चदरिया झीनी झीनी बीनी

चदरिया झीनी झीनी बीनी

चदरिया झीनी झीनी बीनी

राम नाम रस भीनी……चदरिया……….।।

काहे कै ताना काहे कै भरनी

कौन तार से बीनी……..चदरिया……….।।

इंगला पिंगला ताना भरनी

सुषमन तार से बीनी…..चदरिया……….।।

आठ कँवल दल चरखा डोले,

पाँच तत्त गुन तीनी…….चदरिया……….।।

साईं को सिअत मास दस लागे,

ठोंक ठोंक के बीनी…….चदरिया……….।।

सो चादर सुर नर मुनि ओढ़े,

ओढ़ि के मैली कीनी…..चदरिया……….।।

दास कबीर जतन से ओढ़ी,

ज्यों की त्यों धर दीनी….चदरिया……….।।

आपके शरीर के अन्दर एक सूक्ष्म शरीर है। वह है चित्त का विस्तार, मन का विस्तार! उसी के सम्बन्ध में यह भजन है। प्राय: कुछ लोग कहते हैं कि यह शरीर ही चादर है जिसे भगवान ने दस महीनों में बनाया है; किन्तु शरीर चदरिया नहीं है, शरीर तो रहने का एक मकान है। यह चादर तो सदा राम रस भीनीहै और राम के रस में तो चित्त ही भींग सकता है, शरीर नहीं। कोई काम-काम जपता है, कोई क्रोध-क्रोध जपता है। रामरस में कहाँ भींगा रहता है किसी का चित्त? सन्त कबीर कहते हैं कि मेरा चित्त तो सदा रामरस में सराबोर है। गुरुनानक कहते हैं–

राम नाम उर में गयो, ताके सम नहिं कोय।

जा सिमरत संकट मिटे, दरस तिहारो होय।।

राम-नाम हृदय में जाते ही, उसके साथ ही प्रभो! आपका दर्शन हो जाता है और सदा-सदा के लिए संकट कट जाता है। यही कबीर कहते हैं कि चदरिया सदा राम रस भीनी। इसकी बिनाई बहुत सूक्ष्म है– चदरिया झीनी झीनी बीनी। कितना सूक्ष्म है? संत कबीर कहते हैं–

पानीहू ते पातरा, आसमान ते झीन।

पवनहू ते उतावला, दोस्त कबीरा कीन।।

कबीर ने बताया कि भगवान कैसे हैं? वह कहते हैं– पानी से पतला, आकाश से भी सूक्ष्म झीना! वेग से चलने का उपमान वायु है। लोग कहते हैं, उसने वायुवेग से रथ हाँका। वह भगवान वायु से भी अनन्त गुना वेगवान है। दोस्त कबीरा कीनअर्थात् कबीर ने उससे मित्रता कर ली। भगवान जब कृपा करते हैं तो स्वामीभाव, सख्यभाव और कभी वात्सल्य भाव में भी भक्तों का निर्वाह करते हैं। यह चदरिया बहुत झीनी है। संसार मोटी परत है जिसमें चित्त रमा है। परमात्मा इससे बहुत सूक्ष्म है। तुलसिदास कह चिदबिलास जग, बूझत बूझत बूझै।– तुलसीदास ने कहा कि चित्त का पसार ही जगत् है लेकिन यह बात समझ में आते-आते ही समझ में आती है। यह कहने से समझ में नहीं आती। चित्त तो इतना बड़ा जितना संसार; लेकिन भजन के प्रभाव से सिमटकर प्रभु के रंग में रंग गया। परमात्मा तो अतिसूक्ष्म है, कण-कण में व्याप्त है। पृथ्वी पर जैसे गंगा की धारा बहती है इसी प्रकार सूर्य-चन्द्रमा, पृथ्वी-पाताल, लोहे और ठोस चट्टानों में भी वह परमात्मा अविरल प्रवाहित है; उन सबकी जीवनी-शक्ति के रूप में है इसलिए परमात्मा झीना है। हमने अपने चित्त को उस झीने में, अतिसूक्ष्म परमात्मा में बीन दिया है, उससे सराबोर कर दिया है। यह बिनाई आपने किस प्रकार की?–

काहे कै ताना काहे कै भरनी, कौन तार से बीनी।

बुनाई करते समय ताना सीधे खड़े धागे को कहते हैं। आड़ा पड़ा धागा बाना है जिसे भरनी भी कहते हैं जिसे काठ की ढरकी से दायें-बायें धागा फैलाकर पंजे से ठोंकते हैं। इस चदरिया को बुनने में धागा कौन-सा लगाया?–

इंगला पिंगला ताना भरनी, सुखमन तार से बीनी।

चदरिया झीनी झीनी बीनी।।

अध्यात्म जगत् में मेरुदण्ड में तीन नाड़ियों की मान्यता है। दाहिनी नाड़ी पिंगला का सम्बन्ध दाहिने स्वर से है। इंगला या इड़ा नाड़ी का सम्बन्ध बायें स्वर से है। इन दोनों के मध्य की नाड़ी सुषुम्ना है। कबीर कहते हैं– इंगला-पिंगला से हमने ताना और भरनी किया अर्थात् स्वाँस का भजन किया।

