जाति–प्रथा
प्रश्न– महाराजजी, आज की जाति–प्रथा कहाँ तक उपयोगी है?
उत्तर– देखिये, वर्ण-व्यवस्था को लेकर दुनिया में पर्याप्त झगड़े हैं। देश-विदेश में लाखों जातियाँ एवं उपजातियाँ प्रचलित हैं और न जाने कितनी अतीत के गर्भ में विलीन हो गयीं। किन्तु गीता, रामायण इत्यादि प्रमुख भारतीय ग्रन्थों में ऐसा कुछ नहीं है। योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार, दुनिया में सभी मनुष्य केवल दो प्रकार के होते हैं- एक देवता-जैसा, दूसरा असुरों-जैसा। इस विभाजन का आधार क्या है? वस्तुतः अन्तःकरण की दो प्रवृत्तियाँ पुरातन हैं- एक दैवी सम्पद्, दूसरी आसुरी सम्पद्। आसुरी सम्पद् अधोगति और नीच योनियों के लिए होती है और दैवी सम्पद् परम कल्याण के लिए होती है। जिस हृदय में दैवी सम्पद् कार्य करती है वह मनुष्य देवताओं-जैसा है और जिस हृदय में आसुरी सम्पद् कार्यरत है वह मनुष्य असुरों-जैसा है। एक अधोमुखी है तो दूसरी ऊर्ध्वमुखी। एक ईश्वर में विश्वास करती है तो दूसरी प्रकृति में। आसुरी सम्पद् अधोगति और नीच योनियों में ले जाने के लिए होती है, तो दैवी सम्पद् परमकल्याण के लिए होती है।
दैवी एवं आसुरी सम्पद् के लक्षण क्या हैं?- श्रीकृष्ण ने इस पर भी प्रकाश डाला। इन्द्रियों का दमन, मन का शमन, एकाग्रता, धारावाही चिन्तन की प्रवृत्ति, विवेक, वैराग्य, ईश्वर की वास्तविक जानकारी, शरणागति, सरलता- इस प्रकार चौबीस लक्षण गिनाये जो सब-के-सब तो किसी पहुँचे हुए महापुरुष में अथवा उनके समीप की अवस्थावाले में सम्भव है। आप में भी हो सकते हैं, हममें भी हो सकते हैं। यह दैवी सम्पत्ति परमकल्याण के लिए है। अर्जुन! तू दैवी सम्पत्ति को प्राप्त हुआ है। तू मुझमें निवास करेगा। शोक मत कर।
आसुरी सम्पत्ति के लक्षण बताते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं- काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, आशा, अनन्त तृष्णा- सभी आसुरी सम्पद् हैं। आसुरी सम्पद् से आप्लावित पुरुष सोचता है कि स्त्री-पुरुष के संयोग से जितनी वस्तु दुनिया में दिखाई पड़ती है, उतना ही सत्य है, ईश्वर नाम की कोई सत्ता नहीं है। मैं ही ईश्वर एवं ऐश्वर्य का भोक्ता हूँ। वह सोचता है कि मेरे पास इतनी सम्पत्ति है, भविष्य में इतनी और हो जायेगी। मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा और यश को प्राप्त होऊँगा। ऐसे पुरुष यज्ञ और दान भी केवल दिखावे के लिए ही करते हैं। उनकी दृष्टि में ईश्वर अनावश्यक है। वे प्रकृति में ही