आरती का अर्थ
अनन्तश्री विभूषित, योगिराज, युगपितामह परमपूज्य श्री स्वामी परमानन्दजी महाराज (परमहंस जी) की आरती का अर्थ
यह सद्गुरुदेव की आरती है। भगवान की आरती तो सबने सुनाई है लेकिन यह सद्गुरुदेव की आरती क्या? कारण कि परमात्मा यदि परम धाम है तो सद्गुरु ही उस परमात्मा की जागृति, पूर्तिपर्यंत साधन और प्रवेश द्वार है। गुरु परमात्मा का ही प्रतिबिम्ब होता है।
ब्रह्मवेत्ता वक्ता सुरति, गुरु के लक्षण जान।
इच्छा राखे मोक्ष की, ताहि शिष्य पहिचान।।
ब्रह्मवित हों, संयुक्त हों, ब्रह्म के विषय में व्यक्त कर सकते हों, सुरत मन की दृष्टि का नाम है, इस सुरत को पकड़कर ईश्वर-पथ पर सँभालते हों, चलाते हों – ये गुरु के लक्षण हैं। केवल मोक्ष की इच्छा रखे, यह शिष्य के लक्षण हैं। और सब कामनायें रास्ते में, अपने आप स्वत: पूरी होने लगती हैं। ‘मौनं कृपालुम्’– जिसकी इंद्रियां मौन हैं, जो कृपालु है, सद्गुरु के यही लक्षण हैं।
वास्तव में अविनाशी तत्व है परमात्मा। जो उस तत्व से संयुक्त है, वह हैं सद्गुरु। ‘गु’ और ‘रु’ दो अक्षर हैं – एक इंद्रियों का संबोधन है, एक सहज प्रकाश-स्वरूप परमात्मा का। मनसहित इंद्रियों में जो अंधकार है, इसको मिटाकर ईश्वरीय जो सहज प्रकाश का अभ्युदय होना है और उसकी स्थिति वाले हैं, वे सद्गुरु हैं।
सारा ईश्वर-पथ, अध्यात्म-पथ, संत-मत सद्गुरु पर ही आधारित है। भगवान कृष्णोक्त गीता योगदर्शन है। लेकिन यह पूरी की पूरी गीता योगशास्त्र है, गुरु-शिष्य संवाद है। अर्जुन एक शिष्य, और सद्गुरु हैं कृष्ण। पहले अर्जुन भ्रम में था। धरम के नाम पर कुछ उसने याद कर रखा था और प्रश्न रखा– गोविन्द! कुलधर्म सनातन है, जाति-धर्म शाश्वत है, मैं युद्ध नहीं करूँगा। तो भगवान कृष्ण ने कहा– अर्जुन! यह अज्ञान है। तुमने कहाँ से याद कर लिया? इसमें कदापि कल्याण नहीं है, न ही पूर्व श्रेष्ठ पुरुषों ने कभी आचरण किया है। तब अर्जुन ने समर्पण करते हुए कहा कि-
कार्पण्यदोषोऽपहतस्वभाव:
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेता:।
यच्छ्रेय: स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।। (गीता, २/७)
भगवन्! यह सब अज्ञान है तो सिद्ध है कि कायरतारूपी दोष ने मेरे स्वभाव को नष्ट कर दिया है। मैं धर्म के रास्ते में विशेष रुप से मूढ़ चित्त हूँ, आपकी शरण हूँ। मुझे वह उपदेश कीजिए जिससे मैं परम श्रेय को प्राप्त हो जाऊँ। फिर उपदेश करके छोड़ मत दीजिए, मैं कदाचित् लड़खड़ाऊँ तो वहाँ मुझे सहारा दीजिए क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ। अर्थात् योगेश्वर कृष्ण एक सद्गुरु हैं और अनुरागी ही अर्जुन है।
अनुरागी ही शिष्य हुआ करता है। प्राप्ति हमें करनी है भगवान की लेकिन ध्यान धरना है, समर्पण करना है सद्गुरु के प्रति। यह कुछ अटपटी बात है, सहसा समझ में नहीं आती लेकिन योगदर्शन का सिद्धांत ही इसी पर टिका हुआ है जैसा कि गीता में है कि ईश्वर कहाँ रहता है? तो–
ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।। (गीता, १८/६१)
अर्जुन! वह परमात्मा सम्पूर्ण भूत प्राणियों के हृदय-देश में वास करता है। इतना समीप, हृदय के अंदर, तब लोग देखते क्यों नहीं? तो कहते हैं– मायारूपी यंत्र में आरूढ़ होकर भ्रमवश भटकते ही रहते हैं, इसलिए नहीं देखते। माया पर आरूढ़ हम हुए, ‘अपने हाथों बर के रसरिया, अपनी गटइया के फांसा। धोबिया जल बिच मरत पियासा।।’
जब ईश्वर हृदय में है तो शरण किसकी जायं?
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।। (गीता,१८/६२)
अर्जुन! उस हृदयस्थित ईश्वर की शरण जाओ। ‘सर्वभावेन’– सम्पूर्ण भाव से जाओ; यह नहीं कि थोड़ा-सा भाव संकटमोचन, थोड़ा-सा पशुपतिनाथ, थोड़ा-सा कामाख्या देवी, थोड़ा वैष्णव देवी… आप तो बारह आने लीक हो गए। हृदयस्थित ईश्वर के हिस्से में तो आपका भाव, आपकी श्रद्धा चार ही आने पड़ी। कल्याण नहीं होगा।
भगवान कहते हैं– ‘सर्वभावेन भारत’– सम्पूर्ण भावों से, पूर्ण मन से, समर्पित होकर शरण जाओ। मान लो हमने सारी मान्यतायें तोड़ी, और शरण चले ही गए तो उससे लाभ क्या? तो कहते हैं– ‘तत्प्रसादातपराम् शांतिम्’–उसके कृपा-प्रसाद से अर्जुन! तुम परम शान्ति को प्राप्त कर लोगे। ‘स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्’–उस स्थान को, उस घर को पा जाओगे जो शाश्वत है। तुम्हारा निवास रहेगा और तुम्हारा जीवन रहेगा। इसी का नाम मोक्ष है।
कल्याण एक परमात्मा की शरण में, लेकिन परमात्मा को हमने देखा ही नहीं, शरण जायें तो कैसे जायें? यदि हम विचार करते हैं, हृदय में ईश्वर को टटोलते भी हैं, तो राग-द्वेष दिखाई पड़ता है, काम-क्रोध-मोह-लोभ दिखाई पड़ता है। कहीं-कहीं श्रद्धा और भाव भी दिखाई पड़ता है। ईश्वर तो नहीं दिखाई देता, उसकी शरण में कैसे जायँ? तब कहते हैं– अर्जुन! इससे भी अत्यन्त गोपनीय बात मुझसे सुन कि–
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। (गीता, १८/६५)
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:।। (गीता, १८/६६)
अर्जुन! ‘मन्मना भव’– मुझमें मनवाला हो, मेरे परायण हो, मेरा अनन्य भक्त हो। मुझे नमस्कार कर और सम्पूर्ण धर्मों की चिन्ता छोड़ कि मैं किस श्रेणी का कर्ता हूँ (शूद्र हूँ, वैश्य हूँ, क्षत्रिय श्रेणी पर हूँ कि ब्राह्मण श्रेणी का कर्ता हूँ) सारी चिन्ता छोड़ मात्र मेरी शरण हो जा, तू सम्पूर्ण पापों से भली प्रकार मुक्त हो जाएगा।
पहले कहते हैं– सम्पूर्ण भावों से ह्रदयस्थित ईश्वर की शरण जाओ। अगले ही श्लोक में कहते हैं कि उससे भी अति गोपनीय वचन को सुन कि संपूर्ण भावों से मेरी शरण आओ। वास्तव में कृष्ण एक सद्गुरु थे। यदि परमात्मा की जरूरत है, सम्पूर्ण हृदय से परमात्मा की शरण जाने का यदि सृष्टि में कोई तरीका है तो मन-क्रम-वचन से सद्गुरु की शरण जाओ।
गुर बिनु भव निधि तरइ न कोई। जौं बिरंचि संकर सम होई।।
हाँ, यह प्रश्न अलग है, वह गुरु मिले कैसे? ढूँढो, पा जाओगे। भगवान कृष्ण एक योगेश्वर थे। भाववश उन्हें भगवान, परब्रह्म, परमात्मा… सारी उपाधियाँ उनके साथ जुड़ी हुई हैं। हम कहते भी हैं लेकिन प्रत्यक्षदर्शी था संजय। जो कुछ अर्जुन ने देखा, सब कुछ संजय ने देखा और उसके प्रभाव से अपने आपको परम धाम का निवासी भी बनाया उस प्रत्यक्षदर्शी संजय ने। अन्त में संजय ने निर्णय दिया कि कृष्ण कौन हैं?
यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर:।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम्।। (गीता, १८/७८)
जहाँ योगेश्वर कृष्ण हैं, जहाँ महात्मा अर्जुन हैं, वहीं श्री है, विजय है, विभूति है, अचल नीति है। राजन्! विजय वहीं है जहाँ कृष्ण हैं।
योगेश्वर कृष्ण अर्थात् कृष्ण एक योगेश्वर हैं। अर्जुन एक शिष्य है तो– ‘राखइ गुर जौं कोप बिधाता। गुर बिरोध नहिं कोउ जग त्राता।।’–यदि तकदीर के लेख रूठ गए, तकदीर में घोर नर्क और यातनायें लिख गयीं तो गुरु रख लेंगे। कारण कि जैसे-जैसे उस कर्म का, शुभ कर्मों का निर्माण होता है, उस विधि पर चला देंगे; और यदि सद्गुरु उपलब्ध नहीं हैं तो भगवान नाम की कोई वस्तु नहीं है। जबकि भगवान ही तो एक ऐसी सत्ता है जो शाश्वत है, सर्वत्र है, व्याप्त है, सदा है, अपरिवर्तनशील है, उन्हें घटना-बढ़ना भी नहीं है, हटाना भी नही है। हैं…. होंगे! लेकिन हमारे दर्शन, हमारे स्पर्श और प्रवेश के लिए तो नहीं हैं। उसकी कुंजी सद्गुरु हैं। जो उस भगवत्ता से संयुक्त हैं, उससे गुजरे हुए हैं, चले हुए हैं, वे साधक को पकड़कर उस रास्ते को, क्रिया को जगा देंगे, उस पर चलने की विधि बता देंगे और जैसे-जैसे तुम पुकारोगे, वैसे साथ भी रहेंगे। तो जो कुछ महिमा है, गुरु की है।
इसी पर आश्रम में एक आरती गाई जाती है। पहले तो अनुसूइया आश्रम में कोई आरती नहीं थी। काफी वर्ष तक हमारे सामने कोई आरती नहीं गायी गयी। बड़े सुबह महाराज जी उठ जाए, दो बजे खाँसने लगें, फिर भी कोई-कोई साधक न उठें, न सकपकायें तो गुरु महाराज बोलें– ‘‘उठो हो माटी के धोंधों! अरे, महतारी का गरभ छुड़ाने आए हो रे, उठो भजन करो। साधु को ब्रह्मबेला में, चौथे प्रहर में जग जाना चाहिए। साधु को चार घंटे सोना चाहिए। अधिक सोनेवाला अलहदी होता है।’’
पहले डमरू भी नहीं बजता था। कोई डमरू ले आया तो धूनी पर लगा। थोड़ा-सा कुर्र दे बज जाए तो हमने पूछा– ‘‘भगवन्! यह डमरू बजने का अर्थ क्या है? यह कौन-सी पूजा है?’’ तो बोले– ‘‘ये है एलारम। अलारम है। अलहदी हैं, उनको जगाने के लिए। और कुच्छो नहीं।’’ तो महापुरुषों ने जो कुछ नियम बना रखा है, साधकों को कर्म-पथ पर चलाने के लिए।
कुछ दिनों बाद हमारे आश्रम से एक महात्मा पास आउट होकर, पूर्णत्व की अवस्था के करीब झूलते हुए, झूमते हुए पहुँच गए धारकुंडी आश्रम। वहाँ उन्हें गुरु महाराज का गुरुत्व व विभूति मिली। उन्होंने प्रसन्न होकर उद्गार में एक स्तुति लिखकर भेजा। वही है यह स्तुति… आरती।
धारकुण्डी महाराज जी द्वारा भेजी गयी आरती उसी दिन से गायी जाने लगी। इस स्तुति में गुरु का स्वरूप क्या होता है?, गुरु का कार्य क्या होता है?, शिष्य क्यों शरण में जाता है?, शिष्य क्या माँग ले कि उसका काम चल जाय? छुटपुट वस्तुएँ मत माँगो, जरा-सी एक बात मांग लो कि ‘मोपर हेरो’– भगवन्! मुझ पर दृष्टि बनाए रखें। इसमें सब कुछ आ जाता है। फिर जब दृष्टि ही है मालिक की तो वही होगा जिसमें आपका हित होना है। अनिष्ट हो ही नहीं सकता। इसी आशय की यह आरती इस प्रकार है-
ॐ जय सद्गुरुदेवं, परमानन्दं, अमर शरीरं अविकारी।
निर्गुण निर्मूलं धरि स्थूलं काटन शूलं भवभारी।।
सूरत निज सोहं, कलि मल खोहं, जन मन मोहन छवि भारी।
अमरापुर वासी सब सुख रासी, सदा एकरस निर्विकारी।।
अनुभव गंभीरा, मति के धीरा, अलख फकीरा अवतारी।
योगी अद्वेष्टा, त्रिकाल द्रष्टा, केवल पद आनन्दकारी।।
चित्रकूटहिं आयो, अद्वैत लखायो, अनुसुइया आसन मारी।
श्री परमहंस स्वामी, अंतर्यामी, हैं बड़नामी संसारी।।
हंसन हितकारी, जग पगु धारी, गर्व प्रहारी उपकारी।
सतपंथ चलायो, भरम मिटायो, रूप लखायो करतारी।।
यह शिष्य है तेरो, करत निहोरो, मोपर हेरो प्रणधारी।
जय सदगुरुदेवम्…
कभी-कभी आश्रम में जब मेला पहुँचे तो मेले में आने वाले लोग देवताओं की जय बोलना शुरू करें… बोल हनुमान जी की जय…, अनुसुइया की जय…, अत्रि महाराज की जय…, राम जी की जय… तो महाराज बहुत बिगड़ें। वह बोलें– ‘‘अरे, उनकी तो जय है ही। वे विजय पा चुके प्रकृति पर। वे तो विजेता हैं। आपन जय मनाओ, अपनी जय के लिए सोचो, उपाय करो’’ तो ‘जय सद्गुरुदेवं’– जो जय कर चुके हैं, जो इस त्रिगुणमयी प्रकृति के विजेता हैं, ऐसे हैं सद्गुरु। वे ‘देव’ हैं, ‘परमानन्द’स्वरूप हैं, ‘अमर शरीरं अविकारी’–वे जन्म-मृत्यु के बंधन से परे हैं, और शरीरों के विकार से मुक्त हैं।
‘अमर’… पूरा संसार मरणधर्मा है। ‘चलं लक्ष्मी चलं आयु चलं यौवन सर्वश:।’ इतना ही नहीं,
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं सर्वं मायामयं जगत्।
