संतो! सतगुरु अलख लखाया….
संतो सतगुरु अलख लखाया।
परम प्रकाशक ज्ञान पुंज, घट भीतर में दरसाया।
मन बुधि बानी जाहि न जानत, वेद कहत सकुचाया।
अगम अपार अथाह अगोचर, नेति नेति जेहि गाया।
सिव सनकादिक और ब्रह्मा के, वह प्रभु हाथ न आया।
व्यास बसिष्ठ बिचारत हारे, कोई पार नहिं पाया।
तिल में तेल, काष्ठ में अग्नि, व्रत तप माहिं समाया।
शब्द में अर्थ, पदारथ पद में, स्वर में राग सुनाया।
बीज माँहिं अंकुर तरु साखा, पत्र फूल फल छाया।
त्यों आतम में है परमातम, ब्रह्म जीव अरु माया।
कहैं कबीर कृपाल कृपा करि, निज स्वरूप परखाया।
जप तप योग यज्ञ ब्रत पूजा, सब जंजाल छुड़ाया।।
एक अत्यन्त विवादास्पद प्रश्न है कि भगवान सगुण हैं या निर्गुण? लोगों में प्रचलित है कि कबीर निर्गुण उपासक हैं और तुलसी सगुण उपासक। यह एक भयंकर भ्रान्ति है। उपासना जब भी चलती है तो सगुण से ही चलती है। ‘स’ माने वह परमात्मा, उनके गुणधर्म हृदय में प्रगट हो जायँ, उनके संरक्षण में चलते हुए दर्शन, स्पर्श, प्रवेश और स्थिति मिल जाय– यहाँ तक उपासना सगुण है, किन्तु प्राप्ति के पश्चात् उन महापुरुष की रहनी निर्गुण है। वह महापुरुष प्रकृति के गुणों से अतीत है इसलिए उनकी रहनी निर्गुण है। निर्गुण कोई उपासना नहीं है। कबीर भी एक सगुण उपासक थे–
साहब का घर दूर है, लम्बी पेड़ खजूर।
चढ़े तो चाखै राम रस, गिरै तो चकनाचूर।।
उन परम प्रभु भगवान का घर बहुत दूर है, इतना लम्बा जैसे खजूर के पेड़ पर चढ़ना। यदि कोई इतनी दूरी तय कर ले गया, ‘चढ़ै तो चाखै राम रस’– चढ़ गया तो राम रस पा गया और गिर गया तो चकनाचूर। भगवान अलग हैं, अपने अलग है, चढ़ना-गिरना लगा हुआ है! आप ही विचार करें कि सगुण उपासक के और क्या लक्षण हैं?
कबीर ने भजन आरम्भ किया तो चिन्ता में पड़ गये कि माया कब क्या न कर बैठे –
शृंगी की भृंगी करि डारि, पारासर के उदर विदार।
रमैया की दुलहिन लूटल बजार।
सबकी बनी-बनायी प्रतिष्ठा को इस माया ने धूल में मिला दिया।
माया महाठगिनी हम जानी।
तिरगुन फाँस लिये कर डोलै, बोलै मधुरी बानी।
मधुर बोलकर जीव को फँसाती है। इसने किस-किस को ठगा?
केसव के कमला होइ बैठी, सिव के भवन भवानी।
पंडा के मूरत होइ बैठी, तीरथ में भइ पानी।
कबीर ने कहा– हमने जान लिया है कि माया महाठगिनी है। यह चारों ओर से घेरा डालकर जीव के साथ-साथ चल रही है। माया से भयभीत वही कबीर ‘साहब का घर दूर’ माननेवाले, अपने कहीं दूर; उन्होंने जब पाया तो किस रूप में पाया?–
अवधू बेगम देश है मेरा।
तहाँ न उपजै मरै न बिनसे, नहिन काल का फेरा।
हे अवधू! मैं जिस देश में पहुँचा हूँ, वह एकदम बेगम है, अचिन्त्य है, अगोचर है, वाणी का विषय नहीं है, सामान्य मनुष्य की गम अर्थात् पहुँच से परे है – ऐसा मेरा देश है। वहाँ उत्पत्ति नहीं है, विनाश नहीं है, प्रलय नहीं है, परिवर्तन नहीं है। वहाँ न ईश्वर है, न जीव, न माया; न कोई पूजनेवाला और न कोई पूज्य।
तहाँ न सूर्य चन्द्र नहीं रजनी, नहीं तह अन्ध उजेरा।
सूरज, चन्द्रमा, अग्नि, अंधेरा, उजाला वहाँ कुछ भी नहीं है। तो अन्तत: वहाँ है क्या?