पूज्य महाराज जी का कहना था कि जो महात्मा लोग स्वाँस का भजन नहीं जानते, उनको महापुरुष अपनी कुटिया में दो रोटी भी नहीं देते थे क्योंकि वह स्वयं तो गुमराह है, घूम-घूमकर लोगों को पथभ्रष्ट ही करेगा; वह भजन से शून्य जो है।

जपने के नाम का उतार-चढ़ाव स्वाँस पर है। एक ही नाम को चार श्रेणियों से जपा जाता है– बैखरी, मध्यमा, पश्यन्ती और परा। नाम वही है, उसके साथ विशेषण बढ़ता जाता है। आरम्भ में नाम पर बैखरी का विशेषण है, उन्नत होने पर वही नाम मध्यमा, पश्यन्ती और परा के स्तर से गुजरता है।

सभी लोग आरम्भ में ही परावाणी के स्तर का जप नहीं कर सकते; जैसे– शिशु या प्राथमिक कक्षा के छात्र परास्नातक या शोध की पुस्तक नहीं पढ़ सकते। आरम्भ में उन्हें वर्णमाला ‘ए फार एप्पल’, ‘क माने कबूतर’ सीखना ही पड़ता है। इसी प्रकार आरम्भिक स्तर पर प्रभु के नाम का जप ‘ॐ-ॐ’ या ‘राम-राम’ वाणी से इस प्रकार जपें कि सबको सुनाई पड़े। इस जप की ध्वनि वाणी से व्यक्त होती है इसलिए इसे बैखरी वाणी का जप कहा जाता है। मस्ती से प्रभु का नाम जपते जायँ।

जपने का द्वितीय स्तर मध्यमा है। मध्यम अर्थात् धीरे-धीरे आहिस्ता-आहिस्ता इस प्रकार से उच्चारण करें कि कोई पास बैठा हो तो उसे न सुनाई पड़े; आप अवश्य उच्चारण करें और सुनें भी। इस मध्यमा वाणी का जप कण्ठ की सहायता से होता है, कुछ जिह्वा का भी सहयोग रहता है। अनवरत जपते जायँ; जैसे– नीरव रात्रि में झींगुर बोलता है- झिन-झिन-झिन…..; क्रम ही नहीं टूटता; इसी प्रकार राम-राम कण्ठ से उच्चारण करें, कहें भी सुने भी, लेकिन पास बैठने वाले को पता न चले। बैखरी का उच्चारण स्पष्ट था, यह क्षीण स्वर में है, अन्तर इतना ही है। नाम वही है।

वाणी का तीसरा उन्नत स्तर पश्यन्ती है। पश्य का अर्थ है देखना। पश्यन्ती वाणी– जप का उतार-चढ़ाव स्वाँस पर है, जिह्वा का इसमें कोई सहयोग नहीं मिलता। मन को द्रष्टा बनाकर खड़ा कर दें, आती-जाती स्वाँस का निरीक्षण करें कि श्वास कब अन्दर गयी, उसे जानें; भीतर कितनी देर रुकी, इसे जानें; कब बाहर आयी उसे जानें; बाहर कितनी देर रुकी उसे भी देखें; फिर अन्दर कब गयी, उसे देखें। दो-तीन बार अभ्यास के पश्चात् जब देखने की क्षमता आ जाय तो आहिस्ते से, चिन्तन से उस श्वास में नाम को ढाल दें। श्वास अन्दर गयी तो ‘ओम्’, बाहर आई तो ‘ओम्’! यदि ‘राम’ जपते हैं तो ‘रा’ और ‘म’। स्वाँस भीतर लेते समय ‘रा’ की भावना और श्वास बाहर निकालते समय ‘म’ की भावना करें। स्वाँस से ही ‘रा’ और ‘म’ जपें। कुछ दिन तो इस प्रकार जपना पड़ेगा, फिर आप देखेंगे कि स्वाँस सिवाय नाम के और कुछ कहती ही नहीं। कुछ दिन जप करते-करते स्वाँस में प्रसुप्त नाम जागृत हो उठेगा; फिर जपै न जपावै, अपने से आवै– न तो आप जपें न जपने के लिए मन को बाध्य करें। एक बार नाम में सुरत लगा दें, नाम की डोर लग जायेगी, धुन बँध जायेगी– ‘रा….म, रा…..म’ या ‘ओ….म्, ओ…..म्’। यही है– रा और म के बीच में कबिरा रहा लुकाय।– रा और म इन दो अक्षरों के अन्तराल में कबीर छिपकर रहते थे। अब इतना बड़ा शरीर इन दो अक्षरों के बीच कैसे छिप गया?

