छाओ छाओ हो फकीर गगन में कुटी
सन्त कबीर का यह भजन परमपूज्य गुरुदेव भगवान के कर्णकुहरों में उस समय पड़ा जब भगवान के निर्देशों के अनुपालन में आप भजन की मस्ती में नंग-धड़ंग, कभी कटिप्रदेश में सामान्य-सा चीवर लपेटे निराधार विचरण कर रहे थे। उन दिनों उत्तर प्रदेश के मनकापुर स्टेट गोण्डा में आपका परिभ्रमण चल रहा था। पूज्य महाराज जी रात-रात भर बैठकर भजन करने वाले महात्मा थे। निर्जन एकान्त खेतों की पगडण्डियों से चलते हुए आप कहीं बाँसों का झुरमुट तलाश लेते और सायंकाल होते ही उसी स्थल पर बैठकर चिन्तन में डूब जाते थे। आप दो-एक बार पैरों को ऊपर-नीचे कर लेते और सवेरा हो जाता।
एक रात जब महाराज जी झाड़ियों में बैठकर भजन कर रहे थे, दूर बड़ा उजाला दिखायी पड़ा। बीच-बीच में कुछ-न-कुछ हो-हल्ला, शोरगुल भी सुनायी पड़ जाता था। वाद्ययन्त्रों की ध्वनि भी यदा-कदा आ जाती थी। आपने सोचा, कहीं कोई उत्सव होगा! क्या प्रयोजन? भजन में लग गये। रात को दो बजे एक ऐसा भजन सुनाई पड़ा कि महाराज उठकर खड़े हो गये। भजन इतना साधनापरक था कि उसके बोल दुहराते, महाराज जी भीड़ को चीरते-फारते संगीत मंच के एकदम पास पहुँच गये। स्टेट की राजकुँअरी का विवाहोत्सव था। राजसी वैभव के साथ धूमधाम से बारात आयी थी। नृत्य-गान की महफिल में छत्तीसों राग-रागनियाँ बज रही थीं। प्रत्येक घड़ी का अलग-अलग राग गाया जा रहा था। उस समय नृत्यांगना सूफी संतों का-सा वेष बनाये, चूड़ीदार पैजामा-कुरता पहने, टोपी लगाये यह भजन गा रही थी। भजन योग-साधना से सम्बन्धित था इसलिए महाराज जी चाहते थे कि उसे जल्द याद कर लें किन्तु याद ही न हो; फिर भी जितना उन्हें याद था बड़े भाव से हमलोगों को सुनाया करते थे जिसे सुनकर अनुसुइया के नीरव शान्त-एकान्त में हफ्तों बीत जायँ कभी मन में उच्चाटन न हो, कोई स्फुरण न हो। महाराज जी ने बताया था कि, ‘‘हो! यह भजन सुनते ही हमारी श्वास एकदम बाँस की तरह खड़ी हो गयी।’’ भजन इस प्रकार है–
छाओ छाओ हो फकीर गगन में कुटी।।
आसन मारि मगन होइ बैठे, ध्यान धरे लउके त्रिकुटी।
छाओ छाओ हो…..।।
नेह की नींव करो मजबूती, सार सबद की भीत उठी।
छाओ छाओ हो…..।।
बुद्धि बड़ेर ज्ञान का कोरवा, भाव भगति की छानी बनी।
छाओ छाओ हो…..।।
दया दुआरि छमा का बेड़ा, शील सन्तोष की टाटी बनी।
छाओ छाओ हो…..।।
कहै कबीर अगम गोहरावै, आवागमन की फिकर मिटी।
छाओ छाओ हो…..।।
इस भजन में बताया गया है कि साधना आरम्भ कहाँ से किया जाय? अन्त में वह साधक स्वरूप की प्राप्ति करता है तो उसका मापदण्ड क्या है? सन्त कबीर ने कहा– ‘अगम गोहरावै’– जब परमात्मा स्वयं पुकारे तभी आवागमन की दुश्चिन्ता मिटती है, केवल मन के मान लेने से नहीं।
अब आइए, भजन की आरम्भिक पंक्ति पर विचार करें। ‘छाओ छाओ हो फकीर’– फकीर ईश्वर-पथ का वह लगनशील साधक है जिसने संसार की सारी चिन्ता, सारे फिकर त्यागकर, उनसे निर्लेप रहकर, अविचलित रहकर प्रभु के लिए प्रयत्नशील है। ऐसे फकीर का दायित्व क्या है? ‘छाओ छाओ हो फकीर’– छाओ-छाओ का तात्पर्य है निरन्तर लगे रहो। ऐसी कुटी फकीर ही छा सकता है। लेकिन छाये कहाँ? तो ‘गगन में कुटी’– गगन आकाश को कहते हैं, शून्य को कहते हैं। जब वायु से भी तीव्र चलने वाला यह मन अचल स्थिर ठहर जाय, संकल्प-विकल्प से रहित होकर शून्य में स्थिर हो जाय, यही अवस्था आकाश में टिकने की है। मन के अन्तराल में समग्र सृष्टि का निवास है–