सत्यं सत्यं पुन: सत्यं हरेर्नामैव केवलम्।। (कैवल्याष्टकम्)
सृष्टि निर्माता विधाता और उससे उत्पन्न चौदहों भुवन, चराचर जगत पुनरावर्ती स्वभाव वाले हैं, माया में हैं। धोखे की टटिया है, स्वप्नवत् है, नश्वर है; जिनका कोई अस्तित्व नहीं। आत्मा ही सत्य है, सनातन है, अमृत-स्वरूप है, जहाँ मृत्यु का समावेश नहीं है, अपरिवर्तनशील है, काल से अत्यंत परे है, अविनाशी है, वही सनातन सत्य है।
अमर अर्थात् आत्मतत्त्व में स्थित और शरीर-सम्बन्धी विकारों से मुक्त हैं। अब उन्हें शरीर नहीं धारण करना पड़ेगा। उससे निवृत्ति हो गयी।
निर्गुण निर्मूलम् धरि स्थूलं काटन शूलं भव भारी।
वे गुणातीत हैं। सत्-रज-तम त्रिगुणमयी प्रकृति है, वे प्रकृति के तीनों गुणों से अतीत हैं। और ‘निर्मूलम्’–वह प्रकृति का मूल कारण सहित उससे अतीत हैं। वह निवृत्ति प्राप्त हैं।
‘धरि स्थूलम्’–ऐसी निवृत्ति के पश्चात् भी वे स्थूल शरीर के आधारवाले हैं। महात्मा जीते जी ही मुक्ति पाता है, मरने के बाद नहीं। ‘अवधू जीवत में कर आशा। मुए मुक्ति गुरु कहे स्वार्थी, झूठा दे विश्वासा।’, यदि जीवित मन बस हुआ नहीं तो ‘पुनि देवे बहु त्रासा।’। ‘जहाँ आशा तहाँ बासा, मन का यही तमाशा।’ जब कभी मिली है मुक्ति तो जीते जी। वे महापुरुष जीवनमुक्त कहलाते हैं।
महात्मा बुद्ध को दो सौ जन्म के पश्चात् कैवल्य पद प्राप्त हुआ, बोधि प्राप्त हुआ। कागभुसुण्डि को एक हजार जन्म लग गए किन्तु अन्त में वही अविनाशी पद प्राप्त हुआ। भगवान कृष्ण के लिए आता है महाभारत में, कि प्राप्ति में दस जन्म लग गए। एक जन्म में बद्रिकाश्रम में ध्यानस्थ थे। एक कल्प में ‘यत्र सायं गृह मुनि’ के रूप में भ्रमण करते थे। जहाँ शाम तहाँ घर…। और उस पूरी साधना-काल में मौन रहे। एक कल्प में प्रभास क्षेत्र में क्षेत्रीय जनता को उपदेश करते हुए भ्रमण कर रहे थे। एक कल्प में पुष्कर तीर्थ में यज्ञ करवा रहे थे… बारह वर्ष तक। वहाँ आप बहुत कृशकाय हो गए थे। कालान्तर में साधना इतनी उन्नत हुई कि विष्णु का अवतार कहलाए, वामन-अवतार कहलाए, लेकिन फिर भी थे अधूरे।
युधिष्ठिर घबड़ाए हुए थे। पाण्डवों का वनवास चालू हुआ ही था। पहला दिन था। अर्जुन ने कहा– ‘‘राजन्! इस कल्प में ये साक्षात् परब्रह्म परमात्मा हैं, परमात्म स्वरूप हैं, परमात्म तत्व ही हैं जो आपके साथ हैं। आप चिन्ता ना करें, विजय आपकी होगी। ऐसा मैंने देवर्षि नारद से सुना है। दस जन्म के पश्चात् आज परमात्म-भाव, परमात्म-स्थित, परमात्म-स्वरूप, महायोगेश्वर हैं कृष्ण।
यह अवस्था कभी भी प्राप्त हो सकती है। बहुत से योगी ऐसे होते हैं, भजन करते-करते निवृत्ति हो चली है, साधना पूरी हो गई, केवल अब प्रवेश मिलना ही शेष था, परम चेतन का प्रतिबिम्ब पाना ही शेष था और आयु के दिन पूरे हो गए – ऐसे योगी की मुक्ति नहीं होती। उन्हें जन्म लेना पड़ेगा क्योंकि प्राप्ति नहीं हुई। किन्तु जन्म लेते ही थोड़ी सी साधना के पश्चात् तुरन्त वह स्थिति प्राप्त कर लेते हैं, क्योंकि उनके पूर्णत्व प्राप्ति में जन्म लेना ही माध्यम है, साधन नहीं। वे भजन तो पहले कर चुके हैं। ऐसे योगी भवप्रत्यय योगी कहलाते हैं। योगेश्वर भगवान कृष्ण इसी अवस्था वाले थे इसलिए वे बाल्यकाल से ही पूर्ण योगेश्वर हैं।
आदि शंकराचार्य को अठारह वर्ष की अवस्था में पूर्णत्व की प्राप्ति हुई, रामकृष्ण परमहंस देव को करीब पचास वर्ष के लगभग। हमारे गुरु महाराज को अड़तीस साल की अवस्था में। गुरु महाराज के पूर्णत्व प्राप्ति में केवल आठ साल लगा है। हमने कहा– भगवन्! इतना जल्दी क्यों? गुरु महाराज बोले– यह शंका हमको भी थी। तब फिर भगवान ने पिछले सात जन्म की रील मुझे दिखाया। सात जनम लगातार साधु हूँ। पिछले जन्म में निवृत्ति हो चली थी लेकिन दो-एक छोटी-छोटी इच्छायें मन में रह गयीं थी इसलिए जन्म लेना पड़ा।
भगवान कृष्ण कहते हैं– ‘अनेक जन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्।’ (गीता, ६/४५)- शिथिल प्रयत्नवाला साधक भी अनेक जन्म चलते-चलते वहीं पहुँच जाता है जिसका नाम परम गति है, परम धाम है। आगे कहते हैं– अनेक जन्म साधन के परिणामस्वरूप जो प्राप्तिवाला जन्म है, वह ज्ञानी भक्त मेरा स्वरूप है। मैं उसमें हूँ और वह मुझमें है। मुझमें और उसमें कोई अंतर नहीं। कृष्ण ऐसा नहीं कहते कि मैं ही भगवान हूँ, और कोई पायेगा ही नहीं! ‘उसमें और मुझमें कोई अंतर नहीं’ अर्थात् महापुरुष जब अपनाता है तो महापुरुष ही बना देता है। जिस गुरुत्व में स्वयं निमग्न है उसी में निमग्न कर देता है। गुरु कभी शिष्य नहीं बनाता। जब बनाता है तो अपना ही प्रतिरूप, प्रतिबिम्ब बना लेता है। इसी आशय पर यह स्तुति है। इस प्राप्ति के पश्चात् महापुरुष संसार में जब तक रहता है तब तक लोकहित के लिए रहता है।
