सनातन-धर्म

सनातनधर्म

धर्म के लिए झगड़े व्यर्थ हैं। विश्वभर में धर्म एक है, यदि दो है तो धोखा है। जिसमें सत्य नहीं, वह धर्म नहीं। धर्म में सचाई नहीं है तो जीवन भी निरर्थक है।स्वामी अड़गड़ानन्द

बन्धुओ!

इस संसार में छोटे-से कीट से लेकर चक्रवर्ती सम्राट तक सभी किसी-न-किसी दुःख से निवृत्ति का यत्न करते हैं फिर भी दुःखों से छुटकारा नहीं मिलता। मृगतृष्णा के सदृश जिन विषयों के पीछे मनुष्य सुख समझकर दौड़ता है, प्राप्त होने पर वे भी दुःख ही सिद्ध होते हैं। लगता है, सुख कहीं इसके आगे है। इसीलिये आदिशास्त्र गीता में भगवान ने बताया- ‘अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्।’ (गीता, ९/३३)- सुखरहित क्षणभंगुर शरीर पाकर मेरा भजन कर! इसी उपदेश पर चलकर पूर्व मनीषियों ने दुःख से परे सुख और नश्वर से परे शाश्वत की खोज आरम्भ की। उन्होंने शोध का परिणाम घोषित किया, श्रृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः (श्वेताश्वतर उप०, २/५)- अमृत-अंश विश्वभर के लोग सुनें। वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम्– मैंने उस परम पुरुष परमात्मा को भली प्रकार जान लिया है, जो आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्– प्रकाशस्वरूप और तम से परे है। तमेव विदित्वाति मृत्युमेति– केवल उसी को जान लेने पर मृत्यु से छुटकारा मिल सकता है। नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय (श्वेताश्वतर उप०, ३/८; यजुर्वेद, ३१/१८)- इसके अतिरिक्त अन्य कोई शाश्वत सुख का मार्ग नहीं है।

अन्वेषण के इसी क्रम में याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी की कथा आती है। याज्ञवल्क्य का मन जब सांसारिक भोगों से तृप्त न हुआ तो ऋषियों से मिले, उनसे साधन-क्रम समझा और इसी परमात्मा की शोधहेतु जंगल में जाने लगे। अपनी भार्या मैत्रेयी को धन-दौलत देने लगे। मैत्रेयी ने पूछा- ‘‘क्या इस सम्पत्ति से मैं अमर हो जाऊँगी?’’ याज्ञवल्क्य ने कहा- ‘‘नहीं, इससे इतना ही होगा कि जैसे धनी लोग जीवन-निर्वाह करते हैं, वैसे ही तुम भी करोगी।’’ मैत्रेयी ने कहा- ‘‘तो फिर यह सब लेकर भी क्या करूँगी, जिससे मृत्यु का भय बना रहे। वह वस्तु दीजिये जिससे मैं अमर हो जाऊँ, कोई शोक न रहे।’’ याज्ञवल्क्य ने उसे भी एक परमात्मा की प्राप्ति की विधि बतायी। आज भी वैदिक युग की महान् नारियों में मैत्रेयी का नाम श्रद्धा से लिया जाता है।

जीवन और मृत्यु के इसी रहस्य को जानने के लिए, दुःखों से बचने और समस्त प्राणियों को बचाने की विधि बताने के लिए ही गौतम बुद्ध ने प्रतिज्ञा की कि जब तक मैं इसे जान नहीं लूँगा, तब तक राजधानी कपिलवस्तु के भीतर पैर नहीं रखूँगा। महात्मा ईसा कहते हैं- (For what it is a man profited if he shall gain the whole world and lose his soul.) ‘‘इससे बड़ी हानि क्या होगी कि आदमी संसार भर का वैभव पा जाय; किन्तु अपनी आत्मा को ही खो दे। पहले ईश्वर के राज्य में प्रवेश पा लो, बाकी सभी चीजें तुम्हें अपने आप मिल जायेंगी।’’ मुहम्मद साहब भी कहते हैं- ‘‘बड़ा नुकसान उठाया उन्होंने, जिन्होंने अल्लाह को न जाना।’’ इस प्रकार सभी महापुरुषों का एक ही निर्णय रहा कि दुःखों से बचने के लिए, शाश्वत शान्ति और भौतिक समृद्धि के लिए भी परमात्मा को विदित कर लेना आवश्यक है।

स्मरणीय है कि सृष्टि के आदि में अविनाशी योग का उपदेश भगवान ने सूर्य को किया था। वह आदि धर्मशास्त्र था। सूर्य से उसी को मनु ने अपनी स्मृति में धारण किया। इस स्मृति को अक्षुण्ण रखने के लिए महर्षि व्यास ने इसी आदिशास्त्र को सूत्र रूप में भगवान श्रीकृष्णोक्त गीता और उसका विस्तार वेद के रूप में प्रस्तुत किया। वेदग्रन्थों की संख्या चार है, जिसे कालान्तर में समझने-समझाने के लिए आचार्यों ने उपवेद, वेदांग, ब्राह्मण-ग्रन्थ, आरण्यक और उपनिषदों की रचना की।

सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति (कठोपनिषद्, १/२/१५)- सभी वेद जिस एक परमात्मा का मनन करते हैं, उसी परमात्मा को देखने की विधि का वर्णन मुनियों ने सूत्ररूप में दर्शनशास्त्रों में किया। दृश्यते अनेन इति दर्शनम्– जिसके द्वारा उसे देखा जाय, ऐसे छः शास्त्र – सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदान्त के नाम से प्रसिद्ध हैं; किन्तु इसके अनुयायी ‘ईश्वर उपादान कारण है अथवा निमित्त कारण?, साधक अन्त में ईश्वर बन जाता है कि ईश्वर के समान?’- इन्हीं प्रश्नों में बाल की खाल निकालते-निकालते द्वैत, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत, द्वैताद्वैत इत्यादि साम्प्रदायिक संगठनों में संकुचित होते गये। शास्त्रार्थ प्रधान बन बैठा। हृदयस्थ परमपुरुष के शोध की क्रिया धूमिल पड़ गयी। एक धर्म के स्थान पर तान्त्रिक, पाशुपत, पांचरात्र, शाक्त, सौर, गाणपत्य, शैव, वैष्णव, नागपंथी, जैन, बौद्ध, हीनयान, महायान, ब्रजयान, सौतांत्रिक, वैभाषिक, योगाचार, माध्यमिक, श्वेताम्बर, दिगम्बर, दक्षिणमार्गी, वाममार्गी- न जाने कितने सम्प्रदायों और परस्पर विरोधी पूजा-पद्धतियों का बाहुल्य हो चला। शाश्वत का पुजारी नश्वर के पीछे भटकने लगा।

आजकल संसार में प्रचलित प्रचार-प्रसार विरत सनातनी, हिन्दू, जैन, सिख, पारसी, यहूदी तथा प्रचार व संख्या-विस्तार में लगे बौद्ध, ईसाई और इस्लाम विचारधाराएँ धर्म नहीं हैं। महापुरुष प्रत्येक देश-काल में होते आये हैं। उनके उपदेशों को जीवित रखने के लिए संस्थाएँ बनायी जाती हैं, ग्रन्थ लिखे जाते हैं और उनकी मूर्ति भी बना ली जाती है- आदर्श पुरुष की स्मृति के लिए। किन्तु कालान्तर में संस्थाएँ, पूजन-स्थल, उनकी गद्दी पर बैठनेवाले आचार्य और उनके द्वारा परिवर्द्धित क्रियायें ही धर्म बन जाती हैं। महापुरुष गौण बना दिया जाता है। मन्दिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारों में जाना ही धर्म बन गया है। राम, कृष्ण, ईसा और नानक के नाम धूमिल पड़ गये हैं। धर्म के स्थान पर प्रचलित ये विचारधाराएँ नाम तो लेती हैं आध्यात्मिकता का, जो उनमें से कब की विस्मृत हो चुकी है; उनमें रह गई है केवल असहिष्णु संगठन वृत्ति। हाँ, दूसरे सम्प्रदायों से लड़ने के लिए सभी एक हैं।