असन बसन पसु बस्तु बिबिध बिधि, सब मनि महँ रह जैसे।
सरग नरक चर अचर लोक बहु, बसत मध्य मन तैसे।।
(विनयपत्रिका, पद १२४/३)
असन अर्थात् भोजन, वसन अर्थात् वस्त्र, पशु इत्यादि हर प्रकार की सुविधाएँ एक बहुमूल्य मणि से क्रय की जा सकती हैं, प्रकारान्तर से ये सब वस्तुएँ मणि में निवास करती हैं। ठीक इसी प्रकार स्वर्ग, नरक, अपवर्गपर्यन्त लोक-लोकान्तर इस मन के मध्य निवास करते हैं। जब जिसका क्रम आता है, यह मन पिण्ड रूप में फेंकता रहता है।
बिटप मध्य पुतरिका, सूत महँ कंचुकि बिनहिं बनाये।
मन में तथा लीन नाना तनु, प्रगटत अवसर पाये।।
(विनयपत्रिका, १२४/४)
जिस प्रकार एक वृक्ष में हर प्रकार का फर्नीचर विद्यमान है; सूत में हर प्रकार का वस्त्र विद्यमान है– साड़ी-चोली-कुर्ता बनायें या पैराशूट, कुछ भी बना लें; ठीक इसी प्रकार विधाता की अनन्त सृष्टि के कलेवर इस मन के अन्तराल में भी हैं। कर्मानुसार जब जिसका क्रम आता है, वैसा ही कलेवर मिलता रहता है।
यह मन वायु से भी तेज चलने वाला है। आप भजन में बैठते हैं तो भजन में मन नहीं लगता। हर भक्त की यही समस्या है कि मन नहीं लगता, किन्तु साधना के सही दौर में पड़कर, संकल्प-विकल्प से रहित होकर यह मन जब अचल स्थिर होकर शून्य में टिक जाता है वही ‘मन को मारि गगन चढ़ि जावे’– गगन में टिकना है। कबीर कहते हैं– फकीर! उसी गगन में कुटी बनाओ।
संसार में सभी घर बनाते ही रहते हैं। कोई समुद्र तट पर, कोई गाँव में, कोई वाटिका में, किसी का पचासों मंजिल का महल है, किसी ने देशभर में घर बना रखा है, सब जगह किले बना रखा है; किन्तु समय पूरा हो जाने पर सभी गिर जाते हैं। कुछ न कुछ टकरा जाता है, ऊँचे टावर ध्वस्त हो जाते हैं। किन्तु सन्त कबीर ने एक ऐसा स्थान चुन लिया जहाँ किसी की पहुँच ही नहीं। भौतिक पदार्थ उस कुटी के निर्माण में प्रयुक्त भी तो नहीं होते। वह कुटी दृष्टिगोचर नहीं है तो उसे कोई कैसे गिरायेगा? यह सन्तों की कुटिया है जिसमें–
आसन मारि मगन होइ बैठे, ध्यान धरे लउके त्रिकुटी।
हे फकीर! ऐसी कुटी में आसन मार कर मस्त होकर बैठ जाओ! आसन का अर्थ है– सीधा, शान्त होकर बैठ जाना। महर्षि पतञ्जलि कहते हैं– ‘स्थिर सुखमासनम्।’ (योगदर्शन, साधनपाद, सूत्र ४६)– स्थिर और सुखपूर्वक बैठना आसन है। बहुत से लोग आठ-आठ घण्टे एक आसन में बैठे रहते हैं किन्तु सुख शान्ति नहीं पाते, भीतर से कलपते-तड़पते रहते हैं। वस्तुत: सुख और दु:ख का उतार-चढ़ाव मन पर है। शरीर के आसन मारने से कहीं मन शान्त होता है? स्पष्ट है कि आसन का सम्बन्ध मन से है।
अग्रेतर सूत्र में महर्षि पतञ्जलि कहते हैं– ‘प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम्।’ (योगदर्शन, २/४७)- प्रयत्न की शिथिलता और अनन्त अर्थात् परमात्मा में मन लगाने से आसन सिद्ध होता है। यदि संसार में योगासनों के नाम से प्रचलित आसन होते तो प्रयत्न की शिथिलता या अनन्त परमात्मा के ध्यान की अनिवार्यता न होती। वस्तुत: योग-साधना में जो अभ्यास चल रहा है वह इतना परिपक्व हो चले कि स्वत: होने लगे, प्रयास करना न पड़े– यह है प्रयत्न की शिथिलता! साथ ही अनन्त परमात्मा में मन लगने से आसन सिद्ध होता है अर्थात् आसन मन से लगता है।
