अवतार – श्रीकृष्ण के शब्दों में ‘अवतार’

श्रीकृष्ण के शब्दों मेंअवतार

अर्जुन द्वारा इस प्रकार प्रष्न किये जाने पर कि अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः’ (गीता, ४/४) अर्थात् हे श्रीकृष्ण! आपका जन्म तो अब हुआ है और सूर्य का जन्म सुदूरकाल में कभी हुआ था। अतः आपने कल्प के आदि में इस अविनाषी योग को सूर्य से कहा था- इस विषम काल पर कैसे विश्वास करूँ? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अपने अवतार पर प्रकाश डालते हुए कहा कि-

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। (गीता, ४/५)

अर्थात् तेरे और मेरे बहुत से जन्म सुदूर पूर्वकाल से होते आए हैं; किन्तु हे परंतप! (जो किए हुए प्रण से च्युत नहीं होता) उन सबको तू नहीं जानता (अर्थात् अवतार तथा अवतार-प्रकरण को नहीं जानता) और मैं उन समस्त अवतारों को जानता हूँ।

सम्बन्ध- भगवान श्रीकृष्ण के कथनानुसार उनके बहुत से जन्म या अवतार हो चुके हैं, अर्थात् ठीक इसी स्थिति के अनेक महापुरुष हो चुके हैं। यहाँ अवतार के लिए बहुवचन इसी अभिप्राय से है। श्रीकृष्ण के शब्दों में अवतार बहुत से हैं अर्थात् असंख्य, अनन्त अवतारों का विधान है। ‘मानस’ के प्रति ब्रह्माण्ड राम अवतारा।’ (मानस, ७/८०/८) से भी सीधा प्रकाश पड़ता है। अतः कतिपय पुराणों में ‘अवतार चौबीस ही होंगे’- ऐसी मान्यता स्वतन्त्र सत्ता को भी संख्याबद्ध कर देता है। वस्तुतः किसी काल में सत्य के नाम पर कल्पना के प्रसार से असत्य पूजित हो चुका था, यह उसी भ्रामक विचार का परिणाम है।

योगेश्वर श्रीकृष्ण के वे अवतार अलौकिक हैं-

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।

प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया।। (गीता, ४/६)

अर्थात् मैं अव्ययात्मा (अविनाशीस्वरूप), अजन्मा होने पर भी तथा सब प्राणियों का ईश्वर एवं मूल प्राणों में प्रवाहित होने पर भी आत्ममयी स्थिति दिलानेवाली यौगिक प्रक्रिया द्वारा अपनी त्रिगुणमयी प्रकृति के कार्यों को स्वाधीन करके प्रकट होता हूँ। ‘आत्ममाया’ आत्मा का साक्षात् करानेवाली संतत गोपनीय ब्रह्मविद्या का नाम है। यह आत्मा में पूर्ण प्रवेश दिलाने में सक्षम है। आत्मा की ओर ले चलनेवाली आत्ममाया का ही दूसरा नाम योगमाया है।

नोट- गीता के सातवें अध्याय (२५वें श्लोक) में श्रीकृष्ण बताते हैं कि, ‘‘मैं अपनी योगमाया से छिपा हुआ होने से सबको प्रत्यक्ष नहीं होता हूँ। अतः आसुरी सम्पत्तिवाले अज्ञानी मुझ अविनाशी को जानकर तुच्छ तथा साधारण मनुष्य मानते हैं। जब तक योग पराकाष्ठा पर नहीं पहुँच जाता, तब तक भगवान पूर्णरूपेण विदित नहीं होते। पहले माया का पर्दा था, अब योग का भी एक आवरण है, जिसने उस शाश्वत स्वरूप को ढाँक रखा है। अतः इस गोपनीय आत्ममयी प्रक्रिया-विशेष के द्वारा प्रकृति का पूर्ण नियन्त्रणकाल जाने पर उन चिरन्तन के दर्शन का विधान है। पूर्णता एवं पराकाष्ठा की स्थिति के लिए ही यह विधान है।

सम्बन्ध- आत्मिक प्रक्रिया की पूर्तिकाल में महापुरुष पूर्णरूपेण प्रकट होते हुए भक्त की आत्मा में प्रवाहित होकर शाश्वत स्वरूप प्रदान कर देते हैं। इस प्रकार अवतार के सृजन का माध्यम महापुरुष हैं; किन्तु कौन से कारण-विशेष हैं, जिनसे वह प्रभु अवतरित होता है? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं-

