भजन किसका, कैसे और क्यों?

भजन किसका, कैसे और क्यों?

मनुष्य देह की सराहना देवता और सन्तों ने की है। केवल एक प्रयोजन के लिए– सो सनेह सिय पी के(विनयपत्रिका, पद १७५/२)- वह परमात्मा के चरण कमल में स्नेह है। उस परमात्मा की प्राप्ति इस मानव तन से सम्भव है– मात्र इतने के लिए! अनन्त योनियाँ भोग भोगने के लिए हैं, नवीन भजन-चिन्तन कर परमात्मा तक की दूरी तय नहीं कर सकते। मनुष्ययोनि ही भवसागर से पार होने का उपाय है– नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो। (रामचरितमानस, ७/४३/७ क)- मनुष्य शरीर भवसागर से पार होने का एक जहाज है।

भजन एक परमात्मा का ही करना चाहिए; क्योंकि–

बारि मथें घृत होय बरु, सिकता ते बरु तेल।

बिनु हरि भजन न भव तरिअ, यह सिद्धान्त अपेल।।

(रामचरितमानस, ७/१२२ क)

पानी मथने से भले ही घी निकल आये– यह असम्भव कदाचित् संभव हो जाय, बालू पेरने से तेल निकल आये किन्तु बिना हरि, एक परमात्मा के भजन के कोई भव पार हो ही नहीं सकता। भजन किसका करना है? हरि का! एक परमात्मा का! सिवाय परमात्मा के और किसी का अस्तित्व है ही नहीं। देवलोक में भी ऐसा कोई नहीं है जो मृत्यु की इस परिधि से बाहर हो। अपनी आयु पूरी करके उनको भी गिरना पड़ता है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण का कहना है–

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति। (गीता, ९/२१)

सत्कर्मों के फलस्वरूप पुरुष विशाल, स्वर्गलोक को प्राप्त कर लेते हैं किन्तु पुण्य क्षीण हो जाने पर वहीं गिर जाते हैं जहाँ से चलना आरम्भ किया था। देवता उत्तम भोग नि:सन्देह पाते हैं किन्तु नवीन साधना करके मोक्ष नहीं पा सकते। उसका उपाय केवल मानव-तन में है और मानव-तन में भी उपाय है तो केवल हरि का भजन, अन्य किसी का नहीं। देवता मृत्युलोक में गिरते हैं, कीट-पतंग योनियों में जाते हैं। इसलिए भजन केवल एक परमात्मा का करना चाहिए। विस्तार से इस प्रकरण पर एक पुस्तिका आश्रम ट्रस्ट से प्रकाशित है। प्रश्न उठता है कि हरि का भजन करें तो कैसे करें?

रामचरितमानस के अरण्यकाण्ड में शबरी के आश्रम में भगवान श्रीराम ने भजन के नौ सोपानों का वर्णन इस प्रकार किया–

प्रथम भगति संतन्ह कर संगा।

दूसर रति मम कथा प्रसंगा।।

(रामचरितमानस, ३/३४/८)

परमात्मा की भक्ति का प्रथम चरण सन्तों का संग है। वहाँ परमात्मा के कथा-प्रसंग में अभिरुचि होगी कि ईश्वर कहाँ रहता है, उसे कैसे ढूँढ़ा जाय। ईश्वर और हमारे बीच में रुकावट क्या है? उसे दूर कैसे किया जाय? उस कथा का सारांश है गुरु का चरण–

गुरु पद पंकज सेवा, तीसरि भगति अमान।

चौथि भगति मम गुन गन, करइ कपट तजि गान।।

(रामचरितमानस, ३/३५)

कथा का सारांश निकलेगा गुरु महाराज के चरण कमलों की भक्ति! गुरु की भक्ति से प्रभु की लीला का संचार मिल जायेगा। अब प्रभु का गुणगान करें कि वह कैसे व्यापक हैं? कैसे वह करुणानिधान हैं? इसके उपरान्त–

मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा।

पंचम भजन सो बेद प्रकासा।।

(रामचरितमानस, ३/३५/१)

मुझमें दृढ़ विश्वास के साथ मेरे मन्त्र का जप– नाम-जप पाँचवीं श्रेणी का भजन है। भक्ति की इतनी श्रेणियाँ घर-गृहस्थी में रहते हुए भी तय की जा सकती हैं। छठीं श्रेणी में आते-आते बिरति बहु करमा– बहुत-सी जिम्मेदारियों से निवृत्ति हो जाती है। वैसे तीसरी श्रेणी से ही कर्मों से विरति की ओर अग्रसर हो जाना चाहिए, अपनी जिम्मेदारियाँ बाल-बच्चों को सौंप देना चाहिए। भार उनके कन्धों पर दे देना चाहिए जो उसके प्रत्याशी हों। इस छठें स्तर तक पहुँचते-पहुँचते जिम्मेदारियों से निवृत्त हो जाना चाहिए।

सातवँ सम मोहि मय जग देखा।

मोतें सन्त अधिक करि लेखा।।

(रामचरितमानस, ३/३५/३)

इस वैराग्य के साथ भक्ति की सातवीं सीढ़ी पर भगवान सर्वत्र दिखायी देंगे। आज कहने के लिए ही भगवान सर्वत्र हैं किन्तु वैराग्य के साथ एकान्त में जहाँ चिन्तन आरम्भ हुआ, प्रभु की महिमा सर्वत्र झलकने लगती है। सबमें समभाव आ जाता है, कहीं विषमता नहीं रह जाती। कोई मित्र नहीं जिससे हम प्रेम करें, कोई शत्रु नहीं जिससे द्वेष करें। मोहि मय जग देखा– सबमें परमात्मा का रूप, इष्ट का रूप देखना चाहिए।

आठवँ जथा लाभ संतोषा।

सपनेहुँ नहिं देखइ पर दोषा।।

(रामचरितमानस, ३/३५/४)

आठवीं श्रेणी में भक्ति पहुँचने पर जथा लाभ सन्तोषा– जिस लाभ के लिये भजन कर रहे थे, वही मिल गया तब सन्तोष; और उसी के लिए चिन्तन में डूबे भर रहें, प्रभु को तंग न करें कि इतना भजन किया, आपने ध्यान नहीं दिया, शिकायत न करें। वह जानते हैं जितना कुछ आपने किया है वही तो निकलकर सामने आ रहा है। लाभ का आशय वैभव-सम्पदा नहीं। साधक अब सर्वत्र ईश्वर को देख रहा है अत: लाभ भी एक ही दिशा में है– प्रभु से मिलने वाली विभूतियाँ, ईश्वरीय पथ की योग्यता! जैसा जितना मिले उसी में सन्तुष्ट रहते हुए कर्म अर्थात् आराधना में प्रवृत्त रहें। स्वप्न में भी ईश्वर या इष्ट पर दोषारोपण नहीं करना चाहिए, सद्गुरु पर दोषारोपण नहीं करना चाहिए।

नवम सरल सब सन छलहीना।

मम भरोस हियँ हरष न दीना।।

(रामचरितमानस, ३/३५/५)

भक्ति के अन्तिम सोपान का लक्षण है हृदय की सरलता! सबके प्रति जो हृदय में हो वही जिह्वा पर भी हो। हृदय में कुछ तथा जुबान पर कुछ अन्य– ऐसा साधक सफल नहीं होता। हृदय में मात्र परमात्मा का ही भरोसा हो, अन्य किसी से आशावान न हों। हृदय में न हर्ष हो, न दीनताजन्य विषाद हो।

भक्ति का सर्वोपरि मानदण्ड है एक परमात्मा के प्रति श्रद्धा का स्थिर होना! अगस्त्य जी के शिष्य सुतीक्ष्ण को यह भरोसा था– मन क्रम बचन राम पद सेवक। सपनेहु आन भरोस न देवक।।(रामचरितमानस, ३/९/२)- ईश्वर एक है तो दो-चार का भरोसा क्यों? बस, भजन यहीं से आरम्भ हो जाता है।

