अब हम दोनों कुल उजियारी
सन्त कबीर क्रियात्मक चलकर स्थिति प्राप्त करनेवाले महापुरुष थे। उनके इस पद की व्याख्या के पहले उन्हीं का एक छोटा-सा भजन सुनें–
कोइ सफा न देखा दिल का………… रे कोई……..
बिल्ली देखा बगुला देखा, सरप जो देखा बिल का।
ऊपर ऊपर बनी सफेदी, भीतर गोला जहर का।
रे कोई……..
काजी देखा मुल्ला देखा पण्डित देखा छल का।
औरन को बैकुण्ठ बतावे, आप नरक में सरका।
रे कोई……..
पढ़े लिखे कछु वेद सासतर भरल गुमान बरन का।
कहत कबीर सुनो भाई सन्तो, लानत ऐसे तन का।
रे कोई……..
धर्म के नाम पर टोना-टोटका कुछ भी कर डालने से धर्म तो नहीं हो जाता। संत कबीर कहते हैं– एक बहुत साफ-सुथरी बिल्ली देखी, एक बगुला देखा, बिल में रहनेवाला एक सर्प देखा। बाहर से देखने पर इनमें बड़ी चिकनाई। बगुले के पंख तो एकदम सफेद! धूल और गर्द वायु में उड़ते रहते हैं किन्तु बगुले के पंख उससे प्रभावित नहीं होते। धुले वस्त्रों के लिए लोग उदाहरण देते हैं कि यह इतना बढ़िया धुल गया जैसे बगुले का पंख। सर्प के शरीर की पट्टी कितनी चिकनी और चमकदार होती है किन्तु उसके भीतर ‘गोला जहर का’। तीनों के सामने उनके आहार जीव पड़ भर जायँ, निश्चित मृत्यु को प्राप्त होते हैं।
इन उदाहरणों से समानता करते हुए संत कबीर ने कहा– हमने ‘काजी देखा….मौला देखा….पंडित देखा छल का।’ ये लोगों को बैकुण्ठ दिखाते हैं कि चल बैकुण्ठ! ऐसा वैसा कर डालो, मिल जायेगा बैकुण्ठ! इतनी दक्षिणा दो तो मिल जाय बैकुण्ठ! ‘औरों को बैकुण्ठ लखावै, आप नरक में सरका। रे कोई सफा न देखा दिल का।’ दूसरों को ये सदैव बैकुण्ठ का प्रलोभन देकर ठगते रहते हैं और स्वयं नरक की सीधी राह पकड़े हुए हैं। अर्थात् भगवान भगवान हैं, साधना साधना है। पहले हमारी वृत्ति अधोमुखी थी, अब इन्द्रियों को संयमित कर वृत्ति को इष्टोन्मुखी प्रवाहित कर दें। इतनी ही तो साधना है। इसमें लाग-लपेट की जगह ही नहीं है। इस साधना के अतिरिक्त कुछ अन्य टोना-टोटका कर कोई स्थिति प्राप्त कर ले, ऐसी कोई गुंजाइश नहीं है। प्राय: लोगों को पढ़ाई-लिखाई का बड़ा गर्व होता है। कबीर कहते हैं–
पढ़े लिखे कछु वेद सासतर, भरल गुमान बरन का।
कहत कबीर सुनो भाई सन्तो, लानत ऐसे तन का।
रे कोई सफा न देखा दिल का।।
कुछ वेद-शास्त्र पढ़ लिया तो अहंकार भर गया कि हम तो इतने विद्वान हो गये! हमारे जैसा कौन है? किसी-किसी में जाति-वर्ण का अभिमान आ जाता है कि हम इतने उच्चकुल के हैं। यह जाति-अभिमान प्राप्ति के पहले नहीं जाता। कबीर कहते हैं कि यह पार्थिव शिक्षा और वर्ण का अभिमान, शारीरिक बल और कौशल का अहंकार सरासर धोखा है। इस पर इतराने को धिक्कार है क्योंकि ईश्वर के दरबार में कुल और पार्थिव शिक्षा का कोई उपयोग नहीं है अपितु यह बाधा ही है। ईश्वर-पथ की विद्या भगवान स्वयं पढ़ाते हैं जिसे कोई अनुरागी विरही पथिक निरन्तर पढ़ता रहता है। गोस्वामीजी भी कहते हैं–
जाति पाँति धनु धरमु बड़ाई।
प्रिय परिवार सदन सुखदाई।।
सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई।
तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई।। (रामचरितमानस, २/१३०/५-६)
‘जाति’ कि मैं अमुक जाति का हूँ, कुलीन हूँ; ‘पाँति’– उनमें भी पंक्तिपावन हूँ; ‘धनु धरमु बड़ाई’– मेरे पास इतना धन, मुझमें इतना बल, इतना बड़ा मेरा समुदाय, इतना बड़ा परिवार, परिजन; इतना गुणी हूँ मैं, इतना चतुर हूँ – जो इन सबको त्याग कर आपको हृदय में धारण करता है, हे भगवन्! आप उसके हृदय में रहें। खाली पात्र में ही कुछ रखा जा सकता है। यदि मन में पहले से ही धन भरा है, बल भरा है, गुण भरा है, चतुराई भरी है, कुल और जाति का अभिमान भरा है तो भगवान कहाँ बैठे? मानस में है–
निर्मल मन जन सो मोहि पावा।
मोहि कपट छल छिद्र न भावा।। (रामचरितमानस, ५/४३/५)
निर्मल मन में ही भगवान का निवास होता है। ऐसे ही अमलात्मा महात्माओं में कबीर अप्रतिम थे। उनके जीवन में पार्थिक शिक्षा का, जातीय अभिमान का प्रश्न ही नहीं था। भजन उनमें जागृत था। ‘गगन मण्डल में पिया गोहराइल’– भगवान के निर्देशन में चलकर उन्होंने भगवान में स्थिति को प्राप्त किया था। इसी आशय का यह भजन है–
अब हम दोनों कुल उजियारी।
पाँच पुत्र तो उदर के खाये, ननद खाइ गये चारी।
पास परोसिन गोतिन खाई, तापर बुद्धि महतारी।
अब हम………
सोलह खसम नैहर के खाये, भये बत्तीस ससुरारी।
धन्य सराहूँ वाहि पुरुष को, जो सरवर करत हमारी।
अब हम………
सास ससुर पाटी में बाँधे, भसुरा को गुड़तारी।
तब कुल बोरनि सेज बिछायों, सोयो टाँग पसारी।
अब हम………
कहत कबीर सुनहु भाई साधो, संतन लेहु विचारी।