अपने को सनातन कहनेवाला हिन्दू-धर्म भी दो भागों में बँटा है- श्रौत-धर्म और स्मार्त-धर्म। श्रौत-धर्म में संस्कार और कृतियाँ आती हैं, जिनका उल्लेख वैदिक संहिताओं में है, जैसे- अग्नियों की प्रतिष्ठा, यज्ञ और सोमकृत्य, जिन्हें आज का समाज जानता भी नहीं। स्मार्त-धर्म में उन कर्तव्यों की चर्चा है जिनका वर्णन मनु तथा अन्य महापुरुषों के नाम से प्रचारित तथाकथित स्मृतिग्रन्थों में है, जिन्हें धर्मशास्त्र भी कहा जाता है।

इन तथाकथित धर्मशास्त्रों में धर्म के कई रूप मिलते हैं, जैसे- विशिष्ट धर्म वह है जिसका पालन वर्ण-विशेष अथवा आश्रम-विशेष के सदस्यों द्वारा आवश्यक ठहराया गया है, जैसे- अपनी जीविका के लिए ब्राह्मण अध्ययन-अध्यापन, यज्ञ और दान का आश्रय ले। क्षत्रिय रक्षा-कार्य देखे। वैश्य कृषि, गो-रक्षा और व्यापार करे तथा शूद्र सेवा करे। आश्रम-धर्म में जीवन के प्रारम्भिक पचीस वर्षों तक विद्याध्ययन, पचास वर्षपर्यन्त शादी-विवाह और परिवार का पालन-पोषण, इसके उपरान्त वानप्रस्थ आश्रम में गृह त्यागकर विषयों के प्रलोभन से मुक्त होने का प्रयास तथा पचहत्तर वर्ष के बाद मोक्ष-साधन की योजना रखी गयी।

सामान्य धर्म वे हैं, जिनका पालन सभी को करना था, जैसे- किसी जीव को कष्ट न देना, सच बोलना, लेन-देन में ईमानदारी बरतना, दान-दया-क्षमा। इनके साथ ही चोरी, व्यभिचार, अभक्ष्य भोजन, ईर्ष्या, चुगलखोरी, मान-सम्मान, छल-कपट इत्यादि का त्याग तथा यज्ञ, दान और तप इत्यादि काम्यकर्मों को अपने स्वार्थ के लिए न करना धर्म बताया गया है।

निमित्त धर्म विशेष अवसरों पर किये जाते हैं। देश-धर्म और युग-धर्म की भाँति आपत्ति काल में इन नियमों में दी गई शिथिलता को आपद्-धर्म तथा राजकीय कर्तव्यों को राजधर्म कहा गया है। परधर्म उसको कहा गया, जिसके अनुयायी भिन्न हों। इसी प्रकार चल-धर्म कुछ काल तक ही रहनेवाले धर्म और धर्माभास को कहा जाता है। यह राजा का कर्तव्य है कि जो इन धर्मों से च्युत हो रहे हैं, उन्हें इनकी ओर बढ़ने के लिए नियन्त्रित करे।

आप विचार करें कि धर्म की इस अवधारणा में परमात्मा की खोज किस सीमा तक है? यह मात्र सामाजिक व्यवस्था है। चार वर्णों के रूप में यह समाज का स्तरीकरण और चार आश्रमों के रूप में मानव-आयु का स्तरीकरण मात्र है। समाजविरोधी कार्यों के उन्मूलन की जो व्यवस्था आज राज्य करता है, वही कार्य प्राचीनकाल में ये तथाकथित स्मृतियाँ धर्म के नाम पर कराती थीं – क्या यह धर्म है?

सनातन-धर्म के नाम पर रूढ़ियाँ और कुरीतियाँ पूजी जा रही हैं। संसार भर में हिन्दू सबसे अधिक श्रद्धा से भजन करता है; किन्तु सबसे बड़ा अधार्मिक भी वही है। जाति, देवता और भ्रान्तियाँ – बस इतना ही तो सनातन-धर्म रह गया है।

यदि वर्ण और आश्रम-व्यवस्था ही सनातन-धर्म है, तब तो यह शूद्रों के लिए बेकार है। धर्म के एक भी वाक्य पर विचार करने मात्र से उनके लिए नरक आरक्षित है। उन्हें पढ़ने का अधिकार ही नहीं था। ब्रह्मचर्य आश्रम उनके लिए नहीं था फिर उन्हें संन्यास क्यों होता? जब बुनियाद ही समाप्त हो गई तो मकान कैसे बनेगा? उन्हें सिखाया ही कब गया कि वे वैराग्य के लिए तड़पें? यदि यही सनातन-धर्म है तब तो यह समाज के गिने-चुने विशेषाधिकार प्राप्त लोगों का धर्म है।

आधुनिक सुधारवादी आचार्य देशसेवा, सदाचार और परस्पर मानव-प्रेम को ही सनातन-धर्म मान बैठे हैं। यदि यही सनातन-धर्म है तब तो आपको ये गुण विदेशों से सीखने होंगे; क्योंकि देशभक्ति, ईमानदारी के क्षेत्र में आपसे कहीं अच्छे कीर्तिमान् विदेशों में स्थापित हैं। फिर भारत विश्वगुरु कैसा? पचास करोड़ हिन्दुओं के बीच तैंतीस करोड़ से भी अधिक देवता, उनके हिस्से में पड़नेवाला डेढ़-डेढ़ हिन्दुओं का संगठन ही क्या सनातन-धर्म है?

वस्तुतः ये धर्म नहीं, बल्कि भयंकर भ्रम हैं। इन्हीं सबों ने देश को गुलाम बनाया – राजनीति ढंग से और वैचारिक ढंग से भी। जैसा समय रहा, परिस्थिति रही, उसी के अनुसार ये सामाजिक हथकण्डे धर्म के नाम पर अपनाये गये। किसी समय की सती-प्रथा की तरह आज भी जाति-प्रथा, अस्पृश्यता, वेश्यावृत्ति, देवदासी-प्रथा, बाल-विवाह, दहेज-प्रथा, नशाखोरी, विवाह-तलाक, शाकाहार-माँसाहार, पेशों का निर्धारण, जनसंख्या-नियोजन इत्यादि विशुद्ध सामाजिक समस्याएँ हैं, जिन्हें सुलझाने के लिए समाज और समाज के बहुमत पर आधारित शासन-तन्त्र है। यह न तो धर्माचार्यों का क्षेत्र है और न उन्हें इसमें टाँग अड़ाना चाहिए।

