विप्र
प्रश्न– महाराजजी, ब्राह्मण कोई जन्म से होता है कि कर्म–साधना से बनता है? विप्र का वास्तविक स्वरूप क्या है?
उत्तर– देखिये, विप्र ही नहीं शूद्र भी माता से जन्म नहीं लेता। यह योगसाध्य है। भजन की स्थितियाँ हैं। वर्ण पर प्रकाश डालते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं-
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः।। (गीता, 18/41)
हे परन्तप! ‘स्वभावप्रभवैर्गुणैः’- स्वभाव में जागृत गुणों द्वारा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के कर्म विभाजित किये गये हैं। विभाजित वस्तु कर्म है, न कि मनुष्यों को विभाजित किया गया। स्वभाव परिवर्तनशील है, सदैव बदलता रहता है। स्वभाव के परिवर्तन से गुणों में परिवर्तन होता रहता है। अतः गुणों में परिवर्तन होने पर वर्ण-परिवर्तन होना स्वतःसिद्ध है। कर्म की चरमोत्कृष्ट अवस्था में, इच्छाओं सहित अन्तःकरण जीत लेने पर गुणसहित स्वभाव भी शान्त एवं विलीन हो जाता है। इसी अवस्था में परम कल्याण, परमतत्त्व की प्राप्ति होती है जिसे परम नैष्कर्म्य-स्थिति कहते हैं। गोस्वामीजी ने गीता का ही अनुवाद ‘विनयपत्रिका’ में कर दिया है- ‘गुन सुभाव त्यागे बिनु दुरलभ परमानन्द।’ (पद सं. 203)
गुण और स्वभाव के मिट जाने पर ही उस परमानन्द की प्राप्ति सम्भव है। गुणों के अन्तर्गत ही आवागमन है। स्वभाव के जीते-जी प्रकृति जीती है। गुण और स्वभाव के विलय हो जाने पर परमतत्त्व सहज ही प्राप्त हो जाता है। साधना के पूर्तिकाल में गुण और स्वभाव नहीं रह जाते अतः कोई वर्ण भी नहीं रह जाता। जब गुण ही नहीं हैं तो विभाजन किसका हो? वह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र कोई भी वर्ण नहीं रह जाता। आत्मा ही कैवल्य स्वरूप बच रहती है। इस प्रकार चारों वर्ण साधना के चार ऊँचे-नीचे सोपान हैं। कोई भी साधक स्वभाव और गुणों में परिवर्तन लाकर उच्च वर्गों में प्रवेश पा सकता है और अन्त में वर्णों से परे भी हो सकता है। वर्ण का निर्धारण जन्म से नहीं बल्कि स्वभाव में जागृत गुणों से होता है।
अब आइये विप्र की व्युत्पत्ति और पराकाष्ठा पर दृष्टिपात करें। श्रीकृष्ण कहते हैं-
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्।। (गीता, 18/42)
तप (शाश्वत धर्म के लिये इन्द्रियों का तपाना ही तप है। उसके अनुरूप ढालना, उसकी कसौटी पर मन को कसना ही तप है।), इन्द्रियों का दमन, मन का शमन, शुद्धता, अन्तःकरण की शान्ति, ‘आर्जवम्’- सरलता, वास्तविक क्रिया की जानकारी ज्ञान, विज्ञान अर्थात् अनुभवी उपलब्धि, आस्तिक भाव- ये सब ‘ब्रह्मकर्म स्वभावजम्’- ब्राह्मण श्रेणी का कर्म है जो स्वभाव से जन्मा है, उत्पन्न हुआ है। यह ब्राह्मण श्रेणी के कर्म की प्रवेशिका है, निम्नतम सीमा है। ब्राह्मण श्रेणी की पराकाष्ठा में, प्राप्तिकाल में कोई कर्म नहीं रहता; क्योंकि गुण और स्वभाव ही लुप्त हो जाते हैं। ब्राह्मण श्रेणी के कर्म करते-करते गुण स्वभाव से परे होते ही साधक वर्ण से परे हो जाता है। शाश्वत शान्ति को प्राप्त कर लेता है।
