न तसबीह काम आयेगी
(श्री परमहंस आश्रम शक्तेषगढ़ परिसर में प्रतिदिन प्रात: ७.३० से ८.३० बजे तक तथा सायं ३.३० से ४.३० बजे तक दैनिक सत्संग के अवसर पर दूर–दूर से पधारे हुए हजारों भाविक भक्तों को महाराजश्री दर्शन देते, उनके कल्याणार्थ कुछ उपदेश देते, उनकी ओर से आनेवाले आध्यात्मिक प्रश्नों का समाधान करते, उनकी समस्यायें सुनते तथा सबको आशीर्वाद प्रदान करते हैं। भजन और कीर्तन गायक भी समय–समय पर अपने भाव–प्रसून महाराजश्री को निवेदित करते ही रहते हैं। इसी क्रम में क्षेत्र के प्रसिद्ध गायक श्री करम अली ने सूफी सन्तों के उद्गार दो–तीन भजनों के माध्यम से प्रस्तुत किया जो महाराजजी को पसन्द आये, जिनका आशय बताते हुए महाराजजी ने कहा कि भजन की विधि संसारभर के महापुरुषों की एक जैसी रही है चाहे वह कहीं भी जन्मे हों बशर्ते कि वह अन्त:करण से जागृत महापुरुष हुए हों। धर्म देश–काल की सीमा में आबद्ध नहीं होता। धर्म का मुख्य स्वरूप एक है। उसमें की जानेवाली प्रक्रियायें एक, सुविधा और परिणाम भी एक–जैसा हुआ करता है। अब प्रस्तुत हैं क्रमश: वे भजन….)
न तसबीह काम आयेगी, न माला काम आयेगा।
न अदना काम आयेगा, न आला काम आयेगा।।
न फौजें साथ देंगी, ना रिसाला काम आयेगा।
अन्धेरे में तो नेकी का, उजाला काम आयेगा।।
जो देगा राहे हक में, वो निवाला काम आयेगा।।
नशा है जिनको दौलत का, समझ में पड़ गया पत्थर।
अभी तो भीड़ सी रहती है, अपनों की तेरे दर पर।।
तू कमाता जायेगा मरकर, ये खाते जायेंगे हँसकर।
जरा मेरी तरफ तो देख, क्या कहता है ये अम्बर।।
न जोरू काम आयेगी, न साला काम आयेगा।
जो देगा राहे हक में……।।
बुरा दिन आयेगा मिट्टी में मिल जायगी सब शोहरत।
जो करते हैं तेरी इज्जत, करेंगे तुमसे ही नफरत।।
कोई देगा नहीं पानी, जब घट जायगी तेरी ताकत।
अरे नादान इक पल में, लुटेगी तेरी सब दौलत।।
न चाभी काम आयेगी न ताला काम आयेगा।
जो देगा राहे हक में……।।
सवा नैजे पर खुरशीद मैहसर जगमगाएगा।
उस दिन रोना तुमको अपने आमालों पर आयेगा।।
अरे मगरूर तेरा सब, भरोसा टूट जायेगा।
बढ़ेगी तिस्नगी माँगेगा, पानी खाक पायेगा।।
न सुराही काम आयेगी, न प्याला काम आयेगा।
जो देगा राहे हक में……।।
इस भजन में आदमियों को नेकी करने और जरूरतमन्दों को दो ग्रास देने की बात कही गयी, जैसा कि गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं–
तुलसी इस संसार में, करि लीजे दो काम।
देने को टुकड़ा भला, लेने को हरि नाम।।
