तू दैरे हरम का मालिक है
एक भक्त प्रार्थना करता है– प्रभो! आप तो उस परमधाम के मालिक हैं, सर्वसमर्थ हैं। आपके लिए असम्भव कुछ भी नहीं है। तो प्रभो! मेरी थोड़ी-सी अर्जी है, आप उसे स्वीकार कर लें। इसी आशय का यह भजन है–
तू दैरे हरम का मालिक है, बस इतना करम मुझ पर कर दे।
काबा की तरफ ये रुख न सही, तो रुख की तरफ काबा कर दे।।
तू दैरे हरम…….।।१।।
मझधार में कश्ती छोड़ दिया, अब तेरे हवाले करता हूँ।
कश्ती को डुबो दे दरिया में, या कश्ती लबे दरिया कर दे।।
तू दैरे हरम…….।।२।।
बख्शिश की तेरे कोई शिकवा नहीं, पर इतनी गुज़ारिश है बेशक।
तू छीन ले दिल से दरद मेरा, या दरद भरी दुनिया कर दे।।
तू दैरे हरम…….।।३।।
क्या हाल बयाँ मैं तुझसे करूँ, या हाल बयाँ है मुझसे तेरा।
तू चाहे अगर तो अनहद की, आवाज़ भरी दुनिया कर दे।।
तू दैरे हरम…….।।४।।
प्रभो! आप उस परमधाम के मालिक हैं, सर्वशक्तिमान् हैं। आपके लिए असम्भव कुछ भी नहीं है। आप थोड़ा-सा करम मेरे लिए भी कर दें, थोड़ी-सी कृपा कर दें। यदि हमारा रुख, हमारा चेहरा आपके घर काबा की ओर नहीं है तो न सही, ‘तू रुख की तरफ काबा कर दे’– जहाँ भी मेरी दृष्टि पड़े, वहाँ-वहाँ काबे को खड़ा कर दे; मैं किधर भी जाऊँ आप ही मिलें।
योगपथ में भक्तों के समक्ष यह अवस्था आती है। पूर्व में होनेवाले मनीषी इसी अवस्था से गुजरे हैं कि–
सरगु नरकु अपबरगु समाना।
जहँ तहँ देख धरें धनु बाना।। (मानस, २/१३०/७)
न तो स्वर्ग स्वर्ग के रूप में रह जाता है जिसकी हम कामना करें और न नरक नरक के रूप में रह जाता है जिससे हम भयभीत हों। जहाँ भी दृष्टि पड़ी, साधक ने अपने आराध्य देव को खड़ा पाया। वैदिक ऋषियों की अनुभूति है–
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत्।। (ईशावास्योपनिषद्,१)
जगत् में जो कुछ भी है, सबमें ईश्वर का वास है, लेशमात्र भी जगत् का आभास नहीं रह जाता। उस अवस्था का भक्त प्रार्थना करता है– प्रभो! यदि आपके धाम की ओर, आपके स्वरूप की ओर मेरी दृष्टि स्थिर नहीं हो पाती, यदि हमारा रुख उधर नहीं है तो न सही; आप तो समर्थ हैं न! जरा-सी कृपा हमारे लिए कर दें। क्या? जहाँ भी हमारी दृष्टि पड़े, वहाँ आप काबा खड़ा कर दें, अपने धाम को खड़ा कर दें, अपने रूप को खड़ा कर दें। अग्रेतर पंक्ति में कहते हैं–
मँझधार में कश्ती छोड़ दिया, अब तेरे हवाले करता हूँ।
बीच धारा में हमने नाव को छोड़ दिया है। अब आपको इसे समर्पित करता हूँ, अब इसे आप देखें। हमने जीवन-नैया को बीच दरिया में छोड़ दिया। हमने खेना भी बन्द कर दिया है। इसे आपको समर्पित कर दिया है। आप चाहे इसे दरिया में डूबने दें या इसे नदी के किनारे पार करा दें। सन्त कबीर तो कहते हैं कि नाव में नदी भी डूब सकती है; क्योंकि भजन-पथ में नियम ही नौका है। नियम का पालन होने लगे तो भवनदी ही उसमें समाप्त हो जाती है। यही आशय गोस्वामी तुलसीदास जी के शब्दों में देखें–
नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो।
सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो।। (मानस, ७/४३/७)