मानव-समाज गतिशील है अतः सामाजिक व्यवस्था के सम्बन्ध में आज के उपयोगी नियम, प्रथाएँ, आचार-विचार, आहार-विहार इत्यादि भी कल की परिस्थिति में अनुपयोगी हो सकते हैं, इसलिए यह आवश्यक नहीं है कि जिन रीति-रिवाजों और संस्थाओं को हमारे पूर्वजों ने स्थापित किया, उन्हें हम उनकी धरोहर समझकर ज्यों-का-त्यों अपनाये रहें। धर्म के नाम पर प्रचारित इन रिवाजों में काव्य है, चरित्र संगठन है तथा सामाजिक व्यवस्था भी निःसन्देह है; किन्तु यह धर्म कैसे हो गया? एक समय वही आवश्यक था, आज बाधक है- यह पहचानकर हम आदर के साथ उसका विसर्जन कर सकते हैं और इनके विसर्जन के दिन आये भी हैं।

प्राचीनकाल की यज्ञ-प्रथा, बलि-प्रथा, दास-प्रथा, स्वयंवर-प्रथा समाप्त हो गयी। इन्द्र और वरुण की पूजा तिरोहित हो गई, उनके स्थान पर ब्रह्मा, विष्णु, महेश और नये-नये देवी-देवता स्थानासीन हुए। सोमयज्ञ के स्थान पर अखण्ड कीर्तन और अखण्ड रामायण हो रहा है। स्त्रियों और शूद्रों-सम्बन्धी निर्देश, भोजन, बर्तन, पहनावा, पेशा सभी कुछ तो बदलते जा रहे हैं। यदि यही सनातन-धर्म था तो बदल क्यों रहा है? जो बदल जाय, वह सनातन कैसा?

सनातन तो सदैव रहनेवाली सत्ता का नाम है। वह सत्ता है परमात्मा। एक ही परमात्मा सर्वत्र व्याप्त पहले भी था, आज भी है। यदि परमात्मा भी दो हैं तो उनके व्याप्त होने के लिए अलग-अलग सृष्टि चाहिए। वह एक ही है और रहेगा। उस एक को खोजना ही धर्म है, जैसा कि ऋषियों ने जाना था। सृष्टि में धर्म एक ही है- अमृत-तत्त्व की प्राप्ति, सदा रहनेवाले शाश्वत धाम की प्राप्ति। चराचर जगत् का धर्म एक ही है। यदि धर्म भी दो हैं तो एक में धोखा है, जरूर धोखा है।

‘धर्म’ शब्द आज केवल विशेषण बनकर रह गया है। स्थूल-धर्म, सूक्ष्म-धर्म, उप-धर्म, कुल-धर्म, गुण-धर्म, श्रौत-धर्म, वर्ण-धर्म, आश्रम-धर्म और भी बहुत से हैं। जो धर्म अभी कहे गये- इतने धर्मों के बीच वास्तविक धर्म अपनी पहचान खो चुका है। धर्म शब्द को उसके शुद्ध रूप में पुनर्प्रतिष्ठित करने से व्रत-उपवास, तीर्थ-त्यौहार, शुद्धि-श्राद्ध, देवी-देवता, भूत-प्रेत, वृक्ष-पशु, नागपूजा तथा मूर्ति-मजारों की पूजा-जैसी कुरीतियाँ तो जल ही जायेंगी। सामाजिक नीति एवं अर्थ-व्यवस्था की उपयोगी बातों को भी धर्म कहना छोड़ना होगा। आज के परिवेश में यह स्पष्ट करना जरूरी हो गया है कि धर्म के अन्तर्गत केवल एक बात आती है- वह निर्धारित क्रिया, जिसे करने से आत्म-साक्षात्कार होता है।

धर्म का शुद्ध स्वरूप जानने के लिए धर्म जिनकी देन है, उन महापुरुषों द्वारा समझना होगा और उनकी शरण जाना होगा, अन्य कोई रास्ता नहीं है। पोथी को पढ़कर और पोथी के इर्द-गिर्द घेरा डालकर कोई धर्म को नहीं समझ सकता। वेद-शास्त्र सही तो हैं; लेकिन शास्त्र कोई विरला महापुरुष ही जानता है और उसके निर्देशन में कोई विरला पथिक ही पढ़ता है। सब न पढ़ते हैं, न जानते हैं। वे महापुरुष ही शास्त्र को अक्षरशः जानने में सक्षम हैं, जिनके हृदय में वह शास्त्र उतर आया है।

वेद क्या है? उस परमात्मा की वाणी! परमात्मा तो बोलने आया नहीं। बोलनेवाले सौ-सवा सौ महापुरुष ही थे। कहीं नारायण ऋषि हैं तो कहीं कोई ऋषि। उन ऋषियों के अन्तःकरण में जो प्रस्फुटित हो रहा था, बुद्धि मात्र यन्त्र थी। उनके द्वारा जो व्यक्त होता था, परमात्मा अपना निर्देशन दे रहा था। उन महापुरुषों की वाणी का संकलन वेद है। आज भी जो इष्ट की परिधि में पहुँचेगा, उसके हृदय-देश में वह इष्ट अपनी वाणी, अपना निर्णय देगा कि सत्य क्या है, झूठ क्या है? जिसके हृदय में इष्ट जागृत है, जिसके हृदय में शास्त्र अवतरित हो रहा है, वही भली प्रकार जान पाता है कि पुराने शास्त्रों में क्या लिखा है? क्योंकि जो बात उनमें उतरी थी, वही इनमें उतर रही है। अस्तु, आइए देखें कि महापुरुषो ने ‘धर्म’ शब्द को किन अर्थों में लिया है? वैसे धर्म शब्द ‘धृ’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है- धारण करना। धारयतीति धर्मः। परमात्मा ही सबको धारण करने में सक्षम है, वही एकमात्र धर्म है। धर्म वह है कि जब हम उसकी ओर झुकाव लें तो वह हमें धारण कर ले, मार्ग बताने लगे, उँगली पकड़कर चलाने लगे, हृदय से रथी बन जाय, हृदय में ईश्वरीय आदेशों का सूत्रपात होने लगे।

यही मीमांसाकार जैमिनि कहते हैं कि चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः। (जैमिनी सूत्र, १/१/२) ईश्वरीय आदेशों का पालन ही धर्म का लक्षण है। अर्थात् जब तक हृदय से रथी होकर वह निर्देश न देने लगे और उसके अनुसार हम चलना आरम्भ न कर दें, तब तक सही मात्रा में धर्म के लक्षण प्रगट ही नहीं हुए।

‘वैशेषिक दर्शन’ में महर्षि कणाद कहते हैं- यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः।– जिसके द्वारा जीवन की हर परिस्थिति में सर्वांगीण विकास हो तथा जो निःश्रेयस परमश्रेय की प्राप्ति करा दे, वही धर्म है।

न्यायशास्त्र के प्रणेता गौतम कहते हैं, विहित कर्मजन्यो धर्मः।– धर्म विहित कर्मजन्य है। विहित कर्म, नियत कर्म, कार्यं कर्म, पुण्य कर्म इत्यादि को गीता में एक ही ईश्वर-प्राप्ति की क्रिया कहकर सम्बोधित किया गया है जो यज्ञ की प्रक्रिया है, चिन्तन-विशेष है, आत्मदर्शन की पद्धति है।

योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार, अपने स्वभाव की क्षमता से नियत कर्म (यज्ञ की प्रक्रिया) का आचरण धर्माचरण है। आत्मा जिस विधि से विदित होती है, उस विधि को क्रियान्वित करते रहना धर्म का आचरण है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि तुम्हारी बुद्धि इसे क्रियान्वित करने में सक्षम न हो, तो सारे धर्मों की चिन्ता छोड़कर एकमात्र मेरी शरण में आ जाओ- यही है धर्म।

भगवान बुद्ध ने बताया कि सम्यक् वाणी, सम्यक् दृष्टि, सम्यक् जीविका, सम्यक् कर्म, सम्यक् संकल्प, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति और सम्यक् समाधि का जो भली प्रकार आचरण करता है, वह परिनिर्वाण को पा जाता है।