अब आइये भजन की पंक्तियों पर! तसबीह सत्तर या सौ दानों की मोती या काँच की माला होती है जिसके माध्यम से मुसलमान फकीर ईश्वर की इबादत करते हैं। इस तसबीह का उन्हें बड़ा भरोसा होता है। बौद्ध लोग एक प्रार्थना-चक्र घुमाया करते हैं, वह भी एक प्रकार की माला ही है। इस पद में फकीर कहते हैं कि न्याय के दिन न तो यह तसबीह काम आयेगी और न माला ही साथ देगी। उँगलियों पर चलनेवाली माला और जिह्वा पर चलनेवाला नाम परमात्मा के धाम में काम नहीं आता; क्योंकि यह तो साधना की जागृति का आरम्भिक प्रयास मात्र है, उतने के लिये यह आवश्यक है। यह व्यर्थ भी नहीं है क्योंकि मन असंयत है, माया में रात-दिन रमा है। इस उच्छृंखल मन को परमात्मा की राह पकड़ाने के लिए माला या तसबीह सहायक है; किन्तु मन जब साधना की उन्नत श्रेणी पकड़ लेता है तो यह माला विस्मृत हो जाती है।
माला तो मन की भली, और काठ की भार।
माला में गुन होत तो, क्यों बेचे मनिहार।।
माला में यदि गुण होते तो हीरा पारखी जौहरी बेचते; ये चूड़ी बेचनेवाले मनिहारे क्यों बेच रहे हैं? जब मन नाम का अभ्यस्त हो जाता है तब यह हाथ की माला छूट जाती है। उस अवस्था तक माला आवश्यक है। महापुरुष कहते हैं कि उन्नत स्तरों पर माला और तसबीह के माध्यम से किया हुआ भजन-सुमिरन काम नहीं आयेगा। माला-स्तर के जपनेवालों के कुछ अपने भरोसे होते हैं; किन्तु यहाँ कहते हैं– ‘न अदना काम आयेगा न आला काम आयेगा’– छोटा-बड़ा कोई भी आपकी सहायता नहीं कर पायेगा। परिवार में अदना बच्चे या उनके भी बच्चे और आला नवजवान कर्मठ, न वही काम आयेगा। ‘न फौजें साथ देंगी न रिसाला काम आयेगा’– बड़ी से बड़ी सेना भी आपकी रक्षा नहीं कर पायेगी। अनेक सम्राट ऐसे हुए हैं जिनके महलों की सुरक्षा में लाखों पहरेदार लगे थे;
आसपास जोधा खड़े, सबै बजावत गाल।
मंझ महल से ले चला, ऐसा काल कराल।।
आसपास योद्धाओं की कतारें लगी हुई थीं। सभी गाल बजाते, डींग हाँक रहे थे कि ‘यमराज का मुँह मोड़ देंगे। हुजूर! आप बेफिक्र रहिये।’; किन्तु काल जब आया तो इतने पहरे के बीच से उठा ले गया। काल इतना प्रंचड है कि पहरों से भी उससे नहीं बचा जा सकता।
यूनान का सम्राट सिकन्दर अत्यन्त महत्वाकांक्षी था। उसने एक सन्त का नाम सुन रखा था कि अवसर मिलने पर मैं कभी उन महापुरुष का दर्शन अवश्य करूँगा; किन्तु लगातार विजय-अभियानों से उसे अवसर ही नहीं मिलता था। एक दिन वह युद्ध-अभियान पर जा रहा था। रास्ते में उसे एक झोपड़ी दिखायी पड़ी। सेनापति घोड़े से कूद पड़ा और बोला– ‘‘श्रीमन्! जिन सन्त के दर्शन आप करना चाहते थे, वह यहीं धूप में बैठे हैं।’’
सिकन्दर रथ से उतरा, उन्हें सादर प्रणाम किया। उन महापुरुष ने पूछा– ‘‘पहले यह बता तू कौन है?’’ सेनापति ने परिचय दिया– ‘‘यह यहाँ के सम्राट सिकन्दर महान हैं।’’ महात्मा ने कहा– ‘‘अच्छा, यह एक महीने से रात-दिन छकड़े भरकर अस्त्र-शस्त्र चले जा रहे हैं इस रास्ते से; क्या सब तुम्हारे हैं?’’ सिकन्दर ने विनम्रता से कहा– ‘‘जी! मेरे ही हैं।’’ महात्मा ने पूछा– ‘‘सब सामग्री जा चुकी?’’ सिकन्दर ने कहा– ‘‘अभी तो पूरा रिसाला ही शेष है।’’ महात्मा ने कहा– ‘‘इतनी सामग्री लेकर तुम कहाँ जा रहे हो?’’ सिकन्दर से कहा– ‘‘अभी तो मैं तुर्की पर आक्रमण करने जा रहा हूँ।’’ महात्मा ने पूछा– ‘‘उसके पश्चात्?’’ सिकन्दर ने कहा– ‘‘उसके पश्चात् अरब, ईरान, अफगानिस्तान, भारत, फिर रूस और जापान – संक्षेप में पूरा विश्व।’’ महात्मा मुस्कराये– ‘‘तुम्हारे पास समय कहाँ है? देख, इस झोपड़ी में हमने दो आदमी की जगह बना रखी है जिसमें एक जगह तुम्हारे लिए है। यहाँ तुम्हारे लिये दो रोटी का प्रबन्ध भी है। यहीं रुक जाओ।’’
सिकन्दर के अहं को बड़ी ठेस लगी। आज तक सभी तो उसकी प्रशंसा करते थे– ‘क्या कहना! क्या रुतबा है!’; आज यह महात्मा जी अच्छे मिले! यह कह रहे हैं, ‘क्यों समय बर्बाद कर रहा है?’ किन्तु हृदय में श्रद्धा के कारण सोच-विचारकर वह बोला– ‘‘महाराज! अब तो मैं चल चुका हूँ। लौट कर आने पर आपके पास अवश्य आऊँगा।’’ महात्मा ने कहा– ‘‘अरे पगले! यदि नहीं लौट सका तब क्या होगा?’’
भारी मन से सिकन्दर अपने अभियान पर निकल पड़ा। जहाँ-तहाँ लड़ाइयाँ हुईं। सिकन्दर उन सबमें विजयी रहा। भारत में उसने अभी प्रवेश ही किया था कि एक भारी युद्ध में उलझ गया। सेना में हल्की बगावत हो गई। वह तुरन्त लौट पड़ा। लौटते समय एक साधारण मुठभेड़ में सिकन्दर को एक जहरीला तीर चुभ गया। उस वेदना से सिकन्दर बीमार पड़ गया। उसने अपना संदेशवाहक उस महात्मा के पास इस सन्देश के साथ भेजा– ‘‘मैं सीधा आपके पास ही आ रहा था, महलों में नहीं जा रहा था; लेकिन ऐसा लगता है मैं आप तक पहुँच नहीं पाऊँगा। मात्र बत्तीस साल की अवस्था में उसके प्राण पखेरू रास्ते में ही उड़ गये।
पाँव तले की खबर नहीं और लोग सौ बरस की योजना बनाकर बैठे हैं। सिकन्दर था तो विश्वविजेता किन्तु असमय में चल बसा– ‘मंझ महल से ले चला, ऐसा काल कराल।’ मरणासन्न सिकन्दर ने पंक्तिबद्ध सेना की ओर देखा। उसने कहा– भाइयो! हमने जो भूल की, पीछेवाली पीढ़ी उसे न दुहराये। जिन वस्तुओं को हमने इन हमलों से एकत्र किया– ये हीरे-जवाहरात, एक से बढ़कर एक अनमोल रतन, ये पेटियाँ– मेरी मृत्यु के पश्चात् इन्हें मेरी हथेली पर रखकर देखना। कदाचित् मेरी मुट्ठी बन्द हो जाय और एक-आध नगीना मेरे साथ चला चले। यदि ऐसा नहीं होता तो लोग कोई शिक्षा ग्रहण करेंगे। इसीलिये सिकन्दर के पश्चात् किसी कवि ने कहा–
कहाँ गये वे दारा सिकन्दर, कहाँ वो बारहदरी गई।
चले गये सब अजल के मुख में, ना खुश्की ना तरी रही।।
सिकन्दर के अंतिम क्षणों में फौजें भी थीं, रिसाला भी था लेकिन ‘न फौजें साथ देंगी न रिसाला काम आयेगा।’– इस माया के अन्धकार में एकमात्र नेकी का उजाला ही काम आयेगा। संसार में कहीं भी तो नेकी दिखायी नहीं देती। इन्दिरा गाँधी सुचारु रूप से भारत का शासन चला रही थी, नेकी ही तो कर रही थी; तो भी ‘मंझ महल से ले चला, ऐसा काल कराल।’ अपने ही घर में, अपने ही पहरे के अन्दर। ऐ फौजें, रिसाले साथ नहीं देते। काल-कराल से बचना है तो केवल एक रास्ता है नेकी! नेक है केवल परमात्मा! नेकी की राह है परमात्मा का पथ।
सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ।
जहँ न राम पद पंकज भाऊ।।
जोगु कुजोगु ग्यान अग्यानू।
जहँ नहिं राम पेम परधानू।। (रामचरितमानस, २/२९०/१-२)
नेकी है तो केवल एक प्रभु के चरणों में प्रेम का प्रवाह! हृदय में यह उमंग, विरह की एक चिंगारी यदि प्रज्वलित हो जाय तो यह सत्पथ में है क्योंकि सत्य एकमात्र परमात्मा है। इसके अतिरिक्त जो कुछ है नश्वर है, धोखे की एक टटिया है। इस परमात्म-पथ में दो कदम चलते बन गया, कुछ समय देते बन गया– यही नेकी काम आयेगी।
निवाला कहते हैं ग्रास को। एक ग्रास भी यदि दान देते बन गया, ऐसे भिक्षु को जो प्रभु के पथ का पथिक है उसको भिक्षा देते बन गया, जरूरतमंद के पेट में दो दाना देते बन गया, वह अवश्य काम आयेगा। वह आपको काल से बचाने में और भगवान को प्रसन्न करने में आपका सहायक-सम्बल सिद्ध होगा।
प्राय: लोग कहते हैं कि हम भजन क्यों करें, हमें कमी किस बात की? हमारे पास तो बहुत गँजा है, हमें घट्टी क्या? इस पर सन्त कहते हैं– यह भूल है। आखिर सिकन्दर के पास क्या कमी थी? जो कुछ उसने अर्जित किया, कुछ भी काम नहीं आया।
नशा है जिनको दौलत का, समझ में पड़ गया पत्थर।
अभी तो भीड़ सी रहती है, अपनों की तेरे दर पर।।
जिन्हें यह नशा है कि हमारे पास फैक्टरियाँ हैं, हम तो साहब हैं, पूरी कम्पनी चलाते हैं, हम पचीस करोड़ का विदेश में सप्लाई करते हैं; पता नहीं क्या-क्या नशा है? जिन्हें नशा है कि हमारा इतना बैंक-बैलेन्स, हमारे चार लड़के ऊँचे पोस्ट पर– जिन्हें दौलत का नशा है, उनकी समझ में वास्तव में पत्थर पड़ गया है। आज तुम्हारे चतुर्दिक तथा कथित अपनों की भीड़ लगी है। भय्या-भय्या, चाचा-चाचा– लाइन लगी हुई है। साधारण आदमी भी जब चुनाव में जीत जाता है, कदाचित् मंत्री बन जाता है तो रिश्तेदारों की कतार लग जाती है, पराया कोई नहीं; सब अपने, सब कहीं न कहीं से नजदीक होते चले जाते हैं। अपनी आभा, अपनी शान बरकरार रखने के लिये,
तू कमाता जायेगा मरकर, और ये खाते जायेंगे हँसकर।
तू और तल्लीन होकर कमाता जायेगा, रात-दिन एक कर देगा, बारह-दो बजे तक हिसाब लगाता रहेगा, ज्यादा कारोबार बढ़ने पर भोजन और नींद के लिये समय ही कहाँ बचता है– ‘तू कमाता जायेगा मरकर और ये खाते जायेंगे हँसकर’– ‘भाई वाह! क्या कहना? आज तो रसेदार बहुत ही अच्छा बना’, और ‘भाई! कल की मीटिंग में एक दावत भी रख दी जाय।’, ‘हाँ, यह ठीक रहेगा!’– ऐसे कार्यक्रम पास होते ही चले जाते हैं– ‘ये खाते जायेंगे हँसकर।’ किन्तु अब तक का संसार का रिकार्ड क्या कहता है?