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।। (गीता, ४/७)

अर्थात् हे अर्जुन! जब-जब धर्म (परमात्मा) को लेकर ग्लानि होती है, हृदय भयंकर ग्लानि से अभिभूत हो जाता है (जैसा कि ‘मानस’ में महाराज ‘मनु’ को होता है- हृदयँ बहुत दुख लाग’ (मानस, १/१४२) और अधर्म अर्थात् काम, क्रोध, तृष्णा इत्यादि की साधक के हृदय में वृद्धि होने लगती है, साधक प्रयत्न करने पर भी उन विकारों का पार नहीं पाता, परमात्म-धर्म के लिए ग्लानि का बहुमत हो जाता है, प्राप्ति के लिए अन्तःकरण ग्लानि से पूर्ण एवं अधीर हो जाता है, तभी मैं अपने स्वरूप को रचने लगता हूँ।

नोट- यह यौगिक हृदय की वस्तु है।

सम्बन्ध- उपरोक्त सूत्र में इंगित अधर्म की ग्रन्थियों का पार न पाने पर एवं धर्म (परमात्मा) के लिए अधीर हो जाने पर अन्तरंग पुकार के साथ ही आपके प्रगट होने का विधान है। यह अव्यक्त के अवतरण का कारण-विशेष है; किन्तु यह अवतार किस कार्य की पूर्ति के लिए है?

इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण की वाणी में देखें-

परित्राणाय साधूनां विनाशाय दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।। (गीता, ४/८)

साध्य पदार्थ, उस विभूति को सम्भव करनेवाले विवेक, वैराग्य, इन्द्रियों का दमन, शम-दम, ध्यान-चिन्तन एवं भजन की प्रवृत्ति ‘साधूनाम्’ कहलाती है। इनके पालन में श्रम तो बहुत करना पड़ता है लेकिन सफलता मिलती नहीं है। अविद्याजनित जघन्य विकारों से दूषित कर्म ‘दुष्कृताम्’ कहलाता है।

नोट- काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर इत्यादि मानव को बाह्य प्रवृत्ति प्रदान करते हैं। यह मानव के अन्तःकरण में प्रसुप्तावस्था में रहते हैं और संग-दोष को पाकर जागृत हो जाया करते हैं। ये जब भी जागृत होते हैं, दूषित को क्रियान्वित करते हैं। यही दुष्कृत के मूल उद्गम हैं, ‘दुष्कृताम्’ हैं।

इन दुष्कृताम् का विनाश करने के लिए और धर्म की स्थापना अर्थात् स्थायित्व देने के लिए मैं युग-युग में प्रगट होता हूँ। भगवान की प्राप्ति या अवतार के विषय में कोई भी युग अनुकूल अथवा बाधक नहीं होता है।

सम्बन्ध- जैसा कि उपर्युक्त श्लोकों में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने पुष्ट किया है कि उनका अवतार ‘धर्म संस्थापनार्थाय’ होता है। अतः धर्म क्या है? धारयति इति धर्मः’ अर्थात् जो सबको धारण किए हुए है, वह धर्म कहलाता है। सबको धारण करनेवाला वह ब्रह्म सनातन है- यान्ति ब्रह्म सनातनम्’ (गीता, ४/३१)। अतः धर्म कहलानेवाला वह ब्रह्म एकमात्र सनातन-धर्म है। फिर सनातन क्या है?

योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं-

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च।

नित्य सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः।। (गीता, २/२४)

अर्थात् यह आत्मा ही अपरिवर्तनशील, नित्यस्वरूप, न सूखने, न जलने, न गलने, न छेदा जानेवाला, नित्य, सर्वव्यापक अचल और सनातन है। इस स्थान पर श्रीकृष्ण के शब्दों में एकमात्र आत्मा ही शाश्वत तथा सनातन है। अतः इसी आत्मा को साक्षात् जानना हमारा तथा मानवमात्र के लिए धर्म है; किन्तु अजर, अमर, शाश्वत तथा सर्वव्यापक गुणधर्मोंवाली आत्मा यदि सबमें है, तो फिर खोजा किसको जाय?

