तोड़ना टूटे हुए दिल को बुरा होता है

तोड़ना टूटे हुए दिल को बुरा होता है

ॐ जय गुरुदेवम् जय गुरुदेव

ॐ अशरण शरण शरण प्रभु लेव

ॐ जय गुरुदेवम् जय गुरुदेव

राखइ गुर जौं कोप विधाता।

गुर बिरोध नहिं कोउ जग त्राता।। (रामचरितमानस, १/१६५/६)

गुरु कें बचन प्रतीति न जेही।

सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही।। (रामचरितमानस, १/७९/८)

ॐ जय गुरुदेवम् जय गुरुदेव

एक पण्डितजी रिश्तेदारी में अपने समधी के यहाँ चले गये जहाँ उनके पुत्र का विवाह हुआ था। उनके समधीजी बड़े स्नेह से मिले, उनका चरण धुलाया, आसन के लिए पीढ़ा बिछा दिया। दोपहर का समय था इसलिए भोजन के लिए बैठा दिया, पानी भी रख दिया; लेकिन हाथ जोड़कर बोले, ‘‘समधी देवता! हम पूरा गाँव घूमकर चले आये किन्तु कहीं से आधा किलो आटा भी नहीं मिला। बताइये मैं आपकी क्या सेवा करूँ? यदि मैं झूठ बोलूँ तो यह गंगाजल हमारे हाथ में है।’’ तब लड़के के पिता, जो समधीजी आये थे, उन्होंने कहा, ‘‘देखिये समधीजी! हमारे भी हाथ में गंगाजल है। यह बात आपको और मुझे छोड़कर तीसरा कोई जानने न पाये।’’ उन्होंने पानी का गिलास उठाया, पीया और चले गये।

घर पहुँचकर उन्होंने एक बड़ी बैलगाड़ी में आटा, दाल, चावल, घी, गुड़, तेल इत्यादि गृहस्थी का सारा सामान भरकर, साथ में एक हल और दो बैल भी समधीजी के घर भेज दिया। अभावग्रस्त समधी के दिन बदलने लगे, बरक्कत होने लगी। दस वर्ष पश्चात् वही समधी पुन: दरवाजे पर आये। उनके आते ही तुरन्त सूजी का हलवा बन गया, पकौड़ी छन गयी, गरमागरम चाय आ गयी। स्वल्पाहार करा देने के उपरान्त वह बोले, ‘‘समधीजी! चलिये, जरा खेत-क्यारी भी देख आयें, तब तक भोजन भी तैयार हुआ जाता है।’’

खेत की मेंड़ पर पहुँचकर वह बोले, ‘‘देखो समधीजी! यह जो दस बीघा धान देख रहे हैं, यह सब हमारा ही है – इस भुजा के प्रताप से! और इधर आप जो यह कलमी आमों का बगीचा देख रहे हैं, यह सब इसी भुजा के प्रताप से है। और जो यह सबमर्सिबल पम्प देख रहे हैं, यह इस भुजा के प्रताप से है। और यह तीन मंजिला घर भी इसी भुजा के प्रताप से है।’’ चार-छ: बार जब उन्होंने यह दुहराया तब वह समधीजी बोले, ‘‘क्यों समधीजी! आपको याद है, दस साल पहले हम इसी घर में आये थे, तब आप जवान थे। तब इन भुजाओं का बल कहाँ चला गया था जब हम भूखे ही उठकर चले गये थे?’’ वस्तुत: वैभव बढ़ जाने पर ऐंठन सहज ही आ जाती है। यह एक भयंकर दोष है। कौन जानता है कि कब किसके साथ क्या घटित हो जाय? किसे ज्ञात था कि राजा–महाराजा, बादशाह–नवाब इत्यादि के भी दिन बदल जायेंगे। उन्हीं किलों में काई लग गयी, खण्डहर हो गये जिनका कभी भव्य उद्घाटन हुआ करता था।

कबीर गर्व न कीजिये, रंक न हँसिये कोय।

अजहूँ नाव समुद्र में, ना जाने का होय।।

अहंकार नहीं करना चाहिए और किसी के समक्ष गरीबी आ ही गयी तो उस पर हँसना नहीं चाहिए। वह हँसी का पात्र नहीं है। कदाचित् किसी की गरीबी आपकी निगाह में आ ही गयी तो उसकी मदद करें। रंक न हँसिये कोयआप सोचते हैं कि हमारी परिस्थिति तो ठीक-ठाक है; किन्तु सन्त कबीर कहते हैं, नहीं! अजहूँ नाव समुद्र में, ना जाने का होय।– न जाने अगले पल क्या घट जाय! इस तरह की घटनायें आये दिन आँखों के सामने होती ही रहती हैं।

एक दिन राजा रामचन्द्रजी विहरत पुष्प विमाना।

एक दिन सीता करत रुदनवाँ, खबर लेत हनुमाना।

सबै दिन होत न एक समाना।।

जो रामजी किसी दिन पुष्पक विमान में टहल रहे थे, एक दिन ऐसा भी आया था कि सीता चोरी चली गयीं। रामजी जंगल-जंगल पेड़-पत्तियों और मृगों से पूछ रहे थे– तुम देखी सीता मृगनयनी।(रामचरितमानस, ३/२९/९) हनुमानजी उनकी खोज-खबर लेने गये थे। अस्तु, सबै दिन होत न एक समाना।

एक दिन राजा युधिष्ठिर के घर सेवक श्री भगवाना।

एक दिन द्रौपदी करत रुदनवाँ चीर दु:शासन ताना।

सबै दिन होत न एक समाना।।

एक दिन ऐसा भी था कि महाराज युधिष्ठिर के घर सेवक के रूप में भगवान श्रीकृष्ण पत्तल उठाया करते थे। इस घटना के तुरन्त बाद उसी महाराज युधिष्ठिर की राजरानी द्रौपदी चीत्कार कर रही थी। शूरवीर पतियों के समक्ष चीर दु:शासन ताना। सभी असहाय निरुपाय बैठे थे। सभी दिन बराबर नहीं होते। इसी आशय का यह भजन है–

तोड़ना टूटे हुए दिल को बुरा होता है।

जिसका कोई नहीं, उसका तो खुदा होता है।।

माँग कर तुझसे खुशी लूँ, मुझे मंजूर नहीं।

किसका माँगी हुई दौलत से भला होता है।।

जिसका कोई नहीं……..

लोग नाहक किसी मजबूर को बुरा कहते हैं।

आदमी सब अच्छे हैं, पर वक्त बुरा होता है।।

जिसका कोई नहीं……..