वस्तुत: मनुष्य वहीं रहता है जहाँ उसका मन रहता है। कबीर अपने मन को इन दो अक्षरों के अन्तराल में रोकने में सक्षम हो गये थे। पश्यन्ती की पूर्ति और परा के प्रवेश में नाम स्वाभाविक रूप से श्वास में ढल जाता है। उस समय यह साधारण नाम मंत्र की संज्ञा पा जाता है। इसीलिए मन्त्र देने से नहीं आता, अनुभवगम्य है। साथ-साथ भगवान (गुरु महाराज) बताते जाते हैं कि– बेटा! कब तुम कितना लग पाये और कितना नहीं; क्या गड़बड़ी है और कैसे सुधार करें? वह पीछे लग जाते हैं।

चौथी वाणी परा है। इसे परा इसलिए कहते हैं कि यह अब परम में प्रवेश दिला देनेवाली है। अब उस परमतत्त्व को पाने के लिए वाणी में परिवर्तन नहीं लाना पड़ेगा। इस श्रेणी के जप को अजपा कहा जाता है। अजप अर्थात् न जप! कोई तो नहीं जपता तो क्या हो गया अजपा? नहीं, यदि आप नहीं जपते तो अजपा नाम की कोई वस्तु भी आपके पास नहीं है। हम न जपें और जप हमारा साथ न छोड़े। एक बार स्वाँस में सुरत लगा दें तो तैलधारावत् श्वास खड़ी हो जाय। उस समय रिनक धिनक धुन अपने से उठे। उस अजपा की परिपक्व अवस्था में–

जप मरे अजपा मरे, अनहदहू मरि जाय।

सुरत समानी सबद में, ताहि काल ना खाय।।

जप नितान्त आवश्यक है लेकिन जप मरे कब? जब अजपा जागृत हो जाय। अजपा मरे कब? जब अनहद की धुन जागृत हो जाय। अनहद भी समाप्त हो जाती है। कब? जब सुरत शब्द में समाहित हो जाय। सुरत मन की दृष्टि का नाम है। मन सब ओर से सिमटकर पहले तो स्वाँस में लगे। सुरत से वह देख रहा था शब्द को, स्वाँस का जप कर रहा था। वह सुरत शब्द में समा जाय और केवल शब्दमात्र शेष रह जाय, सुरत से देखने का भान न रह जाय। जिस क्षण यह अवस्था आयी, दूसरे ही क्षण काल से अतीत जो अकाल पुरुष है उसका दर्शन, उसमें स्थिति और उसकी रहनी मिल जायेगी। फिर न उसे कुछ पाना शेष है, न सृष्टि में कुछ मिटाना शेष है और न ही कोई भय। इस प्रकार योग-साधना में जप का उतार-चढ़ाव स्वाँस के ऊपर है।

यही सन्त कबीर कहते हैं– इंगला पिंगला ताना भरनी, सुखमन तार से बीनी।स्वाँस-प्रस्वाँस का यजन– यह तो ताना भरनी हो गया और यजन करते-करते साधना इतनी सूक्ष्म हो गयी कि सुखमन-अवस्था आ गयी– मन सुखपूर्वक श्वास में प्रवाहित हो गया। आज आप भजन में मन लगाने का प्रयास करते हैं तो मन भागता है, अन्य-अन्य संकल्प-विकल्प करने लगता है। भजन के नाम पर बैठने पर कभी सरदर्द करने लगता है, कभी चक्कर आने लगता है, भूत-भविष्य की कल्पनाएँ करने लगता है; किन्तु पश्यन्ती की पूर्ति और परा के प्रवेश के साथ ही वही मन की खुराक हो जाता है, वही मन का जीवन हो जाता है। मन को भजन में सुख मिलने लगता है। सुखमना अवस्था में चद्दर तैयार हो जाती है। उस समय चित्त अतिसूक्ष्म कण-कण में व्याप्त परमात्मा के रंग में रंग जाता है। आरम्भ में जिस चित्त का विस्तार बहुत बड़ा था साधना से सिमटते-सिमटते अतिसूक्ष्म, सबके हृदय में निवास करनेवाले परमात्मा के तारों में बुन उठा। पहले वही चित्त भाग रहा था। कहाँ भागता है? प्रकृति में!

आठ कँवल दल चरखा डोले, पाँच तत्त गुन तीनी।

आप भजन में लगते हैं किन्तु चित्त का चरखा डोलता रहता है। यह जाता कहाँ है? अष्टधा मूल प्रकृति, पाँच तत्त्व और तीन गुणों में जाता है। माया का मूल इतना ही है इसलिए इसे मूल प्रकृति कहते हैं। प्रकृति में विद्या और अविद्या दोनों हैं। अविद्या मल है, अंधकार है और विद्या प्रकाश है, निर्मल है। संसार में रहते हुए यदि संकल्प भी आये तो कमल की तरह! कमल जल में रहता है, लहरें आती हैं किन्तु जल उसे गीला नहीं कर सकता। कीचड़ में रहते हुए भी वह उससे निर्लेप है। चित्त संसार में भागता है, किन्तु संसार में इस प्रकार रहे जैसे जल और कीचड़ में भी कमल रहता है। चित्त संसार से विकार लेकर न आये बल्कि निर्दोष-निर्मल ईश्वरीय विभूति से ओतप्रोत होकर जीवनयापन करना चाहिए। प्रश्न उठता है क्या आपने स्वयं भजन कर लिया, चदरिया बुन ली? स्वाँस का भजन क्या आप कर लेंगे? कबीर अगली पंक्ति में बताते हैं– नहीं,

