ससुरा से गवना उलटि चला रे नैहरवा
महान संत कबीर की अटपटी वाणियों का जनमानस पर गहरा प्रभाव देख कई कवियों ने भी इसी प्रकार के भजन लिख डाले। कोई इन्हें निरगुन शैली कहता है, कोई अन्योक्ति तो कोई कूटपद। कवियों का स्वभाव है कुछ न कुछ जोड़ते-गाँठते रहते हैं। ऐसा ही एक भजन आज सामने आया है जो कुछ साधनापरक प्रतीत होता है। इसके रचयिता पुरुषोत्तमजी सद्गृहस्थ आश्रम में रहनेवाले कवि रहे हैं। सतना मध्यप्रदेश के क्षेत्र में इनके पद अधिक प्रचलित हैं। पद इस प्रकार है–
ससुरा से गवना उलटि चला रे नैहरवा।
बिना मात की लड़की जाई तरकी पहिने हियरवा।
मांग सँवारे बेसर पहने कंघा लीन्हे करवा।।
ससुरा से गवना…….
निज लड़के को खसम बनायो, छ: थूनी का मड़वा।
सखी सहेलरि मंगल गावैं, पड़ि गये चकर भँवरवा।।
ससुरा से गवना…….
सोलह पाच पचीस साजि के, चल भये चारि कँहरवा।
डोली डोली फिरे भँवर में, तीन धार का नरवा।।
ससुरा से गवना…….
सात चार के बीच घुमा के, ले गये ससुर दुअरवा।
कह पुरुषोत्तम पिया पाइ के, सोवन लागी कोरवाँ।।
ससुरा से गवना…….
गवना सदैव नैहर से ससुराल ले जाया जाता है लेकिन इस पद में ‘ससुरा से गवना उलटि चला रे नैहरवा’। है तो अटपटा। जनजातियों में कहीं ऐसी प्रथा हो तो आश्चर्य नहीं; किन्तु इस पद में शादी-विवाह के रूपक द्वारा जीवात्मा का परमात्मा से सम्बन्ध जोड़ने का प्रयास किया गया है। यहाँ ससुराल से नैहर की ओर, लोकरीति के विपरीत गवना जा रहा है।
‘ससुरा से गवना’! स माने वह परमात्मा। सुरा कहते हैं सुरत को। जब भजन का अभ्यास इतना उन्नत हो कि सुरत का सम्बन्ध परमात्मा से जुड़ जाय, तत्क्षण वह प्रभु हृदय से जागृत हो जायेंगे, आत्मा से रथी हो जायेंगे। उन्हीं के निर्देशन में जीव पलटकर अपने नैहर, उद्गम की ओर चल पड़ता है। हमारा उद्गम है परमात्मा।
त्वमेव माताश्च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं मम देव देव।।
भगवन्! आप ही हमारी माता हैं, आप ही पिता हैं, आप ही हमारे सखा हैं, सब कुछ हैं। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– अर्जुन! यह मेरी त्रिगुणमयी प्रकृति गर्भ धारण करनेवाली माता और मैं परम चेतन ही बीजरूप से पिता हूँ। संसार के माता-पिता तो निमित्तमात्र हैं।
ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:। (गीता, १५/२)
अर्जुन! यह जीवात्मा मेरा विशुद्ध अंश है। वैदिक ऋषियों ने भी भगवान की विभूतियों का दर्शन किया तो निर्णय दिया– ‘अमृतस्य पुत्रा:’– जो मृत्यु से परे अमृत तत्त्व है, तुम उसकी सन्तान हो। किन्तु उन परमात्मा तक पहुँचने के लिए भजन की जागृति आवश्यक है और वह तभी संभव है जब हम-आप अभ्यास करें, नाम जपें, सुरत लगायें। जहाँ श्रद्धा की डोरी लग जायेगी, भगवान आपकी आत्मा से जागृत होकर प्रेरक के रूप में खड़े हो जायेंगे, मार्गदर्शन करने लगेंगे। अब तक जीव संसार में भटक गया था। वह अपने उद्गम को छोड़कर न जाने कहाँ भटक रहा है। भजन की जागृति के साथ वह पलटकर अपने नैहर परमात्मा की ओर, स्वरूप की ओर गमन करने लगता है।
गौना तो कन्याओं का होता है। यह कन्या कैसी है?
बिना मात की लड़की जाई तरकी पहिने हियरवा।
बिना माता के ही लड़की पैदा हो गयी। ईश्वर-पथ में लौरूपी लड़की; वह बिना माँ-बाप की है। वृत्तियाँ अनन्त हैं। उनमें एक वृत्ति है ईश्वर के अनुरूप लौ। जो प्रसुप्त थी, जागृत हो गयी; यही है ‘बिना मात की लड़की जाई’। जहाँ लौ जागृत हुई, प्रभु से लगन लग ही गयी तो हृदय में तर्क पैदा हो जाता है कि भगवान क्या हैं? कहाँ रहते हैं? झूठ क्या है? सच क्या है? मन उसकी खोज करने लगता है, चिन्तन में डूबकर मनन करने लगता है, स्वाध्याय चलने लगता है। जिसके प्रति लौ जागृत हुई, तुरन्त उसके विषय में तर्क-कुतर्क चलने-उमड़ने लगते हैं।
गुरु महाराज से हम बहुत प्रश्न किया करते थे। रात्रि के दस बजे, एकान्त में, जब उनके पास कोई नहीं होता था, हम अपनी शंकायें प्रस्तुत करते थे। महाराजजी बहुत खुश होते थे, समाधान करते थे और कहते थे– हो, अधिकारी के यही लक्षण हैं कि उसके अन्दर प्रश्न पैदा होते रहें, तर्क उठते रहें। यदि कहीं पहुँचने के लिए कोई विकल है तो वह छटपटाने लगेगा, इनसे परामर्श लेगा, उनसे परामर्श करेगा, साइनबोर्ड पढ़ेगा, सन्तोष नहीं हुआ तो दुकानों पर पूछेगा– लगनशील के यही लक्षण हैं– ‘तरकी पहिने हियरवा’– हृदय में तर्क जागृत हो गया, खोज शुरू हो गयी। इसके साथ ही वह,
मांग सँवारे बेसर पहिने कँघा लीन्हे करवा।।
ससुरा से गवना….
