साधना में संयम एवं दृढ़संकल्प का महत्त्व

साधना में संयम एवं दृढ़संकल्प का महत्त्व

तत्त्वदर्शी महापुरुष की सेवा से उनके संरक्षण में अभ्यास करते-करते इष्टोन्मुखी लगन जागृत हो जाती है। उस समय भी साधक के लिए आन्तरिक अनुशासन की बड़ी आवश्यकता होती है। साधना में संयम एवं दृढ़संकल्प का अत्यधिक महत्त्व है। क्योंकि कोई भी पथिक जब इस पथ पर अग्रसर होता है तो पहले कुछ दिन तक तो बड़ा उत्साह रहता है किन्तु कुछ ही काल पश्चात् यह मन बड़ा दुर्धर्ष हो जाता है। साधना में उसे अपनी मृत्यु दिखलाई देती है इसलिए वह पहले से भी विकराल हो जाता है। तुलसीदास जी को भी पहले तो अच्छा लगा था कि हम भजन करेंगे; किन्तु जब निकल पड़े तब वह मन छटपटाने लगा। मन की इस दशा को उन्होंने व्यक्त किया- बिगरत मन संन्यास लेत जल नावत आम घरो सो। (विनयपत्रिका, 173)- भगवन्! संन्यास लेते समय तो बहुत अच्छा लगा कि भजन करेंगे लेकिन संन्यास लेते ही मन ऐसा बिगड़ा जैसा कच्चा घड़ा। कच्चे घड़े में पानी भर दें तो सब जगह से बुनकी-बुनकी करके सहस्रों छिद्रों से चूने लगता है, पूरा घड़ा समाप्त हो जाता है। यही दशा (गोस्वामीजी निवेदन करते हैं) हमारे मन की भी है। जितना आपका सनेह भरा था वह समाप्त हो गया। मन इतना विकराल हो उठता है कि लगता है इष्टोन्मुखी लगन ही नहीं रह गयी। ऐसी स्थिति में महापुरुषों ने मन को बार-बार डाँटा है, इस पर विवेक का अंकुश लगाया है।

प्रत्येक महापुरुष के समक्ष ऐसा अवसर आता है। पूज्य महाराजजी प्रायः कहते थे कि घोर जंगल में एक भजनानन्दी महात्मा रहते थे। रात-दिन भजन में संलग्न रहते थे। लोगों में उनकी अच्छी ख्याति थी किन्तु थे वे साधक ही। हाँ, अच्छी अवस्थावाले साधक थे। एक दिन उनके अन्दर संकल्प उठा कि कढ़ी होती तो खाते। दूसरे दिन से यही संकल्प बढ़ने लगा। जहाँ भजन में बैठे तहाँ दिखायी पड़े कढ़ी। इष्टदेव का ध्यान धरे तो कढ़ाई में बढ़िया-बढ़िया फुलौरी दिखायी पड़े। तब वे मन को समझाने लगे- “रे मन! कढ़ी में क्या रखा है? क्या इसी के लिए घर छोड़ा था? साधक को युक्ताहार करना चाहिए। आज कढ़ी की इच्छा कर रहा है, कल न जाने कौन-सी इच्छा करेगा? रे मन! तू भजन में लग।’’- इस प्रकार स्वयं को बहुत समझाया किन्तु उनके अन्दर से वे भाव गये नहीं। पन्द्रह-बीस दिन के बाद ऐसी दशा हो गयी कि ‘ओम्’ जपने बैठें तो चार-छः बार के पश्चात् ‘ओम्’ तो छूट जाय, ‘कढ़ी-कढ़ी’ ही जपने लगे। पहले ध्यान में गुरु महाराज का रूप रहता था, अब कड़ाही में धरी-धराई कढ़ी गमका करे। नाम में कढ़ी, ध्यान में कढ़ी, चले तो कढ़ी। दिमाग हो गया कढ़ी-कढ़ी।

