प्यास बुझावै बिन पानी

प्यास बुझावै बिन पानी

प्यास बुझावै बिन पानी, कोई पण्डित ज्ञानी।।

बिना अन्न रस भोग लगावै, बिन मुख पेट खाइ छकि जावे।

बिन कर करै, बिना पग धावै, बिन रसना बोले अमरितबानी।।

प्यास बुझावै…….

बिना भूमि का महल बनावै, बिन आधार की सेज बिछावै।

बिन नारी तिरिया संग सोवै, बिनु आनन्द सुखखानी।।

प्यास बुझावै…….

दान करे संकल्प नसावै, काया तजै देह लौ लावै।

बिना भाव का भरम मिटावै, सो पूरा दरबानी।।

प्यास बुझावै…….

त्यागी बनै राग न तोड़ै, जोगी बने समाधि न जोड़े।

न्यारा रहे संग ना छोड़ै, कह पुरुषोत्तम बानी।।

प्यास बुझावै…….

शरीर में पानी की कमी होने पर प्यास लगने लगती है, होंठ कुम्हला जाते हैं, जिह्वा तालु से चिपक जाती है, गला सूखने लगता है। महात्मा सूरदासजी का बहुत प्रसिद्ध भजन है– अखियाँ हरि दरसन की प्यासीं।– हैं तो प्रज्ञा-चक्षु फिर भी उनकी आँखों को प्यास है हरि-दर्शन की! संत कबीर कहते हैं– जुगन जुगन की तृषा बुझानी अन्त:करण में चित्तवृत्ति में भी प्यास होती है। अनन्त तृष्णा, वासनाओं का अथाह समुद्र लहरा रहा है फिर भी तृष्णा कभी मरी नहीं, पूर्ण नहीं हुई।

समुद्र में ज्वार-भाटा आता ही रहता है। एक बार सागर की लहरों ने असंख्य हीरे-जवाहरात तट पर बिखेर दिये। लोगों के बर्तन, सन्दूक, घर सब भर गये, राजा-महाराजाओं ने अपने रिक्त कोष भरवा लिये फिर भी हीरे-जवाहरात कम होने का नाम ही न लेते थे। एक महात्मा उधर से निकले। उन्हें मनुष्य की एक खोपड़ी मिल गयी थी, उसमें रत्नों को भरना आरम्भ किया। पूरे समुद्र के हीरे समा गये, लेकिन खोपड़ी खाली की खाली! चाह की खोपड़ी कभी भरती ही नहीं। राजनेताओं को बड़ा से बड़ा पद दे दें तब भी वे भूखे के भूखे रहते हैं और जब पद छिन जाये तब तो चेहरा देखते ही नहीं बनता। मनि गिरि गई छूटि जनु गाँठी।(मानस, १/१३४/५)

इच्छा अथाह समुद्र है। इसी का उग्र स्वरूप है तृष्णा। इधर संसाररूपी समुद्र में विषय-वारि है और उधर साधना के सही पथ पर चलते-चलते ज्यों-ज्यों विषयरूपी वारि कम होता जाता है, ब्रह्म-पीयूष मिलने लगता है। क्रमश: ब्रह्म भी अप्राप्य न रह जाय, ब्रह्म-पीयूष अलग न रह जाय तो ब्रह्म-पीयूष की भी चाह खतम हो जाती है।

तहाँ न ईश्वर जीव न माया, पूजक पूज्य न चेरा।

वहाँ न ईश्वर है, न ब्रह्म है, न माया। न कुछ पूजने योग्य है और न कोई पूजनेवाला ही। इस स्थिति में आकर ही इस जीवात्मा, मानव की प्यास सदा के लिये मिट जाती है और यह स्थिति किसी पंडित ज्ञानी को ही मिलती है।

प्यास बुझावै बिन पानी, कोई पंडित ज्ञानी।

अब यह पंडित कौन है? गोस्वामीजी कहते हैं–

चतुराई चूल्हे पड़ी, घूरे पड़ा अचार।

तुलसी राम भजन बिन, चारों बरन चमार।।

उस चतुराई को आग में डाल दें, वह आचार-विचार कचरे के गड्ढे में फेंक देने योग्य है। यदि एकमात्र परमात्मा राम का भजन नहीं है तो चारों वर्ण केवल चमड़ी के पोषक हैं, चमड़ी से प्रेम करनेवाले चमार हैं। जैसी चमड़ी का चिन्तन करते हैं, वैसा ही शरीर भविष्य में मिलता है। गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं– हे अर्जुन! जो जिसका चिन्तन करता हुआ शरीर त्यागता है उसी योनि को प्राप्त होता है और जो मेरा स्मरण करते हुए शरीर त्यागता है मेरे सहज स्वरूप को प्राप्त होता है जहाँ से वह पीछे लौटकर आवागमन में नहीं आता। इसलिए तू आज से ही निरन्तर मेरा चिन्तन कर और युद्ध कर। तू मुझे प्राप्त होगा। आज से ही कर, कल तो कभी आता ही नहीं। यदि आ भी गया तो आज कहलायेगा।