‘धरि स्थूलम्’- वे स्थूल शरीर के आधारवाले होते हैं। कृष्ण कहते हैं– अर्जुन! मैं उस परम का स्पर्श करके, परम भाव में स्थित हूँ, अविनाशी तत्व स्वरूप हूँ; किन्तु हूँ इस मनुष्य शरीर के आधारवाला। जो मेरी इस स्थिति को नहीं जानते, आसुरी स्वभाव को धारण किए हुए मूढ़ लोग मुझे मनुष्य कहकर पुकारते हैं, तुच्छ कहकर पुकारते हैं। किन्तु जो दैवी संपद से युक्त भक्तजन हैं, अनन्य भाव से पूर्ण श्रद्धा से मेरा सुमिरन करते हैं, मैं उनका कल्याण साधनेवाला होता हूँ। पत्र-पुष्प-फल-जल जो अर्पित करते हैं, सेवन करता हूँ। यही है ‘धरि स्थूलम्’।
जो मुक्त हैं, जिन्हें अविनाशी पद प्राप्त है, जो गुणातीत हैं तो फिर वे हैं कहाँ? तो ‘धरि स्थूलम्’। यह स्थिति शरीर के जीते जी ही आती है। स्थूल शरीर में और प्राप्ति के पश्चात् महापुरुष का जीवन लोकहित में ही होता है; स्वयं के लिए तो कोई कार्य शेष नहीं रहा। उन्हें कर्म करने से न कोई लाभ है, न छोड़ने से कोई हानि। श्रीकृष्ण कहते हैं– मैं हूँ स्थूल शरीर के आधारवाला। हर महापुरुष और क्या होता है? प्राप्ति के पश्चात् भी शरीर के आधारवाला ही होता है। प्राप्ति के पश्चात् जो आयु के दिन शेष होते हैं… शरीर के आयु के… वह समाज हित के लिए ही होते हैं। महापुरुष की हर चेष्टा मंगलमयी हुआ करती है।
‘काटन शूलं भव भारी’–वे स्थूल शरीर का आश्रय लेकर ‘काटन शूलं भव भारी’– आवागमन, जन्म-मृत्यु के शूल को काटने में सक्षम होते हैं, इससे निवृत्ति दिलाने वाले होते हैं।
‘सूरत निज सोहम्’– मन की दृष्टि का नाम सुरत है। उनकी सुरत ‘निज सोहम्’–स्वयं स्वरूप में सदा प्रवाहित रहती है, स्थिर रहती है, उससे कभी हटती ही नहीं। ‘डोलत डिगै ना बोलत बिसरै, अस उपदेश दृढ़ावै।’ गुरु महाराज कहते थे– ‘‘होऽऽ मोर स्वांस बांस की तरह खड़ी है। डोलते, बात करते, चलते, लेटते, उठते हर समय सुरतिया वहीं लगी हुई है।’’ ‘सूरत निज सोहम्’– स्वयं स्वरूप में सदा प्रवाहित, संचारित रहती है, स्थित रहती है।
‘कलिमल खोहम्’- वह कलयुग के मल को नष्ट करने वाले हैं। ‘जन मन मोहन छवि भारी’– साथ ही जन माने सेवक, शरणागत, भक्त के मन को मोह लेने वाले होते हैं। इन्हीं कारणों से संसार में उनकी महिमा है। उनकी छवि भारी है उनकी छवि का निखार है। इसी विशेषता की वजह से कि जन के मन को मोह लेते हैं, उठा लेते हैं, पकड़ लेते हैं।
‘अमरापुर वासी सब सुख राशी सदा एकरस निर्विकारी।’
वे अमर अविनाशी केवल आत्मा हैं। वे आत्मतृप्त, आत्मस्थित हैं। ‘अमरापुर वासी’- और जो कुछ है, मृत है सृष्टि में। सत्य, अविनाशी, मृत्यु से परे तो केवल परमात्मा हैं। उस परम तत्व भाव, उस परम तत्व के निवासी हैं। जो ‘सब सुख राशी’- सम्पूर्ण सुख की राशि हैं वह धाम, वह पद। सब सुख किसी के पास नहीं दुनिया में। सृष्टि में किसी के पास सब सुख नहीं है, कोई न कोई दु:ख जरूर पीछा करता है। कुछ एक बार सामग्री दिखाई भी पड़ गई कि दूध पूत से सब बरकरार हैं, इतने में आगे कोई नई चीज आ गई खतरे की। सब सुख-सम्पन्न एक परमात्मा ही हैं। भगवान राम का चित्रण है–
सो सुख धाम राम अस नामा। अखिल लोक दायक बिश्रामा।।
‘जो आनन्द सिन्धु सुख राशि’–आनन्द के समुद्र हैं, सुख की राशि हैं, सुख का ढेर हैं, खजाना लगा है, ‘सो सुख धाम राम अस नामा। अखिल लोक दायक बिश्रामा।’–वे सुख के धाम, उनका नाम राम है।
‘जो सुख राशी’–राशि का अर्थ है कि हमारे पास भरपूर भण्डार है। ‘सीकर तें त्रैलोक सुपासी’–एक बूँद उस भण्डार में से, सुख में से किसी को छिड़क दिया, तीनों लोकों में वह सुपास पा जाता है। उसके लिए खतरा टल गया सदा के लिए। तो सद्गुरु उसी सम्पूर्ण सुख की राशि हैं और,
‘सदा एकरस निर्विकारी’–उनके जीवन में अब उतार और चढ़ाव, उत्थान और पतन नहीं रहता। योगी के कर्म अशुक्ल व अकृष्ण हुआ करते हैं। विकारों से परे सदा निर्विकारी हैं।
‘अनुभव गंभीरा मति के धीरा, अलख फकीरा अवतारी।’ अनुभव तो महापुरुष की शरण जाने पर चार-छ: महीने के अंदर ही जागृत हो जाता है। टूटी-फूटी सेवा, उनके द्वारा बताई हुई टूटी-फूटी साधना भी चार-छ: महीने पार लग गई समर्पण के साथ, अनुभव जागृत हो जाएंगे, यदि अनुभवी महापुरुष हैं तो। सबके पास जागृत करने की क्षमता नहीं होती। ये विरले होते हैं लेकिन ‘अनुभव गंभीरा’–सम्पूर्ण अनुभव – यह सद्गुरु के पास होता है। ‘भव’ कहते हैं संसार को, आवागमन, जन्म-मृत्यु के चक्कर को। ‘अनु’ कहते हैं अतीत को। इससे अतीत करनेवाली विशेष जागृति है जिसका नाम अनुभव है – वह है परमात्मा की आवाज का पकड़ में आना।