भजन एक परमात्मा का ही करना है किन्तु इस भजन पथ में लगने के चार माध्यम हैं– नाम, रूप, रामकथा और अनुभव! इनमें सबसे प्राथमिक और पूर्तिपर्यन्त चलने वाला माध्यम है नाम! ईश्वर के नाम तो अनन्त हैं किन्तु वास्तविकता यही है कि ईश्वर का कोई नाम ही नहीं है। वह अनाम है, अरूप है, अमूर्त है, अजन्मा है, अव्यक्त है– व्यक्त ही नहीं होता। जब कोई वस्तु दिखायी पड़ेगी तो हम कोई नामकरण कर ही लेंगे किन्तु वह अगोचर है– इन्द्रियों द्वारा पकड़ में आने वाला नहीं है; अचिन्त्य है– चित्त और चित्त की लहरों से परे है तो भला नाम कैसा! परमात्मा के जितने भी नाम हैं, उन प्रभु की विभूतियों का चित्रण है; जैसे– वह विभु है अर्थात् सम्पूर्ण वैभव से युक्त है; वह प्रभु है क्योंकि सबका भरण-पोषण करनेवाला है; वह ईश्वर है अर्थात् स्वर (श्वास) में संकल्पों के निरोध के साथ उसकी ओट में छिपी सत्ता है। उसे भगवान भी कहते हैं– भग कहते हैं त्रिगुणमयी प्रकृति को; इसमें विद्या, अविद्या, ऐश्वर्य सब कुछ आ जाता है। वह इसका नियमन करने वाला है, संचालक है इसलिए उसका एक नाम भगवान है। उसका वाचक ओम् है– ओ माने वह अविनाशी परमात्मा, अहम् माने मैं स्वयं– आपके हृदय-देश में जिसका वास हो। सारांशत: उसके कितने ही हजारों नाम हो सकते हैं जबकि किसी एक नाम से उसकी समस्त विभूतियों का चित्रण नहीं होता। वह आत्मा है अर्थात् सबके अन्त:करण में उसका निवास है और यहाँ रहते हुए भी वह सबसे परे है इसलिए परमात्मा कहा जाता है। ये विविध दृष्टिकोण से उस सत्य के सम्बोधन हैं। उनका स्वयं कोई नाम नहीं है, किन्तु ईश्वर-पथ में भजन का सबसे बड़ा माध्यम, पहली सीढ़ी से अन्तिम क्षणों तक साथ देता है नामजप! उस एक अविनाशी परमात्मा का जो द्योतक हो, जो उसका परिचायक हो ऐसे किसी एक नाम का– ॐ अथवा राम का जप करना चाहिए।

आदिशास्त्र गीता में ॐ जपने का निर्देश भगवान श्रीकृष्ण ने दिया है। वैदिक, औपनिषदीय ऋषियों ने ॐ का ही जप किया किन्तु मध्यकाल में शिक्षा को संकीर्ण कर ॐ जपने के अधिकार-अनधिकार का विवाद होते देख भक्तिकालीन सन्तों ने जन-सामान्य को राम जपकर उसी परिणाम का उद्घोष किया जो ॐ जपने से मिलता है। राम उस ॐ से भिन्न हो, ऐसी कोई बात नहीं। ये दोनों पर्यायवाची शब्द हैं। रमन्ते योगिन: यस्मिन् स राम।– जिसमें योगी लोग रमण करते हैं, रात-दिन जिसमें खोये रहते हैं, बाहर संसार की ओर दृष्टिपात् करने का जिन्हें अवकाश नहीं है, उस विज्ञान का नाम है राम! वह भला क्या है? योगीजन किसमें खोये रहते हैं?–

जद्यपि ब्रह्म अखण्ड अनन्ता।

अनुभवगम्य भजहिं जेहि सन्ता।।

(रामचरितमानस, ३/१२/१२)

यद्यपि ब्रह्म अखण्ड है– उसे खण्डित नहीं किया जा सकता; वह अनन्त है– हमारे पकड़ में कैसे आयेगा तो अनुभवगम्य भजहिं जेहि सन्ता।– अनुभव के द्वारा वह सम्भव है और अनुभव के आश्रित जो भजने वाले हैं, वे सन्त हैं। यह अनुभव ही राम की संचार प्रणाली है। भव कहते हैं संसार को, आवागमन को; अन कहते हैं अतीत को– इस प्रकार संसार के आवागमन से अतीत कर देने वाली जागृति-विशेष का नाम अनुभव है। वह है आत्मा की आवाज का प्रस्फुटित होना। जिस परमात्मा की हमें चाह है, वही आवाज देने लगा। उन्हीं के निर्देशन में चलकर परमात्मा तक की दूरी तय की जाती है। यह अपनी इन्द्रियों का देखा-सुना मायिक सत्य नहीं है। यह प्रसारण ईश्वर-प्रेरित, ईश्वर-प्रदत्त है इसलिए उसे राम कहते हैं। गुरुनानक, तुलसी इत्यादि के समय ‘राम’ मंत्र जपने पर अधिक प्रयोग किया गया। देशकाल और भाषागत भेद से और भी कुछ कहने में आया हो सकता है लेकिन सबका अर्थ एक ही है। जपने के लिए प्रयुक्त सभी सम्बोधन एक परमात्मा के परिचायक हैं, अन्य किसी सम्बोधन से जपने का विधान नहीं है। हाँ, सम्बोधन बहुत लम्बा नहीं होना चाहिए।

मंत्र परम लघु जासु बस, बिधि हरि हर सुर सर्ब।

(रामचरितमानस, १/२५६)

मंत्र बहुत छोटा होता है किन्तु उसमें क्षमता इतनी कि उससे ब्रह्मा, विष्णु, महेश समेत सम्पूर्ण देवता, परब्रह्म परमात्मा तक वश में हो जाते हैं। अर्थात् जप के लिए नाम बहुत छोटा होना चाहिए, जैसे– ओम् अथवा राम! क्योंकि उन्नत अवस्था में यह श्वास से जपा जाता है। श्वास आयी और गयी! इस श्वास के आने-जाने में एक शब्द से अधिक की भावना सम्भव नहीं है। इसलिए जप का नाम बहुत छोटा होना चाहिए जो आसानी से श्वास में ढल सके! कुछ लोग ॐ नमो भगवते वासुदेवाय(अर्थात् ॐ शब्द से उच्चरित, सबके श्वास में निवास करने वाले परमात्मा, मैं आपके प्रति नमन करता हूँ।) या इतना विस्तृत कुछ जपते हैं। किन्तु ये प्रार्थनाएँ हैं। यह नाम नहीं है जिसका जप किया जाय!

मन दुर्धर्ष है जिसे पराजित करना कठिन है। परमात्मा और हमारे बीच में रुकावट है तो हमारा मन। मन का वेग! यह वायु से भी तीव्र गति से चलने वाला है। मन ही आपै जगत बना के, ऊँच नीच तन पाया। मन ही सरग नरक भुक्तावे, मन से आया जाया। सन्तो! मन सबको भरमाया।।– इस मन ने ही सबको भटका रखा है। महर्षि पतञ्जलि ने मन को चित्तवृत्ति कहा। योग को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा– योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:’– चित्तवृत्तियों का निरोध, अचल स्थिर ठहर जाना योग है। जहाँ वृत्तियाँ शान्त हुईं, मन स्थिर टिका तो तदा द्रष्टु: स्वरूपेऽवस्थानम्– उस समय द्रष्टा यह आत्मा अपने शाश्वत स्वरूप में स्थित हो जाती है।

पूज्य गुरु महाराज का कहना था कि मन मदमस्त हाथी के समान है, मतवाले शराबी हाथी की तरह झूमता ही रहता है। यह जितना बलवान है, इसे बाँधने के लिए इससे भी बलवान स्तम्भ चाहिए। इससे भी बलवान इसके लिए सीकड़ चाहिए, फिर इसे बाँध दिया जाय। सीकड़ से बाँध देने पर हाथी शान्त नहीं हो जाता, कुछ दिन झूमता है, हिलता-डुलता रहता है, क्रमश: शिथिल होते-होते शान्त होता है, रुक जाता है। यह श्वास ही स्तम्भ है। इसमें सुरति का सीकड़ लगाकर मनरूपी हाथी को बाँध दें। श्वास आई तो ओम्, गयी तो ओम्– श्वास से जप करें। यह जप मन से होता है, सुरत से ही श्वास को देखते रहें कि श्वास में नाम के अतिरिक्त अन्य चिन्तन प्रवेश न कर पायें, फिर भी यह इतर संकल्प करेगा। मन जहाँ भी जाय, जिस माध्यम से जाय उसे वहाँ से घसीटकर पुन: श्वास द्वारा नाम-जप में लगायें। सतत् अभ्यास के फलस्वरूप धीरे-धीरे यह मन शिथिल पड़ता है, स्थिर हो जाता है और स्थिर मन भी जब मिट जाय, परिणाम निकल आता है जिसका नाम परमात्मा है, मोक्ष है।