अर्जुन के समय तो युद्ध की संरचना थी, हम कौन-सा युद्ध करें? हमारा तो किसी से झगड़ा भी नहीं है। प्रतीत होता है कि यह गीता-ज्ञान केवल युद्ध करनेवालों के लिए ही है, किन्तु अगले ही श्लोक में योगेश्वर ने युद्ध का तरीका बताया कि यौगिक साधना-पद्धति अर्थात् गीतोक्त भजन की विधि को हृदय में धारण कर, वैराग्य में स्थिर रहकर, संगदोष से अलग रहकर चित्त को मेरे ध्यान में लगाये। सिवाय मेरे अन्य किसी का चिन्तन न करते हुए निरन्तर मेरा चिन्तन कर और युद्ध कर।

विचारणीय है कि एकान्त-देश का सेवन है, हमें छोड़कर वहाँ कोई है भी नहीं, पता नहीं हम झगड़ा किससे करेंगे? कैसा है यह युद्ध? झगड़ा तब होता है जब किसी वस्तु में हमारा और किसी अन्य के राग का टकराव हो। ‘यह पेड़ आपका नहीं, हमारा है’ तो लड़ सकते थे, किन्तु जब लगाव ही नहीं है तो पेड़ खड़ा रहे चाहे गिर जाय; हमसे मतलब? मान लें यह कलम भगवान है तो इसके अगल-बगल यह कागज, यह टेबल न दिखाई पड़े। दिखायी पड़ता है तो युद्ध ही अधूरा है। इस प्रकार अन्य किसी का चिन्तन न करते हुए निरन्तर मेरा स्मरण कर और युद्ध कर।

स्पष्ट है कि यह अन्त:करण की लड़ाई है। मान लें, आप चित्त को सब ओर से समेटकर चिन्तन में लगा रहे हैं। चिन्तन में तो आप आज लग रहे हैं, पहले तो चिन्तन में लगते ही न थे। चिन्तन में लगते ही आपका मन जो धन्धा जन्मान्तरों से करता आया है, वही स्फुरण आपके अन्दर उठने लगेंगे, काम-क्रोध-लोभ-मोह की लहरें उठने लगेंगी। आप ताश खेलें, अतीत का कोई विचार नहीं आयेगा। इसी प्रकार नृत्य देखें तो मुस्कुराते रहेंगे, बैठे रहेंगे, पुरानी कोई बात स्मरण में आयेगी ही नहीं; किन्तु एकान्त में बैठकर भजन करने लगें तो दस वर्ष पूर्व की घटना, जिसे आप भूल चुके थे, मन वह फाइल खोलकर भी रख देगा कि जरा इसे भी पढ़कर देखो। सब ओर से चित्त समेटकर एकान्त में शान्ति से ज्यों ही आप चिन्तन में बैठेंगे, मायिक प्रवृत्तियाँ बाधा के रूप में प्रत्यक्ष ही हैं। इन मायिक प्रवृत्तियों का पार पाना ही युद्ध है। इस युद्ध में यदि एक बार विजय मिल गयी तो वह शाश्वत विजय है जिसके पीछे कभी हार नहीं है। आपको मिल जायेगा सदा रहनेवाला जीवन और सदा रहनेवाली शांति। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं–

ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविध: स्मृत:

ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिता: पुरा।। (१७/२३)

ओम्, तत् और सत् – ऐसा तीन प्रकार का नाम परमात्मा का है जो प्रसारित हुआ है। इसी के द्वारा ब्राह्मण, वेद और यज्ञ रचे गये। कौन-सा यज्ञ रचा गया? वही जैसा अभी बता आये हैं कि योगविधि यज्ञ है जिसका वर्णन गीता, अध्याय ४ में है कि योगी लोग इन्द्रियों के बहिर्मुखी प्रवाह को संयमरूपी अग्नि में हवन करते हैं, श्वास को प्रश्वास में हवन करते हैं, प्रश्वास को श्वास में हवन करते हैं, श्वास-प्रश्वास की गति को रोककर प्राणायाम के परायण हो जाते हैं। तात्पर्य यह है कि श्वास अग्नि, प्रश्वास अग्नि, प्राणायाम अग्नि, संयम अग्नि, योगाग्नि, ज्ञानाग्नि – इन सबमें कहीं आग नहीं जलती। अग्नि तो एक दृष्टान्त है। जिस प्रकार अग्नि में आप कुछ भी डाल दें, भस्म हो जाता है; उसी प्रकार संयम भी एक अग्नि की तरह है जिसमें पड़कर इन्द्रियों का बहिर्मुखी प्रवाह शान्त हो जाता है। प्राणायाम भी एक ऐसी अग्नि है कि प्राणों का व्यापार, मन की भाग-दौड़, संकल्प-विकल्पों का स्फुरण– इन सब पर विराम लग जाता है। यह मन की निरोधावस्था है। इसी निरोध के साथ ही यज्ञ का परिणाम निकल आता है – अमृत का भोजन और सनातन ब्रह्म में स्थिति। इस प्रकार परमात्मा के मुख से ही यज्ञ प्रसारित होता है। जब आप यज्ञ में प्रवृत्त होंगे तो भगवान मार्गदर्शन करने लगते हैं, बोलने-बताने लगते हैं। श्रद्धापूरित हृदय से जब आपका सम्बन्ध भगवान से जुड़ जायेगा तो वेद की रचना होने लगती है। जो तत्त्व अविदित है विदित होने लगता है। वेद अपौरुषेय है। परमात्मा के श्रीमुख की वाणी है, सीधा प्रसारण है। वह अपौरुषेय वाणी सीधे प्रसारित होने लगती है। साधक समझता जाय और चलता जाय। इस जागृति के पश्चात् केवल आज्ञापालन ही भजन है। आदेश समझें और लगें। यही है वेद रचे गये।