कोई भी प्राणी कर्म का सही स्वरूप समझकर इस ब्राह्मणत्व को प्राप्त कर सकता है, ब्रह्म में विलय पा सकता है। सबके लिए इसका समान विधान है। गीता के दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने कहा-
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्।। (गीता, 2/45)
अर्जुन! वेद तीनों गुणों तक ही प्रकाश करते हैं। तू तीनों गुणों से ऊपर उठ अर्थात् वेदों से ऊपर उठ। गुणों से ऊपर उठा तो वेदों से ऊपर उठ गया। किस प्रकार ऊपर उठ? निर्द्वन्द्व, नित्य, सत्त्व वस्तु में स्थित रहते हुए योगक्षेम को न चाहता हुआ, आत्मपरायण हो। प्रश्न उठता है कि हम ही उठें या और भी कोई ऊपर उठा है? वेदों या तीनों गुणों से ऊपर उठ जायेंगे तो हम क्या हो जायेंगे? हमारी स्थिति क्या होगी? श्रीकृष्ण कहते हैं-
यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः।। (गीता, 2/46)
सर्वत्र परिपूर्ण स्वच्छ जलाशय के प्राप्त हो जाने पर छोटे जलाशय (गड़ही) से मनुष्य का जितना प्रयोजन रह जाता है, अच्छी प्रकार ब्रह्म को जाननेवाले ब्राह्मण का वेदों से उतना ही प्रयोजन रहता है। क्षुद्र जलाशय में अधिक से अधिक शौच-क्रिया कर लेते हैं, इससे अधिक मनुष्य के लिये उसका कोई उपयोग नहीं रह जाता। ठीक इतना ही प्रयोजन ब्रह्म को जाननेवाले ब्राह्मण का वेदों से रह जाता है। महापुरुष के लिए वेद नगण्य हैं किन्तु दूसरों के लिए तो वेदों का सब प्रकार से महत्त्व है। वेद ब्रह्म को ही विदित कराते हैं और जिसने ब्रह्म को ही जान लिया उसके लिए वेद का क्या महत्त्व? किन्तु वह गड़ही के रूप में है, क्योंकि इन्हीं वेदों को ही कल्याणोत्थान के लिए निरूपित करता है। अतः अर्जुन! तू तीनों गुणों तथा वेदों से ऊपर उठ। ब्रह्म को जान, ब्राह्मण बन। आज अर्जुन क्षत्रिय है। तात्पर्य यह है कि ब्राह्मण एक स्थिति-विशेष है। कोई भी साधक क्रमशः चलकर उस विप्रत्व में प्रवेश पा सकता है और उसको भी पार करके ब्रह्म को जानकर ब्रह्म में पूर्णस्थिति ही प्राप्त कर लेता है जो विप्रत्व की उच्चतम सीमा है। स्वयं के लिये वह न विप्र है और न शूद्र; किन्तु अन्य के लिये वह विप्रस्वरूप है। अतः किसी जाति-विशेष के लिए ही (जैसा आजकल समाज में प्रचलित है) विप्रत्व का विधान हो, ऐसी बात नहीं है। यदि गीता सत्य है तो उसकी यही व्यवस्था सत्य है। इन्हीं शास्त्रों के माध्यम से हम समझ पाते हैं कि हमारा धर्म क्या है? कर्म क्या है? क्रिया क्या है?
