गायत्री

गायत्री

वेदमाता गायत्री, ब्राह्मणमाता गायत्री

गायत्री कणकण में व्याप्त परमात्मा के प्रति अपने आपको समर्पित करने का संस्कृत भाषा में एक सूत्र है।स्वामी अड़गड़ानन्द

प्रश्नगायत्री क्या है? इसे वेदमाता और ब्राह्मणमाता क्यों कहा जाता है?

उत्तरधर्मानुरागियों को गायत्री का महत्त्व अच्छी तरह से ज्ञात है। यह एक सिद्धिदायिनी मन्त्र के रूप में प्रतिष्ठित है। धर्म का प्राण वेद और वेद-माता गायत्री, धर्मोपदेशक ब्राह्मण और ब्राह्मण की माता गायत्री! गायत्री-जप ब्राह्मण का अनिवार्य दैनिक कर्म है। आजकल इसके महत्त्व का उद्घोष करने के लिए एक धार्मिक संस्था भी बन गयी है, जो ‘गायत्री परिवार’ के नाम से जानी जाती है। हर महीने एक पत्रिका और प्रतिवर्ष एक अच्छे आकार की पुस्तक भी प्रकाशित होती है, जिसके माध्यम से गायत्री के महत्त्व का विवेचन किया जाता है। गायत्री के एक-एक शब्द और एक-एक अक्षरों की धर्म-विज्ञान और योगशास्त्र की दृष्टि से व्याख्या की जाती है। जीवन में लौकिक तथा पारलौकिक सुखों की अनुभूति इसके पाठ और सतत अभ्यास के द्वारा ही सम्भव बतायी जाती है। आइये, इसके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का अवलोकन करके इसके उद्भव का पता लगायें।

प्राचीनकाल में गाधि के पुत्र ‘विश्वरथ’ नामक एक क्षत्रिय राजा थे, जो बाद में अपने गुणों के कारण विश्वामित्र के नाम से विख्यात हुए। राजा विश्वरथ एक बार अपनी सेना के साथ शिकार के लिए वन में गये। बहुत देर शिकार करने के उपरान्त भूखे-प्यासे और थके हुए राजा घूमते-फिरते सेनासहित मुनि वशिष्ठ के आश्रम में पहुँचे। मुनि वशिष्ठ ने सेनासहित राजा का जो शाही सत्कार किया, उसे देखकर राजा विश्वरथ आश्चर्यचकित हो गये। आश्चर्य की बात थी घोर जंगल में सुख-सुविधा की चीजों का पर्याप्त मात्रा में होना। आश्रम की व्यवस्था के बारे में प्रश्न करने पर मुनि वशिष्ठ ने बताया कि आश्रम में एक गाय है नन्दिनी (कामधेनु की पुत्री), उसी की कृपा से व्यवस्था हो जाती है।

नन्दिनी के प्रभाव को देखकर राजा ने सोचा, यह तो एक रत्न है और रत्न राजाओं को शोभा देता है, इनके पास रहकर क्या करेगी? मुनि वशिष्ठ के पास पहुँचकर राजा ने कहा कि नन्दिनी को मुझे दे दीजिए। मुनि वशिष्ठ ने कहा- इसी के सहारे इस घोर जंगल में आश्रम चल रहा है। मेरे यज्ञ इत्यादि इसी के द्वारा सम्पन्न होते हैं। मैं इसे नहीं दे सकता। राजा विश्वरथ ने पहले अनुरोध किया, फिर हठ किया और अन्त में बल-प्रयोग पर उद्यत हो गये। उन्होंने सैनिकों को आदेश दिया कि नन्दिनी का अपहरण कर लो। फिर क्या था, सैनिक बलपूर्वक नन्दिनी को खींचने लगे। इतने में नन्दिनी ने क्रोधित होकर अपना शरीर हिलाते हुए जोर से हुँकार किया। उसके शरीर से स्फुर्लिंग निकले, जिससे यवन, शक, म्लेच्छ इत्यादि अनेक जातियों के सैनिक हाथों में शस्त्र लिए निकल पड़े। उन सैनिकों ने राजा के सैनिकों को खदेड़ दिया। पुनः विश्वरथ ने तप के प्रभाव से प्राप्त किये बहुत से अस्त्रों को मुनि वशिष्ठ पर चलाया। मुनि वशिष्ठ ने जब देखा कि मेरे ऊपर अस्त्र आ रहे हैं तो उन्होंने अपने सामने एक दण्ड गाड़ दिया और निश्चिन्त होकर बैठ गये। विश्वरथ के द्वारा चलाये गये सभी अस्त्रों को उस डण्डे ने भस्म कर दिया। हताश होकर विश्वरथ ने अपने क्षात्र तेज की भर्त्सना की-