विश्वास करनेवाले हैं, इसीलिए असुर कहलाते हैं। परमदेव परमात्मा पर निर्भर रहनेवाले सुर कहलाते हैं और सुरत्व से विमुख प्रकृति-प्रधान लोगों को असुर कहा जाता है। ज्यों-ज्यों व्यक्ति में दैवी सम्पत्ति संग्रहीत होती जायेगी, त्यों-त्यों वह देवत्व की ओर अग्रसर होता जायेगा। क्रमशः उन्नत होते-होते सर्वथा निरोधकाल में, ध्यान और समाधि की अवस्था में, वह परमदेव परमात्मा का प्रतिबिम्ब पा जाता है। दिग्दर्शन के साथ ही वह उसी परमतत्त्व परमात्मा में प्रतिष्ठित हो जाता है। फिर तो वह स्वयं परमानन्द स्वरूप है, शाश्वत है; जिसे श्रीकृष्ण ने इंगित किया- ‘अर्जुन! तू मुझमें निवास करेगा। जीवभाव में नहीं।’
कभी-कभी मनुष्य दैवी सम्पत्ति की ओर अग्रसर तो नहीं हो पाता किन्तु मन में विकलता रहती है कि काश! हम भी करते। इस दशा में स्पष्ट है कि उसके अन्तर्गत वह दैवी सम्पद् कार्यरत है। देवता की ओर उन्मुख तो है किन्तु सफल नहीं हो पाता, कर नहीं पाता – ऐसी स्थिति में वह सामान्य मानव है। जब वह इस पथ पर चलने में सफल होता है तो देवताओं-जैसा है और जब वही प्रकृति-प्रधान होता है तब मानव भी नहीं है। उस समय मानवाकृति होते हुए भी वह असुरों-जैसा है। ‘खाओ पीओ मौज करो’ तक ही उनकी दृष्टि सीमित है। वे ‘संसार’ में शोध के लिए चलते हैं किन्तु जब शरीर ही नश्वर है तो उसका भोग्य ‘संसार’ कब सत्य होगा। इसीलिए शरीर के साथ ही उनकी सारी शोध शान्त हो जाती है, जबकि दैवी सम्पद् उत्तरोत्तर बढ़ती ही जाती है नष्ट तो कभी नहीं होती; ‘अनेकजन्मसंसिद्धः’ तक का विधान है। मान लीजिए इस जन्म में आपसे थोड़ा भी चलते बना और शरीर का समय समाप्त हो गया तो भविष्य के जन्म में साधन वहीं से पुनः आरम्भ होता है जहाँ से छूटा था और क्रमशः चलते-चलते ‘अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्।’ (गीता, 6/45) अनेक जन्मों के परिणाम में वह वहीं पहुँच जाता है जिसका नाम परमसिद्धि अर्थात् परमात्मा है। श्रीकृष्ण कहते हैं- वह मेरा निजस्वरूप है।
जब से सृष्टि में सभ्यता आयी (वैसे सृष्टि अनादि है। कब से जागृति आयी- यह कहना असम्भव है। कोई भी आदिवासी नहीं है), सुदूर अतीत में यही दो जातियाँ थीं- सुर और असुर। देवासुर संग्रामों से शास्त्र भरे पड़े हैं। वास्तव में मनुष्य के यही दो स्वरूप हैं; आज के शब्दों में, एक आस्तिक और दूसरा नास्तिक। यही विभाजन सदैव रहा है और रहेगा। वैदिककाल की यह शोध अक्षुण्ण है।
प्रश्न– महाराजजी! तब तो आज जो नास्तिक है, सदैव नास्तिक ही बना रहेगा?