जिस सतह पर हम खड़े हैं, जिस प्रभु की हमें चाह है वे उतर आए, हमारी आत्मा से अभिन्न होकर खड़े हो जाएं, और हमारा मार्गदर्शन करने लगें। यह संभव है, यह कल्पना नहीं है। यह अनुभवी सद्गुरु के द्वारा संभव है। तुलसी ने इस पर बल दिया कि ‘मन बस होइ तबहिं, जब प्रेरक प्रभु बरजै।’– आप लाख संयम करो, नियम करो, तप करो, जप करो, कोई लाभ नहीं। यह मन तब वश में होता है जब ‘प्रेरक प्रभु बरजै’–प्रेरक के रूप में प्रभु उतर आयें और आपका रोकथाम करने लगे, साज-सँभाल करने लगें, तब वश में होता है।
उसी प्रभु के संचार-सूत्र का नाम अनुभव है और यह अनुभव आरम्भ, मध्यम, पराकाष्ठा… उसके बाद है गंभीर। सर्वस्व, सम्पूर्ण अनुभव से संपन्न है वे। ‘अनुभव गंभीरा मति के धीरा’–वे स्थितप्रज्ञ है जिनकी बुद्धि सदा धीर है, परिपक्व है।
‘अलख फकीरा अवतारी’–उन महापुरुषों को कोई देख नहीं सकता आँखों से, कारण कि भगवान अचिन्त्य हैं, अगोचर हैं। चित्त का विषय नहीं हैं भगवान। इन आँखों से हम नहीं देख सकते भगवान को। वे अचिन्त्य, अगोचर हैं, चित्त का निरोध और इंद्रियों को संयम करके उस अविनाशी तत्व का स्पर्श और स्थिति वाले हुए, भगवत्ता को प्राप्त किया, तो भला आप किन आँखों से देख लोगे उनको? आप नहीं पहचान सकते।
तुलसीदास के पास एक भक्त पहुँचा। वह बोला– भगवन्! हमने संत को पहचान लिया। ‘कोउ कहा संत हम चीन्हा, तुलसी कानों पर हाथ धर दीन्हा।’ तुलसीदास जी ने तुरंत कान बंद कर लिये, बोले– अरे रे, इससे बड़ा झूठ कुछ नहीं। तुमने किन आँखों से देखा? भगवान मन-बुद्धि से परे हैं। मन-बुद्धि का निरोध करके ही तो भगवत्ता में प्रवेश पाते हैं। उस भगवत्ता से वह जो भगवत्ता की प्राप्ति गुरुत्व है, उससे संयुक्त है, वही सद्गुरु हैं। जहाँ संशयों का अंत है वे संत हैं। भला तुमने कैसे पहचान लिया? तर्क से, बुद्धि-विलास से हम उन्हें नहीं जान सकते। उन्हें हम तब जान पायेंगे जब या तो वे स्वयं ही कृपा करके जना दें अथवा हमारा पुण्य-पुरुषार्थ इतना उन्नत हो कि भगवान कृपा करुणा करके आपका सहयोग कर दें। तो,
संत बिसुद्ध मिलहिं परि तेही। चितवहिं राम कृपा करि जेही।।
विशुद्ध संत उन्हीं को मिलते हैं, प्रभु जब कृपा करके किसी की ओर देख लेते हैं एक निगाह, पा जाओगे।
संत, सद्गुरु-प्राप्ति का दूसरा साधन थोड़ा लंबा है। ‘पुण्य पुंज बिनु मिलहिं न संता।’–पुण्य का पुंज प्रगट रूप में साथ नहीं देता, तब तक संत अथवा सद्गुरु नहीं मिलते। नहीं मिलने का अर्थ यह नहीं कि वे दिखाई नहीं पड़ते; दिखाई अवश्य पड़ेंगे। संत-सद्गुरु नहीं, साक्षात् भगवान शिव खड़े होंगे तब भी हम चार धक्का जरूर देंगे– देखो, कैसा रूप बनाए खड़ा है। दुनिया में कितनी फैक्ट्रियाँ हो गई कपड़े की। कौन-कौन वस्त्र चल गए…. टेरीकाट, टेरिलीन, रेडीमेड और इन्हें दो आने की लंगोटी नसीब नहीं। भइया! मोटान है, जान-बूझकर पशु की तरह नंगा घूम रहा है। कुछ न कुछ हम कह गुजरेंगे। कारण कि जिन आँखों से संत अथवा सद्गुरु पहचाने जाते हैं, वह दृष्टि पुण्यमयी है। ‘पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता।’ मिल गये तो ठीक, नहीं मिले तो सिद्ध है कि कुछ कमी है। आप पुण्य अर्जित करें। वह पुण्य भी संतों के सान्निध्य और सेवा से ही और ईश्वर के प्रति श्रद्धा-समर्पण से ही आगे बढ़ेगा।
पुण्य-पाप दो शब्द ऐसे हैं – जो हमें पूर्णत्व की ओर ले चले वह पुण्य कर्म; और जो पतन की ओर ले जाय वह पाप कर्म। इतना ही अंतर है कुल। तो ‘अलख फकीरा’–वे लखने में नहीं आते। वे तब मिलते हैं जब करुणा करके अपने को दिखा दें। ‘कै जाने जिय आपना कैर जनावे पीव’–वह प्रभु थोड़ा इशारा कर दें।
‘अलख फकीरा’…. ‘फिकर फाड़ फकनी करे, ताहिं कहे फकीर।’ वे सम्पूर्ण फिकर से मुक्त हैं और अवतारी हैं। वास्तव में परमात्मा उनमें सदा जागृत, स्थिर और विद्यमान है। अवतार योगी के हृदय में होता है, बाहर नहीं।
‘योगी अद्वेष्टा त्रिकाल द्रष्टा केवल पद आनन्दकारी।’ वे योगी साधारण नहीं, ‘अद्वेष्टा’–उनका शत्रु-मित्र कोई नहीं।
विद्या विनय सम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पंडिता: समदर्शिन:।। (गीता, ५/१८)
विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण और चांडाल में… जो एक सियार लटकाए है पीठ पर उसमें… कुत्ता तथा गाय में, विशालकाय हाथी में ‘पण्डिता: समदर्शिन:’–जो पूर्ण ज्ञाता हैं वे समान ही दृष्टिवाले होते हैं। उनकी दृष्टि में न गाय धर्म है, न कुत्ता अधर्म है। न विद्या-विनययुक्त विप्र कोई विशेषता रखता है, न चांडाल कोई हीनता रखता है। कारण कि उनकी दृष्टि चमड़ी पर नहीं पड़ती, हृदय में स्थित आत्मा पर पड़ती है। वे केवल इतना ही समझते हैं कि एक साधक थोड़ा आगेवाली सीढ़ी पर खड़ा है, दूसरा नीचेवाली सीढ़ी पर खड़ा है, लेकिन हैं एक ही पथ के पथिक; अंतर नहीं। उसको उस जगह से जगा देंगे, ऊपर वाले कि तरह उस जगह से एड़ (सहायता) दे देंगे। इतना ही अंतर होता है। इसलिए वह ‘योगी अद्वेष्टा’–उनका किसी से द्वेष नहीं। वे सबमें शत्रु-मित्र नहीं, अपना-पराया नहीं, सबमें ‘अद्वेष्टा’।
‘त्रिकाल द्रष्टा’– भूत, भविष्य, वर्तमान – तीन काल – न भूतकाल के संस्कार उन्हें घेरेंगे, न भविष्य की उन्हें चिन्ता; वे सदैव वर्तमान में ही स्थिर रहते हैं। तीनों कालों के वे द्रष्टा हैं, देखने वाले हैं। कोई काल उन्हें प्रभावित नहीं कर पाता। प्रगति और अगति की चिन्ता नहीं। समाज में कहावत है कि जो फ्यूचर (भविष्य) पर दृष्टि रखता है, वही कामयाब होता है संसार में, लेकिन इन महापुरुषों के लिए भविष्य कुछ नहीं, भूतकाल कुछ नहीं। वर्तमान भी उनके काम की वस्तु नहीं। वह अपने सहज में रहते हैं। तीनों कालों के वे द्रष्टा हैं – देखने वाले – उससे प्रभावित नहीं।
‘कैवल्य पद आनन्द कारी’–कैवल्य पद – परम पद – उसके आनन्द में स्वयं निमग्न और ‘कारी’–उस आनन्द के संचारकर्त्ता के रूप में हैं वे। यही कारण है कि सद्गुरुओं के शरण में साधक पनपते हैं।
उन महापुरुष की रहनी क्या होती है? हो सकता है, सभी गुरु हो जायें। गुरु की एक विशेषता है। इस पर प्रकाश डालते हैं–
‘चित्रकूटहिं आयो अद्वैत लखायो, अनुसुइया आसन मारी।’
एक चित्रकूट है पृथ्वी पर जहाँ भगवान राम ने तपस्या की थी। महासती अनुसुइया और अत्रि की तपोभूमि। वह पवित्र स्थान तीर्थस्थान अवश्य है लेकिन एक चित्रकूट और है। तुलसीदास जी ने बड़ी प्रशंसा की है चित्रकूट की, वहाँ जानेवाले सुखी हो जाते हैं लेकिन फिर बाहरी चित्रकूट के स्थान पर एक अन्तरंग चित्रकूट पर प्रकाश डाला कि,
रामकथा मंदाकिनी, चित्रकूट चित्त चारु।
तुलसी सुभग सनेह बन, सिय रघुबीर बिहारु।। (मानस)
रामकथा ही मंदाकिनी है। मन दागना, मन को संयत करना, यही मंदाकिनी है। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार- चतुष्टय अंतकरण – ये कूटस्थ हो जाय, ये शुद्ध हो जाय, सुंदर व कूटस्थ हो जाय। ‘चित्रकूट चित चारु’–कूटस्थ चित्त ही चित्रकूट है। ‘सुभग सनेह बन’–हार्दिक स्नेह ही वन है। ‘सिय रघुबीर बिहार’–जहाँ हार्दिक लगाव है, वहाँ भगवान सदा विहार करते ही हैं उस घट में। अर्थात् चित्त को कूटना ही चित्रकूट है।
चित्त तो इतना बड़ा जितना बड़ा संसार। चित्त के विस्तार ही का नाम जगत है। ‘तुलसीदास कह चिद बिलास जग, बूझत बूझत बूझै।’ तुलसीदास जी कहते हैं, चित्त का पट-पसार ही जगत है। ऐसे वेग से दौड़नेवाले चित्त को समेटकर, संयत करके कूटस्थ कर लिया, अचल स्थित ठहर गया तो ‘चित्रकूटहिं आयो’- चित्त को कूटस्थ करके प्रकट हुए सद्गुरु।
‘अद्वैत लखायो’ और वह अद्वैत…. द्वैत माने प्रभु अलग, हम अलग; अद्वैत माने दर्शन, स्पर्श, प्रवेश और स्थिति वाले। ‘अद्वैत लखायो’–कैवल्य पद में स्थित सहस्रों तीर्थ की स्थिति और,
‘अनुसुइया आसन मारी’–सुइया कहते हैं डाह को, जलन को, माया को। अनु कहते हैं अतीत को। माया से अतीत जिनका आसन है और वहाँ उनका निवास है। वहाँ उनका आसन सदा स्थिर है। वह वहाँ आसन मारकर बैठे हैं। देखने में सामने हैं लेकिन वस्तुत: उनकी रहनी माया से उपराम है।
‘श्री परमहंस स्वामी अंतर्यामी हैं बड़नामी संसारी।’
‘श्री’ माने ऐश्वर्य, ईश्वरीय विभूति; उनसे संयुक्त ‘परमहंस स्वामी’– सम्पूर्ण ईश्वरीय विभूति उनमें प्रवाहित है। ‘परमहंस’– ‘प्रकृति पार पर सब उरवासी।’- जो उस प्रभु से संयुक्त है, वह परमहंस है।
‘संत हंस गुन गहहिं पय, परिहरि बारि बिकार।’–वे संत, वे साधक हंस कहलाते हैं जो सांसारिक विषयरूपी वारि का त्याग कर देते हैं और ईश्वरीय गुणरूपी दूध में जीवनयापन करने वाले हैं। इस अवस्था में पहुँचने पर संत ही हंस हैं। वे दूसरा जीवन जी ही नहीं सकते। शेर को घास खिलाओ, वह जिएगा? मछली को पानी के बाहर पालो, जियेगी, चाहे मेवा क्यों न फेंको? ठीक इसी प्रकार हंस भी सिवाय अपने उस खुराक के बाहर जी ही नहीं सकता; वह हंसत्व से च्युत हो जाएगा।
