दुनियाँ जिसे कहते हैं…..

दुनियाँ जिसे कहते हैं…..

दुनियाँ जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है।

मिल जाय तो मिट्टी है, खो जाय तो सोना है।।

अच्छा सा कोई मौसम, तनहा सा कोई आलम।

हर बात का रोना तो, बेकार का रोना है।।

बरसात का बादल तो, दीवाना है क्या जाने।

किस राह से बचना है, किस छत को भिंगोना है।।

गम हो या खुशी दोनों, कुछ देर के साथी हैं।

फिर रस्ता ही रस्ता है, हँसना है न रोना है।।

दुनियाँ जिसे कहते हैं……।।

संतों की दृष्टि में दुनिया जादू का एक खिलौना-जैसा है। जादू में होता तो कुछ नहीं। जादूगर समय-बेसमय अंगूर-आम कुछ भी दिखा देता है। वह किसी व्यक्ति को ऊपर हवा में गायब कर देता है। किसी को काट देगा पुन: जिला देगा जबकि वास्तविकता कुछ भी नहीं, सब दृष्टिभ्रम मात्र होता है। ठीक इसी प्रकार दुनिया एक जादू का खिलौना है और सब देखनेवाले बच्चे की तरह अबोध हैं; तभी तो खिलौने में उलझे हैं। खिलौनों से बच्चे खेलते हैं। बच्चे खिलौनों के लिए लड़ते-झगड़ते-मचलते हैं, आँसू बहाते हैं। सयानों के लिए उनमें कोई आकर्षण नहीं होता जबकि बच्चों का मन करता है कि उन्हें समेटे रहें, देखते ही रहें। किन्तु दुनिया का खिलौना ऐसा है कि अतिवृद्ध भी उससे चिपके रहते हैं। ज्यों-ज्यों बुढ़ौती आती है, त्यों-त्यों और अधिकाधिक चिपकते हैं।

मान लें, दुनिया का सारा ऐश्वर्य आपको मिल ही गया तब क्या होगा? संतों का अनुभव है– मिल जाय तो मिट्टी है और संसाररूपी खिलौना खो जाय तो सोना है। आइए विचार करें कि ऐसा क्यों?

रामचरितमानस में भूप प्रतापभानु की कथा आती है। स्वबस बिस्व करि बाहुबल।– पूरा विश्व उसके अधीन था। समूची सृष्टि का ऐश्वर्य उसने इकट्ठा कर लिया था लेकिन उसके जीवन में भी एक घटना घट गयी। एक कपटी मुनि से उसकी भेंट हो गयी। उसने कपटी मुनि से ऐश्वर्य की कथा सुनी तो हाथ जोड़कर बोला– प्रभो!

जरा मरन दुख रहित तनु समर जितै जनि कोउ।

एकछत्र रिपुहीन महि राज कलप सत होउ।। (१/१६४)

एक तो वृद्धावस्था न आये; दूसरा आशीर्वाद दीजिए कि मृत्यु न हो; तीसरा आशीर्वाद दीजिए कि शरीर में कोई रोग न हो– दाँत न हिले, कमर में दर्द न हो। ‘किसी से झगड़ा न हो’– यह न माँगकर कहा– झगड़ा अवश्य हो लेकिन शत्रु दुम दबाकर भागे और मैं उसे देखूँ। सब कामना ही कामना! वह अधूरी कामनाएँ लेकर मर गया।

मानस में ही चक्रवर्ती सम्राट रावण की कथा है–

ब्रह्मसृष्टि जहँ लगि तनु धारी।

दसमुख बसबर्ती नर नारी।। (१/१८१/१२)