मन मिटा माया मिटि, हंसा बेपरवाह।

जाका कछु न चाहिए, सोइ शाहंशाह।।

मन मिटा, तब माया मिटी। माया मिट ही गयी तब हंसा – यह आत्मा निश्चिन्त हो जाती है। जाका कछु न चाहिए– यदि आगे कोई सत्ता है तो चाह अवश्य होगी, जब प्राप्त होने योग्य कुछ बचा ही नहीं तो आप चाह किसकी करेंगे? इसलिए सोइ शाहंशाह– वह आप्तकाम पूर्णपुरुष है।

दुक्ख हरे सुक्ख को दिये, मन का कर दे अन्त।

कह कबीर कब मिलिहैं, (ऐसे) परम सनेही सन्त।।

दु:ख को हर लें और बदले में सुख प्रदान कर दें– राम बिमुख सपनेहुँ सुख नाहीं– उनके सन्मुख कर दे और मन का कर दे अन्त– मन का निरोध ही न करे बल्कि उसे समाप्त कर दे। कबीर कहते हैं– ऐसे परम सनेही सन्त भला कब मिलें? यह सन्तत्व की कसौटी है कि शिष्य के मन का ही अन्त कर दें।

इस प्रकार मन के निरोध के लिए नामजप का सीकड़ चाहिए। मन को संयत कर देने वाले नाम का उतार-चढ़ाव श्वास के ऊपर है। पूज्य गुरु महाराज जी कहा करते थे कि जो श्वास का भजन नहीं जानते थे ऐसे साधुओं को महात्मा लोग अपनी कुटिया में दो रोटी भी नहीं देते थे कि यह स्वयं तो पथभ्रष्ट है ही, घूम-घूमकर दूसरों को गुमराह ही तो करेगा!

नाम चार श्रेणियों से जपा जाता है– बैखरी, मध्यमा, पश्यन्ती और परा। आरम्भिक दो श्रेणियों में नाम व्यक्त है, जिह्वा और कण्ठ से उच्चरित होता है लेकिन पश्यन्ती और परा में उतार-चढ़ाव श्वास पर है। इन चारों स्तरों पर भजन खूब करना चाहिए। एक परमात्मा में दृढ़संकल्प होकर यदि आपने नामजप आरम्भ कर दिया तो क्रिया को न जानते हुए भी आप क्रिया के पथ पर हैं।

मन को संयत करने का दूसरा माध्यम है ध्यान! हमने भगवान को देखा ही नहीं, उनका ध्यान कैसे करें? जो अमूर्त है– जिसकी कोई मूर्ति नहीं है; अरूप है– जिसका कोई रूप ही नहीं है; जो अव्यक्त है– जैसे यह वस्तु दिखायी दे रही है, आप दिखायी दे रहे हैं, वह दिखायी नहीं दे रहा है, हम उनके चरण कमलों का ध्यान कैसे करें? ध्यान हमें वैसे ही धरना है जैसा महापुरुषों ने कहा है–

ध्यानमूलं गुरोर्मूर्ति, पूजामूलम् गुरोर्पदम्।

मन्त्रमूलं गुरोर्वाक्यं, मोक्षमूलं गुरो: कृपा।।

गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में बताया कि ईश्वरप्राप्ति का उपाय क्या है और इस रामायण को समझने की कुञ्जी क्या है? बालकाण्ड के मंगलाचरण में ही उन्होंने लिखा–

भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।

याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धा: स्वान्त:स्थमीश्वरम्।।

(रामचरितमानस, बालकाण्ड, श्लोक २)

मैं भवानी और शंकर की वन्दना करता हूँ जो श्रद्धा और विश्वास के रूप हैं। हमें श्रद्धा करनी है और उनमें विश्वास लाना है। उनके बिना सिद्धजन भी हृदय में स्थित ईश्वर को नहीं जान पाते। तुलसीदास जी का ईश्वर हृदय में वास करता है, बाहर नहीं– अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी (रामचरितमानस, १/२२/८)। साधारण लोगों की कौन कहे, भजन इतना उन्नत हुआ कि सिद्धस्तर तक पहुँच गये– ऐसे सिद्धजन भी भवानी-शंकर की कृपा के बिना हृदय में स्थित ईश्वर को नहीं पहचान पाते अर्थात् ईश्वरप्राप्ति का उपाय शंकर और पार्वती में प्रीति है। अब हम उन्हें कहाँ पायें कि उनसे प्रीति करें और ईश्वर हृदय में मिले? संलग्न श्लोक में कहते हैं–

वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकररूपिणम्।

यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्र: सर्वत्र वन्द्यते।।

(रामचरितमानस, बालकाण्ड, श्लोक ३)

गुरुं शंकररूपिणम्’– सद्गुरु शंकरस्वरूप हैं, उनके चरण-कमलों की मैं वन्दना करता हूँ जिनके आश्रित हो जाने पर टेढ़ा चन्द्रमा भी सीधा, परम कल्याणकारी फल देने वाला हो जाता है। चन्द्रमा मनसो जात:’ (पुरुषसूक्त), मन ससि चित्त महान– मन ही चन्द्रमा है। यह टेढ़ा है। यह कभी काम में, कभी क्रोध में, विविध मोह में, राग-द्वेष में जहाँ-तहाँ छलाँगें भरता ही रहता है। ईश्वर का निवास-स्थल होकर भी यह मल-आवरण-विक्षेप से ढँका हुआ है। सद्गुरु के आश्रय से यह टेढ़ा चन्द्रमा, टेढ़ा चित्त भी परम कल्याणकारी फल देने वाला हो जाता है क्योंकि मन जिस प्रकार सीधा होता है, उस विधि को सद्गुरु बता देते हैं और उस पर चला भी देते हैं। उनके पास उपाय है।

मंत्र महामनि बिषय ब्याल के।

मेटत कठिन कुअंक भाल के।।

(रामचरितमानस, १/३१/९)

अर्थात् भाग्य में यदि असाध्य कुअंक, नरक लिखा है, यातनाएँ लिखी हैं वह भी मिट जायेंगे क्योंकि मंत्र में वह क्षमता है। सद्गुरु उसे जागृत कर देंगे और उस पथ पर चला देंगे जिससे कर्म-संस्कार मिटते हैं। मन का टेढ़ापन मिटता है, वह सीधा हो जाता है। यही है गुरुं शंकररूपिणम्। शंकर महापुरुषों की एक स्थिति है। पूर्ण महापुरुष शिवस्वरूप हैं। शंका अरि: स शंकर– वे शंकाओं से मुक्त हैं, निर्लेप हैं इसलिए शंकर हैं।

महर्षि की स्थिति से पूर्व बाल्मीकि का मन कितना टेढ़ा था! सन्त सद्गुरु का सान्निध्य मिला तो बालमीकि भये ब्रह्म समाना।– ब्रह्म की समानान्तर स्थिति वाले हो गये। अंगुलिमाल आरम्भिक जीवन में अत्यन्त क्रूर, दुर्दान्त दस्यु थे; एक महापुरुष का दर्शन हुआ, उनके प्रति समर्पण हुआ, जहाँ उस पथ पर दो कदम रखा, जीवनकाल में ही अरिहन्त पद को प्राप्त कर लिया। शरीर तो रहने का एक मकान मात्र है। इसमें यदि कुछ सीधापन-टेढ़ापन है, मन की वृत्तियों का है, वही मन सीधा हो जाता है, सद्गुरु के आश्रित हो जाता है। शंभु अर्थात् स्वयंभू जो स्वयम् की स्थिति वाला है, शिव प्रकृति की सीमाओं से अतीत है इसीलिए उसे शिव कहते हैं–

सुकृति संभु तन बिमल बिभूती।

मंजुल मंगल मोद प्रसूती।।

जन मन मंजु मुकुर मल हरनी।

किएँ तिलक गुन गन बस करनी।।

(रामचरितमानस, बालकाण्ड, सोरठा ५/३-४)

पुण्यात्मा शंकर जी के शरीर में जो निर्मल विभूति है, इन गुरु महाराज के ही चरणों की उपज है। शंकर जी में अनेकों विमल विभूतियाँ हैं, जैसे– वह आशुतोष, अवढरदानी हैं।

कासीं मरत जंतु अवलोकी।

जासु नाम बल करउँ बिसोकी।।

(रामचरितमानस, १/११८/१)