वे संत हंस हैं, विषयरूपी वारि का त्याग करके ईश्वरीय गुणरूपी दूध पर ही जीवन जिनका टिक गया है, चलने वाले हैं और चलते-चलते जब परम तत्व परमात्मा का स्पर्श पाया, परम से संयुक्त हुए हैं, वे परमहंस हैं। यह योगी की, ईश्वर-पथ की पराकाष्ठा है। जितने हमारे भारतीय दर्शनशास्त्र हैं, इसी परमहंस रहनी पर जाकर मूक हो जाते हैं; आगे कुछ नहीं बताते।
‘श्री परमहंस स्वामी’–अब वे स्वामी हैं, सेवक नहीं। मालिक हैं। ‘अंतर्यामी’–हृदय-देश के भावों को पढ़नेवाले हैं। कभी-कभी महाराज कहें– ‘‘हो… आज एक अधिकारी आवत है, देख निकल न जाए। ओके कुछ उपदेश करैका है।’’ इतने में कोई न कोई अवश्य पहुँच जाय। आगे चलकर वह बड़ा अच्छा साधक निकलता था। कभी कभी कहें– ‘‘हूँ…. ससुरारी से कूँड़ा लेके चले आवत हैं। इन्हें खाये का दे, ओढ़े-बिछावे का देव, हर दे हरवाह दे, खोदे के पैना दे।’’ हम बोले– महाराज! का है? गुरु महाराज बोले– ‘‘कोई चला आवत है ढोंगी ढपाली।’’ हम बोले– ‘‘महाराज! दो रोटी देने में क्या हर्ज है?’’ वह बोले– ‘‘तू का जनिहे, कुपात्री को दान देने से दाता नष्ट हो जाते हैं।’’
इतने में कोई न कोई पहुँच जाय… बकायदा फर्स्ट क्लास तिलक-विलक लगाए…. महात्मा वेशभूषा एकदम डेकोरेट… और उसे देखते ही महाराज जद्द-बद्द कहना शुरू कर दें। इतने पर भी वह सीढ़ी से ऊपर चढ़ आए तब बैठने को दें, गांजा भी दें। वो जो कुछ मांगे, सारी व्यवस्था करें।
‘हंसन हितकारी’–सो केवल भक्तन ‘हितकारी’। वहाँ केवल लगा है, यहाँ हंस लगा है। ‘संत हंस…’– ईश्वरीय-पथ पर ही जिनका जीवन निर्भर कर गया है, ऐसे हंसों को शनै:-शनै: तुरंत आगे बढ़ाने की प्रक्रिया…. उनका हित करने वाले होते हैं। इन साधकों के परम हितैषी हैं तो ‘हंसन हितकारी’।
‘जग पगु धारी’–इसी उद्देश्य से जगत में कदम ही रखा है सद्गुरु ने। ‘गर्व प्रहारी उपकारी’–वे गर्व-प्रहारी हैं, गर्व पर प्रहार करके उपकार करने वाले हैं। अभिमानी को अपने अभिमान से नीचे उतरने में कष्ट होता है लेकिन गर्व जब तक नहीं हटेगा, तब तक उसका कल्याण कदापि नहीं।
एक बार नारद जी को बड़ा गर्व हो गया कि हमने कामदेव को जीत लिया। जीता तो तब कि जब लोग भी कहें, ताली बजावें, फूल-माला चढ़ावें कि वाह रे विजेता…. तब न मौज मिले। तो मौज लेने के लिए चले गए शंकर जी के पास। नारद जी बोले– ‘‘अरे भोलेनाथ! पहले आप अकेले थे, अब हम हो गए दो। आप काम-विजेता, मैं काम-विजेता।’’ शंकर भगवान बोले– ‘‘अरे नारद! माया बड़ी प्रबल है। ये बात विष्णु भगवान से मत कहना। तुम शान्त रहो, अपना सुमिरन करो।’’
नारद जी ने सोचा– ‘‘हूँ… राख पोत के, जटा बढ़ाके बैठा भर है। किसी को फलते-फूलते देख नही सकता। बड़ा डाही है।’’ आगे बढ़ गए, ‘‘चलो, पिताजी से जरा कह दूँ।’’
जब ब्रह्मा जी से कहा तो ब्रह्मा जी बहुत दुखी हुए, सोचे- ओह! हरि की माया का प्रभाव अनन्त है। ‘बिपुल बार जेहिं मोहि नचावा।‘–अनन्त बार जिसने मुझे नचाकर रख दिया तो भला नारद चक्कर में पड़ जाय, कौन बड़ी बात है? वे बोले- देखो बेटा नारद! माया बड़ी प्रबल है, तुम हरि से मत कहना। नारद सोचे– ओह! पिता तो है लेकिन अपने ही बड़कई लेकर बैठा है; और लड़कों की भी उन्नति ये नहीं सह सकते। ये देवता बड़े डाही लगते हैं। सीधा पहुँचे हरि के पास, बोले- ‘‘हमने जीत लिया…’’ भगवान ने रुखा बदन करके कहा- ‘‘अरे नारद जी! जो आपका सुमिरन कर ले, उसके विकार खत्म हो जाते हैं तो भला स्वयं आपके लिए क्या कहना!’’
नारद कहेउ सहित अभिमाना। कृपा तुम्हारि सकल भगवाना।।
‘बड़े गर्व के साथ कहा’ क्योंकि मानते थे कि अब तो जीत ही लिया, अब भला होना ही क्या है! ‘सब आपकी कृपा!’ फार्मेल्टी (शिष्टाचार) अदा किया नारद ने। भगवान ने देखा कि यह मेरा भक्त, मेरी शरणागत… यह तो चक्कर में पड़ गया। यह नष्ट हो जाना चाहता है।
आगे जब नारद बढ़े तो एक शीलनिधि की नगरी मिली। उसकी बहुत ही रूपसौंदर्यसम्पन्न एक कन्या मिली। ‘देखि रूप मुनि बिरति बिसारी’– वैराग्य सब चूल्हे में चला गया। ‘बड़ी बार लगि रहे निहारी’ और लगे झूठ-सच बोलने। इसीलिए ज्योतिषी को नर्क होता है।
नारद जी अच्छे ज्योतिषी थे। राजा बोले– महाराज! आप उदास हो गए। बात क्या है? कन्या के लक्षण ठीक तो हैं? नारद जी बोले– हाँ, ठीक ही है। ‘कछुक बनाइ भूप सन भाषे।’ बोले न झूठ-सच! तो नरक न होई त का होई। और भागे कि मिले कैसे। अच्छा तो रूप बढ़िया होगा तो मिल जायेगी।
नारद ने सोचा– हरि के समान तो हमारा हितैषी कोई नहीं। वे भागे भगवान की तरफ। मिले भगवान। भगवान बोले– ‘‘अरे नारद जी! विकल की तरह कहाँ?’’
नारद जी बोले- ‘‘भगवन्! आप ही के पास..।’’
भगवान ने पूछा– ‘‘क्या काम है?’’