कहत कबीर सुनो भाई सन्तो, नहीं तहँ द्वैत बखेड़ा।
संतो! ध्यान दो, वहाँ द्वैत का बखेड़ा नहीं है। हम अलग, भगवान अलग, ऐसा कुछ नहीं है। जीव परमात्मा में समाहित हो गया। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– हे अर्जुन! मैं न तो यज्ञ से, न तप से, न योग से ही प्राप्त होनेवाला हूँ। मेरी प्राप्ति का एक सुगम उपाय है–
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप।। (गीता, ११/५४)
हे अर्जुन! अनन्य अर्थात् अन्य न; मुझे छोड़कर अन्य किसी भी देवी-देवता को न भजते हुए जो केवल मुझे भजता है, उसके लिए मैं प्रत्यक्ष देखने के लिए, स्पर्श करने के लिए और प्रवेश करने के लिए भी सुलभ हूँ। प्रवेश अर्थात् समाहित हो जाना। सेवक सदा के लिए खो गया, स्वामी ही शेष बच रहा। यही कबीर कहते हैं कि वहाँ द्वैत का बखेड़ा नहीं है। मुझसे भिन्न कोई सत्ता नहीं है। कबीर ने जब पाया तो गुणातीत में, बेगम में।
तुलसीदास जी को सब सगुण उपासक मानते हैं। वैष्णव संत के रूप में वह ठाकुरजी की घण्टी हिलाते रहे। उन्हीं तुलसीदास ने जब पाया तो लिखा–
रघुपति भगति करत कठिनाई।
कहत सुगम करनि अपार जानै सोइ जेहि बनि आई।।
भगवान की भक्ति करने में अत्यन्त कठिन है। कहना तो आसान है किन्तु इसमें करनी अपार है। इसे वही जानता है जिससे करते बन गया। भक्ति एक कला है।
जो जेहि कला कुसल ता कहँ सोइ सुलभ सदा सुखकारी।
सफरी सनमुख जल-प्रवाह सुरसरी बहै गज भारी।।
जल के प्रवाह में मछली पर्वत पर चढ़ जाती है, पानी की धारा के साथ छत पर चढ़ सकती है, वृक्षों पर चढ़ सकती है; क्योंकि वह तैरने की कला जानती है। पहाड़ी नदियों के तीव्र प्रवाह में मजबूत हाथी बह जाता है, उलट-पलट कर मर भी जाता है।
ज्यों सर्करा मिलै सिकता महँ, बल तें न कोउ बिलगावै।
अति रसज्ञ सूच्छम पिपिलिका, बिनु प्रयास ही पावै।।
यदि शक्कर में बालू मिल जाय तो बलपूर्वक उसे कोई अलग नहीं कर पाता, किन्तु रस-विशेषज्ञ चींटी शक्कर का एक-एक कण निकालकर खा जाती है। इसी प्रकार भक्ति एक कला है। भक्ति है क्या?–
सकल दृश्य निज उदर मेलि, सोवै निद्रा तजि जोगी।
सोइ हरिपद अनुभवै परम सुख, अतिसय द्वैत बियोगी।।
समस्त दृश्य प्रपंच को हृदय में समाहित कर निद्रा का त्याग करके योगी परमात्मा में शयन करता है। वही परम पद का अनुभव करता है। वहाँ द्वैत का अतिशय वियोग है। द्वैत है ही नहीं। ‘तुलसिदास कह चिद्बिलास जग बूझत बूझत बूझै।’– तुलसीदास जी कहते हैं कि चित्त का प्रसार ही जगत् है लेकिन यह बात अभ्यास करते-करते ही समझ में आती है। वह पद है कैसा?
