सद्गुरु की हाट अलग लागी
सद्गुरु की हाट अलग लागी।
वस्तु अमोल खोल गुरु बैठे, लेवेगा कोई बड़भागी।
सद्गुरु की……..
आये व्यापारी सौदा करि गये, जनम जनम के अनुरागी।
सद्गुरु की……..
पड़ा रहे मैदान गढ़ी में, सकल कामना जिन त्यागी।
सद्गुरु की……..
कहे कबीर सुनो भाई सन्तो! भगति भीख उनसे मागी।
सद्गुरु की……..
आरम्भ में भगवान राम जब तक अयोध्या में थे, एक भी महात्मा से भेंट नहीं हुई। एक महात्मा विश्वामित्र से उनका सम्पर्क अवश्य हुआ था किन्तु वह भी सिद्धाश्रम से, भयंकर ताड़का वन से अयोध्या पहुँचे थे और कुछ काल पश्चात् वहीं लौट गये; क्योंकि सन्तलोग एकान्त में रहते हैं। किन्तु वनवास के आरम्भ में ही प्रयागराज में रामजी को महर्षि भरद्वाज के दर्शन हुए। भरद्वाज ऋषि ने रामजी को विदा करते हुए कहा– राम! इस पगडण्डी से चले जाओ, आगे यमुना नदी मिलेगी। यमुना के पास तमाम सूखी लकड़ियाँ गिरी पड़ी हैं। बहुतायत बाँस हैं। उन्हें लताओं से बाँधकर बेड़ा बना लेना। पहले सीताजी को उस पर बैठाना, सामान रख लेना और दोनों भाई डाँड़ चलाते हुए उस पार चले जाना। उस पार एक श्यामवट है। बहुत से महात्मा वहाँ तपस्या करते हैं, बड़ी पवित्र जगह है। सीता दोनों हाथ जोड़कर उस वृक्ष से आशीर्वाद की याचना करें। वहीं से जंगलों के बीच से चित्रकूट जाने का मार्ग है।
विचारणीय है कि जिस इलाहाबाद में आदमी आज चींटियों की तरह भरे पड़े हैं, वहाँ उन दिनों भयंकर जंगल था। यमुना के किनारे तमाम सूखी लकड़ियाँ पड़ी थीं, घनघोर जंगल था। वन-प्रवेश के साथ ही भरद्वाज मुनि मिले। वहाँ से आगे जाने पर वन में ही महर्षि बाल्मीकि, महर्षि अत्रि, महासती अनुसुइया, अनेकानेक ऋषियों के आश्रम! इसके पश्चात् मिल गये शरभंग, सुतीक्ष्ण, तपोधन अगस्त्य, शबरी, मतंग इत्यादि। महात्माओं की कतार लग गयी। उस एकान्त में साधन-भजन की दृष्टि से वे सब परम सुखी थे किन्तु निशाचरों का उत्पात उनके पीछे भी कम नहीं था। असुर लोग जिसे भी साधना से लापरवाह पाते, उसे खा लिया करते थे। हाँ, अगस्त्य, अत्रि, शरभंग, सुतीक्ष्ण इत्यादि ऐसी विभूतियाँ थीं जिन पर इन निशाचरों का प्रभाव काम नहीं करता था। ये सन्त परम विवेकी थे, योगेश्वर थे, सद्गुरु थे। इनकी हाट सांसारिक बस्तियों से अलग-थलग शान्त-एकान्त में लगी हुई थी। इसी प्रकार कागभुशुण्डि भी गुरु की खोज में जंगल की ही ओर गये–
जहँ जहँ बिपिन मुनीस्वर पावउँ।
आश्रम जाइ जाइ सिरु नावउँ।। (रामचरितमानस, ७/१०९/१०)
आज खोजना हो तो आपको काशी में ही दसियों हजार मुनीश्वर मिल जायेंगे। प्रयाग में भी मिल जायेंगे। हर गाँव में महात्मा लोगों की कुटिया है लेकिन कागभुशुण्डि वहाँ नहीं गये। उन्होंने विपिन में मुनियों का दर्शन किया, उन्हें सादर प्रणाम किया।
बूझउँ तिन्हहि राम गुन गाहा।
कहहिं सुनउँ हरषित खगनाहा।। (रामचरितमानस, ७/१०९/११)
हे गरुड़जी! मैं उनसे राम का गुणगान पूछता था। वे सप्रेम मुझसे कहते थे और मैं प्रसन्नतापूर्वक उसे सुनता भी था लेकिन सन्तोष कहीं नहीं मिला। शनै:-शनै: घूमते हुए वह लोमश ऋषि के पास पहुँचे–
मेरु सिखर बट छायाँ मुनि लोमस आसीन।