किसको करें क्यों करें फरियाद ये अपनी।

जितना तकदीर में लिखा अदा होता है।।

जिसका कोई नहीं……..

विपरीत परिस्थितियों को झेलते-झेलते व्यक्ति हताश हो जाता है, उसका दिल टूट जाता है। अब टूटे हुए दिल को और अधिक तोड़ना बहुत बुरा होता है। लोग समझते हैं ‘वह असहाय है’। कदापि नहीं; क्योंकि जिसका संसार में कोई नहीं होता, उसके लिये भगवान स्वयं रक्षक हो जाते हैं। कुछ न होने पर मनुष्य के हृदय में भगवान की याद बढ़ जाती है। वह विनती करने लगता है कि प्रभु! दुनिया में सब जी-खा रहे हैं। क्या आपके दरबार में मेरे ही लिये कुछ नहीं रह गया? इस प्रकार प्रार्थना बढ़ जाती है। भगवान सब सुनते हैं, उसका कल्याण अवश्य करते हैं।

पूज्य गुरु महाराज कहा करते थे– हो! आदमी के दिन सदैव एक जैसे नहीं रहते, दिन बदलते देर नहीं लगती। भगवान ही सबके होते हैं। अभाव है तो घबड़ाओ मत। एक प्रभु की शरण पकड़ लो। वह आपके दोष नहीं देखते।

सनमुख होइ जीव मोहिं जबहीं।

जनम कोटि अघ नासिंह तबहीं।। (रामचरितमानस, ५/४३/२)

भगवान कहते हैं– जीव मेरे सन्मुख हो भर जाय, तो उसके करोड़-करोड़ जन्मों के पाप एक पल में समाप्त हो जाते हैं। अस्तु, भगवान आपके पाप नहीं देखते। वे केवल इतना देखते हैं कि कोई जीव मेरे सन्मुख हुआ या नहीं? जिस क्षण जीव सन्मुख हुआ, वे सँभालने लग जाते हैं। इसलिए मान लें, यदि सृष्टि में कहीं ठिकाना नहीं है तो आप मन, कर्म और वचन से एक प्रभु की शरण हो जायँ। भगवान से कुछ माँगना नहीं। क्या भगवान नहीं जानते कि यह तड़प रहा है, इसको क्या जरूरत है? इसकी तड़फन कैसे दूर होगी, क्या वह नहीं जानते? इसीलिए एक भक्त कहता है–

माँग कर तुझसे खुशी लूँ, मुझे मंजूर नहीं।

किसका माँगी हुई दौलत से भला होता है।।

प्रभो! आपसे खुशी माँग लूँ; यह सुविधा दो, वह सुविधा दो– इस प्रकार का माँगना मुझे स्वीकार नहीं है; क्योंकि माँगी हुई दौलत से कभी किसी का भला हुआ है क्या? ऐसा ही एक प्रसंग महाभारत का है। कौरव और पाण्डवों के मध्य सन्धि का अन्तिम प्रयास भी असफल हो गया। तब दुर्योधन ने पूछा, ‘‘केशव! आप किसकी ओर से रहेंगे?’’ भगवान ने कहा, ‘‘दुर्योधन! मैं समदर्शी हूँ! संसार में मेरा न कोई शत्रु है, न मित्र है। मेरे पास जो पहले आयेगा, मैं उसकी ओर रहूँगा।’’

शकुनि ने दुर्योधन को पीछे खींचकर कहा, ‘‘बेटा दुर्योधन! काम बन गया। अर्जुन भजनानन्दी है। प्रात: उठकर वह नहायेगा-धोयेगा, एक घड़ी बैठकर आँख मूँदेगा। तू रात ही रात रथ दौड़ाकर कृष्ण के पास पहले पहुँच। यदि हम कृष्ण को अपनी ओर करने में सफल हो गये तो इन पाण्डवों के पास बचेगा क्या! फिर तो हमारी विजय निश्चित है।’’

दुर्योधन रात में ही चल पड़ा। उधर भगवान ने देखा कि अहंकारी दुर्योधन चला आ रहा है। वह है बड़ा मूर्ख! वह अपने बैठने के लिए अच्छी-सी जगह अवश्य ढूँढ़ेगा। उन्होंने स्वर्णजटित सिंहासन अपने सिरहाने की ओर रखा। पलंग पर लेटते ही प्रगाढ़ निद्रा में चले गये। दुर्योधन पहुँचा और अपने पहले पहुँचने की सफलता पर बहुत प्रसन्न हुआ। उसने भगवान को दण्ड-प्रणाम भी नहीं किया, कमर पर हाथ रखकर कक्ष का निरीक्षण करने लगा कि मैं बैठूँ कहाँ? कृष्ण के पास कितना ही क्यों न हो, है तो कंस से हड़पा हुआ राज्य, कहाँ मैं मूर्धाभिषिक्त नरेश का युवराज! यहाँ मेरे अनुरूप जगह कहाँ मिलेगी? दाहिने-बायें दृष्टि दौड़ायी तो सिंहासन पर नजर पड़ गयी। उसने अनुमान लगाया कि लगता है यह व्यवस्था मेरे लिये ही की गयी है। ये यदुवंशी कुछ भी हों, आतिथ्य-सत्कार करना बढ़िया जानते हैं। वह अकड़कर सिरहाने रखे गये सिंहासन पर बैठकर कृष्ण के जागने की प्रतीक्षा करने लगा।

इसी बीच अर्जुन भी वहाँ पहुँचा। उसे पहले या पीछे पहुँचने की चिन्ता ही नहीं थी कि यह शर्त भगवान ने ही रखी है, वही इस समस्या को उलझायें या सुलझायें! वह तो समर्पित सेवक था। उसने पहुँचते ही श्रीकृष्ण के चरणों में सादर प्रणाम किया और चरणों की ओर फर्श पर बैठकर हाथ जोड़कर भगवान के मुखारविन्द का दर्शन करता रहा। इतने में प्रभु की आँखें खुलीं। बैठते हुए वह बोले, ‘‘अर्जुन! कब आये?’’ अर्जुन कुछ उत्तर देता, इसके पहले की दुर्योधन गुर्राया, ‘‘नहीं, पहले मैं आया हूँ।’’ श्रीकृष्ण ने कहा, ‘‘भाई! कह रहे हो तो तुम पहले ही आये होगे किन्तु आना तब होता है जब आमना-सामना हो। मेरी दृष्टि पहले अर्जुन पर पड़ी है। आड़ में पता नहीं कौन बैठा है, कहाँ क्या पड़ा है?’’ दुर्योधन घबड़ाया कि लगता है कृष्ण ने हमें पुन: ठग लिया। किन्तु श्रीकृष्ण बोले, ‘‘दुर्योधन! तुम बिल्कुल चिन्ता मत करो। मेरे पास दो विकल्प हैं। मेरे पास अजेय नारायणी सेना है जिसने आज तक पराजय का मुँह नहीं देखा है, दूसरी ओर मैं अकेला हूँ किन्तु मैं युद्ध नहीं करूँगा, शस्त्र नहीं उठाऊँगा। तुम दोनों एक-एक विकल्प चुन लो।’’

