घूँघट के पट खोल री

घूँघट के पट खोल री

सन्त कबीर का यह भजन है– घूँघट के पट खोल री, तोहें पिया मिलेंगे।जिन्हें प्राप्त करने के बाद इस जीवात्मा की प्यास सदा-सदा के लिए मिट जाती है, उसके पश्चात् कुछ भी प्राप्त करने की इच्छा नहीं रहती, वे परम प्रभु तुम्हारे हृदय में ही रहते हैं। उन्हें तुम प्राप्त कर लोगे, केवल कपट का पर्दा खोलो। इसी आशय का यह भजन है।

ठीक यही सन्देश आदिशास्त्र श्रीमद्भगवद्गीता का है। गीता के आरम्भ में भगवान ने अर्जुन से कुछ कहा ही नहीं; क्योंकि उस समय अर्जुन में कोई पात्रता ही नहीं थी। वह छोटी-छोटी बातों में भी भगवान से उलझ रहा था। उसने कहा– भगवन्! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच खड़ा कीजिए। मैं देख तो लूँ कि मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना है। ज्योंही अर्जुन ने देखा, वह काँपने लगा। उसने कहा– प्रभो! मैं युद्ध नहीं करूँगा। इसमें तो मुझे अपने ही परिवार से लड़ना है। ऐसा युद्ध करने से सनातन-धर्म नष्ट हो जायेगा; क्योंकि जातिधर्मा: कुलधर्माश्च शाश्वता:’ (गीता, १/४३)

जातिधर्म और कुलधर्म सनातन है। इस युद्ध में वंशोच्छेद हो जाने से पिण्डोदक-क्रिया लुप्त हो जायेगी, पितर लोग गिर जायेंगे, कुल की स्त्रियाँ दूषित होंगी, वर्णसंकर पैदा होंगे जो कुल और कुलघातियों को नरक में ले जाने के लिए ही होते हैं। गोविन्द! हमलोग समझदार होकर भी ऐसा घोर पाप करने को उद्यत हुए हैं। क्यों न इस कुल-क्षय को बचाने के लिए प्रयत्न करना चाहिए। अर्जुन की दृष्टि में जाति सनातन-धर्म, कुलधर्म सनातन-धर्म, पिण्डोदक-क्रिया सनातन-धर्म था। इस पर भगवान ने हँसते हुए कहा–

कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।

अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ।। (गीता, २/२)

अर्जुन! तुम्हें इस विषम स्थल में यह अज्ञान किस हेतु से उत्पन्न हो गया? न यह कीर्ति बढ़ानेवाला है, न कल्याण करनेवाला है और न ही श्रेष्ठ पुरुषों ने भूलकर भी इसका आचरण किया है। यह अनार्यों का आचरण तुमने कहाँ से सीख लिया? गीता आर्यसंहिता है। जो उस अविनाशी अस्तित्व का उपासक है, आर्य है। जिसकी वृत्ति उस अस्तित्व की ओर उन्मुख है, वह आर्यव्रती है। जो नश्वर की ओर भागता है, अनार्य है।

जब भगवान ने कहा कि जाति, कुल, पिण्डोदक-क्रिया इत्यादि अज्ञान है तो सत्य है क्या? अर्जुन ने सोचा– इसके आगे तो हम कुछ नहीं जानते। तब अर्जुन ने समर्पण कर दिया–

कार्पण्यदोषोपहतस्वभाव:

     पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेता:

यच्छ्रेय: स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे

     शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।। (गीता, २/७)

प्रभो! यह अज्ञान है तो इसके आगे मुझे कुछ नहीं आता। सिद्ध है कि धर्म की राह में मैं विमूढ़चित्त हूँ। मुझे वह उपदेश कीजिए जिससे मैं परमश्रेय को प्राप्त हो जाऊँ। अर्जुन केवल श्रेय चाहता है, वस्तु नहीं। उसने कहा भी कि पृथ्वी के धनधान्यसम्पन्न अकण्टक साम्राज्य और देवताओं के स्वामीपन इन्द्रपद में भी मैं उस उपाय को नहीं देखता जो इन्द्रियों को सुखानेवाले मेरे शोक को दूर कर सके, मेरे क्षोभ को मिटा सके। इसके आगे कोई सत्य हो तो बतायें। प्रभो! यदि मैं कदाचित् उस उपदेश पर न चल सकूँ, लड़खड़ाऊँ तो मुझे साधिये, सम्हालिये; क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ। स्पष्ट है कि गीता गुरु-शिष्य संवाद है।

भगवान ने समझाना आरम्भ किया, अर्जुन प्रश्न-परिप्रश्न करने लगा। लगभग चौबीस प्रश्न अर्जुन ने किये, अन्त में वह चुप हो गया। तब भगवान ने, जो प्रश्न अर्जुन नहीं कर सकता था, उस भक्त की क्षमता से बाहर की वस्तु थी, उन प्रश्नों को स्वयं बताया। उनमें एक प्रश्न था– जानते हो अर्जुन! ईश्वर कहाँ रहता है? उन्होंने कहा–

ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।

भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।। (गीता, १८/६१)

अर्जुन! ईश्वर सम्पूर्ण भूत-प्राणियों के हृदय में निवास करता है। इतना समीप होने पर भी लोग उसे क्यों नहीं देख पाते? इस पर वह कहते हैं कि मायारूपी यंत्र में आरूढ़ होकर लोग भ्रमवश भटकते ही रहते हैं इसलिए नहीं जान पाते। प्रश्न उठता है कि जब ईश्वर हृदय में है तो हम शरण किसकी जायँ? अगले ही श्लोक में भगवान बताते हैं–

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।

तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।। (गीता, १८/६२)

अर्जुन! उस हृदयस्थित ईश्वर की शरण जाओ। सर्वभावेन– सम्पूर्ण भावों से जाओ। ऐसा न हो कि थोड़ा-सा भाव संकटमोचन में, कुछ कमच्छा देवी में, थोड़ा पशुपतिनाथ में है। हम तो रुपये में बारह आना लीक हो गये, हमारा भाव यत्र-तत्र बिखर गया। हृदयस्थित ईश्वर के लिए केवल पचीस प्रतिशत बचा। इतने से कल्याण नहीं होगा। हमने समर्पण ही कब किया था? भगवान जानते हैं कि यह कितना प्रतिशत मुझसे जुड़ा है, इसलिए सम्पूर्ण भावों से, पूरे मनोयोग से उस हृदयस्थित ईश्वर की शरण जाओ। मान लें, हमने सारी मान्यताएँ तोड़ीं, हृदयस्थित ईश्वर की शरण चले ही गये तो उससे लाभ क्या होगा? भगवान कहते हैं– उसकी कृपाप्रसाद से तुम परम शान्ति प्राप्त कर लोगे। इतना ही नहीं, स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्– उस स्थान को पा जाओगे जो शाश्वत है। तुम्हारा जीवन रहेगा और तुम्हारा निवास-स्थान रहेगा। भगवान अविनाशी हैं अत: तुम्हारा भी जीवन अविनाशी रहेगा; तुम अनन्त जीवन, शाश्वत शान्ति प्राप्त कर लोगे। इस प्रकार गीता के अनुसार ईश्वर का निवास हृदय में है।

रामचरितमानस के अनुसार भी ईश्वर का निवास हृदय है–

भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।

याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धा: स्वान्तस्थमीश्वरम्।। (बालकाण्ड, मंगलाचरण, श्लोक २)

मैं उन भवानी और शंकर की वन्दना करता हूँ जो श्रद्धा और विश्वास के रूप हैं। हमें वहाँ श्रद्धा स्थिर करनी है, उन पर विश्वास करना है। उनके बिना सिद्धजन भी हृदय में स्थित ईश्वर को नहीं पहचान पाते। साधारण लोगों की कौन कहे, सिद्धकोटि में पहुँचे हुए लोग भी, जिनके लिए केवल थोड़ी-सी दूरी रह गयी, वह भी पकड़ नहीं पाते, पहचान नहीं पाते। शंकर अर्थात् शंका अरि स शंकर– जो शंकाओं से अतीत महापुरुष हैं, शिवस्वरूप हैं; शंकर: शं तनोतु मे(मानस, लंकाकाण्ड, मंगलाचरण)– जो कल्याणस्वरूप कैवल्यपदप्राप्त सद्गुरु हैं, उनकी शरण जाओ। उनकी कृपा के बिना तुम हृदयस्थ ईश्वर को नहीं पा सकते। इस प्रकार संत तुलसीदास का ईश्वर हृदय में रहता है। वैदिककाल के हर महापुरुष ने जब भी उसे प्राप्त किया तो हृदय-देश में! अनुभवी महापुरुष, भगवान के निर्देशन पर चलनेवाला पथिक इसके अतिरिक्त दूसरा कुछ कह ही नहीं सकता; क्योंकि भगवान एक, उनकी विभूतियाँ एक, स्थिति एक! वह एक से सवा कभी हुआ नहीं। राम न देखेउँ आन (मानस, ७/८१-क) इसलिए दूसरा कोई कहे भी तो क्या? पढ़ा-लिखा न होने पर भी संत कबीर अनुभवी महापुरुष थे। उन्होंने भी भगवान को पाया तो हृदय में। साधकों, पथिकों और अनुरागी भाविकों को उन्होंने बताया कि भगवान को पाने में कठिनाई क्या है। इसी आशय का उनका यह भजन है–

