाँ काट भी दें, फिर भी दस जगह से शाखा पत्तियाँ, सब निकल आयेंगी। यदि मूल विद्यमान है तो उसमें पेड़-शाखा-पत्र-पुष्प-फल सब हैं इसलिए रावण के होते हुए सब विद्यमान हैं। किन्तु जब रावण मर गया तो ‘रहा न कुल कोउ रोवनिहारा।’ इधर मोह का अस्तित्व शान्त हुआ तो योगाग्नि में प्रसुप्त स्थायी शान्ति प्राप्त हो गयी, चिदाकाश में अमृत तत्त्व की वृष्टि हो गयी। मृत कहते हैं नाशवान को, अमृत कहते हैं अविनाशी को, जिसकी मृत्यु न हो– काल से अतीत उस अविनाशी तत्त्व का संचार चिदाकाश में हो गया। उस समय ‘सगुन होहिं सुन्दर सकल’– सम्पूर्ण शुभ ही शुभ रह गया, अशुभ का कारण समाप्त हो गया। उस समय अनुभव पूर्ण होता है, स्थिति मिलती है। दर्शन, स्पर्श, प्रवेश और स्थिति मिल गयी तो यही रामराज्य है जो किसी-किसी योगी के हृदय में होता है।
हमारी पुकार ऐसी हो कि वह प्रभु उतर आयें, आत्मा से अभिन्न होकर खड़े हो जायँ, मार्गदर्शन करने लगें; उसी दिन से भजन की शुरुआत है और आज्ञा का जरा-सा भी उल्लंघन किया तो ‘गाँठ पड़ी पिया बोले ना हमसे।’ फिर तो एक जन्म का धक्का लग जाता है। भगवान के आदेश में घट-बढ़ न करें, अपनी बुद्धि न लगायें अन्यथा वह रुष्ट हो जायेंगे और आपका रास्ता लम्बा हो जायेगा। वह भक्त को नष्ट करने के लिए नाराज नहीं होते बल्कि उसे घेरकर रास्ते पर लाने के लिए नाराज होते हैं। इसलिए आज्ञापालन ही भजन है। सद्गुरु के कृपा-प्रसाद से उस आज्ञा का संचार है, इसलिए सबको गुरु महाराज की शरण जाना चाहिए।
ईश्वर एक से सवा कभी हुआ नहीं। उस एक परमात्मा की शरण जाना चाहिए। जो इस परमात्मा का बोध कराता हो, सीधा परमात्मा को ही सम्बोधित करता हो, जो उनका परिचायक हो– ऐसे किसी एक दो-ढाई अक्षर के नाम ओम् अथवा राम का चिन्तन करें, उसे जीवन का अंग बना लें।
भजन करने के लिए कोई जगह पवित्र अथवा अपवित्र नहीं होती। जगह तब अपवित्र है जब हमारे हृदय से, स्मृति पटल से उनका सुमिरन, चिन्तन विस्मृत हो जाय! तब चाहे आप इत्र ही छिड़ककर क्यों न बैठें, अशुद्ध ही हैं। रावण के दरबार में जब हनुमान पहुँचे तो सन्देह में पड़ गये कि सुना था स्वर्ग होता है, लगता है यही है। रावण ने इतने स्वर्गिक ऐश्वर्य का संग्रह कर रखा था फिर भी अधम, खल, निशाचर की सारी डिग्रियाँ उसके पास थीं।
एक सेठ जी थे। भजन में मन लग गया। दुकान-दौरी चौपट हो गयी। घरवाले लगे काँव-काँव करने! सेठ ने गुरु महाराज से कहा कि घरवालों ने तो जीना मुश्किल कर दिया है। गुरु महाराज ने कहा– बेटा! कहीं दुकान लगा ले। कुछ कारोबार शुरू कर। सेठ ने ऐसे कुठौरे दुकान लगाया कि उस गली से आदमियों का आना-जाना था ही नहीं; किन्तु भगवान का मन! ऐसी प्रेरणा हुई कि क्षेत्र भर के ग्राहक उसी सेठ की दुकान पर आने लगे। ऐसी साख बन गयी कि चाहे पाँच साल का बच्चा भेज दो, सेठ सौदा सही देगा। दिनभर बिक्री करते-करते, डाँड़ी चलाते सेठ कुढ़ता– हे भगवन्! कौन-सा पाप प्रकट हो गया कि आपका नाम छूट जाना चाहता है। दिनभर इसी छटपटाहट में बीतता।