इस प्रकार की साधना में चलते-चलते साधक जहाँ मूल, उन परमात्मा का स्पर्श किया तो ब्रह्म जानाति ब्राह्मण:’– जो अविदित तत्त्व है उसका विदित होना वेद है। जब अन्तिम स्तर तक विदित हो गया, जहाँ उससे संयुक्त हुआ, वह ब्राह्मण है। इस प्रकार ब्राह्मण रचे गये। ब्राह्मण एक रचना है। ब्राह्मण जन्मना नहीं होता। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।उन्हें जानकर उन्हीं में स्थिति मिल गयी। वह ब्रह्म से संयुक्त है, रञ्चमात्र भी ब्रह्म अलग नहीं, ब्राह्मण है। ब्राह्मण एक स्थिति है।

 यस्य सर्वे समारम्भा: कामसंकल्पवर्जिता:

 ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहु: पण्डितं बुधा:।। (गीता, ४/१९)

जिस पुरुष के द्वारा सम्पूर्णता से आरम्भ किया हुआ कर्म (गीतोक्त नियत कर्म) संयम के साथ विधिवत् प्रारम्भ किया हुआ कर्म (आराधना, चिन्तन) ‘कामसंकल्पवर्जिता:’– इतना उन्नत हो गया कि काम माने कामनायें, इच्छायें– इनसे ऊपर उठ गया। यह मन की निरोधावस्था है। संकल्प-विकल्प का ही दूसरा नाम मन है। इस निरोध के साथ साधक जिसे जानना चाहता था, वह जानने में आ जाता है। साक्षात् के साथ मिलनेवाली जानकारी का नाम ज्ञान है। ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं– इस ज्ञानाग्नि में कर्म सदा के लिए दग्ध हो जाते हैं। जो संस्कारों की रील में थे वे और वह नियत कर्म जिसे करना अनिवार्य था, ये दोनों कर्म दग्ध हो जाते हैं। तमाहु: पण्डितं बुधा:’– इसी स्थितिवालों को बोधस्वरूप महापुरुषों ने पण्डित कहकर सम्बोधित किया है। पण्डित एक स्थिति है। ऐसे महापुरुषों की रहनी कैसी होती है?–

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।

शुनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिन:।। (गीता, ५/१८)

विद्याविनययुक्त ब्राह्मण में और एक चाण्डाल में (जो एक सियार लटकाये घूम रहा है उसमें) तथा गाय, कुत्ता या विशालकाय हाथी में पण्डिता: समदर्शिन:’– जो पण्डित हैं वे समान दृष्टिवाले होते हैं। उनकी दृष्टि में विद्याविनययुक्त ब्राह्मण न कोई विशेषता रखता है और न ही वह चाण्डाल कोई हीनता रखता है। वह महापुरुष यह जानते हैं कि जो विप्र है, लक्ष्य के थोड़ा करीब है और चाण्डाल लक्ष्य से कुछ दूर बाल्मीकि की तरह खड़ा है, अंगुलिमाल की तरह है; लेकिन है इसी पथ का पथिक। यदि उसे दुर्लभ मानव-तन मिला है तो अधिकारी है। हाँ, वह थोड़ा भटका हुआ है। उन महापुरुषों की दृष्टि में न कुत्ता अधर्म है, न गाय धर्म और न विशालकाय होने से हाथी ही कोई विशेषता रखता है। पण्डित इन सबमें समान ही दृष्टिवाले होते हैं। उनके पास न तो मायारूपी वारि का प्रपंच है, न ब्रह्मपीयूष ही दिखाई देता है जिसे वह प्राप्त करें; क्योंकि वह ब्रह्ममय हो गये हैं। उनकी प्यास मिट चुकी है और दूसरों की प्यास भी यही मिटायेंगे– प्यास बुझावै बिन पानी, कोई पण्डित ज्ञानी।