मान लें किसी ने आसन सिद्ध ही कर लिया तो उससे लाभ क्या है? महर्षि पतञ्जलि के ही शब्दों में ‘ततो द्वन्द्वानभिघात:।’ (योगदर्शन, २/४८)- आसन की सिद्धि से शीत-उष्ण, राग-द्वेष इत्यादि द्वन्द्वों का आघात नहीं होता। ये द्वन्द्व प्रभाव नहीं डाल पाते। शिशिरकाल में दिगम्बर रहने पर भी ध्यान लग जाने पर पूज्य गुरुदेव को शीत का भान भी नहीं होता था। अत: आसन मन के आसीन होने का नाम है।
आसन मारे क्या भया, गई न मन की आस।
ज्यों कोल्हू के बैल को, घर ही कोस पचास।।
आसन मार ही लिया तो क्या हो गया यदि मन की आशाएँ नहीं मिटीं! कोल्हू में जुता हुआ बैल घर के भीतर रहते हुए भी पचासों कोस का चक्कर लगा लेता है। इसी प्रकार मात्र शान्त बैठने वालों का मन भी न जाने कितनी दूरी का भ्रमण कर लेता है। इस प्रकार केवल बैठना आसन नहीं है। जब मन शान्त होकर अनन्त प्रभु के चरणों में स्थायित्व लेने लगे– यह आसन का आरम्भ है। मन जहाँ-जहाँ जाता है उसे खींचकर प्रभु के चरणों में स्थिर करो, मगन होकर प्रसन्न मुद्रा में ध्यान करो। ‘ध्यान धरे लउके त्रिकुटी’– शारीरिक स्तर पर दोनों भौंहों के मध्य के स्थान को त्रिकुटी कहा जाता है। ध्यान का आन्तरिक स्थल यही है, अभ्यास यहीं से शुरू करते हैं; किन्तु जैसे-जैसे तम, रज और सत्– ये तीनों गुण कूटस्थ होते जायँगे, अनुभव घना होता जायेगा। श्वास के साथ उठने वाले संकल्प तमोगुण, रजोगुण या सतोगुण प्रधान होते हैं। तीनों तरह के संकल्पों को रोकते हुए इष्ट के नाम-रूप में सुरत स्थिर करें। ज्योंही संकल्पों का प्रवाह शान्त हुआ– ‘लउके त्रिकुटी’– अनुभव जागृत हो जायेगा कि परमात्मा के आलोक में क्या-क्या है! जब तक साधक इन प्रपंचों को नहीं छोड़ता, भौतिक चिन्तन करता है तो भला कैसे दिखायी दे। तीनों गुण कूटस्थ हो जायँ, ध्यान जब इस स्तर से गुजरने लगता है तो ‘लउके’- दिखायी देने लगता है। ईश्वर कैसे बोलते, पढ़ाते, चलाते हैं, वह दृष्टि जागृत हो जाती है। इसीलिए सन्त कबीर फकीर से गगन में कुटी छाने के लिए अर्थात् शून्य में मन का निरोध करने के लिए कहते हैं।
कुटी छाने के उपकरण क्या होंगे? ‘नेह की नींव करो मजबूती’– नेह कहते हैं स्नेह को, प्रेम को! भजन की जागृति के लिए इष्ट के प्रति प्रेम नितान्त आवश्यक है। एक बार रावण के आतंक से समाज व्याकुल हो गया। धरती त्रस्त होकर देवताओं के पास गयी, ऋषियों के पास गयी। देवताओं ने कहा– हम भी तो रात-दिन उसी की सेवा में हैं। सब मिलकर ब्रह्मा के पास गये। विधाता ने विचार किया कि इस संकट का उपाय तो मेरे पास भी नहीं है। तुम जिस प्रभु की सेविका हो, वह हमारा-तुम्हारा, सबका रक्षक है। उससे प्रार्थना करो। अब ईश्वर को कहाँ ढूँढ़े?– चर्चा का विषय बन गया।
पुर बैकुण्ठ जान कह कोई।
कोउ कह पयनिधि बस प्रभु सोई।।
(रामचरितमानस, १/१८४/२)
किसी ने कहा– प्रभु बैकुण्ठ में रहते हैं; किसी ने प्रतिवाद किया कि तुम क्या जानो! वह तो क्षीरसागर में रहते हैं।
तेहिं समाज गिरिजा मैं रहेऊँ।
अवसर पाइ बचन एक कहेऊँ।।
(रामचरितमानस, १/१८४/४)
भगवान शिव ने कहा– उस समाज में मैं भी था किन्तु कुछ कहने का अवसर ही नहीं मिल रहा था। ज्योंही अवसर मिला, उन्होंने एक सूत्र बताया–
हरि ब्यापक सर्बत्र समाना।
प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना।।
(रामचरितमानस, १/१८४/५)
भगवान न क्षीरसागर में हैं, न बैकुण्ठ में। वह तो समान रूप से सर्वत्र हैं। वह प्रेम से प्रकट होते हैं। उनकी प्राप्ति का उपाय केवल प्रेम है।
राम राम सब कोई कहे, ठग ठाकुर अरु चोर।
बिना प्रेम रीझत नहीं, तुलसी नन्द किसोर।।
प्रेम अत्यन्त आवश्यक है। बिना प्रेम के भगवान कभी प्रसन्न नहीं होते।