धिग्बलं क्षत्रियबलं ब्रह्मतेजो बलं बलम्।

एकेन ब्रह्मदण्डेन सर्वाणि अस्त्राणि हतानि मे।।

अन्त में उन्होंने निश्चय किया कि मैं तपस्या के द्वारा ब्राह्मणत्व प्राप्त करूँगा। घर आकर राज्य का भार पुत्रों को सौंपकर वन चले गये। उन्होंने घोर तपस्या आरम्भ की। स्वर्ग में निवास करनेवाले देवताओं को भय हुआ। उन्होंने विश्वामित्र की तपस्या नष्ट करने के कई प्रयास किये।

सर्वप्रथम स्वर्गलोक की अप्सरा मेनका आयी। उसने बड़ी अनुनय-विनय के साथ रातभर कुटी में रहने के लिए शरण माँगी। दयावश उन्होंने शरण दे दी। लेकिन उसके अप्रतिम सौन्दर्य का जादू विश्वामित्र के ऊपर (मन पर) ऐसा छाया कि काम के वशीभूत होकर अपना धैर्य भी खो बैठे। फिर वह उनके आश्रम में बहुत दिनों तक बनी रही। उसने एक कन्या को जन्म दिया और अदृश्य हो गयी। उसके विरह में व्याकुल विश्वामित्र जंगल में उसे ढूँढ़ रहे थे, उसी समय आकाशवाणी हुई- ‘ब्रह्मतेज प्राप्त करने चले थे, तुम तो पतित हो गये।’

पुनः उसी निश्चय से विश्वामित्र ने तपस्या आरम्भ की। कुछ दिनों उपरान्त इन्द्र ने फिर एक चाल चली। उसने राजा अम्बरीष के यज्ञ का घोड़ा चुरा लिया। घोड़ा के स्थान पर बलि देने के लिए सुनश्शेफ नामक एक मुनिकुमार को खरीदा गया। संयोगवश वह विश्वामित्र का भानजा लगता था। उसने उनसे प्राणरक्षा की याचना की। विश्वामित्र ने अपने सौ पुत्रों में से किसी एक को उसके बदले में जाने को कहा; परन्तु उनके पुत्र इस बात पर राजी नहीं हुए। परिणामस्वरूप विश्वामित्र क्रोधित हो उठे और उन्होंने अपने ही पुत्रों को नष्ट हो जाने का घोर शाप दे दिया। पुनः आकाशवाणी हुई- ‘विश्वामित्र! तुम क्रोध के कारण पतित हो गये।’ पुनः तपस्या में लीन होने पर एक बार राजा त्रिशंकु को स्वर्ग पहुँचाने में तपस्या नष्ट हुई। एक बार भगवान शिव ने परीक्षा ली, उसमें भी वे असफल रहे। एक बार रम्भा अप्सरा के कारण तपस्या नष्ट हुई।

वास्तव में काम और क्रोध साधन-पथ के सबसे बड़े शत्रु हैं, जो जरा-सी असावधानी में वर्षों की तपस्या (परिश्रम) पर पानी फेर देते हैं। आज प्रत्येक मानव के समक्ष विश्वामित्र की वही अवस्था, वही ऊहापोह और वे ही साधन की समस्यायें उपस्थित हैं।

