प्रश्न – साधक का आचरण कैसा होना चाहिए?
उत्तर :- साधक को उतना ही करना चाहिए जितना कुछ सुतीक्ष्ण ने किया। वे महर्षि अगस्त्य के प्रिय शिष्य थे। जब सुना कि वनवास में पर्यटन करते हुए भगवान इसी जंगल में कहीं आये हैं तो वहीं प्रार्थना करने लगे-
हे बिधि दीन बन्धु रघुराया।
मो से सठ पर करिहहिं दाया।।
(मानस, ३/९/४)
हे विधाता! दीनों पर दया करने वाले प्रभु! क्या मेरे जैसे शठ पर भी दया करेंगे। क्या वे मूर्ख थे? कुछ ही घंटे पश्चात् तो भगवान् मिल गये। वे सोचते हैं-
मोरे जियँ भरोस दृढ़ नाहीं।
भगति विरति न ग्यान मन माहीं।।
नहिं सतसंग जोग जप जागा।
नहिं दृढ़ चरन कमल अनुरागा।।
(मानस, ९/९/६-७)
मेरे हृदय में दृढ़ भरोसा नहीं है, न भक्ति है न वैराग्य है और न मन में ज्ञान ही है। मुझमें न तो सत्संग है न योग है, न जप है न यज्ञ ही है और न तो चरण-कमलों में दृढ़ अनुराग ही है। क्या वस्तुतः उनमें इन गुणों का अभाव था? कदापि नहीं, वे इन सभी गुणों से सम्पन्न थे, ‘मन क्रम वचन राम पद सेवक’ थे। स्वप्न में भी इष्ट के अतिरिक्त किसी अन्य देवता का भरोसा नहीं करते थे। अनन्य श्रद्धा थी उनकी। किन्तु उनके उद्गारों में कितना दैन्य है, कितनी विनम्रता है।
प्रायः आजकल के महात्माओं को घर छोड़ने के चार-छः वर्ष बाद वेश तो मिल जाता है, किन्तु ज्ञान के अभाव में वंश की मर्यादा का पालन करते दृष्टिगत नहीं होते और ऐंठने लगते हैं। पाँच-सात साल में ही समझते हैं कि हम सन्त हैं। कुछ भी उनके सम्मान के विरुद्ध हुआ कि वे बौखला जाते हैं। जो वास्तव में सन्त होते हैं उनकी ऐसी दशा नहीं होती, वे विरही होते हैं। उनको कोई सन्त कहे, राजपूत कहे, अवधूत कहे अथवा जुलाहा ही क्यों न कहे, उनके चित्त पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। उनका चित्त अपने इष्ट-सम्बन्धी तथ्यों के अतिरिक्त कुछ ग्रहण ही नहीं करता। वास्तव में अनुरागी के लिए ही इस पथ का विधान है।
साधक का आचरण भरत-जैसा होना चाहिए। राम वनवास में गये तो भरत विकल होकर उनका पीछा करते चित्रकूट पहुँच गये। राम नहीं लौटे तो खड़ाऊँ प्राप्त हुई। चरण पादुका मस्तक पर रखकर भरत अवध आये। राजपाट देखना तो दूर की बात थी, नन्दी ग्राम में एक कन्दरा बनवायी और उसके अन्तराल में बैठ गये। उस खड़ाऊँ का ध्यान करते हुए अश्रुपूर्ण नेत्रों से रात-दिन बिताने लगे।
हनुमान संजीवनी बूटी ला रहे थे, उसी रास्ते से निकले, तब भी भरत उन्हें विकल की तरह दिखाई पड़े। हनुमान रास्ते भर प्रभु-चरणों में उनके अपार अनुराग की सराहना करते रहे। इतना ही नहीं, अपितु चौदह वर्ष पश्चात् प्रभु-आगमन की सूचना देने हनुमान आये तो उसी दशा में भरत को पाया। राम ने कहा था, ‘‘जाओ, अयोध्या में भरत को सूचना दे दो कि हम आ रहे हैं, अन्यथा कहीं वह प्राण न त्याग दें।’’ पूज्य परमहंस महाराजजी से लोग जब पूछते कि महाराजजी क्या भगवान मिलते हैं? तब महाराजजी कहते थे, ‘‘हाँ हो! काहे न मिलिहैं। यदि अनुरागी को भगवान न मिलिहैं त ऊ मरि न जाई। ऊ प्राण दे देई। मोके मिली के तो स्थिति दिये हैं।’’ साधक का विरह इतना तीव्र होना चाहिए। हनुमान ने भरत की दशा देखी-