देखि चरन सिर नायउँ बचन कहेउँ अति दीन।। (रामचरितमानस, ७/११० ख)
सत्संग में कुछ उत्तर-प्रत्युत्तर के पश्चात् मुनि को क्रोध हो आया। उन्होंने मुझे श्राप दे दिया किन्तु फिर भी मेरी विनम्रता और ईश्वर के प्रति जिज्ञासा देख उन्हें विश्वास हो गया कि यह अधिकारी है, तो ‘हरषित राम मन्त्र तब दीन्हा।’– इसके साथ ही ‘बालक रूप राम कर ध्याना।’– ध्यान बताया और,
मुनि मोहि कछुक काल तहँ राखा।
रामचरित मानस तब भाषा।। (रामचरितमानस, ७/११२/९)
मुझे रामचरितमानस सुनाया। पहले दिया मंत्र अर्थात् नाम, दूसरा बताया ध्यान अर्थात् रूप, और तीसरा दिया रामचरितमानस अर्थात् ब्रह्मविद्या (सभी महापुरुषों का तरीका एक, सभी का उपदेश एक, ठीक यही तीनों साधन गुरु महाराज से हमें भी मिला)। तीनों प्रदान करने के पश्चात् महर्षि लोमश अन्त में बोले– ‘रामचरित सर गुप्त सुहावा।’– यह रामचरित अत्यन्त गोपनीय है, इसे संसार में कोई नहीं जानता। क्यों? इतनी बड़ी घटना हुई, रावण मरा, इसे पूरे संसार ने जाना, लोगों ने दीप जलाये, खुशियाँ मनायी, और इसी क्रम में,
राम राज बैठें त्रैलोका।
हरषित भए गये सब सोका।। (रामचरितमानस, ७/१९/७)
राम का राज्याभिषेक होते ही तीनों लोकों का शोक समाप्त हो गया, खुशी की लहर दौड़ गयी। यह तो प्रसिद्ध ऐतिहासिक घटना है। सारे संसार में रामकथा प्रचलित है। सभी इसे जानते थे; किन्तु महर्षि कहते हैं– यह गुप्त है, इसे कोई नहीं जानता। ऐसा कहने में उनका आशय क्या है?
वस्तुत: शास्त्र दो दृष्टियों से लिखा जाता है। पहला उद्देश्य रहता है इतिहास को जीवन्त रखना जिससे लोग पूर्वजों के पदचिह्नों पर चल सकें, मर्यादित जीवन जी सकें; किन्तु कुशलतापूर्वक जी-खा लेने से, आयु के दिन पूरे कर लेने मात्र से जीव का कल्याण संभव नहीं है। इसीलिए शास्त्र लिखने का दूसरा लक्ष्य रहता है कि उस महान घटना के माध्यम से अध्यात्म की शिक्षा प्रदान करना। संसार का हर जीव माया के आधिपत्य में है। माया जैसा चाहती है, सबको वैसा ही नाच नचाती है। इस जीव को माया की अधिकृत भूमि से निकालकर आत्मा की अधिकृत भूमि में प्रवेश दिला देना, उसे आत्मा के संरक्षण में लाना अध्यात्म है। उसी इष्ट (आत्मा) के निर्देशन में चलते हुए परमतत्त्व परमात्मा का दर्शन, स्पर्श, प्रवेश और उसी परमात्मा में स्थिति दिलाना अध्यात्म की पराकाष्ठा है, चरमोत्कृष्ट सीमा है। यह आत्मिक जागृति अत्यन्त दुर्लभ है, गोपनीय है। यह जागृति वाणी से कहने में या लेखनी से लिखने में नहीं आती, इसीलिए लोमशजी ने कहा–
राम चरित सर गुप्त सुहावा।
संभु प्रसाद तात मैं पावा।। (रामचरितमानस, ७/११२/११)
यह रामचरित अत्यन्त गुप्त है, परम मनोहर है, मन को बाँध रखने में सक्षम है। इसे हमने शंकरजी की कृपा से प्राप्त किया था।
तोहि निज भगत राम कर जानी।
ताते मैं सब कहेउँ बखानी।। (रामचरितमानस, ७/११२/१२)
हमने तुम्हें राम का अन्तरंग भक्त समझकर इसका विस्तार से वर्णन किया है, इसलिए तुम भी सदैव ध्यान रखना कि–
राम भगति जिन्ह कें उर नाहीं।
कबहुँ न तात कहिअ तिन्ह पाहीं।। (रामचरितमानस, ७/११२/१३)
