चुनर में दाग कहाँ से लागल
चुनर में दाग कहाँ से लागल।
यह चुनरी मोरी रंग महल की, बड़े जतन से राखल।
दुइ दुइ सिपहिया द्वारे पै ठाढ़े, सास ननदिया जागल।।
चुनर में……।।
आठ कोठरिया दस दरवाजे, दसहों में ताला लागल।
कौनौ अनरूप से चोरवा आइल, दाग लगा के भागल।।
चुनर में……।।
ना मैं मोही सास ननदिया, ना कोइ देवर लागल।
ना मैं मोही गोदी के बलकवा, चुनर भई कस काजल।।
चुनर में……।।
यह चुनरी मैं मलि–मलि धोई, धोवत धोवत भइ पागल।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, हरि जी से नेहिया लागल।।
चुनर में……।।
भजन करनेवालों और भगवान के बीच यदि कोई रुकावट है तो उनकी चित्तवृत्ति है, अन्य कुछ भी नहीं। ये वृत्तियाँ अनन्त हैं। महापुरुष पतञ्जलि ने उन्हें पाँच भागों में बाँटा है। इसी वृत्ति को सन्त कबीर चुनर की संज्ञा देते हैं। गोस्वामी तुलसीदास का भी यही निर्णय है। दाग चित्त में ही लगता है–
जो निज मन परिहरै बिकारा।
तौ कत द्वैत–जनित संसृति–दुख, संसय, सोक अपारा।। (विनयपत्रिका, पद १२४)
यदि मन विकारों का त्याग कर दे तो संसार का अपार शोक, दु:ख और सन्ताप क्यों रहे?
असन, बसन, पसु बस्तु बिबिध बिधि, सब मनि महँ रह जैसे।
सरग, नरक, चर अचर लोक बहु, बसत मध्य मन तैसे।।
एक बहुमूल्य मणि में असन माने भोजन, बसन माने वस्त्र, इज्जत-प्रतिष्ठा, धन-धान्य, सवारी-साधन सब विद्यमान हैं क्योंकि उससे यह सब कुछ खरीदा जा सकता है। ठीक इसी प्रकार मन में स्वर्ग और नरक, चर और अचर सारे लोक विद्यमान हैं।
बिटप–मध्य पुतरिका, सूत महँ कंचुकि बिनहिं बनाये।
मन महँ तथा लीन नाना तनु, प्रगटत अवसर पाये।।
जिस प्रकार एक वृक्ष में नाना प्रकार के फर्नीचर अन्तर्निहित हैं, चाहे पलंग बना लें चाहे तख्त; जिस प्रकार सूत के अन्तराल में नाना प्रकार के वस्त्र हैं, चाहे धोती बना लें चाहे कुर्ता, पैण्ट, शर्ट या पैराशूट, सब उस तन्तु में विद्यमान हैं। ठीक इसी प्रकार मन में विधाता की सृष्टि के अनन्त शरीरों के धब्बे विद्यमान हैं। जब जिस संस्कार का समय आता है, मन पिण्डरूप में उसे फेंकता रहता है। मन और चित्त पर्यायवाची शब्द हैं। इन्हीं धब्बों को कबीर ने दाग की संज्ञा दी है कि ‘चुनर में दाग कहाँ से लागल!’