जो यह पद का अर्थ लगावे, वही पुरुष हम नारी।।
अब हम………
लड़कों का, पुरुषों का यश एक कुल तक सीमित रहता है। किसी ने कीर्तिमान बनाया तो कहा जाता है कि उसने पिता और पूर्वजों का नाम रोशन कर दिया, बालक होनहार है। किन्तु कन्याओं की कीर्ति पितु-गृह और पति-गृह दोनों को सम्मान दिलाती है। इन्हीं यश को फैलानेवाली ‘दोनों कुल उजियारी’ माता सीता थीं। उनके पिता सीरध्वज जनक ने उनके लिये संसार में सर्वोपरि वर चुना था। विवाह के लिए उन्होंने शर्त रखी थी धनुष तोड़ना! वह भी टूटा। सर्वोपरि वर भी मिला। इतना ही नहीं,
दाइज अमित न सकिअ कहि दीन्ह बिदेहँ बहोरि। (रामचरितमानस, १/३३३)
वह एक बार दहेज दे चुके थे, बहोरि अर्थात् दुबारा दिया। उन्होंने इतना अधिक दिया कि जिसका वर्णन आज तक नहीं हो सकता। उन्होंने समस्त वैभव अपनी कन्या को दिया था जिससे वह सुखपूर्वक रह सके; किन्तु सीताजी को अयोध्या आये कुछ ही दिन बीते थे कि रामजी को वनवास हो गया। सीताजी ने भी उनका अनुसरण किया। जनक जी ने चित्रकूट में तपस्विनी के वेष में साधारण-सी झोपड़ी में अपनी पुत्री को देखा,
तापस बेष जनक सिय देखी।
भयउ पेमु परितोषु बिषेखी।। (रामचरितमानस, २/२८६/१)
जनकजी को बड़ा परितोष हुआ, पूर्ण सन्तुष्ट हो गये। चक्रवर्ती सम्राट की पुत्रवधू भिखारिन हो गयी तो संतोष कैसा? खुशी कैसी? वस्तुत: जनक स्वयं एक सन्त थे, त्यागी थे, विदेह कहे जाते थे। वह जानते थे कि संसार में कोई सिंहासन पर जीवन व्यतीत करता है तो कोई फुटपाथ पर। यह जीवन तो जन्म और मृत्यु के बीच का एक पड़ाव है। यह जीवनयापन सत्य नहीं है, सत्य कुछ और है। उन्होंने अपनी पुत्री को उसी मार्ग पर पाया तो उन्हें बड़ा परितोष हुआ, बहुत ही सन्तोष हुआ। उन्होंने कहा–
पुत्रि पबित्र किए कुल दोऊ।
सुजस धवल जगु कह सब कोऊ।। (रामचरितमानस, २/२८६/२)
हे पुत्री! तुमने दोनों कुल को पवित्र कर दिया। तुम्हारा सुयश बहुत उज्ज्वल है। सभी आज यही कह रहे हैं। गोस्वामीजी की मान्यता है–
सूर, सुजान, सुपूत, सुलच्छन गनियत गुन गरुआई।
बिनु हरिभजन इँदारुन के फल तजत नहीं करुआई।
जो पै लगन राम सों नाहीं। (विनयपत्रिका, १७५)
जनक ने पाया कि उनकी पुत्री ने यह चरितार्थ कर दिया। इस प्रकार कन्या दो कुलों को पवित्र बनाती है। किन्तु सन्तों का कुल कुछ अलग ही होता है। सिद्धार्थ जब सन्त हो गये, उन्होंने ज्ञान प्राप्त कर लिया, गौतम बुद्ध कहलाये। उनके पिता महाराज शुद्धोदन ने उन्हें घर लौटाने के कई प्रयास किये; किन्तु सफलता मिलती न देख मंत्रियों द्वारा संदेश भिजवाया कि, ‘‘भगवन्! अब तो आप सन्त हो गये। आपके लिये तो सब बराबर हैं, हम पृथक् कैसे हो गये? एक दिन आप हमारे दरवाजे पर भी भिक्षा ग्रहण करें।’’ बुद्ध ने कहलाया, ‘‘राजन्! एक बार हम आपके यहाँ भिक्षा करने अवश्य आयेंगे।’’
कई महीने व्यतीत हो गये। एक दिन भगवान बुद्ध ने कहा, ‘‘क्यों भिक्षुओ! उन महाराजा के निमन्त्रण को पर्याप्त समय व्यतीत हो गया?’’ भिक्षुओं ने कहा, ‘‘हाँ, भगवन्!’’ बुद्ध ने कहा, ‘‘क्यों न इसे आज सम्पादित कर दिया जाय!’’ भिक्षुओं ने कहा, ‘‘जैसी भगवान की इच्छा!’’ भिक्षुओं के साथ बुद्ध कपिलवस्तु की ओर बढ़े। ज्योंही उन्होंने राज्य की सीमा में प्रवेश किया, सीमारक्षकों ने महाराज को दौड़कर बताया कि युवराज सीमा में प्रवेश कर चुके हैं। अब उस उद्यान में है….. अब उस गाँव में हैं…..। नगर सजने लगा। महल सज गया। कई-कई स्वागत द्वार बनाये गये, झण्डियाँ बँध गयीं। सौ-दो सौ कुमारी कन्यायें मंगल-कलश लेकर पंक्तिबद्ध खड़ी थीं। स्वस्तिवाचन करते आचार्यों से घिरे महाराज मुख्य द्वार पर मंत्रियों तथा श्रेष्ठिजनों के साथ उपस्थित थे।
दोपहर हो चला था। भगवान बुद्ध राजमहल के समीप आ गये थे। मुख्य द्वार सौ-पचास मीटर दूर दिखायी दे रहा था। अचानक भगवान बुद्ध ने शिष्यों से कहा, ‘‘क्यों? भिक्षा का समय तो हो गया भिक्षुओं!’’ वे बोले, ‘‘हाँ भगवन्! समय तो हो गया।’’ बुद्ध ने कहा, ‘‘तो भिक्षा कर लो। महाराज का निमन्त्रण कोई आज का तो है नहीं, उसे कल भी पूरा किया जा सकता है।’’ भिक्षुवृन्द तत्काल गलियों में छिटक पड़ा। भगवान बुद्ध भी एक झोपड़ी की ओर घूम पड़े, कहा, ‘‘भिक्षां देहि!’’ झोपड़ी में से एक बुढ़िया निकली। उसने कहा– ‘‘कुमार आप! आप जब छोटे थे तो मैं ही आपके भवन में साफ-सफाई किया करती थी।’’ बुद्ध ने कहा, ‘‘माते! हमने भिक्षा माँगी है।’’ वृद्धा ने कहा, ‘‘यह चमार का घर है।’’ बुद्ध ने कहा, ‘‘माते! हमने जाति तो पूछी नहीं, केवल भिक्षा माँगी है। क्या एक भिक्षु को तुम भिक्षा नहीं दोगी?’’