संसार में महिलाओं द्वारा सिर के मध्य से कानों की ओर बालों में कंघी घुमाने से एक रेखा बन जाती है जिसे मांग कहते हैं। इसमें सुहाग का प्रतीक सिन्दूर डाल देने से मांग भरपूर कही जाती है किन्तु परमात्मा में जब से लौ लगी है, उन्हें प्राप्त करने के लिए मानसिक प्रवृत्तियों को सँवारना मांग सँवारना है।
निर्मल मन जन सो मोहि पावा।
मोहि कपट छल छिद्र न भावा।। (मानस, ५/४२/५)
निर्मल मनवाला जन ही मुझे प्राप्त करता है। कपट, छल-छद्मवाला व्यक्ति मेरे पास कभी किसी काल में नहीं पहुँच पाता। इसलिए लौ जागृत होने पर तर्क-वितर्क चलने लगा। ज्यों-ज्यों निर्णय मिला, साधक मानसिक प्रवृत्ति को सँवारने लगा, ‘बेसर पहिने’– ब्रह्मविद्यारूपी बेसर धारण किया। बेसर नाक में पहने जानेवाला आभूषण है जो लक्ष्य का द्योतक है। उस पथ पर जाना है तो उसकी विद्या भी है जिसका नाम ब्रह्मविद्या है। यह ब्रह्मपर्यन्त दूरी तय कराने में सहायक है। साधक ब्रह्मविद्यारूपी बेसर पहनता है, अन्य चिन्तन छोड़कर उसे धारण करता है। ‘कंघा लीन्हे करवा’– लौरूपी लड़की कर्त्तव्यरूपी कंघी हाथ में ले लेती है। यदि लगन जागृत है तो पथिक कर्त्तव्य-पथ पर सदा अडिग रहता है। इस गौने में पति कौन है?–
निज लड़के को खसम बनायो छ: थूनी का मड़वा।
लौरूपी लड़की! लौ भली प्रकार परिपक्व अवस्था में पहुँच गयी तो भगवान प्रकट हो जाते हैं। भगवान के जन्म का कारण लौ है। वह है तो सर्वत्र किन्तु जन्मता है ऐसी लौ के अन्तराल में, लगनशील के हृदय में। ख्याल के सम होने पर लक्ष्य विदित होता है इसलिए खसम। ख अर्थात् ख्याल, चिन्तन। इन्हें समेटकर उस परमात्मा के चिन्तन में सम किया, स्थिर किया। सारे विचार सिमटकर एक प्रभु में स्थायित्व कैसे लेंगे? इसके लिए चाहिए ‘छ: थूनी का मड़वा’। संसार के उद्गम के कारण हैं षड् विकार। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर– ये षड्विकार सिमटकर षडैश्वर्य में परिवर्तित हो जायँ। षड्विकार अपनी जगह पर प्रसुप्त हो जाते हैं, जीवित अवश्य रहते हैं। उसकी जगह विवेक, वैराग्य, शम, दम, त्याग, तितिक्षा ले लेते हैं तो मंडप तैयार हो जाता है, भगवान की छत्रछाया हो जाती है। भगवान की अनुकम्पा के अन्तर्गत साधक, भक्त चलने लगता है। उस समय,
‘सखी सहेलरि मंगल गावैं’
आदि शंकराचार्य से शिष्यों ने पूछा– भगवन्! दुनिया में शत्रु कौन है? मित्र कौन है? प्रश्नोत्तरी में है–
के शत्रव: सन्ति निजेन्द्रियाणि तान्येव मित्राणि जितानि यानि।
शंकराचार्य ने कहा– अपनी इन्द्रियाँ ही शत्रु हैं और यदि इन्हें जीत लिया जाय तो यही मित्र बनकर मित्रता में बरतती हैं। इन्द्रियाँ अब सखी हैं, संयत हैं, ईश्वर के प्रति विचारों को सम करने में लगी हैं, ख्यालों को सम करने में लगी हैं। षड्विकार षडैश्वर्य में बदल गये। प्रभु की छत्रछाया मिल गयी। इन्द्रियाँ जो अब तक शत्रु थीं, इतनी संयत हो गयीं कि सखी सहेलरि बन गयीं। जो पहले अमंगल गायन कर रही थीं, परम मंगल स्वरूप की प्राप्ति का गायन करने लगीं। आँखें वही देखने लगी, कान वही सुनने लगे किन्तु ‘पड़ि गये चकर भँवरवा’। इतनी अनुकूल परिस्थितियों में भी माया चक्कर लगाती रहती है क्योंकि माया अभी जीवित है। एक भँवर पड़ जाता है। नदी में भँवर डुबाकर दूर फेंक देने के लिए होता है। यही कौशल माया का भी है। जब तक दूरी तय न हो जाय, यह कभी-कभी साधक को घसीटकर बाहर फेंक देती है। ऋद्धियों-सिद्धियों के भँवर पड़ने लगते हैं। उससे वही बच पाता है जिसका भजन जागृत है, भगवान रथी हैं। उन्हीं के निर्देशन में चलकर प्रकृति के द्वन्द्व में भटका हुआ जीव स्वरूप की ओर गमन कर पाता है। केवल राम-राम जपकर या ओम्-ओम् जपकर कोई मुक्ति तक की दूरी नहीं तय कर सकता। वह तभी संभव है जिस परमात्मा की हमें चाह है, हमारी पुकार ऐसी हो कि वह हमारे स्तर पर उतर आये, हमारी आत्मा से जागृत होकर मार्गदर्शन करने लगे। उन्हीं के निर्देशन में जीव ‘उलटि चल्यो नैहरवा’– अपने उद्गम की ओर गमन करता है, भँवर से बच पाता है। इस गौने में बारात कैसी है?
सोलह पाँच पचीस साजि के चल भये चारि कँहरवा।
सोलह तत्त्वों का आपका सूक्ष्म शरीर है– दस इन्द्रियाँ, मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार, तेजस और प्राज्ञ! इन अन्त:करणों में दूसरी तरंगें, दूसरे विचार न आने पायें। इस प्रकार अन्तर्जगत् को साज-सँवारकर, पञ्चमहाभूत– क्षिति, जल, पावक, गगन और समीर– इन पाँच तत्त्वों का पाँचों में सञ्चार पचीस प्रकृति कहलाता है। जैसे– आकाश में पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि सभी हैं, प्रधानता आकाश की है; वायु में पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश सभी हैं, प्रधानता वायु की है। इन पाँचों का जब पाँचों में सञ्चार होता है तब इनमें क्रिया होती है। इनसे उद्भूत पञ्च तन्मात्राएँ– रूप, रस, गन्ध, शब्द और स्पर्श– इन सबको सजाया गया, इष्ट के अनुरूप ढाला गया। आँखें रूप देखती हैं, कान शब्द सुनते हैं, त्वचा स्पर्श करती है। अब तक ये बाहर क्रियाशील थीं, बाहर देखती थीं, हृदय में प्रभु का स्वरूप देखने लगीं। कान बाहर सुनते थे, अब वह शब्द पर तत्पर रहें कि भगवान कहते क्या हैं? एक भी आदेश व्यर्थ न जाय, अनसुना न होने पाये। इन सबको सजाने में चार कहार लगते हैं। नाम, रूप, लीला और धाम– ये चार कहार हैं। गुरु महाराज प्राय: कहा करते थे– बेटा! पहले नाम; नाम से रूप, रूप से लीला और लीला से धाम।
सुमिरिअ नाम रूप बिनु देखें।
आवत हृदयँ सनेह बिसेषें।। (मानस, १/२०/६)
नाम का सुमिरन करें, बिना रूप देखे ही करें। रूप पहले आपने देखा नहीं, ध्यान कहाँ से धर लोगे? इसलिए पहले नाम का सुमिरन करें। जब स्नेह की डोर लग जायेगी तो रूप भी अपने आप उभरकर सामने आ जायेगा, हृदय में प्रकट हो जायेगा। समर्पण और श्रद्धा के साथ नाम जपने से शनै:-शनै: नाम में सुरत लगने लगी तो रूप आ जायेगा। अब आप रूप देखें, ध्यान धरें। किसका ध्यान धरें? कैसे धरें?–सब स्पष्ट हो जायेगा। भगवान सब बता देंगे। फिर लीला! जहाँ स्वरूप देखने लगे, सुरत से डोरी लगी, तहाँ भगवान अपनी विभूतियों से अवगत कराने लगते हैं, इसका नाम है लीला। इस लीला को कागभुशुण्डिजी ने देखा था–
उदर माझ सुनु अंडज राया।
देखेउँ बहु ब्रह्माण्ड निकाया।। (मानस, ७/७९/३)
अनेकों ब्रह्माण्ड देखे, एक-एक ब्रह्माण्ड में सौ-सौ वर्ष तक रहे। उदर में ही अपनी कुटिया में भी निवास किया और अन्त में कहते हैं–
उभय घरी महँ मैं सब देखा।
भयउँ भ्रमित मन मोह बिसेषा।। (मानस, ७/८१/८)