घूँघट के पट खोल री, तोहे पिया मिलेंगे।

घटघट रमता राम रमैया, कटुक बचन मत बोल री।

तोहे……

धन यौवन का गरब न कीजै, झूठा पचरँग चोल री।

तोहे……

सुन्न महल में दीप जलाकर, आसन से मत डोल री।

तोहे……

जोग जुगुति सों रंगमहल में, पिया पायो अनमोल री।

तोहे……

कहत कबीर आनन्द भयो है, अनहद बाजत ढोल री।

तोहे……

आप स्त्री हों चाहे पुरुष, शरीर भजन नहीं करता। शरीर तो रहने का मकान है, वस्त्र है। मकान या वस्त्र स्त्री-पुरुष नहीं होता। भजन आपसे हो या माताओं से, जब कभी किसी से भजन हुआ है उनमें एक इष्टोन्मुखी लगन जागृत होती है जो भजन करा लेती है। लौरूपी लड़की! यह नारीसंज्ञक है इसलिए सन्त कबीर इस पद में उसी लौरूपी लड़की को, अन्तर्मन को सम्बोधित करते हैं। अनादि वैदिककाल से माता अनुसुइया, माता मदालसा, सप्तर्षि, सनकादि ऋषि, महर्षि वशिष्ठ, विश्वामित्र, वाल्मिकी इत्यादि से लेकर अद्यावधि कबीर, सूर, तुलसी, मीरा, हमारे गुरु महाराज (परमानन्द परमहंसजी) तक जब कभी किसी से भजन पार लगा है, इष्टोन्मुखी वृत्ति जागृत हुई, वही भजन कराती है। हम सबकी लगन भी लग जायेगी जब मन निर्मल हो जाय। रामचरितमानस में गोस्वामीजी भगवान के स्वभाव का वर्णन करते हैं–

निर्मल मन जन सो मोहि पावा।

मोहि कपट छल छिद्र न भावा।। (मानस, ५/४३/५)

निर्मल मनवाला जन ही मुझे प्राप्त करता है। मुझे छल-छद्म-कपट अच्छा नहीं लगता। फिर भी जीव छल-छद्म करता ही है; क्योंकि उसमें विगत जन्मों के संस्कार भरे पड़े हैं, छल-कपट इसका पुराना अभ्यास रहा है। जब तक अन्तिम संस्कार नहीं मिट जाते, तब तक यह कपट पीछा करता है।

परम पावन अवस्था में होने पर भी सती ने भगवान शंकर से कपट किया। भोलेनाथ ने दण्डकारण्य में निवास करनेवाले महर्षि अगस्त्य के यहाँ रामकथा का श्रवण किया, महर्षि के आग्रह पर हरिभक्ति का उपदेश देकर लौट रहे थे। सतीजी उनके साथ ही थीं। उस समय भगवान राम वनवास काल में दण्डकारण्य में ही थे। भोलेनाथ की उन पर दृष्टि पड़ गयी किन्तु कुसमय जानकर उन्होंने उनके समीप जाना उचित नहीं समझा। उन्होंने जय सच्चिदानन्द जग पावन (मानस, १/४९/३) कहते हुए दूर से ही भगवान को प्रणाम किया और उनके प्रेम में मग्न हो गये। सती को बड़ी चिन्ता हुई–

संकरु जगत बंद्य जगदीसा।

सुर नर मुनि सब नावत सीसा।।

तिन्ह नृपसुतहि कीन्ह परनामा।

कहि सच्चिदानंद परधामा।। (मानस, १/४९/७)

उन्होंने एक साधारण राजा के लड़के को, जो नारी-वियोग में विकल है, सच्चिदानन्द कहकर प्रणाम किया। भवानी ने कहा तो कुछ नहीं, किन्तु सन्देह तो हो ही गया। भोलेनाथ अन्तर्यामी थे। प्रियतमा को उधेड़बुन में देख उन्होंने कहा– ‘‘सती! तुम्हें इस प्रकार की शंका नहीं करनी चाहिए।’’ सती ने कहा– ‘‘नहीं भगवन्! यह लगता तो राजा का लड़का जैसा ही है।’’ शंकर ने कहा– ‘‘जाकर परीक्षा ले लो।’’ सती ने सोचा– यह ‘हाय सीते, हाय मृगलोचनी’ की रट लगा रहे हैं, अत: उन्होंने तुरन्त सीता का वेष बनाया और उसी रास्ते पर आने लगीं जिधर राम जा रहे थे। लक्ष्मण ने उन्हें पहचान लिया– लछिमन दीख उमाकृत बेषा।(मानस, १/५२/१) लक्ष्मण ने सीता का वेष बनाये हुए उमा को देखा तो चकित हो गये कि यह क्या! प्रभु तो जानते ही हैं, मैं क्यों बोलूँ! भगवान की उन पर दृष्टि पड़ी तो सती को हाथ जोड़कर प्रणाम किया और पिता के नामसहित अपना परिचय दिया। वह बोले– ‘‘मातेश्वरी! आप इस घोर जंगल में अकेले कहाँ विचरण कर रही हैं। भगवान चन्द्रमौलि कहाँ हैं?’’ सती संकोच में पड़ गयीं। देखा, यह तो सचमुच सर्वज्ञ हैं, भगवान हैं। वह लौट पड़ीं, कुछ बोली ही नहीं। भगवान ने देखा, सती को कुछ कष्ट हुआ है अतएव अपनी किञ्चित् महिमा भी दिखा दिया। सती जिस रास्ते से जा रही थीं, राम-लक्ष्मण-सीता उधर से ही आते दिखायी पड़े। उनसे सामना न हो इसलिए सती दूसरी ओर घूम गयीं, उधर से भी प्रभु आ रहे थे। पूरब-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण चारो ओर प्रभु विराजमान थे। सती आँखें बन्द कर बैठ गयीं तो भगवान हृदय में दिखायी पड़े। अगणित ब्रह्मा-विष्णु-शिव, उमा-रमा-सरस्वती, असंख्य लोक-लोकान्तर दिखायी पड़े, सब भिन्न-भिन्न अवस्था में दिखायी पड़े किन्तु राम रूप दूसर नहिं देखा।(मानस, १/५४/३)– भगवान दूसरे प्रकार के नहीं थे; क्योंकि प्रभु ही एक ऐसी सत्ता हैं जिनमें परिवर्तन नहीं होता। सती ने आँखें खोलकर देखा, वह दृश्य समाप्त हो गया; वही जंगल का जंगल!

सती ने विचार किया कि शिव का कहना न मानकर मैंने बड़ी भूल की है, अब उन्हें क्या उत्तर दूँ? इतने में भोलेनाथ ने पूछ ही लिया कि ‘‘तुमने किस प्रकार परीक्षा ली?’’ सती ने तथ्य को छिपाते हुए कहा– ‘‘भगवन्! हमने तो परीक्षा ली ही नहीं, बस आपकी ही तरह उन्हें प्रणाम कर लिया।’’ भोलेनाथ ने सोचा– यह इतने तपाक से गयी और कहती है कुछ किया ही नहीं, कोई रहस्य तो है।

तब संकर देखेउ धरि ध्याना।

सती जो कीन्ह चरित सबु जाना।। (मानस, १/५५/४)

सती ने जो कुछ किया था, सारा चरित्र भोलेनाथ के सामने आ गया। उन्होंने तुरन्त सती का परित्याग कर दिया। सतीं कीन्ह सीता कर बेषा।(मानस, १/५५/७) सती ने जगज्जननी माता का स्वरूप धारण किया। अब उन्हें पत्नीरूप में स्वीकार करना पाप होगा, इसलिए–

एहिं तन सतिहि भेट मोहि नाहीं।

सिव संकल्पु कीन्ह मन माहीं।। (मानस, १/५६/२)

मन में संकल्प करना था कि आकाशवाणी हुई कि आपके अतिरिक्त इतना सुदृढ़ प्रण भला कौन कर सकता है! सती ने बहुत पूछा, किन्तु शिव ने बताया नहीं। उनके व्यवहार से ही सती ने समझ लिया कि इन्होंने मुझे त्याग दिया है यद्यपि उदारतावश मेरा अपराध कहने में संकोच कर रहे हैं। जरा-सा झूठ बोलने का परिणाम सती को अग्निकुण्ड में जलना पड़ा। सती-कोटि तक पहुँची हुई अमलात्माओं में भी हठात् कपट आ ही जाता है। नारद ने भी ऐसा ही छिपाव किया था–

लच्छन सब बिचारि उर राखे।

कछुक बनाइ भूप सन भाखे।। (मानस, १/१३०/५)

यही कबीर के शब्दों में ‘घूँघट’ है। घूँघट माने पर्दा, घूँघट माने आवरण! यह ऐसा आवरण है जिसे जीव स्वयं ही बनाता है, स्वयं अपनी दृष्टि और स्वरूप को आच्छादित कर लेता है जिससे सामने ईश्वर हो या पहाड़; कुछ भी दिखाई नहीं देता। जीवात्मा ने ही स्वेच्छा से इसे डाल रखा है इसीलिए कबीर अपने अन्तर्मन को लौरूपी लड़की को घूँघट का पट खोलने के लिए समझाते हैं–

