दरस दिवाना बावला

दरस दिवाना बावला

संसार में उच्चकोटि के जितने भी महापुरुष हुए हैं, उनकी रहनी पर विचार करें, पूर्ण त्याग में उनकी वृत्ति देखने को मिलेगी। वे क्रमश: एक या दो वस्त्रों में निर्वाह करते देखे जाते हैं। कुछ विभूतियाँ ऐसी भी रही हैं जिनके शरीर पर वस्त्र ही नहीं रहा। यह उन्होंने जानबूझकर नहीं त्यागा था। भजन का एक स्तर ऐसा आता है जहाँ भगवान ही वस्त्र का त्याग करा देते हैं।

पूज्य गुरु महाराज ने अपनी जन्मभूमि से कुछ ही दूरी पर, गाँव में ही, एक झाड़ी के पास भजन करना आरम्भ किया। भाविक साथियों ने वहाँ बगीचा लगा दिया। गाँव के लोग महाराजजी के भजन-भाव को लेकर रात-दिन छींटाकशी करते। उनकी कटूक्तियों से व्यथित गुरु महाराज भगवान से नित्य ही प्रार्थना करते, आदेश हो जाता तो मैं कहीं दूर जाकर भजन करता। ‘गाँव का जोगी जोगड़ा बाहर का जोगी सिद्ध।’ यहाँ लोग अकारण ही कुछ न कुछ कहते ही रहेंगे; किन्तु भगवान से आदेश मिल ही नहीं रहा था। साधक अपने मन-बुद्धि से कोई भी काम नहीं कर सकता, पानी नहीं पी सकता, एक कदम नहीं उठा सकता। कब? जब भगवान रथी होकर मार्गदर्शक के रूप में अपने सेवक को सँभालने लगते हैं। बाहर जाने का अनुरोध वह प्राय: करते; किन्तु अनुमति नहीं मिल रही थी।

क्रमश: दिन बीतते गये। बगीचे में बौर आने लगे थे। महाराजजी ने मन में विचार किया– बस, अब कहीं नहीं जायेंगे। देखो न! वृक्षों में बौर आने लगा है तो फल भी लगेंगे। फल-फूल खाया करूँगा और भजन करूँगा। भजन ही तो करना है। अब यहीं रहूँगा और कहीं नहीं जाऊँगा।

जिस दिन महाराजजी के मन में ऐसा संकल्प आया, उसी दिन उन्हें अनुभव में आदेश मिला– ‘प्रयागराज जाओ।’ महाराजजी उठकर तुरन्त चल पड़े। पाँच-छ: भक्त भी उनके साथ हो लिये। प्रयाग पहुँचकर महाराजजी सबसे साथ नाव पर घूमते रहे। रात में सबके सो जाने पर उन्होंने भगवान से पूछा– प्रयागराज तो हम आ गये, अब क्या करें? अनुभव में ही उन्हें आदेश मिला– इन लोगों का साथ छोड़ दो। सबको शयन करता छोड़ निस्तब्ध रात्रि में महाराजजी चुपचाप गायब हो गये। गंगा के किनारे-किनारे महाराजजी उन लोगों से बहुत दूर निकल आये।

ऊषाकाल का उजाला फैलने लगा। महाराजजी ने भगवान से पूछा– अब? भगवान ने कहा– शरीर पर जितने वस्त्र हैं, सब उतारकर गंगा के किनारे रख दो। कमण्डल और छड़ी उठाओ। गंगा का यहीं किनारा पकड़ते हुए आगे बढ़ जाओ। अब दो उपवास-तीन उपवास महाराजजी के लिए आये दिन की घटना थी। महाराजजी जीवन-निर्वाह के लिए भी भिक्षा नहीं करते थे। उन्हें विश्वास था– जिन प्रभु ने मुझसे घर छुड़ाया, वही हमारे योग-क्षेम की व्यवस्था करेंगे, मैं क्यों चिन्ता करूँ? भगवान कहते हैं–

मोर दास कहाइ नर आसा।

करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा।। (मानस, ७/४५/३)

मेरा दास कहलाता है और अन्य से भी आशा करता है, ऐसे साधक का मुझ पर विश्वास ही कहाँ है? अत: वह भिक्षा भी नहीं करते थे, निराधार विचरण करते ही रह गये। महाराजजी कहा करते थे– ‘‘हो! बगीचे से थोड़ी-सी ममता हो गयी तो भगवान ने लँगोटी तक उतरवा कर रखवा दिया।’’ अस्तु वस्त्र कोई त्यागता नहीं, भगवान ही वस्त्र का त्याग करा देते हैं। क्रमश: विचरण करते-करते आप सही अनुसुइया आश्रम में पधारे, तब भगवान ने क्षीण-सा आदेश दिया– अब कुछ लपेट सकते हो। जब हमलोग आश्रम में पहुँचे तो देखा महाराजजी मलमल की साफी कभी-कभार लपेट लेते थे। कदाचित् शरीर पर कुछ भी न रहता तब भी दीर्घकाल तक उन्हें इसका भान भी नहीं होता था। यह दिगम्बर वेष महाराजजी को बहुत प्रिय था; क्योंकि यह वेष भगवान का दिया हुआ था। इसी आशय का एक भजन महाराजजी प्राय: गुनगुनाया करते थे–

दरस दिवाना बावला अलमस्त फकीरा।

एक एकाकी हो रहा अस मत का धीरा।।

दरस दिवाना……….

धरती तो आसन किया तम्बू आसमाना।

चोला पहने खाक का रहे पाक समाना।।

दरस दिवाना……….

पीवत प्याला प्रेम का सुधरे सब साथी।

आठ पहर झूमत रहे जस मैगल हाथी।।

दरस दिवाना……….

हिरदै में महबूब है हर दिल का प्याला।

पीवेगा कोई जौहरी गुरुमुख मतवाला।।

दरस दिवाना……….

बंधन काटे मोह का रहता नि:शंका।

ताकी नजर आवता क्या राजा रंका।।

दरस दिवाना……….

सेवक को सतगुरु मिले कछु रहे तबाही।

कह कबीर निज घर चलो जहँ काल जाई।।

दरस दिवाना……….

