कलियुग में धरम-करम कैसे होगा

युगधर्म

प्रश्नअब तो कलियुग आ गया महाराज! अब धरमकरम कैसे होगा?

उत्तर देखिये, रामचरित मानस में कलियुग-महिमा-गायन का प्रसंग जहाँ-जहाँ आया है उस पर दृष्टिपात करने से ज्ञात होता है कि कभी सतयुग था और आज कलियुग है, ऐसी कोई बात नहीं है। कागभुशुण्डिजी ने अपने पूर्वजन्मों का वृतान्त प्रस्तुत करते समय जिन शब्दों में मल-मूल कलियुग का वर्णन किया, ठीक उन्हीं शब्दावली और उन्हीं लक्षणों का उल्लेख गोस्वामीजी ने उत्तरकाण्ड में असन्त लक्षण तथा बालकाण्ड में रावण की उत्पत्ति और निशाचरों के आतंक के अवसरों पर किया है। कलियुग में सब नर काम लोभ रत क्रोधी हैं तो असन्त काम क्रोध मद लोभ परायनहोते हैं। दोनों एक ही बात है। कलियुग में पर त्रिय लंपट कपट सयाने लोग होते हैं तो असन्त पर द्रोही पर दार रत, परधन पर अपवादहैं। इसी प्रकार निशाचरों के उत्कर्ष के समय बाढ़े खल बहु चोर जुआरा। जे लम्पट परधन परदारा।। का साम्य देखने को मिलता है। छिटपुट स्थल तो अनेकों हैं; किन्तु उपर्युक्त तीन-चार स्थलों पर गोस्वामीजी ने कलि के गुण-धर्म पर प्रकाश डाला, कलियुग के अनेक लक्षण बताये-

जो कह झूँठ मसखरी जाना।

कलिजुग सोइ गुनवन्त बखाना।। (मानस, 7/97/6)

जाकें नख अरु जटा बिसाला।

सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला।। (मानस, 7/97/8)

इसी प्रकार-

देव न बरसहिं धरनीं, बए न जामहिं धान। (मानस, 7/101 ख)

इत्यादि पचासों लक्षण गिनाये और अन्त में निर्णय देते हैं कि-

ऐसे अधम मनुज खल, कृतजुग त्रेताँ नाहिं।

द्वापर कछुक बृन्द बहु, होइहहिं कलिजुग माहिं।। (मानस, 7/40)

ऐसे अधम मनुष्य सतयुग और त्रेता में नहीं होते, द्वापर में कुछ होते हैं और कलियुग में झुण्ड-के-झुण्ड होते हैं। प्रश्न खड़ा होता है कि क्या सतयुग और त्रेता में अधम मनुष्य होते ही नहीं थे?

ऐतिहासिक प्रमाणों से ज्ञात होता है कि सतयुग में हिरण्यकशिपु नामक एक नरेश हुआ। अपनी वेधशाला में उसने ऐसा आविष्कार कर लिया कि न दिन में मरे, न रात में मरे। न अस्त्र-शस्त्र से मरे, न पशु-पक्षी से, न मानव से। जब उसने देखा कि हमें मरना ही नहीं है फिर भगवान की क्या आवश्यकता? अतः उसने घोषणा करा दी कि मैं ही भगवान् हूँ। जो भी मुझसे भिन्न किसी भगवान का नाम ले उसे मृत्युदण्ड दिया जाय। अपने सिद्धान्त का वह इतना कट्टर था कि अपने इकलौते बेटे प्रह्लाद को भी वह क्षमा नहीं कर सका। प्रह्लाद को भी फाँसी पर चढ़ा ही दिया। मारने के अनेक प्रयत्न किये गये किन्तु भक्त प्रह्लाद का रक्षक तो कोई और था। वस्तुतः यदि भगवान एक अबोध शिशु का भी स्पर्श कर दे तो संसार में कोई शक्ति नहीं जो उसे मिटा दे। भगवान का वरदहस्त प्रह्लाद पर रहा और उसके माध्यम से उस युग में भक्ति की एक लहर सर्वत्र दौड़ गई।