दुर्योधन बोला, ‘‘केशव! पहले मैं आया हूँ इसलिए पहले मैं ही माँगूँगा।’’ श्रीकृष्ण ने कहा, ‘‘हाँ, हाँ, तुम मुझे माँग लो।’’ दुर्योधन बिगड़ा, ‘‘फिर धोखाधड़ी। जब आपको शस्त्र नहीं उठाना है, युद्ध नहीं करना है तब आपसे बाँसुरी बजवाकर, ‘ता थैया ता थैया’ कराकर रासलीला करवानी है क्या? कृपया हमें नारायणी सेना दीजिए।’’ भगवान ने कहा, ‘‘एवमस्तु।’’ दुर्योधन सेना लेकर चला तो घूमकर कृष्ण और अर्जुन की ओर दृष्टिपात किया और बहुत खुश हुआ कि अब इस ग्वाले के पास बचा ही क्या! अब बजाया करे बाँसुरी और देता रहे उपदेश।

इधर भगवान ने पूछा, ‘‘अर्जुन! तुम…’’ अर्जुन बोला, ‘‘प्रभो! पहले माँगने का अवसर मिलता तब भी मैं आपको ही माँगता। मुझे नारायणी सेना नहीं चाहिए थी। मुझे सृष्टि का कोई बल, कोई सुविधा नहीं चाहिए। मुझे केवल आप चाहिये। प्रभो! सदैव से मेरी एक ही इच्छा थी कि आपका वरदहस्त सदा मेरे शिर पर रहे। अब आप जैसे-जैसे अनुमति देंगे, युद्ध करता रहूँगा।’’ ठीक अठारहवें दिन नारायणी सेना का नामोनिशान नहीं रह गया। ग्यारह अक्षौहिणी सेना के अधिपति दुर्योधन की जाँघें टूट चुकीं थी, वह धूल में लेट रहा था और जीवनभर सच-झूठ बोलकर अंधे पिताजी धृतराष्ट्र और मामा शकुनि की सहायता से षड्यन्त्र रचकर दुर्योधन ने जो कुछ अर्जित किया था, सब-का-सब पाण्डवों को मिल गया जबकि पाण्डवों को उसकी कामना ही नहीं थी। वे तो केवल क्षात्रधर्म का पालन कर रहे थे। सारा वैभव उन्हें हठात् मिल गया। विजय अर्जुन की हुई। जहाँ भगवान रहते हैं वहाँ विजय है, श्री है, विभूति है और वहीं अचल नीति भी है। अस्तु, भगवान से कदाचित् माँगना ही पड़े तो केवल एक वस्तु माँगें कि प्रभो! मैं आपके निगाह के नीचे सदैव रहूँ। बस, यही आशीर्वाद दें कि आपका वरदहस्त सदैव रहे। वे और भी जोर दें तो बोलें– प्रभो! केवल आप चाहिये। मनु ने भगवान को माँगा। अर्जुन ने भी भगवान को माँगा जबकि दुर्योधन ने ऐश्वर्य, बल और शक्ति को माँगा। सृष्टि में जो कुछ है, नश्वर है। आज है तो कल नहीं रहेगा। सबकी नाव समुद्र में है, डूबते देर नहीं लगेगी। इसलिए भगवान से माँगना है तो इस क्षणभंगुर शरीर के सुख-सुविधा की सामग्री नहीं।

जप तप करके स्वर्ग कमाना, यह तो काम मजूरों का।

देना सब कुछ लेना कुछ नहीं, बाना झाँकर झूरों का।।

जप किया, तप किया, संयम किया और भगवान ने कुछ कहा तो स्वर्ग का सुख माँग लिया। यह तो मजदूरों का काम है कि दिनभर श्रम करते रहते हैं, पूछते भी रहते हैं– मालिक! अब कितनी देर है? हमारी मजदूरी का क्या होगा? यही सब माँगा तो हमने नश्वर माँगा; क्योंकि भगवान ही अजर-अमर हैं, शाश्वत हैं इसलिए उन्हें ही सर्वस्व समर्पण कर दें, अपने को उनकी गोद में डाल दें। देना सब कुछ किन्तु लेना कुछ नहीं– उनके हो भर जायँ। यही फकीरों की रहनी है। उन्हें भौतिक सुख-सुविधा या सुन्दरता नहीं चाहिए। वस्तु तो वस्तु है। उसकी आयु है। काल पाकर वह नष्ट हो जायेगी। आप तो पुन: दरिद्रता के उसी फुटपाथ पर आ गये। माँगकर खुशी लूँ, यह तो मुझे मंजूर नहींकारण? किसका माँगी हुई दौलत से भला होता है।

भगवान प्रेम के भूखे हैं। प्रेमी के लिये भगवान ऋणी हो जाया करते हैं। हनुमान ने भरत को संदेशा दिया कि प्रभु राम आ गये। इतना सुनकर भरत बोले–

एहि सन्देस सरिस जग माहीं।

करि बिचार देखेउँ कछु नाहीं।।

नाहिन तात उरिन मैं तोही।

अब प्रभु चरित सुनावहु मोही।। (रामचरितमानस, ७/१३-१४)

