प्रश्न – धर्म के नाम पर कई मज़हब, सम्प्रदाय प्रचलित हैं जिनमें रहन–सहन, खान–पान, वेशभूषा, शादी–विवाह आदि सामाजिक नियमों को लगभग दो हजार वर्षों से धर्म की संज्ञा दे दी गयी है– क्या यही धर्म है? विभिन्न सम्प्रदायों में कई उप–सम्प्रदाय कैसे बने?
उत्तर :- सम्प्रदाय गुरुघराने के ट्रेड मार्क हैं। वस्तुतः ईश्वर एक है, उसे प्राप्त करने की विधि भी एक ही है। उस नियत विधि से साधन करने से मार्ग में मिलनेवाला योगक्षेम एक-जैसा, सुविधा एक-जैसी मिलती है और उन्हीं प्रभु के संरक्षण में चलते हुए प्राप्ति हुई तो उपलब्धि एक-जैसी – उसी अव्यक्त, व्याप्त आत्मा का दर्शन और स्थिति। इस प्रकार भगवत्पथ में कोई सम्प्रदाय हो ही नहीं सकता।
धर्म के नाम पर आजकल जो अनेकानेक सम्प्रदाय, मज़हब फैले हैं यह सभी गुरु घरानों के नाम हैं। यह उन घरानों के पढ़ाने के तरीके हैं। आधी दूरी तक ये अलग-अलग प्रतीत होते हैं लेकिन जब साधना भगवान के निर्देशन में प्रवेश पा जाती है तो साधना एक, सुविधा एक-जैसी, निरीक्षण-परीक्षण और परिणाम एक-जैसा ही रहता है।
आप कान्वेण्ट के हजारों विद्यालयों की वेशभूषा पर दृष्टिपात् करें- कोई पीला है, कोई काला है, कोई श्वेत है तो कोई नीला, गुलाबी, आसमानी। आगे चलकर जब वही छात्र एम.ए., पी-एच.डी. करते हैं तो शिक्षा का स्तर एक-जैसा, परिणाम एक, किसी को कुछ अधिक अंक तो किसी को किंचित् न्यून! भगवत्पथ में कोई चाहकर भी अलग भगवान, अलग धर्म, भिन्न-भिन्न साधन बना ही नहीं सकता। अनुभवी सद्गुरु की शरण-सान्निध्य न मिलने से यह दूरियाँ बनी रहती हैं और उनके मिलते ही यह शान्त हो जाती हैं; क्योंकि वह महापुरुष हृदय से प्रेरणा देकर सही राह पर खड़ा कर देते हैं।
जहाँ तक रहन-सहन, शादी-विवाह का प्रश्न है, भगवद्भक्त को सृष्टि का प्रत्येक कार्य प्रभु में समर्पण करके करना चाहिए। खेत में खुरपी चलाते हों तो समर्पण, अखाड़े में जाते हों तो समर्पण। नौकरी करें, व्यवसाय करें, राजनीति करें, लोहा सुधारें, चमड़ा सुधारें, सोना सुधारें- समर्पण और श्रद्धा के साथ कार्य आरम्भ करें। कार्य सम्पन्न होने पर नमन करें। प्रभु को नमन कर शयन करना, जागने पर नमन करना, चप्पल पहनना, वस्त्र पहनना अर्थात् हर कार्य में प्रभु स्मरण में आते रहें- यही धर्मव्रत है, आर्यव्रत है और सबको ऐसा करना ही चाहिए।
विवाह इत्यादि अवसरों पर कर्मकाण्ड और रस्म-रिवाजों की भिन्नता का आशय यह नहीं है कि कोई अलग धर्म हो गया। वह अपने-अपने ढंग से धर्म को, सत्य को, परमात्मा को साक्षी दे रहे हैं, अन्य कुछ भी नहीं। विविध देशों में प्रभु के समक्ष शपथ और साक्षी बनाने के तरीके अलग-अलग हैं; किन्तु प्रत्येक दशा में वे प्रभु का ही स्मरण करते हैं। वही व्यक्ति जब साधना के प्रशस्त पथ पर आ जाता है तो सबके लिए एक ही विधान है-
जागत में सुमिरन करे, सोवत में लव लाय।
सुरत डोर लागी रहे, तार टूट ना जाय।।
यही श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः।। ८/१४
अर्जुन! अनन्य अर्थात् अन्य न, मेरे अतिरिक्त अन्य किसी देवी-देवता को न भजते हुए जो मुझे भजता है, ‘सततं’– निरन्तर भजता है, उसके लिए मैं सुलभ हूँ। वह मुझे प्राप्त कर लेता है। वह क्षणभंगुर पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता।
(‘प्रश्न समाज के – उत्तर गीता से’ से उद्धृत) * * *