रात्रि में जब वह दुकान बन्द करता तो लोटा लेकर शौच के बहाने दूर एकान्त नाले में निकल जाता। आड़ में बैठकर टट्टी करता और भगवान का नाम ‘राम, राम….’ तब तक जपता जब तक उसे कुछ शान्ति नहीं मिल जाती। वह जानता था कि जब साफ-सुथरा होकर घर पर भजन करने बैठूँगा तो घरवाले पुन: उपद्रव करेंगे कि हमारे सेठ की बुद्धि फिर भ्रष्ट हो गयी। हमें भजन ही तो करना है, लोगों को रिझाना तो है नहीं! उसे इसका भान भी नहीं था कि कैसी जगह बैठे हैं! उसे तो नामजप की लौ लग गयी थी।
एक दिन हनुमानजी की निगाह उस सेठ पर पड़ गयी। वह बौखला उठे– लो! यह बनिया-बक्काल की जाति! हमारे परमात्मा के पवित्र नाम को भी अशुद्ध करने में लगा है। यही समय था नाम जपने का! न हो तो थोड़ी इसे सीख दे दूँ। हनुमान ने उसकी पीठ में एक लात मारा ताकि वह मुँह के बल गिर पड़े, दो-एक दाँत-वाँत टूट जायँ लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ। ‘राम, राम, राम’ शान्तिपूर्वक कहता रहा। अब हनुमानजी को थोड़ा जोश आया। उन्होंने तुरन्त दुपट्टा फेंका, चार दण्ड-बैठक गलाया और जम्प करके वह लात मारा जो मेघनाद की छाती में कभी मारा था जिससे यह कुपात्री रसातल को चला जाय लेकिन वह बनिया टस से मस नहीं हुआ। वह रामधुन लगाते हुए भजन में पूर्ववत् डटा रहा।
उर-प्रेरक तो भगवान हैं। इतने में हनुमानजी के मन में प्रेरणा हुई कि कहाँ से इस कुपात्री को छू दिया, हम भी अशुद्ध हो गये और भगवान की सेवा में भी विलम्ब हो जाना चाहता है। हनुमान को सेवा में कभी विलम्ब हुआ ही नहीं। उन्होंने तुरन्त सरयू में एक डुबकी लगायी और दूसरे पल में भगवान के समक्ष सेवा में उपस्थित हो गये।
भगवान के महल में वहाँ दूसरा ही दृश्य था। भगवान को हल्दी छोपी जा रही थी। भगवान बुरी तरह कराह रहे थे। स्वाँस लेने में भी कष्ट हो रहा था। दवा-दारू, वैद्य-डॉक्टर सब फेल हो चुके थे। हनुमानजी ने पूछा– प्रभो! यह क्या हो गया? भगवान बोले– अरे हनुमान जी! कुछ पूछो मत। आज तो हम लातै-लात बहुत मारे गये। हनुमान जी की भृकुटि तन गयी। वह बोले– प्रभो! अब संसार में ऐसा कौन जीवित है जो आपकी ओर लात उठाये? आप उसका नाम भर बता दें, मैं अभी उसका सफाया किये देता हूँ। भगवान ने कहा– अरे हनुमान जी! तुम्हीं ने तो मारा। हनुमान ने कहा, प्रभो! इतनी बड़ी भूल भला मुझसे कैसे हो सकती है? भगवान ने कहा– क्या उस बनिये को मारा था? हनुमान ने पूछा– भगवन्! आपको कैसे लग गयी? भगवान ने कहा कि,
जननी जनक बन्धु सुत दारा।
तनु धनु भवन सुहृद परिवारा।।
सब कै ममता ताग बटोरी।
मम पद मनहि बाँध बरि डोरी।। (रामचरितमानस, ५/४७/४-५)
जननी माने माता, जनक माने पिता, प्रिय परिवार, परम हितैषी, धनधान्य– सबके अन्दर ममत्व का जो संचार है, उन धागों को समेटकर रस्सी बनाकर जो मेरे चरणों में बाँध देता है–
अस सज्जन मम उर बस कैसे।
लोभी हृदय बसइ धनु जैसे।। (रामचरितमानस, ५/४७/७)
ऐसा सज्जन मेरे हृदय में बस जाता है। ‘मैं उसके हृदय में बसूँ’- यह तो आरम्भिक स्तर है; ऐसा सज्जन जो मेरे हृदय में निवास करता है, उसके कवच के रूप में चारो ओर तो मैं था। सबसे सम्बन्ध तोड़कर वह मुझसे डोरी लगाकर बैठा था। उसके चारों तरफ तो मैं ही था। तुम उसे जितनी लात मार रहे थे, हमीं को झेलना पड़ा। बस तुरन्त हनुमान भागकर उसके पास गये, बोले– ‘‘भैया! भजन करने का तरीका तुम्हारा ही बढ़िया है। लगन हो तो ऐसी!’’
