पायो जी मैंने नाम रतन धन पायो

पायो जी मैंने नाम रतन धन पायो

पायो जी मैंने नाम रतन धन पायो।

वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुर किरपा करि अपनायो।

पायोजी

जनम जनम की पूँजी पाई जग में सबै खोवायो।

पायोजी

खरच न खूँटै चोर न लूटै दिन दिन बढ़त सवायो।

पायोजी

सत की नाव खेवटिया सतगुर भवसागर तर आयो।

पायोजी

मीरा के प्रभु गिरधर नागर हरषि हरषि जस गायो।

पायोजी

माता मीरा का यह भजन देखने में सरल है, सीधा है किन्तु इसमें भगवत्पथ का, उस पथ की साधना का, ईश्वर की अनुकम्पा का, गुरु की गरिमा इत्यादि सभी स्थितियों का, साधनात्मक रहस्यों का भरपूर चित्रण है। इस पद में नाम की महिमा का उद्घोष है। नाम से ही राम मिलते हैं। नाम साधन है और राम उपलब्धि। नाम के विभिन्न स्तरों की चर्चा गोस्वामी तुलसीदासजी इत्यादि संतों ने भी की है।

सीता की शोध में गये हुए हनुमान जब लंका से लौटकर आये, भगवान राम ने पूछा– हनुमान! यह बताओ, सीता वहाँ अपने प्राणों की रक्षा कैसे करती है? हनुमान ने कहा,

नाम पाहरू दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।

लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट।। (रामचरितमानस, ५/३०)

अहर्निश नाम का पहरा लगा है। स्वाँस स्वाँस पर नाम कह, वृथा स्वाँस जनि खोय। ना जाने यहि स्वाँस का, आवन होय न होय।।कोई श्वास व्यर्थ न जाने पाये। जब इस प्रकार नाम का क्रम धारावाही हो जाता है तो नाम का पहरा लग गया। अब नाम प्रहरी बन गया। केवल प्रात:-सायं माला फेर लेने से ऐसा नहीं होता। इसके लिए अहर्निश लगने का विधान है। भजन का दूसरा आलम्बन ध्यान है। सीताजी ने आपके चरणों के ध्यान की किवाड़ लगा रखी है। लोचन निज पद जंत्रित– दृष्टि अपने पद पर टिकी है। यदि लक्ष्य पर दृष्टि स्थिर नहीं होगी तो कोई भी प्रलोभन आकर्षित कर सकता है। जीव को जो पाना है–अपना सहज स्वरूप, लौ सीधे वहाँ लगी है। ऐसा ताला लगा है तो जाहिं प्राण केहिं बाट– किस रास्ते से प्राण जायेंगे?

सामान्यत: प्राण का अर्थ श्वास, जीवनीशक्ति से होता है किन्तु अध्यात्म में मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार– इस अन्त:करण चतुष्टय को प्राण कहा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने इसे गीता में स्पष्ट किया है–

सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे।

आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते।। (गीता, ४/२७)

दूसरे योगीजन सम्पूर्ण इन्द्रियों के कर्म को और प्राण के कर्मों को आत्मसंयम की अग्नि में हवन करते हैं। इन्द्रियाँ ही कर्म नहीं करती, प्राण भी कर्म करते हैं। इन अन्त:करणों में प्रकृति का हलन-चलन न आये– यह है प्राणों की रक्षा। यदि लक्ष्य पर दृष्टि स्थिर नहीं है, कोई दैदीप्यमान चमकीली वस्तु सामने आयेगी तो जो प्राण सीधा चिन्तन में लगा था, भटक जायेगा, प्राण चले जायेंगे। प्राणों के व्यापार की रक्षा, संकल्प की रक्षा प्राणायाम है और श्वास को रोकना-छोड़ना, पूरक–कुम्भक–रेचक के रूप में जो प्राणायाम प्रचलित है, यह तो आरम्भिक स्तर है। सीताजी के चतुर्दिक नाम का पहरा था। नाम में तो यह क्षमता है कि,

नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं।

करहु बिचारु सुजन मन माहीं।। (रामचरितमानस, १/२४/४)

नाम के प्रभाव से अथाह भवसागर सूख जाता है। जहाँ डूबने की संभावना थी, वहाँ जमीन हो गयी तो कहाँ डूबेंगे? प्रकृति परमतत्त्व परमात्मा में परिवर्तित हो जाती है। सूखने का तात्पर्य है कि प्रकृति विलुप्त हो गयी। संत कबीर के शब्दों में– बिनु गोपाल ठौर नहिं कतहूँ, नरक जात धौं काहे।– गोपाल से रहित कोई स्थान है ही नहीं तो कोई नरक में कहाँ जायेगा? सरगु नरकु अपबरगु समाना। जहँ तहँ देख धरें धनु बाना।।(रामचरितमानस, २/१३०/७)– न स्वर्ग स्वर्ग के रूप में रह जाता है जिसकी हम कामना करें और न नरक नरक के रूप में रह जाता है जिससे हम भयभीत हों। जहाँ भी दृष्टि पड़ी, आराध्यदेव के स्वरूप को खड़ा पाया। जहाँ संसार-समुद्र लहरें मार रहा था, वहाँ परमात्मा का आलोक छा गया। समुद्र सूख गया। अथाह भवसिंधु सूख जाता है। वह सूख गया तो परमात्मा ही शेष बच रहता है। अत: नाम निरन्तर जपना चाहिए। नाम-जप में एक स्तर ऐसा भी है कि केवल एक बार नाम जपना होता है और जप सम्पन्न हो जाता है।

जासु नाम सुमिरत एक बारा।

उतरहि नर भवसिंधु अपारा।। (रामचरितमानस, २/१००/३)