नारद ने सोचा कि मैं यदि कहता हूँ कि हमें वह लड़की चाहिए, तो एक बार मैं डींग हाँक चुका हूँ कि मैं काम-विजेता हूँ, फिर लड़की माँगू? लोग कहते आये हैं कि ‘काम क्रोध’- ये भव फन्द हैं, ‘नाथ नरक के पंथ।’ ये अबै ज्ञान बघारै लगिहैं। ऐसा कुछ करो कि भगवान को थोड़ा छल लो।
नारद बोले- भगवन्! अपना हरि रूप दे दें। तो भगवान ने कहा- ‘तथास्तु’। अनन्त रूप हैं भगवान के पास; एक पकड़ा दिया हरि रूप बंदर वाला। फिर नारद जी ने सोचा, फाइनल करवा लूँ। नारद बोले– देखो भगवन्! हमारा हित हो, वही करना। ‘जेहि बिधि होहि नाथ हित मोरा। करउ सो बेगि दास मैं तोरा।।’–मैं आपका दास हूँ, शरणागत सेवक हूँ। जिसमें मेरा हित हो, वही करना। तो भगवान बोले– अरे नारद! तू हित की बात करता है,
जेहि बिधि होइहि परम हित नारद सुनहु तुम्हार।
सोइ हम करब न आन कछु बचन न मृषा हमार।।
जिसमें तुम्हारा परम हित होगा, शाश्वत हित होगा, वहीं हम करेंगे। हमारा वचन मृषा नहीं होता।
नारद उछलते-फुदकते पहुँच गए स्वयंवर में, सोचा, अब मिल जाने में क्या संदेह है! जब भगवान ने राइट (सही) कर दिया, भला उनका लिखा कौन टालेगा! वहाँ गये तो हँसाई ऊपर से हुई, कन्या को कोई और ले गया। फिर नारद जी भगवान को श्राप देने के लिए दौड़े कि ‘देहउँ श्राप कि मरिहउँ जाई’–मरने-मारने को तैयार हो गए।
बीच ही रास्ते में भगवान मिल गए, ‘संग रमा सोइ राजकुमारी’। उन्हें देखकर नारद को एकदम आग लग गई। वे बोले– शंकर जी को विष पिलाकर लक्ष्मी तब ले लिए रह्यो और हमके बंदर का मुँह बनाके इस बार राजकन्या को ले लियो…। और सन्न देना दो-चार श्राप दे दिये कि बन्दर का मुँह बनाया तो बंदर आपकी सहायता करेंगे; जैसे मैं औरत के लिए रो रहा हूँ तोहऊँ रोइहो। पत्ती-पत्ती से ना पूछौ तो हमहूँ बाबा नहीं। सारी साधुआई दाँव पर चढ़ा दिया।
जब हरि माया दूरि निवारी। नहिं तहँ रमा न राजकुमारी।।
भगवान ने माया का वह आवरण हटा लिया। न राजकुमारी, न लक्ष्मी। लक्ष्मी जो भगवान की अर्धांगिनी… वह भी नश्वर; और वह राजकुमारी भी नश्वर। शाश्वत कुछ और। आगे जब उस पर दृष्टि पड़ी तो नारद लगे काँपने। वह बोले– ‘‘प्रभो! मुझे तो आपने बचा लिया, मैं तो समाप्त हो गया था। भगवन्! हमने दुर्वचन कहे, पाप कैसे मिटे? प्रभु हमारा श्राप झूठ हो जाए। प्रभो! मेरा श्राप, मेरा दु:ख कैसे मिटे?, पाप कैसे मिटे?
भगवान का स्वभाव है– ‘उर अंकुरेउ गरब तरु भारी। बेगि सो मैं डारिहउँ उखारी।।’ तो ‘गर्व प्रहारी’ सद्गुरु। ‘गर्व प्रहारी उपकारी’–आपके गर्व को हटा देना एक बहुत बड़ा उपकार है। ‘सकल सोक दायक अभिमाना।’- सारे दु:खों की जड़ अभिमान है। साधक में गर्व होना स्वाभाविक है। कहीं न कहीं उसको नशा हो ही जाता है। किसी-किसी को बोलने का नशा, जो कुछ है ही नहीं। किसी को अपनी रहनी का नशा… यह भी भगवान मिटा देते हैं, मिटाकर उसका कल्याण कर देते हैं। यही सर्वोपरि, परम उपकार कर देते हैं तो ‘गर्व प्रहारी उपकारी’।
‘सतपंथ चलायो भरम मिटायो रूप लखायो करतारी।’
वह सत्य…. शाश्वत सत्य एक परमात्मा है। ‘सत्य वस्तु है आत्मा, मिथ्या जगत पसार। नित्यानित्य विवेकिया लीजै बात विचार।।’- सत्य वस्तु केवल आत्मा है और जगत का पट-पसार नश्वर, क्षणभंगुर, स्वप्नवत्। तो ‘सतपंथ चलायो’- जो शाश्वत सत्य है आत्मा, वे परमात्मा – उस पथ पर चलाने वाले… चलाता तो कोई किसी को है… कोई ट्रैक्टर चलाता है, कोई हल जोतने में बैल चलाता है। ये साधकों को सतपंथ पर ‘चलायो’- चलानेवाले हैं।
हमारे अंदर यदि भ्रम होगा तो हम नहीं चलेंगे तो ‘भरम मिटायो’–सम्पूर्ण भ्रम को मिटाते हुए ‘रूप लखायो करतारी’– और वह स्वरूप लखाया पथिकों को कि क्रिया कैसे की जाती है! करते जाओ और पार होते चले जाओ। एक नाम करतार भगवान का है। जहाँ नाम है, उसके साथ अर्थ जुड़ा हुआ है। वह क्रिया जागृत किया, बोले- तुम चलते जाओ बेटा! करो और तरो। अर्थात् योगविधि सद्गुरु से ही जागृत है, उन्हीं की देन है। वह रूप लखाया जो करतार का है। इन्हीं विशेषताओं को देखकर साधक समर्पण करता है और कुछ माँगता है,
‘यह शिष्य है तेरो करत निहोरो मोपर हेरो प्रणधारी।’
यह शिष्य आपका है, आपकी शरण हूँ। मैं आपसे अनुरोध करता हूँ, प्रार्थना करता हूँ, ‘करत निहोरो’–समर्पण के साथ अनुनय-विनय, प्रार्थना करता हूँ। ‘मोपर हेरो प्रणधारी’– मुझ पर सदा दृष्टि बनी रहे। आपका प्रण ही है कि शरणागतवत्सल, शरणागत-भयहारी तो अपनी उस विरुदावली को स्मरण कर, उस विरुदावली की देखते हुए भगवन्! आपकी ऐसी विरुदावली को जानकर मैं शरण में आया हूँ कि मुझ पर सदा दृष्टि बनी रहे। तो ‘जाके रथ पर केशो ता कहँ कौन अंदेशो।’
गुरु नानक ने कहा- प्रभो! एक आशीर्वाद दें कि मैं आपको भा जाऊँ, प्यारा लगने लगूँ। बस! ‘मोपर हेरो प्रणधारी’।
‘जय सद्गुरुदेवम्’- सद्गुरु परम देव हैं, परमानन्द-स्वरूप हैं। वे अविनाशी-पद-प्राप्त अमर हैं। ‘अमर शरीरं अविकारी’–वे शरीरों के जन्म-मरण के विकारों के बंधन से अतीत हैं। वही सदा विजेता हैं। यहीं पर, इसी स्वरूप में आपकी शाश्वत जय है। उनकी सदा जय हो।
उनकी क्या जय हो, उनकी तो जय है ही। वह विजेता हैं इसलिए जय शब्द उनके साथ लगा हुआ है। वे सदा जीते हुए हैं। वे जितेंद्रिय हैं, प्रकृति पार हैं, कालजयी हैं, स्वरूपस्थित हैं। ऐसे गुरुदेव की मैं सदा जय करता हूँ अर्थात् प्रार्थना करता हूँ। जय दूसरे शब्दों में होता है समर्पण।
।। बोलो श्री गुरुदेव भगवान की जय ।।
(‘अमृतवाणी भाग-8’ से उद्धृत)