जहाँ तक विधाता की सृष्टि थी, रावण ने सबको वश में कर लिया; किन्तु वह एक स्त्री की अधूरी इच्छा लेकर मर गया। उसकी लंका सुवर्ण निर्मित थी; किन्तु सब ऐश्वर्य छोड़कर उसे मृत्यु का वरण करना पड़ा। इसीलिए संसार का सब वैभव मिल भी जाय तो मिट्टी है। शरीर जन्मने-मरनेवाला; पायी हुई वस्तु, भोग-सामग्री नश्वर! हाँ, यह खो जाय तो आप स्वर्णिम युग में पहुँच जायेंगे। किन्तु यह खोये कैसे? जेहिं जाने जग जाइ हेराई।– उस परमात्मा की प्राप्ति से ही जगत् खो जाता है और उस परमात्मा की प्राप्ति सद्गुरु के कृपा-प्रसाद से, एकान्त सेवन से, भजन की विधि जागृत होने से है। यही भाव इन पंक्तियों में भी है–

अच्छा सा कोई मौसम, तनहा सा कोई आलम।

अच्छा मौसम? सृष्टि में कोई ऐसा मौसम नहीं है जो सदा अच्छा लगे। आज कड़ाके की सर्दी है, आप कितना पहन-ओढ़कर बैठे हैं पर बच्चों के लिए मस्ती है, उनके लिए अच्छा है; आपके लिए कष्टसाध्य है किन्तु यही वयोवृद्धों के लिए मौत का संदेश भी है। आज हम-आप गर्मी की कामना करते हैं। ग्रीष्म की प्रखर गर्मी आ गयी तब जी चाहेगा कब वर्षा आ जाय, चार बूँद पड़ जाती तो यह ताप तो कम होता। अतिवृष्टि होने लगी तो लोग कहेंगे– इस कीचड़ से तो शरदकाल अच्छा है। इस प्रकार सृष्टि में ऐसा कोई मौसम नहीं है जो सदा अच्छा रहे।

दुनिया का सारा वैभव सामने रखा है फिर भी निद्रा नहीं आती। एक थे शान्ति प्रसाद जैन। भारत के प्रमुख धनियों में से एक। वह सुप्रीम कोर्ट में बेतिया स्टेट का मुकदमा लड़ रहे थे, प्रतिष्ठित वकील थे। बेतिया स्टेट लावारिस थी। बहुत-से प्रत्याशी निकल आये कि हम वहाँ के राजा के वंशज हैं, स्टेट पर हमारा हक बनता है। बरैनी (मीरजापुर) के एक बाबू साहब भी ऐसे ही एक प्रत्याशी थे। शान्ति प्रसाद जैन ने कहा– ‘‘आपका मुकदमा मैं देखूँगा किन्तु शर्त यह रहेगी कि विजयी होने पर खजाने के हीरे-जवाहरात मेरे होंगे और शेष सम्पत्ति आपकी होगी।’’ वह मुकदमा देखते रहे।

एक दिन जैन साहब ने फोन करके बाबू साहब को बुलाया और बोले– ‘‘राजा साहब! आज रात के एक बज गये, मुझे नींद नहीं आयी। हमसे तो वह मजदूर लाख दर्जे अच्छा है जो आठ घण्टे श्रम करता है और खर्राटे की नींद सोता है।’’ उन्होंने खिड़की से झाँककर फुटपाथ पर सोये मजदूरों को दिखाया। ‘‘धिक्कार है मेरे इस पलंग को जो कि इस पर नींद नहीं आती। राजा साहब! मेरे पास इतना धन है कि दीवालों में सड़ रहा है। मुझे उनके हिसाब का भी पता नहीं है, फिर भी आपके हीरे-जवाहरात की मुझे कामना है। पता नहीं, मैं अभागा उन्हें देख पाऊँगा या नहीं? भगवान अलग से ब्रह्मा नियुक्त कर दें कि जिस मनुष्य को तुमने बनाया है उसकी इच्छा पूर्ण कर दे तो वह भी नहीं कर सकता। जबकि मुझे काेई कमी नहीं है फिर भी मुझे हीरों की इच्छा है। पता नहीं, मैं इन्हें खाऊँगा या बिछाऊँगा?’’ इस वार्ता के ठीक एक महीने पश्चात् वकील साहब का शरीर छूट गया।

