प्रश्न– महाराजजी! क्या घर में भजन नहीं हो सकता?
उत्तर– घर में पुण्य और पुरुषार्थ को बढ़ाया जा सकता है लेकिन उस भजन के द्वारा निवृत्ति नहीं हो सकती। सेवा, भजन उतनी ही तल्लीनता से जारी रखना चाहिए, जब तक कि उसकी कोई निर्धारित सीमा न मिल जाय। उस सीमा के उपरान्त ही स्वयं भगवान घर छुड़ा देते हैं। आज हम सोचते हैं कि घर छोड़ना असम्भव है परन्तु इष्टदेव के अनुकूल होने पर सब सुलभ हो जाता है।
प्रश्न– जब घर में निवृत्ति नहीं होनी है तो हम आपकी शरण में रहकर ही भजन करेंगे।
उत्तर– देखो, किसी के छोड़ने से घर नहीं छूटता है। एक चोर था। जब चारों तरफ से दण्ड के घिराव में आया तो साधू हो गया। जब सब महात्मा लोग विश्राम करने लगते तो वह अपनी खोज जारी रखता था। खोज करने से कुछ भी न मिलने पर वह ‘करे कमण्डलाचार’- रातभर महात्माओं के कमण्डल ही इधर-उधर किया करे। किसी का बाहर रख दे और किसी का अन्दर। यही उसके रातभर का क्रम था। उसके इन क्रियाकलापों से महात्माओं के भजन में व्यवधान पड़ने लगा। बारीकी से जाँच करने पर एक दिन वह पकड़ में आ गया। जब पूछा गया कि, इस वेश में आने के पूर्व तुम कौन थे? तब उसने चौर्य कार्य का पूर्ण विवरण कह सुनाया। चूँकि वह पहले चोर था, इसलिए स्वभावगत संस्कार ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। घर छोड़ने से स्वभाव नहीं छूटता। असली गृहस्थी तो मन है जो ग्रसा हुआ है। केवल बाहर के त्याग से मन की गृहस्थी का त्याग नहीं होता। जब तक इष्टदेव आज्ञा न दें, तब तक घर छोड़ना पाप है और जब आज्ञा दे दें, तब घर में रहना महान् पाप है। इसलिए घर में ही रहकर आज्ञा की स्थिति प्राप्त करो। सहसा छोड़ने से मन का ग्रसन (गृहस्थी) नहीं छूटता, पुराने गुणधर्म पीछे लगे रहते हैं।
‘गुन सुभाव त्यागे बिनु दुरलभ परमानन्द।’
‘बिना विचारे जो करे, सो पीछे पछताय।
काम बिगारे आपनो, जग में होत हँसाय।।’
यदि जल्दीबाजी करनी ही है तो प्रार्थना इत्यादि में करो, बाहर की जल्दीबाजी में काम बिगड़ जाता है।
प्रश्न– महाराजजी! कृपा बनी रहे, जिससे मैं भजन कर लूँ।
उत्तर– तुम भजन कहाँ से कर लोगे? कैसे पता पाओगे कि भजन क्या है? जो कुछ भी शुरू करते हो, यह केवल भजन की प्रवेशिका मात्र है, जिसे प्राथमिक स्तर की संज्ञा दी जाती है। हमारे स्वरूप को हृदय से पकड़ो। धीरे-धीरे जब पकड़ कार्य करने लगेगी तब आत्मा रथी बनकर हृदय से पथ-संचालन करने लगेगी। ऐसी स्थिति में तुम समझ सकोगे कि भजन कब होता है और कब नहीं होता? आँख बन्द कर प्रयास करना तो प्रवेशिका का प्रयत्न मात्र है। जब तक इष्टदेव हृदय से रथी होकर शुभाशुभ और ऊँच-नीच की स्थिति नहीं समझाने लगते, तब तक भजन नहीं होता। हाँ, प्रयास निरर्थक नहीं जायेगा; क्योंकि यही प्रवेश करने का माध्यम है। भजन कोई करता नहीं बल्कि सद्गुरु ही कराते हैं।
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(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)