घूँघट के पट खोल री, तोहें पिया मिलेंगे।

घट कहते हैं हृदय को। लेकिन हृदय में माया के, मल-आवरण-विक्षेप के पर्दे पड़े हैं, जन्म-जन्मान्तरों के संस्कारों की रील पड़ी है, उस परदे को खोलो, तुम्हें प्रियतम का साक्षात् होगा।

सन्त कबीर ने अपने आराध्यदेव को साईं, प्रियतम, भरतार, पति या पीव कहकर सम्बोधित किया जिन्हें प्राप्त कर लेने के पश्चात् इस जीवात्मा की प्यास सदा-सदा के लिए मिट जाती है, कुछ भी पाने की इच्छा नहीं रह जाती। जेहि जानें जग जाइ हेराई।(मानस, १/१११/२)– जगत् तो खो जाता है फिर माँगने लायक बचा ही क्या? ईश्वर ही बचा! आगे कोई सत्ता ही नहीं तो ढूँढ़ें किसे? उस समय यह आत्मा पूर्ण तृप्त, पूर्ण स्थितिवाली हो जाती है। जीव की प्यास मिट जाती है इसलिए पिया कहकर सम्बोधित किया। साईं का आशय स्वामी, मालिक होता ही है। प्रिय उत्तम से प्रियतम! प्रीति के सर्वोपरि आश्रय ईश्वर हैं। वही एक शाश्वत हैं, सार हैं। उनसे सम्बन्ध जुड़ जाने के बाद फिर कभी उनसे विछोह नहीं होता। संसार से प्रेम और विछोह तो होता ही रहता है किन्तु ईश्वर-पथ में बीज का नाश नहीं है। अर्जुन! इसका स्वल्प अभ्यास भी जन्म-मृत्यु के महान भय से उद्धार करनेवाला होता है। यदि आपने इस जन्म में इस पथ पर दो कदम भी स्वाँस के रहते-रहते रख दिया तो अगले जन्म में तीसरा ही कदम रखेंगे और दो-चार जन्मों के अन्तराल में वहीं पहुँच जायँगे जिसका नाम परम गति है, परम धाम है। अत: सर्वोपरि प्रेमास्पद भगवान ही हैं। उनके लिए टेक सुदृढ़, संयम सुदृढ़ हो; भगवान से श्रद्धा की डोर न टूटे, लव लग जाय।

इसी प्रकार पति शब्द भी है। पत कहते हैं इज्जत को, मर्यादा को। मेरी पत राखो गिरधारी– भगवन्! मेरी पत रख लें। आज किसी को दो खरी-खोटी सुनाओ, उसका चेहरा लटक जाता है, इज्जत चली गयी। शादी-विवाह में लड़कीवालों ने कहा– मोटर सायकल देंगे! नहीं दे सका तो समधी साहब की गर्दन लटक गयी। कहीं बारात का भव्य स्वागत हुआ, कन्या पक्ष ने मारुति पकड़ा दिया तो इज्जत चौगुनी हो गयी। और जब आयु के दिन पूरे हो गये, शरीर छूट गया तो यहाँ की इज्जत धरी की धरी रह गयी।

कबिरा अपनी नौबत, दिन दस लेहु बजाइ।

सोइ पुर पाटन सो गली, बहुरि न देखा आइ।।

मृत्यु के पश्चात् कोई लौटकर अपनी अर्जित मान-प्रतिष्ठा, पुत्र-पौत्रादि देखने नहीं आता। यह जीवन जन्म और मृत्यु के बीच का एक पड़ाव है किन्तु आत्मा अविनाशी, शाश्वत, परमतत्त्व है, निर्लेप और निर्दोष है। जो आपका छिपा हुआ स्वरूप है, ऐसे निर्दोष स्वरूप के होते हुए भी बारम्बार अनन्त योनियों का भ्रमण! इस दयनीय दशा से जीव को उबारकर उसे शाश्वत, सम-स्थिति प्रदान कर देने में, उसे मर्यादित स्वरूप में प्रतिष्ठित कर देने में यदि कोई समर्थ है तो एकमात्र भगवान हैं इसलिए आराध्यदेव को सन्त कबीर ने पत रखनेवाला पति कहकर सम्बोधित किया। कालान्तर में लोगों ने इस पावन शब्द को लोकजीवन में पति-पत्नी के रूप में ले लिया कि इस आदर्श शब्द के बहाने भगवान का स्मरण बना रहे।

माता मीरा के पति राणा भोजराज का जब स्वर्गवास हुआ तो कुल की मर्यादा को लेकर चिन्तित रनिवास की महिलाओं ने सोचा– अब तो मीरा पति की चिता पर जल जायेगी। ईश्वर ने सुनवाई तो कर लिया! देखो न, यह साधारण लोगों के बीच जाकर भजन-कीर्तन करती है, राज-परिवार का सम्मान इसने कम कर दिया। हमारा सम्मान इसने घटा दिया। उन्होंने कहा– ‘‘महारानी मीरा! चलिए, अब जलकर सती हो जाइये।’’ मीरा ने पूछा– ‘‘क्यों?’’ उन्होंने बताया– ‘‘आपका पति मर गया है।’’ मीरा ने कहा–

ऐसे पति को क्यों बरूँ, जो जनमे मरि जाय।

मीरा अविनाशी बरे, सुहाग अमर होइ जाय।।

भला ऐसे पति का हमने वरण ही कब किया था जो जन्मता और मरता हो। मीरा ने तो उस अविनाशी का वरण किया है। मेरा सुहाग अक्षुण्ण है, सदा अचल है। आपके वह पति रहते कहाँ हैं? मीरा ने कहा–

औरों के पिया परदेस बसत हैं, लिखि लिखि भेजत पाती।

मेरो पिया मेरे हिय में बसत हैं, ना कहुँ आती न जाती।।

दूसरों के पिया परदेस चले जाते हैं तो चिट्ठी-पत्री से सम्पर्क साधते रहते हैं, हमारे पति तो हमारे हृदय के अन्तराल में निवास करते हैं। हमें न कहीं जाना है, न आना है। राणाजी, मैं तो गिरिधर रँगवा राती।– मैं उस गिरिधर के रँग में रंग गयी हूँ। अब तक आपने जो उपद्रव किया, क्षम्य था किन्तु अब मैं क्षमा कर भी दूँगी तो भगवान आपको क्षमा नहीं करेंगे। राणा भी इस चेतावनी को समझ गये; क्योंकि मीरा को जहर पिलाकर, शूली की शैया पर लिटाकर, सर्पों को भेजकर, तोप से मन्दिर उड़ाकर – सब कुछ कर थक-हार चुके थे। वह जान गये थे कि इसके पीछे इसका कोई अदृश्य रूप से रक्षक अवश्य है। इसके पश्चात् उन्होंने भी मीरा को परेशान नहीं किया, सादर नमन किया। अस्तु, पति परमात्मा का परिचायक है।

पति शब्द का ऐसा ही प्रयोग संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास के साहित्य में भी मिलता है–

अस अभिमान जाइ जनि भोरे।

मैं सेवक रघुपति पति मोरे।। (मानस, ३/१०/२१)

ऐसा अभिमान भूलकर भी न मिटे कि मैं सेवक हूँ और भगवान मेरे पति हैं। सुतीक्ष्ण क्या स्त्री थे? वास्तव में पति शब्द परमात्मा का परिचायक है।

रामचरितमानस का ही प्रसंग है। वनवासी राम और लक्ष्मण को ऋष्यमूक पर्वत की तलहटी में देखकर सुग्रीव ने घबड़ाकर हनुमान से कहा– ‘‘दो शूरवीर धनुर्धर दिखायी दे रहे हैं। जाकर पता करो, यह कौन हैं और यहाँ क्यों आ रहे हैं? भैया बालि का मन मेरे प्रति मैला है। उन्होंने मेरी हत्या करने के लिए इन्हें भेज तो नहीं दिया?’’ हनुमान ने कहा– ‘‘राजन्! आप निश्चिन्त रहें, मैं अभी देखता हूँ।’’ उन्होंने ब्राह्मण का वेष बनाया और घूमकर राम और लक्ष्मण के सामने खड़े हो गये और बोले– ‘‘स्वागत है आपलोगों का! आपकी दिव्य आभा देखते ही बनती है। इस घोर जंगल में आपलोग किसलिए भ्रमण कर रहे हैं। आप हैं कौन? क्या आप ब्रह्मा, विष्णु और महेश में से कोई हैं, नर या नारायण अथवा साक्षात् परब्रह्म परमात्मा हैं?’’ वह लगे धारा-प्रवाह शुद्ध संस्कृत में वार्तालाप करने! भगवान राम भी मन बहलाने लगे। कुछ ही देर में हनुमान को आभास होने लगा कि जिनकी प्रतीक्षा में मैं इस पहाड़ी पर पड़ा हूँ, वह प्रभु आ गये। उनके चरणों में साष्टांग प्रणिपात करते हुए हनुमान बोले– ‘‘प्रभो! सेवक को बड़ी देर में पहचाना!’’ भगवान ने हनुमान को तुरन्त उठाया, गले लगाया और बोले–

सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना।

तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना।। (मानस, ४/२/७)

‘‘हनुमान! तुम चिन्ता न करो। तुम मुझे लक्ष्मण से भी दोगुना अधिक प्रिय हो।’’ इतना सुनते ही–

देखि पवनसुत पति अनुकूला।

हृदयँ हरष बीती सब सूला।। (मानस, ४/३/१)

हनुमान ने जब अपने पति को अनुकूल पाया तो उनका हृदय हर्षित हो गया, सारा दु:ख दूर हो गया। क्यों! हनुमान क्या स्त्री थे? वह वानर-जातीय पुरुष थे, राजकुँवर थे, अखण्ड बाल ब्रह्मचारी थे। सांसारिक पति-पत्नी के सम्बन्धों से वह परे थे। वास्तव में पति का अर्थ है स्वामी, परमात्मा! उन्होंने उन परम प्रभु को अनुकूल समझा। उनका सारा दु:ख दूर हो गया। यह परमात्मा का ही एक पवित्र नाम है। यही आशय कबीर का भी है कि घूँघट के पट खोल री, तोहें पीव मिलेंगे।। जिन्हें प्राप्त करने के साथ ही इस जीवात्मा की प्यास सदा के लिए तृप्त हो जाती है, तुम उन्हें प्राप्त कर लोगे, पहले अन्त:करण के परदे को हटाओ। पूज्य महाराजजी कहते थे– ‘‘गुरु और भगवान के सामने जो हृदय में हो, वही जुबान पर भी हो। हृदय में कुछ और, जबान पर कुछ और है तो वह साधक कभी कामयाब नहीं होता।’’ यह दुराव-छिपाव ही घूँघट है। पहले कपट, चतुराई, छल, छद्म को हटाओ।

मन क्रम बचन छाड़ि चतुराई।

भजत कृपा करिहहिं रघुराई।। (मानस, १/१९९/६)

मान लें, किसी ने कपट का पट हटा ही दिया तो वह पिया को पाये कहाँ? वे रहते कहाँ हैं? इस पर सन्त कबीर कहते हैं–

घट घट रमता राम रमइया, कटुक बचन मत बोल री।

वे तो हर घट में निवास करते हैं। घट कहते हैं हृदय को! वह हर हृदय में निवास करते हैं।

सब घट मेरा साइयाँ, सूनी सेज न कोय।

बलिहारी घट तासु की, जा घट परगट होय।।

सब घट में, सब हृदय में मेरे साँई का निवास है। सूनी सेज न कोय– एक भी हृदय का आसन उनसे रिक्त नहीं है। तब तो हमें सबको नमन करना चाहिए। कबीर कहते हैं– नहीं! बलिहारी घट तासु की, जा घट परगट होय।मैं उस घट को अपने आपको समर्पित करता हूँ जिस घट में वह प्रगट हो गये। जहाँ वह प्रकट हुए, वह सद्गुरु हैं, वह महापुरुष हैं अर्थात् घट में वह प्रकट भी होते हैं। अन्यत्र कबीर की सूक्ति है–

एक राम घट घट में लेटा।

एक राम दसरथ का बेटा।।

एक राम का सकल पसारा।

एक राम सब जग से न्यारा।।

लगता है कबीर चार राम का वर्णन कर रहे हैं किन्तु ऐसी कोई बात नहीं है। एक ही राम घट-घट में हैं। होते होंगे! हमारे किस काम के? हमें मिलें कैसे? कबीर कहते हैं– एक राम दसरथ का बेटा।– राम एक ही हैं लेकिन वह दशरथ के बेटे हैं। दसों इन्द्रियों की निरोधमयी प्रवृत्ति ही दशरथ है। यही संकेत इस दोहे में भी है–

राम राम सब कोउ कहै, दसरथ कहै न कोय।

एक बार दसरथ कहे, कोटि यज्ञ फल होय।।

सब ‘राम-राम, राम-राम’ कहते हैं, दसरथ कोई कहता ही नहीं जबकि कोई एक बार दसरथ कह दे तो कोटि यज्ञ फल होय।इतना बड़ा लाभ! फिर भी दसरथ-दसरथ कोई नहीं भजता। जपना भी नहीं चाहिए। कितना भी राम-राम जपो, इससे केवल पुण्य-पुरुषार्थ बढ़ेगा लेकिन दसों इन्द्रियों की निरोधमयी प्रवृत्ति के साथ, दसों इन्द्रियों के संयम के साथ जो नाम आता है तो सीधा भगवान से सम्बन्ध जुड़ जाता है।

उपनिषदों में है– शरीर एक रथ है, इन्द्रियाँ घोड़े हैं, मन लगाम है, आत्मा रथी है। जब मन की लगाम रथी के हाथ में हो जाती है, यह इतना संयत हो जाता है कि जिधर आप ले चलना चाहें, उधर ही चलेगा। दसों इन्द्रियों की निरोधमयी प्रवृत्ति दशरथ है। विषयों में तो मनसहित इन्द्रियों का निरोध होगा ही नहीं– सेवत बिषय बिबर्ध जिमि नित नित नूतन मार।(मानस, ६/९२) अथवा जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई। (मानस, १/१७९/२) हर लाभ एक नवीन लोभ को जन्म देता है। आज किसी की परिस्थिति लड़खड़ा जाती है तो शाम तक दो रोटी का भी ठिकाना नहीं रह जाता। जब दो रोटी मिलने लगती है तो वह फूला नहीं समाता कि प्रभु ने सुनवायी कर ली। लेकिन जब उसका धन्धा चल निकलता है तो कभी लाख, फिर करोड़, दस करोड़…..क्या कभी पेट भरता है? योजना पर योजना बनने लगती है। इतने में ब्लड प्रेशर हाई होने लगता है। इस प्रकार संसार में हर फायदा नवीन लोभ को ही जन्म देता है। संयम होता है केवल ईश्वर के चिन्तन में! दसों इन्द्रियाँ जिस समय सिमटकर इष्टोन्मुखी प्रवाहित हुईं तो भगवान जो हृदय में प्रसुप्त हैं, जागृत हो जायेंगे। वह आपकी उँगली पकड़कर आपको चलाने लगेंगे। यही है एक राम दसरथ का बेटा।अर्थात् संयम करो, वह अवश्य मिलेंगे। दसों इन्द्रियों का संयम जिस क्षण सधा, वह प्रकट हो जायँगे। उन्हें प्राप्त करने का यही एक तरीका है।

एक राम का सकल पसारा।

राम एक है। जो कुछ भी यावन्मात्र जगत् है उसी का प्रसाद है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– अर्जुन! मेरे तेज के अंशमात्र से सृष्टि का सृजन, पालन और परिवर्तन होता है। रामचरितमानस में है–

जग कारन तारन भव भंजन धरनी भार।

की तुम्ह अखिल भुवनपति लीन्ह मनुज अवतार।। (मानस, ४/१)

जगत् के कारण? भगवान। विश्व के रचयिता? भगवान। इसलिए जो कुछ भी पट-प्रसार आप देखते हैं उस एक परमात्मा के तेज के अंश मात्र से है। यही है एक राम का सकल पसारा।

इतने बड़े विश्वरूपी कारखाने के मालिक, सबके संचालक! तब तो उन्हें दिन-रात बड़ी व्यस्तता रहती होगी? कबीर कहते हैं– नहीं! एक राम सब जग से न्यारा।संसार में एक हैं तो राम। सब प्रपंच उन्हीं से फैला है, फिर भी वह जग से न्यारा– सबसे अलग हैं, निर्लेप हैं। वह मात्र द्रष्टा के रूप में हैं। जो कुछ घटित होता है, व्यक्ति के कर्मों का फल है; भगवान का इससे कुछ भी लेना-देना नहीं है–

करम प्रधान बिस्व करि राखा।

जो जस करइ सो तस फलु चाखा।। (मानस, २/२१८/४)

यही आशय सन्त कबीर का भी है कि घट घट रमता राम रमइया। जब कभी किसी ने प्राप्त किया तो हृदय-देश में पाया। हाँ, उनकी प्राप्ति के लिए एक सुझाव है– कटुक वचन मत बोल री।मानस में है–कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी।(मानस, २/१२९/४) केवल प्रिय तो खल भी बोल देते हैं। उनकी नम्रता भी बनावटी होती है। सीताहरण के षड्यन्त्र में मारीच की सहभागिता के लिए रावण ने उसकी अभ्यर्थना की। मानसकार लिखते हैं– भयदायक खल कै प्रिय बानी। जिमि अकाल के कुसुम भवानी।। (मानस, ३/२३/८) खल की प्रिय वाणी खतरनाक हुआ करती है। अंतत: मारीच के प्राण नहीं बचे।