जल के दो दृष्टान्त दिये जाते हैं। एक तो है विषयरूपी वारि और दूसरा है ब्रह्मपीयूष।

ब्रह्मपियूष मधुर सीतल जो पै मन सो रस पावै।

तौ कत मृगजलरूप बिषय कारन निसि बासर धावै।।

माधव! असि तुम्हारि यह माया।। (विनयपत्रिका, ११६)

यदि जीव को ब्रह्मपीयूष-जैसा मधुर शीतल जल मिल जाय तो वह अनित्य, नश्वर, झूठे विषयरस के पीछे मृग की तरह भला क्यों भागता फिरेगा! पण्डित वे हैं जिन्होंने उन प्रभु को प्रसन्न कर लिया है। वही परमहंस कहलाते हैं। वही सद्गुरु हैं जिन्होंने अपनी प्यास बुझा ली है, जो इस रास्ते से गुजर चुके हैं। वही दूसरों को भी चलायेंगे और लक्ष्य तक पहुँचा देंगे। ऐसे महापुरुष लोकहित के लिये कार्य करते हैं। स्वयं के लिए तो उनका कोई प्रयोजन ही नहीं रहता। दूसरों के कल्याण का स्रोत इन्हीं तत्त्वदर्शी महापुरुषों से, इन्हीं पण्डितों से निकला है। वे सबको राह कैसे पकड़ाते हैं?

बिना अन्न रस भोग लगावै, बिनु मुख पेट खाइ छकि जावै।

बिनु कर करै बिना पग धावै, बिनु रसना बोले अमरित बानी।।

शरीर का भोजन रोटी, दाल, अन्न और षडरस है, किन्तु आत्मा की खुराक में भजन ही भोजन है। उसमें अन्न या रस नहीं लगता। ‘र’ की धारा में रमण करना ही रोटी का खाना है। जो आत्मपर्यन्त दूरी तय करा दे वह भजन ही भोजन है। महापुरुष वह भजन जागृत कर देते हैं। यही है बिना अन्न रस भोग लगाना। यह भोजन मुख से नहीं खाया जाता, पेट में नहीं जाता। चिन्तन मन से किया जाता है। कदाचित् कोई साधक कहीं लड़खड़ाता है तो–

बिनु कर करै बिना पग धावै, बिन रसना बोले अमरित बानी।

…….कोई पण्डित ज्ञानी।

उन दिनों सती अनुसुइया आश्रम घनघोर जंगल में था। अब तो वहाँ बाजार-सा हो गया है। मेला लगता है वहाँ पर। एक संत ने वहाँ पर अनुसुइया जी का भव्य मंदिर बनवा दिया है जहाँ दर्शन के लिये भीड़ टूट पड़ी है। न दिन में चैन, न रात में! लेकिन हमारे गुरु महाराज को जब भगवान ने वहाँ बैठाया था, वर्षा के चार-चार महीनों तक आदमी से भेंट ही नहीं होती थी कि आदमी होता कैसा है? उस जंगल में महाराजजी अकेले निवास करते थे। क्रमश: चार-छ: साधक-शिष्य भी आपकी सेवा में आ गये।

एक दिन एक साधक ने गुरु महाराज से निवेदन किया कि भगवन्! हमलोगों ने इसी जंगल में एकान्त में एक कुटिया बनायी है। आदेश होता तो मैं वहीं अकेले रहकर भजन करता। वह कुटी महाराजजी के आश्रम के समीप ही थी, आश्रम से लगभग आधा किलोमीटर दूर। उस कुटिया के बगल से ही शेर मंदाकिनी में पानी पीने जाया करते थे। गुरु महाराज ने उनका अनुरोध सुना तो बोले– ठीक है, वहीं रहा करो। सात दिन में एक दिन आकर हमें प्रणाम कर लिया करो। जाओ, करो भजन।

उन शिष्य ने कुटिया के बाहर एक मचान बना लिया था। जंगल में यत्र-तत्र बिखरी लकड़ियों को एक सीध में रखकर बैठने और लेटने जितना मचान था। उसी पर बैठकर वह रात्रि में भजन किया करते थे। गर्मियों के दिन थे। वहाँ न बिजली थी, न पंखा और न प्रकाश की ही कोई व्यवस्था! एक दिन वह मचान पर भजन कर रहे थे। अनुभव में उन्हें आदेश मिला– आज सोना मत! भजन में लगे रहो। धीरे-धीरे रात्रि के बारह बज गये, एक बज गये। कमर दर्द करने लगी। उन्होंने सोचा– सोयेंगे नहीं, थोड़ा लेटकर कमर सीधी कर लें। जहाँ मचान के कुन्दों से पीठ लगी, आराम मिला कि नींद आ गयी। इतने में एक चित्तीदार शेर (गुलबाघ) मचान के सामने पिछले पंजों पर बैठकर अध्ययन करने में लगा था कि मचान पर उदरपूर्ति-हेतु पर्याप्त भोजन है या नहीं? वह शिर ऊँचा कर कुछ सूँघ रहा था।