उनके नाम के बल से शंकर जी स्वरूप से मुक्ति प्रदान कर देते हैं। वे भूतनाथ हैं– सभी जीवों के स्वामी! ये सभी विभूतियाँ गुरु महाराज के चरण रज की ही देन हैं। शंकर तो पाप और पुण्य से परे होता है फिर पुण्यात्मा शंकर कैसा? सुकृति शंभु कैसा? वास्तव में कोई भी पुण्य और पाप से अतीत शिवतत्त्व में स्थित हुआ किन्तु आरम्भ में तो वह साधक ही था। कोई पुण्यात्मा साधक गुरु महाराज के चरण रज का आश्रय लेकर उनको हृदय में धारण कर शिवतत्त्व की स्थिति तय कर लेता है और उस निर्मल विभूति से संयुक्त हो जाता है। शिव एक स्थिति है।

श्रीगुर पद नख मनि गन जोती।

सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती।।

दलन मोह तम सो सप्रकासू।

बड़े भाग उर आवइ जासू।।

(रामचरितमानस, बालकाण्ड, सोरठा ५/५-६)

श्री गुरु महाराज के चरण-नखों की ज्योति मणि और माणिक्य के तुल्य है। इसका स्मरण करने से हृदय में दिव्यदृष्टि का संचार होता है। साथ ही वे लोग बड़े भाग्यशाली हैं जिनके हृदय में गुरु महाराज के चरण आ जायँ। मान लें किसी ने श्रद्धापूर्वक स्मरण किया और हृदय में चरण आ ही गये तो उससे लाभ क्या? तो–

उघरहिं बिमल बिलोचन ही के।

मिटहिं दोष दुख भव रजनी के।।

(रामचरितमानस, बालकाण्ड, सोरठा ५/७)

हृदय के निर्मल नेत्र खुल जायेंगे और भव रजनी अर्थात् जन्म-मृत्यु के दोष और दु:ख मिट जायेंगे। इस प्रकार ध्यान गुरु महाराज के चरणों का ही करना है। उससे,

सूझहिं राम चरित मनि मानिक।

गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक।।

(रामचरितमानस, बालकाण्ड, सोरठा ५/८)

रामचरितमानस के प्रति सूझ पैदा हो जाती है। गुप्त- जो लिखने में नहीं आया और प्रकट- जो लिखने में आ गया; जो जेहि खानिक– जहाँ जो जिस स्थान में है अर्थात् परमात्मा के अन्तराल में जो विभूतियाँ छिपी हैं, वह सब विदित हो जायेंगी। कब? जब गुरु महाराज का चरण आपके हृदय में आ जायेगा। अर्थात् ध्यान सद्गुरु का और विदित होती हैं परमात्मा की विभूतियाँ, परमात्मा का स्वरूप; ब्रह्म की गहराइयों का हाल सूझेगा, रामचरितमानस के प्रति सूझ पैदा हो जायेगी।

वस्तुत: शास्त्र कोई विरला महापुरुष जानता है, यह उनके हृदय की वस्तु है और उनके निर्देशन में कोई विरला अधिकारी ही पढ़ता है। सब न पढ़ते हैं, न जानते हैं। शंकर महापुरुषों का सम्बोधन है इसीलिए महापुरुषों ने शंकर की बहुत महिमा का वर्णन किया है। आदि शंकराचार्य ने कहा– : पूजनीय😕 शिवतत्त्वनिष्ठ: शिष्य ने आचार्य से पूछा– सृष्टि में पूजनीय कौन है? आचार्य ने कहा– शिवतत्त्वनिष्ठ:’– जो शिवतत्त्व में स्थित है वह महापुरुष। शंकराचार्य ने अपना स्वरूप बताया तो कहा– शिवो केवलोऽहम्– मैं शिवस्वरूप हूँ अर्थात् यह स्थिति सबके लिए सुलभ है।

रामचरितमानस में शिव-महिमा का वर्णन करते हुए तुलसीदास जी कहते हैं–

जेहि पर कृपा न करहिं पुरारी।

सो न पाव मुनि भगति हमारी।।

(रामचरितमानस, १/१३७/७)

सत्-रज-तम त्रिगुणमयी प्रकृति के ये तीन नगर हैं, तीन पुर हैं। इनका अन्त करने वाला त्रिपुरारि है अर्थात् त्रिगुणातीत, स्वरूपस्थ महापुरुष! यदि वह कृपा न करें तो मेरी भक्ति कोई नहीं पा सकता।

सिव सेवा कर फल सुत सोई।

अबिरल भगति राम पद होई।।

(रामचरितमानस, ७/१०५/२)

सेवा शिव की करें, भक्ति राम की मिलेगी। अन्यत्र है–

बिनु छल बिस्वनाथ पद नेहू।

राम भगत कर लच्छन एहू।।

(रामचरितमानस, १/१०३/६)

बिना छल, मन-वचन और कर्म से निश्छल होकर बिस्वनाथ– विश्व के जो नाथ हैं, स्वामी हैं गुलाम नहीं, उनके चरण-कमलों में प्रीति– राम भगत कर लच्छन एहू– यह रामभक्त के लक्षण हैं। ध्यान धरा हमने शिव के चरणों का और भक्ति पूरी हो गयी राम जी की, कितना विचित्र है! भोजन आप करें और पेट हमारा भर जाय! किन्तु अध्यात्म में ठीक ऐसा ही है।

संकर बिमुख भगति चह मोरी।

सो नारकी मूढ़ मति थोरी।।

(रामचरितमानस, ६/१/८)

शंकाओं से जो मुक्त हैं, शिवतत्त्व में स्थित सद्गुरु महापुरुष से विमुख होकर मेरी भक्ति चाहता है वह मूढ़ है, नरकगामी है। उसकी बुद्धि अत्यन्त अल्प है!

औरउ एक गुपुत मत, सबहि कहउँ कर जोरि।

संकर भजन बिना नर, भगति न पावइ मोरि।।

(रामचरितमानस, ७/४५)

परमात्मा राम ने एक बार सभा बुलाई। उस विशाल जनसभा में भगवान ने कहा कि आप सबसे एक अत्यन्त गोपनीय रहस्य का उद्घाटन करने जा रहा हूँ, हाथ जोड़कर कह रहा हूँ! परम ब्रह्म परमात्मा को हाथ जोड़ने की क्या आवश्यकता थी? अनुरोध इसलिए कि जीवमात्र के लिए उनकी करुणा है। जो बात वह कहने जा रहे हैं, गले के नीचे उतरने वाली नहीं है। गुरु को जब हम-आप देखते हैं तो उनका शरीर ही तो दृष्टिगोचर होता है। वे शिव-स्वरूप में स्थित महापुरुष हैं- यह हठात् समझ में नहीं आता जब तक प्रभु करुणा कर समझा न दें। भले तत्काल समझ में न जाये, देर से समझ में आये किन्तु सत्य यही है इसलिए विनय के साथ कह रहे हैं कि संकर भजन बिना नर, भगति न पावइ मोरि।– शिव-स्वरूप महापुरुष के बिना कोई मेरी भक्ति प्राप्त नहीं कर सकता। यदि परमात्मा को प्राप्त करना है तो ध्यान सद्गुरु के चरणों का ही करना होगा।

बहुत से लोग केवल गुरु-गुरु जपते हैं कि जब सब गुरु ही हैं तो भगवान की क्या आवश्यकता? हो गया भजन! कुछ लोग गुरु के चरणों का ध्यान नहीं धरते, कहते हैं हमारे गुरु तो सीधे भगवान ही हैं; किन्तु इन दोनों मान्यताओं का खण्डन करते हुए परमात्मा राम कहते हैं–

संकर प्रिय मम द्रोही, सिव द्रोही मम दास।

ते नर करहिं कलप भरि, घोर नरक महुँ बास।।

(रामचरितमानस, ६/२)

शंकर का तो प्यारा है, सद्गुरु के ऊपर निर्भर है लेकिन ‘मम द्रोही’- परमात्मा को नहीं चाहता, उनका सुमिरन नहीं करता अथवा परमात्मा का प्रेमी हो गया और शिव का द्रोही है कि परमात्मा ही गुरु हैं, हमें गुरु की क्या आवश्यकता? ते नर करहिं कलप भरि, घोर नरक महुँ बास।– ऐसे लोग एक कल्प अर्थात् एक जन्म तक घोर नरक में वास करेंगे। इसके पश्चात् वह रास्ते पर ही आयेंगे क्योंकि ईश्वर-पथ में कभी बीज का नाश नहीं होता। यदि एक बार क्रिया जाग्रत हो गयी, इस पथ को समझकर आपने दस कदम रख दिया, अगले जन्म में वहीं से साधन आरम्भ करेंगे जहाँ से साधन छूटा था। माया में ऐसा कोई यन्त्र नहीं है जो इस सत्य को मिटा दे। माया केवल विलम्ब कर सकती है इसलिए वह एक कल्प अवश्य भोगेगा! इसलिए ध्यान सद्गुरु के चरणों का और उसके द्वारा परमात्मा की प्राप्ति का विधान है। सतत् सुमिरन बना रहना चाहिए, प्रभु से प्रार्थना बनी रहे।