अब तो उन महात्मा को बड़ा पश्चाताप हुआ कि भगवन्! घर-बार छुड़ाया, घोर जंगल में रहने का सुअवसर भी आपने दिया, महापुरुष की कृपा और सान्निध्य भी प्रदान किया, भजन की विधि भी बतायी; बीच में यह कढ़ी कहाँ से टूट पड़ी? मन को बहुतेरा समझाया किन्तु वह माना नहीं। तब महात्मा ने अपनी छड़ी उठायी और निकटतम गाँव की ओर चल पड़े, जो वहाँ से दो मील की दूरी पर था। गाँववालों ने महात्मा को देखा तो भाव-विभोर हो उठे। कहने लगे- “महाराज! लाख कहने पर भी आप गाँव में नहीं आते थे। आज हमलोगों का परम सौभाग्य है जो आप सहसा पधारे। हमलोगों के लिए क्या आज्ञा है?” महात्मा बोले- “पहले कढ़ी बनाओ।” गाँववालों ने कहा- “महाराज! यह कौन बड़ी बात है। अभी बनाए देते हैं।’’

जब कढ़ी की तैयारी होने लगी तो महाराजजी ने कहा- “एक कड़ाही भरकर लगभग बीस सेर कढ़ी तैयार करना।’’ “जो आज्ञा महाराज!’’ कहकर लोग कढ़ी बनाने में जुट गये। स्वादिष्ट और सुगन्धित कढ़ी तैयार हो गयी। महात्मा बोले- “भाई! किसी को मिलेगी नहीं। हम अकेले खायेंगे। उसे कमरे में रख दो। हम भी उसी कमरे में रहेंगे। बाहर से ताला लगा देना।” फिर तो “जैसी गुरु महाराज की आज्ञा!’’ बाहर से ताला लग गया और भीतर महात्मा कढ़ी पर टूट पड़े।

पहले तो कढ़ी बड़ी स्वादिष्ट लगी। महात्मा ने एक किलो खाया, दो किलो खाया किन्तु कितना खाते? कढ़ी अच्छी ही न लगे, फिर भी महात्मा खाते चले गये। तीन किलो, चार किलो खाया। अरुचि हो गयी, एकदम घृणा हो गयी फिर भी वे खाते रहे। उसी कड़ाही में वमन भी होने लगा फिर भी खाते जाते थे, कहते थे- खाओ! खाओ! और खाओ। अरे! घर-द्वार छोड़ा, जिन्दगी में सब कुछ खाया लेकिन क्षुद्र मन तूने तुच्छ वस्तु के पीछे दो मील तक दौड़ाया, भजन छुड़ाकर लाकर यहाँ पटक दिया। महीने भर से कढ़ी-कढ़ी, कढ़ी-कढ़ी, न राम, न ध्यान! कढ़ी-कढ़ी! ले खा कढ़ी! वमन होती जाय उसको भी मिलाकर खाते जायँ। इतनी घृणा हो गयी कि उधर देखने से शरीर काँप जाता था, खाने को हाथ नहीं उठता था तो अन्त में उसी कड़ाह में कूद पड़े।

लोगों ने ताला खोला तो पूरे कमरे में कढ़ी ही कढ़ी दिखायी पड़ी, पूछा- “महाराज! यह क्या?” महाराज ने कहा कि चिन्ता न करो, अब सब ठीक हो गया। लोगों ने स्नान कराया, आश्रम तक पहुँचाया। उस दिन से कढ़ी तो क्या किसी भी वस्तु के खाने का संकल्प नहीं आया। वस्तुतः यह मन बड़ा दुष्ट है। जब आप चिन्तन-पथ में अग्रसर होंगे, पहले तो बड़ा अच्छा लगता है किन्तु जब आप उधर लग जायेंगे तो धीरे से एक पटरी खींच लेगा। जब आप भजन की पूरी सीढ़ी चढ़ जायेंगे तब भी कुटिलता से बाज नहीं आयेगा, उसी अनुपात का विघ्न भी उपस्थित करेगा।