इतने में गुरु महाराज की आवाज गूँजी। आवाज ही नहीं गूँजी, बल्कि गुरु महाराज ने उन शिष्य का हाथ पकड़कर उन्हें लगभग एक फीट ऊपर उठा दिया और बोले– ‘‘कहा था न, सोना मत। गँवार कहीं का। बैठ!’’ वह साधक आधा तो उठ ही गये थे, नींद भाग चुकी थी। सामने देखा तो अंधेरे में काला-काला कुछ बैठा-सा दिखाई पड़ा। उन्होंने टार्च जलाया तो सामने शेर था। वह धीरे से उठा और झाड़ी की ओट में हो गया। वह वहीं श्वास रोके रातभर खड़ा रहा। प्रात: लगभग पाँच बजे वह दौड़ते हुए एक छलांग में ही नदी पार कर गया। थोड़ी ही देर में जब उधर से जानवरों की चिक-पिक सुनाई देने लगी तब उन साधक को लगा कि शेर अपने भोजन की टोह में निकल पड़ा है। इस प्रकार महापुरुष बिनु कर करै– हाथ तो वहाँ था नहीं लेकिन हाथ से पकड़कर उठा दिया। बिना पग धावै– ऐसे महापुरुष को कहीं भी पुकार लोगे, आपके घर में भी दिखाई पड़ेंगे और बिनु रसना बोलै अमरित बानी।– इतनी जोर से आवाज गूँजी कि ‘उठ! कहा था न, सोना मत। सो गये।’

बिना भूमि का महल बनावै बिन अधार की सेज बिछावै।

साधक धीरे-धीरे संसार का सम्बन्ध तोड़कर मन को शून्य में स्थिर कर लेता है। शून्य कहते हैं आकाश को, पोल को। जब मन संकल्प-विकल्प से रहित, वाह्य प्रपंच से भी रहित, देहाध्यास से भी रहित होकर शून्य में स्थिर होने लगता है तो इसका नाम है चिदाकाश। वहाँ भूमि नहीं होती। ऐसे योगी संत की रहनी बिना भूमि का महल– मन शून्य में टिकने का अभ्यास बना लेता है। यही कबीर भी कहते हैं– छाओ छाओ हो फकीर गगन में कुटी। कोई कहता है महल बनाया, कोई कहता है कुटी बनायी – आशय एक ही है।

मनुष्य वहीं रहता है जहाँ उसका मन रहता है। यहाँ योगी का मन शून्य में स्थिर हो गया। धीरे-धीरे वही उसका आवास बन गया। वह शरीर के सम्बन्ध और देहाध्यास से भी ऊपर, पृथ्वी के समस्त ऐश्वर्य और इाfन्द्रयों से मिलनेवाले सुखों से ऊपर प्रभु के लिए बिना आधार की सेज बिछा लेता है–

सुरत की सेजिया सजाय लो, अँधेरिया में का करिहौ?

येहीं उजियरिया में बिछाय लो, अँधेरिया में का करिहौ?

इस शरीर में जब तक दम-खम है, इन्द्रियों में जब तक सामर्थ्य है तभी तक प्रकाश है। इसी उजाले में भगवान के लिये आसन सजा लो, अँधेरे में क्या कर लोगे? उस समय खड़े हो गये तो चलना कठिन, लेट गये तो उठकर बैठना कठिन, प्रात: जो याद था दोपहर तक भूल गये, फिर आप भजन कैसे कर लेंगे; क्योंकि भजन तो स्मृति के साथ करने की वस्तु है। जो उम्र कमाने-खाने की होती है वही भजन करने की है। ऐसा नहीं है कि युवावस्था में अर्थोपार्जन करने में लगे रहें, वृद्धावस्था में भजन कर लेंगे। जो करना है आज करें, अभी से करें।