जिसके नाम को एक बार जप लिया तो अपार भवसिंधु से नर तर जाते हैं। इतना ही नहीं,

बारक राम कहत जग जेऊ।

होत तरन तारन नर तेऊ।। (रामचरितमानस, २/२१६/४)

एक बार ‘राम’, इतना ही जिसने कह लिया वह स्वयं भवसिंधु से न केवल तर जाता है अपितु अन्य को भी तारनेवाला हो जाता है, सद्गुरु हो जाता है। क्या इतना सस्ता उपाय है? आप अयोध्या, काशी, मथुरा में देखें, एक से एक ऐसी विभूतियाँ नाम-जप में संलग्न हैं जिनकी उँगलियों की रगड़ से काठ की गुरिया घिस गई, घिसी हुई चार-छ: मालायें खूँटी में टँग गयीं। वे न स्वयं ही तरे और न उनमें तारने की शक्ति ही आयी तो इस एक नाम का क्या रहस्य है?

वास्तव में आप एक ही नाम जपते हैं किन्तु जब हम-आप नाम जपने बैठते हैं तो मन बहुत बातें करने लगता है। खाली बैठे हैं तो मन में बहुत उथल-पुथल नहीं रहती किन्तु भजन में बैठते ही मन घर-गृहस्थी की तमाम योजनायें बनाने लग जाता है। प्रकृति के अनन्त चिन्तन आते रहते हैं। भजन के बीच में लहर मारते एक नाम के स्थान पर अनेक चिन्तन आते रहते हैं। यह लहर शान्त हो जाय, संयम इतना उन्नत हो जाय कि एक नाम के अतिरिक्त अन्य चिन्तन समाप्त हो जायँ। इस एक नाम की स्थिति पर जिस क्षण संयम सधा, भजन पूरा हो गया। यह मन की निरोधावस्था है। स्वाँस तैलधारावत् खड़ी हो जाती है, प्रकृति के सम्पूर्ण संकल्प शान्त हो जाने पर जिस पल एक नाम की स्थिति आयी, सुरत टिकी, दूसरे ही पल जो शेष बचता है वह परमात्मा है। उस पल संसार समाप्त हो जाता है। यह अनेक नाम पिण्ड छोड़ें तब ही एक नाम की स्थिति संभव है। यह संयम की परिपक्व अवस्था का चित्रण है, मन की निरोधावस्था है।

जिस क्षण एक नाम की स्थिति आती है, तत्क्षण साधक स्वयं तर जाता है, प्रकृति से सम्बन्ध टूट चुका होता है, परमात्मा से सम्बन्ध उसी पल जुड़ जाता है। भगवान जो हैं, जिन विभूतियों से युक्त हैं, आपमें दृष्टि बनकर संचारित हो जायँगे, सामने स्वयं खड़े हो जायँगे, आप नहीं समझेंगे तो समझा लेंगे; भजन अनिवार्य है। एक नाम की स्थिति तक पहुँचने के लिए हमें उतना ही चिन्तन करना होता है और सारा उपक्रम इस मन के अन्दर नाम-जप में जो अवरोध आते हैं, अनन्त नामों का जो तूफान-सा खड़ा है, संकल्पों का जो वायुमण्डल बना हुआ है, इसका अंत करने के लिए ही होता है। मन की गति के निरोध के लिए ही चिंतन किया जाता है। इसलिए,

यह मसजिद है वह बुतखाना। मकसद तो है मन को समझाना।।

चाहे यह मानो चाहे वह मानो।।

एक परमात्मा पर श्रद्धा स्थिर कर जो उन परमात्मा को पुकारे, ऐसे दो-ढाई अक्षर के किसी नाम का जप करें। एक नाम की स्थिति तक हमारी साधना कैसे पहुँचे? इसके लिए होती है भजन की जागृति। इस जागृति के लिए एक ही नाम को बैखरी, मध्यमा, पश्यन्ती और परा– इन चार श्रेणियों से जपा जाता है। नाम वही है केवल जपने के तरीके का विशेषण लगा है। बैखरी जप सब सुन सकते हैं क्योंकि यह व्यक्त हो जाता है। नाम वही है विशेषण लग गया मध्यमा! मध्यम अर्थात् धीरे-धीरे इस ढंग से नाम जपें कि कोई बगल में बैठा भी हो तो उसे न सुनाई पड़े। आप उच्चारण करें श्वास और कण्ठ से, मुख में जिह्वा हिल सकती है, होंठ भी हिलते रह सकते हैं, कण्ठ की ध्वनि केवल आप ही सुन सकते हैं। इस मध्यमा से उन्नत विशेषण है पश्यन्ती। पश्य माने होता है देखना! शान्त बैठकर श्वास को देखें; क्योंकि पश्यन्ती वाणी में जप का उतार-चढ़ाव श्वास पर होता है। शान्त बैठकर देखें कि कब साँस अन्दर आयी, कितनी देर भीतर रुकी, कब बाहर गयी, कितनी देर बाहर रुकी, पुन: लौटकर कब आयी? मन भली प्रकार साँस को देखने लगे तब आहिस्ते से चिन्तन में नाम को ढाल दें अर्थात् साँस आयी तो ओम्, गयी तो ओम्! यदि राम जपते हैं तो ‘रा’…‘म’…‘रा’…‘म’…– इस प्रकार श्वास से जप करें, श्वास में नाम को देखें। कुछ समय बाद नाम श्वास में ढल जायेगा, फिर तो एक बार सुरत लगा दिया, सहज नाम की धुन प्रवाहित हो जायेगी। इसी का नाम है विपश्यना– नाम विशेष रूप से देखने में आ गया। नाम पर दृष्टि स्थिर हो गयी। इसी जप का नाम है अजपा। अ माने नहीं, जप माने जप करना। हम जप न करें फिर भी जप हमारा साथ न छोड़े। एक बार सुरत लग गयी तो नाम की डोर लग गयी– ओम्-ओम्-ओम्-ओम्….. एक लहर, एक धुन प्रवाहित हो गयी। इसी का नाम परावाणी भी है क्योंकि यह प्रकृति पार प्रभुमें प्रवेश दिला देनेवाली वाणी है। इसी परावाणी की परिपक्व अवस्था के काल में अनन्त नामों की रील शान्त होती है। एक बार सुरत लग गयी तो ओम्-ओम् या राम-राम। जिस क्षण एक नाममात्र रह जाय और अनन्त संकल्प-विकल्प एकदम लुप्त हो जायँ, बस यही है एकमात्र नाम की स्थिति! यह स्थिति जिस क्षण आयी, दूसरे ही क्षण वह व्यक्ति तर जाता है, तारने की शक्तिवाला होता है।