महाराज मनु के नाम से प्रचारित स्मृति-ग्रन्थ में यत्र-तत्र गीता के ही अंष हैं जिसमें धर्म के दस लक्षण बताये- धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रिय-निग्रह, धी, विद्या, सत्य और अक्रोध (मनुस्मृति, ६/९२)। अध्याय २/१ में कहते हैं- विद्वद्भिः सेवितः सद्भिर्नित्यमद्वेषरागिभिः। हृदयेनाभ्यनुज्ञातो यो धर्मस्तं निबोधत।। विद्वानों ने राग-द्वेषरहित हृदय से जिसे प्राप्त किया, उस नित्यपथ का सेवन धर्म है।

विद्वान् का अर्थ शिक्षाविद् नहीं होता। विद्या हि का ब्रह्मगति प्रदाया।– विद्या वह है कि जिसके पास आवे, उसे घसीटकर ब्रह्मगति प्रदान कर दे। वनवासकाल में भगवान राम ने लक्ष्मण से बताया कि विद्या और अविद्या माया के दो पहलू हैं। अविद्या अधोगति और भवकूप में डालनेवाली है। विद्या परमश्रेय को दिलानेवाली है, लेकिन वह है हरिप्रेरित। हम जिस सतह पर खड़े हैं, जिस परमात्मा की हमें चाह है, वह हृदयदेश से जागृत हो जाय, हमें प्रेरित कर चलाने लगे।

यही कारण है कि योगपथ के जितने भी अच्छे विद्वान् हुए, पार्थिव शिक्षा-दीक्षा में शून्य थे। उग्र बुद्धिवाले काकभुशुण्डिजी उसे सुनते-समझते भी थे; किन्तु अच्छा नहीं लगा, नहीं पढ़े, फिर भी अपने युग के सर्वोपरि विद्वान् थे। जिस ज्ञानी गरुड़ का सन्देह ब्रह्मा भी दूर न कर सके, काकभुशुण्डि-आश्रम में जाते ही उनकी शंकायें दूर हो गयीं, समाधान निकल आया। तात्पर्य यह है कि भगवत्पथ में जिस विद्या का उपयोग है, उसे भगवान ही पढ़ाते हैं।

अतः जो व्यक्ति एक परमात्मा में अटूट श्रद्धा और ॐ अथवा राम (जो उस परमात्मा का परिचायक है) का स्मरण करता है, वह धर्म को न जानते हुए भी शुद्ध धार्मिक है।

इस प्रकार सभी महापुरुष एक ही परमात्मा को इंगित करते हैं, फिर भी लोग शाश्वत एकमात्र परमात्मा के स्थान पर नश्वर के पीछे भटक रहे हैं। धर्म के नाम पर आजकल जैसी कुरीतियाँ और रूढ़ियाँ फैली हैं, कुछ इसी प्रकार की रूढ़ियाँ श्रीकृष्णकाल में भी थीं। उनमें से कुछेक रूढ़ियों का शिकार अर्जुन भी था- कुल की रक्षा को सनातन-धर्म मानता था, पितरों को पिण्डा-पानी देना सनातन-धर्म मानता था। कहने लगा कि ऐसा युद्ध करने से सनातन-धर्म नष्ट हो जायेगा, क्योंकि कुलधर्म ही सनातन-धर्म है; किन्तु योगेश्वर ने कहा- अर्जुन! इस विषम स्थल में तुझे यह अज्ञान कहाँ से उत्पन्न हो गया? अर्जुन सनातन-धर्म की रक्षा के लिए आहें भर रहा था। तो क्या सनातन-धर्म की रक्षा भी अज्ञान है? श्रीकृष्ण ने बताया कि जिन बातों के लिए तू विकल है, न तो श्रेष्ठ पुरुषों ने इस पर कभी कदम रखा है, न यह कीर्ति बढ़ानेवाला है और न ही स्वर्ग देनेवाला है। कल्याण नहीं, कीर्ति नहीं, सम्भावित पुरुषों ने भूलकर भी कभी आचरण नहीं किया, तो सिद्ध है कि वह सब अज्ञान था।

तब अर्जुन ने विनीत भाव से पूछा- भगवन्! यदि यह धर्म नहीं है तो मैं धर्म नहीं जानता। धर्म के रास्ते में मैं विशेष रूप से मूढ़चित्त हूँ। अतः जो निश्चित रूप से कल्याणकारी है, वह आप मेरे प्रति कहिये।

भगवान ने बताया- अर्जुन! असत् वस्तु का अस्तित्व नहीं है और सत् वस्तु का तीनों कालों में अभाव नहीं है। वह सत्य क्या है? तब कहते हैं- अर्जुन! यह आत्मा ही सत्य है, आत्मा परम सत्य है, आत्मा ही सनातन है और ये सम्पूर्ण भूतादिकों के शरीर नाशवान् हैं। इनका कोई अस्तित्व ही नहीं है। शरीरों को रोका नहीं जा सकता। आत्मा ही शाश्वत है।

आप कौन हैं? सनातनधर्मी! सनातन क्या है? आत्मा! तो सनातनधर्मी कौन हुआ? आत्मा का पुजारी! यदि आत्मिक पथ की जानकारी नहीं है तो हम सनातनधर्मी कैसे हो गये? इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि इसे जला नहीं सकती, वायु सुखा नहीं सकता, जल इसे गीला नहीं कर सकता, आकाश इसे अपने में समाहित नहीं कर सकता। पंचतत्त्वों से निर्मित कोई भी पदार्थ जब इस आत्मा का स्पर्श ही नहीं कर पाते, तब भला पंचतत्त्वों से निर्मित अन्न-जल इसका कैसे स्पर्श कर सकते हैं? फिर किसी के छूने से अथवा किसी के हाथ का दो ग्रास चावल खाने से, दो घूँट पानी पीने से हमारा शाश्वत, सनातन-धर्म नष्ट कैसे हो गया? सिद्ध है कि हमारे पूर्वज धर्म के नाम पर जिसका पालन करते थे, वह भूल थी तभी तो श्रीकृष्ण ने इसका खण्डन किया। यह भूल आज भी है जिसके कारण सगे भाइयों को हमने सनातन-धर्म से अलग होने के लिए विवश कर रखा है।

जब शरीर ही नाशवान् है, तब इसके जन्म पर आधारित जाति-व्यवस्था सनातन कैसे हो गई? शरीर-पोषण के लिए व्यवसाय पर आधारित वर्ण-व्यवस्था सनातन कैसे हो गई? अचलोऽयं सनातनः (गीता, २/२४)- यह सनातन आत्मा अचल है, शाश्वत है, अपरिवर्तनशील है, तो बदल कैसे गया? सनातनधर्मी का धर्म-परिवर्तन कैसे हो गया? क्या सनातन बदल गया? नहीं! और जिन्होंने इस प्रकार का परिवर्तन किया अथवा कर रहे हैं, वे केवल एक प्रकार की कुरीति छोड़कर दूसरी कुरीति में फँसते जा रहे हैं, न कि उन्हें कोई धर्म मिल रहा है। वे धर्म को जानते ही नहीं। यदि हम आत्मपथ को नहीं जानते, आत्मस्थिति दिला देनेवाली विधि-विशेष को नहीं जानते, तो सनातन-धर्म से हमारा कैसा सम्बन्ध? भूतादिकों के सम्पूर्ण शरीर नाशवान् हैं। ब्रह्मा से उत्पन्न चराचर जगत् परिवर्तनशील, अशाश्वत और क्षणभंगुर है, फिर भी कोई पेड़ पूज रहा है तो कोई पत्थर – वह भी सनातन के नाम पर!