उत्तर– नहीं, ऐसी बात नहीं है; क्योंकि सभी के अन्तःकरण में दोनों प्रवृत्तियाँ विद्यमान हैं। जब आसुरी प्रवृत्ति बलवती होती है तो दैवी सम्पत्ति प्रसुप्त होती है, लेकिन वह मर नहीं जाती। कहीं ठोकर लगने से अथवा सत्संग से सत्संस्कार पड़ते ही दैवी सम्पत्ति उद्दीप्त हो उठती है और आसुरी सम्पत्ति सुप्त होती जाती है। शनैः-शनैः वह परमदेव का देवत्व प्राप्त कर लेता है। अन्तःकरण की दोनों प्रवृत्तियों का उतार-चढ़ाव तब तक रहता है जब तक इष्ट के अंक में प्रवेश नहीं मिल जाता। जब तक साधना इतनी उन्नत नहीं हो जाती कि ईश्वर ‘उर प्रेरक’ के रूप में संचालन करने लगे, तब तक आसुरी प्रवृत्ति कामयाब होती रहती है।
वाल्मीकि नास्तिक थे। डाका, चोरी, हत्या ही उनके स्वभाव में था। नारदादि ऋषियों को भी न छोड़ा। पेड़ से बाँध दिया। किन्तु उन महापुरुषों की संगति से उनके अन्तःकरण का दस्यु स्वभाव समाप्त हो गया और वे ब्रह्मर्षि के पद पर प्रतिष्ठित हो गए। संतों का संग करो, टूटी-फूटी सेवा करो, उनके द्वारा निर्दिष्ट साधना पकड़ो। सब उसी पथ के पथिक हैं। नास्तिकता तो संगति के अभाव में पड़ी एक भँवर मात्र है। आस्तिकता, आत्मदर्शन की प्रवृत्ति सबमें है।
अन्तःकरण की इन्हीं दो प्रवृत्तियों के आधार पर मनुष्य दो जाति, दो स्वभाव अथवा दो प्रकार का होता है। सुदूर अतीत में देवासुर जातियों का उल्लेख इसी तथ्य को इंगित करता है। कालान्तर में किसी ने किसी पर विजय पायी, उसके नाम पर वंश एवं जाति-परम्परा का उद्भव हुआ। क्रमशः यक्ष, रक्ष, किन्नर, गन्धर्व इत्यादि जातियों का सृजन हुआ। मंडूक, वानर, ऋक्ष इत्यादि जातियाँ फैलीं। वे बन्दर और भालू नहीं, हमारे आपके ही पूर्वज थे, मनुष्य थे। जामवन्त अच्छे ज्योतिषी थे। क्या भालू ज्योतिषी होता है? कालान्तर में उन्हीं की औरस पुत्री जामवन्ती से श्रीकृष्ण का विवाह हुआ। क्या श्रीकृष्ण ने भालू से पाणिग्रहण किया? हनुमान भक्त और परम विवेकी थे। बालि सन्ध्या करता था। बालि का दोष केवल इतना था कि अपने छोटे भाई की पत्नी पर अधिकार कर लिया। बालि यदि पशु होता तो मर्यादा पुरुषोत्तम राम मानवोचित उक्त नियम के उल्लंघन के लिए उसे दण्ड क्यों देते?
वस्तुतः वानर एक जाति थी, मण्डूक एक जाति थी, घोड़ा एक जाति थी। हैहय नरेशों का वर्णन पुराणों में मिलता है। शनैः-शनैः सभी जातियाँ अतीत के गर्भ में विलीन हो गयीं। तदनन्तर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जातियाँ प्रकाश में आयीं। किसी समय इनका भी बहुत जोर था। अब तो इनमें भी एक जाति की लाखों उपजातियाँ बन गयीं। ब्राह्मणों में दो वेद पर अधिकार रखने वाले द्विवेदी, तीन पर अधिकार रखनेवाले त्रिवेदी, चारों वेदों के ज्ञाता चतुर्वेदी कहलाये। अग्निहोत्र करानेवाले अग्निहोत्री बन गये। शिक्षा देनेवाले उपाध्याय बने। उपाध्यायों में भी कई शाखाएँ निकलीं- खोरिया उपाध्याय, कटोरी उपाध्याय, परात उपाध्याय आदि। स्पष्ट है, यज्ञों में किसी को परात लेने का अधिकार था तो किसी को कटोरा लेने का।