इस प्रकार उस सतयुग में भी ऐसी परिस्थिति आयी कि धर्म की चर्चा-मात्र करने पर मृत्युदण्ड का विधान था और तुलसीदास कहते हैं, ऐसे अधम मनुज खल– ऐसे अधम मनुष्य कृतजुग त्रेताँ नाहिं– सतयुग और त्रेता में होते ही नहीं। जबकि उसी सतयुग में ऐसे भयंकर लोग हुए कि भगवान का नाम लेने पर फाँसी की सजा देते थे। आज कोई फाँसी तो नहीं देता, बहुत हुआ तो दस लोग छींटाकशी करेंगे; किन्तु उतने ही प्रशंसक भी मिलेंगे कि दादाजी महात्माओं के यहाँ जाते हैं, तीर्थयात्रा करते हैं। चौथेपन की यही शोभा है; इत्यादि।

आइये, उस त्रेता पर दृष्टिपात करें जिसका इतिवृत्त ‘मानस’ में चित्रित है। त्रेता में भी अधम नर थे। रावण धर्म सुनिअ नहिं काना। आपुनु उठि धावइ, रहै न पावइ (मानस, 1/182/छ0)- धर्म कानों से सुन भर पाता तो बौखलाकर स्वयं चल पड़ता था। धर्म को नष्ट करने के लिये ‘फोर्स’ भेज देता था। अधर्मियों को नष्ट करने की आज्ञा नहीं थी, केवल धर्मियों को ही निर्मूल करने की योजना थी। चोर-डाकुओं को नष्ट नहीं करना था बल्कि राम-राम कहनेवालों को नष्ट करने का आदेश था। ऋषि-महात्माओं से भी कर के रूप में रक्त वसूल किया जाता था। उनका अपराध मात्र इतना था कि भगवान का नाम लेते थे। गुप्त रूप से निशाचरों की टुकड़ियाँ चला करती थीं, जो धार्मिकों को अकेला पाते ही मारकर चट कर डालती थीं। वनवासी राम जब चित्रकूट से आगे बढ़े तो नर-कंकालों का एक पहाड़ मिला-

अस्थि समूह देखि रघुराया

 पूछी मुनिन्ह लागि अति दाया।। (मानस, 3/8/6)

हड्डियों का विशाल संग्रह देखकर भगवान राम ने मुनियों से पूछा कि ये नरकंकाल कैसे हैं? मुनियों ने कहा, ‘आप तो अन्तर्यामी हैं, जानते हुए भी क्यों पूछते हैं? परन्तु जब आप पूछते ही हैं तो बताना कर्तव्य होता है। निसिचर निकर सकल मुनि खाए (मानस, 3/8/8)- निशाचरों ने सम्पूर्ण मुनियों को खा डाला। यह उन्हीं की हड्डियों का ढेर है। आज आप नाम तो ले सकते हैं? कोई टैक्स तो नहीं लेता? वेद-पुराण कहने पर देश-निकाला तो नहीं मिलता? उस समय युग कौन-सा था? त्रेता! और गोस्वामीजी कहते हैं कि ऐसे अधम खल कृतयुग और त्रेता में होते ही नहीं! कलि का एक अन्य लक्षण त्रेता के ही सन्दर्भ में देखें-

सौभागिनीं बिभूषन हीना।

बिधवन्ह के सिंगार नबीना।। (मानस, 7/98/5)