दो ही घड़ी के अनुभव में मैंने यह सब देख लिया। यह अनुभव था। भगवान जब अपनी विभूतियों से अवगत कराते हैं तो आपमें दृष्टि बनकर खड़े हो जायेंगे। सामने स्वयं हो जायेंगे और जो युगों का कोर्स है, आपको दो घड़ी में बता देंगे। इसी का नाम है लीला। जैसे-जैसे आपकी साधना का स्तर उठता जायेगा, लीला भी उन्नत होती जायेगी। शिशु कक्षा के छात्र को पी-एच.डी. तैयार करानेवाला गुरु शोध का विषय नहीं पढ़ायेगा। वह छात्र की क्षमता के अनुरूप ही कुछ बता देगा। भगवान तो भगवान ही हैं। साधक की जो स्थिति है, वह वहीं से पढ़ाने लगते हैं। उनके निर्देशन में चलते-चलते साधक ने लीलाधारी का स्पर्श कर लिया तो धाम! धाम माने परमात्मा का दर्शन, उनका स्पर्श और उनमें स्थिति मिल जाती है। इस प्रकार नाम, रूप, लीला और धाम भक्तिपथ के चार क्रमोन्नत अंग हैं। यही इस पंक्ति में है– ‘सोलह पाँच पचीस साजि के चल भये चारि कँहरवा।’– ये उत्तरोत्तर विकास करते-करते धाम तक पहुँचा देंगे। यदि भगवान आपसे कुछ नहीं कहते, नाम जागृत नहीं है, रूप जागृत नहीं हुआ, लीलाधारी का दर्शन, स्पर्श और विलय नहीं मिला, स्थिति नहीं मिली तो कैसा भजन? इन समस्त प्रक्रियाओं से गुजरते समय माया का पूरा द्वन्द्व आपके साथ-साथ रहता है।
डोली डोली फिरे भँवर में, तीन धार का नरवा।
शरीर एक डोली है। चिन्तन इसके अन्तराल में है। डोली अर्थात् हृदय के अन्दर ही सतत् मनन-चिन्तन करते रहने पर भी तीन धारवाला नाला पार करना पड़ता है जिसमें भँवर उठती रहती है। त्रिगुणमयी प्रकृति ही तीन धार का नाला है। सात्त्विक, राजस और तामस– यह त्रिगुणमयी माया समय-समय पर उड़ेरा (झोंका) देती रहती है। कभी तामसी गुण आ जायेगा तो आलस्य, निद्रा और प्रमाद घेर लेता है। यही है भँवर। कभी राजसी गुणों की प्रबलता हुई तो साधक ऐश्वर्य माँगने लगता है। पड़ गया भँवर। सात्त्विक गुण के बाहुल्य में धारणा-ध्यान-समाधि पराकाष्ठा पर पहुँचते हैं तो अभिमान चढ़ बैठता है कि मेरे जैसा ज्ञानी-ध्यानी कौन है! फिर वह पड़ गया भँवर में। यद्यपि साधक हृदय के अन्दर ही है, चिन्तनरत है फिर भी त्रिगुणमयी प्रकृति के झोंके आते रहते हैं। समर्पण के साथ लगा साधक इससे उबर पाता है अन्यथा कोई न कोई भँवर, कोई न कोई लहर उसे लपेट लेती है। अन्त में कवि कहता है–
सात चारि के बीच घुमाइके, ले गये ससुर दुअरवा।
भगवत्पथ की सात भूमिकायें हैं। पहली भूमिका है शुभेच्छा, शुभ के प्रति इच्छा। इच्छा होगी तो विचार अवश्य होगा। यही है दूसरी भूमिका सुविचारणा। ज्योंही चिन्तन आगे बढ़ा, तीसरी भूमिका तनुमानसा! अभी हमारा तन यह स्थूल शरीर है किन्तु चिन्तन उन्नत होने पर साधक मन में ही तनवाला हो जाता है। मन जितना विकृत, उतना ही तन बाहर और मन जितना संयत, उतना ही भीतर चिंतन टिकता है। मन में ही वह शरीरवाला हो जाता है। चौथी है सत्त्वापत्ति– नित्य, सत्व परमात्मा के प्रति विचार स्थिर हो जाता है, श्रद्धा टिक जाती है। पाँचवीं भूमिका है असंसक्ति अर्थात् आसक्ति का अभाव। संग मिले लेकिन प्रभावित न कर सके। असंग रहने की क्षमता! ऐसा योगी कहीं भी भजन कर सकता है, ठीक वैसे ही जैसे कहीं एकान्त में करता है। प्रकृति के वातावरण का प्रभाव अब उसका स्पर्श नहीं कर पाता।
पूज्य गुरु महाराजजी बताया करते थे कि साधनाकाल में निराधार विचरण के क्रम में वे एक बार मुंबई चले गये। रास्ते में गाड़ी की खटर-पटर या यात्रियों के कोलाहल से भी उनके भजन में बाधा नहीं पड़ी। रास्ते में तीन दिन लग गये और तीन-चार दिनों का उपवास महाराजजी के जीवन में उन दिनों आये दिन की घटना थी। महाराजजी मुंबई में उतर गये। उस दिन उन्हें इतनी तेज भूख लगी कि उनका मन करता था कि हलवाई के जलेबी की थाल ही लेकर भाग चलें। मन में होता था, इसे लेकर भाग तो सकते हैं किन्तु ये लोग पकड़ लेंगे, खाने भी नहीं देंगे, पिटाई ऊपर से पड़ेगी।
महाराजजी हलवाई की दुकान से थोड़ी दूर सड़क के किनारे पटरी पर जमीन पर ही बैठ गये। उन्होंने विचार किया– भोजन की चिन्ता क्यों? जिन प्रभु ने तुम्हें साधु बनाया, वे जानें। महाराजजी भजन में बैठ गये। उनका ध्यान लग गया। समाधि लग गयी। दिनभर उस रास्ते से हजारों गाड़ियाँ आयीं-गयीं, उनके चीखते हार्न; महाराजजी को कुछ पता ही न चला। प्रात: छ: बजे से बैठे महाराजजी को वहाँ शाम के छ: बज गये। जैसे महाराजजी वहाँ थे ही नहीं। महाराजजी के मन में असीम शान्ति और बड़ी मस्ती थी। भूख भी भूल गये थे। इतने में एक भक्त उसी भीड़ में से छँटकर भोजन लेकर आया। उसने कहा– ‘‘सन्तजी!’’ महाराजजी के कान में सुनाई पड़ा ‘गुन्न!’ दूसरी बार उसने कहा– ‘‘सन्तजी!’’ महाराजजी ने सोचा– भगवान अनुभव में हमें साधु कह रहे हैं। उन्हें तब भी भान नहीं हुआ कि बाहर से कोई पुकार रहा है। जब तीसरी बार आवाज आई ‘सन्तजी!’, तब महाराजजी की समाधि टूटी। उन्होंने देखा– एक भाविक थाल लिये खड़ा है। उसने पुन: कहा– ‘‘सन्तजी! प्रसाद पावैं।’’ उसने थाल नीचे रख वहीं महाराजजी को विधिवत् खिलाया, हाथ धुलाया। वह हलवाई भी आकर महाराजजी के चरणों में गिरा। महाराजजी को बड़ी प्रसन्नता हुई कि दिनभर गाड़ियाँ दौड़ती रहीं और उन्हें कुछ पता ही न था। वह कहा करते थे– साधु का भजन तब सही है कि बैण्ड-बाजा बजता रहे और उसे पता भी न चले। कोलाहल होता रहे किन्तु उसे सुनाई न दे।
जब पूज्य महाराजजी भगवान के आदेशानुसार अनुसुइया के घनघोर जंगल में रहने लगे, उनकी तपोभूमि क्रमश: व्यवस्थित आश्रम के रूप में परिणत हो गयी। दूर-समीप के भाविक भक्त गुरु महाराज के दर्शनार्थ आने लगे। कर्वी के एक भक्त ने महाराजजी को एक रेडियो भेंट कर दिया। उन दिनों रेडियो उस क्षेत्र में दुर्लभ वस्तु थी। चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया था। बहुत से भारतीय सैनिक युद्ध में हताहत हो रहे थे। महाराजजी ने एक दिन कहा– ‘‘कोई हमें भी लड़ाई के समाचार सुनाता।’’ उसी सन्दर्भ में उस भक्त ने रेडियो ला दिया और बोला– ‘‘महाराज! अब यह नित्य समाचार सुनाता रहेगा।’’ आश्रम में रेडियो देख हमने गुरु महाराज से कहा– ‘‘महाराजजी! दुनिया रात-दिन यही बाजा सुनती रहती है। संसार की चीख-पुकार से दु:खी लोग जंगल के एकान्त में सन्तों की शरण में शान्ति की खोज में आते हैं। यहाँ भी वही चिल्लपों! इससे लोगों के मन में अभाव होगा कि देखो न, महात्मा होकर भी रेडियो सुन रहे हैं।’’ महाराजजी बोले– ‘‘रेडियो से हमसे कुछ मतलब नहीं है। ई चीनवाली लड़ाई सुनै का मन रहा, ईकै मारा आया है। तू कहत है तो हटा देते हैं। जाने दो।’’ रेडियो जिसका था, उसके पास चला गया आश्रम से बीस-पचीस किलोमीटर दूर कर्वी में।
दो-एक दिन पश्चात् एक ओवरसियर आश्रम पधारे। उन्होंने कहा– ‘‘महाराजजी! सुना है कि आपके पास रेडियो आया है?’’ महाराजजी ने कहा– ‘‘हाँ, आया तो था हो! लेकिन हमार एक शिष्य कहत है लोगन में अभाव हो जाई। ई आपके शोभा नहीं है। दु:खी लोग यहाँ शान्ति के लिए आते हैं कि यहाँ कल्याण के चार शब्द मिलेंगे और यहाँ भी ‘हवा में उड़ता जाये मेरा लाल दुपट्टा मलमल का’ जब यही सुनने को है…..(हँसते हुए) इसीलिए वापस भेज दिया।’’