सोक मोह भय हरष दिवस, निसि देस-काल तहँ नाहीं।
तुलसिदास यहि दसाहीन संसय निरमूल न जाहीं।।
वहाँ शोक नहीं है, मोह नहीं है, हर्ष नहीं है, विषाद नहीं है, भय नहीं है। तुलसीदास जी कहते हैं कि इस दशा के बिना संशय कभी निर्मूल नहीं होता। सगुण उपासक तुलसीदास ने भगवान को पाया तो किस रूप में! ‘अतिसय द्वैत वियोगी’– जहाँ द्वैत की कल्पना भी नहीं की जा सकती। कबीर कहते हैं– ‘नहिं तहँ द्वैत बखेड़ा’। हर महापुरुष वही कह रहा है, भाषा चाहे जो रही हो। साधना के सही राह पर चलकर महापुरुष जब भी पाता है तो एक ही मंजिल और एक ही राह से पाता है। उपासना जब चलती है तो सगुण से आरम्भ होती है और अन्त में स्थिति मिलती है तो गुणातीत में। माया के गुण-धर्मों से सर्वथा अतीत दशा का नाम निर्गुण है। निर्गुण कोई उपासना नहीं है। यह तो कबीर की वाणी समझ में नहीं आयी तो लोगों ने कह दिया कि यह निर्गुण कथन है।
इस पद में संत कबीर कहते हैं कि भगवान अचिन्त्य हैं, चित्त और चित्त की लहरों से परे हैं। वे इन्द्रियों से, दृष्टि से परे अमूर्त हैं। सृष्टि में जो कुछ दिखाई-सुनाई पड़ता है, इससे अतीत हैं। दृष्टि से परे हैं, इसलिए उन्हें अलख कहा गया है। किन्तु सद्गुरु ने उस अलख को भी लखा दिया। पहले नहीं देख पा रहे थे किन्तु सद्गुरु के कृपा-प्रसाद से वह देखने में आ गया। हमारे पास वह आँख नहीं थी, वह दृष्टि नहीं थी, हम देखना भी नहीं चाहते थे; सद्गुरु ने हमें पकड़कर उसे दिखा दिया। कैसा है वह अलख?–
परम प्रकाशक ज्ञान पुंज घट भीतर में दरसाया।
संत कबीर पढ़े-लिखे तो थे नहीं, लेकिन आँखें थीं, प्रत्यक्ष देख रहे थे। भगवान को परम प्रकाशक के रूप में देखा, जैसा अर्जुन ने देखा था। कबीर ने वही संदेश दिया जो गीता का है। गीता कहती है–
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमस: परमुच्यते।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्।। (१३/१७)
हे अर्जुन! वह परमात्मा ज्योतियों का भी ज्योति, अंधकार से अत्यन्त परे, सर्वज्ञाता, ज्ञान द्वारा सबके लिए सुलभ है। वह रहता कहाँ है? भगवान कहते हैं– वह सबके हृदय में सदा निवास करता है। यह महापुरुष भी वही कहते हैं कि वह परम प्रकाशक है, ज्ञानपुंज है। प्रत्यक्ष जानकारी का नाम ज्ञान है।
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा।। (१३/११)
पहले तो जीव अचेत है। जहाँ भजन जागृत हुआ, आत्मा जागृत हो गयी। आपकी ही आत्मा आपका मार्गदर्शन करने लगेगी। आत्मा से अभिन्न होकर भगवान बताने लगते हैं। उस आत्मा के आधिपत्य में निरन्तर चलना ज्ञान की जागृति है, निम्नतम श्रेणी है। उनके संरक्षण में निरन्तर चलते हुए परम तत्त्व परमात्मा का प्रत्यक्ष दर्शन और दर्शन के साथ मिलनेवाली जानकारी ज्ञान है और सृष्टि में जो कुछ भी है, अज्ञान है। कबीर भी भगवान को ज्ञानपुंज बताते हैं। भगवान कहाँ मिलते हैं? तो कबीर कहते हैं– ‘घट भीतर दरसाया’– हृदय के अन्दर दिखा दिया। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया–
ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।। (१८/६१)
हे अर्जुन! वह ईश्वर सम्पूर्ण भूत-प्राणियों के हृदय-देश में निवास करता है। इतना समीप है तो लोग जानते क्यों नहीं? क्योंकि मायारूपी यन्त्र में आरूढ़ होकर सबलोग भ्रमवश चक्कर लगाते ही रहते हैं, इसलिये नहीं जानते। गीता का ईश्वर हृदय में! तो शरण किसकी जायँ?