साईं को सिअत मास दस लागे।

साईं अर्थात् स्वामी, सद्गुरु, भगवान! जिस परमात्मा की हमें चाह है वह! सद्गुरु वाणी से साधक को तभी तक समझाते हैं जब तक उसकी आत्मा से अभिन्न होकर खड़े नहीं हो जाते। ज्योंही वह आत्मा से संचारित हो गये वह वाणी से दस-पाँच प्रतिशत ही बताते हैं और हृदय से ही सम्पूर्ण उपदेश देते रहते हैं कि हमारा भजन कब सही है, कब गलत है, कब उद्वेग या व्यवधान आनेवाला है?– इसकी जानकारी वह हृदय से देते रहते हैं। वह संकेत करते रहते हैं कि अब इधर चल, अब बैठ जा, यह काम न कर, इसे कर! उदाहरण के लिए आप घोर अँधेरे में चले जा रहे हैं। अगले कदम पर सर्प है, वह आपको काट लेगा। भगवान कह देंगे कि ‘बस, खड़े हो जाओ।’ आप खड़े हो जाइए। जब सर्प निकल जायेगा तब संकेत मिलने लगेगा कि ठीक है, अब आगे बढ़ो। इस तरीके से प्रकृति का खोह-खंदक बचाते हुए भगवान लक्ष्य तक की दूरी तय करा देते हैं। इसलिए भजन करता तो साधक है लेकिन उसके द्वारा जो पार लग जाता है वह उन महापुरुष की देन है। इसलिए–

साईं को सिअत मास दस लागे, ठोंक ठोंक के बीनी।

भगवान ठोंकाई भी करते हैं। जब परमात्मा से मिलने की स्थिति समीप आ जाती है तो भगवान परीक्षा लेते हैं कि यह मन-क्रम-वचन से मुझमें अनुरक्त है या अभी इसमें कुछ माया है?

पार्वती भगवान शिव के लिए भजन कर रही थीं। परमात्मा राम ने शंकर जी से अनुरोध किया। भोलेनाथ ने सप्तर्षियों को बुलाया कि जाकर परीक्षा लो कि उसकी लगन कैसी है? सप्तर्षि गये। पार्वती से उन्होंने पूछा– ‘‘आप किसकी कन्या हैं?’’ उन्होंने बताया– ‘‘हिमाचल नरेश की।’’ ऋषियों ने पूछा– ‘‘इतना कठोर तप करके आप चाहती क्या हैं?’’ उन्होंने कहा– ‘‘मैं सदैव शिव को पतिरूप में चाहती हूँ।’’ ऋषियों ने कहा– ‘‘ऐसा उपदेश आपको किसने कर दिया?’’ पार्वती ने कहा– ‘‘नारद जी ने।’’ ऋषियों ने कहा– ‘‘देवी! वह धूर्त है। चित्रकेतु का घर उसने नष्ट किया। हिरण्यकशिपु के साथ भी यही हुआ। दक्ष प्रजापति के लड़के उसका उपदेश सुनकर घर ही नहीं लौटे। नारद का उपदेश सुनकर आज तक किसी का घर बसा है क्या? भल भूलिहु ठग के बौराये– तुम उस ठग के बहकावे में आ गयी। वह तो ठग है।’’ पार्वती ने उत्तर दिया–

नारद बचन न मैं परिहरऊँ।

बसउ भवनु उजरउ नहिं डरऊँ।।

गुर के बचन प्रतीति न जेही।

सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही।। (मानस, १/७९/७-८)

तजउँ न नारद कर उपदेसू।

आपु कहहिं सत बार महेसू।। (मानस, १/८०/६)

भगवान शिव सौ बार कहें तब भी मैं नारद जी के उपदेश को त्याग नहीं सकती। गुरु के वचनों में जिन्हें विश्वास नहीं है, उसे स्वप्न में भी न सुख है न सिद्धि। उसके लिए न तो यह लोक है और न परलोक। सप्तर्षि लौट गये।

पार्वती की तपस्या अनवरत चलती ही रही। सप्तर्षि पुन: उनके पास आये और कहा– ‘‘अभी तुम तपस्या कर ही रही हो! गजब हो गया। शंकर जी ने तो कामदेव को जला दिया। अब विवाह किससे करोगी? किन्तु चिन्ता करने की कोई बात नहीं है। हमारी दृष्टि में तुम्हारे लिए एक अच्छा-सा वर है। वह हैं विष्णु – बैकुण्ठ के निवासी! अखण्ड समृद्धि! अपरिमित ऐश्वर्य! शिव के पास तो मात्र एक बूढ़ा-सा बैल है।’’ शैलजा ने उत्तर दिया–

महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम।

जेहि कर मन रम जाहि सन तेहि तेही सन काम।। (मानस, १/८०)