पंचवटी में लक्ष्मण ने परमात्मा राम से पूछा कि प्रभो! माया क्या है? ब्रह्म क्या है? ज्ञान-वैराग्य क्या है और सुख का मूल क्या है? भगवान ने कहा–

भगति तात अनुपम सुखमूला।

मिलइ जो सन्त होइँ अनुकूला।।

(रामचरितमानस, ३/१५/४)

लक्ष्मण! अनुपम सुख की मूल तो भक्ति है। लक्ष्मण ने कहा– तो प्रभो! प्रदान करें! राम ने कहा– नहीं लक्ष्मण! इसे सीधे तो मैं भी नहीं दे सकता। मिलइ जो सन्त होइँ अनुकूला।– वह भक्ति तभी मिलेगी जब कोई सन्त अनुकूल हो। उधर शंकर बिना कोई भक्ति नहीं पा सकता और यहाँ कहते हैं– सन्त बिना कोई पा नहीं सकता। स्वयं मैं भी नहीं दे सकता। अत: ईश्वर-पथ में ध्यान सद्गुरु के स्वरूप का ही करना चाहिए।

गीता के आरम्भ में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के छिटपुट सन्देहों का निवारण किया। पहले अध्याय में अर्जुन धर्म के नाम पर युद्ध से विरत हो रहा था। भगवान ने धीरे से उसे धर्म का विवरण समझाया कि सत्य केवल आत्मा है। विधाता और उससे उत्पन्न सृष्टि नश्वर है। अर्जुन प्रश्न करते गये, भगवान समझाते गये। लगभग चौबीस प्रश्न अर्जुन ने किये और जो वह नहीं कर सके, उसे परमात्मा ने स्वयं समझाया। अन्तत: जब उसमें पात्रता आ गयी तब अठारहवें अध्याय में भगवान ने अर्जुन से पूछा कि जानते हो ईश्वर कहाँ रहता है? स्वयं उत्तर भी दिया–

ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।

भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।।

(गीता, १८/६१)

अर्जुन! ईश्वर सम्पूर्ण प्राणियों के हृदय-देश में निवास करता है। इतना समीप है तो लोग देखते क्यों नहीं? भगवान बताते हैं कि लोग मायारूपी यन्त्र में स्वयं ही दौड़कर चढ़ गये और भ्रमवश भटकते ही रहते हैं। ईश्वर हृदय में है तो शरण किसकी जायँ?

तमेव शरण गच्छ सर्वभावेन भारत।

तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।।

(गीता, १८/६२)

उस हृदय-स्थित ईश्वर की शरण जायँ। सर्वभावेन– सम्पूर्ण भाव से जायँ। ऐसा नहीं कि थोड़ा भाव देवी में, थोड़ा देवता में! तब तो हम तीन चौथाई बिखर गये। अत: पूर्ण श्रद्धा के साथ एक परमात्मा की शरण में जायँ! मान लें हम एक ईश्वर की शरण चले ही गये तो उससे लाभ क्या है? भगवान कहते हैं– तत्प्रसादात्परां शान्तिं– उनकी कृपा-प्रसाद से तुम परमशान्ति को प्राप्त कर लोगे और उस स्थान को पा जाओगे जो शाश्वत है। तुम्हारा धाम रहेगा और तुम्हारा जीवन शाश्वत रहेगा। किन्तु हृदय वाला ईश्वर दिखायी नहीं देता, उसकी शरण जायँ तो कैसे? उसकी विधि क्या है? तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा– अर्जुन! इससे भी अत्यन्त गोपनीय मेरे वचन को सुन–

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।

मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रति जाने प्रियोऽसि मे।।

(गीता, १८/६५)

तू मेरे में ही मन वाला, मेरा अनन्य भक्त हो, मुझे ही नमस्कार कर, सर्वतोभावेन– मुझे समर्पण कर! तू मेरा अत्यन्त प्रिय है इसलिए मैं सत्य कहता हूँ तू मुझे ही प्राप्त होगा।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:।।

(गीता, १८/६६)

सम्पूर्ण धर्मों की चिन्ता छोड़कर, यह सही कि वह– इसे भूल जाओ, एकमात्र मेरी शरण में हो जाओ। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि तू सम्पूर्ण पापों से भली प्रकार मुक्त हो जायेगा।

भगवान श्रीकृष्ण ने पहले बताया कि ईश्वर हृदय में रहता है, सम्पूर्ण भावों से उसकी शरण जाओ; यहाँ कहते हैं– अर्जुन! उससे भी गोपनीय बात सुनो कि सम्पूर्ण भावों से मेरी शरण आओ! एक ईश्वर हृदय में और एक कृष्ण बाहर खड़े हैं, अर्जुन किसकी शरण जाता? वास्तव में श्रीकृष्ण एक योगेश्वर थे, सद्गुरु थे और अर्जुन एक शिष्य! आरम्भ में ही उसने समर्पण कर दिया था– शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।(गीता, २/७)- भगवन्! मुझे साधिये, सँभालिए क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ। अनुराग ही अर्जुन है। श्रीकृष्ण ने कहा– मेरा ध्यान! मेरा भक्त हो! मेरे में मन को लगाओ क्योंकि यदि हृदयस्थित ईश्वर को प्राप्त करना, जानना है तो ध्यान सद्गुरु के चरणों का ही है। अन्य कोई उपाय न गीता में है न वेद में, न मानस में और न कभी था। क्योंकि गुरु उस परमात्मा का एक साँचा है। उस साँचे के अनुसार जब आपके हृदय में ध्यान स्थिर हुआ, सुरत चरणों में भली प्रकार टिकी तो जो विभूति उनमें है, आपमें भली प्रकार प्रसारित हो जायेगी। गुरु किसी को शिष्य नहीं बनाता, वह जब किसी को अपनाता है तो गुरु ही बना देता है। नास्ति तत्त्व: गुरोर्परम्– जिसका कभी विनाश नहीं होता, उसी में गुरु स्थित है। जब वही स्थिति शिष्य में संचारित हो गयी तो गुरु न चेला पुरुष अकेला– गुरु गुरुत्व देकर, शिष्य गुरुत्व पाकर गुरु-ऋण से उऋण हो जाता है। हाँ, इसके लिए श्रद्धान्वित भजन तो करना ही होगा।

अस्तु, ध्यान सद्गुरु के चरणों का है। इस ध्यान के प्रभाव से आपके हृदय में जागृति आ जायेगी। जहाँ श्रद्धा-भाव से किसी ने सद्गुरु का ध्यान पकड़ा, टूटी-फूटी सेवा जहाँ पार लगी तो हृदय में जिस परमात्मा की हमें चाह है, जिस सतह पर हम बैठे हैं, हमारी पुकार जहाँ कुछ उन्नत हुई, मनसमेत इन्द्रियों से जहाँ संयम की अवस्था आयी तुरन्त परमात्मा प्रसारित हो जाता है। अन्त:करण में परमात्मा का अवतार प्रवाह झलकने लगता है, ईश्वर उभरने लगता है, अवतरित हो चलता है। उनके निर्देशन में चलने का नाम भजन है। परमात्मा की आज्ञा का पालन ही भजन है, इसीलिए भजन कहने और लिखने में नहीं आता। अनुभवी सद्गुरु के द्वारा किसी-किसी अधिकारी के हृदय में जागृत हो जाया करता है।

पूज्य गुरु महाराज के पास विश्वविद्यालयों के वाइस-चांसलर, रीडर, प्रोफेसर पहुँचते ही रहते थे। परिचय कराने वाले कहते– महाराज जी, दर्शनशास्त्र पर इनका पूरा अधिकार है। इन्होंने कबीर पर रिसर्च (शोध) किया नहीं बल्कि शोध-प्रबन्ध की जाँच कर डिग्री देते हैं। कुछ देर तक वे अपना बौद्धिक ज्ञान कहते किन्तु तदुपरान्त निवेदन करते कि महाराज! विश्व का दर्शनशास्त्र हमलोगों ने छान डाला किन्तु साधन समझ में नहीं आता, कृपा कर बतायें।