हे तात! मैं तुमसे उऋण नहीं हूँ। मैं तुम्हारा ऋणी हूँ। ‘प्रभु आ गये’– इस संदेश के समान सृष्टि में कुछ है ही नहीं। मैं इसके बदले क्या देकर आपसे उऋण हो सकता हूँ? हनुमान ने कहा– प्रभो! आज मैं सबकुछ पा गया जो आपको प्रत्यक्ष देख रहा हूँ। आपको पाकर हमें अन्य कुछ चाहिए भी नहीं। इसलिए निष्काम कर्मयोग ही आदर्श है। कदाचित् आप कामना करेंगे तो वस्तु की ही तो करेंगे जबकि वस्तु नश्वर है। कामना करनी ही है तो भगवान की करें। भगवान अविनाशी हैं। वह जहाँ रहेंगे, अविनाशी पद रहेगा। वह सर्वज्ञ हैं इसीलिए वहाँ सर्वज्ञता रहेगी। वह लक्ष्मीपति हैं अत: उनके साथ ऐश्वर्य छाया रहता है। मनुष्य अल्पबुद्धि से जो सोचता है, उससे अनन्त गुना आगे की व्यवस्था भगवान के पास रहती है तो क्यों नहीं तुलसी मूलिंह सींचिये फूलै फलै अघाय।

अगली पंक्ति में कवि कहता है–

लोग नाहक किसी मजबूर को बुरा कहते हैं।

आदमी सब अच्छे हैं, पर वक्त बुरा होता है।।

लोग अकारण ही किसी को बुरा कहते हैं। कोई भी बुरा नहीं है। सभी आदमी अच्छे होते हैं, केवल समय बुरा होता है जबकि समय बदलता जाता है– सबै दिन होत न एक समाना।। आज की हमारी करनी कल का वक्त बन जाती है। महाभारत में महाराज नहुष का आख्यान इसी तथ्य की ओर इंगित करता है।

महाराज नहुष बड़े सदाचारी, साधुसेवी और धर्मात्मा थे। सैकड़ों यज्ञ करके उन्होंने इन्द्रपद को प्राप्त किया था। देवताओं का सर्वोच्च पद! अब वरुण, कुबेर, अग्नि, काल, यम इत्यादि सभी उनके चरणों में नतमस्तक होने लगे। उनका स्वभाव बदलने लगा। उन्होंने देखा कि इतनी शक्ति मेरे पास! वह लगे देवताओं की गणना करने। वह देवता पूर्वनरेश देवेन्द्र कहाँ हैं? सेवकों ने बताया, ‘‘वह तो तपस्या करने चले गये।’’ नहुष ने कहा, ‘‘उनकी धर्मपत्नी महारानी शची कहाँ हैं? उनको मेरी सेवा में उपस्थित करो।’’

शची को सूचना मिली। वह देवगुरु बृहस्पति के पास पहुँची– ‘‘गुरुदेव! लगता है मृत्युलोक से कोई सिरफिरा आ गया है। उससे मेरी रक्षा कीजिए।’’ बृहस्पति बड़े मेधावी थे। वह बोले, ‘‘देवी! आप चिन्ता न करें। उसे सन्देश दे दें कि ब्राह्मणों की पालकी में बैठकर वह आपके पास आये तो आप सेवा में प्रस्तुत हो जायेंगी।’’

एक समस्या खड़ी हो गयी कि स्वर्ग में ब्राह्मण कहाँ? जो भी वहाँ गया, देवता हो गया। पृथ्वी पर भी उनकी संख्या न के बराबर। यूरोप में पादरी होते हैं, अरब देशों में मौलाना-मौलवी मिल जायेंगे। मंदिर में सेवा करनेवाला पुजारी हो गया। ब्राह्मणों की खोज होने लगी। आफत आ गयी। भागमभाग होने लगी। हाँ, सोनभद्र से खोजते तो चौबेजी मिल जाते, बनारस से पाण्डेयजी मिल सकते थे; किन्तु उस जमाने में पाण्डे, तिवारी, चौबे…..– ये उपाधियाँ नहीं थीं। उस समय खोजने पर मिले पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरा, अगस्त्य, वशिष्ठ, विश्वामित्र। ये उस युग की सर्वोपरि विभूतियाँ थीं। सब के सब ब्रह्मर्षि थे। इन्द्र के अनुचर इन्हीं को पकड़कर ले गये और नहुष की पालकी में जोत दिया। शची देवी ने कहलाया, ‘‘अब आप एक महीने इसी पालकी में बैठकर स्वर्ग का भ्रमण करें जिससे लोग आपके ऐश्वर्य को देख तो लें। जिस दिन महीना पूरा हो उस दिन मेरे महल में आ जायँ।

पालकी में बैठकर नहुष स्वर्ग के इस छोर से उस छोर तक घूमने लगा। महीना पूरा हुआ। जब पालकी का रुख शची देवी के महल की ओर घूमा, नहुष को पालकी की चाल धीमी प्रतीत हुई। वह सोच रहा था कि कितना शीघ्र पहुँच जाय। उतावलेपन के आवेश में उसने महर्षि अगस्त्य को पैर से मारकर ‘सर्प-सर्प’ कहा अर्थात् शीघ्रता से चलने को कहा। अगस्त्य ने कहा, ‘‘जाओ सर्प ही हो जाओ, तुम अजगर हो जाओ।’’ नहुष ने क्रोध से अगस्त्य की ओर देखा। उसकी दृष्टि में इतनी शक्ति थी कि किसी को क्रोध से देखभर लेता तो वह भस्म हो जाता किन्तु महर्षि पर उसकी दृष्टि का प्रभाव नहीं पड़ा; क्योंकि श्राप पहले ही मिल चुका था, उसकी आँखें अजगर की हो गयीं थीं। वह पालकी से नीचे गिरने लगा तो चिल्लाया, ‘‘त्राहि माम शरणागतम्! आप तो दयालु हैं, ब्रह्मस्थित महापुरुष हैं। मुझ मंदबुद्धि से महान भूल हो गयी।’’ अगस्त्य ने कहा– ‘‘राजन्! श्राप तो मिल चुका, यह जन्म तो आपको भोगना ही पड़ेगा।’’

नहुष गिड़गिड़ाया, ‘‘भगवन्! मेरा उद्धार करें।’’ अगस्त्य ने कहा, ‘‘जिस दिन तुम ब्राह्मण की महिमा सुन लोगे, उस दिन तुम्हें इस अधम योनि से मुक्ति मिल जायेगी और तुम पुन: इन्द्रपद प्राप्त कर लोगे।’’ नहुष ने पूछा, ‘‘भगवन्! मुझे ब्राह्मण की महिमा कौन सुनायेगा?’’ अगस्त्य ने कहा, ‘‘अभी तो संसार में ऐसा कोई नहीं है जो ब्राह्मण की महिमा जानता हो। हाँ, द्वापर युग में महाराज युधिष्ठिर वनवासकाल में तुम्हारे पास आयेंगे। वही तुम्हें ब्राह्मण की महिमा बतायेंगे। उसे सुनकर तुम इस अधम योनि से मुक्त हो जाओगे।’’ नहुष ने पूछा, ‘‘भगवन्! मैं खाऊँगा क्या?’’ अगस्त्य ने कहा, ‘‘दिन के चौथे पहर में जो तुम्हारी अधिकृत भूमि में आयेगा, कितना भी बलवान होगा, वह वश में हो जायेगा। वही तुम्हारा भोजन होगा।’’