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।। (१८/६२)
इसलिये हे भारत! सम्पूर्ण भाव से उस ईश्वर की (जो हृदय-देश में स्थित है) अनन्य शरण को प्राप्त हो। उसके कृपा-प्रसाद से तू परमशान्ति, शाश्वत परमधाम को प्राप्त होगा। यही आशय कबीर का भी है। मानस में तुलसीदास कहते हैं– ‘अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी।’ (मानस, १/२२/७)
वह प्रभु मन, बुद्धि और वाणी का विषय नहीं है–
मन बुधि बानी जाहि न जानत, वेद कहत सकुचाया।
अगम अपार अथाह अगोचर, नेति नेति जेहि गाया।।
वेद ने कहा कि वह अगम्य है, अपार है, अगोचर है, अथाह है, ‘न इति’, ‘न इति’– इतना ही नहीं, आगे कुछ और है, वेद में जितना वर्णन है, उसके आगे भी कुछ है इसलिए सम्पूर्ण वर्णन वेद में भी नहीं है।
सिव सनकादिक और ब्रह्मा के, वह प्रभु हाथ न आया।
मानस में है कि–
बिष्नु बिरंचि संभु भगवाना।
उपजहिं जासु अंस तें नाना।। (मानस, १/१४३/६)
अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु और महेश उन प्रभु के एक अंश मात्र से विलय होते और प्रगट होते रहते हैं अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु, महेश कोई और तथा भगवान कोई और! सुग्रीव के परामर्श पर हनुमान जब प्रभु राम की परीक्षा लेने गये तो बोले– इस पहाड़ी पर ऐसी दिव्य मूर्ति हमने कभी देखी नहीं। आप मनुष्य हो ही नहीं सकते।
की तुम्ह तीनि देव महँ कोऊ।
नर नारायन की तुम्ह दोऊ।।
जग कारन तारन भव, भंजन धरनी भार।
की तुम्ह अखिल भुवनपति, लीन्ह मनुज अवतार।। (मानस, ४/१)
आप तीन देव ब्रह्मा, विष्णु, महेश में से कोई हैं या नर, नारायण हैं या आप चराचर जगत् के स्वामी साक्षात् परमात्मा हैं? इस प्रकार तीन देव कोई और, ‘जग कारन भव तारन’ कोई और! विचारणीय है कि लोग भगवान के नाम पर ब्रह्मा, विष्णु, महेश तक घूमकर खड़े हो जाते हैं, लेकिन यह महापुरुष क्या कह रहे हैं? इसी तरह का प्रकरण वहाँ भी है जब सती ने भगवान राम की परीक्षा सीता के रूप में ली। भगवान ने सती का कपट जान लिया तो उन्हें अपनी कुछ महिमा दिखा दी। सती ने देखा–
देखे सिव बिधि बिष्नु अनेका।
अमित प्रभाव एक तें एका।।
बंदत चरन करत प्रभु सेवा।
बिबिध बेष देखे सब देवा।।
सतीं विधात्री इन्दिरा, देखि अमित अनूप।
जेहिं जेहिं बेष अजादि सुर, तेहि तेहि तन अनुरूप।। (मानस, १/५४)
उन्होंने अनगनित सतियों, ब्रह्माणियों और लक्ष्मियों को देखा। अनन्त ब्रह्मा, विष्णु और महेश भगवान की सेवा कर रहे थे। आज पूरा भारत या तो ब्रह्मा का उपासक है या विष्णु का उपासक वैष्णव है या शिव का उपासक शैव है। भगवान का उपासक कोई है ही नहीं। विचारणीय है कि यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं क्या? वास्तव में जब कोई अचेत जीवात्मा जागृत होती है तो जागृति के प्रथम चरण में भगवान उसके हृदय में विधि-संचार कर देते हैं। परमात्मा की वह प्रशक्ति जो विधि-संचार करती है, ईश्वर-पर्यन्त साधना तय करा देनेवाली साधना-पद्धति प्रसारित करती है, उस प्रशक्ति का नाम है ब्रह्मा। विधि के अनुसार जहाँ साधक चला, संयम सधने के बाद जहाँ स्तर उठा तो भरण-पोषण करनेवाली प्रशक्ति का नाम है विष्णु। विश्व के हर कण में वह भगवान विद्यमान हैं। जिस स्तर पर आप खड़े हैं, भगवान वहीं से व्यवस्था करते चले जाते हैं। विश्व अणु से विष्णु! उन्हीं परमात्मा के वरदहस्त के नीचे चलते हुए साधक के शुभाशुभ संस्कारों का जो संहार करती है वह प्रशक्ति शिव है। अब न भले संस्कार, न बुरे; हृदय हो गया एकदम श्मशान। शिव के उभय प्रयोग हैं। संहार के साथ ही एक स्वरूप प्रकट होता है उसका नाम है शिवतत्त्व अर्थात् शुभाशुभ संस्कारों के संहार के साथ जो अवशेष बचता है वह है शिवतत्त्व, कल्याणतत्त्व परमात्मा। उसे जो जानता है वह तत्त्वदर्शी कहलाता है। वही सद्गुरु है, वही परम पूजनीय है। इसलिए साधक जब तक ब्रह्मा, विष्णु, महेश की श्रेणी पर हैं तब तक उनकी साधना बाकी है।