बुढ़िया की आँखों में अश्रु छलक आये। कदाचित् जीवन में पहली बार कोई उससे इतना प्रेम से बोला था। उसके घर में जो भी रूखा-सूखा था, लाकर भिक्षापात्र में डाल दिया। बुद्ध उसमें से कुछ खाते हुए आगे बढ़े। यह दृश्य उनके पिता महाराज शुद्धोदन देख रहे थे। बड़ी झल्लाहट के साथ वह बोल उठे, ‘‘यह सब क्या हो रहा है?’’ भगवान बुद्ध ने बड़ी शान्ति से उत्तर दिया, ‘‘राजन्! यह अपनी कुल-परम्परा का पालन हो रहा है।’’ राजा ने कहा, ‘‘कौन-सा कुल? तुम्हारे कुल के तो हम हैं। हमारे घर में ऐसा तो कभी हुआ नहीं!’’ बुद्ध ने कहा, ‘‘राजन्! शरीर तो कहीं न कहीं जन्म लेता ही है। पिछले जन्म में कोई और ही हमारे माता-पिता थे, कोई अन्य परिवार था। आज आप माता-पिता हुए हैं और यह परिवार है। जब तक अन्तिम संस्कार समाप्त नहीं हो जाता, तब तक माता-पिता, कुल-परिवारों का मिलना ही है। हम इस कुल के नहीं हैं। हम तथागत, जीवन्मुक्त महापुरुषों के कुल के हैं। राजन्! हमारे कुल की यही परम्परा है कि अमीर-गरीब सबसे भिक्षा लो, उनके दु:ख-सुख की अवस्थाओं का अध्ययन करो और वह जिस श्रेणी या जिस स्तर पर हों, वहीं से उनका उत्थान करो, उनका मार्गदर्शन करो।’’ सन्तों का स्वरूप भी यही है।
हेतु रहित जग जुग उपकारी।
तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी।। (रामचरितमानस, ७/४६/५)
बिना किसी प्रयोजन के संसार में यदि कोई नि:स्वार्थ उपकारी है तो भगवन्! एक तो स्वयं आप हैं और दूसरे आप के अंतरंग भक्त। राजा शुद्धोदन सिर पकड़कर बैठ गये। कहाँ वह राजकुँवर को बहला-फुसलाकर राजमुकुट उनके सिर पर रख वृद्धावस्था में राज-काज से मुक्त होना चाहते थे और वही राजकुमार सामान्यजनों के यहाँ भोजन करने लगा। इस प्रकार भगवान बुद्ध ने अपने कुल का परिचय दिया। एक जन्म तो माता-पिता से प्राप्त होता है जो शरीर का जन्म है, दूसरा जन्म सद्गुरु या महापुरुष की देन है जो स्वरूप का जन्म है। इसी जन्म के लिये आदि शंकराचार्य ने कहा है कि वही जन्म सराहनीय है जिसके पीछे मृत्यु न हो और वही मृत्यु सराहनीय है जिसके पश्चात् पुनर्जन्म न हो। उस सहज स्वरूप की प्राप्ति का एकमात्र कुल है सद्गुरु का दरबार!
इसी प्रकार भगवत्पथ में दो कुलों की मान्यता है– उपासक की सगुण तथा निर्गुण अवस्था। यह एक ही साधक की क्रमोन्नत अवस्था है। दो तरह की उपासना नहीं होती।
अगुन अरूप अलख अज जोई।
भगत प्रेम बस सगुन सो होई।। (रामचरितमानस, १/११५/२)
परमात्मा जो अलख है, लखने में नहीं आता; अरूप है, अमूर्त है, अजन्मा है, वही भक्त के प्रेम से विवश होकर सगुण हो जाता है। जब वह आत्मा से रथी होकर मार्गदर्शन करता है तो सगुण है और उन्हीं के संरक्षण में चलकर जब साधक उन्हें प्राप्त करता है तो ‘जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।’ (रामचरितमानस, २/१२६/३) उसी भाव को प्राप्त हो जाता है तब उसकी रहनी निर्गुण हो जाती है। निर्गुण एक स्थिति है। साधना जब चलती है सगुण से चलती है। सगुण उपासक ही साधना की पराकाष्ठा पर निर्गुण रहनी प्राप्त कर लेता है। यही साधक के दो कुल हैं। दोनों एक ही साधक में फलित होते हैं। संत कबीर कहते हैं– आज दोनों कुल मुझमें प्रकाशित हैं। मैं उनसे प्रतिबिम्बित हूँ।
अब हम दोनों कुल उजियारी।
कई अन्य पदों की तरह इस पद में भी कबीर ने अपने को एक नारी के रूप में चित्रित किया है। यह अस्वाभाविक प्रतीत होता है। वस्तुत: भजन शरीर नहीं करता। शरीर तो एक मकान है। मकान क्या खाक भजन करेगा? आपसे या माताओं से जब भी भजन पार लगता है, एक इष्टोन्मुखी लगन जागृत हो जाती है, वही भजन करा लेती है। लौ रूपी लड़की! इसकी नारी संज्ञा है। यदि यह लौरूपी लड़की जागृत नहीं हुई तो कोई कितना भी ध्यान लगाये, आँख मूँदे– सब व्यर्थ चला जाता है।
का मुद्रा माला के फेरे चंदन घिसे लिलारा।
जटा रखावत मूड़ मुड़ावत अंग लपेटत छारा।
अवधू भजन भेद कछु न्यारा।।
माला फेरने से, चंदन घिसने से, सिर मुड़ाने से या विभूति पोतने से क्या होगा? कुछ भी नहीं! भजन का रहस्य कुछ अन्य ही है। वह जहाँ जागृत हो गया, इष्टोन्मुखी लगन जागृत हो गयी फिर संसार में ऐसा कुछ भी नहीं है कि भगवान की राह से उसे विचलित कर दे। माता मीरा को लगन लग गयी तो जहर का प्याला, शूली की शय्या, देश निकाला इत्यादि विघ्न उसे लक्ष्य से विचलित नहीं कर पाये।