यह उस स्तर का भजन है जब साधक सारा संयम साध चुका होता है। अब दाग की कोई संभावना नहीं रह गयी। फिर यह दाग कहाँ से लग गया? आपकी चुनरी कैसी है? इस पर कहते हैं–
यह चुनरी मोरे रंगमहल की, बड़े जतन से राखल।
संसार का रंगमहल वह सुसज्जित कक्ष है जहाँ नववधू का पति से प्रथम मिलन होता है किन्तु अध्यात्म में ‘सब रंग कच्चा, सँवरिया रंग पक्का।’ सभी रंग परिवर्तनशील; केवल एक रंग, एक स्वरूप ही अपरिवर्तनशील है– परमात्मा, जिससे संसार के समस्त जीवों ने थोड़ा-थोड़ा रंग और आभा प्राप्त किया है–
लाली मेरे लाल की, जित देखूँ तित लाल।
लाली देखन मैं चली, मैं भी हो गइ लाल।।
सन्त कबीर ने परमात्मा को एक रंग की संज्ञा दी कि उस प्रभु की आभा ‘जित देखूँ तित लाल’ और जहाँ उन प्रभु का स्पर्श किया तो ‘मैं भी हो गयी लाल’। मीरा कहती हैं, ‘मैं तो गिरधर के रँग राती।’
इसी सन्दर्भ में सन्त कबीर कहते हैं– ‘यह चुनरी मेरे रंग महल की’ अर्थात् चित्तरूपी चुनरी परमात्मा के रंग से ओतप्रोत है। ‘बड़े जतन से राखल’– बड़े श्रम के साथ, यत्न के साथ इस चुनर को सँभालकर रखना पड़ता है; परमात्मा के रंग में रँगे हुए चित्त को कठोर संयम के साथ यत्न करके रखना पड़ता है। कौन सा यत्न किया आपने? इस पर कहते हैं–
आठ कोठरिया दस दरवाजे दसहूँ में ताला लागल।
‘आठ कोठरिया’ अर्थात् अष्टधा मूल प्रकृति जिसमें पंच महाभूत छिति, जल, पावक, गगन, समीर, मन, बुद्धि, अहंकार आते हैं। ‘दस दरवाजे’– इस प्रकृति के भोगने के रास्ते दस हैं, दस इन्द्रियों द्वारा की प्रकृति का आदान-प्रदान होता है। इन ‘दसहूँ में ताला लागल’– दस इन्द्रियों को हमने संयमित कर लिया। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– ‘सर्वद्वाराणि संयम्य’ (गीता, ८/१२)– इन्द्रियों के सारे दरवाजों को संयमित कर, मन को हृदय-देश में निरुद्ध कर, ॐ का जप करते हुए जो देह का अध्यास छोड़ देता है, वह परमपद को प्राप्त होता है। ठीक इसी का अनुवाद जैसा संत कबीर की वाणी में भी है कि ‘आठ कोठरिया’ (अष्टधा मूल प्रकृति), ‘दस दरवाजे’ (प्रकृति को भोगने के रास्ते), इन दसों में संयम का ताला लग गया; फिर चुनर में दाग कहाँ से लग गया? इतना ही नहीं, कुछ यत्न और भी किया गया–
दुइ दुइ सिपहिया द्वारे पे ठाढ़े, सासु ननदिया जागल।
दरवाजे पर दो-दो प्रहरी सुरक्षा के लिए नियुक्त हैं। अभ्यास और वैराग्य योगपथ के भरोसेमन्द प्रहरी हैं। भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं– अर्जुन! यह मन नि:सन्देह वायु से भी तेज चलनेवाला है किन्तु ‘अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।’ (गीता, ६/३५)– सतत् अभ्यास और वैराग्य के द्वारा इस चित्त का निरोध हो जाता है। महर्षि पतञ्जलि कहते हैं– ‘अभ्यास वैराग्याभ्यां तन्निरोध:।’ (योगदर्शन, समाधिपाद, सूत्र १२)– अभ्यास और वैराग्य के द्वारा इन चित्तवृत्तियों का भली प्रकार निरोध हो जाता है। इष्टप्राप्ति के लिये साधन समझकर सतत् प्रयत्न का नाम अभ्यास है और देखी-सुनी वस्तुओं में राग का त्याग वैराग्य है। कबीर के रूपकों के भी यही दो सिपाही हैं। यही से साधना आरम्भ होती है और जब तक दर्शन नहीं करा देते तब तक इनका प्रयोग उत्तरोत्तर वृद्धि की ओर होता है लेकिन होता अवश्य है। कबीर इस पद में कहते हैं कि योगपथ के ये दोनों सिपाही दरवाजे पर हैं अर्थात् अभ्यास सही है और वैराग्य पक्का है। साथ ही हृदय-देश की क्या अवस्था है? इस पर कहते हैं–
‘सास ननदिया जागल’– संसार में सास-ननद बहू की चौकसी करती रहती हैं किन्तु यौगिक परिवेश में सास कहते हैं स्वाँस को। कबीर कहते हैं हमारी स्वाँस जागृत है। जब नामजप उन्नत श्रेणी में पहुँचकर सूक्ष्म हो जाता है तो उसका उतार-चढ़ाव स्वाँस पर होता है। इसीलिए पूज्य गुरु महाराज जी कहते थे कि साधुवेषधारी यदि कोई स्वाँस का भजन नहीं जानता तो महापुरुष लोग अपनी कुटिया में उसे दो रोटी भी नहीं देते क्योंकि वह स्वयं तो गुमराह है ही, दूसरों को भी घूम-घूमकर पथभ्रष्ट ही तो करेगा। यहाँ कबीर बताते हैं कि उनका श्वास-प्रश्वास का भजन भी जागृत है और,
नेह आनन्द ही ननद है, नियम ननद है। प्रेम-स्नेह में विभोर होकर नियम का परिपालन भी हो रहा है, नियम जागृत है। यह नहीं कि दो दिन भजन किया, तीसरे दिन निद्रा आ गयी तो नियम कैसा? जिस प्रकार जीने के लिए खाना अनिवार्य है, सोना अनिवार्य है, जल पीना अनिवार्य है उसी प्रकार चिन्तन का क्रम न टूटे, भले ही दरवाजे पर लाश पड़ी हो। जब श्वास-प्रश्वास का भजन जागृत है, नियमित है; अभ्यास और वैराग्य का पहरा लगा है; जहाँ इनका पहरा है काम-क्रोध-लोभ-मोह जैसे शत्रु वहाँ प्रवेश ही नहीं कर पाते फिर क्या कारण है कि चित्तरूपी चुनर में दाग लग गया?