बैठे देखि कुसासन, जटा मुकुट कृस गात।
राम राम रघुपति जपत, स्रवत नयन जल जात।।
(मानस, ७/१ ख)
चौदह वर्ष पूर्व भरत की जो दशा थी, उससे भी प्रेमार्द्र दशा में हनुमान जी ने उन्हें देखा। कुश के आसन पर बैठे, जटा का मुकुट, गात कृश है। ‘राम राम रघुपति’ यही जप चल रहा है। हृदय में स्वरूप है, आँखों में अश्रुपात्। ऐसा देखकर हनुमान जी बहुत हर्षित हुए। रोमांच हो आया, अश्रुपात् होने लगा, मन में बहुत सुख माना। अनुरागी भक्त अपने से भी अच्छे अनुरागी को देखकर प्रसन्न होता है, न कि उसे जलन होती है। हनुमान ने अमृत के समान वचन कहा, ‘‘जिनके विरह में दिन-रात सोचते रहते हो, जिनके गुणों की पंक्तियाँ निरन्तर रटते रहते हो, वही राम आ रहे हैं।’’ इतना सुनते ही भरत के सारे दुःख दूर हो गये, मानो प्यासा अमृत पा गया। भरत बोले, ‘‘यह ऐसा संदेश है जिसकी समता का संसार में कुछ है ही नहीं।’’ इष्ट की उपलब्धि ही साधक का सर्वस्व है। वह कभी नहीं भूलता कि इसी के लिए तो वह साधक बना है। अतः पूर्तिपर्यन्त साधक के विरह, वैराग्य, विकलता में न्यूनता तथा शिथिलता नहीं आनी चाहिए। भरत और सुतीक्ष्ण के चरित्र से अपने चरित्र को नहीं जोड़ना चाहिए, उनसे प्रेरणा लेकर अपने को उसी आचरण में ढालना चाहिए। हवा भर भी इष्ट से फासला है, तो भी अपने को साधक ही मानना चाहिए। अनुनय-विनय एवं विकलता में उत्तरोत्तर उत्कर्ष होना चाहिए। इष्ट से सूत भर भी अन्तर है और साधक उस कमी को पूरा करने के प्रयत्न में ढील देता है, तो माया आवृत्त कर सकती है। इस जरा-सी दरार के लिए जड़ भरत को तीन जन्म लेना पड़ा। रंचमात्र ही सही, दूरी तो दूरी ही है। बहुत दूर से दौड़कर आने वाला यदि हताश होकर गंगा से दो हाथ ही दूर बैठ जाय तो गंगाजल का उसके लिए क्या उपयोग? दो हाथ की दूरी से ही तो वह प्यासा मर रहा है। वह दूरी ही उसके लिए योजन है, कणमात्र का अवरोध ही पहाड़ है। परन्तु साधकों को ऐसा समझकर हताश नहीं होना चाहिए कि भगवत्पथ में विघ्न ही विघ्न हैं, कौन इतना झंझट पाले? वस्तुतः भक्तिपथ में कठिनाई कुछ भी नहीं है, पार तो निश्चित है। हाँ, उत्तम साधक को विरह-वैराग्य में न्यूनता नहीं लानी चाहिए।
‘‘सच्चे साधु के लिए सर्वत्र मंगल है। दिखावटी साधु नहीं बनना चाहिए। भगवान ही कुछ बना दें तो बात अलग है। साधक के सुरति की डोरी न टूटने पाये तथा दम्भ न होने पाये तो सब ठीक हो जाता है।’’- अपने शिष्य को ऐसा उपदेश देते हुए एक विचरणशील महात्मा ने कहा, ‘‘बेटा! अपने से कुछ न बनना।’’ शिष्य ने आज्ञा शिरोधार्य की। कुछ दूर चलने के पश्चात् सड़क के पार्श्व में सुरम्य उद्यान दिखाई पड़ा। शिष्य के आग्रह पर महात्मा उस उद्यान में गये, उपवन के जन-शून्य भवन में पड़े एक तख्त पर अपना आसन लगाया। शिष्य भी पार्श्ववर्त्ती कक्ष में पड़ा रहा।