उस त्रेता में सूर्पणखा विधवा ही तो थी। उसका पति विद्युतजिह्वा युद्ध में रावण द्वारा मारा गया तो वह उलाहना देते हुए बोली- ‘‘तू मेरा भाई है या शत्रु? तूने मेरे पति को मार डाला। आज से लोग मुझे विधवा कहेंगे।’’ रावण ने सान्त्वना दी- ‘‘बहन! भूल तो मुझसे अवश्य हुई, किन्तु हमारी जाति में भी क्या कभी विधवा होती हैं? हम हजारों स्त्रियाँ रखते हैं, तुम हजारों पुरुष रख सकती हो। भाई खर-दूषण के साथ जाओ और जनस्थान में मनचाहा विचरण करो।’’ इसी क्रम में, पंचबटी सो गइ एक बारा। देखि बिकल भइ जुगल कुमारा।। (मानस, 3/16/4) जब वह राम के समक्ष पहुँची तो बहुत रूप-स्वरूप बनाकर, मुस्कराकर बोली- मनु माना कछु तुम्हहि निहारी।(मानस, 3/16/10) तुम भी बहुत सुन्दर हो, ऐसी बात नहीं है। हाँ, काम चल जायेगा इसीलिए तो अभी तक कुमारी हूँ, जबकि एक भी कुकर्म उससे छूटा नहीं था। सूर्पणखा जितना अधःपतन आज तो नहीं पाया जाता! फिर भी गोस्वामीजी की उक्ति है कि त्रेता में ऐसे अधम नर होते ही नहीं थे।

फिर जब त्रेता में अधम नर होते ही नहीं थे तो राम लड़े किससे? उनका चरित्र ही प्रत्यक्ष प्रमाण है कि त्रेता में भी अधम खलों का अस्तित्व था। केवल अस्तित्व ही नहीं था वरन् उनके अत्याचारों से धरती भी आकुल हो उठी थी।

महात्माओं को निशाचर खा जाते थे। यह बात अलग है कि महर्षि अगस्त्य, अत्रि, शबरी, सुतीक्ष्ण, वाल्मीकि इत्यादि कुछ ऐसे तपोधन थे जिनके ऊपर इन निशाचरों का बल काम नहीं करता था। इसीलिये ये जहाँ भी थे सुरक्षित थे। लेकिन निशाचरों ने अजमाया इनको भी। इनका भी पीछा किया, अछूता नहीं छोड़ा। आतापी और वातापी दो निशाचर थे। उनका यह तरीका था कि पहले तो वे महात्माओं को निमन्त्रण दे आते थे। आमंत्रित महात्माओं के आने पर बड़ा भाई छोटे को काटकर भोजन बनाता था। विविध प्रकार के व्यंजनों का आस्वादन कर महात्मा जब प्रस्थान करते तो बड़ा भाई उन्हें प्रचुर दक्षिणा भी देता था; क्योंकि वह जानता था कि दक्षिणा भी तो थोड़ी देर में लौटकर वापस आ जायेगी। वे महात्मा जब कुछ दूर निकल जाते तो बड़ा भाई छोटे को पुकारता था और छोटा भाई सबका पेट फाड़ता हुआ निकल आता था। फिर दोनों निशाचर मरनेवाले महात्माओं को गिन लेते। कुछ को ताजा ही खा जाते, कुछ को तल-भूनकर और शेष को सुखाकर रख लेते। एक ही प्रयास में परिवार भर का, कई दिनों का प्रबन्ध हो जाता था।

इसी प्रकार का छल उन्होंने महर्षि अगस्त्य के साथ भी किया। जब वे उन्हें निमन्त्रित करने चले तो छोटे ने सावधान किया कि वे महात्मा बड़े खतरनाक हैं, उन्हें न छेड़ो। बड़े ने झिड़का- तुम तो बड़े कायर निकले! कैसा तपोधन? तपस्या क्या होती है? अस्तु, महर्षि अगस्त्य उस भक्त के यहाँ पहुँचे। आतिथ्य के पश्चात् जब वे लौटने लगे तो बड़े भाई ने छोटे को आवाज दी। महर्षि के पेट में हलचल होने लगी। ध्यान से देखा तो पता चला कि राक्षस पेट के भीतर है। तुरन्त उन्होंने कमण्डल से जल लिया, बाहर छिड़का, पेट पर हाथ फेरा और ‘आतापी वातापी स्वाहा’ कहते ही भीतर का राक्षस भीतर और बाहर का राक्षस बाहर ही समाप्त हो गया। इस प्रकार महर्षि अपनी तपस्या के प्रभाव से बचे। वैसे, निशाचरों ने छोड़ा किसी को नहीं था। हिरण्यकशिपु ने भी छोड़ा नहीं था। वह तो प्रह्लाद अपनी शक्ति से बच गया अथवा प्रभु को इतना अनुकूल कर चुका था कि बचता गया। इतने पर भी गोस्वामीजी कहते हैं, ऐसे अधम खल सतयुग और त्रेता में होते ही नहीं। वास्तविकता तो यह है कि आज से भी अधम नरों का प्रमाण उस युग में पाया जाता है। फिर गोस्वामी तुलसीदासजी कहना क्या चाहते हैं? अन्त में वे स्वयं निर्णय देते हैं-