सनकादिक अर्थात् सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार और नारद– ये पाँच तत्त्व हैं। जब तक ये अलग हैं तब तक उस परमात्मा का भेद नहीं जानते। ये तत्त्व परम तत्त्व में विलीन हो गये तो वहाँ सहज स्वरूप भर रहता है। जब तक ये अलग-अलग हैं, साधना चलती ही रहेगी, प्रभु उनके हाथ में नहीं आते।
व्यास बसिष्ठ बिचारत हारे, कोई पार नहिं पाया।
व्यास, कौरव-पाण्डवों के कुलपुरुष बच्चों को समझाते ही रह गये किन्तु महाभारत होकर रहा। वशिष्ठ, रघुकुल के कुलगुरु अयोध्या को सुरक्षित करने में लगे रहे किन्तु अयोध्यावासी चले गये सरयू में। ये विचार करते ही रह गये, परमात्मा उनके हाथ नहीं आया।
सन् १९६४ में भगवान ने हमें बताया कि तुम्हारी एक वृत्ति बाकी है, गीता लिखना है। वृत्तियों को हमने समाप्त तो किया नहीं था। जब सभी समाप्त हो गयीं तो हमने सोचा कि यह भी समाप्त हो जायेगी, करो भजन! सात-आठ साल से ज्यादा ही हम टालते चले गये लेकिन वह आदेश बराबर पीछा करता रहा। फिर हमने लिखने का मन बनाया। हमें लिखना तो आता-जाता नहीं, बोल दिया, जो टेप में उतर गया; भक्तों ने लिपिबद्ध कर दिया। वही है ‘यथार्थ गीता’।
हमने भगवान से पूछा– हो गयी गीता? आदेश मिला– अंग्रेजी में अनुवाद कराओ। हमने ‘यथार्थ गीता’ का अंग्रेजी अनुवाद तीन विद्वानों से अलग-अलग कराया। इसलिए नहीं कि कहीं कोई भूल न रह जाय बल्कि इसलिए कि भगवान कहीं ये न कह दें कि वृत्ति अभी शेष है। फिर भी सबसे पहले जिन्होंने अनुवाद किया, वही सफल रही। इसके पश्चात् हमने कुछ पूछा ही नहीं। भगवान ने ही अपनी ओर से बताया कि गीता लिखने में तुम्हारे २३ साल व्यर्थ हो गये। उन्होंने पुन: बताया कि लिखने-पढ़ने से भजन में रंचमात्र भी कोई सहयोग नहीं मिलता और अन्त में उन्होंने बताया– गीता तुमने लिखा ही नहीं। सोचिये, २३ साल हमारे व्यर्थ निकल गये और हमने लिखा ही नहीं? किन्तु बात भी ठीक थी, हमने लिखा ही कहाँ था! लिखने में जो भूल होती, भगवान सुधार देते थे। कहते थे– ऐसे नहीं, वैसे! इस प्रकार उन्होंने हमसे लिखवाया। हम तो केवल आदेश का पालन कर रहे थे। इसी प्रकार व्यास और वशिष्ठ इत्यादि विचार करते, लिखते-पढ़ते ही चले गये, परमात्मा को नहीं पा सके। वह परमात्मा कहाँ है? इस पर कहते हैं–
तिल में तेल, काष्ठ में अग्नि, व्रत तप माहिं समाया।
शब्द में अर्थ, पदारथ पद में, स्वर में राग सुनाया।
बीज माँहिं अंकुर तरु साखा, पत्र फूल फल छाया।
त्यों आतम में है परमातम, ब्रह्म जीव अरु माया।
जिस प्रकार तिल में तेल रहता है; काष्ठ में अग्नि होती है; यम, नियम, आसन और प्राणायाम इत्यादि सभी व्रत-तप के अन्तराल में समाहित रहते हैं; शब्द में अर्थ छिपा रहता है, परमपद में चारो पदार्थ– अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष विद्यमान रहते हैं; स्वर में छत्तीसों राग रहते हैं; बीज में जिस प्रकार अंकुर, वृक्ष, शाखा, पत्र, फल-फूल और वृक्ष की छाया सब कुछ समाहित रहता है, उसी प्रकार से आत्मा में भी परमात्मा का निवास है। ब्रह्म, जीव और माया सब इसी आत्मा में होते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– हे अर्जुन! आत्मा ही शत्रु और आत्मा ही मित्र है। जिस पुरुष की मनसहित इन्द्रियाँ जीत ली गयी हैं, उसके लिए उसी की आत्मा मित्र बनकर मित्रता में बरतती है, परम कल्याण करनेवाली होती है। उन्होंने आत्मा के तीन रूपों पर प्रकाश डाला–