मनुष्य श्रद्धा का पुतला होता है। कहीं न कहीं इसकी श्रद्धा अवश्य रहती है। अपनी श्रद्धानुसार वह भगवान का नाम लेता ही रहता है। भगवान के अनेक नाम पुस्तकों में लिखे हैं। नाम का संकीर्तन, हरिकीर्तन भी गाँव-गाँव में होता ही रहता है। आबाल-वृद्ध सभी उसमें सम्मिलित होते हैं। प्रात: चार बजे उठकर मातायें भजन गाती हैं। इस प्रकार हम सब जो नाम का जप कर रहे हैं, यह हमारा पुण्य है, पुरुषार्थ है, उद्योग है। यह भजन का आरम्भिक स्तर है। भजन की आधी दूरी तक यह नाम-संकीर्तन साथ चलता है। इसके आगे आवश्यकता होती है नाम की जागृति की, भजन की जागृति की और नाम की वह जागृति, पूर्ण निवृत्ति दिला देनेवाले भजन की जागृति किसी सद्गुरु के द्वारा ही होती है। उस जागृति का अन्य कोई उपाय नहीं है। वह शून्य में नहीं फलती। इसी आशय का माता मीरा का यह भजन है कि,

पायो जी मैंने नाम रतन धन पायो।

वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुर किरपा करि अपनायो।

पायोजी….

राम-नाम एक रतन है, शुद्ध आत्मिक सम्पत्ति है, निज धन है। उसको हमने प्राप्त कर लिया। यह अनमोल है। इसका मूल्य कोई चुका ही नहीं सकता। इसके बराबर की कोई वस्तु सृष्टि में है ही नहीं। संत कबीर कहते हैं–

राम नाम के पटतरे देबे को कछु नाहिं।

क्या लै गुरु संतोषिये हौंस रही मन माहिं।।

कोई वस्तु देकर इस नाम रतन को नहीं खरीदा जा सकता। इस अमोलक वस्तु को दी मेरे सतगुरु– हमारे गुरुदेव ने प्रदान किया है। यह उनकी कृपा ही है जो उन्होंने मुझे अपना लिया।

हेतु रहित जग जुग उपकारी।

तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी।। (रामचरितमानस, ७/४६/५)

संसार में अहेतुकी कृपा करनेवाले (जिनको बदले में कुछ लेने का कोई प्रयोजन नहीं है, उनका कोई स्वार्थ नहीं है, ऐसी कृपा करनेवाले) सृष्टि में केवल दो हैं– भगवन्! एक तो आप और दूसरे आपके अंतरंग भक्त या सेवक। इसलिए गुरुदेव का कोई स्वार्थ नहीं था। उन्होंने तो केवल ‘किरपा करि अपनायो।’

अयोध्या के समीप नन्दीग्राम में तपस्यारत भरत के पास हनुमान पहुँचे। उन्होंने देखा, कुश के आसन पर भरत बैठे थे। आँखों में अश्रु, कण्ठ पर नाम और हृदय में राम का स्वरूप था–

बैठि देखि कुसासन, जटा मुकुट कृस गात।

राम राम रघुपति जपत, स्रवत नयन जल जात।। (रामचरितमानस, ७/१ ख)

भरत की जटायें उलझ गयी थीं, वही उनका मुकुट जैसा था। कृस गात– वह अत्यन्त दुर्बल हो चले थे। राम राम रघुपति जपत, स्रवत नयन जल जात।– वह निरन्तर नाम जप रहे थे। केवल एक नामवाली स्थिति शेष थी। भरत की उस रहनी को देखकर मुनिराज भी लज्जित हो जाते थे। हनुमानजी की आँखों में प्रेमाश्रु छलक आये,

देखत हनूमान अति हरषेउ।

पुलक गात लोचन जल बरषेउ।।

मन महँ बहुत भाँति सुख मानी।

बोलेउ श्रवन सुधा सम बानी।। (रामचरितमानस, ७/१/१-२)

हनुमान को एक सच्चे भक्त का दर्शन कर अपार हर्ष हुआ। वह अमृत के समान वाणी बोले–

जासु बिरहँ सोचहु दिन राती।

रटहु निरंतर गुन गन पाँती।।

रघुकुल तिलक सुजन सुखदाता।

आयउ कुसल देव मुनि त्राता।। (रामचरितमानस, ७/१/३-४)

आप जिसके विरह में दिन-रात सोचते हैं, जिनके गुण-गणों की पंक्तियों का निरन्तर चिन्तन करते रहते हैं, रघुकुलमणि वह परमात्मा राम भाई लक्ष्मण, सीता और सखाओं के साथ आ गये। उन्होंने रण में शत्रुओं को जीत लिया है। सबलोग उनका गुणगान कर रहे हैं। ‘राम आ गये’ इतना सुनना था,