नित जुग धर्म होहिं सब केरे।

हृदयँ राम माया के प्रेरे।। (मानस, 7/103/1)

सभी युगों के धर्म सबके हृदय में नित्य होते रहते हैं। हृदयँ राम माया के प्रेरे’- भगवान की माया की प्रेरणा से होते हैं। माया के दो रूप हैं- एक तो अविद्या माया है, जो विभिन्न योनियों का कारण होती है। दूसरी राममाया है जिसे विद्या भी कहते हैं। यह हरि-प्रेरित होती है और साधनात्मक क्रिया से ही इसकी जागृति सम्भव है। अविद्या माया की सीमा पार कर लेने पर राममाया की प्रेरणा से साधक के हृदय में क्रमशः चारों युगों के गुण-धर्मों का प्राकट्य होता है। वास्तव में यह भी भगवत्पथ की चार श्रेणियाँ हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे गीतोक्त वर्ण-व्यवस्था। अब पहचाना कैसे जाय कि हृदय में कौन-सा युग आया? गोस्वामीजी पहचान बताते हैं-

सुद्ध सत्व समता बिज्ञाना।

कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना।। (मानस, 7/103/2)

जिसमें सत्वगुण ही कार्यरत हो, समता आ गई हो, विषमता सदा-सदा के लिए समाप्त हो गई हो, विज्ञान अर्थात् अनुभवी उपलब्धि हो, प्रत्येक समस्या पर इष्ट से निर्णय मिलने लगे, असीम प्रसन्नता की अनुभूति हो, ऐसा पुरुष सत्ययुगीन है। इसी प्रकार –

सत्व बहुत रज कछु रति कर्मा।

सब बिधि सुख त्रेता कर धर्मा।। (मानस, 7/103/3)

सत्त्व अधिकांश मात्रा में हो, कुछ राजसी गुण हों, कर्म अर्थात् आराधना में पूर्ण अनुरक्ति हो, सब प्रकार की शान्ति हो- यह त्रेता का विशेष लक्षण है। जिसके हृदय में उपर्युक्त गुण हों उसे त्रेता-श्रेणी का साधक कहा जाता है। पुनः-

बहु रज स्वल्प सत्व कछु तामस।

द्वापर धर्म हरष भय मानस।। (मानस, 7/103/4)

राजसी गुणों के साथ-साथ सत्व एवं तामसी गुणों का किंचित् मिश्रण हो, हृदय में कभी हर्ष और कभी भय बना रहे तो साधक द्वापरयुगीन है। दुविधा से द्वापर बना है। यदि साधना में हर्ष-विषाद का आरोह-अवरोह लगा है, दुविधा बनी है तो साधक द्वापरयुगीन है। और अन्त में-

तामस बहुत रजोगुन थोरा।

कलि प्रभाव बिरेाध चहुँ ओरा।। (मानस, 7/103/5)

जहाँ अधिकांश तामसिक वृत्ति हो, रंचमात्र राजसी गुण हों, मन में चारों ओर बैर और विरोध भरा हो- ऐसा हृदय कलियुग का परिचायक है। यदि इस स्तर पर साधक जीवित है तो सिद्ध है कि वह कलियुगीन है। इस स्तर पर उसमें वे सभी लक्षण विद्यमान रहेंगे, जिनकी गणना गोस्वामीजी ने कलि-प्रसंग में की है।

जब मन में उच्छृङ्खलता है, वैर-विरोध ही है, बुद्धि विकल है तो भला मनुष्य-तन की सार्थकता क्या है? बड़े भाग्य से मानव-तन मिला तो कल्याण कैसे हो? ऐसी स्थिति में हम भजन कहाँ से आरम्भ करें?

