निसिचरि एक सिन्धु महुँ रहई

निसिचरि एक सिन्धु महुँ रहई

प्रश्नमहाराजजी! लंका जाते समय हनुमानजी को सिंहिका मिली थी– ‘निसिचरि एक सिन्धु महुँ रहई।बीच समुद्र में वह किस प्रकार रहती थी कि उसके ऊपर जल का प्रभाव नहीं पड़ता था और वह परछाईं पकड़कर खींच लेती थी। यह परछाईं पकड़ना क्या है?

उत्तर देखिए, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं! आज भी लाखों लोग बीच समुद्र में दिन-रात निवास करते हैं। पनडुब्बियों में भरे लोग अदृश्य भी रहते हैं। दाहिने-बायें जानेवाले किसी भी शत्रु को तुरन्त गिरा देते हैं। आज ही यह साइंस प्रगति पर है, ऐसी बात नहीं है, यह सदैव थी। संघर्ष की पराकाष्ठा पर पहुँचकर यह मन्द पड़ जाती है- कालान्तर में अन्य-अन्य माध्यमों से पनप जाती है। संयोग से इस बार साइंस के पनपने का स्थल भारत से बाहर के देशों में रहा। वैसे तो दुनिया ही एक गाँव है, एक घराना है। जलवायु के अनुसार गोरा-काला, लम्बी-चपटी नाक, कद की लम्बाई इत्यादि का परिवर्तन होता रहता है। आप यहाँ रह रहे हैं, कश्मीर में चार साल रह लें, कुछ गोरे हो जायेंगे। अगली पीढ़ी गुलाब की तरह हो जायेगी।

वैसे यह ‘मानस’ है। मानस कहते हैं- मन को, अन्तःकरण को। ‘रामचरितमानस’ अर्थात् राम के वे चरित्र जो मन में प्रवाहित हैं। इसमें संसार ही समुद्र है, वैराग्यवान् पुरुष ही इसका पार पाता है।

निसिचरि एक सिन्धु महुँ रहई।

करि माया नभु के खग गहई।।

जीव जन्तु जे गगन उड़ाहीं।

जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं।। (मानस, 5/2/1-2)

सिन्धु में एक निशिचरी रहती थी। या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।(गीता, 2/69)- इस जगतरूपी निशा में, चलने और चलानेवाली है, इसीलिए इसका नाम निशिचरी है। यह भवसिन्धु में रहती है, और समुद्र में जिसकी परछाईं पड़ती है उसे दबोच लेती है, फिर वह नीचे गिर जाता है।

गहइ छाँह सक सो न उड़ाई।

एहि बिधि सदा गगनचर खाई।। (मानस, 5/2/3)

वह छाया को पकड़ लेती थी, जिससे जीव-जन्तु उड़ नहीं पाते थे, उनकी गति कुण्ठित हो जाती थी। इसी प्रकार गगनचरों को, आकाश में उड़नेवालों को खा लिया करती थी।

सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा।

तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा।। (मानस, 5/2/4)

वही छल उसने हनुमान के साथ किया। उसके कपटाचरण को हनुमान ने तुरन्त पहचान लिया, फिर तो-

ताहि मारि मारुतसुत बीरा।

बारिधि पार गयउ मतिधीरा।। (मानस, 5/2/5)

तुरन्त उसे मारकर हनुमान समुद्र पार कर गये। वैराग्य ही हनुमान है- मान और सम्मान का हनन करनेवाला है, इसलिए वैराग्यरूपी हनुमान। पक्षी उड़ता तो आकाश में है किन्तु जमीन का सहारा लेता है। केवल वैराग्यवान् पुरुष ही इस संसार-सिन्धु के ऊपर उड़ान भरता है। वह भवसिन्धु से ऊपर उठना चाहता है, उठता भी है और क्रमशः उत्थान करते-करते परम तत्त्व परमात्मा में, भव से परे सत्ता में विलय पा जाता है।