भगवद्दर्शन के लिए जिसकी सचमुच हृदय से लव लग गयी, वे बावले होते हैं, कहीं खोये से रहते हैं। सांसारिक दृष्टिवाले उन्हें दीवाना समझते हैं। माता मीरा के लिए लोगों ने कहा– देखो न! जो नौलखा हार पहनती थी, जो महारानी के पद पर अभिसिक्त थी, गले में तुलसी की माला डालकर घूम रही है। जरूर मीरा पागल हो गयी है। लोग कहैं मीरा भई बावरी सास कहै कुलनासी रे।’ सास ने तो गजब ही कर दिया। वह कहने लगी– यह कुल में कलंक पैदा हो गयी। इस कुल-कलंक को नष्ट करने के लिए मीरा की जितनी परीक्षायें हुईं– जहर का प्याला, शूली की शय्या; सबके पीछे उसी की प्रेरणा थी। आज उस कुलवन्ती सास को कोई नहीं जानता और मीरा को सारा संसार जानता है। देखने में तो यह आता है कि भजन-पथ में जो लग जाता है, सामान्य लोगों के व्यवहार से वह थोड़ा अलग-अलग रहता है। लोग सोचते हैं– यह पागल है। किन्तु सच पूछिये, वह बावला नहीं, अलमस्त फकीरा’ होता है। वह अपने में ही मस्त है– फिकर फाड़ फकनी करे, ताहि कहैं फकीर।’ भली-बुरी सभी प्रकार की चिन्तायें जिसके चित्त से हट गयीं हों, उसे फकनी कर जो फाँक गया है, वह फकीर होता है। यही सन्त कबीर की पंक्तियों में है–

दरस दिवाना बावला अलमस्त फकीरा।

एक एकाकी हो रहा अस मत का धीरा।।

एक परमात्मा में सुरत लगाकर वह प्रभु का दीवाना एकान्तसेवी होकर रहता है। आप किसी को एकान्त में बैठा दें, उससे कोई बातचीत करनेवाला न मिले तो चार दिन में वह बौखला उठेगा। कहते हैं कि गोस्वामी तुलसीदास जी के पास दो बुजुर्ग अपनी समस्या लेकर पहुँचे, कहा– महाराज! बड़ी बेरोजगारी है। कहीं रोजी-रोटी का प्रबन्ध हो जाता तो आपकी बड़ी कृपा होती। उनकी दयनीय दशा से गोस्वामीजी द्रवित होकर बोले– यह एक-एक माला ले लो। एक पूरब की ओर उस वृक्ष के नीचे बैठ जाओ और दूसरा पश्चिम की ओर उस पेड़ के नीचे। दोनों दिनभर राम-राम जपो। आपको समय-समय पर जलपान और भोजन मिलता रहेगा। प्रतिदिन शाम को आप दोनों को दो-दो रुपये भी मिलेंगे।

वह सस्ती का जमाना था। दिनभर की मजदूरी आना-दो आना थी। अभी बहुत दिन नहीं व्यतीत हुए हैं, हेडमास्टर की तनखाह पाँच रुपये मासिक थी। वह दोनों वयोवृद्ध बहुत प्रसन्न हुए, बोले– ‘‘महाराज! भगवान का भजन और ऊपर से रुपया! लोक-परलोक दोनों बन जायेंगे।’’ दोनों डट गये। दो दिन तो दोनों किसी प्रकार माला जपते रहे। तीसरे दिन वे किसी से बात करने के लिए छटपटाने लगे। चौथे दिन उन्होंने माला रख दिया और बोले, ‘‘भगवन्! हमसे आप फावड़ा चलवा लें, कृषि-कार्य ले लें, यह माला हम लोगों से पार नहीं लगेगी।’’ सांसारिक लोगों के लिए एकान्त-सेवन एक जटिल समस्या है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– अर्जुन! ऐकान्तिक सुख मैं हूँ। (गीता, १४/२७) शान्त-एकान्त में भी रात-दिन लौ लगी रहे, मन सुखपूर्वक भजन में लगने लगे, वहाँ मेरा निवास होता है। बुद्धि का ऐसा धैर्यवान अलमस्त फकीर! ऐसे महापुरुष की वेशभूषा, आसन, शय्या इत्यादि कैसी होती है? इस पर कहते हैं–

धरती तो आसन किया तम्बू आसमाना।

चोला पहने खाक का रहे पाक समाना।।

धरती ही उनका आसन है और तम्बू है आसमान! उनके बारहों महीने खुले आसमान के नीचे व्यतीत हो जाते हैं। वर्षा में वर्षा, गर्मियों में गर्मी, शीतकाल में कड़ाके की ठण्ड उनके अपने शरीर पर ही व्यतीत होती है। जब धरती पर ही रहना है तो धूलि और गर्द शरीर पर बराबर गिरेगा ही। चोला पहने खाक का’–शरीर धूल-धूसरित भले हो, वह मैले-कुचैले नहीं हैं। रहे पाक समाना’– वह परम पावन बने रहते हैं। उनके चित्त में मल नहीं है। वह एक जगह सुरत को लगाये हुए रहते हैं। प्रभु-दर्शनों की आस लिए हुए उन महापुरुष के लिए मनोरम शय्या और जमीन की राख में अन्तर प्रतीत नहीं होता।

साधना के आरम्भिक वर्षों में पूज्य गुरु महाराजजी गंगा के किनारे निराधार विचरण करते-करते जहाँ शाम हो जाय, बाँस की कोठी मिले, वहीं अपना आसन लगा लेते थे। बाँस की कोठी के पास, खेत में ढेलों पर वह बैठ जाया करते थे। समीप की पगडण्डियों या खेत की मेड़ों से कोई घास लेकर, कोई अपना पशु हाँककर ले जा रहा दिखायी पड़ता। जहाँ उनका आना-जाना शान्त होता, महाराज धीरे से उठकर बाँस की कोठी के बीच में बैठ जाया करते थे। वहाँ वह अपने बैठने भर की जमीन साफ कर लेते थे और आसन लगाकर वहीं बैठ जाते थे। रात्रि में दो या एक बार नीचे का पाँव ऊपर या ऊपर का पाँव नीचे करते और ध्यान में ही सवेरा हो जाता। शीतकाल में, माघ के महीने में ज्योंही सवेरे पहली किरण निकलती, महाराज जी पुन: खेत में जाकर जहाँ सूर्य की किरण सीधी पड़ती थी, वहीं जमीन पर लेट जाते थे। एक बार के सोने में ११ बजे आँख खुलती, प्रगाढ़ निद्रा आती। ऊबड़-खाबड़ जमीन और इतनी अच्छी निद्रा कि डनलप के गद्दों पर वैसी नींद क्या आयेगी!

एक नींद लेकर आप गंगा के किनारे-किनारे आगे बढ़ जाते थे। उसी बीच आप नित्यक्रिया, दातून इत्यादि भी कर लेते थे। सायं तक यदि कोई कुटिया मिल भी जाती, आप उस कुटी में न जाते। आपकी मान्यता थी कि इस समय कोई न कोई कुटी में अवश्य होगा। अपने दैनिक कार्यों से निवृत्त वह गपशप करके हमारे चिन्तन का समय ही तो नष्ट करेगा। इसलिए आप कुटी से कुछ दूर बाहर ही किसी वृक्ष के नीचे बैठकर चिन्तनरत रहते थे। प्रात: होने पर आप कुटी में चले जाते थे। जो वहाँ पर सन्त मिलते, उन्हें सादर प्रणाम कर लेते। यदि उन्होंने कुछ दिया तो आप खा लेते अन्यथा चुपचाप आगे बढ़ जाते थे।