प्रेम पियाला जिन पिया, शीश दक्षिणा देय।
लोभी शीश न दे सके, नाम प्रेम का लेय।।
प्रेम का प्याला पीने के लिए दक्षिणा में शीश देना पड़ता है। प्रेमी को अपने विचार, बुद्धि, सुझाव– सबकुछ इष्ट के चरणों में अर्पित कर देना होता है। ऐसा करने से प्रभु अपनी बुद्धि, अपना विचार, अपनी विभूति आपको प्रदान कर देंगे इसलिए प्रेम शिर के बदले में मिलता है। प्रभु प्रेम से प्रकट होते हैं इसलिए कुटी की बुनियाद ठोस प्रेम की होनी चाहिए। यदि नींव कमजोर है तो निर्माण स्थायी नहीं होगा। विपत्ति का साधारण-सा झटका भी प्रेमविहीन साधक झेल नहीं पाता इसलिए भजन के पथ में ‘नेह की नींव करो मजबूती’– प्रेम की नींव सुदृढ़ हो और ‘सार शबद की भीत उठी’– सार शब्द– ‘राम नाम जग सार, रसना हरि–हरि बोल।’ जगत् में सार मात्र प्रभु का नाम है।
अत्यन्त प्राचीनकाल में, आदिशास्त्र गीता में, वैदिक वाङ्मय में परमात्मा के लिए ओम् का उच्चारण होता था। कालान्तर में शास्त्र, शिक्षा, इतिहास और संस्कृति पर प्रतिबन्ध लग जाने से ओम् के जप के अधिकार-अनधिकार का प्रश्न उठने लगा तो भक्तिकालीन सन्तों ने राम शब्द के जप से काम चलाया। दोनों का अर्थ, परिणाम एक ही है। विविध भाषाओं में प्रभु के अनन्त नाम हैं किन्तु मूलत: उनका कोई नाम है ही नहीं। वह अनाम हैं, अरूप हैं तो भला उनका नाम कैसा! वस्तुत: उनके विविध नाम अनेकानेक दृष्टियों से उनके किसी न किसी विभूति के द्योतक हैं। ओम् अर्थात् वह परमात्मा हम सबके हृदय में निवास करता है, प्राप्तिकाल में स्वरूप में स्थिति दिलाता है। इसी प्रकार राम शब्द है– ‘रमन्ते योगिन: यस्मिन् स राम’– जिसमें योगी लोग रमण करते हैं, उसका नाम राम है। इसलिए यह किसी एक व्यक्ति या किसी एक पिण्ड का नाम नहीं है। अब योगी किसमें रमण करते हैं? यह एक प्रश्न है।
वस्तुत: ‘नाम लेत भव सिन्धु सुखाहीं।’ (रामचरितमानस, १/२४/३)– हम नाम क्यों जपते हैं? हमें भवसागर में डूबने का भय है। नाम कोई ऐसा उपाय है कि भवसागर ही सूख जाय। ‘नाथ नाम तव सेतु नर चढ़ि भव सागर तरहिं।’ (रामचरितमानस, लंकाकाण्ड, सोरठा २)– समुद्र के सुझाव पर भगवान ने जामवन्त को सेतु बनाने का निर्देश दिया। इस पर जामवन्त ने कहा– प्रभो! आपका नाम ही वह सेतु है जिस पर चढ़कर मनुष्य भवसागर पार हो जाता है। मनुष्य का हृदय जड़ चट्टान है। इस पर जब प्रभु का नाम अंकित हो जाता है तो यही भवसागर पर सेतु बन जाता है अर्थात् भवसागर पार होने का उपाय नाम है। यही सार शब्द है, अन्य कुछ भी सार नहीं है। इसी को निरन्तर (Continuous) जपें। इतना जपें कि ‘साधक नाम जपहिं लय लाएँ। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ।।’ (रामचरितमानस, १/२१/४)– साधक लौ लगाकर अर्थात् अत्यन्त रुचिपूर्वक नाम का जप करते हैं।
सुमिरन की झड़ी लगा दें कि उसकी दीवार खड़ी हो जाय। बीच में विराम नहीं कि दीवार रुक जाय या गिर पड़े। सार शब्द है नाम और उसका सतत् जप भीत या दीवार उठाना है, इस प्रकार ‘छाओ छाओ हो फकीर गगन में कुटी।’ आदिशास्त्र गीता में भी है– ‘सततं कार्यंकर्म समाचर’ (३/१९)- निरन्तर कार्यं कर्म करो। ‘अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।’ (६/३५)- निरन्तर अभ्यास और वैराग्य से मन वश में हो जाता है। ‘छाओ–छाओ’ की पुनरुक्ति का यही आशय है कि इसमें निरन्तर लगे रहें।