क्षत्रियों में राजाओं के लड़कों को राजपूत कहा गया। प्रतिहारी करनेवाले प्रतिहार कहे गये। महाराजा रघु के नाम पर रघुवंशी, इसी तरह सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी, यदुवंशी क्षत्रियों का वर्ग बना। कुरु के नाम पर कौरव वंश चला, पाण्डु से पाण्डव वंश, किन्तु आज कोई कौरववंशी नहीं है, न पाण्डववंशी। महाराणा प्रताप के वंश की एक घटना है। किसी किले को हस्तगत करने के लिए राणा ने भरे दरबार में बीड़ा रखा। दो सरदारों में होड़ लग गयी। दोनों की टुकड़ियों ने अपना-अपना शौर्य दिखाना प्रारम्भ किया। मुगलों से घमासान युद्ध होने लगा। सूर्यास्त हो चला तो एक सरदार चिल्लाया कि मुझे सूर्यास्त के पूर्व किले में प्रवेश कर जाना है, अन्यथा मेरा प्रण पूरा नहीं होगा। हाथी किले के फाटक को नुकीली कीलों के कारण तोड़ने में हिचक रहा था। सरदार ने कीलों पर सीना लगाकर महावत को हाथी आगे बढ़ाने का आदेश दिया और कहा- ‘हर हर महादेव’ बोलते हुए मेरी लाश सूर्यास्त से पूर्व ही किले के भीतर पहुँचा देना।’’ ऐसा ही किया गया। हाथी के दबाव और कीलों से सरदार का सीना छलनी हो गया। दरवाजा टूटने ही वाला था कि अकस्मात् दूसरे सरदार की दृष्टि उस पर पड़ी, जो सीढ़ियाँ लगाकर अपने सैनिकों को किले के भीतर ले जाने के प्रयास में जीवन की बाजी लगा रहा था। उसने सोचा कि पहला सरदार तो मुझसे पहले ही किले में प्रवेश कर जायेगा अतः उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि मेरा सिर काटकर तुरन्त किले के भीतर फेंक दो। सैनिकों ने सेनापति की आज्ञा का अक्षरशः पालन किया और कहना न होगा कि विजयश्री भी ऐसे उत्साहियों का ही वरण करती है। सूर्यास्त होने के पहले ही किला राजपूतों के हाथ में था। महाराणा ने दोनों सरदारों के नाम पर दो वंश चलाये। शक्ति के नाम पर शक्तावत और चूड़ा के नाम पर चूड़ावत वंश चला।
रीवाँ नरेश गुजरात नरेश के पुत्र थे, उनका नाम था व्याघ्रदेव। यहाँ लड़-भिड़कर उन्होंने रीवाँ राज्य की स्थापना की। उनके नाम पर बघेल वंश चला। विद्वत्ता, शौर्य, व्यवसाय और प्रादेशिक निवास से जातियों के गठन का विस्तार होता गया। गन्ध बेचनेवाले गाँधी, हीरे-जवाहरात के व्यवसायी जौहरी, सोने के व्यवसायी स्वर्णकार, लोहे का काम करनेवाले लुहार, भूननेवाले भड़भूँजा, तेल का काम करनेवाले तेली, हलवा बनानेवाले हलवाई, सोने की थाल में खानेवाले सोनथालिया, मूषक का आहार करनेवाले मूसहर, चमड़े का काम करनेवाले चमार, कोठार पर रहनेवाले कोठारी, भण्डार पर रहनेवाले भण्डारी, माला बनानेवाले माली, कपड़ा धोनेवाले धोबी, कन्नौज के रहनेवाले कान्यकुब्ज, मगध के मागध, अम्बष्ठ, जायसवाल–क्या यह सब भी कोई जाति है? पूर्ण समृद्धशाली कौरव और पाण्डव जातियाँ भी नष्ट हो गयीं, जिनकी सुरक्षा के लिए संघर्ष हुए थे। हैहय इत्यादि समृद्ध जातियाँ खो गईं, तो क्या आज की जातियाँ सुरक्षित हैं? यह केवल तुच्छ पदवियों का मोह है। इसी प्रकार