गुरु महाराज बताते थे कि सर्दियों की रातों में कभी-कभी रात बारह बजे ध्यान उचट जाय तो इतनी ठंडक लगती थी कि लगता था जैसे अब प्राण ही नहीं बचेंगे। उस समय महाराजजी उठकर एक फर्लांग तेजी से दौड़ लगाते, उसी वेग से लौटते; शरीर में गर्मी आ जाती। उस गरमी के रहते-रहते महाराजजी पुन: ध्यान में बैठ जाते। ध्यान लग जाता, सुरत पकड़ में आ जाती तो सवेरा हो जाता। हमलोगों ने पूछा– ‘‘महाराजजी! क्या ध्यान में ठंड नहीं लगती?’’ उन्होंने बताया– ‘‘जहाँ सुरत ध्यान में लगी, शरीर में भीतर से गरमी आ जाती थी। शरीर के बाहर चमड़े पर ठंड अवश्य लगती थी, रोयें भी खड़े रहते थे; किन्तु भीतर पूर्ण शान्ति और गर्मी बनी रहती थी।’’ निराधार विचरण की यही दिनचर्या थी जिसमें शयन का आसन कँकरीली-पथरीली जमीन, मिट्टी का आसन! वास्तव में अनादिकाल से संसार में जितने विरही सन्त हुए हैं, साधनकाल में सबने धरती को ही आसन बनाया। ऐसे सन्त निरन्तर चिन्तन में क्यों रहे आते हैं?–

पीवत प्याला प्रेम का सुधरे सब साथी।

आठ पहर झूमत रहे जस मैगल हाथी।।

ऐसे सन्त प्रेम का प्याला पीते हैं। आजकल इस ‘प्रेम’ शब्द का दुरुपयोग होने लगा है। अब तो लोग लिव-इन-रिलेशनशिप में रहने लगे हैं, कहते हैं– ‘प्रेम हो गया।’ भला जीवों से कैसा प्रेम? कभी प्रेम करनेवाला जीवित और प्रेमास्पद ही चल बसा! यह परस्पर राग-द्वेष, काम-क्रोध, आशा-तृष्णा, वासनाजनित लगाव हो सकता है, प्रेम नहीं। स्वार्थ-सिद्धि में व्यवधान पड़ते ही यह तथाकथित प्रेम विद्वेष और सम्बन्ध-विच्छेद में बदल जाता है।

श्रीरामचरितमानस का प्रसंग है। भगवान राम के वनवास का आरम्भिक दिन था। शृंगवेरपुर में कुश की शय्या पर माता सीता और श्रीराम विश्राम कर रहे थे। लक्ष्मण धनुष-बाण लेकर सुरक्षा में बैठे थे। निषादराज भी कार्यों से निवृत्त होकर धनुष लेकर लक्ष्मणजी के पास ही बैठ गये। महान विभूतियों को घास पर लेटे देख उसे बड़ा कष्ट हुआ। उसने कहा– भ्राता लक्ष्मण! यह माता कैकेयी बहुत कुटिल है। इस दुर्बुद्धि ने अपने ही फलते-फूलते वंश पर कुठाराघात किया। लक्ष्मण ने कहा– नहीं भैया! ऐसी बात नहीं है। माता कैकेयी का तो कोई दोष ही नहीं है।

काहु कोउ सुख दुख कर दाता।

निज कृत करम भोग सबु भ्राता।। (मानस, २/९१/४)

संसार में सुख या दु:ख देनेवाला कोई है ही नहीं। यह तो किसी जन्म में किये हुए अपने ही कर्मों का भोग है जो घूम-फिरकर सामने आ रहा है।

जोग बियोग भोग भल मन्दा।

हित अनहित मध्यम भ्रम फंदा।। (मानस, २/९१/५)

जोग माने मिलना, बियोग माने बिछुड़ना, हितैषी, अहितैषी और मध्यस्थ– ये भ्रम के फन्दे हैं। इतना ही नहीं,

धरनि धामु धनु पुर परिवारू।

सरगु नरकु जहँ लगि ब्यवहारू।। (मानस, २/९१/७)

धरनी है, धाम है, पुर है, परिवार है, स्वर्ग-नरक और जहाँ तक व्यवहार है,

देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं।

मोह मूल परमारथु नाहीं।। (मानस, २/९१/८)

इन सबके विषय में सुनना, इनके विषय में देखना, इनके विषय में मन में विचार करना मोह का मूल है, परमार्थ कदापि नहीं। अर्थात् स्वर्ग और नरक, स्वर्गिक ऐश्वर्य और इन वस्तुओं के पीछे लगाव, इनके विषय में सुनना-गुनना मोह का मूल है, परमार्थ कदापि नहीं। परमार्थ क्या है?–

सखा परम परमारथु एहू।

मन क्रम बचन राम पद नेहू।। (मानस, २/९२/६)

हे सखे! परम परमार्थ तो एक ही दिशा में है– मन-क्रम-वचन से राम–उन परम प्रभु के चरणों में प्रीति! इसलिए जड़ पदार्थ, जो नश्वर है, उससे कभी प्रेम हो ही नहीं सकता। जड़ पदार्थों में लगाव कार्यों की आपूर्ति के साधन मात्र हैं। प्रेम परमात्मा से होता है। इसलिए कबीर ने सन्तों के लिए कहा– प्याला पीवे प्रेम का’। मानस में है–

हरि ब्यापक सर्बत्र समाना।

प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना।। (मानस, १/१८४/६)

भगवान कण-कण में, सर्वत्र समान रूप से व्याप्त हैं; किन्तु उनको खोज निकालने का उपाय प्रेम है। प्रेम से वह प्रकट हो जाते हैं–

अग जग मय सब रहित बिरागी।

प्रेम तें प्रभु प्रगटइ जिमि आगी।। (मानस, १/१८४/७)

यद्यपि वह चराचर जगत् में हैं, सबसे अलग भी हैं किन्तु प्रेम से वह वैसे ही प्रकट होते हैं जैसे पत्थर की रगड़ से अग्नि। उन्हें प्रकट करने का उपाय केवल प्रेम है और यही कबीर कहते हैं, एकान्त सेवन का राज भी है कि वह प्रेम का प्याला हरदम पीते रहते हैं। इससे सुधरे सब साथी’– हमारे साथी सुधर जाते हैं। पहले यही साथी सुधरे नहीं थे। आप भगवान से प्रेम करना चाहेंगे किन्तु आँख कुछ देखकर व्यवधान पैदा करेगी, कान कुछ सुनकर बाधा प्रस्तुत करेगा, मन कुछ सोचकर आपको भगवत्प्रेम से विमुख कर देगा। बिगड़े साथी भजन में लगने ही नहीं देंगे।

आदि शंकराचार्यजी से शिष्यों ने पूछा– भगवन्! सृष्टि में शत्रु कौन है? ‘प्रश्नोत्तरी’ में है– के शत्रवे सन्ति निजेन्द्रियाणि। तान्येव मित्राणि जितानि यानि।’ शंकराचार्य ने बताया– शत्रु कौन है? अपनी इन्द्रियाँ और अपना मन! यदि ये जीत ली जायँ तो यही मित्र बनकर मित्रता में बरतने लगती हैं, परम कल्याण करनेवाली होती हैं, परम श्रेय, कैवल्य पद की दूरी तय करा देती हैं। इसलिए हमें प्रभु के चरणों में प्रेम स्थिर करना है तो इन साथियों की हमें आवश्यकता है। मन की, अन्त:करण की, इन्द्रियों की अनुकूलता आवश्यक है। हम आज भजन करने लगे हैं, पहले तो नहीं करते थे, कुछ और ही किया करते थे। संस्कारों की वह रील चित्त में पड़ी हुई है। जब हम चिन्तन में लगते हैं तो यही रील हमारे चिन्तन को बिखेर देती है। ये सुधरे कैसे? इनके सुधरने का उपाय है प्रेम। प्याला पीवे प्रेम का सुधरे सब साथी।’ इससे मन सुधर जायेगा, इन्द्रियाँ सुधर जायेंगी, अनुकूल हो जायेंगी।