महाराज जी कहते थे, ‘‘हो! सब बात सब कोई जानत है। दो-दो पैसे में वेदान्त बिकत है। (उन दिनों गीता प्रेस-गोरखपुर से गीता दो-दो पैसे में मिल जाती थी। महाराज जी का संकेत उसी ओर था।) लोग पढ़ते हैं और न जाने क्या लिखते भी जाते हैं; किन्तु साधन ही एक ऐसी वस्तु है जो लिखने में नहीं आती। उसे तो साधक के हृदय में भगवान ही पढ़ाते हैं।’’ इस जागृति के पश्चात् ईश्वर के आदेश का पालन ही भजन है। उस आदेश में घट-बढ़ करने पर भगवान नाराज हो जाते हैं। इस जागृति के पूर्व हमें केवल इतना करना है कि एक परमात्मा के प्रति दृढ़ संकल्प हो जायँ। क्षण में भूत-पूजा, क्षण में भवानी, क्षण में भुइयाँ रानी एक प्रवंचना के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं हैं। क्योंकि ईश्वर एक से दो कभी हुआ नहीं इसलिए उस एक परम प्रभु के प्रति दृढ़ संकल्प हो जायँ।

इसके साथ ही उस परमात्मा का परिचायक दो या ढाई अक्षर का नाम– ॐ अथवा राम का जप आरम्भ करें। सतत् प्रार्थना करें कि प्रभु, हमें केवल आप चाहिए। उनसे कुछ न माँगे! मन में कहाँ क्षमता है कि कुछ सही माँग ले। मन और बुद्धि स्वयं नश्वर है तो शाश्वत को माँग कैसे लेंगे?

गो गोचर जहँ लगि मन जाई।

सो सब माया जानेहु भाई।।

(रामचरितमानस, ३/१४/३)

इन्द्रियों और इन्द्रियों के भोगों में जहाँ तक मन कल्पना कर सकता है, बुद्धि निर्णय ले सकती है सो सब माया जानेहु भाई।– वह सब-की-सब माया है, मायिक क्षेत्र का ही छोटा-बड़ा निर्णय है। भले ही आप उसका नाम अतीन्द्रिय ज्ञान रख लें या कुछ भी कह लें किन्तु वह नश्वरता का ही ज्ञान है। इसलिए भगवान से कुछ न माँगे। भगवान से केवल भगवान को ही माँग लें। उनका दर्शन माँगें। प्रभु आयेंगे तो प्रभु का सारा ऐश्वर्य आयेगा, उनका वातावरण आयेगा। प्रभु साथ हैं फिर कभी कोई कमी नहीं रहेगी। यही निष्काम कर्मयोग का रहस्य है।

इस समर्पण के साथ जो भजन में लग गया तो प्रभु जानते हैं कि इस भक्त को क्या चाहिए, वे देंगे। भविष्य में जो कुछ भी आपके लिए आवश्यक है जिसकी आपके मन में कल्पना भी नहीं है, उन सबकी व्यवस्था कर देंगे। आप जो भी माँगेंगे, वह भी देंगे और मोक्ष तो मिलना है ही; क्योंकि ईश्वर-पथ में बीज का नाश नहीं होता। इसलिए भजन करना है तो एक परमात्मा का कीजिए।

भजन के लिए चाहिए सद्गुरु; किन्तु आप दौड़कर किसी को गुरु न बना लें। उसके लिए भगवान से प्रार्थना करें, भगवान स्वयं सद्गुरु ढूँढ़कर छप्पर फाड़कर दे देंगे–

संत बिसुद्ध मिलहिं परि तेही।

चितवहिं राम कृपा करि जेही।।

(रामचरितमानस, ७/६८/७)

विशुद्ध संत उसी को मिलते हैं परम प्रभु राम जिसकी ओर करुणा कर देख लें। उनकी कारुणिक दृष्टि अपनी ओर झुकायें। उसके लिए एक प्रभु के प्रति समर्पित होकर सतत् प्रार्थना में लग जायँ। भगवान् शीघ्र ही करुणा करते हैं और जब वे द्रवित होते हैं तो सन्त सद्गुरु जहाँ जिस स्थिति में हैं, आपको बोध करा देते हैं–

मन क्रम बचन छाड़ि चतुराई।

भजत कृपा करिहहिं रघुराई।।

(रामचरितमानस)

अरब में एक महापुरुष हुए थे। भगवान इण्डिया के, यूरोप के या किसी क्षेत्र-विशेष के नहीं होते। वह कण-कण में व्याप्त, सर्वत्र हैं। भू-भागों के नामकरण वैसे ही हैं जैसे हमने अपने गाँव में ही मेंड़ बाँध रखी है कि यह आपका खेत और यह हमारा! ऐसे ही लोगों ने संसार को बाँट रखा है कि यह जर्मनी है यह जापान, यह इण्डिया है वह पाकिस्तान! परमात्मा की दृष्टि में पृथ्वी एक छोटा-सा नक्षत्र है। इसलिए भूतल पर कोई कहीं भी भगवान को प्राप्त कर सकता है।

हाँ, तो अरब में येरूशलम में एक महात्मा मूसा हुए थे। हजरत मूसा में भगवान की विभूतियाँ जागृत थीं। लगभग इकतालीस वर्ष की अवस्था में भगवान ने उन्हें कुछ निर्देश दिये। एक बार वह जहाँ-तहाँ उपदेश देते हुए विचरण कर रहे थे। सड़क के किनारे एक युवक बैठकर परमात्मा की स्तुति कर रहा था। उसकी आँखों में अश्रु, हृदय द्रवित था। वह स्तुति में तल्लीन था। हजरत मूसा ने पीछे से सुना। उस युवक को बड़ी जोर से झिड़का– मूर्ख! तुम स्तुति को गलत पढ़ रहे हो, इस प्रकार उच्चारण शुद्ध करके पढ़ो। वह बेचारा काँप गया और लगा व्याकरण रटने। वह दु:खी हो गया कि प्रभु, हमने आपको गलत ढंग से पुकारा, मेरे इस अपराध के लिए आप कृपया क्षमा करें। मूसा को आकाशवाणी हुई– मूसा! मैंने तुझे इन जीवों का उद्धार करने भेजा था, इन जीवों को मुझसे जोड़ने के लिए भेजा था न कि तोड़ने के लिए। पहले यह स्तुति कर रहा था, इसका मुझसे सीधा सम्बन्ध था, वह तो समाप्त हो गया। अब बेचारा भाषा रट रहा है। मूसा ने परमात्मा को साष्टांग दण्डवत् किया और लौटकर उस युवक से कहा– भाई! मुझसे भूल हुई! तुम जैसे पहले स्तुति कर रहे थे, वैसा ही करो। अस्तु, भगवान के यहाँ प्रेम चलता है, भाषा-व्याकरण या लच्छेदार बातें नहीं चलतीं।

हमारे पूज्य गुरु महाराज पार्थिव शिक्षा में निरक्षर थे किन्तु जब उनकी वाणी निकलती तो विद्वानों की विद्वता का कोई उपयोग नहीं रह जाता था। महाराज जी कहा करते थे– ‘‘हो, हम कहें आँखिन की देखी, तुम कहो कागज की लेखी; भला हमार तोहार मनवा एक कैसे हो?’’ ईश्वर-पथ आँखों देखा हाल है। भजन कैसे करें?– इस विषय में लोग केवल भाषा के द्वारा व्याकरण ही रटते हैं। संस्कृत को देववाणी कहा जाता है। इसका शुद्ध उच्चारण कर लेना ईश्वर-प्राप्ति का साधन नहीं है। बहुत से लोग व्रत-उपवास पर जोर देते हैं, बहुत-से लोग कुछ सब्जियों को त्याज्य मानते हैं, बहुत से लोग मूर्तियों के आगे-पीछे नियमावलियों का पालन करते हैं; किन्तु इनसे बहुत मतलब नहीं है। जैसा स्वयं परमात्मा ने भजन के लिए स्वयं निर्देश दिया है, हमें वैसे ही भजन करना चाहिए।

लोग कहते हैं कि ईश्वर का ध्यान धरें! ईश्वर को आपने देखा है? वह तो अमूर्त है, अरूप है। फिर ये मूर्तियाँ क्या हैं? समय-समय पर जो महापुरुष हुए हैं, सद्गुरु रहे हैं, परमात्म-भाव को प्राप्त हुए हैं– ये उनके चित्र हैं। कालान्तर में मन्दिर और मूर्तियों से जीविका चलने लगी तो अनेक कल्पित देवी-देवताओं का सृजन हो गया। कहीं भुँइया रानी, कहीं गड़बड़ा देवी, लाठियों से कोई मर गया तो एक ब्रह्म का नाम देकर अच्छी खासी पूजा आरम्भ कर देते हैं। एक सन्तोषी माई का नाम आधुनिक युग की देन है। मनुष्य को किसी न किसी प्रकार का असन्तोष रहता ही है। इस मनोवृत्ति का लाभ उठाकर चलचित्र वालों ने गणेश की पुत्री के रूप में सन्तोषी माँ का प्रचलन कर दिया। हमारे मीरजापुर जनपद में एक हाई माई हैं। एक पत्थर में लाल रंग लगा दिया, पुजारियों की भीड़ लग गयी। पूजन का यह कोई तरीका नहीं है। अस्तु बहुत-सी मूर्तियाँ कल्पित हैं; किन्तु अनेकानेक मन्दिरों में समय-समय पर होने वाले महापुरुषों की प्रतिमाएँ हैं।