कुटी की नींव भर गयी, भीत उठ गयी; अब आवश्यकता पड़ती है बड़ेर की! दीवार के ऊपर की मोटी लकड़ी का नाम बड़ेर है। दीवार और बड़ेर का आधार लेकर कुरवा या कोरई ठोस पतला बाँस होता है। इस गगन कुटी की बड़ेर बुद्धि है। साधन में बुद्धि का भी सहयोग रहता है– ‘साधन करिय बिचारहीन मन सुद्ध होइ नहिं तैसे।’ (विनयपत्रिका, ११५/३)- लाख साधन करें यदि विवेक-विचार से युक्त नहीं हैं तो मन कदापि शुद्ध नहीं होगा। अत: स्मृति के साथ लगना चाहिए। पर स्मृति किन-किन चीजों की रखनी है? मात्र अपने पथ और लक्ष्य के अनुकूल सारी जानकारी होनी चाहिए। बुद्धि बड़ेरी है, ऊपर की मोटी लकड़ी है। विचारों के शीर्ष पर बुद्धि होनी चाहिए। उससे सम्बन्धित लकड़ियाँ ‘कोरवा’ ज्ञान का है। यम-नियम-आसन-प्राणायाम-धारणा-ध्यान और समाधि तथा अहिंसा-सत्य-अस्तेय-ब्रह्मचर्य-अपरिग्रह-शील-शौच-सन्तोष इत्यादि योगपथ के जितने भी अंग-उपांग हैं, सबकी भली प्रकार जानकारी कुरवा है। ये सब बुद्धि से जुड़े रहें, नामजप से जुड़े रहें। इस प्रकार विचारों से युक्त होकर लगें, कुटी छायें। यदि आप इस पथ की जानकारी से अनभिज्ञ हैं या जानकारी धूमिल है, कहीं संशय है तो ‘संशयात्मा विनश्यति’ (गीता, ४/४०)- उसका विनाश हो जाता है। अब बड़ेर और कुरवा के ऊपर छाजन या छानी होनी चाहिए तो–
भाव भगति की छानी बनी।
भाव में असीम बल है। लाख भजन करें, यदि श्रद्धा नहीं है तो कोई लाभ नहीं होता। ‘श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानम्’ (गीता, ४/३९)– श्रद्धावान् ही ज्ञान प्राप्त करता है। संयतेन्द्रिय ही ज्ञान प्राप्त करता है। भाव में वह क्षमता है कि भगवान वश में हो जाते हैं; किन्तु यदि भाव नहीं है तो ‘श्रद्धाविहीन दिया हुआ दान, जपा हुआ जप, तपा हुआ तप सब व्यर्थ चला जाता है।’ (गीता, १७/२८)। भाव के बिना भक्ति व्यर्थ चली जाती है इसलिए श्रद्धाभाव का होना नितान्त आवश्यक है। भक्ति की शुरुआत तो रोने-धोने से ही होती है। विरह, वैराग्य और तड़पन अन्त तक बनी रहे। अन्तत: भक्ति की अधिकतम सीमा है– ‘भग इति स भक्ति’– भग कहते हैं त्रिगुणमयी प्रकृति को, माया को! इसका अन्त हो जाय और परमात्मा ही शेष बचे।
भुसुण्डि जी को महर्षि लोमश ने भक्ति का आशीर्वाद दिया, भगवान शंकर ने भी अविरल रामभक्ति का वरदान दिया किन्तु जब परमात्मा का दर्शन हुआ तो उन्होंने कहा–
काकभुसुण्डि मागु बर, अति प्रसन्न मोहि जानि।
अनिमादिक सिधि अपर रिधि, मोच्छ सकल सुख खानि।।
(रामचरितमानस, ७/८३-ख)
आजु देउँ सब संसय नाहीं।
मागु जो तोहि भाव मन माहीं।।
(रामचरितमानस, ७/८३/२)
योग, विराग, ज्ञान, विज्ञान, सम्पूर्ण सुख की खानि मोक्ष माँग लो, जो भी चाहिए। काकभुसुण्डि उदास हो गये। वह मन ही मन विचार करने लगे–
प्रभु कह देन सकल सुख सही।
भगति आपनी देन न कही।।
भगति हीन गुन सब सुख ऐसे।
लवन बिना बहु बिंजन जैसे।।
(रामचरितमानस, ७/८३/४, ५)
भगवान सबकुछ तो दे रहे हैं किन्तु भक्ति देने का नाम नहीं ले रहे हैं। भक्ति के बिना सारे गुण, सारे सुख ऐसे हैं जैसे नमक के बिना अनेकों प्रकार के व्यंजन जिनमें जैसे कोई स्वाद ही न हो। काकभुशुण्डि ने कहा–
जौं प्रभु होइ प्रसन्न बर देहू।
मो पर करहु कृपा अरु नेहू।।
मन भावत बर मागउँ स्वामी।
तुम्ह उदार उर अंतरजामी।।
(रामचरितमानस, ७/८३/७-८)
प्रभो! यदि आप प्रसन्न होकर वर देना ही चाहते हैं तो मैं मनचाहा वर माँगता हूँ। आप अन्तर्यामी हैं, जानते हैं कि मैं क्या चाहता हूँ!