कभी-कभी ऐसा भी होता है कि जिसका भजन बहुत अच्छा होता है, उसे अपने भजन का भी मोह हो जाता है। इस ओर इंगित करते हुए सन्त कबीर कहते हैं–
ना मैं मोही सासु ननदिया, ना केहू देवर लागल।
नि:सन्देह श्वास-प्रश्वास की क्रिया जागृत है, नियम भी परिपक्व है, सुचारु रूप से चल रहा है किन्तु इनमें हमारा कोई मोह नहीं है। इनमें मैं सन्तुष्ट नहीं हूँ। मान लें, भजन बहुत अच्छा है किन्तु इतने से भगवान तो नहीं मिल गये, परिणाम दिखाई नहीं पड़ा। इस नियम और भजन के द्वारा हम जिसे ढूँढ़ते थे, वह परमात्मा तो नहीं मिला इसलिए इससे मैं मोहित नहीं हूँ। और ‘ना कोई देवर लागल’– देवर अर्थात् द्वितीय वर! एक तो भगवान सर्वश्रेष्ठ हैं जिनका हम-आप भजन करते हैं और कभी-कभी साधकों को भ्रम हो जाता है कि इनकी अपेक्षा वह देवता या अन्य महात्मा अधिक ताकतवर तो नहीं है, गुरु महाराज से तगड़े तो नहीं हैं। ‘दूसरा भी कोई श्रेष्ठ है।’– ऐसा भाव भी हमारे मन में कभी नहीं आया फिर ‘दाग कहाँ से लागल!’
एक मुसलमान और एक हिन्दू मित्र थे। दोनों साथ-साथ जा रहे थे। रास्ते में एक नाला पड़ गया। उसे पार किये बिना जाने का अन्य रास्ता भी नहीं था। तैरना दोनों को ही नहीं आता था। असहाय होने पर दोनों का ध्यान ईश्वर की ओर गया। दोनों ने निश्चय किया कि अपने-अपने इष्ट का स्मरण करें और नाले को लाँघ जायँ! मियाँ ने कहा, ‘या खुदा’; लगाई छलाँग और नाले के पार चले गये। पण्डित चक्कर में पड़े कि लगता है खुदा में ताकत है; नहीं तो यह पार कैसे होता? उन्हें भी उस पार जाना ही था तो बोले, ‘हे रामजी! हे हनुमान जी! या खुदा’; लगाई छलाँग तो नाले में ही गिर पड़े। संशय में आधी शक्ति वैसे भी कम हो जाती है। अत: राम खुदइया में जो पड़ जाता है, उसका भी विनाश हो जाता है।
गीता में है– ‘संशयात्मा विनश्यति’। सृष्टि में भगवान एक से दूसरा हुआ नहीं तो दूसरा वर आया कहाँ से? लेकिन साधकों में ऐसा सन्देह माया के कारण कभी-कभी हो जाता है। कबीर कहते हैं, यहाँ वह भी नहीं है। स्वाँस और नियम की जागृति पर हमें संतोष नहीं है। भरत को तब तक संतुष्टि नहीं मिली जब तक हनुमान ने आकर कह नहीं दिया कि राम आ गये। तब तक भरत को अपने भजन का कोई भरोसा नहीं था बल्कि वह कहते थे– ‘जौं करनी समुझै प्रभु मोरी। नहिं निस्तार कलप सत कोरी।।’– मेरी करनी पर यदि प्रभु विचार करेंगे तो मेरा निस्तार सौ कल्प तक भी नहीं हो सकता। क्या भरत की करनी इतनी खराब थी? पाँच मिनट बाद ही हनुमान पहुँच गये, राम पहुँच गये। साधक ज्यों-ज्यों परमात्मा के करीब पहुँचता है, त्यों-त्यों अपनी हवा भर कमी को भी पहाड़ के समान महसूस करने लगता है। यही कबीर कहते हैं कि कहीं कोई कमी नहीं फिर हमारे संयत चित्त में दाग कहाँ से पड़ा? अगले पद में वे कहते हैं–