ऋषिवरो! माना कि शिवजी सारे दुर्गुणों की खान और विष्णु सारे सद्गुणों के भण्डार हैं, फिर भी जिसका मन जिसके साथ रम गया, उसका उसी से प्रयोजन होता है। आपकी दृष्टि में शिव ने अब कामदेव को जलाया। क्या अब तक वे विकारी थे? किन्तु हमारी दृष्टि में शंकर सदैव अकाम, अविकारी, अभोगी और पूर्णयोगी हैं। यही समझकर यदि हमने शिव की उपासना की है तो भगवान मेरे प्रण को अवश्य पूर्ण करेंगे। यदि शादी-विवाह की बिचवई किये बिना आपलोगों से नहीं रहा जाता तो ऋषिवरो! संसार में वर-कन्या बहुत हैं, आप वहाँ प्रयास कीजिए। बहुत विलम्ब हो गया, अब आप सब अपने घर को प्रस्थान करें। सप्तर्षियों ने देखा कि हमलोग इन्हें विचलित नहीं कर पायेंगे तो उन्होंने माता पार्वती को प्रणाम किया और लौट गये। शंकरजी ने भी परीक्षा ली, पार्वती उत्तीर्ण रहीं।

इन्हीं परीक्षाओं में अनेकानेक ऋषि-मुनि असफल होते रहे हैं। उदाहरण के लिए शृंगी की भृंगी करि डारी, पारासर के उदर विदार।– असफल होने पर भी यह लोग साधना में लगे ही रह गये। यही है ठोंक ठोंक के बीनी। प्रह्लाद को कितनी यातनाएँ झेलनी पड़ीं। मीरा को शूली पर लिटाया गया, विषपान कराया गया, सर्प का हार पहनाया गया, देश निकाला दे दिया गया; किन्तु मीरा जब मेड़ता से निकली, लोगों को अग्रिम सूचना-संकेत मिलने लगे। लोग स्वप्न देखने लगे कि मीरा आ रही है। वृन्दावन में भीड़ मीरा की प्रतीक्षा कर रही थी। वहाँ मीरा के भजन सुननेवालों का ताँता लग गया। पहले मीरा चित्तौड़ की महारानी थी, अब जगत् की महारानी हो गयी। किन्तु इतने दिनों में मीरा की कितनी ठोंकाई हुई? भगवान चाहते तो जहर ही न आता, शूली ही न होती, देश से निष्कासन ही न होता। अस्तु, भगवान अपने भक्त की परीक्षा लेते हैं – इतनी बड़ी उपलब्धि प्रदान करना है, अपना स्वरूप, अपना धाम देना है। प्रभु पात्रता का परीक्षण करते हैं। वह माया को आदेश देते हैं कि जरा इसे ठोंक, बजा! इसीलिए हमलोगों की दृष्टि में कोई माया नहीं आती, भगवान की अनुकम्पा ही समझ में आती है, चाहे वह कुटिल रूप में ही क्यों न आये। माया का अपना कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है।

साईं को सिअत मास दस लागे– दस मास अर्थात् दसो इन्द्रियाँ– पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय– इनमें जब तक आशा का सूत्र लगा है तब तक चद्दर माया में रंगी है, अभी वह अतिसूक्ष्म परमात्मा में नहीं रंगी, आकाश से भी महान्, कण-कण में व्याप्त झिनबे में नहीं रंगी, बल्कि कुछ-न-कुछ माया में, वासनाओं में आशा लगाये हुए हैं। जहाँ इनमें से आशाओं का सूत्र टूटा, चादर तैयार हो जाती है।

साधक मात्र नाथा हुआ बैल है। बैल कभी हल नहीं जोतता। हल तो हलवाहा जोतता है जो बैल के पीछे हल की मुठिया पकड़कर चलता है। आधुनिक परिवेश में ट्रैक्टर हल नहीं जोतता, हल ड्राइवर जोतता है। ट्रैक्टर को कहाँ आँख या बैल को इतना ज्ञान कहाँ कि हल कैसे जोता जाता है? इसी प्रकार साधक में क्षमता कहाँ कि वह भजन कर ले। भजन भगवान करते हैं, साधक तो उसके हाथ का यंत्रमात्र है। यंत्र हमें बनना पड़ेगा फिर तो थोड़ी बहुत ठोंकाई के बाद भगवान साधक की बागडोर अपने हाथ में ले लेंगे और जाके रथ पर केसो। ता कहँ कौन अँदेसो।अंत में कहते हैं– इस चादर को ओढ़ा किसने?

सो चादर सुर नर मुनि ओढ़े, ओढ़ के मैली कीन्हीं।– इस चद्दर के ओढ़ने वाले तीन लोग हैं– सुर, नर और मुनि! सुर उसे कहते हैं जिसके हृदय में दैवी सम्पद् ढल गयी हो, जो सुरा में विचरण की क्षमता रखता हो। सुर योग-साधना की एक श्रेणी है, परमदेव परमात्मा को विदित करा देने वाली वृत्ति है जो स्वभाव में ढल गयी है। दैवी सम्पद् ने जिसके हृदय में स्थायित्व ले लिया है, वह देवताओं-जैसा है। उसके पास चद्दर है। उसके पास भजन के अन्तराल में अतिसूक्ष्म ब्रह्म से बीनी हुई चित्तवृत्ति है।