प्राय: लोग ‘यह भी कर लो, वह भी कर लो, कुछ भजन भी कर लो।’ करते ही रहते हैं और गुरु महाराज को भी लांछन लगाते रहते हैं कि दया नहीं कर रहे हैं, मन नहीं लग रहा है– यह सब व्यर्थ की बातें हैं। सबके ममता का धागा वहाँ बाँध दो और धन्धा-पानी जो सामने आता है, करते जाओ, त्यागो कुछ भी नहीं। न काम त्यागो न क्रोध, न मोह, न लोभ– कुछ मत त्यागो, केवल एक श्रद्धा की डोरी वहाँ लगा दो, मन-क्रम-वचन से चलते-फिरते, उठते-बैठते नाम याद आया करे। समर्पण और श्रद्धा के साथ लगें; आगे उन्नत स्तर पर त्यागनेवाली वस्तुएँ भगवान खुद छुड़ा देंगे। स्तर उठेगा तो वह आपको आगेवाली क्लास में घसीट लेंगे। इसीलिए महाराज का आदेश था कि भगवान जब तक आदेश न दें, घर छोड़ना पाप है और जब छोड़ने का आदेश दे दें तो घर में रहना भी पाप है। फिर यदि तुम पीछे रहते हो तो तुम पापी हो और उधर चलोगे तो सुरक्षा उनकी जिम्मेदारी है। हम चाहें कि पतित हो जायँ, भगवान हमको होने नहीं देंगे क्योंकि रक्षा की जिम्मेदारी उनकी हो जाती है।
समर्पण के साथ जो साधक साधना में लगता है, अपने आपको उनको अर्पण करके जो लगता है, कर्म करने में चिन्तन करने में जो कटौती नहीं करता, ‘योगक्षेमं वहाम्यहम्’ (गीता, ९/२२)– उसके योग की सुरक्षा और आगे योग की व्यवस्था का भार, भगवान कहते हैं– मैं स्वयं वहन करता हूँ। इसलिए,
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परं संयतेन्द्रिय:।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणामधिगच्छति।। (गीता, ४/३९)
श्रद्धावान संयतेन्द्रिय और आराधना में तत्पर पुरुष ही मुझे प्राप्त करता है। वह तत्त्वस्वरूप परमशान्ति को प्राप्त कर लेता है। इसलिए कुछ त्यागो मत! केवल एक प्रभु के प्रति समर्पण के साथ लग भर जाओ, फिर आगे आपमें जब उठने की क्षमता आयी तो भगवान त्याग करवा लेंगे, करना नहीं पड़ेगा। पूज्य गुरु महाराज तो घर की ओर भाग गये थे, भगवान ने पीट-पाटकर पुन: रास्ते पर लगा दिया– ‘जाके रथ पर केसो, ता कहँ कौन अँदेशो।’ अत: भगवान को प्रसन्न कर लेना ही सधुअई है। जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता है कि मनुष्य शरीर मिला है, इस पर ध्यान देना चाहिए। भजन करके हम कुछ खो नहीं रहे हैं। हाँ, भजन एक परमात्मा का ही करना चाहिए।
रामचन्द्र के भजन बिनु, जो चह पद निर्वान।
ग्यानवन्त अपि सो नर, पसु बिन पूँछ विषान।। (रामचरितमानस, ७/७८-क)
राम– एक परमात्मा के भजन के बिना यदि कोई निर्वाण अर्थात् कैवल्य पद चाहता है तो वह पशु है। अन्तर इतना ही है उसके पास केवल सींग और पूँछ नहीं है। अब चाहे पशु बनें या मानव, यह आपके हाथ में है।
।। श्रीगुरुदेव भगवान की जय।।
(‘अमृतवाणी भाग-2’ से उद्धृत)