सुनत बचन बिसरे सब दूखा।

तृषावंत जिमि पाइ पियूषा।। (रामचरितमानस, ७/१/६)

जैसे प्यास से तड़पता हुआ कोई प्यासा, जिसके प्राण संकट में हों, अमृत पा गया हो। उसी तृप्ति के साथ भरत बोले–

एहि संदेस सरिस जग माहीं।

करि बिचार देखेउँ कछु नाहीं।।

नाहिन तात उरिन मैं तोही।

अब प्रभु चरित सुनावहु मोही।। (रामचरितमानस, ७/१/१३-१४)

हे तात! हमने विचार कर देख लिया कि इस सन्देश के समान सृष्टि में कुछ है ही नहीं; क्योंकि राम के रोम-रोम से अनन्त सृष्टि उत्पन्न होती और विलीन होती रहती है इसलिए ‘राम आ गये’– इस संदेश के समकक्ष देने लायक सृष्टि में कुछ है ही नहीं। इसलिए हनुमान! मैं तुम्हारा ऋणी हो गया। अब प्रभु का चरित्र सुनाइये। हनुमान ने कहा– अभी चरित्र सुनने का समय नहीं है। आकाश में यह जो चिड़िया जैसी उड़ रही है, इसी में हैं रामजी। इतने में पुष्पक उतर गया, प्रभु आ गये। यह है नाम की जागृति, भजन की जागृति! यह जब होती है, सद्गुरु से ही होती है। इसीलिए माता मीरा कहती हैं कि यह वस्तु अमोलक। कौन-सी वस्तु? नाम की जागृति! किसने दी? तो दी मेरे सतगुर। वह भी कृपा करके दे दी– किरपा करि अपनायो।इस रतन के लिए हम कब से प्रयत्नशील थे? माता मीरा कहती हैं–

 जनम जनम की पूँजी पायो, जग में सभी खोवायो।

इस रत्न को ढूँढ़ने के लिए हमने जनम-जनम से प्रयास किया था किन्तु प्राप्त आज हुई, वह भी गुरु महाराज की कृपा से। काकभुशुण्डिजी ने कहा था–

कवन जोनि जनमेउँ जहँ नाहीं।

मैं खगेस भ्रमि भ्रमि जग माहीं।।

देखेउँ करि सब करम गोसाईं।

सुखी न भयउँ अबहिं कि नाईं।। (रामचरितमानस, ७/९५/८-९)

अब कौन-सा सुख मिल गया? उसे बताते हैं,

राम भगति एहिं तन उर जामी।

ताते मोहि परम प्रिय स्वामी।। (रामचरितमानस, ७/९५/४)

इस शरीर में, मेरे हृदय में भक्ति का जन्म हो गया। यही जन्म-जन्मान्तरों के प्रयास की सार्थकता है। माता मीरा भी यही कहती हैं कि जगत् में सबने जन्म-जन्म की पूँजी को नश्वर सुखों के पीछे खो दिया किन्तु गुरु महाराज की कृपा से हमें यह राम रतन धन प्राप्त हो गया।

उस पूँजी की तलाश सबको है। सब विकल हैं शान्ति के लिए; किन्तु उस शान्ति को धन-वैभव, पद-प्रतिष्ठा में ढूँढ़ने लगते हैं। कोई धन छिपाकर बाथरूप में रखता है तो कोई विदेश में! वह पूँजी ही ढूँढ़ रहा है, किन्तु जहाँ नहीं है वहाँ ढूँढ़ रहा है और अपने लिये विपत्ति ही ढूँढ़ता है। वह जन्म-जन्मान्तरों की पूँजी जगत् की चकाचौंध में ही खो देता है जबकि नाम-जागृति के पश्चात् यह राम रतन धन–

खरच न खूँटै चोर न लूटै, दिनदिन बढ़त सवायो।

खूँटना अर्थात् समाप्त होना! भौतिक धन-सम्पत्ति खर्च करने से कम होते-होते थोड़े ही दिनों में समाप्त हो जाता है किन्तु जागृति के पश्चात् नाम-धन खर्च करने से समाप्त नहीं होता प्रत्युत दिनोंदिन सवाया बढ़ता ही जाता है। नाम का खर्च तब होगा जब आप जिह्वा से कहेंगे, चिन्तन से कहेंगे। जितना ही इसका प्रयोग करेंगे, उतना ही अभ्यास में वृद्धि होगी। जितना प्रदान करेंगे, उतनी ही इसकी वृद्धि होगी। चोर इसे लूट नहीं सकता। कोई अनुरागी श्रद्धालु ही इसे ले सकता है। कोई जब भी लेगा समर्पण से लेगा, कृपा से, अनुकम्पा से लेगा। दिन दिन बढ़त सवायो– जितना इसे खर्च करोगे, अभ्यास करोगे, उतना ही सवाई यह बढ़ता जायेगा।

सत की नाव खेवटिया सतगुर भवसागर तर आयो।

सत्य वस्तु है आत्मा, मिथ्या जगत पसार।– परमहंस गुरुदेव की वाणी बारहमासी में है कि सत्य तत्त्व है परमात्मा और वहाँ तक पहुँचाने की नौका है नाम! इस नाव को खेनेवाले सद्गुरु हैं। यदि सद्गुरु आपको भजन में न लगायें, न उठायें कि उठ! बैठ! भजन में लग। देखो, अब खतरा आनेवाला है, यह संकल्प गलत है, अब भजन ठीक हो रहा है, चलित भजन कर, चलित ध्यान कर! इस प्रकार जब तक वह साधक को न चलायें, चलाकर रास्ते पर न ले आयें, सत्य की नाव को न खेयें, तब तक साधक का हर प्रयास अँधेरे में मारा हुआ तीर है। वह प्रयत्न अवश्य है लेकिन भजन जागृत नहीं है। सद्गुरु के निर्देशन, मार्गदर्शन से ही भजन का रास्ता तय होता है, भवसागर से पार होने का विधान है।