आत्मा अकाट्य, अशोष्य और अपरिवर्तनशील है। वह सर्वत्र, सब में सदा एकरस है। उसे खोजने और पाने की स्थली हृदय-देश है, बाहर नहीं- हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति (गीता, १८/६१); किन्तु अकाट्य, अशोष्य, अजर-अमर जैसी कोई सत्ता भीतर दिखायी तो नहीं पड़ती, सूक्ष्मता से निरीक्षण करने पर शोक-सन्ताप, मृत्यु और मोह ही दिखायी पड़ता है। इस पर भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि यह आत्मा है तो ऐसा ही; किन्तु अचिन्त्य और अगोचर है। जब तक चित्त और चित्त की लहर है, तब तक वह अगोचर है, दिखाई नहीं देता। अगोचर का यह अर्थ नहीं कि भगवान इन्द्रियों के रहते दिखायी ही नहीं देंगे। वे दिखायी देंगे किन्तु संयम के पश्चात् उन प्रभु की दृष्टि से। एकादस अध्याय में उन्होंने स्वयं कहा कि अनन्य भक्ति से मुझे देखा जा सकता है और मुझमें प्रवेश पाया जा सकता है।

अब एक नवीन प्रश्न खड़ा हो गया कि चित्त का निरोध कैसे हो? इसके लिए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! तू कर्म कर। वह नियत कर्म है यज्ञ को कार्यरूप देना। आरम्भ में दैवी सम्पद् के गुणों को हृदय में भली प्रकार धारण करना यज्ञ है, आहार और इन्द्रियों का संयम यज्ञ है। साधना सूक्ष्म होने पर श्वास-प्रश्वास का जप यज्ञ है। यज्ञस्वरूप महापुरुष का ध्यान करना यज्ञ है। इस प्रकार चौदह अंगों से यज्ञ का चित्रण अध्याय चार में प्रस्तुत किया, जो सब मिलाकर चित्त के निरोध की विधि-विशेष हैं, जिनके आचरण से प्राणों का आयाम हो जाता है- न भीतर से संकल्प उठते हैं और न बाह्य वायुमण्डल के संकल्प अन्दर प्रवेश कर पाते हैं। यही चित्त की अचिन्त्य अवस्था है, मन की निरोधावस्था है, साम्यावस्था है।

प्राणों का व्यापार शान्त होते ही यज्ञ पूरा हो जाता है, परिणाम निकल आता है, जैसा कि अगले ही श्लोक में कहते हैं- यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्। (गीता, ४/३१)- यज्ञ के पूर्तिकाल में यज्ञ जिसकी संरचना करता है, वह अमृत है। उस ज्ञानामृत को प्राप्त करनेवाला योगी सनातन ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है। पहले कहा- आत्मा सनातन है, यहाँ कहते हैं- ब्रह्म सनातन है। वस्तुतः आत्मा, परमात्मा, तत्त्व, परमतत्त्व, ईश्वर, सच्चिदानन्द, भगवान, शाश्वत, ब्रह्म इत्यादि एक ही परमात्मा के विविध नाम हैं।

इस प्रकार चित्त की अचिन्त्यावस्था में, निरोधावस्था में वह अगोचर सनातन इन्हीं इन्द्रियों में प्रवाहित हो गया। प्रवाहित ही नहीं, प्राप्त हो गया; किन्तु इतने पर ही योगेश्वर श्रीकृष्ण नहीं रुकते। वे यह भी स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति।; जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई। (मानस, २/१२६/३)। उन्हीं के शब्दों में देखें- इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः। (गीता, ५/१९)- उन पुरुषों द्वारा जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया, जिनका मन समत्व में स्थित है। अब समत्व की स्थिति से और संसार को जीतने से क्या सम्बन्ध है? यदि संसार जीत ही लिया तो वह गया कहाँ? रुका कहाँ पर? इस पर कहते हैं कि ‘निर्दोषं हि समं ब्रह्म’- वह ब्रह्म निर्दोष और सम है, इधर उसका मन भी समत्व की स्थितिवाला हो गया। तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः– इसलिए वह ब्रह्म में स्थित हो जाता है।

यह स्थिति जिस यज्ञ से मिली है, उसी यज्ञ को कार्यरूप देना कर्म है। इसलिए कर्म पर बल देते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने गीता, अध्याय २ के ३९वें श्लोक में बतलाया कि अब तू निष्काम कर्मयोग के विषय में सुन, जिससे युक्त हुआ तू कर्मों के बन्धन को भली प्रकार नष्ट करेगा। अतः कर्म उसे कहते हैं जो कर्म-बन्धन से छुड़ा दे। इस नियत कर्म की दूसरी विशेषता बताते हैं- नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति– इस निष्काम कर्मयोग में आरम्भ का नाश नहीं होता। अगर कर्म आरम्भ भर कर दे तो उस पुरुष का और उस क्रिया का कभी नाश नहीं होता, कल्याण करके ही छोड़ेगा। अभी हुआ नहीं, किन्तु कल्याण का आरक्षण भली प्रकार हो चुका। इस जन्म में जहाँ से साधन छूटता है, अगले जन्म में वहीं से शुरू करता है। दो-चार जन्म के अन्तर से वहीं पहुँच जाता है, जिसका नाम परमगति है। इसी कर्म की तीसरी विशेषता बताते हैं कि प्रत्यवायो न विद्यते– इस कर्म को करने से विपरीत और सीमित फलरूपी दोष भी नहीं मिलता कि आपको स्वर्ग-बैकुण्ठ, ऋद्धियों-सिद्धियों, धर्मशाला-पाठशाला, आश्रम या लिप्सा में उलझाकर खड़ा कर दे। चौथी विशेषता है कि स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्। (गीता, २/४०)- इस धर्म का थोड़ा-सा भी पालन जन्म-मृत्यु के महान् भय से उद्धार करनेवाला होता है।

किस धर्म का? इसी नियत कर्म का आचरण ही धर्म है। यहीं से धर्म का आचरण शुरू होता है, जिसके परिणाम में सनातन विदित हो जाता है। जिस कर्म का आचरण ही धर्म है, उसी कर्म को योगेश्वर श्रीकृष्ण ने साधकों की अन्तःदुर्बलता के आधार पर चार भागों में बाँटा। अध्याय ४ के १३वें श्लोक में वे कहते हैं कि चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं’- चार वर्णों की संरचना मैंने की। तो क्या मनुष्यों को चार भागों में बाँटा? कहते हैं कि नहीं, गुणकर्मविभागशः (गीता, ४/१३)- गुणों के माध्यम से कर्म को चार भागों में बाँटा।

गुण इस विभाजन का मापदण्ड है। जब अन्तःकरण में तामसी गुण का बाहुल्य है तब आलस्य, निद्रा, प्रमाद, कर्त्तव्य-कर्म में न प्रवृत्त होने का स्वभाव, अकर्त्तव्य-कार्यों को न पहचानने का स्वभाव होगा। मोहमयी प्रवृत्तियों का दबाव रहता है। दो घण्टे ध्यान लगाता है तो दस मिनट भी मन की स्थिरता अपने पक्ष में नहीं पाता- ऐसी परिस्थिति में धर्म का आचरण कहाँ से शुरू करे? इस पर कहते हैं, परिचर्यात्मकं कर्म (गीता, १८/४४)- इसी कर्म को सेवा से शुरू करो।