जैन साहब को एक लड़का था, वह भी अच्छा वकील था। सुप्रीम कोर्ट में ही प्रैक्टिस करता था। पिता की मृत्यु के पश्चात् मुकदमा वह देखने लगा। छ: महीने में उसका भी शरीर छूट गया। बीमारी दोनों को एक! अत: ऐसी कोई समृद्धि नहीं जो आपकी आत्मा को सुखी कर सके। सृष्टि का वैभव मिल जाय तो मिट्टी है, खो जाय तो सोना है।

अच्छा मौसमके सम्बन्ध में लोगों का दृष्टिकोण है कि हीरे-जवाहरात, स्वर्गिक ऐश्वर्य बिछा हो, कारोबार अच्छा हो, पचीसों कारें पीछे लगी रहें; किन्तु यह सब मिलकर भी आपको सुख प्रदान नहीं कर सकते। इसलिए अच्छा मौसम सत्गुरु की शरण में होता है, जो तत्त्वदर्शी महापुरुष हैं उनके सान्निध्य में होता है। उनकी शरण में आप जायेंगे, थोड़े ही समय में साधना जहाँ जागृत हो गयी तो आप चिन्तन में डूबते चले जायेंगे। फिर आपको अपने और पराये का भान भी नहीं रहेगा। उस समय आपको चिन्ता रहेगी तो एक–

उर अभिलाष निरन्तर होई।

देखिअ नयन परम प्रभु सोई।। (मानस, १/१४३/३)

मैं कैसे प्रभु को भा जाऊँ? अच्छे मौसम में जी रहे थे राजकुमार सिद्धार्थ। उन्होंने गृह त्याग दिया, वैभव त्याग दिया। एक खप्पर लेकर एक चीवर पहनकर चल दिये, भगवान बुद्ध कहलाये। चक्रवर्ती नरेश मनु! संसार उन्हीं का बनाया हुआ, संसार के एकछत्र सम्राट! लेकिन एक अदृश्य कमी उन्हें भी खटक रही थी। वह दु:खी थे, भजन करने निकल पड़े। नैमिषारण्य गये, सन्तों से मिले, साधना का क्रम समझा और भजन में लग गये। भजन में गति आई तो सरसब्ज वाटिकाएँ दिखाने ब्रह्मा, विष्णु और महेश स्वयं आ गये–

बिधि हरि हर तप देखि अपारा।

मनु समीप आये बहु बारा।।

मागहु बर बहु भाँति लोभाए।

परम धीर नहिं चलहिं चलाए।। (मानस, १/१४४/३-४)

जब विश्वामित्र की परीक्षा लेनी थी, इन्द्र ने मेनका को भेज दिया, सफल रहे। जब नारद को परखना था तो पूरी ताकत के साथ कामदेव को भेजा कि जरा ठोंको-बजाओ कि भक्त कैसा है? नारद उसमें तो नहीं फँसे किन्तु अहंकार में उलझ गये। वाह रे जितेन्द्रिय! नारद दौड़-दौड़कर अपनी जितेन्द्रियता की वाहवाही सुनने में लग गये। किन्तु महाराज मनु! देवलोक उनका बनाया हुआ। भला उन्हें कौन-सा प्रलोभन दिया जाय? संसार भी तो उन्हीं का बसाया हुआ है। तब उनकी परीक्षा में आये– ब्रह्मा-विष्णु-महेश। उन्होंने कहा– ब्रह्मलोक ले लो, विष्णुधाम ले लो, शिवलोक ले लो। बहु भाँति लुभाए– वह भी एक अच्छा मौसम दिखा रहे थे, मनु ने उनकी तरफ घूमकर देखा भी नहीं।