उस विप्र के लक्षण क्या हैं? तत्त्ववित् पुरुष के लक्षण क्या हैं? इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं-
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः।। (गीता, 5/18)
विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण और चाण्डाल में, गाय, कुत्ता तथा हाथी में ‘पण्डिताः’- पूर्ण ज्ञानी लोग ‘समदर्शिनः’- समान दृष्टिवाले होते हैं। उनकी दृष्टि में न गाय धर्म है, न कुत्ता अधर्म। न विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण कोई अधिक विशेषता रखता है, न चाण्डाल कोई हीनता। क्यों? क्योंकि सबके अन्तराल में जिस शाश्वत आत्मा का संचार है वे महापुरुष उसी परमात्मा की स्थितिवाले हैं, सबके मूल में स्थित होते हैं। ऐसे महापुरुष की दृष्टि जब भी किसी पर पड़ती है, उसके आत्मिक प्रसार पर ही पड़ती है। आत्मा पर पड़ती है, चमड़ी पर नहीं। वह जीवात्मा उत्थान अथवा पतन जिस स्थिति में होती है, उसको वहीं से मार्गदर्शन उन महापुरुष द्वारा प्राप्त होने लगता है। यह ब्रह्मस्थित, प्रत्यक्षदर्शी महापुरुष के लक्षण हैं, विप्रत्व की चरम सीमा है।
एक अन्य श्लोक में श्रीकृष्ण बतलाते हैं कि ब्राह्मण कब और कैसे होता है?-
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः।। (गीता, 4/19)
जिस पुरुष के द्वारा सम्पूर्णता से आरम्भ की हुई क्रिया, जिसमें लेशमात्र भी त्रुटि न हो, क्रमशः उत्थान करते-करते इतनी सूक्ष्म हो गई कि ‘कामसंकल्पवर्जिताः’- जहाँ काम और संकल्प नहीं रहते (काम और संकल्प से रहित होना ही मन की विजेतावस्था है क्योंकि संकल्प-विकल्प का उतार-चढ़ाव तो इस मन पर है) तो मन के निरोध के साथ ही ‘ज्ञानाग्निदग्धकर्माणम्’- जिसे हम नहीं जानते हैं, वह शाश्वत, जिसका नाम परमात्मा है, विदित हो जाता है। इसकी प्रत्यक्ष जानकारी का नाम ही ज्ञान है। उस ज्ञान की अग्नि में ‘दग्धकर्माणम्’- कर्म सदा के लिये जल जाते हैं। कर्म अर्थात् आराधना भी समाप्त हो जाती है। आगे कोई ऐसी सत्ता नहीं है जिसे ढूँढे़, इसलिये कर्म सदा के लिए शेष हो जाते हैं। ‘तमाहुः पण्डितं बुधाः’- बोधस्वरूप महर्षियों ने ऐसे ही स्थितिवाले पुरुषों को पण्डित कहकर सम्बोधित किया है। उनकी क्रिया में लेशमात्र भी कसर नहीं है अतः यह ब्राह्मण की अधिकतम सीमा एवं पराकाष्ठा है। वह ब्रह्म को पूर्णरूप से जानता है। ब्रह्म पर है, परब्रह्म से संयुक्त है इसलिये विप्र है। द्वि अर्थात् द्वैत पर जय पानेवाला है, इसलिये द्विज है।
अतः ब्राह्मण, विप्र, द्विज साधना का ही एक स्तर-विशेष है, न कि कोई जन्मना ब्राह्मण होता है। योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ‘स्वभावजम्’- स्वभाव तथा ‘स्वभावप्रभवैर्गुणैः’- स्वभाव से होनेवाले गुणों से निर्धारित होते हैं। कालान्तर में अपभ्रंश हो जाने से लोगों ने अन्तःकरण की वस्तु को बाहर देखने का प्रयास किया इसलिए बहुत-सी जाति, उपजाति और सम्प्रदाय पैदा हो गये। सभी मत-मतान्तर केवल उदर-पोषण की लिप्सा एवं मान-सम्मान की भावना को लेकर बने हैं और बाह्य आडम्बर