लोक-व्यवहार में भी मीठा बोलकर लोग अपना कार्य साधते ही रहते हैं। एक व्यक्ति ने बताया– ‘‘महाराज! कलकत्ता के एक सेठ ने हमारे घर दो लाख रुपये पहुँचा दिया है। एक दूसरा सेठ उससे भी अधिक मासिक वेतन पर हमें अपने यहाँ रखने को तैयार है।’’ हमने पूछा– ‘‘आपमें गुण क्या है?’’ उसने बताया– ‘‘महाराजजी! मैं सेल्समैन हूँ। कोई ग्राहक शोरूम में प्रवेश कर ही गया, वह खाली हाथ लौट नहीं सकता। कुछ वस्तुएँ तो वह ले ही लेगा। इसीलिए महानगरों में अच्छे सेल्समैन को उद्योगपति आँकते रहते हैं। किसी का तरीका उन्हें पसन्द आया, दो-ढाई लाख रुपया उसके घर भेजकर उसे अपने यहाँ रख लेते हैं। मेरे पास भी पैसा पहुँच गया है।’’ यह प्रिय बोलने का ही परिणाम था।

सेल्समैन की कुशलता हमें भी देखने को मिली। एक बार हम इलाहाबाद चले गये। हमारे साथ कई लोग थे। कुतूहलवश हम खिलौनों की एक दुकान में गये। खिलौने काफी महँगे थे। एक सज्जन कह रहे थे– ‘‘मेरा लड़का बहुत सीधा-सादा है। उसके लिए यह साधारण कीमतवाला खिलौना ठीक रहेगा।’’ सेल्समैन बोला– ‘‘बाबूजी! बच्चे तो सौम्य होते ही हैं, क्षीरसागर में शान्त लेटे भगवान विष्णु की तरह! बच्चे तो भगवान का स्वरूप होते हैं। उनके लिए साधारण खिलौना!’’ उसने अधिक कीमतवाला खिलौना उन्हें दे दिया। हमारे साथ चल रहे बतासा गुरु बोले– ‘‘हमारा लड़का तो बड़ा चंचल है। वह खिलौना तोड़ देगा। खिलौना लेकर क्या होगा?’’ सेल्समैन ने कहा– ‘‘चाचाजी! बच्चे तो फुदकते हुए मृग होते हैं। चंचलता ही उनकी शान है। तोड़ भी देगा तो क्या? आखिर हम कमाते किसके लिए हैं!’’ उसने चिट्टा-पट्टी देकर एक वैसा ही खिलौना उन्हें भी पकड़ा दिया। बच्चा सौम्य हो या चंचल, उससे मतलब नहीं! उसे तो खिलौना बेचना है। यह प्रिय वचन नहीं, काम निकालने का एक तरीका है।

कबीर की दृष्टि में ‘कटुक वचन’ वह है जो हमें संसृति में भरमाये, संसार में फँसाये। मधुर शब्द वह है जो ईश्वरीय माधुर्य प्रदान कर दे, आध्यात्मिक पथ प्रशस्त कर दे; साधना पथ में हमें अग्रसर कर दे। अन्यत्र कहीं भी मधुर है ही नहीं। साधकों के लिए तो इतने कड़े प्रतिबन्ध हैं कि जब बोले तब हरि गुन गावे, मौन रहे की नाम जपावे।हृदय में यदि प्रभु का सुमिरन है तो वाणी भी प्रभु की ही निकलेगी। यदि वाणी कौवे की तरह ऊटपटांग निकलती है तो समझना चाहिए कि इसके हृदय में भजन नहीं है। इसलिए कटुक वचन मत बोल री। परम प्रभु अवश्य ही आपको प्राप्त होंगे। लेकिन इस पथ में एक भयंकर रुकावट और भी है; वह है धन और यौवन का गर्व।

कभी-कभी कतिपय धनी-मानी लोग कहते सुने जाते हैं कि सन्त-महात्माओं के पास जाने की उन्हें क्या आवश्यकता? सौ-पचास आदमी उनके माध्यम से रोजी-रोटी पा रहे हैं, करोड़ों का टर्न ओवर है सालाना! उन्हें किस बात की कमी है? किन्तु भोजन-पानी ही तो सब कुछ नहीं है। भोजन, वस्त्र या मकान के आगे किसी मजदूर को आपने कुछ दिया है क्या? इसीलिए यह महापुरुष कहते हैं– धन यौवन का गर्व न कीजै, झूठा पँचरंग चोल री।– झूठा अर्थात् नश्वर! यह आज है तो कल नहीं रह जायेगा। यह छिति, जल, पावक, गगन और समीर– इन पंच नश्वर तत्त्वों से निर्मित एक खोल है, आवरण है। इसके भुलावे में मत आओ। एक अन्य पद में कबीर ने ऐसा ही सन्देश दिया है। लोग मिलने पर परस्पर पूछा करते हैं– कुशल तो है? उत्तर में मिलता है– हाँ, हाँ! कुशल ही है। पुत्र की पदोन्नति हो गयी, नाती अमेरिका पढ़ने गया है, पनत का जन्म हो गया, पौत्र के विवाह के लिए उसे देखनेवाले आ रहे हैं……. यह कुशल, वह कुशल! इतने में आयु के दिन पूरे हो गये। जिस कमी की पूर्ति के लिए हमें दुर्लभ मानव-तन मिला था, उसके लिए तो हमने सोचा ही नहीं।

कुसल कुसल कहत जग बिनसे, कुसल काल की फाँसी।

कह कबीर एक राम भजन बिनु, बाँधे जमपुर जासी।।

वृद्धावस्था तक लोग भजन के लिए समय नहीं निकाल पाते। वे कहते हैं– गठिया-बतास आजकल कुछ ठीक है, स्वाँस भी नहीं फूल रही है, च्यवनप्राश मिल रहा है, वृद्धा पेंशन मिल रही है। कबीर कहते हैं– यह कुशल नहीं है, काल का फेंका फन्दा है। इसमें-उसमें मन लगाया कि ‘राम नाम सत्य है’; पहुँचा दिये गये मणिकर्णिका घाट! जहाँ समय पूरा हुआ, मनुष्य न एक श्वास अधिक ले पाता है और न ही एक ग्रास अधिक खा पाता है। तो भला कुशल कहाँ है? कह कबीर एक राम भजन बिनु बाँधे जमपुर जासी।– बरबस जकड़कर यमलोक पहुँचा दिये जाओगे। जब वृद्धावस्था की यह हालत है, जवानी तो अँधेरी रात है; न जाने कहाँ ऊँचे-नीचे पैर पड़ जाय, व्यक्ति कहीं भी गिर सकता है। इससे बचने के लिए क्या करें? कबीर उपाय बताते हैं–

शून्य महल में दीप जलाकर आसन से मत डोल री।

तोहें पीव मिलेंगे।।

शून्य महल? भजन करते-करते जब चित्त संकल्प-विकल्प से रिक्त हो जाता है, अन्त:करण में शान्ति छा जाती है, मन में सन्नाटा हो जाता है–यही शून्य महल है। उस समय अन्त:करण में न शुभ और न ही अशुभ संकल्पों का उदय होता है। जहाँ संकल्पों का आवरण हटा तो भक्ति का दीप निर्विघ्न जलने लगता है, प्रकाश मिलने लगता है– राम भगति मनि उर बस जाकें। दुख लवलेस न सपनेहुँ ताकें।। (मानस, ७/११९/९)– विभक्ति माने अलगौझी; भक्ति माने जुड़ना। सुरत भगवान से जुड़ जाती है, भक्तिरूपी मणि प्राप्त हो जाती है। इस भक्ति का उतार-चढ़ाव नाम पर है–

राम नाम मनिदीप धरु, जीह देहरीं द्वार।

तुलसी भीतर बाहेरहुँ, जौं चाहसि उजिआर।। (मानस, १/२१)

रामनाम मणिदीप है। पहले पूर्वजों के पास मणियों के दीपक हुआ करते थे। प्रकाश के लिए मणि रख दिया। बत्ती ठीक करो, तेल भरो– ऐसा कुछ भी नहीं था। गरीबों का यह प्रयोग तो बहुत बाद में आया। गोस्वामीजी उसी मणि-दीप का रूपक रामनाम को देते हैं कि इस नामरूपी मणि को जीह की देहरी पर रख दो तो भीतर-बाहर दोनों ओर प्रकाश हो जायेगा। बाहर का मायिक अंधकार वहाँ स्पर्श नहीं कर पायेगा; क्योंकि मणि से निरन्तर प्रकाश मिल रहा है। रामनाम में लव लगी है तो माया आयेगी कैसे!