रूढ़ियों का प्रचलन बढ़ता गया और लोग संकीर्णताओं से घिरते गये। अब तो ये जातियाँ भी धुँधली पड़ती जा रही हैं। भविष्य में सम्भव है सोशलिस्ट, कम्युनिस्ट, कांग्रेस इत्यादि जातियाँ हों अथवा और कुछ हों। क्यों? क्योंकि अतीत की जातियाँ, जिनका निष्ठा से पालन प्रचलन था; लुप्त हो गईं तो इनके भी लुप्त होने में कोई सन्देह नहीं। वस्तुतः मनुष्य केवल दो प्रकार के होते हैं। श्रीकृष्ण का यही मत है।
प्रश्न– लेकिन, महाराजजी! श्रीकृष्ण तो मनुष्यों को चार प्रकार का मानते हैं– ‘चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टम्।’
उत्तर– देखिये, गीता के चौथे अध्याय में श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टम्’- चार वर्णों को मैंने रचा। तो क्या चार प्रकार के मनुष्य बनाये? नहीं, बल्कि ‘गुणकर्मविभागशः’- गुणों के माध्यम से कर्म को चार भागों में बाँटा। गुण एक कसौटी है जिस पर कसकर कर्म को चार श्रेणियों में विभक्त किया। इसी को अठारहवें अध्याय में और स्पष्ट करते हैं, ‘कर्माणि प्रविभक्तानि’- कर्म बाँटे गये हैं न कि मनुष्य। मनुष्य तो दो ही प्रकार का है। अब आप इंग्लैण्ड में पैदा हुए हों या भारत में, अरब में अथवा दुनिया के किसी कोने में, यह दो प्रवृत्तियाँ स्वाभाविक रहेंगी। मनुष्य या तो दैव (ईश्वर) प्रधान होंगे अथवा प्रकृति में विश्वास करनेवाले। दैव-प्रधान हैं तो देवताओं-जैसे, और प्रकृति-प्रधान हैं तो असुरों-जैसे होंगे।
इस प्रकार दैवी सम्पत्ति की प्रवृत्तिवाला प्रत्येक पुरुष धार्मिक है। परमात्मा ही तो एक सनातन है, इसलिए उसकी पिपासावाला सनातन-धर्मी है। अपने इसी देन के कारण भारत जगद्गुरु था। भारत ने ही विश्व को दैवी सम्पद् एवं परमदेव परमात्मा तक की दूरी तय करा देनेवाली प्रक्रिया दी। केवल पुस्तक पढ़ने से वह क्रिया नहीं आती। प्राप्तिवाले, अनुभवी महापुरुषों की शरण में टूटी-फूटी सेवा और उनके अनुसार थोड़ी-सी साधना करने से वह क्रिया जागृत हो जाती है, वे आराध्य आत्मा से खड़े होकर पथ-संचालन करने लगते हैं जिसके माध्यम से चलकर साधक उसी देवत्व में प्रवेश पा जाता है। इसलिए विश्व में कोई कहीं पैदा हुआ है, यदि दैवी सम्पत्ति की ओर अग्रसर है तो सनातनधर्मी है। हाँ, यह बात अलग है कि वह सनातन-धर्म का पिपासु मात्र है। सनातन-धर्म का शुद्ध अनुयायी वह तब होगा जब कोई अनुभवी महापुरुष ‘सद्गुरु’ मिल जायँ और उसके हृदय से आत्मा को जागृत कर दें अर्थात् जिस सतह पर वह आत्मा है, उसे उसी सतह से जागृत कर, शनैः-शनैः पथ-संचालन करते हुए उस परम की ओर ऊपर उठा दे। उस दिन से वह सनातनधर्मी की श्रेणी में आ जाता है, इसके पूर्व वह पिपासु मात्र है।