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षर: सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते।। (१५/१६)
अर्जुन! संसार में पुरुष दो प्रकार का होता है– ‘क्षर’ और ‘अक्षर’। कैसे पता चले, कौन क्षर है और कौन अक्षर है? इस पर कहते हैं– ‘क्षर: सर्वाणि भूतानि’। भूत माने जीवित प्राणी। प्राणीमात्र के शरीर क्षर पुरुष हैं, क्षरणशील हैं। ‘कूटस्थोऽक्षर उच्यते’– मनसहित इन्द्रियाँ जब कूटस्थ हो जाती हैं, संयम सध जाता है तो वह अक्षर पुरुष है, उसका कभी क्षय नहीं होता। अर्थात् इन्द्रिय स्तर तक जब तक जीवन है, अविद्या जिसका क्षेत्र है, अज्ञान जिसकी जानकारी है तो यह आत्मा जीवात्मा है। और जब मनसहित इन्द्रियों का संयम सध गया, विद्या जिसका क्षेत्र है, ज्ञान ही जिसका परिणाम है, तो वह कूटस्थ पुरुष; जिसका कभी विनाश नहीं होता, यह है ईश्वरात्मा। इनसे भी परे एक तीसरा पुरुष है–
उत्तम: पुरुषस्त्वन्य: परमात्मेत्युदाहृत:।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वर:।। (१५/१७)
उत्तम पुरुष तो अन्य ही है अर्थात् अनिर्वचनीय है। इसका कोई नाम नहीं, यह सर्वलोकों को व्याप्त करके स्थित है, इसे परमात्मा या पुरुषोत्तम कहा जाता है। आत्मा वही है, केवल विशेषण लग गया – जीवात्मा, ईश्वरात्मा और परमात्मा। और मनुष्य जब अचेत होता है तो ‘या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी’ (गीता, २/६९) जगत्रूपी रात्रि में सभी प्राणी निश्चेष्ट पड़े हैं। गीतोक्त साधना समझकर संयम सध जाता है तो पुरुष जग जाता है। जब तक अचेतावस्था में है तब तक वह जीवात्मा है। कबीर कहते हैं– तुम्हारी आत्मा में ही परमात्मा है, बृहद् होने से ब्रह्म है, अचेत होने से जीव है, परिवर्तनशील होने से माया है – यही उस आत्मा की सीमायें हैं।
अन्त में कबीर कहते हैं–
कहैं कबीर कृपाल कृपा करि, निज स्वरूप परखाया।
संत कबीर कहते हैं कि सद्गुरु ने कृपा करके इस अलख परमात्मा को हृदय में ही दिखा दिया। तुलसी कहते हैं– ‘जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।’– उन्हें जानकर वही हो गया। सेवक सदा के लिए खो गया, स्वामी ही शेष बचा। प्रकृति पुरुषोत्तम में विलीन हो गयी। कबीर कहते हैं कि सद्गुरु कृपाल हैं। उन्होंने परमात्म-दर्शन करा दिया। कैसे? तो ‘निज स्वरूप परखाया’– अपने स्वरूप की पहचान दे दी। अब जिसे जानना था, जान लिया, स्वरूप ही परख लिया तो जप-तप किसके लिये करे? इस पर वे कहते हैं–
जप तप योग यज्ञ ब्रत पूजा, सब जंजाल छुड़ाया।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– हे अर्जुन! इस गीतोक्त कर्म को किये बिना न कोई पूर्व में पाया है, न भविष्य में कोई प्राप्त ही कर सकेगा। किन्तु कर्मों के परिणाम में जिन्हें आत्मा विदित है, जो आत्मतृप्त हैं, आत्मस्थित हैं (आत्मस्थिति का आशय है– ‘निज स्वरूप परखाया’) उस पुरुष के लिए किंचिन्मात्र भी प्राप्त होने योग्य वस्तु अप्राप्य नहीं है जिसके लिए वह अभ्यास करें। वे कर्म कभी न करें तब भी उन्हें कोई हानि नहीं है फिर भी वे महापुरुष लोकहित के लिए कर्म करते रहते हैं; क्योंकि महापुरुष जो आचरण कर जाते हैं, पीछेवाली पीढ़ियाँ उसी का अनुसरण किया करती हैं। हे अर्जुन! मुझे भी कोई वस्तु अप्राप्य नहीं है, कर्म करने से मुझे लाभ नहीं, न छोड़ने से हानि; फिर भी मैं पीछेवालों के हित की इच्छा से भली प्रकार कर्म में बरतता हूँ।