उन्होंने कहा– ‘‘महाराजजी! जो पूर्णत्ववाले महापुरुष होते हैं, उनके यहाँ अप्सरायें नाचती रहें, छत्तीसों रंग बरसते रहें, उनके ऊपर न शुभ संस्कार पड़ता है न अशुभ संस्कार पड़ता है। गीता में भी तो है महाराज! ‘आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमाप: प्रविशन्ति यद्वत्। तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी।।’ (२/७०)– योगी के कर्म अशुक्ल और अकृष्ण होते हैं।’’
गुरु महाराज ने कहा– ‘‘भाई, मैंहूँ जानत हूँ। मोरेउ लिये कुच्छौ नहीं है लेकिन….. बुला ओके!’’ महाराज ने हमको बगिया से बुलवाया। हमारे आने पर उनका कथन बताया और कहा– ‘‘देख, ई का कहत हैं?’’ हमने कहा– ‘‘महाराज! यह ठीक कहते हैं। पूर्णत्ववाली अवस्था तो आपकी है, हमलोगों की तो नहीं है।’’ महाराजजी ने कहा– ‘‘तू आपन देख! भजन तब सही है जब छत्तीसो रंग बरसते रहें और सुनाई न पड़े, कुछ दिखाई न पड़े। तू कर भजन!’’ फिर रेडियो आ गया। उसमें भी महाराजजी केवल समाचार सुनते थे और दोपहर में गोरखपुर से दो गाने आया करते थे, उसे सुनते थे। विदेशिया और बटोहिया दो अच्छे भोजपुरी गायक उन दिनों थे। महाराजजी उनके लोकगीत सुनते थे। कभी दो-एक गीत भी सुन लेते थे।
रेडियो से समाचार तो नित्य ही प्रसारित होते किन्तु एक भी समाचार हमें सुनायी नहीं पड़ता था; क्योंकि महाराज ने कहा था न कि ‘सुनाई न पड़े’ इसलिए समाचार आने के समय हम अपने चिन्तन में लग जाते, चिन्तन में इतना डूब जाते कि कुछ भी सुनाई न पड़ता। किन्तु एक दिन उस रेडियो पर एक ऐसा गीत आया कि उसका एक-एक शब्द चोट करता गया। गीत के बोल थे– ‘जरा मन की किवड़िया खोल, सैंया तेरे द्वारे खड़े।’ बस इतना ही याद हो पाया और गीत समाप्त हो गया। हमने महाराजजी से कहा– ‘‘वही भजनिया फिर लगा दें, महाराजजी!’’ महाराजजी बोले– ‘‘एहमें एकै बार आवत है रे!’’ जैसे हमारे महाराजजी थे, उतने ही विद्वान हम भी थे। अब भी नहीं मालूम कि रेडियो, टेलीविजन कैसे चलाया जाता है। यह था भगवत्पथ का पाँचवाँ स्तर असंसक्ति।
छठीं भूमिका है पदार्थाभावनी। पदार्थ अर्थात् संसार! पदार्थ है ही नहीं। संसार है ही नहीं। एक ऐसी अवस्था आती है कि,
सीय राम मय सब जग जानी।
करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी।। (मानस, १/७/२)
जहाँ भी दृष्टि पड़ती है, साधक आराध्यदेव के स्वरूप को ही खड़ा पाता है। पदार्थ का अभाव है तो खतरा कौन करेगा?
सरगु नरकु अपबरगु समाना।
जहँ तहँ देख धरें धनु बाना।। (मानस, २/१३०/७)
न स्वर्ग स्वर्ग के रूप में रह जाता है जिसकी हम कामना करें और न नरक ही नरक के रूप में रह जाता है जिससे हम भयभीत हों। यही है पदार्थाभाव अर्थात् पदार्थ का अभाव। सर्वत्र ईश्वरमयी दृष्टि का सूत्रपात् हो जाता है।
भक्तिपथ की सातवीं और अन्तिम भूमिका है तुर्यगा। तुरीयावस्था साधक की रहनी हो जाती है। जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति के अनन्तर तुरीय या समाधि की अवस्था। पूर्वजों ने मन को तुरंग की संज्ञा दी है। साधक अब मनरूपी अश्व का संचालक हो गया। अब यह मन हमें बलात् घसीटकर कहीं फेंक नहीं सकता। भक्तिपथ की ये सातों भूमिकायें और ‘चार घुमाकर’– नाम जपने के चार क्रमोन्नत सोपान– बैखरी, मध्यमा, पश्यन्ती और परा हैं। बैखरी में जिह्वा के द्वारा जपा हुआ राम-राम, ओम्-ओम् उन्नत होने पर मध्यमा में ढल जाता है। मध्यमा पश्यन्ती को जगा देगी। पश्यन्ती परा में प्रवेश दिला देगी और परा की पूर्तिकाल में,
जप मरे अजपा मरे, अनहदहू मरि जाय।
सुरत समानी सबद में, ताहि काल न खाय।।
जप अनिवार्य है। जपना तो पड़ेगा, लेकिन जपते-जपते एक समय ऐसा आता है कि जप मर जाता है। कब? जब अजपा जागृत हो जाय। अजपा मरे कब? जब अनहद की जागृति मिल जाय। आज कोई दो घण्टे भजन करता है, कोई दस घण्टे तो कोई चौदह घण्टे; लेकिन कोई-कोई,
जागत में सुमिरन करे, सोवत में लौ लाय।
सुरत डोर लागी रहे, तार टूटि ना जाय।।
यह है अनहद! जब भजन माप-तौल की सीमाओं से ऊपर उठ जाय। किन्तु अनहद ही सही, भजन करना तो पड़ रहा है। एक समय ऐसा आता है जब सुरत शब्द में समा गयी तो ‘ताहि काल न खाय’– वह अकाल पुरुष में स्थिति प्राप्त कर लेता है। सुरत जिस शब्द को सुन रही थी, उस शब्द में समा गयी। चित्त का निज स्वरूप शून्य हो गया, शब्द मात्र शेष बचा। शब्द ही ब्रह्म है किन्तु इस अवस्था की प्राप्ति के लिए बैखरी, मध्यमा, पश्यन्ती और परा– इन चारों के बीच से घूमना पड़ेगा अर्थात् क्रम-क्रम से चारों स्तर से साधना-भजन करते हुए गुजरना पड़ेगा, योग की सातों भूमिकाएँ तय करनी होंगी। ‘सात चारि के बीच घुमाइके, ले गये ससुर दुअरवा।’ ससुर– स माने वह परमात्मा! उन परमात्मा के आमने-सामने खड़ा कर दिया। अब,
कह पुरुषोत्तम पिया पाइ के, सोवन लागी कोरवाँ।
सात भूमिकायें और जप की चार श्रेणियाँ साधक को ‘ले गईं ससुर दुअरवा’– उन परमात्मा के दरवाजे ले गयीं। सुरत शब्द में समाहित हो गयी। तत्क्षण ‘कह पुरुषोत्तम पिया पाइ के’– जिन्हें प्राप्त कर लेने के बाद इस जीव की प्यास सदा-सदा के लिए मिट जाती है, जीव पूर्ण तृप्ति प्राप्त कर लेता है, आगे कुछ भी पाने की इच्छा शेष नहीं रहती क्योंकि आगे प्राप्त होने योग्य कोई वस्तु बची ही नहीं, कुछ है ही नहीं। उसे पाकर जीव की प्यास सदा के लिए मिट जाती है इसलिए भगवान को एक सम्बोधन ‘पिया’ कहकर भी दिया। उस पिया, परम प्रियतम को प्राप्तकर जीवात्मा ‘सोवन लागी कोरवाँ’– उनके अंक में विश्राम करने लगी। अब, ‘भजन हमार हरि करें, हम पायो विश्राम।’ भगवत्ता को प्राप्त ऐसे महापुरुष पेंशनीयर हो जाते हैं।
राम झरोखे बैठ कर सबका मुजरा लेय।
जैसी जाकी चाकरी, तैसी ताको देय।।
वह राम के साथ झरोखे में बैठ गया। ‘सबका मुजरा लेय’– वह सबकी प्रार्थनायें सुनता है। जिसका जैसा समर्पण और जैसी पुकार है, वैसी व्यवस्था भगवान स्वयं करने लगते हैं। महापुरुष जिस स्वरूप में स्थित हैं, वह स्वरूप व्यवस्था करता है। महापुरुष तो उनकी गोद में निश्चिन्त पड़ा है। पूज्य गुरु महाराजजी इसी को इंगित कर कहते थे– ‘‘हो! मोरे स्वरूप से लोग न जाने क्या-क्या प्राप्त कर लेते हैं, मैं भी नहीं जानता।’’
।। ॐ श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय ।।
(‘अमृतवाणी भाग-5’ से उद्धृत) महान संत कबीर की अटपटी वाणियों का जनमानस पर गहरा प्रभाव देख कई कवियों ने भी इसी प्रकार के भजन लिख डाले। कोई इन्हें निरगुन शैली कहता है, कोई अन्योक्ति तो कोई कूटपद। कवियों का स्वभाव है कुछ न कुछ जोड़ते-गाँठते रहते हैं। ऐसा ही एक भजन आज सामने आया है जो कुछ साधनापरक प्रतीत होता है। इसके रचयिता पुरुषोत्तमजी सद्गृहस्थ आश्रम में रहनेवाले कवि रहे हैं। सतना मध्यप्रदेश के क्षेत्र में इनके पद अधिक प्रचलित हैं। पद इस प्रकार है–
ससुरा से गवना उलटि चला रे नैहरवा।
बिना मात की लड़की जाई तरकी पहिने हियरवा।
मांग सँवारे बेसर पहने कंघा लीन्हे करवा।।
ससुरा से गवना…….