उपवन किसी राजा का था, जो यदा-कदा वहाँ विश्राम करने आ जाता था। संयोग से राजा भी उसी समय आ गया, जिस समय उसके कक्ष में गुरु-शिष्य विश्राम कर रहे थे। सिपाहियों ने लपककर शिष्य को डाँटा, ‘‘कौन हो? जानते नहीं कि यह महाराजाधिराज का विश्रामालय है?’’ शिष्य ने कहा, ‘‘मैं साधु हूँ।’’ सिपाही ने एक थप्पड़ मारा और अपशब्द कहते हुए बाहर ढकेल दिया। राजा दूसरे कक्ष में गये। वहाँ गुरुजी लेटे हुए थे। सिपाही दौड़कर महात्मा पर बरस पड़ा, ‘‘कौन है? महाराज के तख्त पर लेटने का दुस्साहस तुमने कैसे कर लिया?’’ महात्मा चुपचाप उठे और बैठ गये। अंगरक्षक ने अपना प्रश्न दुहराया, ‘‘कौन हो? यहाँ कैसे आ गये?’’ तब तक राजा ने कहा, ‘‘लगता है कोई महात्मा हैं, तभी तो इतने शान्त हैं। इन्हें सादर दूसरे कमरे में ले जाओ।’’ किन्तु विचरण-प्रिय महात्मा नहीं रुके। सड़क पर मिलते ही शिष्य ने कहा, ‘‘महाराज! हमको तो बड़ी मार पड़ी।’’ महात्मा ने कहा, ‘‘कुछ बने होगे।’’ शिष्य ने कहा, ‘‘महाराज! उन्होंने पूछा था कि ‘कौन हो?’ मैंने कह दिया, ‘साधु हूँ।’’ महात्मा ने कहा, ‘‘साधु बन गये न, इसीलिए मारे गये।’’ साधु बनने की वस्तु नहीं बल्कि साधनात्मक क्रिया पकड़कर जब क्रमशः उत्थान करते-करते योगारूढ़ता की स्थिति आ जाये तो मन के निरोधकाल में साध्य वस्तु स्वतः प्रवेश पा जायेगी, साधक को उठा लेगी, साधु बना देगी। जो परमात्मा को साध लेता है, वही साधु है। ढोंग नहीं करना चाहिए।
साधना की अवधि में भयंकर विघ्न आ सकते हैं, लेकिन साधक को चाहिए कि अपनी टेक पर अडिग रहे। प्रण का सच्चा उत्साही ही इस पर चल पाता है। प्रण पर अडिग रहकर साधनारत रहने से विपत्ति भी सम्पत्ति बन जाती है। जैसा अर्जुन या महर्षि काग के जीवन में दृष्टिगोचर होता है। अर्जुन ने उर्वशी को मातृवत् ही देखा, भले ही उसे एक वर्ष के लिए नपुंसक बनना पड़ा। वह शाप भी अज्ञातवास की अवधि में सहायक सिद्ध हुआ, अर्जुन के लिए वही वरदान हो गया। कागभुशुण्डि की दृढ़ता के लिए मिलने वाले शाप के पीछे वरदानों का तांता लग गया। अतः साधक को प्रेरणा लेनी चाहिए। दुष्ट से दुष्ट व्यक्ति में भी एकाध गुण अवश्य होता है। साधक की दृष्टि केवल उसी गुण पर होनी चाहिए।
महात्मा दत्तात्रेय विचरण कर रहे थे। कुत्ता दिखाई पड़ा, किसी ने डण्डा उठाया तो भाग खड़ा हुआ, पुचकारा तो पास चला गया, टुकड़ा फेंका ले लिया अन्यथा बैठा रहा। दत्तात्रेय ने विचार किया कि यह तो गुरुओं का भी गुरु है। उससे सद्गुरुओं की शिक्षा मिली कि अवधूत को सदैव मान-सम्मान से रहित और संतोषी होना चाहिए। वैसे कुत्ते में दुर्गुण भरे पड़े हैं किन्तु दत्तात्रेय का उससे क्या प्रयोजन? अनन्त दुर्गुणों में भी एक गुण दिखाई पड़ा। उन्होंने उसी पर विचार केन्द्रित रखा।