बडे़ं भाग मानुष तनु पावा।

सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा।।

साधन धाम मोच्छ कर द्वारा।

पाइ न जेहिं परलोक सँवारा।। (मानस, 7/42/7-8)

बडे़ भाग्य से मानव-तन मिला है। अरे, पशु-पक्षी सभी तो जी रहे हैं। कौआ भी सुखी है। बड़े ताव से उड़ता है, पेड़ पर बैठता हैः फिर मनुष्य में कौन-सा बड़ा भाग्य है? इसलिये कि शेष चौरासी लाख योनियाँ केवल भोग भोगने के लिए हैं किन्तु मनुष्य स्वयं कर्मों का रचयिता है। बुरे से बुरे संस्कारों को काटने की इसमें क्षमता है, बशर्ते कि कर्म की क्रिया को समझ ले। अपने लक्ष्य को मन में, हृदय में स्थान भर दिये रहे। यह साधन का धाम, मुक्ति का दरवाजा है। इसको पाकर जिसने अपना निज परलोक नहीं सुधार लिया (किसी पर एहसान न करें, किसी की भलाई न करें, केवल अपनी भलाई तो कर लें)-

सो परत्र दुख पावइ, सिर धुनि धुनि पछिताइ।

कालहि कर्महि ईस्वरहि, मिथ्या दोष लगाइ।। (मानस, 7/43)

वह जन्मान्तरों में दुःख पाता है, सिर धुन-धुनकर पछताता है और काल-कर्म-ईश्वर को व्यर्थ दोष देता है। यदि मानव-तन उपलब्ध है और अपना परलोक नहीं सुधारा तो वस्तुतः सब दोष उसी का है। प्रायः मनुष्य दो-तीन बहाने कर लिया करता है। ‘करम में नहीं लिखा है’- कर्म को दोष देना, ‘समय अनुकूल नहीं है’- काल को दोष देना, ‘कर्ता-धर्ता तो भगवान हैं वे कराते ही नहीं’- इस प्रकार भगवान को दोष देना जीवों का स्वभाव बन गया है। लेकिन यहाँ भगवान राम कहते हैं कि यदि मानव-तन उपलब्ध है और कोई निज परलोक नहीं सुधार लेता तो न काल का दोष है, न कर्म का है और न ईश्वर का है। वस्तुतः सब दोष उसी का है। मनुष्य कर्मों का रचयिता है। मेटत कठिन कुअंक भाल के। (मानस, 1/31/9)- भाल में यदि असाध्य कुअंक, नरक और यातनाएँ लिखी हैं तो आप उसे मिटा सकते हैं बशर्ते कि नाम की युक्ति उपलब्ध हो। अब हमें यह देखना है कि यह मानव-तन तो उपलब्ध हुआ किन्तु तामसी गुण का बाहुल्य है, कलियुग का बाहुल्य है तथा भजन में हमारा मन लगता ही नहीं। तब तो हमारा मानव होना ही बेकार हुआ। ऐसी परिस्थिति में हमारे लिए भजन का विधान है भी कि नहीं? किन्तु भजन का विधान तो है-

कृतजुग सब जोगी बिग्यानी।

करि हरि ध्यान तरहिं भव प्रानी।। (मानस, 7/102/1)

सतयुग में सब योगी और विज्ञानी होते हैं। भगवान का ध्यान करते ही स्वाभाविक ध्यान जम जाता है और पार हो जाते हैं। अर्थात् जब सात्विक गुण कार्य करेगा, अनुभवी उपलब्धि होगी; उस समय सहज ध्यान की क्षमता आप में होगी।

त्रेताँ बिबिध जग्य नर करहीं।

प्रभुहि समर्पि कर्म भव तरहीं।। (मानस, 7/102/2)