उमा राम सुभाउ जेहिं जाना।

ताहि भजनु तजि भाव आना।। (मानस, ५/३३/३)

उसे भजन के अतिरिक्त कुछ अच्छा लगेगा ही नहीं इसलिए सुधरे सब साथी’ और आठ पहर झूमत रहे जस मैगल हाथी।’–आठों पहर अर्थात् रात-दिन, सोते-जागते–

जागत में सुमिरन करे, सोवत में लव लाय।

सुरत डोर लागी रहे, तार टूट ना जाय।।

जब तक जगो, सुमिरन करो; सोओ तो लव लगाकर निद्रा-लाभ करो, सोकर उठो तो सुरत वहीं लगी मिले– इस प्रकार आठों पहर भजन में लगना है, क्रम न टूटे। ऐसा भजनानन्दी भजन के ही नशे में दिन-रात मदमस्त हाथी की तरह अपने में ही निमग्न रहता है। जिनसे वह प्रेम करता है, वह प्रभु रहते कहाँ हैं? तीर्थों में या मन्दिरों में? वह प्रेम कहाँ करता है? इस पर कहते हैं–

हिरदै में महबूब है हर दिल का पियाला।

उनका प्रेमास्पद प्रभु हृदय में रहता है। वशिष्ठजी ने चित्रकूट की सभा में परमात्मा राम से कहा–

सबके उर अंतर बसहु जानहु भाउ कुभाउ।। (मानस, २/२५७)

गोस्वामीजी का परमात्मा हृदय में रहता है। यही आदिशास्त्र गीता का भी उद्घोष है। अर्जुन में पहले तो क्षमता ही नहीं थी कि सत्य को समझ ले किन्तु क्रमश: उसके सभी प्रश्नों का समाधान हो जाने पर, जो प्रश्न वह नहीं कर सकता था, भगवान ने स्वयं उन प्रश्नों को उठाया कि अर्जुन! जानते हो, ईश्वर कहाँ रहता है? और स्वयं ही उत्तर दिया–

ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।

भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।। (गीता, १८/६१)

अर्जुन! ईश्वर सम्पूर्ण भूत-प्राणियों के हृदय-देश में निवास करता है। जब वह इतना समीप है तो लोग देखते क्यों नहीं? भगवान ने बताया कि मायारूपी यन्त्र में आरूढ़ होकर लोग भ्रमवश भटकते ही रहते हैं इसलिए नहीं जानते। प्रश्न उठता है कि ईश्वर हृदय में है तो हम शरण किसकी जायँ? अगले ही श्लोक में भगवान बोले–

तमेव शरणं गच्छ’–उस हृदयस्थित ईश्वर की शरण जाओ। सर्वभावेन भारत’– सम्पूर्ण भावों से जाओ। थोड़ा-सा हमारा भाव पशुपतिनाथ में है, कुछ कमच्छा देवी में, थोड़ा मैहर, थोड़ा और कहीं…..हम तो रुपये में बारह आना तो लीक हो गये। हमारे मन के भाव बिखर गये, श्रद्धा विभाजित हो गयी, आस्थाएँ छितरा गयीं तब भगवान नहीं मिलेंगे। इसलिए अर्जुन! सम्पूर्ण भावों से उस हृदयस्थित ईश्वर की शरण जाओ। मान लें, हमने सारी मान्यताओं को त्याग दिया, मन को सब ओर से समेटकर एक हृदयस्थ ईश्वर की शरण चले ही गये, उससे लाभ क्या? भगवान कहते हैं– तत्प्रसादात्परां शान्तिं’– तुम परमशान्ति पा जाओगे और स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्’– उस स्थान को, उस निवास को प्राप्त हो जाओगे जो शाश्वत है। उसमें हर साल चूना लगाओ, मरम्मत करो, इन सबकी जरूरत नहीं रह जायेगी। तुम्हारा जीवन शाश्वत और तुम्हारा धाम भी शाश्वत!

कहने का आशय यह है कि कबीर ने कोई नयी बात नहीं कहा। जो आदिशास्त्र गीता में है, जिसे वैदिक-औपनिषदिक ऋषि कहते आये हैं, बस उसी सत्य को पुन: व्यक्त कर दिया। अन्तर इतना ही है कि उन्होंने इस तथ्य को सधुक्कड़ी भाषा में प्रस्तुत किया कि जिससे प्रेम करते हो, वह महबूब कहाँ है, तो हिरदै में महबूब है’– वह प्रभु हृदय में निवास करते हैं और हर दिल का पियाला’–कहो कि केवल हमारे हृदय में है, ऐसी बात नहीं है। वह सबके हृदय में उतनी ही मात्रा में विद्यमान है–

सब घट मेरा साइयाँ सूनी सेज कोय।

बलिहारी घट तासु की जा घट परगट होय।।

मेरे साईं, मेरे स्वामी सब घट’–सबके हृदय-देश में निरन्तर निवास करते हैं। तब तो सभी घटों को प्रणाम करना चाहिए। महापुरुष कहते हैं– नहीं, मैं उस घट के ऊपर अपने आप को निछावर करता हूँ जिस घट में वह प्रकट हो गये। जिसने साक्षात् कर लिया, प्रत्यक्ष दर्शन के साथ परमात्म भाव में स्थिति प्राप्त कर लिया। कबीर कहते हैं– सभी उस प्याले को प्राप्त कर सकते हैं किन्तु–

पीवेगा कोई जौहरी गुरुमुख मतवाला।

उसे वही जौहरी पीवेगा जो गुरु के मुख का मतवाला है।

कबीर गुरु मुख चन्द्रमा, सेवक नयन चकोर।

आठ पहर निरखत रहे, गुरु मूरत की ओर।।

कबीर कहते हैं– सेवक को आठों पहर गुरु के चन्द्रमुख को चकोर की तरह देखते रहना चाहिए, उनके प्रति समर्पित रहना चाहिए, उनके गुरुत्व की आन्तरिक क्षमता को अर्जित करने के लिए सतत प्रयत्नशील रहना चाहिए। गुरु महाराज जी कहते हैं–‘ऐसा करो…’, शिष्य उसे करने से कतरा रहा है, विपरीत आचरण कर रहा है तो वह गुरुमुख का मतवाला कहाँ रह गया? शिष्य तो उनके हाथ का यंत्र बनकर चलनेवाला पथिक है। जब कभी ध्यान का स्तर आयेगा तब भी ध्यान उन्हीं में केन्द्रित होता है, इसके पूर्व नाम-जप करना चाहिए। पूज्य गुरु महाराजजी का कहना था कि गुरु आज्ञा-पालन भजन है–

गुरोर्वाक्यं सतत ज्ञेयं ज्ञेयं शास्त्रकोटिभि:।।

सत्गुरु का यदि एक वाक्य उपलब्ध है तो उसकी तुलना में करोड़ों शास्त्र भी व्यर्थ हैं। गुरु का वाक्य ही सत्य है, शिष्य के लिए वही करणीय है। ऐसे महापुरुष रहते कैसे हैं?