जिसके हृदय में राम की भक्ति न हो, उसे यह कभी मत कहना, भूलकर भी नहीं कहना। इतना ही नहीं, मानसकार तो यहाँ तक कहते हैं– ‘कहिअ न लोभिहि क्रोधिहि कामिहि।’ आप ही बतायें, यहाँ जितने लोग बैठे हैं, सबमें क्या काम नहीं है? आपमें क्रोध है या नहीं? लोभ है, मोह है, राग है, द्वेष है…. जब यह विकार प्राणिमात्र में हैं तो कहा किससे जाय? यह सत्संग नहीं जो सुनने आप यहाँ बैठे हैं, महर्षि लोमश उस रामचरित को गुप्त कहते हैं जो केवल ऋषि-परम्परा में है, अधिकारी साधक के लिए है।
वैसे, यह पूरा का पूरा रामचरितमानस ब्रह्मविद्या भी है– ‘बुध बिश्राम सकल जन रंजनि। रामकथा कलि कलुष बिभंजनि।।’ (रामचरितमानस, १/३०/५)– सामान्य जन इसे पढ़-सुन-समझकर प्रसन्न होते हैं तो बौद्धिक मनीषा को इसमें विश्राम मिलता है, साथ ही इसमें निहित ब्रह्मविद्या कलि-कलुष का उन्मूलन कर देनेवाली है। कथा एक, आयाम तीन!
रामचरितमानस के समस्त कथानकों का आध्यात्मिक पक्ष भी है। संकेत के रूप में महर्षि लोमश का आश्रम देखें– ‘मेरु सिखर बट छायाँ मुनि लोमस आसीन।’ दिव्य सुमेरु पर्वत! हिमाच्छादित उन्नत शिखर! मानसरोवर से भी ऊँचाई की जलवायु में वटवृक्ष हो सकता है क्या? इसी प्रकार कागभुशुण्डिजी ने अपना निवास बनाया, वह भी पर्वत शिखर पर! उसकी चोटी पर जलाशय! तालाब में मणिखचित सीढ़ियाँ! पर्वत शिखर पर चार कोने पर चार वृक्ष! बीच में आश्रम! हंस ही वहाँ कथा श्रवण करने जाते थे।
कैसे हैं महापुरुषों के ये आश्रम! इनसे स्पष्ट होता है कि सृष्टि में आज तक जितने भी महापुरुष हुए हैं, जंगलों में, पर्वत-शिखरों पर हुए हैं, घरों में कभी नहीं। घरों में साधना होती है, भजन होता है। इसलिए सद्गृहस्थ आश्रमीय आप सब खेती करते हुए, खुरपी चलाते हुए, लड़का खिलाते-खेलाते हुए भगवान के दो-ढाई अक्षर के किसी नाम का जो सीधे उन प्रभु का परिचायक हो, जैसा हमारे गुरु महाराज कहते थे– राम या ओम् का जप करें। आप न काम छोड़ें, न क्रोध छोड़ें, न मोह छोड़ें! कुछ भी छोड़ने की जरूरत नहीं है। केवल एक प्रभु से रिश्ता जोड़ लें। आपको रास्ते की सही जानकारी होनी चाहिए। उस भगवत्-पथ को समझने के लिए आप सबको पढ़ना-सुनना-समझना होगा गीता, जिसका यथावत् भाष्य ‘यथार्थ गीता’ है। इसके पश्चात् आपको चाहिए सन्तों का सत्संग! इतने से ही आपको रास्ता मिल जायेगा। जहाँ भजन-साधन का स्तर उठा, फिर हम घर नहीं छोड़ेंगे, घर ही हमको छोड़ देगा। भगवत्-पथ से भागने का रास्ता नहीं मिलेगा। हम घर पर रहना चाहेंगे किन्तु जब रहने की जगह हो तब ना! भगवान जब कृपा करते हैं, घर छुड़ा देते हैं और तभी निवृत्तिवाला उन्नत श्रेणी का भजन आरम्भ होता है।
गुरु महाराजजी का कहना था, ‘‘भगवान आदेश न दें तब तक घर छोड़ना पाप है और आदेश दे दें तो घर में रहना भी पाप है। मोके आदेश देके ही घर छुड़वाया है। हमार तनिकौ घर छोड़ै का मन नही रहा हो!’’ महाराजजी बताते थे कि ‘‘पहलवानी का अच्छा अभ्यास था। बढ़िया शरीर, बादाम-पिस्ता, पावभर घी और पाँच किलो दूध, आधा किलो बादाम रोज छन रही थी। वह तो माँ मोरे पीछे पड़के जबरदस्ती ब्याह करा दिया और मेहरियो चिकन-चिकन गोर के रही, नगदै रही! लेकिन भगवान ने हमारा कान पकड़कर घर छुड़ा दिया। हो, मुझे भगवान ने साधु बनाया है, मैं सचहूँ के साधू हूँ।’’ गुरु महाराजजी ने भी पकड़ा तो एकान्त! अपने शिष्यों को भेजा तो एकान्त जंगल! इसीलिए कबीर कहते हैं–