इसी प्रकार बालक ध्रुव का कथानक है। ध्रुव के पिता की दो रानियाँ थीं। छोटी रानी से उनके पिता का लगाव अधिक था। एक दिन पाँच वर्ष का बालक ध्रुव पिता की गोद में बैठना चाहा तो छोटी माता ने उसे गोद से उतार कर कहा, ‘‘राजा की गोद में बैठने के लिए तुम्हें मेरी कोख से जन्म लेना चाहिए था।’’ रोते हुए ध्रुव ने अपनी माँ से पूछा, ‘‘इसमें मेरा क्या दोष है? मुझे क्या करना चाहिए कि मैं पिता की गोद में बैठ सकूँ?’’ उसकी माँ ने कहा, ‘‘भगवान का भजन कर तो शायद तू उस लायक हो जाय!’’ ध्रुव भगवान की शोध में निकल पड़ा। राजा को ज्ञात हुआ तो उसने मंत्रियों से कहलवाया कि अब तक तुम माँ-बेटे को खाने के लिये प्रतिदिन एक किलो आटा मिलता था, यदि ध्रुव लौट आये तो आज से वह दो किलो मिलने लगेगा। ध्रुव ने विचार किया, अभी तो हमने भजन किया ही नहीं, भगवान की राह में अभी दो कदम ही रखा है,
जिन्ह प्रभु कीन्ह सेर से दूना।
ताके भवन कुछहू नहिं सूना।।
केवल दो कदम रखने का यह परिणाम? सेर का दो सेर कर दिया जिस भगवान ने, उनके घर में नि:सन्देह किसी वस्तु का अभाव नहीं हो सकता। अब तो मैं उन्हें प्राप्त करके ही लौटूँगा। जंगल में शेर-चीतों का भय, अनेकानेक विघ्न आये; किन्तु उनकी श्रद्धा पुष्ट होती ही गयी। लौ लग गयी। ध्रुव ध्रुव हो गये अर्थात् अचल पद पा गये। प्रह्लाद को खौलते तेल के कड़ाह में डाला गया, हाथियों से कुचलवाया गया किन्तु न उसकी लगन कमजोर पड़ी, न भगवान का योगक्षेम कमजोर पड़ा। भजन के लिये लौ अनिवार्य है। रामचरितमानस में है–
बड़े भाग मानुष तनु पावा।
सुर दुर्लभ सब ग्रन्थन्हि गावा।।
साधन धाम मोच्छ कर द्वारा।
पाइ न जेहिं परलोक सँवारा।। (रामचरितमानस, ७/४२/७–८)
बड़े भाग्य से मानव-तन मिला है। यह देवदुर्लभ है। खाना-पीना, मरना-जीना तो हर शरीर में है। इस मानव-तन में ऐसी कौन-सी विशेषता है? इस पर गोस्वामी जी कहते हैं– यह साधन धाम है। क्षेत्रीय बोलचाल की भाषा में साधन के कई आशय लिये जाते हैं; जैसे– पूर्वी उत्तर प्रदेश में लोगों से पूछिये कि आप कैसे आये हैं? वे कहते हैं– साधन से आये हैं अर्थात् बस से आये हैं। बाँदा जिले में पूछिये कि आजकल क्या हो रहा है? तो कहते हैं– साधन के चक्कर में पड़ा हूँ। साधन अर्थात् आटा-भाटा, भोजन का प्रबन्ध करना। गोस्वामी जी कहते हैं– यह साधन नहीं बल्कि वह साधन जो आपको मोक्ष प्रदान कर दे, आवागमन से मुक्ति प्रदान कर दे। उस मुक्ति के लिये विवेक, वैराग्य, श्रद्धा, समर्पण, टेक इत्यादि जितना भी साधन चाहिये, वह सब इस मानव-तन में भरकर भगवान ने आपको जन्म दिया है। इसे पाकर जो अपना निजी परलोक नहीं सँवार लेता–
सो परत्र दु:ख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताइ।
कालहि कर्महि ईश्वरहि मिथ्या दोष लगाइ।। (रामचरितमानस, ७/४३)
वह जन्मान्तरों में दु:ख पाता है। काल, कर्म और ईश्वर को व्यर्थ ही दोष देता है। यह है साधन-धाम! धाम माने आपका घर। भला घर कौन-सा भजन करेगा? इसमें जागृत होती है इष्टोन्मुखी प्रवृत्ति! लौरूपी लड़की! लौ इतनी उन्नत हो गयी कि कबीर कह उठते हैं–
‘अब हम दोनों कुल उजियारी।’
‘अब’ और ‘तब’ में पूरब और पश्चिम का अन्तर है। दो-एक उदाहरण लेते हैं। मान लें, खेत की मेड़ पर किसी ने कुछ अधिक ही जोत लिया। लड़कों ने लाठी चला दी। मुकदमा चल गया। जिले के न्यायालय से उच्च न्यायालय चले गये। सर्वोच्च न्यायालय तक आने-जाने लगे। दो-तीन बीघे खेत बिक गये। किसी तरह अनुकूल पासा पड़ गया, अब कहीं जान में जान आयी। जब आँखों से घूर रहे थे तब नहीं; जब खींच-खींच कर डण्डा चलाते थे तब नहीं, अब जब समाधान निकल आया।
इसी प्रकार कन्या के विवाह में प्राय: वर ढूँढ़ते दो-चार वर्ष लग जाया करते हैं। किसी तरह दो-चार बिस्वा बेचकर बिटिया के हाथ पीले करते बन गया तो अब कहीं जान में जान आयी। ‘अब’ शब्द कार्य की पूर्ति का द्योतक है। कबीर भी कहते हैं– ‘अब’। एक ऐसी स्थिति मुझमें देखने को मिली कि दोनों कुल – निर्गुण कहलानेवाला अविनाशी, सर्वत्र व्याप्त ब्रह्म और सगुण कहलानेवाला दयालु परमात्मा दोनों का प्रकाश मुझमें प्रकाशित है, एक साथ विद्यमान है। इसके लिये आपने क्या किया? कबीर कहते हैं–