युग बीतने लगे, द्वापर आया, युधिष्ठिर इत्यादि का जन्म हुआ। शकुनि और दुर्योधन के षड्यन्त्र चले। युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन सबका वनवास हुआ। भीम शिकार के शौकीन थे। प्रात: होते ही वह गदा उठाते और शिकार पर निकल जाते। एक दिन शाम होने को आयी और वह लौटे ही नहीं। युधिष्ठिर ने कहा, ‘‘हम चार भाई यहाँ हैं, केवल भीम नहीं है। मेरी बायीं भुजा और वाम नेत्र फड़क रहे हैं। लगता है, भीम संकट में है।’’ ऋषि धौम्य को लेकर युधिष्ठिर उन्हें ढूँढ़ने गये।

घनघोर जंगल में किसी एक आदमी को ढूँढ़ना कठिन होता है फिर भी भीम को ढूँढ़ना बड़ा आसान था; क्योंकि भीम द्वारा आहत कई एक शेर, हाथी, गैंडे और जंगली भैसें कराह रहे थे। बहुतों ने दम तोड़ दिया था। वृक्ष उखड़े पड़े थे। वह जिधर से निकल गया, मानो सेना के बुलडोजर उधर से निकल गये हों। रास्ता साफ हो जाया करता था। इन्हीं चिह्नों का अनुसरण करते युधिष्ठिर वहाँ पहुँच गये जहाँ एक अजगर से लिपटा भीम निश्चेष्ट पड़ा था।

युधिष्ठिर ने कहा, ‘‘भीम! पृथ्वी पर जन्म लेनेवाला कोई प्राणी तुम्हें वश में नहीं कर सकता। यह अजगर वेश में कोई देवता हैं, यक्ष या कोई किन्नर हैं; यह कौन हैं?’’ तब भीम ने कहा, ‘‘भय्या! यह हमलोगों के पूर्वज महाराज नहुष हैं। यह इन्द्रपद से च्युत हुए हैं। इन्होंने किसी वरदान के बल से मुझे वश में कर लिया है।’’ युधिष्ठिर ने हाथ जोड़कर कहा, ‘‘राजन्! मेरे भाई को आप मुक्त कर दें। मैं जब तक जंगल में रहूँगा, आपके भोजन की व्यवस्था करता रहूँगा।’’ नहुष ने कहा, ‘‘राजन्! हम किसी का दिया हुआ भोजन खा ही नहीं सकते। दिन के चौथे पहर में जो भी यहाँ आता है, वही हमारा भोजन होता है। दूसरी वस्तु तो हम खा ही नहीं सकते। कल तक खड़े रहे तो आप सबको भी खा लूँगा। क्योंकि एक ही जीव खाने का मुझे अधिकार है इसलिए इसे छोड़ूँगा नहीं।’’

युधिष्ठिर ने पुन: कहा, ‘‘जिसने सैकड़ों यज्ञ-महायज्ञ कर इन्द्रपद प्राप्त किया, इतने धर्मात्मा आप-जैसे महापुरुष से ऐसा कौन-सा अपराध हो गया जो अजगर की अधम योनि में पड़े हैं?’’ तब नहुष को पूर्वजन्म याद हो आया। उन्होंने बताया, ‘‘ब्राह्मणों के श्राप से ऐसा हुआ है।’’ युधिष्ठिर ने कहा, ‘‘अरे! ब्राह्मणों का श्राप! क्या आप ब्राह्मण की महिमा नहीं जानते?’’ नहुष ने कहा, ‘‘राजन्! आप ही बतायें, ब्राह्मण किसे कहते हैं?’’

ब्राह्मण: को भवेद् राजन् वेद्यं किं च युधिष्ठिर:

ब्रवीह्यति मति त्वां हि वाक्यैरनुमिमीमहे।। (महाभारत, वनपर्व, १८०/२०)

युधिष्ठिर ने बताया–

सत्यं दानं क्षमा शीलमानृशंस्यं तपो घृणा।

दृश्यन्ते यत्र नागेन्द्र स ब्राह्मण इति स्मृत:।। (महाभारत, वनपर्व, १८०/२१)

‘‘हे नागेन्द्र! सत्य अर्थात् एक परमात्मा में निष्ठा, दान अर्थात् उस ब्रह्म में मन-क्रम और वचन से समर्पण, क्षमा, मनसहित इन्द्रियों का संयम, अिंहसा, धारावाही चिन्तन, धारणा-ध्यान-समाधि जिसके स्वभाव में ढल गया हो, दया इत्यादि शील से जो युक्त है वही ब्राह्मण कहा जाता है।’’ अजगर वेषधारी नहुष ने कहा–

शूद्र तु यद्भवेल्लक्ष्म द्विजे तच्च न विद्यते।

न वै शूद्रो भवेच्छूद्रो ब्राह्मणो न च ब्राह्मण:।। (महाभारत, वनपर्व, १८०/२५)

‘‘ये गुण तो शूद्र में भी पाये जा सकते हैं और इन गुणों से हीन ब्राह्मण भी पाये जाते हैं।’’ युधिष्ठिर ने कहा, ‘‘फिर तो वह शूद्र शूद्र नहीं है और न वह ब्राह्मण ब्राह्मण ही है।’’

यत्रै तल्लक्ष्यते सर्प वृत्तं स ब्राह्मण: स्मृत:

यत्रै तन्नभवेत् सर्प तं शूद्रमिति निर्दिशेत्।। (महाभारत, वनपर्व, १८०/२६)