जब त्रेता की योग्यता होगी तब भगवान को सम्पूर्ण कर्म समर्पण करने की क्षमता होगी। यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि (गीता, 10/25) श्वास-प्रश्वास का यज्ञ सभी यज्ञों में सर्वोपरि है। लेकिन यज्ञ की श्रेणीवाले जप का उतार-चढ़ाव इस श्वास के ऊपर है। यह न माला के ऊपर है, न जुबान के ऊपर। त्रेता में विविध यज्ञ अर्थात् श्वास-प्रश्वास का यजन करने की क्षमता होगी, भगवान को कर्म समर्पण करने की क्षमता होगी तो समर्पण कर क्रिया में प्रवृत्त रहकर वह भवसागर का पार पा लेता है।

द्वापर करि रघुपति पद पूजा।

नर भव तरहिं उपाय न दूजा।। (मानस, 7/102/3)

जब आप द्वापर की श्रेणीवाले होंगे तो ध्यान तो लगेगा नहीं क्योंकि मन में दुविधा लगी है तो ‘पद पूजा’- भगवान के स्वरूप को हृदय में पकड़ना, चरणों में मन को केन्द्रित करना (ध्यान रहे यह केवल करने का प्रयास मात्र है, होता नहीं, बस अभ्यास करने की क्षमता होती है) ऐसा करके वह भवसागर का पार पाता है।          

कलिजुग केवल हरि गुन गाहा।

गावत नर पावहिं भव थाहा।। (मानस, 7/102/4)

यदि हम कलियुग के स्तरवाले हैं तो केवल हरि गुन गाहा’- भगवान का गुण-गायन, उनकी लीलाओं का चिन्तन – जैसे रामायण में यह लिखा है, श्रीकृष्ण ने ऐसी लीलाएँ कीं, उन महापुरुषों का चरित्र ऐसा था, इत्यादि गुण-गायन और नाम-जप के अतिरिक्त कलियुग से पार जाने का कोई दूसरा उपाय नहीं है। जब मन विकल है, तामसी गुण है, वैर-विरोध भरा है, राग-द्वेष का संचार है, मन हवा से बातें करता है, उस समय यदि हम आँख मूँदकर बैठ जायँ तो शरीर तो बेशक बैठा रहेगा लेकिन जिस मन को ध्यानस्थ होना है वह तो हवा से बातें करता है, इसलिए वह नहीं लगेगा। ऐसी परिस्थिति में बैठे रहने से, समय नष्ट करने से क्या लाभ? इस परिस्थिति में लीलाओं के श्रवण करने और साधारण नाम-जप की स्वाभाविक क्षमता होती है। ऐसा करने से मनुष्य भवसागर का थाह पा जाता है।

प्रश्न खड़ा होता है कि क्या चार भवसागर हैं?, तो नहीं, भवसागर तो एक ही है किन्तु उससे पार होने के लिए चिन्तन-पथ की चार श्रेणियाँ हैं। उन्हें ही सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलि कहा गया। यदि हम कलियुग की श्रेणी के हैं, प्रवेशिकावाले हैं, तो इस अथाह भवसागर से पार होने के लिए साधना का आरम्भ गुण-गायन और नाम-जप से ही करना होगा। इससे हम भवसागर से सीधे पार नहीं हो जायेंगे बल्कि द्वापर में प्रवेश मिलेगा। जब हमारे अन्तराल में पद-पूजा की क्षमता आ जायेगी तो उसका अभ्यास करते-करते भवसागर का थाह पायेंगे। इतने से ही पार नहीं हो जायेंगे बल्कि चरणों का चिन्तन और उसे हृदय में पकड़ने के सतत अभ्यास के फलस्वरूप त्रेता में प्रवेश मिलेगा। उस समय श्वास-प्रश्वास का यजन, ईश्वर में कर्मों का समर्पण करने की योग्यता हममें स्वाभाविक होगी और ऐसा करने पर ही मनुष्य भवसागर का पार पाता है। ऐसा नहीं है कि त्रेता से ही सीधे-सीधे पार लग जायँ बल्कि इतना कर लेने पर सतयुग में प्रवेश मिलेगा। उस समय ईश्वरीय ध्यान की स्वाभाविक क्षमता होगी। जब लगाना चाहेंगे, जिस क्षण लगाना चाहेंगे, मन तुरन्त स्वरूप को पकड़ लेगा, केन्द्रित हो जायेगा। अनुभवी उपलब्धि होगी। प्रत्येक समस्या का हल बुद्धि से न होकर ईश्वर के निर्देशन पर आधारित होगा। ऐसा करके मनुष्य भवसागर का पार पा जायेगा।