निज लड़के को खसम बनायो, छ: थूनी का मड़वा।
सखी सहेलरि मंगल गावैं, पड़ि गये चकर भँवरवा।।
ससुरा से गवना…….
सोलह पाच पचीस साजि के, चल भये चारि कँहरवा।
डोली डोली फिरे भँवर में, तीन धार का नरवा।।
ससुरा से गवना…….
सात चार के बीच घुमा के, ले गये ससुर दुअरवा।
कह पुरुषोत्तम पिया पाइ के, सोवन लागी कोरवाँ।।
ससुरा से गवना…….
गवना सदैव नैहर से ससुराल ले जाया जाता है लेकिन इस पद में ‘ससुरा से गवना उलटि चला रे नैहरवा’। है तो अटपटा। जनजातियों में कहीं ऐसी प्रथा हो तो आश्चर्य नहीं; किन्तु इस पद में शादी-विवाह के रूपक द्वारा जीवात्मा का परमात्मा से सम्बन्ध जोड़ने का प्रयास किया गया है। यहाँ ससुराल से नैहर की ओर, लोकरीति के विपरीत गवना जा रहा है।
‘ससुरा से गवना’! स माने वह परमात्मा। सुरा कहते हैं सुरत को। जब भजन का अभ्यास इतना उन्नत हो कि सुरत का सम्बन्ध परमात्मा से जुड़ जाय, तत्क्षण वह प्रभु हृदय से जागृत हो जायेंगे, आत्मा से रथी हो जायेंगे। उन्हीं के निर्देशन में जीव पलटकर अपने नैहर, उद्गम की ओर चल पड़ता है। हमारा उद्गम है परमात्मा।
त्वमेव माताश्च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं मम देव देव।।
भगवन्! आप ही हमारी माता हैं, आप ही पिता हैं, आप ही हमारे सखा हैं, सब कुछ हैं। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– अर्जुन! यह मेरी त्रिगुणमयी प्रकृति गर्भ धारण करनेवाली माता और मैं परम चेतन ही बीजरूप से पिता हूँ। संसार के माता-पिता तो निमित्तमात्र हैं।
ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:। (गीता, १५/२)
अर्जुन! यह जीवात्मा मेरा विशुद्ध अंश है। वैदिक ऋषियों ने भी भगवान की विभूतियों का दर्शन किया तो निर्णय दिया– ‘अमृतस्य पुत्रा:’– जो मृत्यु से परे अमृत तत्त्व है, तुम उसकी सन्तान हो। किन्तु उन परमात्मा तक पहुँचने के लिए भजन की जागृति आवश्यक है और वह तभी संभव है जब हम-आप अभ्यास करें, नाम जपें, सुरत लगायें। जहाँ श्रद्धा की डोरी लग जायेगी, भगवान आपकी आत्मा से जागृत होकर प्रेरक के रूप में खड़े हो जायेंगे, मार्गदर्शन करने लगेंगे। अब तक जीव संसार में भटक गया था। वह अपने उद्गम को छोड़कर न जाने कहाँ भटक रहा है। भजन की जागृति के साथ वह पलटकर अपने नैहर परमात्मा की ओर, स्वरूप की ओर गमन करने लगता है।
गौना तो कन्याओं का होता है। यह कन्या कैसी है?
बिना मात की लड़की जाई तरकी पहिने हियरवा।
बिना माता के ही लड़की पैदा हो गयी। ईश्वर-पथ में लौरूपी लड़की; वह बिना माँ-बाप की है। वृत्तियाँ अनन्त हैं। उनमें एक वृत्ति है ईश्वर के अनुरूप लौ। जो प्रसुप्त थी, जागृत हो गयी; यही है ‘बिना मात की लड़की जाई’। जहाँ लौ जागृत हुई, प्रभु से लगन लग ही गयी तो हृदय में तर्क पैदा हो जाता है कि भगवान क्या हैं? कहाँ रहते हैं? झूठ क्या है? सच क्या है? मन उसकी खोज करने लगता है, चिन्तन में डूबकर मनन करने लगता है, स्वाध्याय चलने लगता है। जिसके प्रति लौ जागृत हुई, तुरन्त उसके विषय में तर्क-कुतर्क चलने-उमड़ने लगते हैं।
गुरु महाराज से हम बहुत प्रश्न किया करते थे। रात्रि के दस बजे, एकान्त में, जब उनके पास कोई नहीं होता था, हम अपनी शंकायें प्रस्तुत करते थे। महाराजजी बहुत खुश होते थे, समाधान करते थे और कहते थे– हो, अधिकारी के यही लक्षण हैं कि उसके अन्दर प्रश्न पैदा होते रहें, तर्क उठते रहें। यदि कहीं पहुँचने के लिए कोई विकल है तो वह छटपटाने लगेगा, इनसे परामर्श लेगा, उनसे परामर्श करेगा, साइनबोर्ड पढ़ेगा, सन्तोष नहीं हुआ तो दुकानों पर पूछेगा– लगनशील के यही लक्षण हैं– ‘तरकी पहिने हियरवा’– हृदय में तर्क जागृत हो गया, खोज शुरू हो गयी। इसके साथ ही वह,
मांग सँवारे बेसर पहिने कँघा लीन्हे करवा।।
ससुरा से गवना….