मनुष्य-शरीर भवसागर से पार होने के लिए जहाज है। मेरी कृपा ही अनुकूल वायु है। तथा–
करनधार सदगुर दृढ़ नावा।
दुर्लभ साज सुलभ करि पावा।। (मानस, ७/४३/८)
सद्गुरु इस मजबूत नाव को खेनेवाले हैं, केवट हैं, संचालक हैं। अब तो मैं स्वयं छटपटा रहा था, प्रयत्न कर रहा था; अब मेरी समझ में आ गया है कि मेरे किये कुछ होनेवाला नहीं है। इसलिए इस जीवन-नौका को ‘अब तेरे हवाले करता हूँ’– आपको सौंपता हूँ।
कश्ती को डुबो दे दरिया में, या कश्ती लबे दरिया कर दे।
आप चाहे इसे डुबा दें या मेरी कश्ती को दरिया के किनारे लगा दें। भक्त पुन: निवेदन करता है–
बख्शिश की तेरे कोई शिकवा नहीं, पर इतनी गुजारिश है बेशक।
आपने जो बख्शिश, जो खैरात, जो पुरस्कार दिया है, अकारण अहैतुकी कृपा की है; जैसे– करुणा कर दुर्लभ मनुष्य-शरीर दिया, सूझबूझ दी कि भजन की इच्छा जागृत हुई, आपने भजन की लाईन दी, इतना कुछ दिया है कि हमें आपसे कोई शिकवा-शिकायत नहीं है; किन्तु जरा-सी प्रार्थना है–
तू छीन ले दिल से दरद मेरा, या दर्द भरी दुनिया कर दे।
गुजारिश यह है कि आप मेरे दिल का दर्द छीन लें। विरह की जब आग लग जाती है, कसक पड़ जाती है तो वह अन्य किसी तरीके से दूर हो ही नहीं सकती। वह तो तभी दूर होती है जब भगवान स्वयं हृदय में उतर आयें।
कै बिरहनि कूँ मींच दे, कै आपा दिखलाइ।
आठ पहर का दाझणा, मोपै सह्या न जाइ।।
मीरा के हृदय में यह दर्द हुआ। उन्होंने कहा–
दरद की मारी बन बन डोलूँ, बैद मिल्या ना कोय।
मीरा की प्रभु पीर मिटे, जब बैद सँवरिया होय।।
पीर मिट सकती है यदि वैद्य साँवलिया हो। वह हृदय में दिखाई पड़े, स्थायित्व ले ले। भरत का दु:ख तभी दूर हुआ जब राम आ गये।
‘या दरद भरी दुनिया कर दे’– लेकिन यह दर्द बड़ा प्यारा है। इस दर्द में आनन्द है। इस विरह में एक मस्ती है इसलिए थोड़ी-सी कृपा यह करें कि सारी दुनिया को ही यह दर्द हो जाय। सब तेरे विरह में पागल हों, सब छटपटाते रहें–
एक तीरे इश्क है जो दिलों के पार है।
हम तड़पते हैं यहाँ, वहाँ तड़पता यार है।।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– अर्जुन! जो मुझे जितना भजता है, मैं भी उसे उतना ही भजता हूँ। वह दो कदम मेरी ओर रखता है तो मैं भी दो कदम उसकी ओर रखता हूँ, बल्कि उससे भी आगे बढ़कर अनुग्रह करता हूँ–
जहाँ भगत मेरो पग धरे, तहाँ धरूँ मैं हाथ।
पाछा लागा नित रहूँ, कबहूँ न छाड़ूँ साथ।।
हाँ, तो भक्त कहता है– पहले तो मेरा दर्द छीन, मुझे मिल; और यह दर्द भी क्या है? एक मस्ती है। यह दरद ही तो मानव-तन मिलने का सर्वोपरि उपहार है इसलिए ‘तू दरद भरी दुनिया कर दे’ अर्थात् तू सबको आस्तिक बना दे, सबमें अपना संचार जागृत कर दे– गृही बिरति रत हरष जस विष्नु भगत कहुँ देखि। (मानस, ४/१३)
राम के राज्य में ऐसा हुआ था–
राम भगति रत नर अरु नारी।
सकल परम गति के अधिकारी।। (मानस, ७/२०/४)
उनके राज्य में सभी परमगति के अधिकारी थे। वहाँ के लोग भगवान के लिए पलकें बिछाये हुए थे–
जहँ तहँ नर रघुपति गुन गावहिं।
बैठि परसपर इहइ सिखावहिं।।
भजहु प्रनत प्रतिपालक रामहि।