मीरा के प्रभु गिरधर नागर हरषि हरषि जस गायो।

मीरा के प्रभु गिरि को धारण करनेवाले हैं, सृष्टि-चक्र के रक्षक, हर तरह का भार वहन करनेवाले! जबकि भजन कोई भार नहीं है। वह भार तभी तक प्रतीत होता है जब तक भजन जागृत नहीं है और जब भजन जागृत हो गया तो कोई भार नहीं। वह एक हर्ष है, आह्लाद है, एक नशा है। मीरा कहती हैं– हरषि हरषि जस गायो।– मैं अत्यन्त आनन्दपूर्वक प्रभु का यशोगान करती हूँ।

मानस में है– भगति सुतंत्र सकल सुख खानी।(रामचरितमानस, ७/४४/५)– भक्ति सम्पूर्ण सुखों की स्रोत है। किन्तु आरम्भिक अवस्था में भजन बहुत कठिन प्रतीत होता है–

रघुपति भगति करत कठिनाई।

कहत सुगम करनी अपार जानै सोइ जेहि बनि आई।। (विनयपत्रिका, १६७)

भक्ति कहने में तो सरल किन्तु करने में अत्यन्त कठिन है; क्योंकि–

आगि आँच सहना सुगम सुगम खड्ग की धार।

नेह निबाहन एक रस महाकठिन व्यवहार।।

राजस्थान में क्षत्राणियाँ पल भर में जौहर कर लेती थीं– आगि आँच सहना सुगम; यही नहीं सुगम खड्ग की धार– खड्ग की धार पर कितने ही योद्धा कट गये, यह भी सुगम; किन्तु नेह निबाहन एक रस– उन प्रभु में एकरस प्रेम का निर्वाह कर ले जाना महाकठिन व्यवहार। भजन वास्तव में कठिन है किन्तु यदि सद्गुरु भवसागर में साधक की नाव खेनेवाले हों, साधक में समर्पण हो तो शनै:-शनै: भजन जागृत हो जाता है जिससे प्रभु का प्रभाव जानने में आने लग जाता है। तब फिर भजन ही एक नशा है, भजन ही एक जीवन है, भजन करने में हर्ष होता है और उसके छूट जाने में दु:ख होता है।

सीता की शोध में गये हुए हनुमान जब लंका से लौटे, प्रभु श्रीराम ने पूछा, सीता कैसी है? उसका समाचार बताओ। हनुमान ने कहा,

सीता कै अति विपति बिसाला।

बिनहिं कहे भलि दीनदयाला।। (रामचरितमानस, ५/३०/९)

प्रभो! उनकी विपत्ति तो विशाल है। उसे बिना कहे ही भला है।

निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।

बेगि चलिअ प्रभु आनिअ भुजबल खलदल जीति।। (रामचरितमानस, ५/३१)

प्रभो! उनके हृदय में एक पल एक कल्प के समान व्यतीत होता है। आप शीघ्र चलें। अपनी भुजाओं के बल से दुष्टों के समूह को जीतकर उन्हें ले आइये। यहाँ बातों में जितने पल खर्च करेंगे, सीताजी के अन्त:करण में वहाँ उतने कल्प बीत जायेंगे। रामजी ने पूछा– सीताजी ने और कुछ कहा? हनुमान बोले– सीताजी ने यही संदेशा दिया है कि,

मन क्रम बचन चरन अनुरागी।

केहिं अपराध नाथ हौं त्यागी।। (रामचरितमानस, ५/३०/४)

प्रभो! मैं मन-क्रम-वचन से आपके चरणों की अनुरागिनी हूँ। वह कौन-सा अपराध है जिससे आपने मुझे त्यागा हुआ है? रामजी ने कहा– हनुमान! तुम एक तरफ तो कहते हो कि सीता की विपत्ति बहुत विशाल है और दूसरी ओर यह भी कह रहे हो कि वह मेरी अनुरागिनी है; दोनों बातें एक साथ कैसे हो सकती हैं; क्योंकि,

बचन काय मन मम गति जाही।

सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही।। (रामचरितमानस, ५/३१/५)

मन-क्रम-वचन से जो मुझमें समर्पित है, स्वप्न में भी विपत्ति उसका स्पर्श कर ही नहीं सकती तो सीता को विपत्ति कैसी? हनुमान ने कहा–

कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई।

जब तव सुमिरन भजन न होई।। (रामचरितमानस, ५/३१/३)

प्रभो! विपत्ति के क्षण तो वे ही हैं जिन क्षणों में आपका भजन और सुमिरण नहीं होने पाता। रावण राक्षसियों को लेकर आता है, तलवार दिखाता है कि तुम्हें काट डालूँगा, मार दूँगा! बस यही व्यवधान है, यही विपत्ति है और कोई विपत्ति नहीं है। इसलिए,

उमा राम सुभाउ जेहिं जाना।

ताहि भजनु तजि भाव न आना।। (रामचरितमानस, ५/३३/३)

भजन उनकी खुराक है। भजन उनका एक सुरक्षित विश्राम-स्थल है। नाम की जागृति का ही एक संकेत देवर्षि नारद के प्रकरण में रामचरितमानस में द्रष्टव्य है। सीता चोरी जा चुकी थीं। भगवान राम दण्डकारण्य की एक स्फटिक शिला पर शान्त बैठे थे।

बैठे परम प्रसन्न कृपाला।

कहत अनुज सन कथा रसाला।। (रामचरितमानस, ३/४०/४)