जरा मेरी तरफ तो देख, क्या कहता है ये अम्बर।
जो कुछ भी संसार में घटित होता है, आसमान में, शून्य में विद्यमान रहता है। चिदाकाश या अम्बर में अब तक का लेखा-जोखा यही बता रहा है कि अन्तिम समय में–
न जोरू काम आयेगी, न साला काम आयेगा।
मनुष्य के पास माता-पिता, भाई-भतीजे सब तो हैं; लेकिन जब किसी की कमाई-धमाई अधिक मात्रा में बढ़ने लगती है तो सारा विचार खिंचकर पत्नी और साले की ओर चला जाता है। एक सज्जन बता रहे थे कि उनके एक साथी इंजीनियर मध्य प्रदेश में बड़े-बड़े बाँध बनाते रहे। उन्हें काफी कुछ कमीशन मिला, तो भोपाल में घरवालों से छिपाकर एक आलीशान महल छोटे साले के नाम बनवाया। जब पेंशन का समय आया, सरकारी आवास छोड़ उन्होंने साले से मकान खाली करने को कहा। छोटा साला अब जवान हो चला था। उसने कहा– ‘‘जीजा जी! आपको क्या कमी है? इतने दिनों से हम इसमें रहते आये, आदत-सी पड़ गई है। अब तो इसमें हम ही रहेंगे। आप कोई दूसरा बनवा लें।’’ सुनते ही साहब को हार्ट-अटैक हो गया।
सुत मानहि मातु पिता तब लौं।
अबलानन दीख नहीं जब लौं।।
युवक अबला की ओर घूमते हैं, अबला उन्हें साले की ओर उन्मुख कर देती है, साला और पत्नी ही प्रिय लगने लगते हैं। माता और पिता की सेवा तो भगवान कराते हैं, जो करना चाहिए। ‘न जोरू काम आयेगी, न साला काम आयेगा’– भला काम क्या आयेगा?
अँधेरे में तो नेकी का उजाला काम आयेगा।
नेक मार्ग, सन्मार्ग का प्रकाश ही आपके काम आयेगा। सद्मार्ग कौन? सत् क्या? तो,
सत्य वस्तु है आत्मा मिथ्या जगत पसार।
इस आत्मपथ पर दिया गया तुम्हारा समय, बढ़ा हुआ कदम, दिया हुआ दान– चाहे स्वल्प ही क्यों न हो, वह अवश्य काम आयेगा; क्योंकि ईश्वर-पथ में कभी बीज का नाश नहीं है। यदि हमने आरम्भ कर दिया, दो कदम रख दिया तो माया में ऐसा कोई यन्त्र नहीं जो इसे मिटा दे। माया केवल देर कर सकती है, इसे मिटा नहीं सकती; क्योंकि वह सत्य है और सत्य को नश्वर मिटा नहीं सकता।
‘नशा है जिनको दौलत का’– जगतानन्द आश्रम के पास बरैनी ग्राम है। वहाँ एक गुदरू दद्दा वयोवृद्ध सम्मानित रईस थे। वह बताते थे कि महाराज! हमारे पास इतना धन था कि मानो कुबेर अपनी गाड़ी में अशरफी भरकर अपनी अलकापुरी को जा रहा था और हमारे यहाँ उस गाड़ी का पहिया टूट गया हो। महाराज! हम इंग्लैण्ड तक मुकदमा लड़ आये हैं लेकिन बुरा दिन आने पर आज वह कुछ भी नहीं रहा। आज दस-बीस बीघे खेती से जीवन-निर्वाह करना पड़ रहा है।
चलम् लक्ष्मी: चलम् आयु:, चलम् यौवन सर्वश:।
चलाचली संसार है, एको धर्म निश्चल:।।
आयु चलायमान, धन-लक्ष्मी चलायमान! चलाचली के इस संसार में निश्चल है एकमात्र धर्म– सत्य को हृदय में धारण करना। सत्य शाश्वत केवल एक परमात्मा है। उसको हृदय में धारण करना, उसके लिये चिन्तन में प्रवृत्त होना धर्माचरण है। यही मूल है।
बुरा दिन आयेगा, मिट्टी में मिल जायेगी सब शोहरत।