इस प्रकार बार-बार आनेवाले विघ्नों को देखकर विश्वामित्र ने सोचा- मैं अथक परिश्रम करता हूँ, अपनी बुद्धि और विवेक से लेशमात्र भी त्रुटि नहीं होने देता, फिर भी कोई-न-कोई भूल हो ही जाती है। बहुत सोच-विचार के उपरान्त उन्होंने निर्णय लिया कि क्यों न मैं अपने आपको भगवान को समर्पित कर दूँ- अपना मन, बुद्धि, हृदय सब उन्हीं को सौंप दूँ। मेरे योगक्षेम का वे ही निर्वाह करेंगे। ऐसा निश्चय करके विश्वामित्र भाव-विभोर हो पुकार उठे-

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।। (ऋग्वेद, 3/62/10)

ॐ शब्द से उच्चरित, तीनों लोकों में तत्त्वरूप से व्याप्त, स्वयं प्रकाशरूप, वरण करने योग्य एकमात्र शरणस्थली प्रभु हमें वह बुद्धि दें, जिससे मैं आपको तत्त्वरूप से जान सकूँ। परमश्रेय को प्राप्त कर सकूँ।

मानव मात्र को आज उसी समर्पण भाव के इस छन्द का अध्ययन, चिन्तन और मनन करना चाहिये। इस प्रकार सर्वभावेन प्रभु को समर्पित होकर जब विश्वामित्र ने पुनः तपस्या प्रारम्भ की, तो निरन्तर वे आगे बढ़ते गये। कई बार विघ्न उपस्थित करनेवाले देवता घबड़ा गये। काम और क्रोध का कहीं पता नहीं, रबि सन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं। (रामचरितमानस, 7/71/8) जहाँ भगवान ही स्वयं रक्षक के रूप में खड़े हैं, वहाँ कोई क्या कर सकता है। देवताओं ने ब्रह्माजी से जाकर प्रार्थना की कि जो माँगें वह देकर उनकी तपस्या समाप्त कराइए अन्यथा उग्र तप से हम सब जल जायेंगे।

ब्रह्माजी विश्वामित्र के पास पहुँचकर बोले- आज से आप जितेन्द्रिय ब्रह्मर्षि हुए। विश्वामित्र की मनोकामना पूर्ण हुई। बोले- मैं ब्रह्मर्षि हूँ, ब्राह्मण हूँ। ब्राह्मण की जननी कौन? गायत्री! मतलब क्या? उस परम प्रभु, शाश्वत प्रभु के प्रति मन, वचन और कर्म से समर्पण का नाम ही गायत्री है। उनके ऊपर निर्भर होकर चिन्तन में लग जाओ। जब वे प्रार्थना सुन लेंगे तब परमश्रेय की प्राप्ति करा देंगे।

विश्वामित्र ने कहा- जब मैं ब्राह्मण हूँ तो वेद हमारा वरण करे। ब्रह्माजी ने ‘तथास्तु’ कहा और वेद विश्वामित्र के हृदय में उतर आया। जो तत्त्व विदित नहीं था, वह विदित हो गया। वास्तव में परमात्मा की प्रत्यक्ष जानकारी का नाम ही वेद है। अविदित तत्त्व का विदित हो जाना ही वेद का हृदय में उतरना है। यह भगवत्-कृपा से ही सम्भव है। इसीलिए वेदों को अपौरुषेय कहा जाता है। वेद किसी पुस्तक का नाम नहीं है। जो पुस्तक हमें वेद के रूप में उपलब्ध है वह तो उसकी प्रवेशिका मात्र है, जो प्रेरणा देती है। विश्वामित्र के हृदय में वेद उतारने का श्रेय किसे मिला? गायत्री को! वेद की जननी कौन? गायत्री!