ना मैं मोही गोदी के बलकवा।
जब स्वाँस का निरोध हो चला, नियम-संयम परिपक्व है, अभ्यास और वैराग्य की सच्ची ड्यूटी है, दसों इन्द्रियों में ताले लगे हैं, भजन चल रहा है; ऐसी परिस्थिति में ‘गोदी’– गो माने मनसहित इन्द्रियाँ; इन इन्द्रियों के अन्तराल में प्रभु का स्वरूप उभरकर आता है, भगवान हृदय में उतर आते हैं। जहाँ स्वरूप हृदय में संचारित हुआ तो बहुत से साधक उतने में ही मुग्ध हो जाते हैं, संयम शिथिल पड़ जाता है। कबीर कहते हैं– ‘ना मैं मोही गोदी के बलकवा’– इन्द्रियों के अन्तराल में प्रभु का जो स्वरूप उतर आया, उतने से ही मैं सन्तुष्ट नहीं हूँ क्योंकि भले स्वरूप उतार आया है मैं तो अलग हूँ, स्वरूप ने हमें तो समाहित नहीं किया अत: उतने में ही मैं मुग्ध भी नहीं हूँ; फिर ‘चुनर भइ कस काजल’– चित्तरूपी चुनर में दाग कैसे लगा? यह काली कैसे हो गयी? अब बताते हैं, यह आवरण कैसे आया?
कौनौ अनरूप से चोरवा आयल, दाग लगा कर भागल।
‘कौनौ अनरूप से’ कोई अदृश्य चोर आया। हर विकार अदृश्य होकर ही आता है। मेघनाद अदृश्य होकर लड़ता था। विकारों से भी सूक्ष्म है उनके संस्कार! महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि देशकाल का व्यवधान होने पर भी संस्कार समय पर घटित होते ही हैं। वह अरूप हैं जिनके आने की कोई कल्पना भी नहीं है किन्तु वह अनायास, अकस्मात् प्रकट हो जाता है और ‘दाग लगा कर भागल’– संस्कार केवल एक बार आता है। जिस श्रेणी का संस्कार है वैसा रूपक खड़ा हो जायेगा और समाप्त हो जायेगा, पुन: नहीं आयेगा। महाभारत का आख्यान है– कर्ण के पास चुंचुक नाम का एक नाग आया। उसने कहा– ‘‘मैं अर्जुन का जन्मजात बैरी हूँ। मैं उसे मार डालूँगा। केवल तुम मुझे उसके पास तीर की तरह फेंक दो। मैं स्वयं नहीं चल सकता किन्तु कोई योद्धा मेरा प्रयोग कर सकता है।’’ कर्ण ने उसे अपने तरकश में रख लिया। जब कर्ण ने चुंचुक को अर्जुन की ओर छोड़ा, भगवान श्रीकृष्ण ने रथ को नीचे दबा दिया। अर्जुन के मुकुट का स्पर्श करते हुए चुंचुक आगे निकल गया। वापस आकर चुंचुक क्रोध में बोला, ‘‘कर्ण! एक बार तुम मुझे फिर छोड़ो! मैं एक जबड़ा पृथ्वी पर और दूसरा आकाशपर्यन्त फैलाकर श्रीकृष्ण और अर्जुन को रथसमेत निगल जाऊँगा।’’ किन्तु कर्ण ने उसे डाँट दिया कि चल भाग! एक बार छोड़े हुए बाण को मैं दोबारा नहीं छोड़ता। यह है विजातीय कर्मरूपी कर्ण! है तो पाण्डवों का सगा भाई; किन्तु प्रबल विजातीय शत्रु है। पुण्यरूपी पाण्डु के संसर्ग से पूर्व साधक कर्त्तव्य समझकर जो भी कर्म करता है, वे उसे बहुत परेशान करते हैं। कर्ण आजीवन पाण्डुपुत्रों से लड़ता रहा। अस्तु, चुंचुक अर्थात् चित्त के अन्तराल में संस्कारों की जो रील है, वह जब घटित होता है, दाग लग जाता