अबिरल भगति बिसुद्ध तव, श्रुति पुरान जो गाव।
जेहि खोजत योगीस मुनि, प्रभु प्रसाद कोउ पाव।।
(रामचरितमानस, ८४ क)
अविरल भक्ति जिसे योगेन्द्र मुनिवर्य चाहते हैं, जो भक्ति कभी घटे-बढ़े नहीं– ऐसी भक्ति मिल जाय! भगवान बहुत खुश हुए, प्रदान किया।
विचारणीय है कि भक्ति के द्वारा भक्त भगवान को ढूँढ़ते हैं। यहाँ भगवान सामने खड़े हैं, मिल गये; फिर भी भक्ति के लिए रोना अभी शेष ही है। भुशुण्डि को भगवान मिल तो गये किन्तु वह अलग और भगवान अलग खड़े थे। दोनों विभक्त थे। विभक्त का अर्थ है अलगाव; भक्त का अर्थ है तद्रूप मिल जाना। भक्ति की पूर्णता तब है जब प्रकृति का अन्त हो जाय, परमात्मा का स्वरूप ही शेष बचे। भगवान ने भुशुण्डि को तुरन्त अपना स्वरूप दे दिया किन्तु साधनावस्था में सन्त कबीर कहते हैं कि बुद्धि की बड़ेर, ज्ञान का कोरवा और भावपूर्ण भक्ति की छानी (छाजन) बन गयी। अब इसे भेदकर न शोक-सन्ताप की लहरियाँ आयेंगी और न प्रकृति का ताप ही आ सकेगा। ऐसे महापुरुष की रहनी पर प्रकाश डालते हैं–
‘दया दुआर क्षमा का बेड़ा’
सन्त दयालु होते हैं। उनकी दया का द्वार खुला रहता है। सृष्टि में मनुष्य दो प्रकार के होते हैं– एक तो दया चाहने वाले श्रद्धालु और दूसरे उच्छृंखल स्वभाव के लोग जो अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति हेतु याचना करते हैं। एक दैवी प्रकृति के तो दूसरे आसुरी स्वभाव के लोग हैं। इनमें जो दैवी स्वभाव के हैं, दया के पात्र हैं। उनको दया मिलती रहे–
राम झरोखे बैठकर, सबका मुजरा लेहिं।
जैसी जाकर चाकरी, वैसी वाको देहिं।।
किन्तु जब उद्दण्ड टकराये तो क्षमा का बेड़ा लगा दें, उसे क्षमा कर दें। यदि उसकी उद्दण्डता को सन्त ले ले तो अपने श्रेय से च्युत हो जायेगा। ऐसे लोगों के लिये क्षमा का बेड़ा अवरोध लगा लें जिससे उनका उग्र रूप सन्त तक न पहुँच सके।
इस स्थिति के एक महापुरुष ईसा हुए हैं। वह दिन-रात दुखियों का दु:ख-दर्द सुना करते थे, सच्चा उपदेश देते थे। कोढ़ियों को काया, रोगी को नीरोग, अन्धों को आँखें देते ही रहे। कुछ लोगों को उनकी यह सेवा भी अच्छी न लगी। पोप-पादरी, धर्माधिकारी, मठाधीशों को अपना प्रभाव कम होता प्रतीत हुआ। रूढ़िवादी धर्मावलम्बियों ने राज्याधिकारियों से शिकायत की– ईसा अनर्थ कर रहे हैं। हमारे धर्मग्रन्थ में है कि परमात्मा ने छ: दिनों में पृथ्वी और सृष्टि की रचना की, सातवें दिन विश्राम किया। इस ईशू ने विश्राम के दिन उस अन्धे को आँख दी, काम किया। इसने धर्मशास्त्र के विरुद्ध काम किया, घोर अपराध किया। अधिक आन्दोलन हुए। ईसा पकड़े गये। उन्हें आरोप सुनाया गया। वह बोले– कुछ काम ऐसे होते हैं जिनमें अवकाश नहीं होता। कल तक वह अन्धा भिखारी न जाने कहाँ होता? कदाचित् भेंट होती भी या नहीं! अन्धा का अन्धा ही रह जाता बेचारा! कल तक मेरे ही जीवन का कौन ठिकाना? एक गरीब का उपकार करने से मैं वंचित रह जाता। मान लें आपके देश पर किसी ने आक्रमण कर दिया, ऐसी परिस्थिति में क्या रविवार को अवकाश देंगे? धर्माधिकारियों के दबाव में ईसा को शूली की सजा सुनाई गयी। ईसा ने प्रभु से प्रार्थना किया, प्रभु! ये अज्ञानी हैं, अबोध हैं, इन्हें क्षमा किया जाय। स्वयं ईसा ने क्षमा किया ही! जो सन्त अन्धों को दृष्टि दे सकता है, कोढ़ियों को नीरोग कर सकता है; क्या अपने विरोधियों का अन्त नहीं कर सकता? किन्तु ईसा ने क्षमा का बेड़ा लगा दिया। इनकी उद्दण्डता वहाँ न टकराने पाये, इसके लिए क्षमा की बाड़ लगा दी।