इसके उत्तर में योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि आत्मा को इन विभूतियों से युक्त केवल तत्त्वदर्शियों ने देखा। साधारण लोगों को आत्मा के ये गुण दिखाई नहीं पड़ते। आये दिन शोक, सन्ताप और मृत्यु का कारण माया ही दिखलाई पड़ती है। श्रीकृष्ण कहते हैं-

जन्म कर्म मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।। (गीता, ४/९)

अर्थात् मेरा वह जन्म, कर्म दिव्य एवं अलौकिक है। उपरोक्त अलौकिक विभूतियों से युक्त जो मुझे जानता है, वह तत्त्वदर्शी है (अर्थात् तत्त्वदर्शी के लिए जानकारी का विधान है)। मेरी जानकारी के पश्चात् शरीर का परित्याग करनेवाला पुनर्जन्म में नहीं गिरता, मुझमें ही स्थित रहता है।

नोट- अवतार तो होता है, लेकिन लाखों मनुष्यों में से कतिपय तत्त्वदर्शी पुरुषों ने उसे देखा है। केवल तत्त्वदर्शी के लिये अवतार-दर्शन के आदर्श की मान्यता है। वैसे तो उस तत्त्व का स्पन्दन सम्पूर्ण जगत् के मानवमात्र में समान ही है तथा अविभाजित रूप एवं प्रसुप्तावस्था में अनवरत लहराता है, फिर भी किसी तत्त्वस्थित महापुरुष से उसकी जागृति तथा अवतरण का शाश्वत विधान है।

अब उन लोगों में से वे लोग सर्वथा भ्रान्ति में हैं, जिनकी धारणा है कि इस बार कुँआरी कन्या से अथवा अमुक प्रकार से अवतार होगा। इस तरह की अनेक मान्यताएँ प्रचलित हैं और होती रहेंगी; किन्तु सनातन-धर्म एवं उसके प्रकटीकरण का विधान-विशेष पूर्वकाल से जिन महानतम् पुरुष, स्वरूपस्थ महापुरुषों की देन है, उसमें इन भ्रान्तिमूलक विचारों का कोई स्थान नहीं है। परम की प्राप्ति के लिए आप परमतत्त्वस्थित एवं स्वरूपस्थ महापुरुष की तलाश करें, जो पुण्य-पुरुषार्थ से होगा। तभी आप अवतार-दर्शन की महान् गरिमा के सुपात्र बन सकते हैं।

उपसंहार-

ईश्वर सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापी और अन्तर्यामी है। इस त्रिगुणात्मिका सृष्टि का प्रसार उसी की लीलामयी दृष्टि का विस्तार है। संसार एक रंगमंचीय कला है, जहाँ चराचर जीव द्वन्द्वात्मक भूमिका में लीलाधर के निर्देशन में अभिनय कर रहे हैं। सुभ अरु असुभ कर्म फल दाता।’ (मानस, ७/४०/५) वह एक है, लेकिन अनेक रूपों में बरतता हुआ अपनी माया का विस्तार करके सबको नचा रहा है। सब विकल हैं- सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय और जीवन-मृत्यु की चपेट से। इस भवसिन्धु की लहरें इतनी विकराल हैं कि उनके आघातों से जीवात्माएँ छटपटा रही हैं, ढूँढ़ती हैं किनारा, अन्धकार में कहाँ मिले? यही अथाह संसार-सागर-मन्थन की यौगिक प्रक्रिया साधक के मानसिक धरातल पर घटित होती है। जब मन और इन्द्रियों को समेटकर कोई पथिक पूर्णतः सद्गुरु के अधीन हो जाता है, तो संयमित मन और इन्द्रियों के परिणामस्वरूप उसके अन्तःकरण में ही कच्छपावतार हो जाता है। क्रमागत साधनात्मक उपलब्धियों की विशिष्टियों में प्रवेश करता हुआ, प्रगतिशील साधक भवसिन्धु-मन्थन के अन्तराल में उस अमृत-तत्त्व को प्रत्यक्ष पा लेता है, जिसकी अनुभूति तत्क्षण शाश्वत सत्ता में लीन कर उसे सदा-सदा के लिये आवागमन से मुक्त कर देती है, लीलाधर की लीला सिमट जाती है और स्वरूप निखरकर सामने आ जाता है। साधक के रोम-रोम से ध्वनि उठने लगती है-