सोभा सील रूप गुन धामहि।। (मानस, ७/२९/१-२)
इस प्रकार वे परस्पर उपदेश किया करते थे। अन्त में भक्त कहता है– प्रभो! यह तो हमारे आपके बीच आपस का लेना-देना है–
क्या हाल बयाँ मैं तुझसे करूँ, या हाल बयाँ है मुझसे तेरा।
मैं बार-बार अनुनय-विनय करके अपनी स्थिति आपके सामने निवेदन करता ही रहता हूँ; जैसे–
तू दयालु, दीन हौं, तू दानि, हौं भिखारी।
हौं प्रसिद्ध पातकी, तू पाप–पुंज–हारी।। (विनय०, ७९)
यह है भक्त का आत्म-निवेदन जिसे यहाँ कहते हैं कि हाल बयाँ करना, भगवान के सामने सत्गुरु के सामने अपना स्पष्टीकरण करना। गुरु महाराज कहते थे– ‘‘हो! ‘हृदय में कुछ और है, वाणी में कुछ और है’– ऐसा साधक कभी कामयाब नहीं होता। गुरु के सामने जो हृदय में है वह जबान पर होना चाहिए।’’
‘क्या हाल बयाँ मैं तुझसे करूँ’– अपनी व्यथा तो मैं सदा आपके सामने कहता ही रहता हूँ लेकिन हमें तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि ‘हाल बयाँ है मुझसे तेरा’। मुझसे ही आपका हाल बयान होता जाता रहा है। आज तक सृष्टि में भगवान की महिमा का प्रसारण जब कभी हुआ है भगवान के किसी अन्तरंग भक्त द्वारा ही हुआ है।
चंदन तरु हरि सन्त समीरा। (मानस, ७/११९/१७)- भगवान चन्दन के स्थिर वृक्ष-जैसे हैं। संत समीर हैं जो चंदन की खुशबू को दूर-दूर तक प्रसारित करते रहते हैं; देश-विदेश में फैला देते हैं। जैसा कि भगवान बुद्ध का उपदेश सन्तों द्वारा ही देश-विदेश में फैल गया। किन्तु हाल बयाँ करनेवाले सन्तों के लक्षण क्या हैं? यह उन सन्तों की रहनी में परिलक्षित होता है जिनमें अनहद की वाणी जागृत हो जाय।
तू चाहे अगर तो अनहद की, आवा़ज भरी दुनिया कर दे।
प्रभो! यदि आप ही स्वयं चाह लें तो अनहद की आवाज से दुनिया को भर दें। हद कहते हैं सीमा को, अनहद कहते हैं असीम को। ससीम है सृष्टि और असीम है परमात्मा! तू चाहे तो अपनी वाणी का सूत्रपात बच्चे-बच्चे में कर सकता है।
इस प्रकार इन पंक्तियों में भक्त निवेदन करता है कि प्रभो! यदि हमारा रुख आपकी तरफ स्थिर नहीं हो पाता तो आप ही थोड़ा अनुग्रह करें, मेरे लिए थोड़ा-सा करम करें कि जिधर भी मेरी प्रवृत्ति हो, उस तरफ तू काबा कर दे। कथा आती है कि एक बार गुरुनानक मक्का पहुँच गये। वहाँ वह मस्जिद की ओर पाँव करके लेट गये। मौलवी लोग दौड़ पड़े– अरे! तौबा-तौबा! काफिर कहीं का! तूने खुदा के घर की तरफ पैर कर दिया। गुरुनानक बोले– भाई! जिधर खुदा का घर न हो तुम उधर ही मेरा पैर कर दो। मौलवी ने आवेश में आकर उनका पैर दूसरी ओर घूमा दिया तो मस्जिद ही घूम गयी। पुन: पैर घुमाकर यथावत् किया तो मस्जिद सही सलामत हो गयी। काबा कहाँ नहीं है? परमात्मा तो जर्रे-जर्रे में है, कण-कण में व्याप्त है–
बिनु गोपाल ठौर नहिं कतहूँ नरक जात धौं काहे।
लेकिन यह सन्तों की अवस्था-विशेष है कि जिधर ही रुख किया, उधर ही काबा! यह योग्यता नानक में थी और साधना करके जो इस शिखर पर पहुँच जाता है, उसमें भी यही योग्यता सम्भव है।
!! ॐ श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय !!
(‘अमृतवाणी भाग-3’ से उद्धृत)