संसार में महिलाओं द्वारा सिर के मध्य से कानों की ओर बालों में कंघी घुमाने से एक रेखा बन जाती है जिसे मांग कहते हैं। इसमें सुहाग का प्रतीक सिन्दूर डाल देने से मांग भरपूर कही जाती है किन्तु परमात्मा में जब से लौ लगी है, उन्हें प्राप्त करने के लिए मानसिक प्रवृत्तियों को सँवारना मांग सँवारना है।
निर्मल मन जन सो मोहि पावा।
मोहि कपट छल छिद्र न भावा।। (मानस, ५/४२/५)
निर्मल मनवाला जन ही मुझे प्राप्त करता है। कपट, छल-छद्मवाला व्यक्ति मेरे पास कभी किसी काल में नहीं पहुँच पाता। इसलिए लौ जागृत होने पर तर्क-वितर्क चलने लगा। ज्यों-ज्यों निर्णय मिला, साधक मानसिक प्रवृत्ति को सँवारने लगा, ‘बेसर पहिने’– ब्रह्मविद्यारूपी बेसर धारण किया। बेसर नाक में पहने जानेवाला आभूषण है जो लक्ष्य का द्योतक है। उस पथ पर जाना है तो उसकी विद्या भी है जिसका नाम ब्रह्मविद्या है। यह ब्रह्मपर्यन्त दूरी तय कराने में सहायक है। साधक ब्रह्मविद्यारूपी बेसर पहनता है, अन्य चिन्तन छोड़कर उसे धारण करता है। ‘कंघा लीन्हे करवा’– लौरूपी लड़की कर्त्तव्यरूपी कंघी हाथ में ले लेती है। यदि लगन जागृत है तो पथिक कर्त्तव्य-पथ पर सदा अडिग रहता है। इस गौने में पति कौन है?–
निज लड़के को खसम बनायो छ: थूनी का मड़वा।
लौरूपी लड़की! लौ भली प्रकार परिपक्व अवस्था में पहुँच गयी तो भगवान प्रकट हो जाते हैं। भगवान के जन्म का कारण लौ है। वह है तो सर्वत्र किन्तु जन्मता है ऐसी लौ के अन्तराल में, लगनशील के हृदय में। ख्याल के सम होने पर लक्ष्य विदित होता है इसलिए खसम। ख अर्थात् ख्याल, चिन्तन। इन्हें समेटकर उस परमात्मा के चिन्तन में सम किया, स्थिर किया। सारे विचार सिमटकर एक प्रभु में स्थायित्व कैसे लेंगे? इसके लिए चाहिए ‘छ: थूनी का मड़वा’। संसार के उद्गम के कारण हैं षड् विकार। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर– ये षड्विकार सिमटकर षडैश्वर्य में परिवर्तित हो जायँ। षड्विकार अपनी जगह पर प्रसुप्त हो जाते हैं, जीवित अवश्य रहते हैं। उसकी जगह विवेक, वैराग्य, शम, दम, त्याग, तितिक्षा ले लेते हैं तो मंडप तैयार हो जाता है, भगवान की छत्रछाया हो जाती है। भगवान की अनुकम्पा के अन्तर्गत साधक, भक्त चलने लगता है। उस समय,
‘सखी सहेलरि मंगल गावैं’
आदि शंकराचार्य से शिष्यों ने पूछा– भगवन्! दुनिया में शत्रु कौन है? मित्र कौन है? प्रश्नोत्तरी में है–
के शत्रव: सन्ति निजेन्द्रियाणि तान्येव मित्राणि जितानि यानि।
शंकराचार्य ने कहा– अपनी इन्द्रियाँ ही शत्रु हैं और यदि इन्हें जीत लिया जाय तो यही मित्र बनकर मित्रता में बरतती हैं। इन्द्रियाँ अब सखी हैं, संयत हैं, ईश्वर के प्रति विचारों को सम करने में लगी हैं, ख्यालों को सम करने में लगी हैं। षड्विकार षडैश्वर्य में बदल गये। प्रभु की छत्रछाया मिल गयी। इन्द्रियाँ जो अब तक शत्रु थीं, इतनी संयत हो गयीं कि सखी सहेलरि बन गयीं। जो पहले अमंगल गायन कर रही थीं, परम मंगल स्वरूप की प्राप्ति का गायन करने लगीं। आँखें वही देखने लगी, कान वही सुनने लगे किन्तु ‘पड़ि गये चकर भँवरवा’। इतनी अनुकूल परिस्थितियों में भी माया चक्कर लगाती रहती है क्योंकि माया अभी जीवित है। एक भँवर पड़ जाता है। नदी में भँवर डुबाकर दूर फेंक देने के लिए होता है। यही कौशल माया का भी है। जब तक दूरी तय न हो जाय, यह कभी-कभी साधक को घसीटकर बाहर फेंक देती है। ऋद्धियों-सिद्धियों के भँवर पड़ने लगते हैं। उससे वही बच पाता है जिसका भजन जागृत है, भगवान रथी हैं। उन्हीं के निर्देशन में चलकर प्रकृति के द्वन्द्व में भटका हुआ जीव स्वरूप की ओर गमन कर पाता है। केवल राम-राम जपकर या ओम्-ओम् जपकर कोई मुक्ति तक की दूरी नहीं तय कर सकता। वह तभी संभव है जिस परमात्मा की हमें चाह है, हमारी पुकार ऐसी हो कि वह हमारे स्तर पर उतर आये, हमारी आत्मा से जागृत होकर मार्गदर्शन करने लगे। उन्हीं के निर्देशन में जीव ‘उलटि चल्यो नैहरवा’– अपने उद्गम की ओर गमन करता है, भँवर से बच पाता है। इस गौने में बारात कैसी है?
सोलह पाँच पचीस साजि के चल भये चारि कँहरवा।
सोलह तत्त्वों का आपका सूक्ष्म शरीर है– दस इन्द्रियाँ, मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार, तेजस और प्राज्ञ! इन अन्त:करणों में दूसरी तरंगें, दूसरे विचार न आने पायें। इस प्रकार अन्तर्जगत् को साज-सँवारकर, पञ्चमहाभूत– क्षिति, जल, पावक, गगन और समीर– इन पाँच तत्त्वों का पाँचों में सञ्चार पचीस प्रकृति कहलाता है। जैसे– आकाश में पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि सभी हैं, प्रधानता आकाश की है; वायु में पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश सभी हैं, प्रधानता वायु की है। इन पाँचों का जब पाँचों में सञ्चार होता है तब इनमें क्रिया होती है। इनसे उद्भूत पञ्च तन्मात्राएँ– रूप, रस, गन्ध, शब्द और स्पर्श– इन सबको सजाया गया, इष्ट के अनुरूप ढाला गया। आँखें रूप देखती हैं, कान शब्द सुनते हैं, त्वचा स्पर्श करती है। अब तक ये बाहर क्रियाशील थीं, बाहर देखती थीं, हृदय में प्रभु का स्वरूप देखने लगीं। कान बाहर सुनते थे, अब वह शब्द पर तत्पर रहें कि भगवान कहते क्या हैं? एक भी आदेश व्यर्थ न जाय, अनसुना न होने पाये। इन सबको सजाने में चार कहार लगते हैं। नाम, रूप, लीला और धाम– ये चार कहार हैं। गुरु महाराज प्राय: कहा करते थे– बेटा! पहले नाम; नाम से रूप, रूप से लीला और लीला से धाम।
सुमिरिअ नाम रूप बिनु देखें।
आवत हृदयँ सनेह बिसेषें।। (मानस, १/२०/६)
नाम का सुमिरन करें, बिना रूप देखे ही करें। रूप पहले आपने देखा नहीं, ध्यान कहाँ से धर लोगे? इसलिए पहले नाम का सुमिरन करें। जब स्नेह की डोर लग जायेगी तो रूप भी अपने आप उभरकर सामने आ जायेगा, हृदय में प्रकट हो जायेगा। समर्पण और श्रद्धा के साथ नाम जपने से शनै:-शनै: नाम में सुरत लगने लगी तो रूप आ जायेगा। अब आप रूप देखें, ध्यान धरें। किसका ध्यान धरें? कैसे धरें?–सब स्पष्ट हो जायेगा। भगवान सब बता देंगे। फिर लीला! जहाँ स्वरूप देखने लगे, सुरत से डोरी लगी, तहाँ भगवान अपनी विभूतियों से अवगत कराने लगते हैं, इसका नाम है लीला। इस लीला को कागभुशुण्डिजी ने देखा था–
उदर माझ सुनु अंडज राया।
देखेउँ बहु ब्रह्माण्ड निकाया।। (मानस, ७/७९/३)
अनेकों ब्रह्माण्ड देखे, एक-एक ब्रह्माण्ड में सौ-सौ वर्ष तक रहे। उदर में ही अपनी कुटिया में भी निवास किया और अन्त में कहते हैं–
उभय घरी महँ मैं सब देखा।
भयउँ भ्रमित मन मोह बिसेषा।। (मानस, ७/८१/८)