बंधन काटे मोह का रहता नि:शंका।।

ताको नजर आवता क्या राजा रंका।।

वे मोह का बंधन काट देते हैं क्योंकि मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजिंह बहु सूला।।’ (मानस, ७/१२०/२९)– सम्पूर्ण व्याधियों का मूल मोह है। उन व्याधियों से अनन्त शूलों की सृष्टि होती है। किन्तु महापुरुष मोह के बन्धन को ही काट देते हैं और नि:शंक होकर निवास करते हैं। ऐसे महापुरुष की दृष्टि में ऊँच-नीच, छोटा-बड़ा जैसा भेदभाव नहीं होता। क्या राजा रंका’– उनकी निगाह में राजा और रंक का अन्तर नहीं दिखायी देता। उनकी दृष्टि सीधे आपके हृदय-देश की अवस्था पर पड़ती है, आत्मा पर पड़ती है, चमड़ी के रहन-सहन पर नहीं। उनके यहाँ शेर और बकरी एक ही घाट पर पानी पीते हैं। कोई फुटपाथ पर जीवनयापन कर रहा है तो कोई सिंहासन पर। ये तो जन्म-मृत्यु के बीच के पड़ाव की अवस्थाएँ हैं। आगामी जीवन में न जाने कौन-सी योनि, कौन-सा स्थान या कौन व्यवस्था मिल जाय! जड़भरत जैसे महापुरुष को भी एक जन्म मृग का लेना पड़ा था। इसी प्रकार हमें-आपको जन्म लेना पड़े तो कौन बड़ी बात है! इसीलिए महापुरुषों की दृष्टि भौतिक ऐश्वर्य पर नहीं पड़ती। उनके लिए राजा और रंक समान हुआ करते हैं। राजा भी अच्छे पथिक हुए हैं और अत्यन्त गरीब पथिक भी भगवान को पा गये, जैसे–शबरी इत्यादि। इसलिए महापुरुष समदर्शी और समवर्ती होते हैं। अन्त में कबीर कहते हैं कि हम प्राप्त करें तो कहाँ पर?–

सेवक को सतगुरु मिले कछु रहे तबाही।

कहै कबीर निज घर चलो जहँ काल जाई।।

यदि सेवक है और उसको कदाचित् सत्गुरु मिल जायँ तो उसे किसी प्रकार का अभाव नहीं खटकेगा। वह सबकुछ प्राप्त कर लेगा; किन्तु यदि सद्गुरु नहीं मिला तो–

पूरा सतगुरु ना मिला मिली साँची सीख।

भेष जती का बनाय के, घर-घर माँगे भीख।।

यदि पूरा सत्गुरु उपलब्ध नहीं हैं तो यती का वेष बना लेने पर भी कोई लाभ नहीं होगा। घर-घर जाकर भीख माँगना ही हाथ लगेगा, अन्य कुछ भी नहीं। ऐसा व्यक्ति सत्य वस्तु से दूर ही रहेगा। परमात्मा यदि परम धाम है तो सत्गुरु उसके आत्मा की जागृति से पूर्तिपर्यन्त पथ का प्रवेश-द्वार है। प्रवेश के पश्चात् गुरु चेला, पुरुष अकेला।’ वह जिस स्थिति में स्वयं निमग्न थे, उसी स्थिति की मस्ती शिष्य में भी प्रसारित हो गयी। वह शिष्य भी सत्गुरु की क्षमतावाला हो गया। यदि कोई सेवक है, सचमुच लगनशील है, उस नशे को पाना चाहता है तो आवश्यकता है सत्गुरु की। गुरुओं की तो कतार लगी है। यहाँ से बनारस तक जाते-जाते आपको दसियों हजार गुरु मिल जायेंगे। वैसे भी देखा जाय तो सांसारिक जीवनयापन के गुरु, पहलवानी के गुरु, कोई आचार्य, कोई पुर का हित करनेवाला पुरोहित– सभी गुरु ही तो हैं लेकिन आवश्यकता है सत्गुरु की। सत्य है क्या?–

सत्य वस्तु है आत्मा मिथ्या जगत प्रसार।

नित्यानित्य विवेकिया लीजै बात विचार।। (परमहंसजी की ‘बारहमासी’)

सत्य है, नित्य है, केवल एक परम तत्त्व है तो आत्मा! वैदिककाल में भगवान का नाम आत्मा था। वे अन्त:करण के अन्तराल में विदित होते हैं इसलिए आत्मा कहे जाते हैं। उस आत्मा के जो ज्ञाता हों, आत्मदर्शन, आत्मस्थित और आत्मप्रज्ञ हों, सत्य से संयुक्त जिनकी अवस्था होगी, वह सत्गुरु हैं जो आत्मा को आपके हृदय से जागृत कर सकें और उसके संरक्षण में आपको चला सकें। सेवक को ऐसे सद्गुरु मिल गये, कछु रहे तबाही’– फिर किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं खटकेगा, न साधना में किसी प्रकार भ्रान्ति की संभावना ही रहेगा। उस सद्गुरु की दी हुई विद्या कहाँ तक पहुँचाती है?–

कहै कबीर निज घर चलो’ सूर्य अस्त होने पर सभी तो अपने घर चलने का प्रयास करते हैं, भागते-दौड़ते तीर की तरह घर पहुँचते हैं लेकिन कबीर कहते हैं– उस घर चलो जहाँ काल का प्रवेश नहीं है–

काल खाय कलप नहिं व्यापे, देह जरा नहीं छीजे।

यहाँ अपना घर कहाँ? यह तो जन्म-मृत्यु के बीच का एक पड़ाव है, चिड़िया रैन बसेरा’ है, मुसाफिरखाना है।

पांचों नौबत बाजते उठत छतीसों राग।

ते मन्दिर खाली पड़े, बैठन लागे काग।।

जिस महल में आप बैठे हैं, यहाँ कभी इतना कड़ा पहरा था– खबरदार! सावधान! हुजूर आ रहे हैं। जब हम यहाँ आये, किले के इस खण्डहर पर स्यार, कौवों और सर्पों की भरमार थी। यह घर उनका था तो छोड़कर क्यों चले गये? यह तो जन्म-मृत्यु के बीच का एक पड़ाव है।

अपने खातिर महल बनाया। आपहु जाय जंगल बिच सोया।।

अपने रहने की बहुत तैयारी की, जहाँ रहने लायक हुआ, आप जंगल में जाकर सो गये, राम नाम सत्य हो गया इसलिए यह आपका घर नहीं है। घर तो वह है जिसमें काल का भी भय न रहे। काल से अतीत अकाल पुरुष तो अविनाशी परम तत्त्व परमात्मा है। साधना के इसी निर्देशन में चलकर जहाँ मूल का स्पर्श किया, दर्शन और स्थिति मिली, वही आपका धाम कैवल्य पद है। उसी को कबीर ने अपना घर कहा है। वह अरिहंत पद है, जहाँ कोई ऐसा शत्रु नहीं है जो आपको उस अवस्था से चलायमान कर दे। उसी घर के लिए कबीर स्थान-स्थान पर बल देते हैं–