सद्गुरु की हाट अलग लागी।
सद्गुरु का निवास अलग-थलग, शान्त-एकान्त में है। उनके पास है क्या?–
वस्तु अमोल खोल गुरु बैठे…
उनके पास अनमोल वस्तु है जिसका मूल्य कोई चुका नहीं सकता। पूरा राज्य दे दें, सर्वस्व दे दें तब भी कीमत नहीं चुका पायेंगे। माता मीरा ने, कबीर ने, तुलसी ने इसकी बहुमूल्यता पर बल दिया– ‘पायो जी मैं तो नाम रतन धन पायो। वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुर…’। यदि राज और नौलखा हार देने से मिल जाता तो महारानी मीरा उसे खरीद लेतीं लेकिन उन्होंने निर्णय दिया, एक महारानी ने निर्णय दिया कि मेरे सद्गुरु ने अत्यन्त बहुमूल्य वस्तु प्रदान की है। गुरुजी ने क्यों दे दिया? तो ‘किरपा करि अपनायो’ यह भी उनकी कृपा ही है। वास्तव में भजन एक जागृति है। राम-राम कोई जपता रहे किन्तु जब तक सद्गुरु हृदय से, आत्मा से अभिन्न होकर जागृत न हो जायँ, मार्गदर्शन न करने लगें, तब तक भजन आरम्भ ही नहीं हुआ। यह भजन की प्रवेशिका हो सकती है किन्तु पूर्ण निवृत्ति दिला देनेवाला भजन उसके पास नहीं है। वास्तव में सद्गुरु के शरण-सान्निध्य से, उनके निर्देशन के अनुसार साधना और टूटी-फूटी सेवा से वह सद्गुरु आपके हृदय से, आत्मा से अभिन्न होकर स्वयं ही प्रसारित हो जाते हैं, उपदेश देने लगते हैं। प्रभु मार्गदर्शन करने लगते हैं। आत्मा, परमात्मा, सद्गुरु– ये पर्यायवाची शब्द हैं। इसी को मीरा ने कहा कि यह अमोलक वस्तु है, मूल्य से नहीं मिलती, सद्गुरु ने करुणा और कृपा करके ही दी है। यही गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि अर्जुन! हृदयस्थ ईश्वर की शरण जाओ। उनकी कृपा-प्रसाद से तुम परम शान्ति प्राप्त कर लोगे और ‘स्थानम् प्राप्स्यसि शाश्वतम्’ (गीता, १८/६२) शाश्वत धाम पा जाओगे। तुम रहोगे, तुम्हारा निवास रहेगा, तुम्हारा जीवन रहेगा। वही जीवन सराहनीय है जिसके पीछे मृत्यु न हो; और यह सद्गुरु से सम्भव है। यही अनमोल वस्तु उनके पास है जिसे सबके लिए सुलभ करके उन्होंने रखा है। फिर भी सब उसे नहीं लेते– ‘लेवेगा कोई बड़भागी’– जन्म-जन्म से चले हुए पुण्यशील व्यक्ति ही उसे ले पाते हैं।
गौतम बुद्ध का जन्म हुआ। ज्योतिषियों ने कहा– यह बालक बहुत बड़ा महात्मा होगा या चक्रवर्ती सम्राट! राजा ने कहा– सम्राट हो जाये, लेकिन यह साधू न होने पाये, भिक्षु न होने पाये। लेकिन समय पर संस्कार ने, भाग्यरेखा ने काम किया, बुद्ध महापुरुष हो गये। इस प्रकार जिनके संस्कारों की रेखा कल्याण की दिशा पर है, ऐसे भाग्यशाली लोग ही उसे खरीदते हैं। सांसारिक लोग तो सद्गुरु के पास जाकर भी सांसारिक कामनाओं की याचना करते हैं कि महाराज! पुत्री का विवाह हो जाय, नौकरी में प्रमोशन हो जाय, नौकरी लग जाय, रोग ठीक हो जाय, सम्पत्ति चौगुनी हो जाय– वहीं तक उनकी समझ है। उन्हीं लोगों में से कोई-कोई अमोलक वस्तु माँगनेवाला होता है। यह बाहरी वस्तु माँगना गलत नहीं है, अमोलक वस्तु तो नहीं लिया, कुछ तो लेकर लौटे। एक संस्कार पड़ गया, वह व्यर्थ नहीं जायेगा। हाँ, बहुमूल्य वस्तु और उसके लिए एकान्त का सेवन संस्कारी पुरुष ही कर पाते हैं। तब तो वहाँ बहुत कम व्यापारी आते होंगे? संत कबीर कहते हैं– नहीं,