पाँच पुत्र तो उदर के खाये, ननद खाइ गये चारी।
उदर के पाँच पुत्र अर्थात् छिति, जल, पावक, गगन और समीर– ये पञ्च महाभूत ही उदर में आने के कारण बनते हैं। बार-बार जन्म और पोषण के कारण इन पञ्च महाभूतों की गति को हमने शान्त कर लिया। अब ये हमारे लिये शरीर का निर्माण नहीं कर सकेंगे। साधना की ऐसी स्थिति आ गयी कि ये पञ्च महाभूत परमतत्त्व परमात्मा में लीन हो गये।
‘ननद खाइ गये चारी’– भजन की चारों स्थितियाँ समाप्त हो गयीं। साधना के कई अंग हैं– नाम, रूप, लीला और धाम। इसमें सर्वप्रथम और प्रमुख अंग है नाम। नाम से ही साधना की जागृति होती है और परिणाम देकर ही नाम शान्त होता है, बीच में कहीं विराम नहीं है। एक ही नाम को चार श्रेणियों से जपा जाता है– बैखरी, मध्यमा, पश्यन्ती और परा।
बैखरी उसे कहते हैं जो व्यक्त हो जाय। आप इस ढंग से जप करें कि ओम्….ओम् या राम….राम सबको सुनायी पड़े। खूब लौ लगाकर जप करें। जब अभ्यास थोड़ा सूक्ष्म हुआ, मन में और टिकने की क्षमता आयी तो मध्यमा! मध्यम अर्थात् धीरे-धीरे। यह उच्चारण कण्ठ से होता है। जिह्वा का हल्का-सा सहारा दें, नाम का उच्चारण इतना धीरे से करें कि वह केवल आपको सुनायी पड़े, पास में और कोई बैठा हो तो उसे सुनायी न दे। आप उच्चारण स्वयं करें और सुनें भी स्वयं। चौबीस घण्टे बैखरी से जपें किन्तु यदि दस-पाँच मिनट भी मध्यमा से जपने की क्षमता आ जाय तो यह उसकी बराबरी कर लेगा।
वाणी जप की तीसरी उन्नत अवस्था पश्यन्ती है। नाम वही है केवल चिन्तन के तरीके में परिवर्तन होता है। इस पश्यन्ती वाणी के जप का उतार-चढ़ाव श्वास पर है। अब आप मन को द्रष्टा बनाकर खड़ा भर कर दें, श्वास को देखा भर करें कि साँस कब अन्दर गयी, कितनी देर तक रुकी और कब लौटकर बाहर आयी। जहाँ मन भली प्रकार खड़ा होकर साँस को देखने लगे तब आहिस्ते से चिन्तन में नाम ढाल दें। साँस आयी तो ओम्, गयी तो ओम्! ओम्…ओम्… ओम्…ओम्…। कदाचित् आप राम जपते हैं, साँस आयी तो ‘रा’, गयी तो ‘म’; इस प्रकार साँस के साथ नाम जप करें। साँस को घटायें, बढ़ायें नहीं। बच्चों में बच्चों-जैसी, वृद्धों में वृद्धों-जैसी और युवकों में युवक-जैसी साँस तो चलती ही रहती है। इसका क्रम कभी नहीं टूटता। यह परमात्मा की माला है– ‘निरञ्जन माला घट में फिरे दिन–रात।’ साँस की यह माला रात-दिन चलती ही रहती है। साँस स्वाभाविक जैसे चलती है, उसी में नाम ढाल दें। कुछ दिन इसे ढालना पड़ेगा और फिर साँस में ढला-ढलाया नाम जागृत हो जायेगा।
पूज्य गुरु महाराज कहा करते थे कि साँस सिवाय नाम के और कुछ कहती ही नहीं। मन को सब ओर से समेटकर श्वास में लगा भर दो। श्वास को देखा भर करें। जहाँ श्वास में नाम ढला-ढलाया मिला, जागृत हुआ, तहाँ नाम-जप की पश्यन्ती अवस्था आ गयी। पश्य माने देखना! जब श्वास देखने की क्षमता आ जाती है, श्वास में प्रसुप्त नाम सुनायी देने लगता है।
पश्यन्ती की परिपक्व अवस्था परा में प्रवेश दिला देती है। फिर तो ‘जपे न जपावे, अपने से आवे’। न मन को जपने के लिए बाध्य करें और न जपें, फिर भी जप आपका पिण्ड न छोड़े। एक बार सुरत लग गयी, लौ लग गयी तो ओम्…ओम्…ओम्… धुन प्रवाहित हो गयी। भजन के आरम्भ में मन का धरातल वासनाओं की ओर भागना होता है; किन्तु बैखरी, मध्यमा, पश्यन्ती के पश्चात् जहाँ परा में प्रवेश मिला तो मन की खुराक वही जप हो जायेगा। साँस बाँस की तरह एकदम तैल धारावत् खड़ी हो जायेगी। इसी जप का नाम अजपा भी है। अजप अर्थात् न जपो। हम न जपें और जप हमारा साथ न छोड़े। यही अजपा परावाणी है।
प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी। (रामचरितमानस, ७/७१/७)
भगवान प्रकृति से परे हैं, परम पुरुष हैं, परमतत्त्व हैं। यह उस परम में प्रवेश दिला देनेवाली वाणी है इसलिए इसका नाम है परावाणी। अब उस परमतत्त्व परमात्मा को प्राप्त करने के लिए वाणी में कोई परिवर्तन नहीं लाना पड़ेगा। परावाणी की परिपक्व अवस्था में–
जप मरे अजपा मरे, अनहदहू मरि जाय।
सुरत समानी शब्द में, ताहि काल न खाय।।