दया और क्षमा के अतिरिक्त इस कुटी में ‘शील सन्तोष की टाटी बनी। छाओ छाओ हो फकीर गगन में कुटी।।’– शील साधुता के गुणधर्मों को कहते हैं। साधुता के सारे साधन जब सध जायँ, सधकर सामने से गुजरने लगें उसे शील कहते हैं। उस अपनी रहनी से, भजन की उत्तरोत्तर वृद्धि से संतुष्ट होकर चलना चाहिए। इसकी टाटी बना लें, कवच बना लें जिससे अन्य विजातीय संकल्पों का स्फुरण भी न हो। यदि कोई भजन तो करता है किन्तु रहनी और लक्ष्य से संतुष्ट नहीं है तो असंतुष्ट मन कहीं-न-कहीं जरूर भागेगा, वासनाओं में खिंच जायेगा। इसीलिए शील और सन्तोष की टाटी भी कुटी में आवश्यक है।
गौतम बुद्ध सत्य की खोज में विचरण कर रहे थे। मगध नरेश महाराज विम्बिसार उनसे मिलने आये। उन्होंने सिद्धार्थ से कहा, ‘‘आप राज्य करने योग्य हैं। मेरा आधा राज्य स्वीकार करने की कृपा करें। यदि दान लेने में संकोच हो रहा हो तो मेरे साथ तलवार लेकर अश्व पर आरूढ़ हों, आपका राज्य स्थापित कराने में मुझे प्रसन्नता होगी।’’ बुद्ध ने कहा, ‘‘राजन्! मैंने किसी भय या राग-द्वेष के कारण गृहत्याग नहीं किया है। मैंने खूब सोच-समझकर इस जिज्ञासा से गृहत्याग किया है कि सत्य क्या है? दु:खों का स्रोत क्या है? मोक्ष का उपाय क्या है? या तो मैं इन्हें जानूँगा या मृत्यु को प्राप्त होऊँगा! लोक में ऐसा कोई प्रलोभन नहीं है जो मुझे अपनी ओर आकर्षित कर सके।’’ इस प्रकार महामानव बुद्ध शील में रमे थे, अपने लक्ष्य से संतुष्ट थे। राज्य का लोभ भी उन्हें चलायमान नहीं कर सका और एक दिन गौतम बुद्ध पार हो गये। हर साधक के लिए आवश्यक है कि शील अर्थात् साधुता की कसौटी पर अपने को कसता जाय और उससे सन्तोष प्राप्त करता जाय, इसकी टाटी बना ले।
जब इतना करते बन गया तो भगवान पुकारने लगते हैं– ‘कहै कबीर अगम गोहरावै, आवागमन की फिकर मिटी। छाओ छाओ हो फकीर गगन में कुटी।।’। कबीर कहते हैं– ‘अगम गोहरावै’– अगम, अपार, एकरस, अखण्ड परमात्मा है। वह परम प्रभु है। जो कण-कण में व्याप्त है, अचिन्त्य-अगोचर है, वह बुलाता है। जहाँ उसने पुकार लिया तो आवागमन अर्थात् जन्म-मृत्यु की चिन्ता ही मिट गयी।
पूज्य महाराज जी कहा करते थे– ‘‘हो! भगवान ने वहाँ ऐसा उपदेश दिया, वहाँ भगवान ने हमें पतित होने से बचा लिया और वहाँ भगवान ने मुझे यह विभूति दी।’’ हमने कहा– ‘‘महाराज जी! क्या भगवान भी बोलते हैं? बातें करते हैं?’’ महाराज जी ने कहा– ‘‘हाँ हो, भगवान ऐसे ही बतियावा करते हैं जैसे हम-तुम बैठकर बातें करें, घण्टों बतियाईं और क्रम न टूटे।’’ हमारे लिए यह नयी बात थी इसलिए समझ में नहीं आया यह क्या कहते हैं! हम उदास हो गये। एक पन्द्रह मिनट बाद महाराज जी बोले– ‘‘काहे घबरात है? तोहूँ से बतिअइहैं।’’ वस्तुत: उनका कथन अक्षरश: सत्य निकला।
सम्पूर्ण अवनि मण्डल के एकछत्र सम्राट महाराज मनु के मन में एक बार अपार दु:ख हुआ कि घर में रहते चौथापन आ गया, विषयों से वैराग्य भी नहीं होता। गृहत्याग कर वे नैमिषारण्य पहुँचे, ऋषियों से मिले, साधन-क्रम समझा और भजन में लग गये। उन्होंने इतना तप किया कि ‘अस्थि मात्र होइ रहे सरीरा।’– शरीर कंकाल मात्र शेष बचा। ‘बिधि हरि हर तप देखि अपारा। मनु समीप आये बहु बारा।।’ (रामचरितमानस, १/१४४/२)। महाराज मनु सृष्टि के सम्राट थे तो देवाधिदेव ब्रह्मा, विष्णु, महेश– तीनों बार-बार उनके पास आये। ‘मागहु बर बहु भाँति लोभाए’– वे कुछ दे नहीं रहे थे; ‘वर माँगो, वर माँगो’– ऐसा कहकर प्रलोभन दे रहे थे। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य– ये षड् विकार हैं। इनमें से एक विकार लोभ को ही बढ़ावा दे रहे थे किन्तु मनु विचलित नहीं हुए। यह भी नहीं कहा कि देव! हमारा सौभाग्य कि आप पधारे। वह शान्त भजन में लगे रहे।