आये व्यापारी सौदा करि गये, जनम जनम के अनुरागी।
हाँ, दूर-दूर के व्यापारी वहाँ पहुँचे, सौदा किया और लेकर चले भी गये। कौन थे व्यापारी? कौन-सी रकम लेकर पहुँचे? वे थे ‘जनम जनम के अनुरागी’।
गुरु महाराज को तीन बार आकाशवाणी हुई। एक बार आकाशवाणी हुई– ‘इन महात्मा को भोजन कराओ।’ सामने से एक महात्मा हाथ में झण्डा लिये धीरे-धीरे दौड़ते हुए, ‘सीताराम सीताराम’ कहते हुए चले जा रहे थे। ज्योंही वह महाराजजी के समीप से गुजरे, तभी महाराजजी को आकाशवाणी हुई कि इनको भोजन कराओ। महाराजजी का सिर चकरा गया, आवाज इतनी जोर की थी। महाराजजी पुलिया का सहारा लेकर थोड़ी देर में संयत हुए। समीप ही दो आदमी धान की निराई कर रहे थे। महाराजजी ने उनसे पूछा, ‘‘आपलोगों ने कुछ सुना?’’ वे बोले, ‘‘यहाँ सुननेवाली कौन-सी बात थी? आप भी चुप हैं, हमलोग भी चुप हैं।’’ महाराज जी ने सोचा, आवाज तो इतनी जोर की थी कि आधा किलोमीटर में सबको भली प्रकार सुन लेना चाहिए था। यह लोग पास में बैठे हैं, फिर भी इन्हें नहीं सुनाई पड़ा। लगता है यह कोई दैवी घटना है। कुछ भी हो, इन महात्मा को खिलाना चाहिए।
महाराजजी ने उनको सुबह से छ: बजे शाम तक ढूँढ़ा, वह मिले ही नहीं। वह निराश होकर लौटने को थे कि महात्माजी दिखाई पड़ गये। महाराजजी ने उन्हें विधिवत् भोजन कराया।
जब वह एक कुटिला के निमन्त्रण पर रात को आठ बजे जा रहे थे। मन में द्वन्द्व चल रहा था कि मैं कभी डर रहा हूँ, कभी आगे बढ़ रहा हूँ, पाप तो नहीं करने जा रहा हूँ! बड़ी जोर से दूसरी आकाशवाणी हुई कि महान पाप करने जा रहे हो, घोर नरक में जाओगे। महाराजजी के रोयें फूट पड़े, प्रकृति में भय समा गया। पाँव मन-मन भर के हो गये, उठाने से भी नहीं उठ रहे थे जैसे उनके पाँव थे ही नहीं। आधा घण्टा में उन्हें थोड़ी शान्ति मिली तो चुपचाप बिना सोचे लौट पड़े। रास्ते में एक टूटे-फूटे मंदिर के पास आये कि तीसरी आकाशवाणी हुई कि इसमें तुम्हारे गुरु महाराज हैं। महाराजजी मंदिर के भीतर गये। धुप्प अँधेरा! भीतर कोई दिखाई नहीं पड़ा। उन्हें झुँझलाहट हुई कि पता नहीं कौन हमारे पीछे पड़ा है? कौन जोर से बोलता है? कौन धीरे से बोलता है। आकाशवाणी हुई थी कि इसमें गुरु महाराज हैं, किन्तु यहाँ तो कोई नहीं है। इतने में खाँसने की आवाज आयी। वह महापुरुष बैठे थे। महाराजजी ने प्रकाश की व्यवस्था की, तीन दिन-तीन रात उनकी सेवा में लगे ही रह गये। उनसे साधना का क्रम समझा और भजन में लगकर महाराजजी महाराज हो गये। फिर लौटकर घर नहीं गये।