जप आवश्यक है। मरे का अर्थ यह नहीं कि हम जप शुरू ही न करें। हमारे पास था क्या जो मर गया? जब कुछ है ही नहीं तो मरेगा क्या? इसलिए जप तो आवश्यक है, अनिवार्य है किन्तु अजपा की जागृति के साथ जप अजपा में परिवर्तित हो गया। यह अजपा भी परिवर्तित हो जाता है। अजपा मरे कब? जब अनहद की पकड़ आ जाय। यह ‘अनहदहू मरि जाय’। वह कब? जब ‘सुरत समानी शब्द में’। सुरत मन की दृष्टि का नाम है। यह जब शब्द में समा गयी अर्थात् श्वास में उठनेवाले शब्द में समा गयी, चित्त का निज स्वरूप शून्य हो गया, शब्द मात्र रह गया– ‘ताहि काल ना खाय’– तत्क्षण काल से परे अकाल पुरुष परमात्मा आपमें दृष्टि बन जायेंगे, सामने स्वयं खड़े हो जायेंगे, आप नहीं समझेंगे तो भी समझा लेंगे, आप नहीं मानेंगे तब भी वह मना लेंगे; क्योंकि भगवान सर्वसमर्थ सत्ता का नाम है।
‘ननद खाइ गई चारी’
नेह आनन्द स ननद! नेह का बड़ा महत्व है–
नेह निभाया ही सरे, छोड़े सरे न आन।
तन दे धन दे शीश दे, नेह न दीजै जान।।
नेह अर्थात् स्नेह! स्नेह का निर्वाह करने पर ही ‘सरै’ अर्थात् आपकी कार्यसिद्धि होगी, आपको सफलता मिलेगी। ‘छोड़े सरै न आन’– स्नेह छोड़ देने से अन्य किसी भी विधि से कभी सफलता नहीं मिलेगी। इसलिए तन देना पड़े, धन देना पड़े, मन देना पड़े– सब कुछ देना पड़े तब भी दे डालो। इतने में भी यह सौदा पट जाता है तो महँगा नहीं है; किन्तु ‘नेह न दीजै जान’– स्नेह को मत जाने दो। स्नेह का निर्वाह होने पर ही प्रभु के दर्शन हो सकते हैं। मानस में प्रभु के अवतरण के लिये धेनुरूपधारी पृथ्वी समेत सभी देवताओं की समवेत प्रार्थना में इसी रहस्य का उद्घाटन किया गया है। सबकी समस्या थी कि भगवान को कहाँ पायें कि उन्हें अपनी विपत्ति सुनायें। देवताओं ने कहा– बैकुण्ठ चलो। किसी ने क्षीरसागर की यात्रा का सुझाव दिया। भगवान शंकर भी उसी समाज में थे–
तेहिं समाज गिरिजा मैं रहेऊँ।
अवसर पाइ बचन एक कहेऊँ।। (रामचरितमानस, १/१८४/४)
इतने वक्ताओं के बीच शंकर जी को बोलने का अवसर ही नहीं मिल पा रहा था। ज्योंही उन्हें अवसर मिला, ‘बचन एक कहेऊँ’। उन्होंने बताया– भगवान बैकुण्ठ में या क्षीरसागर में नहीं रहते, सर्वत्र समान रूप से हैं। वह यहाँ भी, इस क्षण भी विद्यमान हैं,
हरि ब्यापक सर्बत्र समाना।
प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना।। (रामचरितमानस, १/१८४/५)
प्रेम से वह प्रकट हो जाते हैं। ‘मैं जाना’– यह तथ्य हमारा जाना हुआ है। हमने यह सुना नहीं, पढ़ा नहीं अपितु जाना है। इसी प्रेम को भगवान श्रीकृष्ण ने श्रद्धा कहकर व्यक्त किया है। भगवान कहते हैं– श्रद्धाविहीन होमा हुआ हवन, दिया हुआ दान, किया हुआ कर्म, तपा हुआ तप और जपा हुआ जप सब व्यर्थ चला जाता है जैसे कुछ हुआ ही नहीं।
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति।। (गीता, ४/३९)
अर्जुन! श्रद्धावान् संयतेन्द्रिय पुरुष ज्ञान प्राप्त करता है। जिस क्षण ज्ञान तत्क्षण स्थिति प्राप्त करता है। श्रद्धा, प्रेम, भाव, नेह, स्नेह इत्यादि पर्यायवाची शब्द हैं। ‘ननद खाइ गई चारी’– चार अर्थात् बैखरी, मध्यमा, पश्यन्ती और परा में जो नियम चल रहा था, इनमें स्नेह का जो प्रवाह था, चौथी सीढ़ी पार कर लेने पर अब उस स्नेह की भी जरूरत नहीं रह गयी, नियम की आवश्यकता समाप्त! आगे कोई सत्ता है ही नहीं तो किसके लिये नियम करें? किससे स्नेह करें? उस प्राप्तिकाल में स्नेह की आवश्यकता भी नहीं रह गयी। उस अवस्था के ठीक पास में रहती है परावाणी! तो,
‘पास पड़ोसिन गोतिन खाई’
उसके ठीक पास में रहनेवाली परावाणी पड़ोसन है। ‘गोतीन’– गो माने इन्द्रियाँ! इन्द्रियों की विचरणस्थली है त्रिगुणमयी प्रकृति। वह भी शान्त हो गयी। इस दर्शन-स्पर्श के साथ सुरत शब्द में समा गयी, वह भी विलीन हो गयी। ‘तापर बुद्धि महतारी’– बुद्धि सबको धारण करनेवाली है, इसलिए माँ है। बुद्धिरूपी माता – यह उसको भी खा गयी। ‘तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता:’ (गीता, २/६८)– बुद्धि स्थिर हो गयी, स्वरूप में प्रतिष्ठित हो गयी। अलग से बुद्धि का कार्य ही नि:शेष हो गया। अब इस अवस्था में आने पर सगुण कहलानेवाला दयालु परमात्मा, निर्गुण कहलानेवाला निष्क्रिय ब्रह्म – दोनों कुल मुझमें प्रवाहित हैं, मुझसे प्रकाशित हैं, दोनों का प्रकाश मुझसे संयुक्त है। आगे कहते हैं कि इस भजन से क्या होता है?