जब भगवान ने देखा कि मन-क्रम-वचन से यह केवल मुझे चाहता है तो आकाशवाणी हुई कि वर माँगो। मनु ने कहा– प्रभो! केवल आप चाहिए, अन्य कुछ भी नहीं। भगवान बोले– मेरे जैसा तो सृष्टि में कोई है ही नहीं, मैं कहाँ से लाकर दे दूँ? चलो, मैं स्वयं ही तुम्हारे यहाँ अवतरित होऊँगा। भगवान से माँगना है तो भगवान को ही माँग लो। जहाँ भगवान रहेंगे, ये ब्रह्मा-विष्णु-महेश, देवी-देवता सभी तुम्हारे अगल-बगल स्वत: बने रहेंगे। संसार में कोई ऐसा मौसम नहीं जो सदा एकरस रह सके। अच्छा मौसम है भगवत्-पथ, सद्गुरु की शरण! जहाँ साधना जागृत हुई, कुछ ही समय में साधक एकान्त में देखा जाता है। इसी से कहते हैं–अच्छा सा कोई मौसम, तनहा सा कोई आलम। तनहा माने अकेला, वहाँ केवल अपना तनमात्र है और कोई नहीं। वह तुरन्त एकान्त सेवन करने लगता है। उसका मन करेगा किसी से भेंट न हो, किसी से बात करने का भी मन नहीं करेगा। साधक की ऐसी दशा हो जाती है। आलम माने संसार भी होता है। जब साधक शान्त-एकान्त में बैठा है, उस समय सारी दैवी वृत्ति साधक के साथ रहती है, धड़ाधड़ आवाजें आने लगती हैं, भगवान उसका योगक्षेम करने लगते हैं। उस साधक के पास आध्यात्मिक संसार होता है, सद्गुणों की भीड़ होती है। लेकिन यह तब सम्भव है जब हम तनहा हों और मौसम में सद्गुरु के सान्निध्य से गुजरें। साधक में सतत चिन्तन की अवस्था जागृत हो जाय तभी वह एकान्त में रह भी पायेगा, तनहा हो सकेगा।

हर बात का रोना तो, बेकार का रोना है।

यदि इतना हो गया तो आपको किसी वस्तु की कमी नहीं रहेगी। यदि इतना नहीं हो सका तो एक कमी की पूर्ति के पश्चात् दूसरी के लिए रोना लगा रहेगा। एक बस डाल दिया तो दूसरी के लिए पुन: प्रार्थना-पत्र देना– आयुपर्यन्त एक न एक कमी खटकती रहेगी।

एक बार गुरु महाराज ने कहा कि– भगवान ने मुझसे ऐसा कहा, उस स्थान पर यह कहा, वहाँ हमें पतित होने से बचाया। हमने पूछा– ‘‘महाराज जी! क्या भगवान बातें करते हैं?’’ गुरु महाराज बोले– ‘‘हाँ हो! भगवान ऐसे बतियावत हैं जैसे हम-तुम बैठ के बतियायीं, घण्टों बतियायीं और क्रम न टूटै।’’ किन्तु यह तब सम्भव है जब शान्त-एकान्त में सुरत लगाकर रहो, रहने लगो। तनहा होने पर वह आलम मिलेगा, ईश्वरीय आलोक की सभी विभूतियाँ आपके अगल-बगल रहेंगी। फिर कोई कमी नहीं रहेगी – रोना नहीं पड़ेगा। यदि आप इसके विपरीत हैं तो रोना पड़ेगा और वह बेकार का रोना होगा। अब बताते हैं कि एकान्तसेवी साधक के लक्षण क्या हैं?–

बरसात का बादल तो, दीवाना है क्या जाने।

किस राह से बचना है, किस छत को भिंगोना है।।

भक्त को बरसात के बादल की उपमा दी गयी है। जब वह ईश्वरीय विभूतियों और आलोक से सम्पर्क स्थापित कर लेता है, उस आलम, उस भीड़भाड़ से गुजरनेवाला होता है तो उसकी रहनी बरसात के बादल की तरह होती है। बादल दस किलोमीटर दूर दिखेगा किन्तु पानी यहाँ गिरेगा। वह किसी राह से बँधा नहीं है। वह तो स्वतन्त्र शून्य में चल रहा है। ऐसे साधक को किससे बचना है, किस रहनी से रहना है, किस पर अनुकम्पा की वर्षा करनी है, उसकी जिम्मेदारी समाप्त! यह दायित्व भगवान स्वयं सम्पादित कर देते हैं। वह प्रेरणा कर उधर ही ले चलेंगे जिसमें साधक का हित है।