मात्र हैं। जिससे दबते बना दबा, जिसे दबाते बना दबाया। अन्यथा योगदर्शन, गीता, रामचरित मानस अथवा इसी स्तर के प्रत्येक महापुरुषों की वाणी में अन्य कुछ नहीं मिलता। भगवान महाबीर, गौतम बुद्ध, शंकराचार्य, गुरुनानक1 और तुलसी इत्यादि सभी ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र चारों शब्दों का प्रयोग किया, चारों को स्वीकार किया लेकिन सबकी दृष्टि एक ही है कि आराधना के ही क्रम को चार श्रेणियों में बाँटा गया जिसमें ब्राह्मण एक पवित्र स्थल है। ब्राह्मणत्व की निम्नतम सीमा में ब्रह्म में विलय दिलानेवाले सारे लक्षण होते हैं। विलय के पश्चात् वह स्वयं में न तो ब्राह्मण है न क्षत्रिय, न वैश्य है न शूद्र। यही ब्राह्मणत्व की पराकाष्ठा है। हाँ, दूसरों के लिए वह ब्रह्म का परिचायक, उपदेशक और प्रेरक है। ब्रह्म में विलय दिला देने की उसमें क्षमता है इसलिये वह विप्र ही पुकारा जाता है। नहुष को शाप किन विप्रों ने दिया था? जिन तपोधनों ने उन्हें शाप दिया वे जन्म से कहाँ कुलीन थे? अतः कोई भी व्यक्ति क्रिया पर चलकर विप्र बन सकता है, आप भी बनें। उस वास्तविक क्रिया की जानकारी के लिये तत्त्वदर्शी महापुरुषों की शरण में जायँ क्योंकि वही वस्तुतः विप्रत्व के ज्ञाता हैं। धर्मशास्त्रों2 का यही निर्णय है।
गीता के अनुसार ब्राह्मणत्व अर्जित किया जाता है। यह एक स्थिति है-
ओम् तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा।। (गीता, 17/23)
ओम्, तत् और सत् परब्रह्म परमात्मा का नाम है जो ब्रह्म के ही श्रीमुख से प्रसारित हुआ है। इसी ओम्, तत् और सत् के द्वारा यज्ञ, वेद और ब्राह्मण रचे गये हैं। अस्तु, ब्राह्मण एक रचना है।
यज्ञ एक निर्धारित क्रिया है। जिसमें एक परमात्मा में निष्ठा, सद्गुरु के ध्यान, उनकी सेवा, इन्द्रियों के संयम, मन के निरोध, श्वास-प्रश्वास के यजन से जहाँ प्राणायाम की स्थिति आयी तो सनातन ब्रह्म का दर्शन और प्रवेश यह यज्ञ का पूर्तिकाल है। जहाँ यज्ञ पूर्ण हुआ तहाँ वेद रचे गये। जो तत्त्व अविदित था विदित हो गया। अतः वेद भी रचना है। जिसने उस प्रभु को विदित कर लिया, ब्रह्म का दर्शन, स्पर्श और स्थिति पा गया, वह ब्राह्मण है। अतः ब्राह्मण एक रचना है न कि संसार के मनुष्यों की कोई प्रजाति।
।। ओम्।।
1. गुरुनानक– ‘योग शब्द गियान शब्द ते ब्राह्मन।’ ज्ञान और योग शब्द में पाये जानेवाले भेद को जो यथार्थतः जानता है, विप्र है।
2. बृहदारण्यक उपनिषद्, तृतीय अध्याय अष्टम ब्राह्मण में जनक की यज्ञसभा में याज्ञवल्क्य गार्गी को बताते हैं- गार्गी! उस परमतत्त्व को ब्रह्मवेत्ता अक्षर कहते हैं। जो उस अक्षर को जानता है, वही ब्राह्मण है।
वास्तव में जो भी व्यक्ति ब्राह्मणत्व के गुणधर्मों से युक्त है, वही ब्राह्मण है। वही सृष्टि में सर्वोपरि, एकमात्र पूजनीय है, इसमें दो राय नहीं है। अतः महापुरुषों की जाति, वेष इत्यादि बाह्य गुणधर्मों पर दृष्टि नहीं रखनी चाहिए।
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(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)