ठीक इसी प्रकार अर्द्ध-तामसी गुण समाप्त हो गये हैं तो वैश्य है। ध्यान में मन लगने लगेगा, इन्द्रिय-संयम की क्षमता होगी। तामसी गुण के साथ आधा राजसी गुण भी शान्त हो गया और आधा सात्त्विक गुण भी आ गया, तहाँ क्षत्रिय वर्ण की योग्यतावाला है। वह प्रकृति के द्वन्द्व में न घबड़ाने का स्वभाववाला, शौर्य-तेज से संयुक्त होगा और इसी निष्काम कर्म को भली प्रकार चरितार्थ करेगा। तामसी और राजसी गुण बिल्कुल शान्त हो गये हों, सात्त्विक गुण ही कार्य में हो, वहाँ उसके स्वभाव में ब्रह्म में प्रवेश दिला देनेवाली योग्यता होती है। अतः वह ब्राह्मण श्रेणी का व्यक्तित्व है। इसमें मन का शमन, इन्द्रियों का दमन, तप, धारणा, ईश्वरीय अनुभूति इत्यादि ब्रह्म में प्रवेश दिला देनेवाली योग्यता सहज ही स्वभाव में प्रवाहित है, इसलिए ब्राह्मण श्रेणी के कर्म का कर्त्ता है। यह सब स्वभावप्रभवैर्गुणैः (गीता, १८/४१)- स्वभाव में उत्पन्न हुए गुणों के आधार पर बनते हैं और इसी के अनुसार कर्म करना इस व्यक्ति का धर्म है।

अध्याय १८ के ४५वें श्लोक में योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं- स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।– स्वभाव से उत्पन्न कर्म की क्षमता के अनुसार कर्माचरण करके मनुष्य भगवत्-प्राप्तिरूपी परमसिद्धि को प्राप्त होता है। अर्जुन! जिस प्रकार स्वभाव में पायी जाने वाली क्षमता के अनुसार कर्म में लगा हुआ मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त होता है, उस विधि को तू मुझसे सुन। आप सब भी उस विधि पर ध्यान दें। (अध्याय १८, श्लोक ४६) विधि है कि जिस परमात्मा से सम्पूर्ण भूतों की उत्पत्ति हुई है, जो सर्वत्र व्याप्त है, उस परमात्मा को स्वभाव से उत्पन्न कर्म करने की क्षमता के अनुसार अर्चन करके, भली प्रकार श्रद्धा से पूजकर (जिसका चित्रण समूची गीता में स्थान-स्थान पर है) मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त होता है। इससे स्पष्ट है कि इस कर्म-पथ में एक परमात्मा का अर्चन, सर्वांगीण पूजन करना तथा क्रमागत सोपान से चलना ही मुख्य विधि है।

आगे इसी को धर्म कहकर सम्बोधित किया। (देखें- गीता, १८/४७) श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।– स्वभाव से उत्पन्न कर्म करने की क्षमता के अनुसार कर्म में प्रवृत्त होना हमारा धर्म है, दायित्व है। वह शूद्र श्रेणी का ही क्यों न हो, सेवावृत्ति पर खड़ा हो, तब भी इसी स्तर से करे तो यह परमश्रेय को दिलानेवाला है। यदि अन्दर क्षमता नहीं है और क्षमतावालों की नकल करना चाहें, भली प्रकार अनुष्ठान की भी कोशिश करें तब भी भय को ही प्राप्त होंगे, परमश्रेय को नहीं। इसलिए स्वभाव से उत्पन्न कर्म की श्रेणी के अनुसार धर्माचरण करके आप सम्पूर्ण पापों से अर्थात् जन्म-मृत्यु के चक्कर से मुक्त हो जायेंगे।

साथ ही, ब्राह्मण श्रेणी का कर्म भी दोषों से पूर्ण है; क्योंकि प्रकृति का अन्तिम सात्त्विक गुण अभी जीवित है। वहाँ भी पतन के लक्षण विद्यमान हैं, वह गिर भी सकता है। इसलिए गुण जब तक शान्त न हो जायँ, तब तक स्वभाव से उत्पन्न कर्म ही हमारा स्वधर्म है। इसका क्रमागत पालन करते हुए मनुष्य उस शाश्वत, अमृततत्त्व आत्मभाव को भली प्रकार विदित कर लेता है। दर्शन, स्पर्श और प्रवेश पा जाता है। इसलिए इस कर्म का पालन ही धर्म का पालन है।

गीता के अनुसार इस धर्माचरण का अधिकारी कौन है? कहीं आप यह तो नहीं मान बैठे हैं कि धर्म तो साधु-महात्माओं के लिए है, गृहस्थ इसे कर पायेगा या नहीं? इस पर कहते हैं (अध्याय ४/३६)- अर्जुन! तू सभी पापियों से भी अधिक पाप करनेवाला ही क्यों न हो (अध्याय ९ का तीसवाँ श्लोक भी कि अपि चेत्सुदुराचारो– अर्जुन! अत्यन्त दुराचारी भी), यदि अनन्य अर्थात् अन्य न, मुझे छोड़कर किसी अन्य देवता को न भजते हुए केवल मुझे भजता है, वह साधु ही मानने योग्य है; क्योंकि वह यथार्थ निश्चय से लग गया है। क्षिप्रं भवति धर्मात्मा (गीता, ९/३१)- वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहनेवाली शाश्वत शान्ति को प्राप्त कर लेता है।

अतः आप अत्यन्त दुराचारी ही क्यों न हों और अन्य बहुत से दुराचारों की योजना भी क्यों न बनाते हों, यदि एक परमात्मा के प्रति श्रद्धा और उसकी प्राप्ति की क्रिया – यज्ञ की प्रक्रिया कर्म में श्रद्धा के साथ लगते हैं तो आप सन्त हैं, शुद्ध धार्मिक हैं। हाँ, क्रिया के लिए तत्त्वदर्शी के प्रति श्रद्धा और सान्निध्य आवश्यक है। उस परमात्मा के अतिरिक्त सृष्टि में कुछ भी सत्य नहीं है, अन्य किसी के पूजन का विधान नहीं है।

नोट इतना स्पष्ट निर्देश होते हुए भी लोग पत्थर-पानी पूजते ही रहते हैं। कहते हैं- ‘क्या पत्थर में भगवान नहीं हैं? मूर्तिपूजा सगुणोपासना है। हृदय में ध्यान लगाना तो ज्ञानमार्ग है। वस्तुतः यह सब भ्रान्तियाँ हैं। आइये, गीता के ही आलोक में इस प्रश्न पर भी विचार कर लिया जाय।

योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि आत्मा अकाट्य है, अशोष्य है, सनातन है, अमृतस्वरूप है, सदा और सर्वत्र रहनेवाला यही एक शाश्वत है। प्रश्न उठता है कि- क्या आप भगवान होने के नाते ऐसा कहते हैं? श्रीकृष्ण ने समाधान किया कि- नहीं, अर्जुन! अजर-अमर-शाश्वत-सनातन-सर्वव्यापी-अमृतस्वरूप इत्यादि गुणधर्मों से युक्त आत्मा को तत्त्वदर्शियों ने भली प्रकार देखा है। किसने देखा? तत्त्वदर्शियों ने! न दस भाषा के विद्वान् ने देखा, न व्याकरण रटनेवाले ने और न किसी समृद्धिशाली ने देखा, बल्कि तत्त्वदर्शियों ने देखा। श्रीकृष्ण भी उसी सत्य का उद्घाटन कर रहे हैं, जिसको तत्त्वदर्शियों ने कभी देख लिया था। वह सत्य सदैव एक ही जैसा रहा। समय-समय पर उस सत्य के नाम पर भ्रान्तियाँ आती ही रही हैं। जितने भी महापुरुष संसार में हुए हैं, सबने इन भ्रान्तियों का निराकरण करके समाज को पुनः सत्य के उसी प्रशस्त पथ पर खड़ा किया है। श्रीकृष्ण ने भी वही कहा, जो ऋषिभिर्बहुधा गीतम् (गीता, १३/४)।