सोलह खसम नैहर के खाये, भई बत्तीस ससुरारी।
सोलह तत्त्वों का सूक्ष्म शरीर! पहले ‘पाँच पुत्र उदर के खाये’– छिति, जल, पावक, गगन और समीर– इन पञ्च महाभूतों से निर्मित स्थूल शरीर। इसके अन्तराल में सोलह तत्त्वों का सूक्ष्म शरीर जिसमें दस इन्द्रियाँ, अन्त:करण चतुष्टय (मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार) तैजस और प्राज्ञ हैं। यह मन का संसार है। सृष्टि में मनुष्य के सभी विचारों को मन ही अपने में सँजोकर रखता है, संस्कारों का संग्रह करता रहता है। यदि अन्त:करण में कोई भला अथवा बुरा संस्कार पड़ा है, वह बरबस आपको घसीट लेगा। वह संस्कार जब भी उमड़कर आयेगा तो आप इधर जा रहे हैं अकस्मात् आप लौटकर उधर जाने लगेंगे। सूक्ष्म शरीर में पड़े हुए ये संस्कार सनेह का हरण करनेवाले हैं। ये संस्कार भी शान्त हो गये तो ‘भई बत्तीस ससुरारी’– सुरा ईशवत् हो गयी। उसमें परमात्मा का संचार हो गया।
धन्य सराहउँ वाहि पुरुष को, जो सरवरि करत हमारी।
ईशवत् हो जाना– यह बड़ी महत्वपूर्ण अवस्था है। संत कबीर कहते हैं वह पुरुष धन्य है, कृतार्थ है, मैं उसकी सराहना करता हूँ जो ‘सरवरि करत हमारी’– जो हमारी बराबरी करे, इस साधन से चलकर हमारे स्तर पर पहुँच जाय। इस भगवत्पथ में साँस के भजन में अनेक बाधायें आती हैं। साँस का भजन चाहते तो सभी हैं किन्तु सुरत साँस में लगती नहीं। मन वायु से तेज चलनेवाला है। कुछ ही देर में संकल्प-विकल्पों का वेग साँस को चलायमान कर देते हैं। इन संकल्पों का वेग शान्त कर साँस में सुरत कैसे प्रवाहित हुई? उसका उपाय बताते हैं–
‘सास ससुर पाटी में बाँधे’
प्रेमरूपी पाटी! परमात्मा से संयुक्त साँस की गति को हमने प्रेमरूपी पाटी में बाँध दिया। यदि प्रेम है तो सुरत साँस में प्रवाहित रहेगी। भजन में रुकावट है भ्रममयी साँस! इसलिए ‘ससुरा को गोड़तारी’– गो माने मनसहित इन्द्रियाँ! दमन के आधार पर हम इनसे पार पा गये। इन्द्रियाँ कहना नहीं मानतीं इसलिए उनका दमन किया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– अर्जुन! विषयों में विचरती हुई जिस एक इन्द्रिय के साथ मन रहता है वह एक ही इन्द्रिय साधना में प्रवृत्त साधक के मन का अपहरण कर ले जाती है और कहीं न कहीं संसार-समुद्र में डुबो देती है। इसलिए मनसहित इन्द्रियों को वश में करके मुझमें लगा, योग-साधना में लगा। इन्द्रियाँ प्रमथन स्वभाववाली हैं इसलिए भरम की सुरा को ‘गोड़तारी’– इन्द्रिय दमन के आधार पर तर गये, पार हो गये। और,
तब कुल बोरनि सेज बिछायों सोयों टाँग पसारी।
तब कुल डूब गया। अब संस्कार बचे ही नहीं इसलिए संसार में जन्म कैसे हो? अब संसार में जन्म नहीं होगा। ‘सेज बिछायो’ परमात्मा सेज है, सहज है, स्वयंसिद्ध है, ‘विधि न बनाये हरि आप बनि आये’– वह शुभ-अशुभ से परे, सगुण-निर्गुण से परे, अरूप, अमूर्त, ज्योतिर्मय, अपरिवर्तनशील, एकरस परमात्मा का बिछौना मिल गया। ‘सोयों टाँग पसारी’– सुरति टाँग पसार कर सोने लगी। सुरति स्थिर हो गयी। अब आगे भजन करके जायें कहाँ? जब से जीव नाम पड़ा है, कभी नहीं सोया।
जिव जब तें हरि तें बिलगान्यो।
तब तें देह गेह निज जान्यो।।
माया बस स्वरूप बिसरायो।
तेहि भ्रम तें दारुन दुख पायो।। (विनयपत्रिका, १३६)
जब से यह जीव भगवान से अलग हुआ, इसका नाम जीव पड़ गया। माया से आक्रान्त होकर यह अपने स्वरूप को भूल गया। इस योनि से उस योनि, अंतहीन सफर पर आवागमन के चक्र में प्रवृत्ति मार्ग पर चलता ही रहा। इसे सोने को कब मिला? वास्तविक शयन तभी है जब आगे जन्म न लेना पड़े, प्राप्त होने योग्य कोई वस्तु अप्राप्य न हो। अंतत: परमात्मा के अंक में स्थान मिल गया। जो स्वयंसिद्ध है, व्याप्त है, सहज है, सेज जैसा है, वह बिछौना मिल गया, साधक और भगवान के बीच की दूरी भी मिट गयी, दोनों कुल डूब गये। वह शय्या मिल गयी तो ‘सोयों टाँग पसारी’ अब न आगे जन्म लेना है, न पीछे कोई विकार त्यागना है अर्थात् स्थिति मिल गयी। अंत में कबीर कहते हैं–
कहत कबीर सुनो भाई साधो संतन्ह लेहु विचारी।
सन्तों को ही उद्देश्य बनाकर कबीर कहते हैं कि आप इसे सुनें! इतनी अटपटी वाणी सब सुनकर ही क्या करेंगे? सन्त उस पथ के पथिक हैं। जो भी चलकर इस स्तर पर आयेंगे, उनके सामने भी यही परिस्थितियाँ होंगी, यही वातावरण रहेगा इसलिए वे समझ जायेंगे और उनके माध्यम से अन्य सब भी समझेंगे। वह कहते हैं कि इस पद में जो व्यवस्था दी गयी है, उस पर विचार करें और,
‘जो या पद का अर्थ लगावै’