परमात्मा ने देखा कि यह अनन्य भाव से मुझमें लगे हैं। शील और उसी में संतुष्ट हैं, मन-क्रम-वचन से मेरे भक्त हैं तो आकाशवाणी हुई– ‘मृतक जिआवनि गिरा सुहाई।’– यह संसार मरणधर्मा है। इस मानव को अमृत पद देनेवाली वाणी जब मनु के हृदय में गूँजी तो ‘हृष्ट पुष्ट तन भये सुहाए। मानहुँ अबहिं भवन ते आए।।’– उन्हें ऐसा लगा कि अभी-अभी हम महल से निकले ही थे कि भगवान मिल गये, बड़ी सरलता से मिल गये जबकि श्रम इतना किया था कि ‘अस्थिमात्र होइ रहे सरीरा।’
प्रभु जब कृपा करके देख लेते हैं, पुकार लेते हैं तो साधन-श्रम विस्मृत हो जाता है। ‘जेहि जानें जग जाइ हेराई। जागें जथा सपन भ्रम जाई।।’ (रामचरितमानस, १/१११/२)– उन्हें जान लेने के बाद जगत् खो जाता है; जैसे जग जाने पर स्वप्न का भ्रम स्वत: मिट जाता है। जब वह मिट ही गया तो दु:ख का भान किसे हो। इसीलिए महाराज मनु को लगा मानो अभी महल से चले आये हों, हमने श्रम किया ही नहीं, प्रभु हमें अनायास ही मिल गये। इस गगन गिरा की कबीर भी पुष्टि करते हैं कि ‘अगम गोहरावै’– भगवान ने पुकारा; अब ‘आवागमन की फिकर मिटी’- जन्म-मृत्यु का बन्धन समाप्त हो गया।
पूज्य गुरुदेव इस पर बहुत जोर दिया करते थे। वह हम साधकों को बार-बार सचेत करते रहते थे– ‘‘हो! पूरा संसार एक स्वर से तुम्हें साधु कहे, तुम्हें उस प्रशंसा से कुछ भी नहीं मिलेगा। एक दिन रोने को आँसू तक नहीं मिलेगा। केवल तुम्हारी आत्मा तुम्हें साधु कह दे, भगवान तुम्हें साधु कह दें, तुम सबकुछ पा जाओगे। दुनिया कहे चाहे कभी न कहे; आत्मा तुम्हें साधु मान ले तो तुम्हारे पास कोई कमी कभी नहीं रहेगी।’’
‘न जायते म्रियते वा कदाचित्’– जन्म और मृत्यु से परे केवल परमात्मा है। ‘नायं भूत्वा भविता वा न भूय:। अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराणो, न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।’ (गीता, २/२०)- अजन्मा, शाश्वत, नित्य एक परमात्मा है। उस परमात्मा की प्राप्ति हो जाने पर आवागमन, जन्म-मरण का टकराव नहीं होता अर्थात् इस स्थिति के लिए भजन नितान्त आवश्यक है। भजन इस प्रकार करना चाहिए कि चित्त संकल्प-विकल्प से रहित शून्य में टिक जाय। श्वास में सुरत की डोरी लग जाय, जहाँ मानसिक वृत्तियाँ कूटस्थ हुईं– तत्काल कुटी बनकर तैयार हो जायेगी। आसन मार लो, पुन: मन को ध्यान में लगाओ। इस प्रकार आप अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेंगे। हर साधक को साधन-क्रम की जानकारी होनी चाहिए। गगन कुटीर की नींव स्नेह से भरी जाती है। सारशब्द नाम का जप है, इसी की दीवाल बनती है। बुद्धि और विचार से युक्त होकर ‘ज्ञान का कोरवा’– जानकारी के साथ, स्मृति के साथ लगने का विधान है। भक्ति भावपूर्ण होनी चाहिए। हमारा चित्त कभी संयम से अलग न हो। सत्पात्रों के लिए दया और आसुरी स्वभाववालों के प्रति क्षमा का भाव रहे। ऐसे महापुरुष को ‘अगम गोहरावै’– प्रभु पुकारते हैं और उनके रीझते ही आवागमन की चिन्ता ही समाप्त हो जाती है।
!! बोलिये श्री सद्गुरुदेव भगवान की जय !!
(‘अमृतवाणी भाग-1’ से उद्धृत)