ऐसा व्यवधान प्रत्येक महापुरुष के समक्ष आता है। महाराज भर्तृहरि उज्जैन के राजा थे। बड़ा सम्पन्न राज्य था। एक समय राजा को रानी में दोष दिखायी पड़ा। संसार से बड़ी घृणा हो गयी, वैराग्य उदित हुआ। गुरु गोरखनाथ की शरण में पहुँच गये। गोरखनाथजी वस्तुतः महापुरुष थे। उन्होंने साधना का क्रम बताया और भर्तृहरि उसी में लग गये। पागलों की तरह, दिगम्बर वेश में, केवल एक चिट लपेटे दिन-रात भजन में संलग्न रहते थे। कभी दो उपवास, कभी तीन उपवास आये दिन की घटना थी। वे दिन में एक बार भिक्षा के लिए निकलते थे। जो स्वतः मिल जाता, स्वीकार कर लेते थे। किसी से न माँगने का उन्हें आदेश था।

एक दिन उनका मन करने लगा कि जलेबी मिलती तो खाते। अब जलेबी दे कौन? भाविक तो बहुत थे, लेकिन किसी को क्या मालूम कि महाराजजी को जलेबी खाने की इच्छा है। एक दिन भर्तृहरि हलवाई की दुकान पर जाकर खड़े हो गये कि कोई भक्त आ जाय और दिला दे; लेकिन भगवान भी बड़े कौतुकी हैं, लम्बी परीक्षा लेते हैं। किसी के मन में जलेबी का भाव ही न आये। महीना, दो-महीना बीत गया। जब भजन में बैठे तो जलेबी, ध्यान में बैठे तो जलेबी, नाम जपे तो जलेबी, भर्तृहरि परेशान हो गये।

एक दिन विवश होकर वे किसी निर्माणाधीन मकान में दिनभर मिट्टी ढोते रहे। सायं उनको कुछ पैसे मिले। मिट्टी से लथपथ हाथों से पैसा लिया। दौड़ते हुए हलवाई के पास गये, ‘जलेबी’ कहते हुए पैसा फेंका। दुकानदार ने टोकरी में जलेबी भरकर दे दी। सस्ती का जमाना था, काफी मिल गयी। मन कहता था- तुरन्त प्रारम्भ हो जाओ। भर्तृहरि ने मन को समझाया- ‘रे मन! तेरे कहने पर मैंने दिनभर मिट्टी ढोयी। देख तो! मिट्टी से सने हाथ हैं। इन्हें गंगा के किनारे धो तो लेने दे।’ दौड़ते हुए गंगा के किनारे पहुँचे। हाथ-पाँव धोया। मन तो जलेबी पर था। रह-रहकर मुँह में पानी भर आता था। यह हो कि कितना शीघ्र जलेबी खा जायँ।