महापुरुष को चाहिये कि स्वयं को जरूरत नहीं है फिर भी पीछेवालों के हित की इच्छा से भली प्रकार कर्म में बरतें। उनके लिये जप, तप, योग, नियम से कोई प्रयोजन ही नहीं रह गया। यही कबीर कहते हैं कि ‘सब जंजाल छुड़ाया’।
कबीर ने इसे विभिन्न दृष्टान्तों से समझाने का प्रयास किया। एक पद में वह कहते हैं– ‘अवधू सहज समाधि भली।’ परमात्मा सहज है। ‘विधि न बनाये हरि आप बनि आये।’ स्वयंसिद्ध है। सम और आदि से समाधि– यह ‘गुरु परताप भयो जा दिन से सुरत न अनत चली।’ यह गुरु की कृपा से जिस दिन से प्राप्त हुई, सुरत अन्यत्र चली ही नहीं। अब जब मिल ही गयी तो बाकी क्या बचा? अब हम ढूँढ़ें किसे? आगे कोई सत्ता है ही नहीं। इसलिए–
आँख न मूँदू कान न रूँधूँ, काया कष्ट न धारूँ।
उघरे नयना साहब देखूँ सुन्दर रूप निहारूँ।।
ठीक इसी स्थिति का वर्णन कबीर की इन पंक्तियों में है कि ‘जप तप जोग यज्ञ ब्रत पूजा, सब जंजाल छुड़ाया।’ परमात्मा एक परमधाम है तो सद्गुरु ही भजन की जागृति, पूर्तिपर्यन्त पथ-रक्षक और प्रवेश-द्वार हैं। प्रवेश मिल गया तो भगवान और भक्त एक। गुरु का कार्य पूरा हो गया। अब ‘गुरु न चेला पुरुष अकेला।’ इसलिए जब किसी ने पाया तो माध्यम सद्गुरु रहे हैं। उस परमात्मा के दर्शन की विधि सद्गुरु से ही जागृत होती है। शिष्य को भी सदैव गुरु-आज्ञा के अन्तर्गत ही रहना चाहिये अन्यथा उसका कल्याण सम्भव नहीं है।
एक शिष्य ने गुरुजी से कहा– आज्ञा होती तो मैं वैराग्य (निराधार विचरण) कर आता। गुरु ने कहा– बेटा, माया बड़ी प्रबल है। अभी तुममें वह क्षमता नहीं है। शिष्य ने कहा– आपकी दया है तो माया क्या कर लेगी! गुरुदेव ने सावधान किया कि मेरी दया है तभी तो कह रहा हूँ। शिष्य ने प्र्ाणाम किया और चल पड़ा। शिष्य कुटिया से अभी दो-एक किलोमीटर जंगल की ओर बढ़ा ही था कि एक बुढ़िया, जिसके चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ी हुई थीं, कमर झुकी हुई किन्तु सतेज आँखें, हाथ में घोड़े की लगाम लिये तेजी से चली आ रही थी। ब्रह्मचारीजी ने सोचा कि लगता है उसका घोड़ा खो गया है। यह पूछेगी तो मैं बता दूँगा कि घोड़ा इधर नहीं गया है, नहीं तो यह बेचारी जंगल में भटक जायेगी। बुढ़िया बाबाजी को एड़ी से चोटी तक देखते हुए आगे बढ़ गयी, पूछा ही नहीं।
ब्रह्मचारीजी से रहा नहीं गया। वह बोल पड़े– माताजी! कहाँ चली जा रही हैं? इधर तो कोई घोड़ा गया भी नहीं! उस महिला ने कहा– नहीं बाबा, यह लगाम मैं घोड़ों को नहीं, साधु-महात्माओं को लगाया करती हूँ। ब्रह्मचारीजी बिगड़ पड़े– चुड़ैल कहीं की! एक तो दयावश हमने पूछ लिया, ऊपर चढ़ी चली आ रही है। महात्माओं का तुम क्या कर लोगी? वह बोली– अच्छा बाबाजी, तो बचना।
ब्रह्मचारीजी आगे बढ़े तो एक नदी मिल गयी। उस दिन वर्षा से उस पहाड़ी नदी में कुछ जल हो गया था। इस पार एक नवविवाहिता किनारे बैठकर रो रही थी। सिर में सिन्दूर, पैरों में महावर, अंग-प्रत्यंग में आभूषण पहने किसी भले घर की कन्या प्रतीत हो रही थी। रोते-रोते उसका चेहरा लाल हो गया था। महात्मा ने सोचा कि कोई दुखियारी लगती है, पूछा– क्यों, तुम्हारे घरवाले बिछुड़ गये क्या? तुम्हारे साथ कौन है?