अब एक नवीन प्रश्न खड़ा हो गया कि वह तत्त्वदर्शन क्या है? तत्त्वदर्शी कौन है? क्या हम भी तत्त्वदर्शी हैं? इस पर अध्याय १८, श्लोक ५१-५३ में कहते हैं कि अर्जुन! तत्त्वदर्शन की चाहवाले पुरुष को चाहिए कि एकान्त-देश का सेवन करे। इन्द्रियों को विषयों से भली प्रकार समेटकर मन को ध्यान में लगावे। वैराग्य में रहते हुए (वैरागी का वेश बनाकर नहीं) सतत ध्यान में लगते-लगते काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर- ये बहिर्मुखी प्रवृत्तियाँ जब भली प्रकार शान्त हो जायँ तथा विवेक, वैराग्य, शम, दम, धारणा, ध्यान और समाधि भी परिपुष्ट हो जायँ, इनमें स्थिति आ जाय तो उस समय वह ब्रह्म को जानने योग्य होता है।

आवश्यकता तो थी तत्त्व की! एक नयी बात बीच में आ गई कि वह व्यक्ति ब्रह्म को जानने योग्य होता है। वस्तुतः तत्त्व, ब्रह्म, भगवान, आत्मा, ईश्वर सब एक ही हैं।

जिन योग्यताओं की सम्पूर्ण दक्षता में व्यक्ति ब्रह्म को जानने योग्य होता है, श्रीकृष्ण के शब्दों में उस योग्यता का नाम पराभक्ति है अर्थात् भक्ति पराकाष्ठा पर है, अपना परिणाम देने की अवस्था में है। इस पराभक्ति की अवस्था में वह पुरुष तत्त्व को जानता है।

वह तत्त्व को जानता तो है किन्तु वह तत्त्व है क्या? पाँच तत्त्व या पचीस तत्त्व, जैसा कि लोग गणना बैठाते रहते हैं। यह तत्त्व प्रकृतिजन्य है। इस पर श्रीकृष्ण बताते हैं- नहीं, मैं जो हूँ, अजर-अमर-शाश्वत-अलौकिक जिन गुणधर्मोंवाला हूँ, मुझको जानता है और मुझे जानकर तत्क्षण वह मुझमें ही प्रविष्ट हो जाता है। तत्त्व माने वह परमात्मा। प्राप्तिकाल में साधक पहले भगवान को देखता है; किन्तु दूसरे ही क्षण वह स्वयं में ही अजर, अमर, शाश्वत, सनातन इत्यादि गुणधर्मों से ओतप्रोत अपनी आत्मा को देखता है। वह है तत्त्वदर्शी। उन तत्त्वदर्शियों ने देखा कि आत्मा या परमात्मा शाश्वत है, सनातन है। यह उनकी अनुभूति है कि वह कण-कण में व्याप्त है- ईशावास्यमिदं सर्वम् (ईशावास्य उप०, १); सीय राम मय सब जग जानी (मानस, १/७/२); वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः। (गीता, ७/१९) अब वह महान् आत्मा है। पत्थर-पानी पूजकर वह तत्त्वदर्शी तो हुआ नहीं; किन्तु आरम्भिक साधना के प्रवेश वे ही हैं।

हमारे आपके लिए जैसा योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि अपने स्वभाव से उत्पन्न क्षमता के अनुसार नियत कर्म (यज्ञ की प्रक्रिया) का आचरण ही धर्म है, जिसकी विधि वे गीता में बता आये हैं, जिससे कि विधि के नाम पर भी पाखण्ड करने की कोई गुंजाइश न रहे। परमात्मा के शोध की स्थली हृदय-देश है। तमेव शरणं गच्छ (गीता, १८/६२)- उसी हृदयस्थ ईश्वर की शरण में जाने का योगेश्वर स्पष्ट निर्देश देते हैं। उसकी अनुभूति की स्थली भी हृदय ही है, आत्मनि विन्दति; बाहर कहीं नहीं। अतः जो लोग बाहर तत्त्वप्राप्ति की आशा लगाये बैठे हैं, भ्रम में हैं। भले ही भगवान सर्वत्र हों किन्तु प्राप्त होते हैं हृदय में ध्यान करने से ही। हृदि अयम्– यह हृदय में है, यही हृदय शब्द की निष्पत्ति भी है।

सारांशतः योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि आत्मा शाश्वत है, आत्मा ही सनातन है, वही अविनाशी अमृततत्त्व है। उस परमतत्त्व को पाना हमारा-आपका, मानव मात्र का दायित्व है। इसी दायित्व को योगेश्वर श्रीकृष्ण आपका धर्म कहकर सम्बोधित करते हैं। यही सनातन-धर्म है। सनातन-धर्म क्या है? सनातन तक की दूरी को तय करानेवाली क्रिया का आचरण !

अब यदि आप आत्मदर्शनवाली विधि-विशेष को, आत्मदर्शनवाली प्रक्रिया को नहीं जानते तो धर्म नाम की कोई वस्तु आपके पास नहीं है। यदि धर्म के लिए आहें भरते हैं तो प्रत्याशी अवश्य हैं किन्तु धार्मिक नहीं। उसके लिए हृदय में छटपटाहट भले हो किन्तु वस्तु तो तभी सम्भव होगी जब क्रिया उपलब्ध हो, एक परमात्मा में श्रद्धा हो।

एक परमात्मा की भक्ति सृष्टि का एकमात्र धर्म है। उसी एक धर्म को गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में चार प्रकार से समझाया है कि (१) धरमु न दूसर सत्य समाना, (२) परहित सरिस धर्म नहिं भाई, (३) परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा, और (४) एकइ धर्म एक ब्रत नेमा। चारों का अर्थ एक है, क्रिया एक है और परिणाम भी एक ही है। इनमें से प्रस्तुत है सर्वप्रथम-

धरमु न दूसर सत्य समाना।

आगम निगम पुरान बखाना।। (मानस, २/९४/५)