भगवान के लिये आसन, सुरत की शय्या बिछा लें। मन की दृष्टि का नाम सुरत है। आप यहाँ बैठे हैं, यहाँ के दृश्यों में भूले हैं, सहसा कोई कान में कह दे कि नाती छत से गिर गया, बेहोश है, अस्पताल गया। उस समय मर्यादावश भले ही आप यहाँ बैठे रहें, आपके कान खुले होने पर भी आपको यहाँ का कुछ भी सुनाई नहीं पड़ेगा। उसके स्थान पर आपकी आँखें खुली होने पर भी आपको यहाँ का दृश्य दिखाई नहीं पड़ेगा। उसके स्थान पर आपके समक्ष आपके नाती का चेहरा दिखने लगेगा। उसकी बरौनी कैसी, चितवन कैसी, उँगलियाँ कैसी, नाक कैसी, दाँत कैसे – उसका एक-एक रोम दिखाई पड़ने लगेगा। वस्तु न रहने पर भी जो वस्तु का नक्शा खींच लेती है, मन की इस दृष्टि का नाम सुरत है। इसे सब ओर से समेटकर चिन्तन में लगा दें। सुरत ने जहाँ स्थायित्व लिया, भगवान के लिए आसन तैयार हो गया। यही है सुरत की सेजिया बिछाय लो, यही है–बिना भूमि का महल बनावै, बिन आधार की सेज बिछावै।

सुरत की यह सेज बिना आधार की है, चिदाकाश में लगती है। और–

बिन नारी तिरिया सँग सोवै, बिन आनन्द सुखखानी।

वहाँ कोई नारी नहीं है वह सदैव तुरीयावस्था में रहता है–यही तिरिया है। वह मनरूपी तुरंग पर सदा असवार, उसका मन पर सदा नियन्त्रण है। यह शान्तिवाली अवस्था उसमें सदा विद्यमान रहती है। वाह्य वस्तुओं के संसर्ग से प्राप्त होनेवाले सुख या दु:ख उसके पास नहीं हैं। अब वह सहज आनन्द-सिन्धु में निमग्न है। इन्द्रियों और विषयों के संसर्ग से प्राप्त होनेवाले सुख के न होने पर भी वह आनन्द की खानि है, प्रभु के वरदहस्त के संरक्षण में है। रामचरितमानस में है–

जो आनंद सिंधु सुखरासी।

सीकर तें त्रैलोक सुपासी।। (मानस, १/१९६/५)

जो आनन्द के समुद्र हैं, सहज सुख की राशि हैं। उस सुख की राशि से एक बूँद भी जिसके लिए छिड़क दें, वह साधक तीनों लोकों में सुपास पा जाता है, सुविधा और संतुष्टि पा जाता है। उसके लिये विघ्न है ही नहीं। इसलिए जब सुरत शून्य में स्थिर हो गयी, प्रभु के लिये शय्या तैयार हो गयी तो आनन्दसिन्धु भगवान का संचार मिल जाता है। उस समय वह सर्वस्व का समर्पण कर देता है।

दान करे संकल्प नसावै काया तजे देह लौ लावे।

बिना भाव का भरम मिटावै सो पूरा दरबानी।।

भूखे को भोजन, प्यासे को पानी, लोगों की आवश्यकतानुसार उपयोगी वस्तुओं का बिना मूल्य अर्पण दान कहलाता है। दान परमात्मा की ओर है। जितना जिसने दान दिया, मान लें किसी ने मुट्ठीभर अन्न दान में दिया तो एक मुट्ठीभर संसार छूट गया, उतनी वस्तु से सम्बन्ध छूट गया। दान में लोग बहुत कुछ दे देते हैं। दधीचि ने अपनी हड्डियों को दान में दे दिया। अष्टावक्र ने जनक से मन का दान माँगा। अध्यात्म में गुरु महाराज को तन-मन समर्पित करने का विधान है–

तन मन अर्पण करिहौ, तुम चलो दिवाने देस।

मन का समर्पण आवश्यक है। किसी बबूल के वृक्ष को गुरु महाराज आम कह रहे हैं तो मान लो वह आम है, तुम्हें आम का ही फल मिलेगा। कोई वस्तु आकर्षक लग रही है किन्तु गुरु महाराज मना कर रहे हैं तो उससे दूर ही रहो। तुम आज की देख रहे हो जो आँख से दिखाई दे रहा है, इतना ही जानते हो; किन्तु गुरु महाराज देख रहे हैं कि दस साल बाद तुम्हारी चित्तवृत्ति क्या बदलती है? क्या पायेगी?–उसे जानते हैं। उनके निर्देशन के तद्रूप जब समर्पण हो जाय तभी सर्वस्व का समर्पण हो पाता है। इसी का नाम दान है। जब मन ही दे दिया तब संकल्प कौन करे? फिर तो काया तजे– काया तो संस्कार है। जैसा संस्कार वैसा ही शरीर मिलता है। जन्म-मृत्यु का कारण संस्कारों की रील है। संकल्पों का दान होते ही–