राम झरोखे बैठकर, सबका मुजरा लेय।

जैसी जिसकी चाकरी, तैसी ताको देय।।

वह तो प्रभु के झरोखे में बैठ गया। वह सबकी प्रार्थनाएँ सुनता है और जैसी जिसकी चाकरी– किसकी सेवा हृदय से है किसकी बनावटी; किसमें संस्कारों का कैसा दबाव है, उसी के अनुरूप व्यवस्था भगवान स्वयं करते रहते हैं। करत करावत आप हैं, पलटू पलटू शोर।– संत पलटू साहब कहते हैं कि करते तो भगवान हैं, हमारा केवल नामभर रहता है। किसी आदमी का भला हो गया तो कहते हैं– ‘आपकी कृपा से हो गया।’ जबकि करते भगवान हैं। यह बादल की जिम्मेदारी नहीं है कि किस छत को भिंगोना है, किस पर वरदहस्त रखना है लेकिन लोगों को वरदहस्त मिलने लगता है। अन्त में बताते हैं कि इस पथ के आरम्भ में बाधाएँ बहुत-सी हैं–

गम हो या खुशी दोनों, कुछ देर के साथी हैं।

फिर रस्ता ही रस्ता है, न हँसना है न रोना है।।

ईश्वर-पथ में मीरा को शूलों की सेज बिछायी गयी, कितने विघ्न आये। प्रह्लाद को समुद्र में फेंका गया, आग में जलाया गया। त्रय तापों की ज्वाला में माया जलाया ही करती है, संसार के विषयरूपी वारि में ढकेला ही करती है। यह विघ्न प्रह्लाद ही नहीं, सभी साधकों के सामने आते हैं। उस समय कभी सहयोग मिलेगा तो खुशी और सहयोग नहीं मिला तो गम महसूस होता है। लेकिन इस शायर का कहना है कि यदि हम इस पथ पर समर्पित हैं तो गम हो या खुशी, दोनों कुछ देर के साथी हैं।– कुछ दूरी तक यह दोनों पीछा करते हैं। हनुमान समुद्र सन्तरण करने चले तो मैनाक ने कहा– आइए, इस स्वर्णिम शिखर पर विश्राम कीजिए। पहले स्वर्ण का प्रलोभन! आगे बढ़े तो एक भयंकर राक्षसी सुरसा बदन बढ़ाने लगी। सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा।– जितना बड़ा समुद्र, उतना बड़ा मुँह। हनुमान अत्यन्त छोटे बनकर उसके मुँह से निकल आये। सुरसा ने कहा– ‘‘तुम बल-बुद्धि में निष्णात हो। राम का कार्य तुम अवश्य करोगे– यह मेरा आशीर्वाद है।’’ आशीर्वाद देकर सुरसा चली गयी। इस प्रकार गम हो या खुशी, दोनों कुछ देर के साथी हैं।इस ईश्वर-पथ में ये कुछ ही दूरी तक पीछा करते हैं। फिर रस्ता ही रस्ता है– रास्ता एकदम साफ, चले जाओ धड़ाधड़। हँसना है न रोना है– न हँसी का अवसर, न रोने का!