हम मरब मरिहैं संसारा।

हमका मिल्यों जिआवन हारा।।

ठीक इसी प्रकार देश-काल के परिवर्तनों के साथ विभिन्न कथानकों के रूप में ब्रह्मविद् पुरुषों की वेदमयी वाणी द्वारा सत्य एवं परम के अवतरण का शाश्वत, अक्षुण्ण विधान है। कथानक अनेक हैं किन्तु मूल वस्तु एक है। संसार परिवर्तनशील है। सहस्राब्दियों का अतीत, उसका मध्यकाल तथा यह वर्तमान भी अतीत के गर्भ में विलीन हो जायेगा। प्रायः प्रत्येक सौ-दो सौ वर्षों के अन्तर से भाषा एवं उसके अभिप्राय की सूक्ष्म ग्रन्थियों में बड़ा परिवर्तन आ जाता है। अतः भविष्य का मानव किस बोलचाल में होगा, यह कल्पनातीत है। युग-युगान्तरों से बदली हुई परिस्थिति एवं घटना-क्रम से मानव-मस्तिष्क आहत-सा हो जाता है। यही कारण है कि वह महापुरुषों के वचनामृत में निहित मूल भावों से शनैः-शनैः दूर होता जाता है।

उपर्युक्त विषम परिस्थितियों में प्राक्कथित अवतारों की जागृति एवं उनकी कार्य-प्रणाली का रूपक ब्रह्मविद् मनीषियों द्वारा प्रस्तुत होता आया है। भाषा-शैली एवं प्रसंग की भिन्नता होते हुए भी मानव-अन्तस्थल में उनकी मौलिक उपलब्धि समान है। उपनिषद् का कथन है कि साधन-परायण हजारों पुरुषों में से वही उस आत्मतत्त्व की स्थिति प्राप्त कर पाता है जिसका चयन परमात्मा स्वयं कर लेता है। यह आत्मा न तो प्रवचन से, न विशिष्ट बुद्धि से और न बहुश्रुत होने से ही प्राप्त हो सकती है। अतः मानवमात्र में परम अधिकारी को अन्तःकरण से सहयोग प्रदान करना, सखा की तरह उसका हाथ पकड़कर प्रकृति से परे पुरुष, परमतत्त्व तक का पथ प्रशस्त करना, उसे शाश्वत के सर्वव्यापी स्वरूप में स्थित कर देना- यही अवतार की अवधारणा का केन्द्र-बिन्दु है।

यद्यपि मानवमात्र के अन्तःकरण में वह परमतत्त्व सदैव विद्यमान है, तथापि उसे वही जानता है जिसमें वह वस्तुतः जागृत है। जागरण की यौगिक प्रक्रिया-हेतु साधक मनसहित इन्द्रियों को समेटकर परमात्मा की प्राप्ति की अभिलाषा को बलवती बनाये एवं तत्त्वदर्शी महापुरुष की प्राप्ति के लिए पुण्यार्जन करते हुए सतत संलग्न रहे। प्रयत्नशील भाविकों के लिए वह अलौकिक इष्ट-वचनामृत, इष्ट-योगक्षेम सर्वथा सम्भव है।

यह कोई कल्पना नहीं, अपितु परम चेतन का विधान, अनादि सत्य एवं शाश्वत अनुकरणीय है। इसी तात्त्विक परिवेश में चौबीस अथवा यथासंख्य अवतारों का क्रियात्मक प्रसार महापुरुषों की कृपा से प्राप्त करें। महापुरुष की प्राप्ति पर मैं यहाँ पुनः बल देता हूँ। उनकी यथासम्भव सेवा, सान्निध्य तथा वचनामृत को हृदयपूरित मन से पकड़ें; कालान्तर में वह परम तृप्ति सम्भव हो सकेगी। साधन-पथ पर यदि न चला जा सके, तब गुरोर्वाक्यं सतत् गेयम्’ के अनुसार श्री गुरुदेव भगवान के वचनामृत का अवलोकन, अनुशीलन करते रहना चाहिए।

ध्यानमूलं गुरोर्मूर्ति पूजामूलं गुरोर्पदम्।

मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा।।

।। शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।

(‘शंका-समाधान’ से उद्धृत)

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