जो इस पद में दिये क्रम का निर्वाह कर ले जाय अर्थात् पहले पंच महाभूतों का निरोध, पास में रहनेवाली परावाणी भी लक्ष्य का बोध कराकर शान्त, बुद्धि भी स्थिर, सोलह तत्त्वों का सूक्ष्म शरीर शान्त, ईशवत् स्थिति, परमात्म-प्रेम की पाटी में श्वास को संयमित करना, भ्रम की सुरा का इन्द्रिय-संयम और दमन के आधार पर अंत करना, कुल डूबा, सहज स्थिति मिली– इस प्रकार इस पद में जो स्थितियाँ बतायी गयी हैं, संतों इस पर विचार करें, अपने में धारण कर लें। ‘वहै पुरुष हम नारी’– वही पुरुष है, वह परम पुरुष है, स्वरूप को प्राप्त महापुरुष है; और ‘हम नारी’ अर्थात् हम अब स्थिति से भी न्यारी अनिर्वचनीय अवस्था को प्राप्त हैं, इन समस्त अवस्थाओं से न्यारी अर्थात् अलग हो चुके हैं।
एक प्राचीन आख्यान है। ऋषि याज्ञवल्क्य ने अपनी दो भार्याओं मैत्रेयी और कात्यायनी में सम्पत्ति का वितरण कर भजन करने के लिए वन को प्रस्थान किया। उनकी पत्नी मैत्रेयी उनका अनुसरण कर रही थी। दो-एक किलोमीटर जंगल में जाने के पश्चात् जब उनकी दृष्टि अपनी पत्नी पर पड़ी तो उन्होंने उससे पूछा कि वह उनके पीछे क्यों आ रही है? उसने कहा कि आपने जो धन दिया है, क्या उससे मैं शोकमुक्त होकर मोक्ष पा सकूँगी? ऋषि ने कहा– धन से तो आज तक किसी का मोक्ष नहीं हुआ। हाँ, इससे तुम्हारा जीवन-निर्वाह हो जायेगा। पत्नी ने कहा– विप्रवर! मुझे तो वह चाहिए जिससे मेरा कल्याण हो, मोक्ष हो। ऋषि ने कहा– वह तो आत्म-चिन्तन से ही सम्भव है।
ऋषि आगे बढ़ गये। उन्होंने देखा कि मैत्रेयी अब भी उनके पीछे आ रही थी। उन्होंने जानना चाहा कि वह अब क्यों उनके पीछे आ रही है। मैत्रेयी ने बताया कि आत्म-चिन्तन के लिए वह भी गृहत्याग कर रही है। ऋषि ने बताया– चिन्तन में अपनों का साथ रुकावट पैदा करता है। मैत्रेयी ने उन्हें सादर प्रणाम किया और दूसरी राह पकड़ ली। याज्ञवल्क्य की तरह वह भी आत्मचिन्तन में लग गयी।
प्राचीन भारत में नारियों को पढ़ने-लिखने और भजन करने का अधिकार था। वे शास्त्रार्थ में भाग लेती थीं। महाराज जनक के यज्ञ में वचक्नु की पुत्री वाचक्नवी गार्गी और याज्ञवल्क्य का शास्त्रार्थ हुआ। महाराज जनक एक यज्ञ कर रहे थे। उस यज्ञ में सर्वोपरि विद्वान महापुरुष को दान देने के लिए उन्होंने दस हजार गायों की सींग को सोने से और खुर चाँदी से मढ़वाया था, अलंकृत किया था। गाय की सींग को सोने से मढ़ें या हीरे से, कुछ भी कर दें, उसे सोने या मिट्टी के अंतर का ज्ञान नहीं होता। वह कहीं मिट्टी का ढेर देखेगी तो सींग अवश्य मारेगी। वास्तव में सींग में सोना इसलिए लगाया जाता था कि किसी गरीब के घर जाय तो वहाँ भूखी न मरे। उसके जीने-खाने की व्यवस्था सींगों में बँधी हुई रहती थी।
सर्वोपरि विद्वान महापुरुष की प्रतियोगिता वर्षों चलती रही। गायें चारागाह में उसी प्रकार रह रही थीं। इसी क्रम में वहाँ याज्ञवल्क्य ऋषि भी पहुँचे। उन्होंने पहले किसी से कोई शास्त्रार्थ नहीं किया, अपने शिष्यों से कहा– गायों को आश्रम ले चलो। गायें हाँकी जाने लगीं, किसी ने प्रतिरोध नहीं किया; क्योंकि सभी जानते थे कि यह महापुरुष हैं। उस सभा में गार्गी भी आयी हुई थी। उसने उनको रोककर कहा,
अहं पश्यामि विप्रेन्द्र जगदेतदपौरुषम्।
नपुंसकमहं तद्वदहं स्त्री च पुमानहम्।।
हे विप्रश्रेष्ठ! इस जगत् को मैं पुरुष से हीन देखती हूँ। इनमें कोई पुरुष नहीं है। मैं ही पुरुष हूँ, मैं ही नपुंसक हूँ और मैं ही स्त्री हूँ। क्योंकि,
नपुंसक: पुमान् ज्ञेयो यो न वेत्ति हृदि स्थितम्।
पुरुषं स्वप्रकाशं तमानन्दात्मानं अव्ययम्।। (आत्मपुराण)
वह पुरुष होते हुए भी नपुंसक है जो हृदय में स्थित आत्मा को नहीं पहचानता। वह आत्मा पुरुष स्वरूप है, उत्तम आनन्द से युक्त है, अव्यय है। जो उस अव्यय स्वरूप को नहीं पहचानता, वह पुरुष नहीं है, पुरुष होते हुए भी नपुंसक है, नारी है, माया के आश्रित है, वह माया ही है।
कबीर का भी यही आशय है। वह कहते हैं कि इस भजन में बताये हुए आशय को जो अपने में धारण कर ले, ‘अर्थ लगावै’– इसमें बताया हुआ जो अर्थ है, सारतत्त्व है उसे अपने में सँजो ले, वह पुरुष है, परमात्मा की प्राप्तिवाला है। मैं उस स्थिति को प्राप्त कर चुका हूँ, निर्लेप हूँ।
जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई। (रामचरितमानस, २/१२६/३)
भगवन्! तुम्हें जानने के पश्चात् वह तुम ही हो जाता है। सेवक खो जाता है, स्वामी ही सदा-सदा के लिये शेष बच रहता है।
।। ॐ श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय ।।
(‘अमृतवाणी भाग-6’ से उद्धृत)