तवन घर चेतिहे रे भाई। तोहरा आवागमन मिटि जाई।।

उस घर के लिए यत्न करो जहाँ जन्मना-मरना, इस संसार में आना-जाना सदा के लिए समाप्त हो जाय। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– अर्जुन! योगविधि यज्ञ है। इस यज्ञ को चरितार्थ करना कर्म है। आत्मा ही शाश्वत परम सत्य है। उसकी प्राप्तिवाली योगविधि को कार्यरूप देना ही कर्म है। अर्जुन! पूर्व में होनेवाले जितने मनीषी हुए, इसी कर्म को करके परम नैष्कर्म्य की स्थिति को प्राप्त हो गये। इस कर्म को किये बिना न कोई इस स्थिति को प्राप्त कर सका है और न ही भविष्य में कोई कर सकेगा। किन्तु कर्मों की पूर्तिकाल में जिसको आत्मा विदित है, जो आत्मतृप्त है, आत्मस्थित है, उस पुरुष के लिए कर्म किये जाने से न कोई लाभ है और न कर्म छोड़ने से कोई हानि है। उसे प्राप्त होनेवाली किञ्चित् वस्तु भी अप्राप्त नहीं है। फिर भी वह महापुरुष पीछेवालों के हित की इच्छा से भली प्रकार क्रिया में बरतते हैं।

ऐसे महापुरुष से अपनी समानता करते हुए भगवान श्रीकृष्ण अपना परिचय देते हैं– अर्जुन! मुझे भी तीनों कालों में कोई भी कर्त्तव्य शेष नहीं है, प्राप्त होनेयोग्य वस्तु अप्राप्त नहीं है; फिर भी मैं पीछेवालों के हित की इच्छा से भली प्रकार क्रिया में बरतता हूँ। यदि मैं सावधान होकर कर्म में न बरतूँ तो मेरे अनुसार समाज भी बरतने लग जायेगा और भ्रष्ट हो जायेगा। इस प्रकार मैं समाज की हत्या करनेवाला हो जाऊँगा, वर्णसंकर पैदा हो जायेंगे और वर्णसंकर का कर्त्ता बनूँ। (गीता, ३/२१) इसलिए आत्मतृप्त आत्मस्थित ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि कर्मों में आसक्त उन अज्ञानियों की बुद्धि में भेद उत्पन्न न करे बल्कि स्वयं करते हुए उनसे भली प्रकार कर्म कराये; क्योंकि इसे करके ही परम नैष्कर्म्य की स्थिति को प्राप्त किया जा सकता है।

मान लें, हमने गीतोक्त साधना को समझा, सद्गुरु की विद्या को हृदयंगम किया, दृढ़ता के साथ लग भी गये, फिर भी अभी हम अज्ञानी ही हैं। कल प्राप्ति होनी है, किन्तु आज का दिन तो अज्ञान का है। गीता के अनुसार ज्ञान साक्षात् के साथ मिलनेवाली जानकारी का नाम है। (४/३८) उसे जानकर साधक अनामय अमृतपद को प्राप्त कर लेता है जहाँ मृत्यु का प्रवेश नहीं होता। यही संकेत इस पद में सन्त कबीर दे रहे हैं– कह कबीर निज घर चलो जहँ काल जाई।’

एक अच्छे से भ्रमणशील महापुरुष थे। उन्हें एक नवयुवक सेवक मिल गया। उसने निवदेन किया– ‘‘भगवन्! मुझे शरण में रख लें।’’ महापुरुष ने कहा– ‘‘तुममें साधुता के लक्षण अभी तो नहीं है, फिर शिष्य बनना है तो चल मेरे साथ!’’ उसने महाराज का कमण्डल उठाया और उन महात्मा के साथ चल पड़ा।

विचरणशील उन महात्मा ने एक गाँव के कुएँ के पास आसन लगाया। गाँवभर के लोग कुएँ पर आये, स्नान किया, पानी ले गये किन्तु उन महात्माजी को किसी ने छेड़ा नहीं। शान्त एकान्त में महात्मा तो भजन में लग गये, दिन के दो बज गये, सुरत लगी ही रह गयी, वह उठे ही नहीं। उधर शिष्य के मन में गाँववालों के प्रति आक्रोश बढ़ता जा रहा था। उसने सोचा– ऐसा दुष्ट गाँव! खाना-पीना पूछना तो दूर की बात थी, किसी ने दण्डवत् भी नहीं किया, सीताराम भी नहीं कहा। ऐसे गाँव में तो आग लग जानी चाहिए। गुरुजी को देखो! रोज तो भजन से दस-ग्यारह बजे उठ जाते थे, आज दो बज गया। गुरुजी को भी आज ही समाधि चटकी है।

ज्योंही गुरु महाराज की आँख खुली, शिष्य ने कहा– ‘‘महाराज! यह तो बड़ा दुष्ट गाँव है। ऐसे गाँव में तो आग लग जानी चाहिए। देखिये न! खाना-पीना पूछने की कौन कहे, किसी ने सीताराम तक नहीं कहा।’’ महाराज ने कहा– ‘‘बेटा! भजन करने लायक जगह तो यही है। भजन करने की इतनी अच्छी जगह अन्यत्र मिली ही नहीं। जहाँ कोई न पूछे, वह जगह शान्त-एकान्त की होती है। हमारा तो विचार है कि भ्रमण के उपरान्त यहीं निवास करेंगे।’’

शिष्य सहमत तो नहीं था किन्तु औपचारिकतावश बोल पड़ा– ‘‘सत्य वचन महाराज!’’ कुछ दूर जाने पर एक नगर पड़ा। गुरु महाराज ने दो आने देकर शिष्य से कहा– ‘‘जाओ, चने ले आओ।’’ शिष्य ने दुकानदार से पूछा– ‘‘चने का क्या भाव है?’’ दुकानदार ने कहा– ‘‘एक रुपये का आठ सेर!’’ शिष्य ने कहा– ‘‘अरे, इतना महँगा! पीछेवाले गाँव में हम एक रुपये का दस सेर छोड़कर आ रहे हैं।’’ सस्ती का जमाना था। भुनभुनाते हुए शिष्य ने चना खरीदा। तब तक उसकी दृष्टि गट्टे पर पड़ी। उसने पूछा– ‘‘यह गट्टा क्या भाव है?’’ उसने बताया– ‘‘रुपये का आठ सेर।’’ शिष्य ने चना दुकानदार की दौरी में उलट दिया और बोला– ‘‘तब गट्टा ही दे दो।’’ गट्टा अभी साफी में आया ही था कि निगाह पड़ गयी रसगुल्ले पर। उसने रसगुल्ले का मूल्य पूछा। उसे भी रुपये का आठ सेर बिकता देख शिष्य गट्टा उलटकर, रसगुल्ला लेकर छलकता हुआ जाकर गुरु महाराज के समक्ष रख दिया।