रामनाम– भगवान का नाम तो सभी जपते हैं; हम भी, आप भी लेकिन यह मणि जिह्वा के द्वार पर टिकती ही नहीं। पाँच मिनट हम सब राम-राम कहते हैं लेकिन छठवें मिनट मन हवा से बातें करने लगता है, न जाने यह कहाँ चला जाता है। हम मणि को जिह्वा पर रखते हैं, वह टिकती ही नहीं। कारण यह है कि भीतर संकल्पों की भीड़ लगी हुई है। चिन्तन करते-करते चित्त जब संकल्प-विकल्प से शान्त हुआ, यह मणि स्थायित्व ले लेती है।

मणि रखने का यह अर्थ नहीं है कि हम सब कुछ पा गये। यह ठीक है कि मायिक अन्धकार का अब प्रवेश नहीं होगा किन्तु मणि के प्रकाश में हमें इष्ट तक की दूरी तय करनी है इसलिए आसन से मत डोल री। आसन के सन्दर्भ में सन्त कबीर की साखी है–

आसन मारे क्या हुआ, मिटी न मन आस।

ज्यों कोल्हू के बैल को, घर ही कोस पचास।।

यह पद्मासन! यह सिद्धासन! आसन लगाकर बैठने से क्या होगा? यह तो शरीर के उठने-बैठने की मुद्राओं को हमने आसन नाम दे रखा है। इससे मन की आशाएँ तो नहीं मिटीं। जिस प्रकार घर में लगे हुए कोल्हू का बैल घर के बाहर झाँकता भी नहीं, एक कमरे में ही घूमता हुआ वह दिनभर में पचासों कोस का चक्कर लगा लेता है, थककर बैठ जाता है। उसी प्रकार कभी-कभी मन इतना अशान्त हो जाता है कि नींद नहीं आती। कोई खिन्न होकर एकान्त कोठरी में बैठ जाता है। आसन तो लग गया लेकिन अन्त:करण में शोक-संवेदना की लहरें उठती रहती हैं। इस आसन से क्या लाभ?

इसीलिए योग-साधना में आसन की परिभाषा है– स्थिरसुखमासनम्(पातंजल योगदर्शन, साधनपाद, ४६)– स्थिर और सुखपूर्वक बैठने का नाम आसन है। चलचित्र देखनेवाले भी सुखपूर्वक स्थिर बैठते हैं। आश्रम के एक भक्त रामबाबू सेठ हैं। वह अपनी दुकान पर एक आसन से कभी-कभी दस-बारह घण्टे बैठे रह जाते हैं लेकिन शरीर के आकार-प्रकार का नाम आसन नहीं है। पूर्वजों में अनेक ऐसे महापुरुष हुए हैं जिनके शरीर का आसन लगा ही नहीं। अष्टावक्रजी के अंग टेढ़े-मेढ़े थे, वह कौन-सा आसन लगाते! किन्तु वह महाराज जनक के गुरु और उस युग के सर्वोपरि महापुरुष थे। हमारे गुरु महाराज के गुरु सत्संगी महाराज का एक पैर टूट गया था। वह पालथी मारकर कभी बैठे ही नहीं; किन्तु उन्हीं के लिए गुरु महाराज को आकाशवाणी हुई कि इस मन्दिर में तुम्हारे गुरु महाराज हैं। वास्तव में वह महापुरुष थे। वस्तुत: आसन मन का होता है। आसन का आशय है कि मन सब ओर से संकल्प-विकल्प से रहित होकर शान्त सम टिकने लगे। इसीलिए योगदर्शन के प्रणेता महर्षि पतंजलि बताते हैं कि आसन कैसे सिद्ध होता है?–

प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम्। (योगदर्शन, २/४७)

यम और नियम अर्थात् अिंहसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह; शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान में जो हमारा प्रयत्न चल रहा था, उसमें शिथिलता आ जाय, यह क्रियाएँ सहज होने लगें तथा अनन्त एकमात्र परमात्मा में मन लगाने से आसन सिद्ध होता है। यदि शरीर के बाहरी आकार-प्रकार का नाम आसन होता तो परमात्मा में मन लगाने की क्या आवश्यकता थी? यही कबीर कहते हैं कि मन जब संकल्प-विकल्प से शून्य हो चले, वृत्ति जहाँ शान्त प्रवाहित हुई, रामनामरूपी मणिदीप प्रकाशित हो उठेगा, अब मणि कण्ठ से हटेगी ही नहीं। दीप जल गया तो आसन लग गया। यह आसन लगना भी पर्याप्त नहीं है। तब तक निरन्तर लगे रहें जब तक कि प्रभु सँभाल न लें, वह लक्ष्य विदित न हो जाय। इस प्रकार लगे रहने का परिणाम कबीर अग्रेतर पंक्ति में कहते हैं–

जोग जुगुति सो रंग महल में, पिया पायो अनमोल री।

योग एक युक्ति है, एक कला है। जो जेहि कला कुसल ता कहँ सोइ सुलभ सदा सुखकारी। सफरी सनमुख जलप्रवाह सुरसरी बहै गज भारी।। (विनयपत्रिका, १६७) पहले संस्कारों की भीड़ से भरा महल था, चित्तवृत्ति जब संकल्प-विकल्परहित प्रवाहित हुई, मन शून्य महल बन गया, रामनाम मणिदीप जगमगाने लगा तो ईश्वरीय विभूतियाँ प्रसारित होने लगीं। मन रंगमहल बन गया। सब रंग कच्चा सँवरिया रंग पक्का।एक प्रभु का रंग ही अपरिवर्तनशील है।

रंग भूमि जब सिय पगु धारी।

देखि रूप मोहे नर नारी।। (मानस, १/२४७/४)

रंगभूमि; जहाँ प्रभु का रंग बरसने लगा, प्रभु की विभूतियाँ अवतरित होने लगीं। कबीर ने भी प्रभु के स्वरूप को एक रंग की संज्ञा दी है–

लाली मेरे लाल की जित देखूँ तित लाल।

लाली देखन मैं चली मैं भी हो गई लाल।।

परमात्मा एक लाली है, एक आभा है। जित देखूँ तित लाल– जहाँ भी दृष्टि पड़ी, परमात्मा ही दिखायी पड़ा। यह चिन्तन की एक अवस्था- विशेष है–

सरगु नरकु अपबरगु समाना।

जहँ तहँ देख धरें धनु बाना।। (मानस, २/१३०/७)

न स्वर्ग स्वर्ग के रूप में रह गया जिसकी हम कामना करें और न नरक नरक के रूप में रह गया जिससे हम भयभीत हों। जित देखूँ तित लाल– जहाँ भी देखा, प्रभु की लालिमा ही दिखायी पड़ी, प्रभु का शाश्वत रंग ही दिखाई पड़ा और ज्योंही हमने लाली का स्पर्श किया, हम भी लाल हो गये। हम खो गये और वह प्रभु ही शेष बच गया– जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।(मानस, २/१२६/३)– उन्हें जानकर वही हो गया। जहाँ स्पर्श किया, पिया मिल गये। पहले विभूतियाँ उतरती हैं, भगवान अपनी स्थिति से अवगत कराते हैं और जहाँ स्पर्श किया तो पिया मिल गये। अनमोल– उनके समान कुछ है ही नहीं।

रामचरितमानस का प्रसंग है। चित्रकूट से लौटकर भरत राम के विरह में व्याकुल थे, दिन-रात चिन्तन में लगे थे, शरीर कृश हो चला था, आँखों में अश्रु थे। चौदह वर्ष पश्चात् जब भगवान लौटे तो हनुमान ने भरत को उसी दशा में बैठा पाया–

बैठे देखि कुसासन जटा मुकुट कृस गात।

राम राम रघुपति जपत स्रवत नयन जलजात।। (मानस, ७/१)

आँखों में आँसू, कण्ठ पर नाम, हृदय में राम! अति दुर्बल, खिन्न! हनुमान ने भरत को इस दशा में देखा।

देखत हनूमान अति हरषेउ।

पुलक गात लोचन जल बरषेउ।। (मानस, ७/१/१)

हनुमानजी के शरीर में रोमांच हो गया, प्रेमाश्रु छलक आये।

मन महँ बहुत भाँति सुख मानी।

 बोलेउ श्रवन सुधा सम बानी।। (मानस, ७/१/२)

उन्होंने अपने मन में बहुत प्रकार से सुख मानते हुए अमृत के समान वाणी कहा–

जासु बिरहँ सोचहुँ दिन राती।

रटहु निरन्तर गुन गन पाँती।।

रघुकुल तिलक सुजन सुखदाता।

आयउ कुसल देव मुनि त्राता।। (मानस, ७/१/३-४)

जिसके वियोग में आप रात-दिन घुलते रहे, जिनके गुणों की पंक्तियाँ आप निरन्तर स्मरण करते रहते हैं, शत्रुओं को रण में जीतकर, सीता और अनुज के सहित सकुशल वह प्रभु आ गये।

सुनत बचन बिसरे सब दूखा।

तृषावन्त जिमि पाइ पियूषा।। (मानस, ७/१/६)

इतना सुनते ही भरत का सारा दु:ख दूर हो गया, मानो एक गिलास जल के लिए तृषित व्यक्ति अमृत पा गया हो। वह उल्लसित हो खड़े हो गये, बोले–

एहि संदेस सरिस जग माहीं।

करि बिचार देखेउँ कछु नाहीं।।

नाहिन तात उरिन मैं तोही।

अब प्रभु चरित सुनावहु मोही।।

तात! इस सन्देश के समान सृष्टि में कुछ भी नहीं है जिसे देकर मैं तुमसे उऋण हो सकूँ। हनुमान! मैं आपका ऋणी हूँ। अब आप हमें प्रभु का विशद चरित्र सुनायें। हनुमान ने उन्हें बताया कि यह समय चरित्र सुनने का नहीं है। यह विमान जो आ रहा है, इसी में हैं प्रभु राम! आप स्वागत की व्यवस्था करें। इसके पश्चात् भरत कभी लौटकर नंदिग्राम की गुफा में नहीं गये और न राम-राम ही जपा। अब भजन हमारा हरि करें, हम पायो विश्राम।प्रभु मिल ही गये तो सृष्टि में उनसे मूल्यवान बचा ही क्या? पहले तो सृष्टि का कुछ मूल्य दिखायी पड़ रहा था किन्तु जहाँ उन प्रभु को जाना, प्रकृति पुरुषोत्तम में परिवर्तित हो गयी–

जेहि जानें जग जाइ हेराई।

जागें जथा सपन भ्रम जाई।। (मानस, १/१११/२)

जगत् खो गया, मानो एक स्वप्न आया और तिरोहित हो गया– ईशावास्यमिदं सर्वम्– प्रकृति बची ही नहीं, हम क्या दें? इसलिए पिया पायो अनमोल री…..’– प्रभु अनमोल हैं, कुछ देकर उऋण हुआ ही नहीं जा सकता। माना कि हमने तन-मन-धन सब कुछ त्यागा किन्तु इस त्याग से वह मिलते नहीं दीखते। वह जब भी मिलते हैं, अपनी अनुकम्पा से मिलते हैं। उनके मिलने का सत्परिणाम क्या निकला?