जब पथिक चलता है तब निसिचरि एक सिन्धु महुँ रहई’- दूसरों की इच्छाशक्ति ही निशिचरी है। कोई अच्छा साधक अपनी साधना में अग्रसर होता जाता है तो दूसरे लोग मायिक विचारों को लेकर उससे टकराने लगते हैं। महिलाओं के लिए पुरुष या पुरुषों के लिए महिलायें ऐसा सोचने लगती हैं कि, ‘‘बाबा तो बड़े अच्छे हैं। न जाने कब से कटिबद्ध हैं, ब्रह्मचर्य का पालन कर रहे हैं। कितने अच्छे हैं। हमारे संगी साथी रहे होते तो कितना अच्छा होता।’’- बस विषय की भयंकर वेदना लेकर वह चिन्तन करेंगी। तहाँ उनका चिन्तन ज्यों-का-त्यों वैराग्यवान् पुरुष के शान्त चित्त से टकरायेगा; क्योंकि चित्त तो सबका एक ही है। साधक यह निर्णय नहीं कर पाता कि ऐसा चिन्तन आया कहाँ से। तुरन्त उसी चिन्तन से वह आक्रान्त हो जाता है। वही भाव पनपते-पनपते कुछ ही समय में साधक को इसी संसाररूपी समुद्र में गिरा देता है। संसार ही समुद्र है। जिसमें विषयरूपी जल भरा है; किन्तु-

बार बार रघुबीर सँभारी।

तरकेउ पवनतनय बल भारी।। (मानस, 5/मंगलाचरण, चौ0 6)

जो निरन्तर भगवान का स्मरण करता रहता हैं, जिसमें इष्ट का बल है, जो इष्ट के इशारों पर चलनेवाला है, उस विरक्त पुरुष में तुरन्त इस छल को पहचानने की क्षमता होगी कि हमारे चिन्तन तो गन्दे थे ही नहीं, फिर ये कहाँ से आ रहे हैं? जिसके अन्दर इस चिन्तन के विभाजन की क्षमता होती है, अपने और पराये चिन्तन को जो पहचानने लगता है, उसके ऊपर से इस संकल्पजनित संगदोष का प्रभाव टल जाता है। साधक जान जाता है कि ऐसा बुरा संकल्प कौन कर रहा है? जब चिन्तन हमारा है ही नहीं, किसी अन्य की मनःस्थिति टकरा रही है। दुनिया में सब विषयी ही तो हैं, वे कुछ भी सोच सकते हैं; क्योंकि वे उसी क्षेत्र में खड़े हैं, उसी वायुमण्डल में हैं और वे करेंगे भी क्या? अतः उन्हें माँ अथवा बहन कह दें, तो फिर संकल्पों की लहर, जो साधक से टकरा रही थी, समाप्त हो जाती है। उनकी भाव-भंगिमा बदल जाती है।

संसाररूपी सिन्धु में विषय-रस से ओत-प्रोत दूसरों की इच्छाशक्ति साधक के चित्त को पकड़ती है। यही परछाईं का पकड़ना है। जब साधक का चित्त विषय-चिन्तन में आवृत्त होने लगता है तो वे संस्कार बन जाते हैं। परिणामतः वह श्रेय साधन से गिर जाता है; किन्तु जिस साधक में इष्ट का बल है, अनुभवी आधार पर संकल्पों के विभाजन की क्षमता है, वह इसको सहज ही पार करके आगे निकल जाता है। साधक जानता है कि दुनिया प्रायः वही चिन्तन करेगी जिसमें वह लिप्त है। जिसे सर्प ने काटा है, उसे लहर तो आयेगी ही। साधक भी तो पहले दुनिया में रहकर यही सब चिन्तन करता था। जहाँ संकल्पों के विभाजन की क्षमता आयी, सांसारिक संकल्पों की लहर साधक के मन से विलग हो जाती है; किन्तु यह क्षमता इष्ट को हृदय में सतत सँजोनेवाले साधक में प्रभु की कृपा द्वारा ही आती है। इष्ट द्वारा प्रदत्त अनुभवों के बल पर ही साधक ऐसा कर पाता है।

ताहि मारि मारुतसुत बीरा।

बारिधि पार गयउ मतिधीरा।।

अतः भजन करो। वे दया के सागर हैं। तुम भी पाओगे।

।। ओम् ।।

 (‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)

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