‘‘जिसकी वृत्ति इन लक्षणों से युक्त हो वही ब्राह्मण है, और जहाँ ऐसी वृत्ति नहीं है उसे शूद्र जानना चाहिए।’’ इतना सुनना था कि अजगर का शरीर छूट गया। भीम तत्काल मुक्त हो गये और वह अजगरवेशधारी नहुष इन्द्र के स्वरूप में परिवर्तित हो गये। उन्होंने कहा, ‘‘राजन्! युगों से मैं इस अधम योनि में पड़ा हुआ था। आपके कृपाप्रसाद से आज मैं पुन: अपना इन्द्रपद पा गया। महाभारत युद्ध होनेवाला है। मेरा आशीर्वाद है कि विजय आपकी होगी।’’ उन्होंने आशीर्वाद दिया और चले गये। अस्तु, शकुनि का षड्यन्त्र, दुर्योधन की मूर्खता, अंधे धृतराष्ट्र का पुत्र-मोह – ये सब तो निमित्त मात्र थे। महाभारत के भीषण युद्ध की संरचना में इनमें से किसी का कोई दोष ही नहीं था। युगों पूर्व जब पृथ्वी के नक्शे में हस्तिनापुर का अस्तित्व भी नहीं था, महाभारत-युद्ध की घोषणा हो चुकी थी। ‘एक युधिष्ठिर जन्म लेंगे और वनवास में जायँगे’– यह पहले से ही निर्धारित था। मनुष्य होनी के हाथ का खिलौना मात्र है और कुछ नहीं। यह होनी थी इसलिए ‘लोग नाहक ही किसी मजबूर को बुरा कहते हैं। आदमी सब अच्छे हैं…..।’

एक दिन युधिष्ठिर महाराजा थे और उन्हीं के जीवन में एक दिन ऐसा भी आया कि वह असहाय होकर वन-वन भटक रहे थे। आज की हमारी करनी भविष्य बनकर हमारे सामने आती है। जो हो रहा है, वह भूतकाल के संस्कारों में अंकित है।

अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।

अन्त में कहते हैं–

किसको करें, क्यों करें फरियाद यह अपनी।

जितना तकदीर में लिखा अदा होता है।।

प्रार्थना करें भी तो किससे? उस भाग्यरेखा को टालने की क्षमता ही किसमें है? प्रार्थना भी क्यों करें जब प्रयोजन सिद्ध होना ही नहीं है? जितना भाग्य में लिख गया है, समय पर अवश्य प्रकट होता है। यह युधिष्ठिर के तकदीर में लिखा युगों के पश्चात् प्रकट हो गया। भाग्य का बोझ तो उठाना ही पड़ता है। किन्तु कैसी भी भाग्यरेखा हो, भजन, संयम और एक परमात्मा के प्रति समर्पण से शान्त हो जाती है, दुर्भाग्य की रेखाएँ तितर-बितर हो जाती हैं। जिसका कोई नहीं– संसार में कोई सहारा नहीं, भाग्य ने तो उठाकर पटक दिया गन्दी नाली में, आगे-पीछे सहायक कोई नहीं; फिर भी हताश होने की जरूरत नहीं है; क्योंकि,

जिसका कोई नहीं उसका तो हरि होता है।

जिसका कोई नहीं उनकी रक्षा भगवान करते हैं। नारदजी एक बार ऐसी ही विपदा में पड़ गये। दच्छ प्रजापति के कुल के एक हजार लड़कों को उपदेश देकर उन्होंने साधु बना दिया। इससे दच्छ को दु:ख हुआ कि इन्होंने तो हमारे वंश का ही उच्छेद कर डाला। उन्होंने नारद को श्राप दे दिया कि दो घड़ी से अधिक एक स्थान पर न रुकें, किसी को लम्बा सत्संग सुनाकर साधु न बना सकें। इसके पश्चात् नारदजी जहाँ भी जाते, दो घड़ी तो ठीक रहते, इसके पश्चात् उनके शिर में दर्द होने लगता। वह वहाँ से चल देते तो दर्द समाप्त हो जाता था। इसी क्रम में विचरण करते हुए नारदजी हिमालय की तलहटी में पहुँच गये। गंगा के किनारे उन्हें एक पवित्र गुफा दिखायी पड़ी। वह वहाँ बैठकर चिन्तन में डूबे तो,

सुमिरत हरिहि श्राप गति बाधी।

सहज बिमल मन लागि समाधी।। (रामचरितमानस, १/१२४/४)

हरि का स्मरण करते ही श्राप की गति समाप्त हो गयी। इसलिये कैसा भी कुसंस्कार हो, एक प्रभु का सुमिरण करने से सौभाग्य में बदल जाता है। इस सुमिरन की शुरुआत नाम से है। दर्शन-स्पर्श-प्रवेश-विलय और स्थिति जब तक नहीं मिल जाती, तब तक यह नाम साथ चलता है। नाम इतना अधिक जपें कि भगवान खुद पूछने लगें कि बेटा! तुम्हारी इच्छा क्या है? वह अनुकूल हो जायँ। जहाँ वह अनुकूल हुए तो,

गरल सुधा रिपु करहिं मिताई।

गोपद सिन्धु अनल सितलाई।।

गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही।

राम कृपा करि चितवा जाही।। (रामचरितमानस, ५/४/२-३)

गरुड़जी! सुमेरु पर्वत शिर पर आनेवाला होगा, आयेगा अवश्य क्योंकि न आये तो कैसे ज्ञात होगा कि सुमेरु जितना बड़ा पहाड़ शिर पर आनेवाला था। उसे किसी ने फेंका नहीं है। वह तो किसी जन्म की आपकी ही कमाई है जो पहाड़ जैसी विपत्ति बनकर आ रहा है; किन्तु वह रजकण जैसा भारहीन होकर गिर जायेगा, आपको पता भी नहीं चलेगा, सुमेरु रेनु सम ताही। किसको? राम कृपा करि चितवा जाही।– परमतत्त्व परमात्मा राम कृपा करके एक निगाह देख भर लें। जहाँ उनकी दृष्टि पड़ी तो गरल सुधा– विष अमृत में परिवर्तित हो जायेगा, रिपु करहिं मिताई– शत्रु मित्र हो जायेंगे और वह भवसागर जिसे सभी अथाह कहते हैं, गोपद बन जायेगा। गो माने मनसहित इन्द्रियाँ। उनका जितना आयतन है आपके लिए समुद्र उतना ही रहता है। गाय के चलने से जमीन पर बने गड्ढे में जितना पानी भर जाता है, अथाह संसार समुद्र उतना ही रह जाता है कि एक बार पाँव रखें तो गाय के खुर के दस-पाँच गड्ढे आप पार कर जायेंगे। किसके लिए? जिसे प्रभु करुणा करके एक निगाह देख लें। प्रभु करुणा करेंगे कब? जब आप उनका सुमिरण करेंगे।

मंत्र महामनि बिषय ब्याल के।

मेटत कठिन कुअंक भाल के।। (रामचरितमानस, १/३१/९)