हमने पूछा, ‘‘महाराजजी! आपको आकाशवाणी क्यों हुई?’’ वह बोले, ‘‘यह शंका हमें भी थी। हमने भी भगवान से पूछा था तो भगवान ने बताया कि मैं पिछले सात जन्मों से लगातार साधु रहा हूँ। चार जन्म तो झूठ-मूठ का ही कमण्डल लेकर साधु-संन्यासियों के बीच घूम रहा हूँ। कहीं अगरबत्ती सुलगा रहा हूँ, कहीं किताब उलट रहा हूँ। विभूति भी लगायी है, तिलक भी लगाया हूँ लेकिन सब झूठ-मूठ का ही।’’ हमने पूछा, ‘‘झूठ से आपका क्या आशय है?’’ उन्होंने बताया, ‘‘उन दिनों हमें आता-जाता कुछ नहीं था। नाम जपता था, साधुओं जैसी बात भी कर लेता था, इन्द्रिय संयम भी पक्का था किन्तु भजन जागृत नहीं था। पिछले तीन जन्म से बढ़िया साधु रहा हूँ। इष्टदेव रथी थे, योग-साधना जागृत थी, जैसा कि एक साधु को होना चाहिए। निवृत्ति हो चली थी किन्तु मन में थोड़ा कुतर्क था कि यह शादी-विवाह क्या होता है? गाँजा पीकर लोग बहुत झूमते हैं, इसमें कौन-सा सुख है? थोड़ा देहाभिमान था कि मैं कुलीन हूँ, विद्वान हूँ, इत्यादि। गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि देहाभिमानियों की गति नहीं होती। किन्तु विगत इन जन्मों में भी संयम का पक्का था। केवल इसी हल्की-सी मानसिक फिसलन से जन्म लेना पड़ा। और भगवान ने थोड़े ही समय में शादी-विवाह कराकर, दिखा-सुनाकर दो चटकना मारा कि यह पाप, यह पुण्य और यह गुरु महाराज और कर भजन।’’
महाराजजी जा रहे थे काम की ओर लेकिन भगवान ने कान पकड़कर घुमा दिया राम की ओर। उन्होंने गुरु महाराज का भी परिचय दे दिया। महाराजजी बताते थे कि, ‘‘उन गुरु महाराज को हमने पचासों बार पहले भी देखा था। लोग उन्हें पागल कहते थे। मैं भी वही समझता था किन्तु आकाशवाणी ने बताया कि यह तुम्हारे गुरु महाराज हैं। वास्तव में वह महापुरुष थे, सद्गुरु थे। उनके माध्यम से साधना जागृत हो गयी। चार महीने के अन्दर ही भजन जागृत हो गया। और जैसे कोई अपने घर के आंगन में अपना ही गड़ा धन पा जाय, अनायास ही भजन जागृत हो गया। भगवान श्वास-श्वास पर नियन्त्रण करने लगे, उठाने-बैठाने लगे, भजन पढ़ाने लगे, भजन कराने लगे।’’ यह जन्म-जन्म का संस्कार था। जिसे इन पंक्तियों में कबीर ने कहा– ‘जनम जनम के अनुरागी’। महाराजजी सात जनम से अनुरागी थे। सृष्टि में लगाव का नाम है राग और प्रभु के प्रति लगाव का नाम है अनुराग! इष्ट के अनुरूप लगाव अनुराग है। अगली पंक्ति में यह महापुरुष कहते हैं कि सौदा मिल ही गया तो साधक की साधना कैसी होती है?–
पड़े रहे मैदान गढ़ी में
वह मैदान में पड़े हैं। दीवाल एक भी नहीं है फिर भी किले में हैं। वास्तव में हृदय ही एक गढ़ी है जो सब ओर से चित्तवृत्ति को समेटकर सूरत को स्थिर करने से होता है। मनुष्य वहीं रहता है जहाँ उसका मन रहता है। कामना रहते हुए कोई शान्त-एकान्त में बैठ ही नहीं सकता। जैसी कामना होगी, मन उड़कर वहीं पहुँच जायेगा। इसलिए ‘सकल कामना जिन त्यागी’। कामनाओं के त्याग से ही यह स्थिति संभव है।