दत्तात्रेय आगे बढ़े। एक अजगर दिखाई पड़ा। इतना मोटा कि सरक भी नहीं सकता था। दिनभर में एक फुट भी नहीं चल पाता था। उन महात्मा को कुतूहल हुआ कि यह जीता कैसे है? खाता क्या है? अतः वहीं आसन लगाकर बैठ गये। देखा, प्रतिदिन कोई न कोई खग-मृग ठीक उसके मुख के सामने पहुँच जाता था, जिसे पकड़कर वह उदरस्थ कर लेता था। अजगर की हिंसक वृत्ति से दत्तात्रेय को कुछ लेना-देना नहीं था। उसमें भी एक गुण दत्तात्रेय को दिखाई पड़ा कि अवधूत को पेट के लिए द्वार-द्वार नहीं भटकना चाहिए। अजगर की प्रशंसा करते हुए दत्तात्रेय चल पड़े कि तुममें भी गुरुओं का एक गुण देखने को मिला है। अजगर दत्तात्रेय का गुरु नहीं था, गुरुओं की विद्या तो कुछ और ही होती है, फिर भी सद्गुरु की रहनी का एक गुण अजगर में भी उन्हें दिखाई पड़ा। सम्पूर्ण भूत-प्राणियों की विभिन्न चेष्टाओं में उन्होंने अपने गुरु अथवा इष्ट को ही देखने का प्रयास किया।
सिमिटि सिमिटि जल भरहिं तलावा।
जिमि सद्गुन सज्जन पहिं आवा।।
एक-एक बूँद करके तालाब भर जाता है। ठीक इसी प्रकार अधिकारी साधक एक-एक करके गुणों का संचय करता है। दूसरों का छिद्रान्वेषण करने से साधक भी उन दुर्गुणों से आक्रान्त हो जाता है। अतः साधक को सदैव सजग रहना चाहिए। किसी महात्मा अथवा सांसारिक जीव की भी निन्दा नहीं करनी चाहिए। परनिन्दा साधक के पतन का कारण भी बन जाती है- ‘परनिन्दा सम अघ न गरीसा।’
साधक को लंगोटी का सच्चा होना चाहिए। जो व्यक्ति दुराचरण से विरत नहीं हुआ है, जिसे एकान्त अच्छा नहीं लगता, जागतिक वस्तुओं के त्याग की भावना जिसके लिए असम्भव है, उसे अक्षयपद की प्राप्ति नहीं हो सकती। जिन वस्तुओं की अधिकता में मूढ़ को अनुराग होता है, उन्हीं की प्राप्ति में प्राज्ञ पुरुष को वैराग्य होता है। विषयों का त्याग दुर्लभ है, तत्त्वज्ञान की प्राप्ति दुर्लभ है तथा सद्गुरु कृपा के बिना सहजावस्था की प्राप्ति दुर्लभ है।
अतः बन्धुओ! अनुभवी सद्गुरु का सान्निध्य प्राप्त करें। मन-क्रम-वचन से उनकी शरणागति का चिरन्तन विधान है। उन महापुरुषों से अन्तःप्रेरणा के स्रोत मिलने लगे, साधक की आत्मा में जागृत होकर वे महापुरुष हृदय में निर्देश देने लगें, तब समझना चाहिए कि साधना का अन्तर्प्रवेश हुआ। वह अन्तर्प्रवेश निवृत्ति का निश्चित स्रोत है। उसे जानने के लिए गुरु के पास जाना ही होगा- ‘तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्’– ऐसा उपनिषदों का निर्देश है। उन महापुरुषों की प्राप्ति में आपका पुण्य माध्यम है। सन्त एवं सद्गुरु जिस दृष्टि से पहचान में आते हैं, वह दृष्टि ही पुण्यमयी है।
(‘प्रश्न समाज के – उत्तर गीता से’ से उद्धृत) * * *