दूसरे लोग हैं मुनि, जो मननशीलता की सीमा पर पहुँच गये हैं। जिसकी मनसहित इन्द्रियाँ मौन हैं उसे मुनि कहते हैं। उस स्तर के साधक के पास भी चद्दर होती है। उन पर भगवान की अनुकम्पा है और उनके संरक्षण में भजन है। उनका चित्त प्रभु से ओतप्रोत है। भगवान के अन्दर सराबोर, बुना हुआ, गूँथा हुआ है।

तीसरी श्रेणी नर की है। सामान्य मनुष्य नर नहीं है और न माताएँ इस अर्थ में नारी हैं। नर भजन-पथ में एक अवस्था का चित्रण है। गोस्वामी जी ने रामचरितमानस की रचना की जिसमें उन्होंने मानस-रोग भी गिनाये–

मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला।

तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला।। (मानस, ७/१२०/२९)

मोह सम्पूर्ण व्याधियों का मूल है। इससे अनन्त शूलों की सृष्टि होती है; जैसे–

काम बात कफ लोभ अपारा।

क्रोध पित्त नित छाती जारा।। (मानस, ७/१२०/२९)

काम वात का रोग, कफ लोभ और क्रोध पित्त का रोग है।

प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई।

उपजइ सन्यपात दुखदाई।। (मानस, ७/१२०/३१)

जिस हृदय में काम-क्रोध-लोभ– तीनों भाई एक साथ मिलकर क्रियाशील होते हैं तो दु:खदाई सन्यपात रोग हो जाता है। सन्निपात अर्थात् ‘आसन्न निपात’ (निकट मृत्यु)। वह जलन और वेदना से तड़पता रहता है, न दिन चैन न रात। इतना ही नहीं,

अहंकार अति दुखद डमरुआ।

दंभ कपट मद मान नेहरुआ।। (मानस, ७/१२०/३५-३६)

अहंकार गाँठ का दर्द है। दम्भ, कपट, मद और मान नसों का रोग है। तृष्णा उदरवृद्धि का भयंकर रोग है। इस प्रकार पन्द्रह-पचीस रोगों का चित्रण किया। अन्त में मानसकार ने निर्णय दिया–

एक ब्याधि बस नर मरहिं ए असाधि बहु ब्याधि।

पीड़हि संतत जीव कहुँ सो किमि लहै समाधि।। (मानस, २/१२१ क)

उपर्युक्त व्याधियों में से एक भी व्याधि यदि स्पर्श कर ले तो नर मर जाता है। नर कोई ऐसा स्वरूप है जिसके पास ये रोग नहीं हैं– काम-क्रोध-लोभ-मोह-आशा-तृष्णादिक विकार नहीं हैं; किन्तु आक्रामक के रूप में सब-के-सब खड़े हैं, मरा इनमें से कोई नहीं है। कदाचित् किसी रोग ने स्पर्श कर दिया तो एक ब्याधि बस नर मरहिं।– नर मर जाता है और कदाचित् सभी रोग किसी के पास हैं तो वह जीव है, जड़ है, उसे समत्व प्राप्त होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। नर वह है मायारूपी नारी के प्रभाव से जिसका चिन्तन निर्लेप है। ऐसी स्थितिवाले नरश्रेणी के पास यह चद्दर है। जो झीना है, पृथ्वी-पाताल, चतुर्दिक, जर्रे-जर्रे में सर्वत्र विद्यमान है, दिखायी नहीं देता, उस परमात्मा से जिसका चित्त सराबोर है, उनके पास चद्दर की पकड़ है लेकिन ओढ़ के मैली कीनी– सुर, नर, मुनि तीनों के पास चद्दर की पकड़ है लेकिन तीनों ने ओढ़कर इसमें दाग लगा दिया अर्थात् इन तीनों स्थितियों में माया कामयाब हो जाया करती है। माया इस स्थितिवालों को भी पकड़कर घसीट सकती है।

काबुल में एक सन्त हुए हैं। बचपन में ही वह गृह त्यागकर साधु हो गये। वह आजीवन उन्मत्त पागल की तरह भजन करते रहे। उनकी आधी उम्र तक लोगों ने सोचा– यह पागल हैं किन्तु आधी आयु बीतते-बीतते लोगों के मन में ऐसी प्रेरणा होने लगी कि नहीं, नहीं, यह महापुरुष हैं। उनकी आयु लगभग पचहत्तर वर्ष हो चली थी। वह घनघोर जंगल के किनारे झाड़ियों में एक साधारण-सी कुटी में निवास करते थे। वहाँ आदिवासी लोगों का आना-जाना था।

एक दिन उनकी परीक्षा की घड़ी आयी। अतीव सुन्दरी एक शहजादी उनके समक्ष आकर खड़ी हो गयी। उसकी वेशभूषा भी राजसी थी। महात्मा को दया आ गयी– अरे! यहाँ शेर-चीता चारों ओर हैं। यहीं जल का भी एक स्रोत है जहाँ वन्यजीव पानी पीने आते ही रहते हैं; क्योंकि अन्यत्र क्षेत्र में कहीं जल भी नहीं है। यदि यह पगडंडी से जंगल में भटक गयी तो बेचारी प्राणों से भी हाथ धो बैठेगी। महात्मा ने विचार किया– इसे रास्ता बता दूँ।