भगवान परम प्रसन्न बैठे थे। हर्ष की एक स्थिति है प्रसन्न, एक उसका भी अतिरेक– परम प्रसन्न! किसी की पत्नी खो जाय तो उसे कई-कई दिन नींद नहीं आयेगी। इन भगवान की पत्नी अभी-अभी खोयी है और बैठे परम प्रसन्न कृपाला– वे अनुज लक्ष्मण से रसभरी कल्याणकारी कथा कह रहे हैं। नारद की उन पर दृष्टि पड़ी तो उन्हें बड़ा दु:ख हुआ–

मोर साप करि अंगीकारा।

सहत राम नाना दुख भारा।। (रामचरितमानस, ३/४०/६)

मेरे श्राप को स्वीकार कर राम नाना प्रकार के दु:खों का बोझ ढो रहे हैं। भगवान को कहीं श्राप लगता है क्या? वह तो सबसे परे हैं, शुभाशुभ से अतीत हैं किन्तु भक्त के मान-सम्मान की रक्षा के लिए, उसके दु:ख को बँटाने के लिए प्रभु ने स्वयं ही उस दु:ख को अपने ऊपर ले दिया। इतने में नारदजी को याद आ गये वे क्षण, जब वे बन्दर का मुख लगाकर कन्या के समक्ष जाने के प्रयास में कभी इधर तो कभी उधर उछल कर जा रहे थे। उस कन्या ने भी जयमाल दिखाकर, उन्हें प्रलोभन दे उनकी दुर्दशा कर भगवान के गले में वरमाल को डाल दिया और निकल गयी। विकलता के वे क्षण नारद को याद आ गये। उन्होंने सोचा– अब जरा पूछकर देखूँ कि जो मुख लटकाकर बैठे हैं, पता चला कि ब्याह बिगाड़ने में कितना कष्ट सहन करना पड़ता है?

तब विवाह मैं चाहउँ कीन्हा।

प्रभु केहि कारन करै न दीन्हा।। (रामचरितमानस, ३/४२/३)

प्रभो! ऐसा कौन-सा कारण था जो आपने हमें विवाह नहीं करने दिया? अब आप बुलुक-बुलुक रोवत हो! पता चला? तब भगवान को किञ्चित् रोष आ गया कि इस मूर्ख को हमने बचा लिया और इसे पता ही नहीं।

सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा।

भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा।।

करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी।

जिमि बालक राखइ महतारी।। (रामचरितमानस, ३/४२/४-५)

उन्होंने रोष से कहा जिससे यह तथ्य नारद की समझ में आ जाय– हे मुनि! अन्य सबका भरोसा त्यागकर केवल मुझ पर निर्भर होकर जो भजते हैं, मैं सदैव उनकी उसी प्रकार रक्षा किया करता हूँ जैसे शिशु की रक्षा माता किया करती है। कभी छोटा शिशु हिलते-डुलते सर्प को खिलौना समझकर पकड़ना चाहता है या चमक देखकर अग्नि को पकड़ने दौड़ता है, उस समय माता उसे समझाने का प्रयास नहीं करती, क्योंकि मना करने से वह मानेगा भी नहीं। बच्चा घुटनों के बल सर्प पकड़ने चल पड़ा, उसे मना करने पर वह अपनी गति बढ़ा लेगा कि यह हमें पकड़कर कहीं हमारा खिलौना न छीन ले,

गह सिसु बच्छ अनल अहि धाई।

तहँ राखइ जननी अरगाई।। (रामचरितमानस, ३/४२/६)

माता उस शिशु को उठाकर सर्प से अलग कर देती है। इसी प्रकार नारदजी! मैं अपने अंतरंग भक्तों की रक्षा कर दिया करता हूँ। प्रभु के इसी स्वभाव का वर्णन कागभुशुण्डिजी ने गरुड़ के प्रति किया–

जिमि सिसु तन ब्रन होइ गोसाईं।

मातु चिराव कठिन की नाईं।।

जदपि प्रथम दुख पावइ रोवइ बाल अधीर।

ब्याधि नास हित जननी गनति न सो सिसु पीर।। (रामचरितमानस, ७/७४ क)

जैसे छोटे बच्चे के शरीर में फोड़ा हो गया हो, मवाद भर गया हो, सड़न हो रही हो तो माता किसी निर्दय की तरह उसे किसी शल्य चिकित्सक से चीर-फाड़ करा देती है। उस समय यद्यपि वह बालक अधीर होकर रोता है, माँ का मुँह देखता है किन्तु उस मूल व्याधि के नाश के लिए माँ उसकी क्षुद्र पीड़ा पर ध्यान नहीं देती; वह उसे सदा-सदा के लिए व्याधिमुक्त करना चाहती है। इसी प्रकार देवर्षि का भी प्रकरण है। नारदजी ने बहुत छल किया, बहुत श्राप दिया किन्तु मूल व्याधि के अन्त के लिये भगवान ने उनकी तात्कालिक पीड़ा पर ध्यान नहीं दिया। नारदजी भगवान के चरणों में लेट गये। वह बोले– प्रभो! एक प्रार्थना है। इससे आपको इतना श्रम भी नहीं करना होगा यदि मेरा यह निवेदन स्वीकार कर लें कि–

जद्यपि प्रभु के नाम अनेका।

श्रुति कह अधिक एक तें एका।।

राम सकल नामन्ह ते अधिका।

होउ नाथ अघ खग गन बधिका।। (रामचरितमानस, ३/४/७-८)

प्रभो! आपके नाम तो अनन्त हैं, एक से एक बढ़कर हैं किन्तु राम नाम उन सभी नामों से अधिक हो। वह पापरूपी पक्षियों का वध करने में समर्थ हो। जब पाप रहेगा ही नहीं तो हमें भटकायेगा कौन? हमें दुर्बुद्धि कौन देगा? व्याह के लिए तैयार कौन करेगा?