महाराजजी बोले– ‘‘यह क्या उठा लाया? क्या तुम चना भी नहीं पहचानते!’’ शिष्य ने कहा– ‘‘महाराज! यह जगह बहुत ही अच्छी है। यहाँ रसगुल्ला एक रुपये में आठ सेर मिल रहा है।’’ महाराजजी ने पूछा– ‘‘अन्य वस्तुएँ किस भाव मिल रही हैं?’’ शिष्य ने बताया– ‘‘चना रुपये का आठ किलो, गट्टा भी आठ किलो, रसगुल्ला भी आठ किलो; सबकुछ रुपये का आठ किलो मिल रहा है।’’ गुरुजी ने कहा– ‘‘बेटा! यह अंधेर नगरी है। यहाँ से शीघ्र भाग चलो। यहाँ कोई महान संकट खड़ा हो सकता है।’’ शिष्य ने कहा– ‘‘महाराज जी! आपके आशीर्वाद से संकट कैसा? आज्ञा होती तो मैं यहीं वैराग्य साधता।’’ गुरुजी ने देखा, रसगुल्ला तो इसके मुँह लग गया। वह बोले– ‘‘ठीक है, कोई संकट आये तो हमें याद कर लेना।’’ शिष्य ने साष्टांग दण्डवत् किया और गुरुजी आगे बढ़ गये। शिष्य भी तालाब के किनारे झोपड़ी बनाकर वहीं रहने लगा।

शिष्य ने उपेक्षा के साथ सोचा– देखा जायेगा। भला हमें मुसीबत क्यों आयेगी? दिनभर में आठ-दस आने तो कहीं गये नहीं हैं। इतने में रबड़ी, बादाम, घी, दूध–सबकुछ पर्याप्त मिल जायेगा। उसने अपने भोजन की तालिका भी बना ली और लगा दण्ड-बैठक लगाने। चार-छ: महीने में ही उसकी गर्दन पर मांस छा गया।

उन्हीं दिनों नगर में एक घटना घट गयी। एक चोर दीवाल में सेंध लगा रहा था। दीवाल कमजोर थी, गिर पड़ी और चोर उसी में दबकर मर गया। चोर का पिता राजा के पास जाकर बोला– ‘‘हुजूर! अन्नदाता! गजब हो गया! हमारा एक ही लड़का था। उन सेठ की दीवाल गिर गयी जिससे दबकर वह मर गया।’’

राजा कुछ नशे में था, बोला– ‘‘ऐं! ऐसा हो गया? बुलाओ उस सेठ को।’’ सेठ के आने पर राजा ने कहा– ‘‘क्यों रे! इतना कमजोर मकान क्यों बनवाया? मान लो वह सेंध ही मार रहा था तो चोरों को दण्ड कोड़े मारना है, जेल भेजना है, चोरी के बदले मृत्युदण्ड कहाँ का न्याय है? खून का बदला खून! इस सेठ को फाँसी दे दो।’’

सेठ उसी नगर का निवासी था, वहाँ की चालों में माहिर था। उसने कहा– ‘‘पृथ्वीनाथ! दीवाल हमने नहीं, मिस्त्रीलोगों ने जोड़ा था। हमने तो पूरा पैसा दिया था। अब दीवाल कमजोर हो गयी तो दोष उनका है।’’ राजा ने कहा– ‘‘ठीक कहते हो, मिस्त्री बुलाये जायँ।’’ राजा ने उसने कहा– ‘‘इतनी खराब जोड़ाई क्यों की? देखो न! एक हत्या हो गयी। उस खून के बदले मुख्य राजगीर को फाँसी पर लटका दो।’’

मिस्त्री ने कहा– ‘‘रक्षा करें हुजुर! दुहाई सरकार की! बाल-बच्चे भूखों मर जायेंगे, अनाथ हो जायेंगे। हमारा तो कोई दोष ही नहीं है। सूत से नाप लें, दीवाल एकदम सही है। वह मजदूर, जो मसाला बना था, उसने पानी अधिक डाल दिया।’’ मजदूर पकड़ा गया। उससे भी राजा ने पूछा– ‘‘इतना रद्दी मसाला क्यों बनाया?’’ मजदूर ने कहा– ‘‘गरीबपरवर! सरकार की, हुजूर की हाथी पर सवारी इतनी धूमधाम से निकली कि मैं देखता ही रह गया, इधर मसक से पानी अधिक गिर गया।’’

राजा ने कहा– ‘‘ऐसी बात! उस कोतवाल को बुलाओ जिसने मेरी सवारी निकालने का प्रबन्ध किया।’’ कोतवाल के आने पर राजा ने कहा– ‘‘क्यों रे! तुमने मेरी सवारी इतनी धूमधाम से क्यों निकाली कि जनता अपना काम-धाम भूल गयी? ले जाओ इस कोतवाल को फाँसी पर चढ़ा दो।’’ कोतवाल को रोज-रोज डाँट पड़ती ही रहती थी, सूखकर काँटा हो गया था। वह ‘हुजुर-हुजुर’ करता ही रह गया किन्तु जल्लादों ने उसे पकड़ लिया।

जल्लाद ने कोतवाल के गले में फाँसी का फन्दा डाला तो बोला– ‘‘हुजूर! यह फाँसी ढीली पड़ रही है।’’ मंत्री ने भी देखा तो कहा– ‘‘इसकी गर्दन पतली है।’’ राजा ने कहा– ‘‘तुम मंत्री पद पर रहने लायक नहीं हो। इतना बड़ा मुकदमा हमने निपटारा कर दिया। इस छोटी सी समस्या का हल नहीं कर सकते? जाओ, जिसे भी यह फाँसी ठीक-ठाक लगती हो, उसी को लगा दो।’’

अब मोटी गर्दनवालों की खोज होने लगी। खोजते-खोजते लोग उसी तालाब पर पहुँच गये, जहाँ ब्रह्मचारीजी थे। सिपाहियों ने कहा– ‘‘चलिये महाराज! राजासाहब के यहाँ आपका बुलावा है।’’ शिष्य बहुत प्रसन्न हुआ। उसने सोचा– सेठ-साहूकारों और जमींदारों का अन्न तो बहुत खाया। आज, राजा साहब के यहाँ छप्पन प्रकार का स्वागत देख लें। उन्होंने कमण्डलु उठाया और चल पड़े।

चलते-चलते उन्होंने सिपाहियों से पूछ लिया– ‘‘वहाँ क्या काम है?’’ सिपाहियों ने बताया– ‘‘आपकी फाँसी होगी।’’ अब ब्रह्मचारीजी लगे घबड़ाने। वह कहने लगे– ‘‘भाई! हमने कोई पाप नहीं किया है, कोई अपराध भी नहीं किया है। हम तो केवल भजन करते हैं।’’ सिपाहियों ने कहा– ‘‘अपराध या पाप का प्रश्न नहीं है। कोतवाल साहब को फाँसी ढीली पड़ रही है, आपकी मोटी गर्दन में वह बैठ जायेगी।’’ अब तो शिष्य चिल्लाया– ‘‘गुरु महाराज! रक्षा कीजिए।’’

गुरु महाराज समर्थ महापुरुष थे। जब उन्हें दिखायी पड़ा कि शिष्य संकट में पड़नेवाला है, वह समीप आ गये थे। तत्काल पहुँचकर उन्होंने शिष्य के कान में कहा– ‘‘और खा ले रसगुल्ला!’’ शिष्य ने कहा– ‘‘महाराज! अब चना भी नहीं, चने का छिलका खाकर रह लेंगे। कृपया बचा लें।’’