अर्थात् सत्य के समान दूसरा कोई धर्म नहीं है- जिसकी प्रशंसा वेद, पुराण तथा शास्त्रों में है। प्रश्न उठता है- सत्य क्या है? कोई कहता है- मैं सच बोलता हूँ, झूठ मत बोलो। कोई कहता है कि पृथ्वी डोलती है- यह सच है, तो कोई कुछ कहता है। लोगों ने नश्वर प्रकृति में सच और झूठ की सीमाएँ बना रखी हैं। कोई उन सीमाओं में कहता है तो सत्य और इस परिधि से बाहर बोलता है तो झूठ। विनयपत्रिका में गोस्वामीजी कहते हैं- कोउ कह सत्य, झूठ कह कोऊ, जुगल प्रबल कोउ मानै। कोई इस सृष्टि को सत्य कहता है तो कोई इस संसार को मिथ्या कहता है, तो कोई ब्रह्म और संसार दोनों को ही सत्य मानता है। किन्तु तुलसिदास परिहरै तीन भ्रम, सो आपन पहिचानै। तुलसीदासजी कहते हैं कि ये तीनों विचार भ्रामक हैं। इन तीनों भ्रमों का परित्याग करने पर ही आत्मानुभूति सम्भव है। अर्थात् सृष्टि में कहीं सत्य है ही नहीं- झूठइ लेना झूठइ देना। झूठइ भोजन झूठ चबेना।। (मानस, ७/३८/७) जगत् का व्यवहार सब झूठा है। भगवान शिव का निर्णय है, जेहि जानें जग जाइ हेराई। जागें जथा सपन भ्रम जाई। (मानस, १/१११/२)- जिसे जान लेने पर जगत् ही खो जाता है, जिस प्रकार जग जाने पर स्वप्न का भ्रम समाप्त हो जाता है। अर्थात् जगत् एक भ्रम है जो खो जाता है। उन प्रभु को जान लेने के पश्चात् यह जगत् सदा-सदा के लिए समाप्त हो जाता है। जो समाप्त हो जाय, उसमें सत्य ही क्या है? जिसका कोई अस्तित्व नहीं, वह सत्य कैसा? सृष्टि सत्य या असत्य अथवा दोनों ही है- ऐसे विचार भ्रामक हैं। इन तीनों ही विचारों को जो त्याग देता है, वही अपने स्वरूप को पहचानता है। अस्तु, सृष्टि में सत्य है ही नहीं। तो सत्य है क्या? इस पर उन महापुरुष ने स्वयं निर्णय दिया-

ब्यापकु एकु ब्रह्म अबिनासी।

सत चेतन घन आनन्द रासी।।

अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी।

सकल जीव जग दीन दुखारी।। (मानस, १/२२/६-७)

वह प्रभु कण-कण में व्याप्त है। एक है, आज तक एक के सिवाय दो कभी हुआ नहीं। वह बृहत् है इसलिए ब्रह्म कहा जाता है। वह अविनाशी है जिसका कभी विनाश नहीं होता। वह सत्, चेतन और आनन्द की राशि है। वही परम सत्य है। ऐसा प्रभु सबके हृदय में वास करता है। वह अविकारी है। कोई कुत्ता, बिल्ली कुछ भी खाता हो, उन विकारों से उसे कुछ लेना-देना नहीं है। वह द्रष्टा के रूप में हृदय-देश में विद्यमान है। ऐसा परमात्मा जो हृदय-देश में है, उसे विदित कैसे किया जाय? नाम निरूपन नाम जतन तें। सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें।। (मानस, १/२२/८) पहले तो नाम का निरूपण करना चाहिए कि नाम है क्या और जब समझ में आ जाय तो दिन-रात उसके लिए यत्न करें जिससे वह प्रकट जो जाय। एक ही नाम को जपने के लिए कई श्रेणियाँ पार करनी पड़ती हैं। राम नाम में अन्तर है, कहीं हीरा है कहीं पत्थर है। नाम वही है, किसी ने चौबीस घण्टे जपा, कुछ कंकड़ हाथ लगा। उसी नाम को किसी ने उतना ही जपा, हीरे हाथ लग गये। नाम जपने की विधि महापुरुषों के द्वारा जागृत होती है। उनके निर्देशानुसार चलना ही धर्म है। केवल श्रद्धा समर्पित कर नाम-जप के द्वारा उस परमात्मा को, जो आपके हृदय-देश में है, जगाना भर है। उस परमात्मा के प्रति समर्पण, श्रद्धा स्थिर करना धर्माचरण है।

एक स्थल पर धर्म को इंगित करते हुए गोस्वामीजी कहते हें- पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।। (मानस, ७/४०/१) जितना कुछ जीव-जगत् में दिखायी-सुनायी पड़ता है, वह सब प्रकृति के अन्तर्गत है। इससे परे केवल आत्मा है- प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी। (मानस, ७/७१/७)

वह प्रकृति से परे है इसलिए पर कहलाता है। इस आत्मा के हित के समान कोई धर्म नहीं और इस आत्मा को पीड़ा पहुँचाने के समान कोई अधम कृत्य नहीं है। भगवान श्रीकृष्ण भी कहते हैं कि अर्जुन! आत्मा ही शत्रु और आत्मा ही मित्र है। जिस पुरुष के द्वारा मनसहित इन्द्रियाँ जीती गई हैं उसके लिए उसी की आत्मा मित्र बनकर मित्रता में बरतती है और परमकल्याण करनेवाली होती है; किन्तु जिस पुरुष के द्वारा मनसहित इन्द्रियाँ नहीं जीती गई हैं उसके लिए उसी की आत्मा शत्रु बनकर शत्रुता में बरतती है, अधोगति और नीच योनियों में फेंकती है। इसलिए अर्जुन! तू अपने द्वारा अपनी आत्मा का उद्धार कर। इसको अधोगति में न फेंक। वास्तव में यही परहित है। आत्मा प्रकृति पार है इसलिए पर कहलाता है, लेकिन सो माया बस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाईं।। (मानस, ७/११६/३) यह बँधा हुआ है। इसे बन्धन से छुड़ाकर अपने सहज स्वरूप में स्थिति दिलाना- इसके समान कोई अन्य धर्म नहीं है।

परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा। (मानस, ७/१२०/२२) श्रुति अर्थात् वेद भजन में निमग्न महात्माओं को प्रभु द्वारा समय-समय पर दी गई जानकारियों का संकलन है। उसमें उन महापुरुषों की अनुभूतियों का संग्रह है जो ईश्वर के तद्रूप थे, समीप पहुँचे हुए थे। प्राप्ति के पश्चात् ईश्वर किसे पढ़ायेगा और कौन पढ़ेगा? जब तक कुछ दूरी रहती है तभी तक भगवान कुछ समझाते हैं। उन अनुभूतियों को कुछ काल तक शिष्य-परम्परा में रटा गया। वेदव्यास ने उसे पुस्तकाकार प्रदान किया; किन्तु आप भजन करेंगे तो वेद आपके लिए नये सिरे से उतरेगा। वह पुस्तक काम नहीं करेगी; क्योंकि ईश्वर सदा बोलता है, सदैव समझाता है, जड़-चेतन सर्वत्र से बोलता है। उन निर्देशों को पकड़नेवाला साधक ही उसकी अनुभूति पाता है। शनैः-शनैः साधक में दृष्टि जागृत हो जाती है। उस दृष्टि से प्रभु की विभूतियाँ देखने, सुनने और समझने में आती हैं; किन्तु पुस्तक हमें दृष्टि नहीं दे सकती। वह केवल इतना बोध कराती है कि हम प्रयास करें तो किस दिशा में करें।

निर्देशों के अनुसार प्रयास करने से आत्मा जागृत होकर मार्गदर्शन करने लगती है। परमात्मा में सुरत लगाने पर जितना कुछ विदित हो जाय, उसी के अनुसार आचरण करना परमधर्म है। धर्म की यह परिभाषा प्रयोगात्मक है। ईश्वरप्रदत्त निर्देशों का पालन अहिंसा है और यदि साधक इन आदेशों में कटौती करता है, इनकी अवहेलना करता है तो हिंसा है, वह हत्यारा है। अहिंसा का शुद्ध अर्थ है एक परमात्मा का चिन्तन।

भगवान राम ने एक बार सभा बुलाई। एक दृष्टान्त प्रस्तुत किया कि मनुष्य-शरीर भवसागर से पार होने के लिए एक जहाज के तुल्य है, मेरी अनुकूलता ही अनुकूल वायु है, सद्गुरु कर्णधार अर्थात् के