इस प्रकार गायत्री एक निर्णायक उपदेश है। कण-कण में व्याप्त परमात्मा के प्रति अपने आपको समर्पित करने का संस्कृत भाषा में एक सूत्र है। इसमें कोई देवी-देवता नहीं हैं; किन्तु इसी वाक्य को लेकर कोई गायत्री देवी की प्रतिमा बना लेता है, तो कोई इसे तीन भागों में विभक्त करके उलट-पलटकर क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और महेश का ध्यान करता है। कुछ लोगों का कहना है कि यह अति गोपनीय महामन्त्र है। इसे उलटकर ‘तयादचोप्र नः यो’ जाप करने का विधान है। विश्वामित्र के जीवन से ही स्पष्ट हो गया होगा कि साधन-पथ में देवता ही सबसे बड़े शत्रु हैं। फिर भी जन्म-जन्मान्तर से हमारा मस्तिष्क देवता से इतना प्रभावित हो गया है कि हमें जो भी अच्छा लगा, उसे देवता मानकर पूजा शुरू कर देते हैं।

एक शाश्वत स्वयंप्रकाशस्वरूप प्रभु के प्रति समर्पण करते हुए कर्म (तप) में लगने का नाम गायत्री है। यदि आप इस प्रकार से लगते हैं तो सफलता अवश्य मिलेगी। उस सर्वशक्तिमान प्रभु से निर्मल बुद्धि, जो परमश्रेय को दिलानेवाली है, प्राप्तिहेतु गायत्री एक प्रार्थना मात्र है। तदर्थ कर्म भी करना होगा। ऐसा नहीं कि जीवनपर्यन्त प्रार्थना मात्र ही करते रहें और नियत कर्म पर ध्यान न दें। ऐसी दशा में परिणाम कुछ भी नहीं निकलेगा। नियत कर्म ही वह साधन है जो लक्ष्य तक पहुँचा सकता है। कर्म निर्विघ्न होता रहे, इसी के लिये प्रार्थना की जाती है।

समर्पण के साथ कोई दो-ढाई अक्षर का नाम लेकर जप शुरू करें। किसी अनुभवी महापुरुष की शरण लेकर आगे बढ़ते रहें, तब ब्राह्मणत्व का जन्म होगा, तत्पश्चात् वेद का आविर्भाव होगा। आपके हृदय में इन्हीं दोनों का जन्म गायत्री है। जब विश्वामित्र पूर्ण हो गये, वेदज्ञ और ब्रह्मस्थित हो गये, तब आगे कोई ऐसी सत्ता नहीं जिसकी शोध करते। जब खुद ब्रह्मस्वरूप में स्थित हो गये, तो किसकी प्रार्थना करते और क्यों करते? जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई। (रामचरितमानस, 2/126/3) अब वे गायत्री के द्वारा किसका आवाहन करते? गायत्री का महत्त्व क्षत्रिय श्रेणी के साधक के लिए होता है; क्योंकि सर्वभावेन समर्पण की क्षमता ऐसे ही साधकों में होती है। जिसमें ईश्वर के लिए तड़पन पैदा हो गयी हो, ईश्वर के वियोग में एक-एक पल कल्प के समान बीतता हो, वही गायत्री का अधिकारी है, अन्य नहीं। वैश्य और शूद्र स्तर के साधकों में भली प्रकार समर्पण हो भी नहीं सकता। यह ध्यान देने की बात है कि यह स्तर क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जातिवाचक नहीं अपितु एक ही साधक के चिन्तन के सोपान हैं। साधना के उन स्तरों पर पहुँचकर क्रमशः चारों सोपानों को पार करते हुए साधक परमसिद्धि को प्राप्त कर लेता है।

एक कर्मकाण्ड के जानकार लड़के से मैंने पूछा कि गायत्री क्या है? वह बोला- महाराज! जैसे बल बुधि बिद्या देहु मोहि, हरहु कलेस बिकार।’- ऐसी ही एक प्रार्थना है। मैंने पूछा- दोनों में क्या अन्तर है? उसने कहा- बल, बुद्धि, विद्या भगवान के सेवक से माँगी गयी और ‘गायत्री’ वाली सीधे भगवान से माँगी गयी है।

जब माँगना ही है तो सीधे भगवान से माँगना ठीक है- तुलसी मूलहि सींचिए फूलइ फरइ अघाइ।नीचेवाले क्या देंगे? भक्ति का मार्ग देंगे! सद्गुरु के बिना भक्ति नहीं मिलती। संतो! भगति सद्गुरु आनी।(सन्त कबीर)

।। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।।

(शंका-समाधानसे उद्धृत)

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