आज जो लोग भैया-भैया कर रहे हैं, भीड़ लगी है, लोगों का मुँह सूखने लगता है, आगे-पीछे तारीफ के पुल बन जाते हैं कि भैया आज न होते तो यह कार्य कभी सम्पन्न न होता; इसका श्रेय आपको है। कभी-कभी नेताओं की प्रशंसा इसी प्रकार होती है। इन्दिरा जी जब भारत की प्रधानमंत्री थीं, एक नेता बोला था– ‘तेरे सुबह की जय, तेरे शाम की जय! तेरे नाम की जय, तेरे काम की जय!’ जब वह हार गयीं तब उन्हीं नेता से पूछा गया– ‘क्या कहा था आपने?’ वह बोले– ‘‘मैंने कुछ नहीं कहा था।’’ वही बात हुई ‘बने–बने के सब साथी, जब वक्त पड़ा तब कोई नहीं।’ यही इन पंक्तियों में भी है कि बुरा दिन आने पर इज्जत करने के स्थान पर नफरत करने लगते हैं। यह शानोशौकत एक पल में समाप्त हो जायेगा।
पाँचों नौबत बाजती, उठत छतीसो राग।
वे मन्दिर खाली पड़े, बैठन लागे काग।।
जहाँ राजा-महाराजाओं की तूती बोलती थी, जहाँ गूँजता रहता था– ‘सावधान! खबरदार! महाराजाधिराज पधार रहे हैं’, उसी किले में आज आप लोग बैठे हुए हैं। यहाँ कौवे बैठते थे, सियार और सर्प रहते थे। यह किला खण्डहर हो चला था। प्राचीन वैभव के ध्वन्सावशेष कक्ष खाली पड़े थे। वह इस किले का बुरा दिन नहीं था तो क्या था? जहाँ जय-जयकार होती थी, दूकान-दूकान, घर-घर में जिनके चित्र पूजे जाते थे, नेपाल में ऐसा ही था, आज उसी राजा को सिंहासन त्यागना पड़ गया। आज वह जनसामान्य का-सा जीवन व्यतीत करने को विवश है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को वन-वन भटकना पड़ा। युधिष्ठिर-जैसे धार्मिक सम्राट को दर-दर की ठोकरें खानी पड़ी। यह कोई नयी बात नहीं है। समय-चक्र आज अच्छा है तो कल बुरा आ सकता है। आज समय बुरा है तो कल अच्छा अवश्य आयेगा। बुरा दिन आने पर अपने लोग भी नजरें बचाने लगते हैं कि वह अमुक आ रहा है, यहाँ से हट जायँ; दीवाल की ओर देखने लगते हैं कि कहीं चाय न पिलानी पड़ जाय।
कोई देगा नहीं पानी, घट जायेगी तेरी ताकत।
प्राय: बुजुर्ग लोग खटिया पर पड़े-पड़े कहते हैं– ‘‘भैया, प्यास लगी है।’’ बच्चे कहते हैं– ‘‘हमेशा टाँय-टाँय करते ही रहते हो! चुपचाप पड़े रहो! गला नहीं चटका जा रहा है।’’ कवि कहता है– ‘अरे नादान, तेरी इक पल में लुटेगी सब दौलत’– यही अपने एक पल में तेरी दौलत ले लेंगे।
न चाभी काम आयेगी, न ताला काम आयेगा।
बड़े-बड़े लॉकर, तिजोरियाँ, विदेशों में सड़ रहा धन– कुछ भी काम नहीं आयेगा। काश समय रहते ही सद्बुद्धि आ जाय। मनुष्य-शरीर मिला है तो मानव का एक ही कर्त्तव्य है–
नर तनु पाइ विषयँ मन देहीं।
पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं।। (मानस, ७/४३/२)
कदाचित् हम विषयों में लिप्त हो गये तो हमने अमृत को बदलकर उसी के बदले विष माँगकर पी लिया। ‘एहि तन कर फल बिषय न भाई।’ (मानस, ७/४३/१) विषयों की सीमा कहाँ तक है? ‘स्वर्गउ स्वल्प’– स्वर्ग के ऐश्वर्यों तक विषयभोग हैं; किन्तु ‘अन्त दुखदाई’– स्वर्ग पानेवाला भी परिणाम में दु:ख का ही संग्रह करता है। खाओ-पीयो, चार दिन नाचगान, पुन: इसी अँधेरे में!