है। वह एक ही बार घटित होता है, बार-बार नहीं। यही है अनरूप से चोर का आना क्योंकि हमारा चित्त शान्त है, संयम परिपक्व है, भजन जागृत है, बाहर पहरा लगा है, इन्द्रियों के सभी दरवाजे भली प्रकार निरुद्ध हैं फिर भी अन्तराल में छिपे संस्कार अकस्मात् प्रकट होते हैं और एक कालिमा लगाकर चले आते हैं। यह एक बलात्कारिक विघ्न है। इन संस्कारों के भी काटने का उपाय बताते हैं–
यह चुनरी मैं मलि मलि धोई, धोवत धोवत भई पागल।
इस चित्तरूपी चुनरिया को हमने मल-मल के धोया, सतत् अभ्यास के द्वारा धोया! इतना धोया कि ‘धोवत धोवत भई पागल’– धोते-धोते एक नशा सवार हो गया। ‘लोग कहें मीरा भई बावरी’– लोग मीरा को पगली कहने लगे थे। सुतीक्ष्ण को भजन का नशा हो गया तो उनकी यह स्थिति हो गयी कि ‘को मैं चलेऊँ कहाँ नहिं बूझा’। भजन में एक अवस्था ऐसी आती है। जड़भरत, कागभुसुण्डि सबको इस अवस्था से गुजरना पड़ा। हमलोगों के गुरु महाराज को भी लोग पागल ही कहा करते थे। गुरु महाराज बताते थे कि ‘‘उन दिनों कोई पास आकर बैठ जाये तो मन में होता था कि यह कब उठकर चला जाय। चिन्तन में बड़ा आनन्द आता था।’’ यही कबीर कहते हैं कि चुनरी को धोने में हम पागल हो गये। क्या सचमुच मस्तिष्क विकृत हो गया? वे कहते हैं, नहीं!,
कहत कबीर सुनो भाई साधो, हरि जी से नेहिया लागल।
कबीर कहते हैं, पागल होने जैसी कोई बात नहीं थी, वास्तव में हरि जी से नेह की डोर लग गयी।
हरि व्यापक सर्वत्र समाना।
प्रेम ते प्रकट होहिं मैं जाना।।
भगवान सर्वत्र समान रूप से व्याप्त हैं लेकिन उन्हें खोज निकालने की कुँजी केवल प्रेम है। वह प्रेम से प्रकट होते हैं। भगवान शिव कहते हैं कि हमने सुना नहीं, हमने इस बात को कहीं पढ़ा नहीं बल्कि ‘मैं जाना’– मैंने उसे प्रत्यक्ष जाना है। कबीर कहते हैं कि मैं पागल नहीं हुआ बल्कि ‘हरि जी से नेहिया लागल’– भगवान से जब सचमुच नेह की डोर लग जाती है तो मनुष्य की दशा पागलों जैसी हो जाती है। इस चित्त के दाग को छुड़ाने का एक ही उपाय है– स्नेह की डोरी भगवान से लग जाय। मल-मल कर चुनर को सतत् धोना है। इसका क्रम तब तक न टूटे जब तक अन्तिम संस्कार मिट न जाय।
मंत्र महामनि विषय ब्याल के।
मेटत कठिन कुअंक भाल के।।
भाग्य में असाध्य कुअंक, घोर नरक और यातना लिखा है वह भी मिट जायेगा, मंत्र में ऐसी क्षमता है। एक अन्य पद में सन्त कबीर कहते हैं–
राम नाम का साबुन ले ले, कृष्ण नाम दरियाइ।
अपने गुरु को कर ले बरेठा, जनम दाग धुलि जाइ।।
चोलिया काहे न धुलाई, सुन्दर बाँके जोगिया……
राम नाम का साबुन, कृष्ण नाम की दरिया, गुरु को धोबी बना लें तो जन्म-जन्मान्तरों का दाग भी धुल जायेगा।
!! ॐ श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय !!
(‘अमृतवाणी भाग-2’ से उद्धृत)