इस प्रकार ये साधन-पथ की चार श्रेणियाँ हैं। इन्हीं को महापुरुषों ने कलियुग, द्वापर, त्रेता और सतयुग इन चार सोपानों में विभक्त किया है। महर्षि पतंजलि ने ‘योगदर्शन’ में इन्हीं का उल्लेख अति उत्तम, उत्तम, मध्यम और निकृष्ट श्रेणी के साधकों के रूप में किया है। गोस्वामीजी ने मानस के अरण्यकाण्ड (4/12) में उत्तम के अस बस मन माहीं।माताओं के माध्यम से इन्हीं चारों युगधर्मों का निरूपण किया है।

1- हम निःसन्देह कलियुगी हैं लेकिन चिन्तन के माध्यम से क्रमशः द्वापर, त्रेता, सतयुग और उसका भी पार पाकर ब्रह्म के दिग्दर्शनकाल में उसके स्वरूप की स्थिति पा सकते हैं। अतः युगधर्म सबके हृदय में हैं और गुणों के परिवर्तन से युगधर्म बदले भी जा सकते हैं।

2- युगधर्म वहीं तक चलते हैं जब तक ईश्वर अलग है, हम अलग हैं। युगधर्म तब तक निरन्तर चलते हैं जब तक परमतत्त्व परमात्मा का आविर्भाव नहीं हो जाता। उस आविर्भाव के साथ ही साधना, युगधर्म और उसकी केन्द्रभूमि मन भी शान्त हो जाता है और इनमें प्रवाहित तीनों गुणों का भी विलीनीकरण हो जाता है। वही शाश्वत राममयी स्थिति है-

काल धर्म नहिं ब्यापहिं ताही।

रघुपति चरन प्रीति अति जाही।। (मानस, 7/103/7)

3- वास्तव में युगधर्मों के उतार-चढ़ाव की स्थली मन है, इसीलिए-

बुध जुग धर्म जानि मन माहीं।

तजि अधर्म रति धर्म कराहीं।। (मानस, 7/103/6)

विवेकी लोग युग-धर्म को मन के अन्तराल में जानकर अधर्म से धर्म की ओर, छोटे धर्म से महान धर्म की ओर क्रमशः अग्रसर होते हैं। स्पष्ट है कि युगधर्मों को बदला जा सकता है।

4- अब, यदि हम समाज का वास्तविक कल्याण चाहते हैं, तो मिलकर सत्य के लिए प्रयास करें। जब बहुमत में सत्यप्रधान लोग होंगे तो सतयुग स्वाभाविक, स्वतः हो जायेगा। समाज में आप परम कल्याण के स्रष्टा कहलायेंगे। लोक-कल्याण भी होगा और स्वयं तो कल्याण-भाजन होंगे ही।

5- अनुभवी अन्तस्प्रेरक महापुरुष के द्वारा ही युगधर्मों का पार पाया जा सकता है। इससे सामान्य पाठक की अनेक भ्रान्तियों का भी निराकरण होगा और उन्हें अनन्त शाखाओं में से उचित मार्ग का चयन कर सकना सम्भव हो सकेगा कि वे किस कोण से प्रारम्भ करें। वे तभी जान पायेंगे कि किस मार्ग पर चलकर वे वस्तुतः कल्याण के भागी हो सकते हैं। अतः किसी अनुभवी महापुरुष के लिए अन्तःकरण में सदैव शोध की लालसा रखें।

प्रश्नमहाराजजी, गोस्वामीजी ने नारियों के माध्यम से युगधर्म का चित्रण क्यों किया?

उत्तरआप स्त्री हों अथवा पुरुष, यह शरीर भजन नहीं करता। इष्टोन्मुखी प्रवृत्ति ही भजन करती एवं कराती है जो स्त्री-संज्ञा में आती है, इसीलिए नारियों को प्रतीक बनाकर उसका चित्रण किया गया।

।। ओम् ।।

(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)

Q & A
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