मूर्तियाँ आवश्यक हैं, उनका उपयोग है, उन्हें रखना भी चाहिए कि उन्होंने क्या किया? क्या पाया? ईश्वर रहता कहाँ है? उसे ढूँढ़ने का उपाय क्या है? उसकी विधि बताने के लिए, उनसे आशीर्वाद लेने के ाfलए, उनकी स्मृति सँजोने के लिए मूर्तियाँ लगायी जाती हैं यद्यपि दीर्घकाल बीतने पर लोग भूल जाते हैं कि ये मूर्तियाँ किसकी हैं, केवल एक परम्परा रह जाती है। सन्त रहीम कहते हैं–

जिन देखा सो कहा नहिं, कहा सो देखा नाहिं।

रहिमन अगम बात के, कहन सुनन को नाहिं।।

जिन्होंने देखा उन्होंने कहा ही नहीं। कह कबीर गूँगे की शक्कर, खाये सोई पै जाने।– शक्कर खाने पर गूँगा उसका स्वाद जानता है, सिर हिलाता है, प्रसन्न होता है किन्तु उसे मुख से व्यक्त नहीं कर सकता, उसके पास वाणी नहीं है। ठीक इसी प्रकार उन परमात्मा को जिन्होंने देखा, उन्होंने कहा ही नहीं; जो कहता है उसने अभी देखा नहीं। वह परमतत्त्व अगम्य है, अगोचर है, अचिन्त्य है। आप ही बतायें इन मूर्तियों का क्या अस्तित्व है? क्या इन पत्थरकटों को ज्ञात है कि भगवान कैसे हैं?

राजस्थान की राजधानी जयपुर महानगर शिल्पकारों का केन्द्र है। वहाँ के मूर्ति कलाकार करोड़ों रुपयों की मूर्तियाँ प्रतिदिन बेच लेते हैं क्योंकि वहाँ संगमरमर की खदानें हैं। आधी मूर्तियाँ चौराहों पर स्टेच्यू में काम आती हैं, शेष मन्दिरों में जाती हैं। क्या इन सबने परमात्मा को देखकर मूर्तियाँ तराशी हैं? इनमें से अधिकांश काल्पनिक हैं। इसीलिए ध्यान उसी का धरें जिसके लिए परमात्मा राम ने, भगवान श्रीकृष्ण ने, गोस्वामी तुलसीदास जी ने इंगित किया– ध्यान विश्वनाथ अर्थात् विश्व के जो स्वामी हैं ऐसे सद्गुरु के चरणों का, प्राप्ति परमात्मा की!

विश्व में बहुसंख्यक लोग ऐसे हैं कि जिन्हें मात्र उनके घर के ही लोग जानते हैं, बाहर के लोग उन्हें नहीं जानते। कुछ ऐसे भी लोग हैं जिन्हें पास-पड़ोस, गाँववाले अथवा मुहल्ला वाले जानते हैं। बहुतों को जिला जानता है, कुछेक ऐसे भी है जिन्हें सम्पूर्ण देश जानता है, ऐसे भी हैं जिन्हें पूरा विश्व जानता है। गुरुनानक कहते हैं– नवा खण्डा बिच जानिये, नाल चले सबु कोइ।– सम्पूर्ण जगत् जान ले कि इस नाम का कोई व्यक्ति संसार में है, लोग यह भी चाहते हैं कि सभी मेरे पीछे चलें। उसका कदम जिस ओर उठ गया, लाखों कदम उधर उठ गये; उसने जो कह दिया, विश्व के सभी समाचार-पत्र उसकी वार्त्ता प्रकाशित करने लगें, उसके पदचिह्नों को अनुसरण करने लगें और चंगा नाम धराइ के जसु कीरति जग लेइ।– अच्छे नाम, अच्छे पदक, ऊँचे कीर्तिमान, दुनिया में यश कीर्ति सब कुछ मिल जाय किन्तु जो तिसु नदरि न आवइ, ता बात न पूछे केइ।– यह सब कुछ प्राप्त हो जाने के बाद भी यदि व्यक्ति भगवान की निगाह के नीचे नहीं आया तो वह किसी काम का नहीं है, कुछ भी नहीं है। ईश्वर की कृपादृष्टि नहीं पड़ी तो यह सब व्यर्थ हैं क्योंकि संसार नश्वर है, इसकी उपलब्धियों का भी कोई अस्तित्व नहीं है। इस अस्तित्वविहीन संसार में जो प्रभु की शरण, उनकी निगाह के नीचे आ गया, उसका कभी विनाश नहीं होता। इसीलिए भजन किया जाता है और सबको करना भी चाहिए।

भजन में सहसा मन नहीं लगता किन्तु अभ्यास करते-करते एक स्तर ऐसा आता है कि भगवान की कृपादृष्टि हो जाती है जिससे भगवान का स्वभाव जानने में आ जाता है और जिसने भी प्रभु का स्वभाव जान लिया–

उमा राम सुभाउ जेहिं जाना।

ताहि भजनु तजि भाव न आना।।

(रामचरितमानस, ५/३३/३)

उसे भजन के अतिरिक्त अन्य कुछ भी अच्छा नहीं लगता। सृष्टि में ऐसा कोई पदार्थ नहीं कि उसे वहाँ से भटका कर खड़ा कर दे। कौन-सी कमी थी महात्मा बुद्ध के पास? इकलौता राजकुमार! राज्य का उत्तराधिकारी! पिता को सन्देह हो गया कि कहीं यह साधु न हो जाय क्योंकि ज्योतिषियों ने कहा था– यह बालक चक्रवर्ती नरेश होगा या साधु! राजा उसकी सुख-सुविधा के प्रति सजग थे। बगीचे में ऐसे वृक्ष लगवाये जिसमें पतझड़ न हो। झड़ती हुई पत्तियों को देखकर इसे वैराग्य न हो जाय कि इसी की तरह संसार भी झूठा है, एक दिन इन्हीं पत्तियों की तरह मैं भी समाप्त हो जाऊँगा। राजकुमार के समक्ष कोई वयोवृद्ध, कोई रोगी न जाने पाय, कोई शव न दिखाई पड़े; कहीं इन्हें देखकर इसे वैराग्य न हो जाय। इन तमाम सतर्कताओं के होते हुए भी समय आने पर राजकुमार के समक्ष वृद्ध भी आया, रोगी भी और शव भी! राजकुमार चिन्तामग्न हो गये। अर्द्धरात्रि में उन्होंने गृहत्याग कर दिया और यह ढूँढ़ने निकल पड़े कि मृत्यु का कारण क्या है? सत्य क्या है? जीवन क्या है? क्या इतना ही जीवन है कि खाओ, पीओ और मर जाओ या इसके आगे कोई सत्य और भी है?

