भगवान और आत्मा एक ही लक्षणवाले हैं।
भगवन्! आप जानने योग्य परम अक्षर अर्थात् अक्षय परमात्मा हैं, आप इस जगत् के परम आश्रय हैं, आप शाश्वत-धर्म के रक्षक हैं तथा आप अविनाशी सनातन पुरुष हैं– ऐसा मेरा मत है। आत्मा का स्वरूप क्या है? शाश्वत है, सनातन है, अव्यक्त रूप है, अविनाशी है। यहाँ श्रीकृष्ण का क्या स्वरूप है? वही शाश्वत, सनातन, अव्यय, अविनाशी अर्थात् प्राप्ति के पश्चात् महापुरुष भी उसी आत्मभाव में स्थित होता है। तभी तो भगवान और आत्मा एक ही लक्षणवाले हैं।
(गीता – अध्याय ११, श्लोक १८)
।। ॐ श्री सद्गुरुदेव भगवान् की जय ।।
श्रीमद्भगवद्गीता – यथार्थ गीता – अध्याय ११, श्लोक १८ – विश्वरूप-दर्शन योग
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