महात्मा ने उससे पूछा– ‘‘तुम कौन हो? कोई तुम्हारे साथ है या नहीं?’’ वह मुस्कुराई और पीछे हट गयी। महात्मा बोले– ‘‘अरे! यह जंगल है। रास्ता भटक जाओगी तो मर भी जाओगी। तुम्हें कहाँ जाना है? बता दो तो मैं रास्ता बता दूँ।’’ वह और भी पीछे हट गयी। महात्मा खड़े हो गये। उन्हें और भी दया आ गयी– लगता है बड़े घर की है, लाड़-प्यार में पली है इसलिए उच्छृंखल लगती है। उन्होंने पुन: पूछा– ‘‘बता तो!’’ वह दौड़ने लगी, बाबा भी उसके पीछे भागने लगे।

महात्मा सोचते जा रहे थे, यह रुक जाती तो इसे रास्ता बताते। यदि यही चाल रही तो मैं कहाँ तक दौड़कर इसे बचा पाऊँगा। लगता है यह आज जंगली रास्तों में अवश्य भटक जायेगी। दौड़ते-हाँफते बाबा एकाध किलोमीटर चलकर रुक गये। नयी उम्र की लड़की के साथ बाबा कहाँ तक दौड़ते! हताश होकर वह खड़े हो गये– अब तो नहीं बतायेगी, मरे चाहे जीये।

तब तक आकाशवाणी हुई– जो पूरी जिन्दगी बड़े वेग से जन्नत की ओर भागा जा रहा था, आज वही उतने ही वेग से दो़जख की ओर भागा जा रहा है। आज से चौथे दिन तुम्हें नबूबत (अवतार की स्थिति) मिलनेवाली थी लेकिन तुम चूक गये! इतना सुनना था कि महात्मा ने कुल्हाड़ी उठाई और अपने पाँव काट डाले कि इन पैरों का दोष है, जबकि गरीब पाँवों का कोई दोष ही नहीं था। दोष तो मन का था किन्तु मन दिखायी दे तब न काटें। महात्मा के मन में उस लड़की के प्रति कोई दुर्भावना नहीं थी; किन्तु भजन छोड़कर वह लोक-व्यवहार में दयावश चले गये थे। इसीलिए कहा गया है कि साधनाकाल में लोक-व्यवहार वर्जित है। सीताजी रावण पर दया कर रेखा से बाहर चली आयीं तो उन्हें लंका जाकर भोगना पड़ा। मनुष्य आज की परिस्थिति जानता है लेकिन भगवान जानते हैं कि आज का परिणाम दो महीने पश्चात् क्या निकलेगा? वह महात्मा भजनानन्दी थे। आजीवन तपस्या ही की थी उन्होंने। थे तो वह चद्दरवाले। दैवी सम्पद् प्रवाहित थी उनमें। विकारों से निर्लेप वह नर भी थे। उनकी मनसहित इन्द्रियाँ भी मौन थीं, समाज में कभी कुछ बोले ही नहीं; किन्तु परीक्षा की घड़ी आयी तो दाग लग ही गया– यह चादर सुर नर मुनि ओढ़े, ओढ़ के मैली कीन्हीं।दाग तो लग गया, एक जन्म का झटका तो लग गया; किन्तु–

दास कबीर जुगुत सों ओढ़ी, ज्यों की त्यों धरि दीन्हीं।

चदरिया झीनी झीनी बीनी।।

दास अर्थात् सेवक, समर्पित भक्त; प्रभु के हाथ में यन्त्र बनकर चलनेवाला पथिक। वह कहते हैं– सुर-नर-मुनि ने वह चादर ओढ़कर मैली कर दी; किन्तु कबीर ने उस चदरिया को ओढ़कर ज्यों-की-त्यों रख दी। वास्तव में, जिस प्रकार सुर-नर-मुनि योग-साधना की स्थितियाँ हैं, उसी प्रकार ‘कबीर’ शब्द भी एक अवस्था का चित्रण है। काया का वीर स कबीर! जो काया पर अंतिम विजय प्राप्त कर लेता है, फिर न विद्या है न अविद्या है; सुख है न दु:ख है; माया है न आगे पाने के लिए कोई ब्रह्म है– इस प्रकार काया पर पूर्ण विजय की जिस क्षण स्थिति आई तो ‘ज्यों की त्यों धरि दीनी चदरिया’। जो सहज है, स्वयंसिद्ध है, बिधि न बनाये हरि आपु बनि आये।जैसा है, उसी स्थिति में अपने को प्रवाहित कर दिया।

लाली मेरे लाल की, जित देखूँ तित लाल।

लाली देखन मैं गयी, मैं भी हो गयी लाल।।

भगवत्प्राप्ति की खुमारी जब चढ़ी तो सर्वत्र ईश्वरमयी दृष्टि हो गयी– जित देखूँ तित लाल। यह तो वैसा ही है कि–

सरगु नरकु अपबरगु समाना।

जहँ तहँ देख धरें धनु बाना।। (मानस, २/१३०/७)