गुरु महाराज ने उसके कान में धीरे-से एक योजना बतायी कि ‘‘बेटा! यह अंधेर नगरी है। वहाँ चलकर हमसे झगड़ना……।’’ पूरी योजना शिष्य समझ गया। ब्रह्मचारीजी फाँसी के तख्त तक पहुँचाये गये। राजासाहब का सिंहासन लग गया, सामन्त बैठ गये, जनता देख रही थी। फाँसी खुलेआम दी जाती थी।

गुरु महाराज राजा के पास पहुँचे और कहा– ‘‘राजन्! यह मेरा शिष्य है। अन्तिम समय में क्या मैं इससे कुछ बातें कर सकता हूँ?’’ राजा ने कहा– ‘‘हाँ, हाँ! यह जो चाहे खा सकता है, किसी से बात कर सकता है।’’ गुरुजी ने शिष्य के कान के पास कुछ कहा और सबको सुनाकर कहा– ‘‘अच्छा बेटा जा! शान्ति से भजन कर! फाँसी पर हम चढ़ेंगे।’’

शिष्य ने गुरु महाराज का चरण छूकर कहा– ‘‘महाराज! यह तो अपने भाग्य का सौदा है। फाँसी पर तो हम ही चढ़ेंगे।’’ गुरु ने कहा– ‘‘कैसा मूर्ख है! तू शिष्य है कि कसाई! आज हमें जाने दो। तुम तो भजन करके भी इस लक्ष्य को प्राप्त कर लोगे। हमारी बुढ़ौती देख! फाँसी पर तो हम ही चढ़ेंगे।’’ चेला बोला– ‘‘देखो, महाराज! बुढ़ौती और जवानी कुछ नहीं, यह तो भाग्य की बात है। फाँसी पर हम ही चढ़ेंगे।’’ वह आपस में धक्का देने लगे।

राजा ने सोचा– फाँसी से सभी डरते हैं, काँपते हैं, ये झगड़ा क्यों करते हैं, वह भी महात्मा होकर! राजा ने दोनों को शान्त किया और कहा– ‘‘ठीक है महाराजजी! आप ही फाँसी पर चढ़ जाइये लेकिन यह बतायें कि आप फाँसी पर चढ़ना क्यों चाहते हैं?’’ जब गुरु महाराज ने देख लिया कि राजा अब रास्ते पर आ गया है तो बोले– ‘‘राजन्! देखो देवलोक में शक्र (इन्द्र) की आयु अभी-अभी पूरी हुई है। उसका इन्द्रासन रिक्त है। इस फाँसी से जो जायेगा, वह सीधे इन्द्र पद पर बैठेगा। हमारी वृद्धावस्था है। उतना भजन नहीं कर पाता। यह अभी जवान है। भजन करके यह भी स्वर्ग पा सकता है लेकिन यह दुष्ट मान ही नहीं रहा है।’’ मंत्री, जो बगल में ही खड़ा था, प्रार्थना किया कि ‘‘हुजुर! हमें ही फाँसी पर चढ़ा दिया जाय।’’ राजा ने कहा– ‘‘राजा के रहते प्रजा बैकुंठ नहीं जा सकती। फाँसी पर हम चढ़ेंगे।’’ वह फाँसी पर लटक गया।

महात्मा ने शिष्य से कहा– ‘‘मूर्ख, अब तो भाग चल! अब यह बिना राजा का देश हो गया है, अब कुछ भी हो सकता है। अब यहाँ कोई कानून नहीं है। शीघ्र यहाँ से निकल चल।’’ और वे निकल गये।

सेवक को सतगुरु मिले’– आरम्भ में वह शिष्य था तो कमजोर पथिक; किन्तु सद्गुरु के संरक्षण में वह सुधर गया और गुरु महाराज के हाथ का यंत्र बनकर चलने लगा।

दुनिया में ऐसा कोई पापी नहीं है कि सद्गुरुओं की विद्या में चलकर भगवत्पथ की दूरी तय न कर ले। अंगुलिमाल से क्या बचा था? वह तो गौतम बुद्ध के ऊपर भी झपटा था किन्तु कालान्तर में वही बुद्ध के जीवन्मुक्त अरिहन्त शिष्य में अग्रगण्य था, प्राप्ति कर ले गया। बाल्मीकि से क्या छूटा था? वह दस्युओं का सरदार था। रत्नाकर! इतना डाका डाला कि डकैती का समुद्र तैयार कर दिया। जैसे अधिक विद्वान् को विद्यासागर की उपाधि मिली है, इतना बड़ा विद्वान् कि विद्या का सागर भर दिया। इसी प्रकार उसने इतना डाका डाला कि रत्नाकर नाम ही पड़ गया; किन्तु वही जब सप्तर्षियों से टकराये तो–

उलटा नामु जपत जगु जाना।

बाल्मीकि भये ब्रह्म समाना।। (मानस, २/१९३/८)

उन्होंने ब्रह्म के समानान्तर स्थिति प्राप्त कर लिया। जो पाप के रसातल में खड़े थे, सब पाप धुल गये। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– ‘‘अर्जुन! संसार के सभी पापियों से भी अधिक पाप करनेवाला हो, ज्ञानरूपी नौका से वह नि:सन्देह तर जायेगा।’’

अत: लोगों को हताश नहीं होना चाहिए कि हमने तो बड़े पाप किये हैं। भला, हमारे ऐसे पापियों की सुनवाई क्यों होगी? अरे, प्रभु तो पाप का निवारण ही हैं। वह तो दुर्भाग्यशालियों के ही भाग्य हैं। हर परिस्थिति में केवल नाम स्मरण बना रहे। चलते-फिरते, उठते-बैठते नाम याद आया करे तो सोने में सुगन्ध है। सुबह-शाम आधा घण्टा बैठकर समय अवश्य दिया करें। यह नियम खण्डित न हो। जो खण्डित ही हो जाय वह नियम कैसा? खाना-पीना, मर-मुकदमा, झूठ-फरेब सब आप करते ही हो, खाना-पीना, सोना-जागना, सब अनिवार्य है तो जिस कमी की पूर्ति के लिए दुर्लभ मानव-तन मिला है हम उसी को क्यों तिलांजलि दे देते हैं? इस आधे घण्टे के भजन से ही भजन की पूर्ति न समझें, हर समय नाम याद आया करे। भगवान जानते हैं कि जीव को क्या चाहिए? इसका हित किसमें है? वह सब मिलेगा। भजन प्रकाश का रास्ता है, अन्धकार की अटकल नहीं। आपके और प्रभु के बीच माया का आवरण हल्का होते ही भगवान पेड़ से बोलेंगे, पत्तियों से बोलेंगे, शून्य से बोलेंगे और आपके लिए मार्गदर्शक बनकर खड़े हो जायेंगे। वह परम चेतन सर्वत्र सुनते हैं, सर्वत्र देखते हैं किन्तु पूर्णत्व की प्राप्ति का साधन तभी जागृत होगा जब सेवक को सतगुरु मिले’; बस फिर कोई तबाही नहीं रह जायेगी।

।। श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय ।।

(अमृतवाणी भाग-4’ से उद्धृत)

Q & A
×