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। (गीता, २/६९)
जगत् एक घोर अंधकारपूर्ण निशा है। सभी प्राणी इसमें अचेत पड़े हैं। इनमें से संयमी पुरुष जाग जाता है। इसी संयम का नाम है नेकी। इसी नेकी का उजाला अंत में काम आता है। अंतिम पंक्तियों में है–
सवा नैजे पर खुरशीद मैहसर जगमगाएगा।
जीवन थोड़ा है। एक दिन वह भी आयेगा जहाँ आयु के दिन पूरे हो जायेंगे। इस्लाम विचारधारा में मान्यता है कि कयामत के दिन न्याय के मैदान में सूर्य मनुष्यों के शिर से सवा बालिश्त या सवा नेजे पर आ जायेगा जिसकी ऊष्मा से लोग मर जायेंगे। विचारणीय है कि किसी का घर पहाड़ के ऊपर, किसी का नाले के किनारे! सबके शिरों से सवा बीता का अंतर बना पाना सूर्य के लिए कितना कठिन होगा? कोई युवक छ: फीट का, उसका बच्चा तीन फीट का; उन दोनों से सवा बालिश्त के अंतर का गणित सूर्य कैसे पूरा करेगा? ऐसा कुछ नहीं है। सूर्य का प्रभाव ताप देना है। शरीर का तापमान एक सौ पाँच-छ: डिग्री होते ही मौत आ जाती है। जहाँ छ:-छ: मास तक सूर्य के दर्शन नहीं होते वहाँ भी मौतें होती हैं। तात्पर्य यह है कि मैहसर अर्थात् न्याय के मैदान में जब खुरशीद (सूर्य) जगमगायेगा, अपनी पूर्ण कलाओं से तुम्हारी करनी का पर्दाफाश करेगा उस दिन तुम्हें अपने आमालों अर्थात् करनी पर रोना आयेगा कि प्रभु के चरणों में हम समय नहीं दे सके; ग्लानि होगी, पश्चाताप होगा।
अरे मगरूर तेरा जब सब भरोसा टूट जायेगा।
बढ़ेगी तिस्नगी माँगेगा पानी तो खाक पायेगा।।
तुम्हारा सारा भरोसा टूट जायगा। तापमान अधिक होने से मुँह से बोल भी नहीं सकेगा। तिस्नगी अर्थात प्यास बढ़ेगी। तू विकल होकर पानी माँगेगा। पानी तो वाष्प बनकर उड़ गया; क्योंकि सूर्य इतना समीप है। उसमें सुराही का जल भी तो सूख गया। प्राचीनकाल में ऐश्वर्य का सर्वोपरि प्रतीक सुराही और प्याला हुआ करता था। बादशाहों के यहाँ एक हुक्का, सुराही और प्याला महफिल में रहता था, जैसे आजकल सोफा और शोरूम से ऐश्वर्य आँका जाता है। इन पंक्तियों में चेतावनी है कि–
न सुराही काम आयेगी न प्याला काम आयेगा।
जिस ऐश्वर्य में तुम खोये हो काम नहीं आयेगा।
मोहनिसाँ सब सोवनिहारा।
देखिअ सपन अनेक प्रकारा।। (मानस, २/९२/१)
मोहरूपी रात्रि में सबलोग निश्चेष्ट पड़े हुए हैं। रात-दिन जो दौड़-धूप कर रहे हैं मात्र स्वप्न देखते हैं। यही तो हमने जुटाया।
उमा कहउँ मैं अनुभव अपना।
सत हरिभजन जगत सब सपना।। (मानस, ३/३८/५)
जगत् सपना है और हमने वही जुटाया है। हमने सपना ही देखा है। इस जगत्-रूपी रात्रि के घोर अंधकार में तो केवल नेकी का उजाला काम आयेगा।
तुलसी जाके मुखन ते, धोखेहु निकसत राम।
ताके पग की पानही, मेरे तन को चाम।।
!! ॐ श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय !!
(‘अमृतवाणी भाग-3’ से उद्धृत)