दो ही घड़ी के अनुभव में मैंने यह सब देख लिया। यह अनुभव था। भगवान जब अपनी विभूतियों से अवगत कराते हैं तो आपमें दृष्टि बनकर खड़े हो जायेंगे। सामने स्वयं हो जायेंगे और जो युगों का कोर्स है, आपको दो घड़ी में बता देंगे। इसी का नाम है लीला। जैसे-जैसे आपकी साधना का स्तर उठता जायेगा, लीला भी उन्नत होती जायेगी। शिशु कक्षा के छात्र को पी-एच.डी. तैयार करानेवाला गुरु शोध का विषय नहीं पढ़ायेगा। वह छात्र की क्षमता के अनुरूप ही कुछ बता देगा। भगवान तो भगवान ही हैं। साधक की जो स्थिति है, वह वहीं से पढ़ाने लगते हैं। उनके निर्देशन में चलते-चलते साधक ने लीलाधारी का स्पर्श कर लिया तो धाम! धाम माने परमात्मा का दर्शन, उनका स्पर्श और उनमें स्थिति मिल जाती है। इस प्रकार नाम, रूप, लीला और धाम भक्तिपथ के चार क्रमोन्नत अंग हैं। यही इस पंक्ति में है– ‘सोलह पाँच पचीस साजि के चल भये चारि कँहरवा।’– ये उत्तरोत्तर विकास करते-करते धाम तक पहुँचा देंगे। यदि भगवान आपसे कुछ नहीं कहते, नाम जागृत नहीं है, रूप जागृत नहीं हुआ, लीलाधारी का दर्शन, स्पर्श और विलय नहीं मिला, स्थिति नहीं मिली तो कैसा भजन? इन समस्त प्रक्रियाओं से गुजरते समय माया का पूरा द्वन्द्व आपके साथ-साथ रहता है।
डोली डोली फिरे भँवर में, तीन धार का नरवा।
शरीर एक डोली है। चिन्तन इसके अन्तराल में है। डोली अर्थात् हृदय के अन्दर ही सतत् मनन-चिन्तन करते रहने पर भी तीन धारवाला नाला पार करना पड़ता है जिसमें भँवर उठती रहती है। त्रिगुणमयी प्रकृति ही तीन धार का नाला है। सात्त्विक, राजस और तामस– यह त्रिगुणमयी माया समय-समय पर उड़ेरा (झोंका) देती रहती है। कभी तामसी गुण आ जायेगा तो आलस्य, निद्रा और प्रमाद घेर लेता है। यही है भँवर। कभी राजसी गुणों की प्रबलता हुई तो साधक ऐश्वर्य माँगने लगता है। पड़ गया भँवर। सात्त्विक गुण के बाहुल्य में धारणा-ध्यान-समाधि पराकाष्ठा पर पहुँचते हैं तो अभिमान चढ़ बैठता है कि मेरे जैसा ज्ञानी-ध्यानी कौन है! फिर वह पड़ गया भँवर में। यद्यपि साधक हृदय के अन्दर ही है, चिन्तनरत है फिर भी त्रिगुणमयी प्रकृति के झोंके आते रहते हैं। समर्पण के साथ लगा साधक इससे उबर पाता है अन्यथा कोई न कोई भँवर, कोई न कोई लहर उसे लपेट लेती है। अन्त में कवि कहता है–
सात चारि के बीच घुमाइके, ले गये ससुर दुअरवा।
भगवत्पथ की सात भूमिकायें हैं। पहली भूमिका है शुभेच्छा, शुभ के प्रति इच्छा। इच्छा होगी तो विचार अवश्य होगा। यही है दूसरी भूमिका सुविचारणा। ज्योंही चिन्तन आगे बढ़ा, तीसरी भूमिका तनुमानसा! अभी हमारा तन यह स्थूल शरीर है किन्तु चिन्तन उन्नत होने पर साधक मन में ही तनवाला हो जाता है। मन जितना विकृत, उतना ही तन बाहर और मन जितना संयत, उतना ही भीतर चिंतन टिकता है। मन में ही वह शरीरवाला हो जाता है। चौथी है सत्त्वापत्ति– नित्य, सत्व परमात्मा के प्रति विचार स्थिर हो जाता है, श्रद्धा टिक जाती है। पाँचवीं भूमिका है असंसक्ति अर्थात् आसक्ति का अभाव। संग मिले लेकिन प्रभावित न कर सके। असंग रहने की क्षमता! ऐसा योगी कहीं भी भजन कर सकता है, ठीक वैसे ही जैसे कहीं एकान्त में करता है। प्रकृति के वातावरण का प्रभाव अब उसका स्पर्श नहीं कर पाता।
पूज्य गुरु महाराजजी बताया करते थे कि साधनाकाल में निराधार विचरण के क्रम में वे एक बार मुंबई चले गये। रास्ते में गाड़ी की खटर-पटर या यात्रियों के कोलाहल से भी उनके भजन में बाधा नहीं पड़ी। रास्ते में तीन दिन लग गये और तीन-चार दिनों का उपवास महाराजजी के जीवन में उन दिनों आये दिन की घटना थी। महाराजजी मुंबई में उतर गये। उस दिन उन्हें इतनी तेज भूख लगी कि उनका मन करता था कि हलवाई के जलेबी की थाल ही लेकर भाग चलें। मन में होता था, इसे लेकर भाग तो सकते हैं किन्तु ये लोग पकड़ लेंगे, खाने भी नहीं देंगे, पिटाई ऊपर से पड़ेगी।
महाराजजी हलवाई की दुकान से थोड़ी दूर सड़क के किनारे पटरी पर जमीन पर ही बैठ गये। उन्होंने विचार किया– भोजन की चिन्ता क्यों? जिन प्रभु ने तुम्हें साधु बनाया, वे जानें। महाराजजी भजन में बैठ गये। उनका ध्यान लग गया। समाधि लग गयी। दिनभर उस रास्ते से हजारों गाड़ियाँ आयीं-गयीं, उनके चीखते हार्न; महाराजजी को कुछ पता ही न चला। प्रात: छ: बजे से बैठे महाराजजी को वहाँ शाम के छ: बज गये। जैसे महाराजजी वहाँ थे ही नहीं। महाराजजी के मन में असीम शान्ति और बड़ी मस्ती थी। भूख भी भूल गये थे। इतने में एक भक्त उसी भीड़ में से छँटकर भोजन लेकर आया। उसने कहा– ‘‘सन्तजी!’’ महाराजजी के कान में सुनाई पड़ा ‘गुन्न!’ दूसरी बार उसने कहा– ‘‘सन्तजी!’’ महाराजजी ने सोचा– भगवान अनुभव में हमें साधु कह रहे हैं। उन्हें तब भी भान नहीं हुआ कि बाहर से कोई पुकार रहा है। जब तीसरी बार आवाज आई ‘सन्तजी!’, तब महाराजजी की समाधि टूटी। उन्होंने देखा– एक भाविक थाल लिये खड़ा है। उसने पुन: कहा– ‘‘सन्तजी! प्रसाद पावैं।’’ उसने थाल नीचे रख वहीं महाराजजी को विधिवत् खिलाया, हाथ धुलाया। वह हलवाई भी आकर महाराजजी के चरणों में गिरा। महाराजजी को बड़ी प्रसन्नता हुई कि दिनभर गाड़ियाँ दौड़ती रहीं और उन्हें कुछ पता ही न था। वह कहा करते थे– साधु का भजन तब सही है कि बैण्ड-बाजा बजता रहे और उसे पता भी न चले। कोलाहल होता रहे किन्तु उसे सुनाई न दे।
जब पूज्य महाराजजी भगवान के आदेशानुसार अनुसुइया के घनघोर जंगल में रहने लगे, उनकी तपोभूमि क्रमश: व्यवस्थित आश्रम के रूप में परिणत हो गयी। दूर-समीप के भाविक भक्त गुरु महाराज के दर्शनार्थ आने लगे। कर्वी के एक भक्त ने महाराजजी को एक रेडियो भेंट कर दिया। उन दिनों रेडियो उस क्षेत्र में दुर्लभ वस्तु थी। चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया था। बहुत से भारतीय सैनिक युद्ध में हताहत हो रहे थे। महाराजजी ने एक दिन कहा– ‘‘कोई हमें भी लड़ाई के समाचार सुनाता।’’ उसी सन्दर्भ में उस भक्त ने रेडियो ला दिया और बोला– ‘‘महाराज! अब यह नित्य समाचार सुनाता रहेगा।’’ आश्रम में रेडियो देख हमने गुरु महाराज से कहा– ‘‘महाराजजी! दुनिया रात-दिन यही बाजा सुनती रहती है। संसार की चीख-पुकार से दु:खी लोग जंगल के एकान्त में सन्तों की शरण में शान्ति की खोज में आते हैं। यहाँ भी वही चिल्लपों! इससे लोगों के मन में अभाव होगा कि देखो न, महात्मा होकर भी रेडियो सुन रहे हैं।’’ महाराजजी बोले– ‘‘रेडियो से हमसे कुछ मतलब नहीं है। ई चीनवाली लड़ाई सुनै का मन रहा, ईकै मारा आया है। तू कहत है तो हटा देते हैं। जाने दो।’’ रेडियो जिसका था, उसके पास चला गया आश्रम से बीस-पचीस किलोमीटर दूर कर्वी में।