कहत कबीर आनन्द भयो है, अनहद बाजत ढोल री।

कबीर कहते हैं– प्रभु के मिलते ही आनन्द छा गया। राम बिमुख न जीव सुख पावै।(मानस, ७/१२१/१८) जब है ही नहीं तो पायेगा कहाँ?

जो आनन्द सिन्धु सुख रासी।

सीकर तें त्रैलोक सुपासी।। (मानस, १/१९६/५)

भगवान आनन्द के समुद्र हैं, सहज सुख की राशि हैं। जब वह अनमोल परम प्रिय उतर ही आये, तो अनहद बाजै ढोल री। तोहे पीव मिलेंगे। हद कहते हैं सीमा को, अनहद कहते हैं असीम को! असीम अनन्त तो एकमात्र परमात्मा है, उस परमात्मा के यहाँ डंका बजने लगा। उस स्थिति में खुशियों की उमंग सदैव उठती रहती है।

अनहद भजन का सर्वोच्च शिखर है लेकिन उसकी निम्नतम सीमा वहाँ से है जब भजन में लव लग जाय। आज आप दो-चार घण्टे भजन में बैठते हैं, कोई-कोई सन्त दस घण्टे, बारह घण्टे, कोई सोलह घण्टे भी लगातार लवलीन होकर भजन में लगे रहते हैं फिर भी उनका भजन एक सीमा में ही है; किन्तु एक स्तर ऐसा भी आता है कि,

जागत में सुमिरन करे, सोवत में लौ लाय।

सुरत डोर लागी रहे, तार टूट ना जाय।।

जब तक जागो, सुमिरन करो। सोने लगो तब भी लव लगाकर शयन करो। जब भी नींद खुले तो सुरत वहीं लगी मिले। भजन का क्रम टूटने न पाये। पूज्य महाराजजी हमलोगों को बताया करते थे, ‘‘हो! रात के ठीक दो बजे हमारी नींद खुल जाती थी। जहाँ आँख खुले तो भक से गुरु महाराज का स्वरूप मेरे हृदय में आ जाय। फिर एक ही बैठकी में सवेरे के छ: बज जाते थे।’’

साधक को चाहिए कि भजन के लिए बैठने पर आँखें भली प्रकार खुली रखें। जिसकी पलकें जितना अधिक देर तक खुली रहेंगी, उतना ही शीघ्र ध्यान लगता है। बन्द आँखों से भजन होता ही नहीं, ध्यान ही नहीं लगता बल्कि नींद भी आ जाती है। इसलिए आँख खुलते ही पहला संकल्प आये तो नाम; दृश्य आये तो गुरु महाराज का रूप! इसी क्रम से चलते-चलते जहाँ मूल का स्पर्श हुआ, तहाँ प्रकृति की सीमाएँ समाप्त और भजन की सीमा भी समाप्त! वह स्थिति आ जाती है कि भजन हमारा हरि करें, हम पायो विश्राम।हम तो हो गये पेंशनर! फिर भरत गुफा में कभी नहीं गये। जिसको पाना था, पा लिया। इसके आगे ढूँढ़ें किसे? यह अनहद है, परमात्मा है। अब कुछ भी पाना शेष नहीं है। वह प्रभु अवश्य मिलेंगे। लेकिन कपट केवड़िया खोल– छल-छद्म छोड़ो, निश्छल निर्लेप होकर प्रभु के समक्ष हो जाओ।

जीव जड़ स्वभाव का होता ही है इसलिए वह कपट का आचरण आसानी से छोड़ नहीं पाता। धृतराष्ट्र ने सदा ही कपट किया। अपने पुत्रों की तुलना में पाण्डुपुत्रों का उत्कर्ष उसे खटक रहा था। उसने राजनीतिज्ञ अपने कुटिल मंत्री कुणक से परामर्श किया। उसने कहा– ‘‘राजन्! सन्न्यासियों की भाषा बोलो कि हमें राज्य और वैभव की कोई इच्छा नहीं है। भीतर क्रोध भरा रहने पर भी पाण्डुपुत्रों से प्रिय बोलो। उन्हें अपने विश्वास में ले लो और समाप्त कर दो।’’ आग में जलाने का परामर्श उसी ने दिया था। लाक्षागृह का षड्यन्त्र उसी की देन थी। द्यूत के आमंत्रण से वनवासपर्यन्त के कुचक्रों में धृतराष्ट्र की मौन सहमति थी। वनवास के अन्त में पाण्डव लौटकर अपना राज्य न माँगें, इसके लिए उसने संजय द्वारा युधिष्ठिर को एक संदेश भेजा। उसने कहा– ‘‘संजय! प्रिय युधिष्ठिर का शिर सूँघना और कहना, तुम्हारे अन्धे वृद्ध और अशक्त ताऊ को बस एक ही कष्ट है कि तुमलोग दु:ख में हो। मेरा पुत्र दुर्योधन बड़ा धूर्त है, मेरा कहना ही नहीं मानता। तुम्हारा राज्य तुम्हें सौंपना नहीं चाहता जिससे आपस में युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गयी है। प्रिय अनुजपुत्र! दुर्योधन हठी है किन्तु तुम तो समझदार हो। भाई-भाई का झगड़ा ठीक नहीं है इसलिए प्रिय अनुजपुत्रो! तुमलोग जंगल में ही रह लो। जंगल में रहने का तुम्हें अभ्यास भी हो चला है। किसी भी मूल्य पर शान्ति बनाये रखने में ही तुम्हारी महानता है।’’

युधिष्ठिर ने इस निवेदन को बड़े पिता की विवशता समझ स्वीकार ही कर लिया होता किन्तु संयोग से भगवान श्रीकृष्ण भी वहीं थे। उन्होंने कहा– ‘‘राजन्! यह शान्ति का संदेश जहाँ से आया है, उसका क्रियान्वयन भी पहले वहीं से होना चाहिए। आप केवल उनके अनुजपुत्र ही नहीं, क्षत्रिय हैं, राजा हैं। आपका क्षात्रधर्म, राजधर्म क्या कहता है? आप सबने प्रतिज्ञाएँ कर रखी हैं, उनका क्या होगा?’’ अंतत: युधिष्ठिर ने संजय से कहा कि ‘‘पिताजी का चरणस्पर्श कर कहना कि आपके प्रति पूर्ण श्रद्धा रखते हुए मैं क्षत्रिय-धर्म का पालन करूँगा। ’’

भीषण संग्राम हुआ। भाइयों और सहायकों समेत दुर्योधन मारा गया। विजयोपरान्त भाइयों सहित युधिष्ठिर श्रीकृष्ण को साथ लेकर धृतराष्ट्र का आशीर्वाद लेने गये। धृतराष्ट्र क्रोध से बौखलाया था फिर भी शान्ति का प्रदर्शन करते हुए उसने पूछा– ‘‘केशव! युद्ध में किसकी विजय हुई?’’ भगवान ने कहा– ‘‘राजन्! आपका आशीर्वाद जिसके साथ था, आपके उन अनुजपुत्रों की विजय हुई है। जहाँ धर्म है, वहाँ विजय होती है। राजन्! यह धर्मराज युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव और मैं वासुदेव कृष्ण आपको प्रणाम करते हैं।’’

भीम का नाम सुनते ही धृतराष्ट्र की भावभंगिमा बदलने लगी। उसका शरीर ऐंठने लगा। उसने कहा– ‘‘पहले प्रिय भीम को मेरे पास ले आओ। मैं उससे गले मिलना चाहता हूँ।’’ भोला-भाला भीम आगे बढ़ा। श्रीकृष्ण ने भीम का हाथ पकड़कर पीछे खींच लिया और लोहे की बनी भीम की उस मूर्ति को आगे बढ़ाने का संकेत किया जिस पर दुर्योधन गदा प्रहार का अभ्यास करता था। जन्मान्ध धृतराष्ट्र ने न कभी भीम का स्पर्श किया था न लोहे की उस मूर्ति का। वह लोहे की उस मूर्ति को ही भीम समझ उससे लिपट पड़ा। उसने मूर्ति की गर्दन मरोड़ दी, हाथ उखाड़ दिये और रक्त का वमन करते हुए मूर्च्छित हो गया। पाण्डव खड़े-खड़े तमाशा देख रहे थे। किञ्चित् होश आने पर वह बड़बड़ाया– ‘‘बदला ले लिया! प्रिय दुर्योधन, तुम्हारा बदला मैंने ले लिया।’’

चैतन्य होने पर धृतराष्ट्र को अपने प्राणों की रक्षा की चिन्ता होने लगी। फिर वह छल-छद्म करने लगा– ‘‘केशव! यह क्या हो गया? मुझ जन्मान्ध से क्या हो गया? मुझ मंदबुद्धि से क्या अनर्थ हो गया?’’ वह कहना चाहता था– जो कुछ हुआ, अनजाने में, अकस्मात् हो गया। श्रीकृष्ण बोले– ‘‘नहीं, राजन्! आज जो कुछ करेंगे, वह राजनीति का ही कोई पाठ होगा। आप अनर्गल तो कुछ कर ही नहीं सकते। आप महान राजनीतिज्ञ हैं सम्राट!’’