मन मिटा माया मिटी हंसा बेपरवाह।

जाका कछु न चाहिए सोई शाहंशाह।।

इस अवस्था का महापुरुष शरीर से भला करे चाहे बुरा, योगी के कर्म अशुक्ल और अकृष्ण होते हैं। उनके न शुभ संस्कार पड़ते हैं, न अशुभ। वे महापुरुष लोकहित के लिए कर्म करते हैं। महापुरुष जो प्रमाण कर जाते हैं, पीछेवाली पीढ़ियाँ उसी का अनुसरण किया करती हैं। उन महात्मा को आवश्यकता नहीं है फिर भी उन्हें लोकहित के लिए क्रिया में बरतना चाहिए। यही कारण है कि वे देह से भला-बुरा कर्म अकारण ही करते रहते हैं। उनकी उसमें कोई रुचि नहीं, कोई लिप्सा नहीं। पद्मपत्रमिवाम्भसा– कमल के पत्तों पर घड़ों पानी डालें, थोड़ी ही देर में वह सूखा का सूखा मिलता है। ऐसे महापुरुष– बिना भाव का भरम मिटावै।

भाव होता है अपने से श्रेष्ठ में, माता-पिता, गुरु या भगवान में। प्रेमास्पद प्रभु जब भिन्न नहीं रह गये, अभाव है ही नहीं, भगवान विलग नहीं हैं, जब रंचमात्र भी भाव या अभाव नहीं रह जाता तो भ्रम सदा के लिए समाप्त हो जाता है। सो पूरा दरबानी– वह भगवान का सच्चा दरबान है। गुरु महाराज कहा करते थे– ‘‘हो! हम भगवान के दूत हैं, द्वारपाल हैं। हमसे मिले बिना कोई भगवान तक नहीं पहुँच सकता।’’ भगवान के धाम में प्रवेश सद्गुरु से होकर है। वह भगवान के द्वार के पहरेदार हैं। वही सद्गुरु होते हैं। ऐसी स्थितिवाले महापुरुष से ही भजन की जागृति सम्भव है। इस प्राप्ति के पश्चात्–

त्यागी बने राग ना तोड़े, जोगी बने समाधि न जोड़े।

न्यारा रहे संग ना छोड़े, कह पुरुषोत्तम बानी।।

……कोई पण्डित ज्ञानी।।

उस समय वह महापुरुष पूर्ण त्यागी हैं। उनके लिये किसी व्यक्ति या वस्तु में राग बचा ही नहीं लेकिन लोकहित के लिए वह सबसे सम्बन्ध बनाये रखते हैं। वह पूर्ण योगी हैं, परमात्मा के स्वरूप से मिलन है, उनमें स्थिति है लेकिन बाहर लोगों को वह भजन करते दिखाई नहीं देते। ऐसी स्थितिवाले योगी कब भजन करते हैं, पास में रहनेवाला भी नहीं जान पाता जब तक कि वह स्वयं न बता दें। वह सबसे निर्लेप हैं, किन्तु संग ना छोड़े– सबके संग में दिखाई पड़ेंगे। कह पुरुषोत्तम बानी–यह उत्तम पुरुषों की वाणी है।

इस भजन में गीता का ही भाव अपने शब्दों में दिया गया है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया– अर्जुन! गीतोक्त आत्मदर्शन की नियत विधि यज्ञ है। उस विधि को क्रियान्वित करना ही कर्म है। गीतोक्त कर्म है आराधना। इस कर्म को किये बिना सृष्टि में न कभी किसी ने भगवान को पाया है न भविष्य में कभी कोई प्राप्त कर सकेगा, किन्तु इस नियत कर्म के परिणाम में जिसकी आत्मा विदित है, जो आत्मतृप्त और आत्मस्थित है उस पुरुष के लिए किंचित् भी कर्त्तव्य शेष नहीं रह जाता। उसे प्राप्त होने योग्य वस्तु अप्राप्य नहीं है इसलिए कर्म किये जाने से न उसे लाभ है और न कर्म छोड़ देने से कोई क्षति। वह कर्म करे भी तो सुनेगा कौन? आगे कोई सत्ता अलग नहीं है तो जवाब कौन देगा? फिर भी ऐसे महापुरुष पीछेवालों के हित की इच्छा से, लोकहित की भावना से भली प्रकार कर्म में बरतते हैं।

ऐसी स्थितिवाले महापुरुष से अपनी तुलना करते हुए भगवान ने कहा– अर्जुन! मुझे भी तीनों कालों में कोई कर्म शेष नहीं है, प्राप्त होने योग्य कोई भी वस्तु अप्राप्य नहीं है फिर भी मैं पीछेवालों के हित की इच्छा से कर्म में ही बरतता हूँ। यदि मैं ऐसा न करूँ तो मेरा अनुकरण कर समाज भी कर्म छोड़ बैठेगा, नष्ट हो जायेगा, वर्णसंकर हो जायेगा और मैं इस प्रजा का हत्यारा कहलाऊँगा। इसलिए महापुरुष को चाहिये कि स्वयं करते हुए सबसे कराये। महापुरुष जो प्रमाण कर जाता है, समाज उसी का अनुसरण करता है। इसीलिए वे समाज को कर्म करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं; क्योंकि कर्म से भाग्य के असाध्य कुअंक भी मिटाये जा सकते हैं।