लोग कहते हैं भजन क्यों करें? सत्य की शोध करने के लिए, मौत से अपना बचाव करने के लिए, सहज सुख आत्मदर्शन की प्राप्ति के लिए भजन किया जाता है क्योंकि इस समय जो हमें-आपको प्राप्त है, उसका कोई भरोसा नहीं है। राजकुमार ने अपनी व्यवस्थाओं में कमी देखी, तुरन्त निकल पड़े।

गृहत्याग करना इतना आसान भी नहीं है। नवजात शिशु का मोह राजकुमार के समक्ष आया। चार-पाँच दिनों तक इस मोह से लड़ते रहे। अन्तत: उन्होंने विचार किया– जैसे मेरा जन्म हुआ था, वैसा ही इसका भी हुआ है। मेरे जन्म की तरह इसके जन्म पर भी वाद्ययन्त्र बजे। जैसे मैं युवा हुआ और जीर्ण हो जाऊँगा, वैसे ही यह भी होगा। जो दशा मेरी, वही मेरे पड़ोसी की और इस आत्मा की भी है। मैं अवश्य पता लगाऊँगा कि इन दु:खों का कारण क्या है? सहज सुख कहीं है भी या नहीं? इसी शोध के लिए बुद्ध निकल पड़े।

तत्कालीन राजा-महाराजाओं ने राजकुमार से बहुत आग्रह किया कि वह राज्य करें। मगध सम्राट विम्बिसार ने अनुरोध किया कि हमारा आधा राज्य ले लें अथवा दान लेने से झिझक रहे हैं तो तलवार के बल पर आपके लिए राज्य स्थापित किये देते हैं। आप राज्य करने योग्य हैं, सुख भोगने योग्य हैं। यह उम्र तपस्या की नहीं है। किन्तु बुद्ध ने कहा– ‘‘राजन्! मैंने किसी के भय से या राग-द्वेष के कारण गृहत्याग नहीं किया है। मैंने जानबूझकर यह जानने के लिए गृहत्याग किया है कि दु:ख का कारण क्या है और शाश्वत सत्य क्या है? या तो मैं इसे जानूँगा या मृत्यु को प्राप्त होऊँगा। सृष्टि और यहाँ तक कि स्वर्ग में भी ऐसा कोई प्रलोभन नहीं है जो मुझे अपने लक्ष्य से विचलित कर दे।’’ शीघ्र ही राजकुमार सिद्धार्थ को बुद्धत्व की प्राप्ति हुई, स्थिति मिली। उन्होंने बताया कि दु:खों का कारण है इच्छा! पाप के मूल में है कामनाएँ; जैसा आदिशास्त्र गीता में है– काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भव: (गीता, ३/३७); विगतेच्छाभयक्रोधो य: सदा मुक्त एव स: (गीता, ५/२८); सर्वसंकल्पसन्न्यासी योगारूढस्तदोच्यते। (गीता, ६/४); नि:स्पृह: सर्वकामेभ्यो युक्त इच्युच्यते तदा। (गीता, ६/१८)।

सन्त कबीर कहते हैं–

इच्छा काया इच्छा माया, इच्छा जग उपजाया।

कह कबीर जे इच्छा विवर्जित, ता कहँ पार न पाया।।

इच्छा ही काया है, इच्छा ही माया है, इच्छा ने ही जगत् की सृष्टि की है। जिसने इस इच्छा का निरोध कर लिया, उसका पार कोई नहीं पा सकता; क्योंकि वह अपार अनन्त ब्रह्म में प्रवेशवाला हो जाता है इसलिए अपार स्थिति पा लेता है। सृष्टि के किसी पदार्थ से किसी की इच्छापूर्ति कभी नहीं हुई है। सांसारिक वस्तुएँ पके आम की तरह चार दिन में सड़कर समाप्त हो जाने वाली हैं। इससे इच्छा-तृप्ति कैसे होगी? जो हमने पाया वह नश्वर था। हमारे देखते-देखते उसे नष्ट होना है और हम भोक्ता को भी चले जाना है। भोग्य पदार्थ यहीं रह जायेगा और हमें भी उन्हें छोड़ जाना है। ऐसी परिस्थिति में इच्छा की पूर्ति परमात्मा दर्शन में है। आत्मदर्शन और आत्मस्थिति के पश्चात् आगे कोई सत्ता ही नहीं जिसकी हम कामना करें। इच्छा भी करें तो किसकी करें! इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने कहा–

तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्। (गीता, १८/६२)

उसके कृपा-प्रसाद से तुम परम शान्ति प्राप्त कर लोगे और उस स्थान को पा जाओगे जो शाश्वत है। स्थान का आशय है घर! वहाँ आपका निवास शाश्वत होगा। क्या सृष्टि में ऐसी कोई ईंट बनी है जो शाश्वत हो? मकान लौह-इस्पात निर्मित हो तो भी क्या हुआ? क्या ये किले शाश्वत हैं जिनकी पचीसों फीट चौड़ी दीवारें हैं? श्रीकृष्ण कहते हैं शाश्वत है वह स्थान! साथ ही परमशान्ति रहेगी। आत्मदर्शन की स्थिति में यह उपलब्धि है; बीच में, रास्ते में न ऐसा घर मिलेगा न शान्ति! जो पुरुष साधना की पूर्तिकाल में, चित्त के निरोध और विलयकाल में जहाँ आत्मा विदित हो गयी, साधक आत्मा से ओतप्रोत है, आत्मा में स्थित और तृप्त है, उस पुरुष के लिए कोई भी प्राप्त होने योग्य वस्तु अप्राप्त नहीं है तो वह चाह भी किसकी करे? उससे भी बड़ी कोई वस्तु दिखायी दे तभी वह चाह करेगा किन्तु आगे कुछ है ही नहीं। यहाँ इच्छा का अन्त हो जाता है। ऐसे महापुरुष की इच्छा इच्छाशक्ति में परिवर्तित हो जाती है और ऐसी स्थितिवाला महापुरुष भक्तों की इच्छा के अनुसार सांसारिक वस्तुओं की इच्छा कर भी ले तो–

जो इच्छा करिहहु मन माहीं।

हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं।।

(रामचरितमानस, ७/११३/४)

ऐसा महापुरुष किधर भी दृष्टि डाल दे, मन से इच्छा कर ले, किसी से कहे भी न तब भी हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं।– भगवान के कृपा-प्रसाद का प्रभाव ऐसा रहता है कि उसके लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं है। आज उसने इच्छा की, कल उसके समक्ष उपस्थित हो जायेगा किन्तु पूर्णता से पूर्व साधक इच्छा कर बैठता है वह उसके लिए घातक है। वह इच्छा उसे साधना से भटका देगी क्योंकि इच्छा काया इच्छा माया– इच्छा ही संसार में भटकाने वाली है किन्तु परमात्मा से ओतप्रोत, तृप्त और स्थिति के पश्चात् योगी में कोई इच्छा आ ही गयी तो इधर इच्छा आई, उधर पूर्ति। वह उसकी इच्छा नहीं है, हरि प्रेरित एक व्यवस्था है जिसके द्वारा इस स्तर के सन्तों की सेवा होती रहती है।

मनुष्य भजन में इसलिए प्रवृत्त होता है कि मैं अपने स्वरूप को प्राप्त कर लूँ, शाश्वत धाम पा जाऊँ, अनन्त जीवन पा लूँ, प्रकृति का भय समाप्त हो जाय और अपनी इच्छा की पूर्ण पूर्ति हो जाय। इसलिए भजन अनिवार्य है क्योंकि इस आत्मा का घर संसार में नहीं है।

ईस्वर अंस जीव अबिनासी।

चेतन अमल सहज सुखरासी।।

सो माया बस भयउ गोसाईं।

बँध्यो कीर मरकट की नाईं।।

(रामचरितमानस, ७/११६/२-३)

परमात्मा अजर, अमर, अविनाशी है, सहज सुख की राशि है। उसी का विशुद्ध अंश जीवात्मा है। यह भी सहज सुख की राशि है, ईश्वर का अंश है। यह प्रकृति के किसी पदार्थ से तृप्त हो ही नहीं सकता। यह माया के वश में भटक रही है, अपने अंशी परमप्रभु परमपिता की गोद में जाने लिए सदैव छटपटाती रहती है इसलिए भजन अनिवार्य है। यह आत्मा की माँग है। जाने अनजाने सभी लोग उस शान्ति की शोध में तड़प रहे हैं। साधना भले न मिली हो, सभी प्रत्याशी अवश्य हैं। हर पुरुष श्रद्धा से खोज अवश्य रहा है किन्तु अभी तक जो भी खोजा, धोखा निकला। अनन्त, हजारों, चारों युगों तक की उमर मिली, गुरुनानक कहते हैं– धोखा ही निकला– जे जुग चारो आरजा और दहूणी होय। चार युगों इतनी लम्बी आयु, उससे भी दस गुनी आयुपर्यन्त जीने से भी क्या लाभ? यदि ईश्वर की कृपादृष्टि नहीं हुई तो सब व्यर्थ चला जाता है। जिसने अपनी आत्मा को प्राप्त कर लिया वह सदा शाश्वत शान्ति पा गया, अनन्त जीवन पा गया, अपना धाम पा गया जहाँ से पीछे लौटकर आवागमन नहीं है। अपने ही सहज स्वरूप की प्राप्ति के लिए, सम्पूर्ण इच्छाओं के अन्त के लिए, भली प्रकार तृप्ति के लिए भजन करना मनुष्य की अपरिहार्य माँग है।

!! बोलिये श्री सद्गुरुदेव भगवान् की जय !!

(अमृतवाणी भाग-1से उद्धृत)

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