मंत्र महान मणि है जिसके प्रभाव से संसार के विषयरूपी विषधर के असाध्य कुअंक भी तत्काल मिट जाते हैं। भाग्य कोई स्थायी वस्तु नहीं है। नाम-जप से असाध्य कुअंक भी मिट जाते हैं इसलिए नाम का जप करें। दो-ढाई अक्षर का एक छोटा-सा नाम जो उन प्रभु को पुकारे। बीच में कहीं भ्रान्ति न पैदा कर दे। ऐसा नहीं कि सोमवार को शंकरजी, मंगलवार को हनुमानजी, बुधवार को बुद्धिदाता गणेशजी की पूजा– रोज आपकी निष्ठा बदलती चली जाय। इसलिए जो उन प्रभु को पुकारे, ओम् अथवा राम– दो-ढाई अक्षर का कोई एक नाम, किसी भाषा में नाम लेकिन सम्बोधन सीधा उसका हो। भाषा चाहे जो हो, नाम बहुत छोटा होना चाहिए। बहुत बड़ा पँवारा श्वास में आयेगा ही नहीं। इसी साधारण नाम को पहले जिह्वा से, फिर श्वास से, सुरत से जपना होगा। श्वास से जपने में भगवान का लम्बा-चौड़ा नाम साथ नहीं देगा, श्वास में ढल नहीं पायेगा। इसलिए छोटा-सा नाम, किसी भाषा का कोई भी नाम जो सीधे परमात्मा का बोध कराता हो, ऐसा नाम चलते-फिरते, उठते-बैठते, खाना खाते, पानी पीते, शौच जाते, जीवन की हर क्रिया के साथ, जब तक सचेत रहें, नाम याद आया करे। सदैव स्मरण बना रहे तो सोने में सुगंध है। हाँ, प्रतिदिन सुबह-शाम बैठकर आधा घण्टा-बीस मिनट समय अवश्य दें। यदि किसी दिन समय न दे पायें तो रात में अधिक समय देकर इतना नाम-जप अवश्य पूर्ण कर लें। नियम में शिथिलता या कुछ दिनों तक जप छूट जाने से पुन: नये सिरे से आरम्भ करना होता है। भगवान के दरबार में निश्चित समय पर उपस्थिति का बड़ा महत्व है।

नाम-जप के नियम को सदैव याद रखने के लिए ही कुछ पूर्वजों ने त्रिकाल सन्ध्या का नियम बनाया। प्राचीनकाल में घड़ी जैसे यन्त्र का आविष्कार जब नहीं था तो सूर्योदय के समय जिसमें सूर्य का उदय और रात्रि के अवसान की संधि, सायंकाल सूर्य का अवसान और रात्रि के प्रवेश की संधि और मध्याह्न के समय आधा व्यतीत हुआ और आधा दिन के उतार की सन्धि– इन तीन अवसरों पर प्रभु के स्मरण का विधान था। कुछ मनीषियों ने पाँच बार प्रभु के स्मरण का विधान रखा किन्तु सद्गुरुओं ने अपने शिष्यों के लिए अहर्निश चिन्तन का उपदेश दिया,

जागत में सुमिरन करे, सोवत में लौ लाय।

सुरत डोर लागी रहे, तार टूट ना जाय।।

अर्थात् जब तक जगें, सुमिरन करें। सुरत भली प्रकार लग जाय तभी निद्रा-लाभ करें जिससे निद्रा में भी कोई अनर्गल स्वप्न न आने पाये। यदि स्वप्न आये तो भगवान की महिमा दिखाई पड़े। सुरत डोर लागी रहे, तार टूट न जाय।– सुरत की डोर अर्थात् मन की दृष्टि इष्ट में लगी रहे, क्रम टूटने न पाये। सोकर उठने पर सुरत वहीं लगी मिले जहाँ रात को सोते समय छोड़ा था। गुरु महाराज बताया करते थे– हो! जब सुबह हमार आँख खुले तो भक्क देना स्वरूपवा हृदय में आ जाय। सुरतिया सीधे नाम पर जाय, स्वाँस पर। इस प्रकार आठ पहर लागा रहे, तार टूट ना जाय।– दिन-रात के आठों प्रहर श्वास पर ध्यान केन्द्रित रखना महात्माओं का भजन है लेकिन आरम्भिक अवस्थावालों के लिए चलते-फिरते, उठते-बैठते, खुरपी चलाते, लड़का खिलाते अर्थात् जीवन के हर मोड़ पर नाम याद आवे। सुबह-शाम बैठकर आधा घण्टा समय अवश्य दें। भगवान जानते हैं कि यह जीव मुझे पुकार रहा है। वह यह भी जानते हैं कि इसकी चाहत क्या है? वह देंगे। भविष्य में आप जो माँगेंगे, वह मिलेगा। भगवान यह भी देखते हैं कि किसमें इसका हित है, घुमा-फिराकर वही देते हैं और मोक्ष मुनाफे में मिल जाता है क्योंकि परमात्मा के चिन्तन-पथ में बीज का नाश नहीं होता, आरम्भ का नाश नहीं होता। माया के पास ऐसा उपाय नहीं कि आपके चिन्तन को मिटा दे। भगवत्पथ में यदि वस्तु माँगते हैं तो वस्तु भी मिलेगी और श्रेय पद तो परमात्मा का अतिरिक्त उपहार है। वस्तु का जब तक समय होगा, आपको तब तक वहाँ टिकना पड़ेगा। ज्योंही वस्तु की आयु समाप्त हुई, जहाँ से साधन छूटा था, वहीं से पुन: आगे बढ़ना होता है। और,

अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परमां गतिम्। (गीता, ६/४५)

अनेक जन्मों के परिणाम में भजन करनेवाला वहाँ पहुँच जाता है जिसका नाम परम गति है, परम धाम है। इस जीवन और इसके नश्वर भोगों का क्या? विश्वविजयी सम्राटों को भी अधूरी इच्छायें लेकर जाना पड़ा। यूनान के सिकन्दर महान ने एक महापुरुष सन्त डायोजनिस का नाम सुन रखा था। राजकीय कार्यों की व्यस्तता में उसे इतना अवसर ही नहीं मिला कि उन सन्त का दर्शन कर सके यद्यपि मन में उनके दर्शन की प्रबल लालसा बनी रहती थी। एक बार वह सामरिक अभियान पर जा रहा था। उनके सेनापति ने घोड़े से उतरकर निवेदन किया, ‘‘जहाँपनाह! जिस सन्त का आप दर्शन करना चाहते थे, वह यहीं सामने धूप में बैठे हैं। सिकन्दर रथ से उतर पड़ा। उन महात्मा को सादर प्रणाम किया।