यह सुनकर धृतराष्ट्र घबड़ाया– कहीं भीम बच तो नहीं गया! उसने पूछा– ‘‘केशव! यहाँ कौन-कौन खड़े हैं?’’ श्रीकृष्ण बोले– ‘‘धर्मराज युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव! सभी तो हैं। मैंने आपके अन्तर्भाव को भाँपकर लोहे की बनी भीम की मूर्ति को आपको पकड़ा दिया था।’’ तब धृतराष्ट्र बोला– ‘‘केशव! इस भीम ने मेरे सभी पुत्रों की हत्या कर दी। इसने मेरे एक भी पुत्र को नहीं छोड़ा कि वह मेरी वृद्धावस्था में दो घूँट पानी तो पिलाता इसीलिए मैं विवेक खो बैठा था। प्रिय भीम! मुझे क्षमा कर दो। युधिष्ठिर! मुझे क्षमा कर दो।’’

श्रीकृष्ण ने कहा– ‘‘राजन्! अपने पुत्रों की हत्या आपने स्वयं की है। राज्य तो आपका था ही नहीं। आप तो शासन चलाने के लिए बैठाये गये थे किन्तु पुत्र-मोह में पड़कर सही उत्तराधिकारी को राज्य सौंपना नहीं चाहते थे। लाक्षागृह आपकी दुरभिसन्धि थी, द्रौपदी चीरहरण में आप हैं, जुए में आप हैं, भीम को जहर देने में आप हैं। हर षड्यन्त्र में आपकी सहभागिता रही है। जिस तरह आप आँखों से अन्धे हैं, उसी तरह हृदय से काले भी हैं लेकिन विजय सत्य की होती है राजन्!’’

अस्तु, जीव का स्वभाव है छिपाना। अंततोगत्वा धृतराष्ट्र ने भी समझ लिया कि श्रीकृष्ण से तो कुछ छिपा ही न था। पाण्डव तमाम षड्यन्त्रों से बचते रहे केवल इनके कारण। यह तो सब जानते हैं, अन्तर्यामी हैं। धृतराष्ट्र का दुराव-छिपाव – यही तो है घूँघट। इस स्वभाव से विवश होकर लोग भगवान से भी छल-कपट कर बैठते हैं। सुदामा भी ऐसा कपट कर बैठे थे। वह श्रीकृष्ण के हिस्से का एक मुट्ठी चना चबा गये थे। श्रीकृष्ण ने पूछा– ‘‘गुरुमाता ने चने दिये थे, कहाँ हैं?’’ सुदामा ने कहा– ‘‘दोनों हाथों से मैंने वृक्ष पकड़ रखा है, लगता है कहीं गिर गये।’’ जबकि सुदामा चने खा रहे थे, उससे कट-कट की ध्वनि आ रही थी। श्रीकृष्ण ने पूछा– ‘‘तुम्हारे दाँत क्यों कटकटा रहे हैं?’’ सुदामा ने कहा– ‘‘दुर्बल ब्राह्मण हूँ भैया! दाँत तो शीत से बज रहे हैं।’’ श्रीकृष्ण ने कहा– ‘‘ठीक है सुदामा! एक मुट्ठी चना हमारा तुम्हारे ऊपर ऋण रहा।’’ उस एक मुट्ठी चने के पीछे सुदामा जीवनभर भूखे मरते रहे। उनकी वृद्धावस्था आ गयी, तब कहीं प्रायश्चित पूरा हुआ। श्रीकृष्ण की कृपा से उन्हें सबकुछ मिल गया जिसके अधिकारी वह पहले से ही थे। लोग सोचते हैं कि वह जो कर रहे हैं, उनकी योजना कोई नहीं जानता; किन्तु वास्तविकता तो यह है कि हम संकल्प बाद में करते हैं, भगवान पहले से ही सब जानते हैं। हम उनसे कुछ छिपा भी तो नहीं सकते।

लोकव्यवहार में आप जो करते हैं, करें; किन्तु चिन्तन-पथ में जो हृदय में हो, वही जबान पर भी होना चाहिए; क्योंकि आप लाख पर्दा करने का प्रयास करें, वह पहले से ही जानते हैं। उनसे कुछ भी पर्दा नहीं है। श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध में कथा आती है कि गोपियाँ यमुना में स्नान कर रही थीं। श्रीकृष्ण उनका चीर लेकर कदम्ब वृक्ष पर चढ़ गये और बाँसुरी बजा दिया। तब गोपियों को अपने वस्त्रों का ध्यान आया। उन्होंने कहा– ‘‘कन्हैया! हमारे वस्त्र दे दो।’’ श्रीकृष्ण ने कहा– ‘‘नदी से बाहर आकर अपने-अपने वस्त्र पहचान कर ले लो।’’ गोपियों ने कहा– ‘‘हम निर्वस्त्र हैं, बाहर कैसे आ सकती हैं?’’ श्रीकृष्ण ने पूछा– ‘‘वस्त्र के बिना तुमलोग गयी कैसे?’’ गोपियों ने कहा– ‘‘उस समय यहाँ कोई था ही नहीं।’’ श्रीकृष्ण ने कहा– ‘‘पागल हो गयी हो। देखो यमुना के जल में मैं हूँ, तुम्हारे हृदय में मैं तुम्हारी आत्मा हूँ, आकाश में मैं हूँ, पृथ्वी पर मैं हूँ। मैं कहाँ नहीं हूँ?’’ जब गोपियों ने देखा कि कन्हैया सर्वत्र हैं तो उनसे क्या छिपाना! वह निश्छल होकर सामने आ गयीं। घूँघट अर्थात् भगवान और साधक के बीच में कपट का जो पर्दा था, हट गया। ‘घूँघट के पट खोल’। भगवान ने उन्हें वस्त्र दे दिया।

यह चीरहरण प्रसंग भी वास्तव में आध्यात्मिक रूपक है। गोपी = गो अर्थात् इन्द्रियों का प्रतीक है। ये उच्छृंखल होती हैं। इन्हें चराने में सतर्क रहो। विवेक, वैराग्य, शम, दम, श्रद्धा और समर्पण से ये संयत होती हैं तथा काम, क्रोध, राग और द्वेष से ये विकृत होती हैं। इन्द्रियाँ जब इष्टोन्मुखी हो जाती हैं तो त्यागरूपी तालाब में अवगाहन करने लगती हैं। काया ही कदम्ब है, उसमें भगवान अवतरित हो जाते हैं। वह दिव्य वस्त्र प्रदान करते हैं, फिर यह जीवात्मा कभी निर्वस्त्र नहीं होता। आज सौभाग्य से आप सब वह तन पाये हैं जिस पर वस्त्र पहना जाता है। कदाचित् वह तन मिल गया गाय, बैलवाला; वहाँ कौन-सा वस्त्र, कोट-पैन्ट पहनेंगे? भगवान द्वारा प्रदत्त वस्त्र से आप फिर कभी निर्वस्त्र नहीं होंगे, कृष्णमय हो जायेंगे। चित्त ही चीर है, योग ही यमुना है। योगारूढ़ता आते ही भगवान आत्मा में अपना प्रसारण करने लग जाते हैं, फिर तो जीव अपने लक्ष्य परमात्मा में समाहित होकर ही रहता है।

आज प्राय: लोग कहते हैं कि यह करो, वह मत करो; पुण्य करो, पाप मत करो जबकि भजन जागृत ही नहीं है। आप भजन की गीतोक्त विधि पकड़ें। ज्यों-ज्यों आपके भजन-संयम का स्तर उठेगा, वह भजन बीज से पौधा, पौधे से वृक्ष हो उठेगा जिसमें समय पर फूल-फल आयेंगे। जहाँ फल का स्वाद मिला, कड़वी बुराइयाँ स्वत: छूट जायेंगी।

।। ॐ श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय ।।

(अमृतवाणी भाग-5’ से उद्धृत)

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