दुनियाँ जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है।

मिल जाय तो मिट्टी है, खो जाय तो सोना है।।

जिसे हम दुनिया कहते हैं, सरसब्ज वाटिका-जैसी है। यह फुदकते हुए बाल-गोपाल, लहलहाती हुई खेतियाँ जादू के खिलौने-जैसी हैं। इनके प्रति हम सबके मन में एक भयंकर आकर्षण है। इन्हें बिना देखे हम सबसे रहा ही नहीं जाता। इस जंगल या ग्राम्य-परिवेश से हटकर अमेरिका के विकसित नगरों में ही क्यों न चले जायँ, चित्त इसी खपरैल वाली झोपड़ी में लगा रहेगा कि इसमें क्या हो रहा होगा? इसके प्रति मन में जबरदस्त खिंचाव है। जिसके लिए हम मर मिट रहे हैं, खींचे चले आ रहे हैं, वह मिल भी जाय तो मिट्टी है; क्योंकि सोइ पुर पाटन सोइ गली, बहुरि न देखा आइ।। चंद दिनों पश्चात्, आयु के दिन जहाँ पूरे हुए शरीर का परिवर्तन निश्चित है। फिर जिस नई जगह जन्म होगा, वहाँ की दूसरी ही दुनिया, दूसरे ही लोग, दूसरा ही घर-परिवार, दूसरा ही परिवेश, दूसरी ही इज्जत, दूसरी ही मर्यादा– आज तक जितना अर्जित किया पुन: इनका दर्शन भी नहीं होना है। यह हमारे किस काम आयेगी? यह मिट्टी नहीं तो क्या है? क्योंकि इसे छोड़कर आगे सफर करना पड़ेगा। आप लौटकर पुन: इस घर को नहीं देख पायेंगे इसलिए यह खो जाय तो सोना है।लेकिन तुलसिदास कह चिदबिलास जग, बूझत बूझत बूझै।गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि जगत् का निवास तो चित्त के अन्तराल में है; यह खोये कैसे? बाहर से अभाव हो गया तब भी क्या खो गया? मन तो रात-दिन हाय-हाय कल्पना कर रहा है। यह कैसे खोये? इसके लिए सरल-सा उपाय बताया–

अच्छा सा कोई मौसम, तनहा सा कोई आलम।

सृष्टि में ऐसा कोई मौसम नहीं जो एक ही शरीर को सदैव एक-जैसा लगे। जब सब नश्वर ही है, जादू ही है तो अच्छा मौसम केवल एक है– भगवान का भजन; और भजन के शोध का स्थान है तत्त्वदर्शी महापुरुष, सत्गुरु का दरबार। उनके द्वारा निर्दिष्ट टूटी-फूटी सेवा, टूटी-फूटी साधना जहाँ पार लगी तहाँ तुरन्त शान्त-एकान्त में पहुँच जाओगे। एकान्त में भी जब मन लग जाय तो तनहा हो गया– तनहा सा कोई आलम।उस वक्त है तो अकेला और आलम कहते हैं संसार की भीड़भाड़ को। अकेला आलम कैसा? तो भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– ऐकान्तिक सुख मैं हूँ। शान्त-एकान्त में जिसकी लौ मुझमें लग जाय, उसके हृदय में मैं प्रवाहित होता हूँ।

जहाँ शान्त-एकान्त में सुतीक्ष्ण की तरह लौ लगी तो सारे देवता (दैवी सम्पद्), दैवीय आलोक के प्राणी उसके सामने ऊँची-नीची अवस्थाओं के भेद बताते रहेंगे। इनका एक आलम साधक के चतुर्दिक रहता है। भगवान आगे-पीछे रहकर योगक्षेमं वहाम्यहम्– योगक्षेम की व्यवस्था में रहेंगे। यह आलम तनहा होने पर ही सम्भव है।

जब भगवान का ही वरदहस्त और उनकी विभूतियों का दिग्दर्शन आने लगा तो सारा दु:ख समाप्त। फिर उसे छोटी-छोटी बातों के लिए रोना नहीं पड़ेगा। आगे इस जीव का जिसमें कल्याण है वह व्यवस्था स्वयं प्रभु ही देते रहते हैं, सार-सँभाल करते रहते हैं। इसके विपरीत यदि आप संसार से आशावान् रहेंगे तो एक पूर्ति के अनन्तर पुन: अभाव; दूसरी पूर्ति हुई तो तीसरा दु:ख; क्योंकि यह संसार दु:खालयम् अशाश्वतम्है ही। ऐसे महापुरुष की रहनी कैसी होती है? उसकी चाल कैसी होती है?– तो बताया– जैसे बरसात का बादल! उसकी जिम्मेवारी स्वयं प्रभु ले लेते हैं।

!! ॐ श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय !!

(अमृतवाणी भाग-3’ से उद्धृत)

Q & A
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