भगवान श्रीकृष्ण ने आदिशास्त्र गीता में ओम् जपने का निर्देश दिया था। गीता हमारा–आपका, मानव-मात्र का धर्मशास्त्र है। आज संस्कृत हमारे बोलचाल की भाषा नहीं रह गयी इसलिए गीता कठिन प्रतीत होती है किन्तु यह कठिन बिल्कुल नहीं है। आप भारत की विभिन्न भाषाओं तथा प्रख्यात विदेशी भाषाओं में प्रकाशित गीता की यथावत् व्याख्या ‘यथार्थ गीता’ की चार आवृत्ति करें तो धर्म के विषय में कभी कोई भ्रान्ति नहीं होगी। उस जमाने में लोग ओम्-ओम् जपते थे। वो अहम्, सो अहम् अर्थात् वह परमात्मा मुझमें है। यह ‘ओम्’ शब्द प्रभु के निवास-स्थान का परिचायक है। उसी को भक्तिकालीन ऋषि राम-राम जपने लगे। नारद ने वरदान माँग लिया कि राम सकल नामन्ह ते अधिका।भगवान ने वरदान दे भी दिया।

प्रश्न स्वाभाविक है कि ‘राम’ ही अधिक महत्व का क्यों? वास्तव में रमन्ते योगिन: यस्मिन् स राम।– योगीजन जिसमें रमण करते हैं, वह सत्ता है राम! योगी किसमें रमण करते हैं?

जद्यपि ब्रह्म अखंड अनंता।

अनुभवगम्य भजहिं जेहि सन्ता।। (रामचरितमानस, ३/१२/१२)

यद्यपि वह ब्रह्म अखण्ड है, अनन्त है, किन्तु वह अनुभवगम्य भी है। अनुभव के द्वारा वहाँ पहुँचा जा सकता है, अनुभव के द्वारा वह सुलभ है। इसलिए अनुभव के आश्रित जो उन्हें भजते हैं, वही सन्त होते हैं। अन्य तरीकों से भजनेवाले सन्त हैं ही नहीं। लोक-व्यवहार में प्राय: लोग कहते ही रहते हैं कि हमने अनुभव करके देख लिया कि यह खेत तो बीज को ही ले डूबता है; हमने अनुभव करके देख लिया कि अब शहरों की हर गली में आटो रिक्शा सुलभ है; हमने उधार देकर देख लिया; हमने ठोकर खाकर अनुभव कर लिया….. इत्यादि। बीती घटनाओं से मिलनेवाली सीख को लोग अनुभव कहने लगे।

अध्यात्म में ऐसा नहीं है। भव कहते हैं संसार को। अनु कहते हैं अतीत को! संसार से अतीत करनेवाली विशेष जागृति का नाम अनुभव है। वह है परमात्मा का निर्देशन। जिस परमात्मा की हमें चाह है, जिस सतह पर हम बैठे हैं, हमारी पुकार ऐसी हो कि वह प्रभु हमारी सतह पर उतर आयें, हमारी आत्मा से अभिन्न होकर खड़े हो जायँ, हमारा मार्गदर्शन करने लगें, कहीं भूल हो रही हो तो वे सावधान कर हमें रोक दें; साधना सही है तो हमारी पीठ थपथपा दें कि बेटा! बढ़ते चलो, बिल्कुल ठीक है। वह हमें भजन के लिये उठायें, बैठायें, जगायें; खान-पान, रहन-सहन, आँख से देखना, पाँव से चलना, कान से सुनना– प्रत्येक इन्द्रिय, प्रत्येक परिस्थिति में नियन्त्रण कर हमें चिन्तन-पथ पर ले चलें। परमात्मा की इस संचार-प्रणाली का, इस प्रशक्ति का नाम है अनुभव। अनुभव ही राम है। योगीजन अनुभव में रमण करते हैं। विज्ञानरूपी राम! उनकी जागृति और प्रसारण का नाम है विज्ञान! यह है बेज्ञान का ज्ञान! बेतार का तार!,

जो नहिं देखा नहिं सुना, जो मनहूँ न समाइ।

सो सब अद्भुत देखेउँ, बरनि कवनि बिधि जाइ।। (रामचरितमानस, ७/८० क)

बेदृश्य का दृश्य, बिना तार का तार– परमात्मा के इस संचार का नाम है राम! नाम-जप के साथ प्रभु मार्गदर्शन करने लगते हैं। यदि भजन संतोषजनक चल रहा है, साँस सही चल रही है तो दाहिने नाक का भीतरी भाग फड़ककर बताता है कि साँस का चिन्तन अन्तर्मुखी है। नाक का ऊपरी भाग फड़केगा कि साँस ठीक चल रही है। बाँयी नाक फड़ककर बताती है कि साँस भटक गयी, साँस से तुम्हारा चिन्तन भटक गया। प्रभु जो अनुभव देते हैं, उसके कई प्रकार हैं; जैसे– अंग-स्पन्दन की क्रिया, स्वप्न-सुरा सम्बन्धित अनुभव, भजन में बैठे हैं तो सुषुप्ति-सुरा सम्बन्धित अनुभव, प्रभु से तारतम्य जुड़ गया हो तो सम-सुरा सम्बन्धित अनुभव, आकाशवाणी इत्यादि। भगवान जब बताना शुरू करते हैं तो सृष्टि में सर्वत्र से बोलने-बताने लगते हैं। चूँकि वह सर्वत्र हैं इसलिए वृक्ष से, खम्भे से, द्वार से, उड़ते हुए पक्षी से, राह चलते हुए व्यक्ति से भी वह आपको सन्देश दे सकते हैं जिसे साधक खटाखट समझता जाता है, उसी के अनुरूप चलता जाता है। इसी अनुभव को समझते हुए साधक साधना में प्रवृत्त रहता है। यह जागृति जब भी मिलती है तो किसी सद्गुरु के द्वारा ही मिलती है–

वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुर।

यह जागृति दुर्लभ वस्तु है। इसकी कीमत चुकाना असम्भव है। यह जागृति सद्गुरु की कृपा का प्रसाद है। जब इस जागृति से संयुक्त नाम चलता है तो नाम राम से संयुक्त है। इसके पश्चात् भगवान को अवतार लेकर आपकी विपत्ति को दूर नहीं करना पड़ता। वह तो आपके मन में ही हर समय निर्देशनों के द्वारा आगे-पीछे सब ओर से आपकी रक्षा करते हुए, आपको बचाते हुए भजन पथ पर अग्रसर करते जायँगे। जागृति के पश्चात् यही राम–

बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना।

कर बिनु करम करइ बिधि नाना।।

आनन रहित सकल रस भोगी।

बिनु बानी बकता बड़ जोगी।।

तन बिनु परस नयन बिनु देखा।

गहइ घ्रान बिनु बास असेखा।।

अस सब भाँति अलौकिक करनी।

महिमा जासु जाइ नहिं बरनी।।

जेहि इमि गावहिं वेद बुध जाहि धरहिं मुनि ध्यान।

सोइ दसरथ सुत भगत हित कोसलपति भगवान।। (रामचरितमानस, १/११८)

वेद और प्रत्यक्षदर्शी महापुरुष जिसका इस प्रकार गायन करते हैं और मुनिलोग जिसका ध्यान धरते हैं….. मुनिलोग किसी पत्थर की मूर्ति का ध्यान नहीं धरते। वे उसका ध्यान करते हैं जो बिना पाँव के चल रहा है, बिना आँखों के सब कुछ देख रहा है; क्या कोई कैमरा उसका चित्र खींच सकता है? वह बिना हाथ के काम कर रहा है, बगैर तन के स्पर्श कर रहा है। यह सब अनुभवगम्य है। यह है विज्ञानरूपी राम! आपकी साधना का जैसा स्तर है, भगवान उतना ही बताते हैं। साधना की जागृति की आरम्भिक अवस्था में अंगस्पंदन, सुषुप्ति सुरा के अनुभव मिलते हैं। शेष उन्नत अनुभव साधना-स्तर उठने पर मिलते हैं। साधना संतोषजनक हो जाने पर भगवान आपके मन को नाथ कर उसकी लगाम अपने हाथ में ले लेते हैं– जाके रथ पर केसो, ता कहँ कौन अँदेसो।फिर तो उन्हीं के संरक्षण में चलकर पुरुष वहाँ पहुँच जाता है जहाँ बैठकर वह प्रभु प्रसारण करते हैं। जहाँ उस मूल का साधक ने स्पर्श किया तो,

जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई। (रामचरितमानस, २/१२६/३)

उन्हें जानकर वह वही हो गया। सेवक सदा के लिए खो गया। वहाँ जाकर अनुभव पूर्ण हो जाता है, भगवान का सहज स्वरूप ही शेष बचता है। न अलग कोई सेवक है, न स्वामी। ईश्वर-भाव में स्थिति मिल जाती है। द्रष्टा अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है। अब संसार है ही नहीं तो कोई भवसिंधु में डूबेगा कहाँ?

जेहि जाने जग जाइ हेराई।

जागें जथा सपन भ्रम जाई।। (रामचरितमानस, १/१११/२)

जगत् खो जाता है, कहीं गिरने की कोई संभावना ही नहीं है। इसलिए जब तक यह नाम अनुभवों से संयुक्त नहीं है तब तक यह अधूरा है। यह लाभदायक हो सकता है, पुण्य-पुरुषार्थ को बढ़ाता है किन्तु खतरा बना हुआ है। नारद की तरह बन्दर का मुखौटा पहनकर घूमना पड़ सकता है लेकिन जब नाम-चिन्तन के साथ-साथ जब अनुभवी विज्ञानरूपी राम– वह परमात्मा हमें उठाये, बैठाये, चलाये, बिना हाथ-पाँव के कार्य करनेवाले राम से संयुक्त जब नाम जप चलता है तो निश्चित कल्याण करनेवाला होता है। पापरूपी पक्षी इस नाम की जागृति के साथ झुलसते चले जाते हैं, साधक आगे बढ़ता चला जाता है। नि:सन्देह भगवान के अनन्त नाम हैं, सभी कल्याणकारी हैं किन्तु राम सकल नामन्ह ते अधिका। यह है भजन की जागृति। इसके पश्चात् साधन मार्ग में खतरा संभव नहीं है और यह जागृति किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष के द्वारा होती है। ‘वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुर।’

आज रामजी सबको सुलभ नहीं हैं। नारदजी को वह दिखायी दे रहे थे इसलिए उन्होंने पूछ लिया। आप किससे पूछेंगे? कौन उत्तर देगा? वस्तुत: किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष के द्वारा ही यह जागृति होती है। इसीलिए माता मीरा कहती हैं– दी मेरे सतगुर– इस सत्य तक की दूरी तय करनेवाली नौका है नाम! खेनेवाले हैं सद्गुरु! इस प्रकार भवसागर तरि आयो।– उन्होंने अगाध भवसागर पार कर लिया। आप सब भी प्रयास करें।

।। ॐ श्री सद्गुरुदेव भगवान की जय ।।

(अमृतवाणी भाग-6’ से उद्धृत)

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