वह महात्मा बोले, ‘‘पहले बता तू कौन है?’’ वह बोला, ‘‘यहाँ का सम्राट सिकन्दर!’’ महात्मा ने कहा, ‘‘ओह! इधर एक महीने से गाड़ियों में भरकर जो अस्त्र-शस्त्र इस रास्ते से जा रहे हैं, क्या सब तुम्हारे हैं?’’ सिकन्दर ने कहा, ‘‘हाँ सब मेरे हैं।’’ महात्मा ने पूछा, ‘‘सब चला गया या अभी कुछ शेष है?’’ सिकन्दर मुस्कराया और बोला, ‘‘अरे! अभी तो पूरी सेना पीछे आ रही है। वह भी शस्त्रों से सुसज्जित है।’’ महात्मा ने कहा, ‘‘अच्छा यह बताओ, तुम जा कहाँ रहे हो?’’ सिकन्दर ने चार-छ: देशों के नाम गिनाये कि इस-इस देश को जीतने जा रहा हूँ। इसके पश्चात् काबुल और उसके आगे भारत! महात्मा ने पूछा, ‘‘इसके बाद?’’ उसने बताया, ‘‘पूरा संसार।’’ वह महात्मा बोले, ‘‘अरे तुम्हारे पास समय कहाँ है? समय को व्यर्थ क्यों खोते हो? यह कुटिया दो व्यक्तियों के भजन के लिये पर्याप्त है, दो रोटी का प्रबन्ध भी है। एक मैं हूँ, दूसरे तुम रह सकते हो। यही रुक जाओ, भजन करो।’’

अभी तक सिकन्दर को प्रशंसा करनेवाले लोग ही मिले थे। उस दिन कोई सच-सच कहनेवाले सन्त मिले थे। सन्त वचन से पहले तो उसे ठेस लगी किन्तु मन में उनके प्रति बड़ी श्रद्धा थी। वह सँभलकर बोला, ‘‘भगवन्! अब तो निकल चुका हूँ। लौटूँगा तो आपके पास अवश्य आऊँगा।’’ वह महात्मा बोले, ‘‘पगले! जब लौटकर नहीं आओगे तब क्या होगा?’’ भारी मन से सिकन्दर चला गया। जहाँ-तहाँ लड़ाइयाँ हुई, विजय सिकन्दर को मिली। भारत में प्रवेश के साथ ही महाराज पुरु से कड़ा मुकाबला हुआ। किसी तरीके से वह जीत तो गया किन्तु सेना ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया। सिकन्दर लौट पड़ा। रास्ते में ही वह बीमार पड़ गया। बचने की आशा क्षीण हो चली थी। उसने उन महात्मा को पत्र भेजा कि भगवन्! मैं आपके ही पास आ रहा था, महलों में राजकाज देखने नहीं जा रहा था किन्तु अब लगता है आप तक पहुँच नहीं पाऊँगा। लगभग बत्तीस वर्ष की आयु में सिकन्दर चल बसा।

कहाँ गये वो दारा सिकन्दर, कहाँ वह बारहदरी गयी।

चले गये सब अजल के मुख में, न खुश्की न तरी गयी।।

विश्वविजय की कामना लिये सिकन्दर अल्पायु में चला गया। इसलिए यह निश्चित नहीं है कि हम आप अस्सी साल या नब्बे साल के होकर ही जायेंगे। कल के पल को भी कोई ठीक नहीं कहा जा सकता। यदि दुर्लभ मानव-तन मिला है तो….यदि कहीं कोई सहारा न मिलता हो तब भी निराश होने की आवश्यकता नहीं है। चौबीसों घण्टे का सहारा हैं मात्र एक प्रभु! इसलिए विनोद में, गपशप में, हँसी-ठिठोली में या केवल जीवन-निर्वाह में समय न गँवायें।

सोइ सर्वग्य गुनी सोइ ग्याता।

सोइ महिमंडित पंडित दाता।।

धर्म परायन सोइ कुल त्राता।

राम चरन जाकर मन राता।। (रामचरितमानस, ७/१२६/१-२)

यह धर्म वह धर्म…. धर्म के नाम पर भ्रान्तियाँ कि बिल्ली पूजो, चूहा पूजो– यह धर्म नहीं है। मानस जिनके हृदय की उपज है उन भगवान शंकर ने निर्णय दिया कि वही सर्वज्ञ है, सब कुछ जानता है, गुणी है, ज्ञाता है, पण्डित है, दानदाता है, वही धर्मपरायण है, वही अपने कुल का वास्तविक रक्षक है। कौन? एक परमात्मा के चरणों में जिसका मन अनुरक्त है।

नीति निपुन सोइ परम सयाना।

श्रुति सिद्धांत नीक तेहिं जाना।। (रामचरितमानस, ७/१२६/३)

दच्छ सकल लच्छन जुत सोई।

जाकें पद सरोज रति होई।। (रामचरितमानस, ७/४८/८)

वह नीति में निपुण है, वह परम सयाना है, वेदों का सिद्धान्त भली प्रकार उसने जाना है, भले ही वह पढ़ा-लिखा न हो फिर भी वेदों के सिद्धान्त से भली प्रकार अवगत है, वह दक्ष है, सभी लक्षणों से सम्पन्न है, एक परमात्मा के चरणों में जिसका मन अनुरक्त है। अन्त में मानस के रचयिता भगवान शिव कहते हैं– हे पार्वती!,

सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत।

श्री रघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत।। (रामचरितमानस, ७/१२७)

वह सारा कुल कृतार्थ है, भाग्यवान है जिस कुल में किसी एक का उन परमतत्त्व परमात्मा में, उस अविनाशी भगवान में प्रेम जागृत हो जाय।

रामचन्द्र के भजन बिनु जो चह पद निर्बान।

ग्यानवंत अपि सो नर पसु बिनु पूँछ बिषान।। (रामचरितमानस, ७/७८ क)

इसलिए एक परमात्मा के भजन में समय दें। तोड़ना टूटे हुए दिल को बुरा होता हैआप समझते हैं कि वह असहाय है। कदापि नहीं! जिसका कोई नहीं उसका तो खुदा होता है…..’– उसके तो हरि होते हैं।

।। ॐ श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय ।।

(अमृतवाणी भाग-6’ से उद्धृत)

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