राजा भर्तृहरि, गोपीचन्द, पूरनमल इत्यादि सब के सब समकालीन राजपरिवार के थे। पिता के स्वर्गवास के पश्चात् सोलह वर्ष की अल्पायु में गोपीचन्द को राज-काज सँभालना पड़ा। एक दिन वह शिकार से लौटा, उसने देखा, राजकीय उद्यान में तमाम सड़ँसे गड़े थे, धूने जल रहे थे। महान संत जलंधरनाथ अपनी शिष्य-मंडली के साथ वहाँ विश्राम कर रहे थे क्योंकि राजपरिवार पहले से ही उनका शिष्य था। उद्यान में इतने महात्माओं को देख गोपीचन्द बिगड़ा, ‘‘यह क्या! बगीचे का सर्वनाश कर दिया।’’ उसने सिपाहियों को डाँट लगायी, ‘‘इस बाबा को कुँए में फेंक दो।’’ वह आदेश देकर महलों में चला गया। दासियाँ चन्दनमिश्रित जल से उसे स्नान करा रही थीं। उसकी माँ ऊपर दूसरी मंजिल में खड़ी रो रही थी। उसके आँसू टपक रहे थे। आँसू की बूँदें उसके ऊपर गिरीं तो माँ की ओर उसने देखा, ‘‘आपकी आँखों में आँसू!’’ माँ ने कहा, ‘‘हाँ बेटा! मैं दु:खी हूँ।’’ गोपीचन्द ने कहा, ‘‘आप आदेश दें, मैं पहले दु:ख दूर करूँगा, स्नान बाद में होगा।’’ माँ ने कहा, ‘‘हाँ, दु:ख भी तुमको ही दूर करना है।’’ जब गोपीचन्द ने कहा कि, ‘‘मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि अवश्य आपका दु:ख दूर करूँगा।’’, तो माँ ने कहा, ‘‘बेटा! ये कंचन-जैसी काया जो आज सहलायी-नहलायी जा रही है, यह कल खाक में मिल जायेगी। इसी का हमें दु:ख है।’’ गोपीचन्द ने कहा, ‘‘माँ! इसका उपाय क्या है?’’ माँ ने कहा, ‘‘गुरु जलंधरनाथजी की शरण में जाओ।’’ गोपीचन्द ने कहा, ‘‘एक जलंधरनाथ को तो मैं कुएँ में फेंक आया हूँ।’’ उसकी माँ घबड़ाकर भागी। उसने जलंधरनाथजी को कुएँ से निकलवाया, उनसे क्षमा-याचना की। शिष्य गोरखनाथजी के अनुरोध और प्रयासों से जलंधरनाथजी ने गोपीचन्द को क्षमा करते हुए उसे अपना शिष्य बना लिया और कहा, ‘‘जाकर अपनी माँ से भिक्षा माँग लाओ।’’
गोपीचन्द माँ के पास पहुँचे। माता ने भिक्षा में पाँच शिक्षायें दी– किले में रहना, मसहरी में सोना, मोहनभोग खाना, सूली पर चढ़ जाना और परिवार बदलकर रहना। गोपीचन्द ने विचार किया कि महल तो छूट गया, दूसरों के टुकड़े पर आश्रित हो गये, मोहनभोग कहाँ मिलेगा? वह बोले, ‘‘माताजी! इसका अर्थ क्या हुआ?’’ उसकी माता मैनावती ने कहा, ‘‘इसे अपने गुरुदेव से पूछना।’’
उसने गुरुदेवजी से कहा, ‘‘गुरुदेव भिक्षा में यही पाँच बातें मिली हैं और कहा है कि इसका अर्थ गुरुजी से पूछ लेना। आप ही बताइये, अब किले में रहना कैसे सम्भव है?’’ गुरुदेव बोले, ‘‘देखो! संसार में किले तो बनते-बिगड़ते रहते हैं। आज जो किला तुम्हारा है, किसी ने जीत लिया तो उसका होगा। तुम्हारा निज किला है तुम्हारा हृदय। मनुष्य वहीं रहता है जहाँ उसकी चित्तवृत्ति है। इसलिए मन से इन्द्रियों को संयमित करके चित्तवृत्तियों को श्वास में लगाओ, सुरत को हृदय में स्थिर करते हुए स्वरूप, इष्ट के चरणों में लगाओ। यदि सुरत टिक जायेगी तो तुम वहीं निवास करोगे। सदा अन्तर्मुखी रहना, बाहर मत निकलना। यही है किले में रहना।’’
गोपीचन्द ने पूछा, ‘‘और गुरुदेव, मसहरी में सोना?’’ जलंधरनाथ ने कहा, ‘‘संसार में माया के कीटाणु, राग-द्वेष, इच्छा-वासना के कीटाणु संगदोष से उड़ा ही करते हैं इसलिए सदैव संयम की मसहरी के अन्दर रहना।’’