जहाँ भी ऐसे भक्त की दृष्टि पड़ी, अपने आराध्य देव को खड़ा पाया, अर्थात् जित देखूँ तित लालऔर लाली देखन मैं गयी, मैं भी हो गयी लाल।– जहाँ उस मूल का स्पर्श किया तो हम भी उसी रंग में रंग गये। पूज्य महाराज जी कहते थे– नमक की एक पोटली समुद्र की थाह लेने चली, घुलकर वह भी समुद्र हो गयी। अब लौटकर संदेशा कौन दे? यही है ज्यों-की-त्यों चदरिया रख देना।

आरम्भ में हर साधक का चित्त कठोर होता है। वह काम-क्रोध, राग-द्वेष का पूरा संसार भरकर खड़ा है। तुलसीदास जी ने कहा–

विटपमध्य पुतरिका, सूत महँ कंचुकि बिनहिं बनाये।

मन महँ तथा लीन नाना तनु, प्रगटत अवसर पाये।। (विनय-पत्रिका, १२४)

एक वृक्ष के अन्दर नाना प्रकार के फर्नीचर विद्यमान हैं। आप उससे दियासलाई, कुर्सी-टेबल जो चाहें बना लें, उसमें ये सब मौजूद हैं। यद्यपि आप लकड़ी फाड़े, उसमें टेबल-कुर्सी नहीं दिखाई देगा। एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा ये गठित होते हैं। इसी प्रकार सूत के तन्तु में नाना प्रकार के वस्त्र– कुर्ता बनाओ, पैण्ट-शर्ट बनाओ, पैराशूट बना लो– सब उसके अन्तराल में विद्यमान हैं। ठीक इसी प्रकार मन के अन्तराल में विधाता की सृष्टि के सारे मॉडल विद्यमान हैं। जब जिसका क्रम आता है, यह मन पिण्डरूप में उन्हें फेंकता रहता है। इस प्रकार चित्त इतना बड़ा है जितना संसार।

असन, बसन, पसु बस्तु बिबिध बिधि, सब मनि महँ रह जैसे।

सरग, नरक, चर अचर लोक बहु, बसत मध्य मन तैसे।। (विनय-पत्रिका, १२४)

एक मूल्यवान् मणि में असन माने भोजन, बसन माने वस्त्र, धन-धाम, इज्जत-प्रतिष्ठा, सवारी-साधन– सब विद्यमान हैं; ठीक इसी प्रकार मन के अन्तराल में स्वर्ग-नरक इत्यादि चराचर लोक विद्यमान हैं। जब जिसका संस्कार आता है, आकार धारण करता जाता है।

यह चित्त प्रकृति में घुला-मिला है। इसे उधर से खींचकर राम-रस से धुलाई करें और झिनवा-सा बीन दें। झीना अर्थात् सूक्ष्म! आत्मा ही सूक्ष्म है। इसे शस्त्र नहीं काट सकते, आग नहीं जला सकती, वायु नहीं सूखा सकता, आकाश विलय नहीं कर सकता और न ही यह कुछ होकर भी अन्य कुछ होनेवाला है। यह सदा एकरस, शाश्वत और सनातन है। यह सर्वत्र व्याप्त है, यहाँ भी विद्यमान है। उस अतिसूक्ष्म ब्रह्म के धागे में हमने अपने चित्त को बुन दिया– जहाँ सुख नहीं, दु:ख नहीं; प्रकृति भी नहीं है; इसलिए सबको भजन ही करना चाहिए।

भजन का उतार-चढ़ाव चित्त के ऊपर है। शरीर तो भजन करने के लिए आपको मकान मिला है, स्थान मिला है। इसलिए मनसहित इन्द्रियों को बस में करें और मन को सब ओर से समेटकर गुरु महाराज के चरणों में लगा दें।

वैदिककाल के महात्मा लोग ‘ॐ’ का जप करते रहे, इसीलिए महापुरुषों ने इस पर बल दिया– एक ओंकार सतगुर प्रसादि!’ उस ओंकार को हम ढूँढ़ नहीं सकते। वह जब कभी किसी को मिला है तो सतगुर प्रसादि– सद्गुरु के कृपा-प्रसाद से ही प्राप्त होता है, अन्य कोई तरीका है ही नहीं। उस परमात्मा को प्राप्त करने की कुञ्जी सद्गुरु हैं। वहाँ तक पहुँचने का रास्ता सत्गुरु से होकर गुजरता है।

भक्तिकाल के महापुरुषों ने जप के लिए ‘राम’ शब्द का अधिक प्रयोग किया है। वस्तुत: ‘राम’ शब्द ‘ओम्’ का ही हिन्दी अनुवाद है। रमन्ते योगिन: यस्मिन् स राम:– जिसमें योगी लोग रमण करते हैं, उसका नाम ‘राम’ है। ॐ या राम दोनों का आशय एक, जपने में सुविधा एक-जैसी और परिणाम भी एक ही है। अत: आप भी सन्त कबीर की तरह अपने चित्तरूपी चदरिया को झिनवा-सा बीनने में संलग्न हो जायँ।

!! ॐ श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय !!

(अमृतवाणी भाग-3’ से उद्धृत)

Q & A
×