दो-एक दिन पश्चात् एक ओवरसियर आश्रम पधारे। उन्होंने कहा– ‘‘महाराजजी! सुना है कि आपके पास रेडियो आया है?’’ महाराजजी ने कहा– ‘‘हाँ, आया तो था हो! लेकिन हमार एक शिष्य कहत है लोगन में अभाव हो जाई। ई आपके शोभा नहीं है। दु:खी लोग यहाँ शान्ति के लिए आते हैं कि यहाँ कल्याण के चार शब्द मिलेंगे और यहाँ भी ‘हवा में उड़ता जाये मेरा लाल दुपट्टा मलमल का’ जब यही सुनने को है…..(हँसते हुए) इसीलिए वापस भेज दिया।’’
उन्होंने कहा– ‘‘महाराजजी! जो पूर्णत्ववाले महापुरुष होते हैं, उनके यहाँ अप्सरायें नाचती रहें, छत्तीसों रंग बरसते रहें, उनके ऊपर न शुभ संस्कार पड़ता है न अशुभ संस्कार पड़ता है। गीता में भी तो है महाराज! ‘आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमाप: प्रविशन्ति यद्वत्। तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी।।’ (२/७०)– योगी के कर्म अशुक्ल और अकृष्ण होते हैं।’’
गुरु महाराज ने कहा– ‘‘भाई, मैंहूँ जानत हूँ। मोरेउ लिये कुच्छौ नहीं है लेकिन….. बुला ओके!’’ महाराज ने हमको बगिया से बुलवाया। हमारे आने पर उनका कथन बताया और कहा– ‘‘देख, ई का कहत हैं?’’ हमने कहा– ‘‘महाराज! यह ठीक कहते हैं। पूर्णत्ववाली अवस्था तो आपकी है, हमलोगों की तो नहीं है।’’ महाराजजी ने कहा– ‘‘तू आपन देख! भजन तब सही है जब छत्तीसो रंग बरसते रहें और सुनाई न पड़े, कुछ दिखाई न पड़े। तू कर भजन!’’ फिर रेडियो आ गया। उसमें भी महाराजजी केवल समाचार सुनते थे और दोपहर में गोरखपुर से दो गाने आया करते थे, उसे सुनते थे। विदेशिया और बटोहिया दो अच्छे भोजपुरी गायक उन दिनों थे। महाराजजी उनके लोकगीत सुनते थे। कभी दो-एक गीत भी सुन लेते थे।
रेडियो से समाचार तो नित्य ही प्रसारित होते किन्तु एक भी समाचार हमें सुनायी नहीं पड़ता था; क्योंकि महाराज ने कहा था न कि ‘सुनाई न पड़े’ इसलिए समाचार आने के समय हम अपने चिन्तन में लग जाते, चिन्तन में इतना डूब जाते कि कुछ भी सुनाई न पड़ता। किन्तु एक दिन उस रेडियो पर एक ऐसा गीत आया कि उसका एक-एक शब्द चोट करता गया। गीत के बोल थे– ‘जरा मन की किवड़िया खोल, सैंया तेरे द्वारे खड़े।’ बस इतना ही याद हो पाया और गीत समाप्त हो गया। हमने महाराजजी से कहा– ‘‘वही भजनिया फिर लगा दें, महाराजजी!’’ महाराजजी बोले– ‘‘एहमें एकै बार आवत है रे!’’ जैसे हमारे महाराजजी थे, उतने ही विद्वान हम भी थे। अब भी नहीं मालूम कि रेडियो, टेलीविजन कैसे चलाया जाता है। यह था भगवत्पथ का पाँचवाँ स्तर असंसक्ति।
छठीं भूमिका है पदार्थाभावनी। पदार्थ अर्थात् संसार! पदार्थ है ही नहीं। संसार है ही नहीं। एक ऐसी अवस्था आती है कि,
सीय राम मय सब जग जानी।
करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी।। (मानस, १/७/२)
जहाँ भी दृष्टि पड़ती है, साधक आराध्यदेव के स्वरूप को ही खड़ा पाता है। पदार्थ का अभाव है तो खतरा कौन करेगा?
सरगु नरकु अपबरगु समाना।
जहँ तहँ देख धरें धनु बाना।। (मानस, २/१३०/७)
न स्वर्ग स्वर्ग के रूप में रह जाता है जिसकी हम कामना करें और न नरक ही नरक के रूप में रह जाता है जिससे हम भयभीत हों। यही है पदार्थाभाव अर्थात् पदार्थ का अभाव। सर्वत्र ईश्वरमयी दृष्टि का सूत्रपात् हो जाता है।
भक्तिपथ की सातवीं और अन्तिम भूमिका है तुर्यगा। तुरीयावस्था साधक की रहनी हो जाती है। जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति के अनन्तर तुरीय या समाधि की अवस्था। पूर्वजों ने मन को तुरंग की संज्ञा दी है। साधक अब मनरूपी अश्व का संचालक हो गया। अब यह मन हमें बलात् घसीटकर कहीं फेंक नहीं सकता। भक्तिपथ की ये सातों भूमिकायें और ‘चार घुमाकर’– नाम जपने के चार क्रमोन्नत सोपान– बैखरी, मध्यमा, पश्यन्ती और परा हैं। बैखरी में जिह्वा के द्वारा जपा हुआ राम-राम, ओम्-ओम् उन्नत होने पर मध्यमा में ढल जाता है। मध्यमा पश्यन्ती को जगा देगी। पश्यन्ती परा में प्रवेश दिला देगी और परा की पूर्तिकाल में,
जप मरे अजपा मरे, अनहदहू मरि जाय।
सुरत समानी सबद में, ताहि काल न खाय।।
जप अनिवार्य है। जपना तो पड़ेगा, लेकिन जपते-जपते एक समय ऐसा आता है कि जप मर जाता है। कब? जब अजपा जागृत हो जाय। अजपा मरे कब? जब अनहद की जागृति मिल जाय। आज कोई दो घण्टे भजन करता है, कोई दस घण्टे तो कोई चौदह घण्टे; लेकिन कोई-कोई,
जागत में सुमिरन करे, सोवत में लौ लाय।
सुरत डोर लागी रहे, तार टूटि ना जाय।।
यह है अनहद! जब भजन माप-तौल की सीमाओं से ऊपर उठ जाय। किन्तु अनहद ही सही, भजन करना तो पड़ रहा है। एक समय ऐसा आता है जब सुरत शब्द में समा गयी तो ‘ताहि काल न खाय’– वह अकाल पुरुष में स्थिति प्राप्त कर लेता है। सुरत जिस शब्द को सुन रही थी, उस शब्द में समा गयी। चित्त का निज स्वरूप शून्य हो गया, शब्द मात्र शेष बचा। शब्द ही ब्रह्म है किन्तु इस अवस्था की प्राप्ति के लिए बैखरी, मध्यमा, पश्यन्ती और परा– इन चारों के बीच से घूमना पड़ेगा अर्थात् क्रम-क्रम से चारों स्तर से साधना-भजन करते हुए गुजरना पड़ेगा, योग की सातों भूमिकाएँ तय करनी होंगी। ‘सात चारि के बीच घुमाइके, ले गये ससुर दुअरवा।’ ससुर– स माने वह परमात्मा! उन परमात्मा के आमने-सामने खड़ा कर दिया। अब,
कह पुरुषोत्तम पिया पाइ के, सोवन लागी कोरवाँ।
सात भूमिकायें और जप की चार श्रेणियाँ साधक को ‘ले गईं ससुर दुअरवा’– उन परमात्मा के दरवाजे ले गयीं। सुरत शब्द में समाहित हो गयी। तत्क्षण ‘कह पुरुषोत्तम पिया पाइ के’– जिन्हें प्राप्त कर लेने के बाद इस जीव की प्यास सदा-सदा के लिए मिट जाती है, जीव पूर्ण तृप्ति प्राप्त कर लेता है, आगे कुछ भी पाने की इच्छा शेष नहीं रहती क्योंकि आगे प्राप्त होने योग्य कोई वस्तु बची ही नहीं, कुछ है ही नहीं। उसे पाकर जीव की प्यास सदा के लिए मिट जाती है इसलिए भगवान को एक सम्बोधन ‘पिया’ कहकर भी दिया। उस पिया, परम प्रियतम को प्राप्तकर जीवात्मा ‘सोवन लागी कोरवाँ’– उनके अंक में विश्राम करने लगी। अब, ‘भजन हमार हरि करें, हम पायो विश्राम।’ भगवत्ता को प्राप्त ऐसे महापुरुष पेंशनीयर हो जाते हैं।
राम झरोखे बैठ कर सबका मुजरा लेय।
जैसी जाकी चाकरी, तैसी ताको देय।।
वह राम के साथ झरोखे में बैठ गया। ‘सबका मुजरा लेय’– वह सबकी प्रार्थनायें सुनता है। जिसका जैसा समर्पण और जैसी पुकार है, वैसी व्यवस्था भगवान स्वयं करने लगते हैं। महापुरुष जिस स्वरूप में स्थित हैं, वह स्वरूप व्यवस्था करता है। महापुरुष तो उनकी गोद में निश्चिन्त पड़ा है। पूज्य गुरु महाराजजी इसी को इंगित कर कहते थे– ‘‘हो! मोरे स्वरूप से लोग न जाने क्या-क्या प्राप्त कर लेते हैं, मैं भी नहीं जानता।’’
।। ॐ श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय ।।
(‘अमृतवाणी भाग-5’ से उद्धृत)