गोपीचन्द ने कहा, ‘‘भगवन्! मोहनभोग?’’ गुरुदेव ने कहा कि ‘‘जब तीव्र भूख का अनुभव हो, चौबीस घण्टे में एक बार, सूखी रोटी खाओगे तब भी हजम हो जायेगी, तुम्हें रस मिलेगा। शरीर को जितनी मात्रा में शक्ति चाहिये, वह सब मिलेगी, तुम बीमार कभी नहीं पड़ोगे और स्वस्थ शरीर से तुम्हें भजन में निरन्तर लगने का पूरा अवसर मिलेगा। भूख लगने पर स्वल्प भोजन ही मोहनभोग है।’’
शिष्य ने पूछा, ‘‘और शूली पर चढ़ जाना?’’ गुरु ने बताया, ‘‘सन्तों ने कहा है– ‘ग्यान पंथ कृपान कै धारा। परत खगेस होइ नहिं बारा।।’ (रामचरितमानस, ७/११८/१)– ज्ञान का पंथ तलवार की धार पर चलना है। इसी को किसी ने खाड़ें की धार कहा है– ‘मुश्किल अगम पंथ का चलना, धारा खाड़ें छूरों का।’ किसी ने इसे शूली कहा है– ‘सूली ऊपर सेज हमारी….’। सिर कटाना आसान है, साधू होना कठिन है–
शूरा होना सुगम है, घड़ी पहर का काम।
साधू होना कठिन है, आठ पहर संग्राम।।
यह भजन का पंथ बहुत दृढ़ता का पथ है, कृपाण की धारा पर चलने जैसा है। इस व्रत को लेना शूली पर चढ़ने जैसा है।’’
गोपीचन्द ने पूछा, ‘‘और परिवार बदलकर रहना?’’ जलंधरनाथ जी ने कहा, ‘‘बेटा, भूल जाओ कि हमारी माता कौन? पिता कौन? अब अपना परिवार बदलो। अब ज्ञान ही पिता है, भक्ति ही माता है। तुम्हारे सहज स्वरूप की जागृति और स्वरूप की प्राप्ति भक्ति से है इसलिए भक्ति ही माता है। इष्टोन्मुखी प्रवृत्ति अर्थात् वृत्ति ही बहन है। विवेक-वैराग्य-शम-दम– ये निरन्तर तुम्हारा साथ देनेवाले सगे-सहोदर भाई हैं और इन्हीं के सहारे चलकर तुम्हें अपने स्वरूप को प्राप्त करना है। यही परिवार बदलकर रहना है।’’
सारांशत: जनम-जनम के पथिक जब सद्गुरु से भली प्रकार सौदा प्राप्त कर लिये तो मन भजन में ही लग गया, ‘सकल कामना जिन त्यागी’। महाराजजी कहते थे, ‘‘हो! चार महीने में ही मन भजन में लग गया, कोई बगल में आकर बैठ जाय तो उससे बात करने का मन ही न करे, उसे देखने की इच्छा न हो। मन करे कि यह कब यहाँ से उठकर चला जाय। एक बार सुरत लग गयी तो मन करे कि दिन-रात ऐसे ही डूबा रहूँ। सुरत श्वास में टँगी रहे और मैं बैठा रहूँ।’’ कामना ही हमें भटकाती है। जब उसका त्याग हो गया तो सन्त कबीर कहते हैं–
कहे कबीर सुनो भाई साधो, भगति भीख उनसे माँगी।
सद्गुरु की शरण में जाने पर कदाचित् कुछ माँगना ही पड़े तो उनसे भक्ति की भीख माँगो। विभक्ति माने होता है विभाजन, ‘अलगौझी’। भक्ति माने दर्शन-स्पर्श-प्रवेश, उन परमात्मा से मिल जाना, उनके तद्रूप स्थिति पाना। इसलिए कदाचित् माँगना ही हो तो भक्ति की भिक्षा माँगनी चाहिए। यह सद्गुरुओं की हाट संसार से अलग-थलग शान्त-एकान्त जंगल में हुआ करती है। साधना के लिये दिन के चौबीसों घण्टे, वर्ष के तीन सौ पैंसठ दिन निरन्तर एकान्त चाहिए। जो साधक दो दिन भजन और तीसरे दिन बाजार में दिखाई पड़े वह दो-चार जन्म का झटका अवश्य खा जायेगा। संत कबीर का यह भजन ठीक वैसा ही है जो गीता का सिद्धान्त है। यह है तो सधुक्कड़ी भाषा में किन्तु तथ्य गीता के ही उद्घाटित होते हैं। गीता ने जो सत्य बताया, उसके बाहर आज तक किसी ने कुछ कहा ही नहीं। इसे यथावत् समझने के लिए देखें– गीताभाष्य ‘यथार्थ गीता’!
।। बोलिये श्रीगुरुदेव भगवान की जय ।।
(‘अमृतवाणी भाग-6’ से उद्धृत)