भर्तृहरि बैठकर विचार करने लगे- ओह! ऐसी कौन-सी मिठाई थी जो हमने न खायी हो। केशर-कस्तूरी और मुहरों से छौंककर बननेवाली मिठाई हम खाते थे; किन्तु मैदे से बननेवाली साधारण जलेबियों के पीछे दुष्ट मन ने हमें गिरा दिया। ऐसा विचार आते ही भर्तृहरि जलेबियाँ लेकर बैठ गये। जलेबी मुँह तक ले जायँ- “बड़ी सुन्दर है। कैसी लाल-लाल कुरकुरी जलेबियाँ हैं। रस से ठसाठस भरी हैं।” इस प्रकार मन को ललचावें और एक-एक जलेबी पानी में फेंकते जायँ। जब अन्तिम जलेबी उठायी, पानी में फेंकने चले तो एक छाया सामने आकर खड़ी हो गयी। बोली- ‘‘यह हमको दे दीजिए।’’ भर्तृहरि ने पूछा- ‘‘तुम कौन!’’ वह बोली- “आपकी इच्छाशक्ति!” भर्तृहरि बिगड़े, “हरजाई कहीं की! घर छोड़ा, द्वार छोड़ा, ऐसा कौन-सा मिष्ठान्न था जिसे तूने न खाया हो? किन्तु इच्छा देवी! तूने मुझे अन्ततोगत्वा फाँसी दे ही दी। तूने मुझसे दिनभर मिट्टी ढुलवायी, भजन छुड़वाया, अभी तुझे जलेबी देंगे ही?” इच्छाशक्ति ने कहा- “इस एक जलेबी को खा लें। अब आपको किसी वस्तु की इच्छा नहीं होगी।” भर्तृहरि ने उस जलेबी को खा लिया, पानी पीया और चल दिये। उनकी साधना सुचारु रूप से चलने लगी। उनके जीवन में एक समय ऐसी ही घटना और घटित हुई। बनारस-जैसे पानप्रेमी शहर महोबा की गलियों में भर्तृहरि नंग-धड़ंग चले जा रहे थे। कागज के ऊपर किसी ने पान थूक दिया था। चाँदनी रात थी। लपझप-लपझप वह पीक चमक रही थी। भर्तृहरि ने सोचा- “यह तो मणि हो सकती है। करोड़पतियों का मुहल्ला है। किसी बड़े आदमी की गिर गयी होगी। कोई न कोई तो उठा ही लेगा। क्यों न मैं ही ले लूँ? किसी सेठ-साहूकार को दे दूँगा, उसी से जीवनयापन करते हुए भजन करूँगा।” मन विचलित हो गया। जहाँ हाथ लगाया, तहाँ वह पीक से भर गया। हथेली रंग गयी। रोशनी में देखा तो पश्चाताप करने लगे- “रे दुष्ट मन! तू राजा था, चक्रवर्तियों-जैसा तुम्हारा रहन-सहन था। कौन-सी मणि तुम्हारे सामने से नहीं गुजरी। अरे दुष्ट! तू त्यागी है, महापुरुष का अनुयायी है। भगवान के लिए तू सब कुछ त्यागकर कटिबद्ध था। एक मणि के प्रलोभन में हमें गिरा दिया।” कई दिन उन्होंने उपवास किया, मन को बहुत फटकारा, फिर उसमें सबलता आ गई। यही भर्तृहरि भविष्य में पूर्ण तपोधन महर्षि हुए, जिन्होंने ‘वैराग्यशतक’ लिखा।

वस्तुतः इष्टोन्मुखी लगन जब जागृत होती है तो मायिक प्रवृत्ति उसका पीछा करती है। उसके निवारण के लिए मन को ही सबल और सक्षम बनाया जाता है, उसे अनुशासन में रखना पड़ता है। इन्द्रियाँ बड़ी चंचल हैं। ये सदैव विषयों में ही सुख चाहती हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे नाबदान का कीड़ा बाहर नहीं आना चाहता। इसीलिए कोई साधक महापुरुष के संरक्षण में जाता भी है तो मन शीघ्र ही उचटने लगता है। जहाँ रोटी बनानी पड़ी, बर्तन मलना पड़ा, तहाँ मन सोचता है- “हटो, यहाँ बड़ा कष्ट है। क्या यही करने यहाँ आये हैं? चलो, कहीं बाहर भजन करें।” अरे! भजन क्या खाक करेंगे। महापुरुष के सान्निध्य में सेवा करते-करते इतनी क्षमता आ जाय कि चार घण्टे ध्यान में बैठ सकें, मन रुकने लगे तब बाहर भी भजन होता है। इतने के लिए ही तो महापुरुष की सेवा में रहा जाता है। इतने के पश्चात् महापुरुष आपको अपने पास रखेंगे भी नहीं। सद्गुरु जब किसी को अपनाता है तो गुरु ही बना देता है, चेला बनाकर नहीं रखता। वह झाडू लगवाने के लिए शिष्य नहीं बनाता। वह शिष्य को इसीलिए अपने पास रखता है कि यह हमारी वास्तविक विद्या को सीखे, आचरण में ढाले और रामबाण की तरह इष्ट की ओर सनासन अग्रसर होता जाय।

बन्धुओ! धान के छिलके की भाँति जीव में मल स्वाभाविक है तथापि वह नष्ट अवश्य हो जाता है। अतएव उद्योगी बनो। कठोपनिषद् में निर्देश है, उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत’- उठो! जागो! महापुरुषों के पास जाकर उस क्रिया को सीखो।

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(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)

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