अन्तःकरण की इन दोनों प्रवृत्तियों तथा मानव मात्र को अपने ही जैसा पाकर भारतीयों ने समग्र विश्व को स्थान एवं विलय दिया। गोपनीय अध्यात्मविद्या के माध्यम से क्रमशः उठाकर शाश्वत सत्य की गरिमा से उन्हें अवगत कराया। यही कारण था कि भारत विश्वगुरु बना। वाल्मीक रामायण का उल्लेख है कि राम के यज्ञ में, जिसमें समस्त प्रजा एवं ऋषि आमन्त्रित थे, भोजन परोसने इत्यादि की सेवा में राम ने अपने विश्वस्त अनुचरों एवं मित्रों को नियुक्त किया जिसमें विभीषण और उसका परिवार, जामवन्त एवं अंगद का परिवार भी सम्मिलित था, किन्तु इन अधम जातियों के हाथ से परोसा भोजन करने में ऋषियों, विप्रों एवं जनता को कोई आपत्ति नहीं थी। सभी ने तृप्ति के साथ भोजन किया और इन सेवकों की सराहना की। अतः छूने-खाने से धर्म कभी नष्ट नहीं होता।
वस्तुतः प्राप्तिवाले महापुरुष समाज के बीच कभी अन्तर नहीं डाल सकते। यह तो अधकुचलों की देन है। जो उस परम का दिग्दर्शन और मूल की स्थितिवाला है, जो कण-कण में व्याप्त है, वह समाज में भेदभाव नहीं डाल सकता। वह कभी नहीं कह सकता कि भारत में ही राम हैं, बाहर नहीं। यदि कोई ऐसा कुछ कहता है तो सिद्ध है कि वह अभी ईश्वर-तत्त्व को नहीं जानता। महापुरुषों के पश्चात् उनके नाम पर अपनी ख्याति अर्जित करनेवाले अथवा उदर-पोषण की प्रवृत्ति लेकर जीने-खानेवाले लोग ही सम्प्रदायवाद, रूढ़िवाद एवं मानव का विभाजन कर देते हैं। कबीर ऐसे ही लोगों को लक्ष्य करके कहते हैं-
कोई सफा न देखा दिल का।
साँचा बना झिलमिल का रे……….कोई।।
काजी देखा मुल्ला देखा, पण्डित देखा छलका।
औरों को बैकुण्ठ बतावे, आप नरक में सरका।।
बिल्ली देखा बगुला देखा, सर्प जो देखा बिल का।
ऊपर ऊपर बनल सफेदी, भीतर गोला जहर का।।
पढ़े लिखे कुछ वेद शासतर, भरल गुमान बरन का।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, लानत ऐसे तन का।।
कबीर कहते हैं कि ऐसे लोगों को धिक्कार है जो वेद-शास्त्र पढ़ें और शरीर का भेद बना रहे। तब उसने वेद पढ़ा ही कहाँ? कृत्रिम जातियाँ तो पैदा होती आई हैं, नष्ट हुई हैं, नित्य पैदा हो रही हैं, नष्ट हो रही हैं; पैदा होंगी और नष्ट भी होती रहेंगी। मनुष्य की केवल दो श्रेणियाँ, दो जातियाँ स्वाभाविक हैं। वास्तव में मनुष्य मात्र दो प्रकार के हैं। न चार प्रकार के, न हजार प्रकार के।
प्रश्न– महाराजजी ! यदि यही दो जातियाँ हैं तो असुर कहलाना कौन पसन्द करेगा?
उत्तर– करना तो नहीं चाहिए किन्तु अधिकांश पसन्द करते हैं। असुर का यह अर्थ नहीं कि दो सींगवाली, बड़े दाँतोंवाली, लाल-लाल आँखोंवाली कोई जाति रही हो। श्रीकृष्ण देवता थे, उन्हीं के सगे-सम्बन्धी पाण्डव मानव थे और सगे मामा कंस, सम्बन्धी बाणासुर, जरासंध, शिशुपाल सभी असुर थे। अच्छे आचरणों से मनुष्य ही देवता बन जाता है और बुराइयों पर चलकर वही असुर भी कहलाता है। असुर वह है जो परमदेव परमात्मा के देवत्व पर विश्वास न करे। बहुत से लोग आज भी ईश्वर को नहीं मानते। हैं वे असुर ही, नाम चाहे जो दे लें। आजकल प्रचलित जाति-प्रथा न तो स्वाभाविक है और न उपयोगी ही। जो स्वाभाविक है, ‘नेचुरल’ है, अनिवार्य है, उसे क्यों नहीं मानते? न भी मानें किन्तु वह आपके अन्तःकरण में प्रवाहित रहेगी।
(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)