रोना बन्द कर वह चुपचाप उठी, चरणों पर कुछ रुपये चढ़ा दिये और बोली– महाराज! आप जाइये। यह संसार है, आपसे क्या मतलब! महात्मा ने सोचा– लगता है, इसके साथ कोई घटना घटित हो गयी है। उन्होंने पूछा– बात क्या है? वह बोली– मैं मायके से विदा होकर आ रही हूँ। तब संभावना नहीं थी कि नदी में जल होगा। आज अचानक पानी आ गया है। नदी उस पार हमारी ससुराल है जहाँ हमें जाना है। अब इसमें जाऊँगी तो बह जाऊँगी। कैसे जाऊँ? वापस जाती हूँ तो शुभ मुहूर्त में विदाई हुई है वह व्यर्थ हो जायेगा। अब तो हम कहीं के न रहे।
महात्मा ने कहा– अरे, विशेष पानी नहीं है। ठीक है, तुम हमारी यह छड़ी पकड़ लो। उसने छड़ी पकड़ ली और महात्मा के पीछे-पीछे चली। जब जल के पास आयी तो चीखकर वापस भाग गयी। महात्मा बोले– अब क्या हुआ? उसने कहा– मेरे पैर के रंग छूट जायेंगे, यह भी अपशकुन होगा। महात्मा ने कहा– अब तुम जानो और तुम्हारा काम जाने। वह विवाहिता उठी और महाराज के चरणों पर १००० रुपया रख दिया कि हमें तो शेर-चीता खा लेंगे, इन पैसों का मैं क्या करूँगी? आप इसे ले लें, तीर्थयात्रा में काम आयेगा। और मुँह लटकाकर बैठ गयी।
महात्मा दयालु होते हैं। सोचा, है बड़ी धर्मात्मा! इसकी सहायता करनी चाहिए। उन्होंने पूछा– क्या कोई उपाय है? उसने कहा– महाराज! आप अपने कन्धे पर बैठाकर मुझे उस पार कर दें तो हो सकता है। महात्मा बिगड़े– मूर्ख कहीं की, कहती है कन्धे पर बैठा लो। ऐसा कैसे हो सकता है? वह बोली– महाराज! हम तो पहले ही कह रहे थे कि हमारी मौत निश्चित है। उसने रुपयों की पोटली ही महाराज के चरणों पर गिरा दी और बोली– आप जायें महाराज! महाराज ने इधर-उधर देखा, कहीं कोई दिखाई नहीं पड़ा। उन्होंने सोचा– कोई देखता तो है नहीं। उन्होंने कहा– अच्छा बैठ कन्धे पर! वह बैठ गयी और जब नदी के बीच में पहुँची तो वही लगाम निकालकर बाबा के मुँह में डाल दिया। महात्मा बिगड़े– यह क्या कर रही है? उसने बाबा के घुटने में लगायी अपनी एड़ी और बोली– टिक-टिक-टिक-टिक…..चल। महात्मा ने ऊपर देखा तो वहाँ कोई विवाहिता नहीं बल्कि वही बुढ़िया थी। उन्होंने उसे उठाकर नदी में फेंक दिया और वह उस पार खड़ी दिखाई पड़ी। उसने कहा– बाबाजी! वो तुम्हारे गुरु बाबा की कृपा रही जो बच गये, नहीं तो तुम्हारे जैसे महात्माओं को मूली की तरह हम रोज ही चबाया करते हैं। इसलिए –
गुरु की आज्ञा उलंघि के, जो नर कतहूँ जाय।
जहाँ जाय तहँ काल है, कह कबीर समुझाय।।
।। ॐ श्री सद्गुरुदेव भगवान की जय ।।
(‘अमृतवाणी भाग-7’ से उद्धृत)