कभी-कभी घटनायें ही व्यक्ति का हृदय-परिवर्तन कर देती हैं। जीवन के आरम्भिक दिनों में दस्यु रहे एक व्यक्ति को डाका डालने से नफरत हो गयी। वह एक महात्माजी की कुटिया में जाकर बोला– सन्तजी! हमें शिष्य बना लें। महात्मा ने उसकी लाल-लाल आँखें, भयंकर चेहरा, ऐंठी हुई मूँछें देखी। उसे चाय पिलाकर बोले– भगतजी! आगे और अच्छी कुटिया है, आप आगे बढ़ लें। दो-चार महात्माओं ने उसे इसी तरह आगे बढ़ा दिया। अन्तत: एक महात्मा ने उसे स्वीकार करते हुए कहा– यह झण्डा काला है। इसे बाँस में लगा लो। भगवान के इस नाम का जप करो। भूख लगने पर भिक्षा माँग लिया करो और दिन-रात जप करते रहो। जिस दिन यह काला झण्डा सफेद हो जाय, हमारे पास आ जाना।

‘जो आज्ञा गुरु महाराज!’ कहकर वह व्यक्ति चल पड़ा। उसी तरह जीवन-यापन करते उसे साल-डेढ़ साल बीत चला। प्रतिदिन वह देख लेता था कि झण्डा सफेद हुआ या अभी काला ही है। वह पुन: नाम-जप में लग जाता।

गाँव में बस्ती से दूर-दूर भी कुछ घर बन जाया करते हैं। इसी तरह का एक घर गाँव से बाहर एकान्त में था। वह महात्मा उस घर से थोड़ी दूर पर एक पेड़ के नीचे आसन लगाकर भजन कर रहे थे। रात में उस घर में चार लुटेरे पहुँच गये। संयोग से उस रात उस घर के पुरुष आवश्यक कार्य से कहीं बाहर चले गये थे। घर में केवल चार सयानी कन्यायें ही थीं। उन्होंने बहुत हल्ला मचाया। पूरा गाँव जग गया। लोग दूर से ही आश्वासन देने लगे– घबड़ाना नहीं, हम आ रहे हैं। घेरो रे! चलो रे! भागने न पायें। लोगों ने खूब शोर मचाया लेकिन आया कोई नहीं।

लुटेरों ने रुपये-गहने बाँध लिये और चारों कन्याओं को भी घसीटकर ले जाने लगे। अब उन महात्मा से नहीं रहा गया। वह विचार करने लगे कि मुझमें क्षमता है कि मैं इनकी रक्षा कर सकता हूँ। मैं ठहरा साधु! सांसारिक प्रपंचों में उलझने से कहीं पाप न हो जाय? यही सब छोड़कर तो मैं आया हूँ। भजन छोड़कर इनकी रक्षा करने चलूँ तो कहीं गुरु महाराज की आज्ञा का उल्लंघन न हो जाय। वह अभी यह सोच ही रहा था कि बेटियों का करुण क्रन्दन सुनाई पड़ा। उसने झण्डा अपने बाँस पर लपेटा, उन चारों पर टूट पड़ा। एक पल में ही उसने उन चारों को मार गिराया। उसका तो यह धंधा ही था। उसने लड़कियों से कहा– बेटा! अपना सामान ले लो और घर जाओ। अब कोई खतरा नहीं है। तुमलोग शान्ति से घर जाओ। लड़कियाँ अपना सामान लेकर घर को भाग गयीं।

उन महात्मा ने बेहोश लुटेरों को घसीटकर पशुओं के झोपड़े में बन्द कर बाहर से साँकल लगा दिया और दूर किसी वृक्ष के नीचे अपने आसन पर पुन: नाम जप में लग गये। बड़े सवेरे ही उस घर के सामने गाँववालों की भीड़ लग गयी। कोई कह रहा था– खेतों में ढूँढ़ो, हमलोगों की निगाहों से बच नहीं सकते। रातभर हमने घेरा बना रखा था, वे कहीं भागे नहीं होंगे। कोई कह रहा था– इस डकैती की पोल खोलकर ही दम लेंगे। वे कहीं से आये हों, दरोगाजी हमारे मित्र हैं। हम उनसे कहकर उन्हें ढूँढ़ निकालेंगे। कोई कह रहा था– अभी कल ही हम मंत्रीजी के साथ थे। उनसे कहकर सी.आई.डी. जाँच बैठा देंगे या एस.पी. साहब से कहकर खोजी कुत्ता मँगाये देते हैं।

कुछ लोग ढूँढ़ते-ढूँढ़ते वहाँ के चिल्लपौं से दूर पेड़ के नीचे बैठे हुए उन महात्मा के पास भी पहुँचे। वे बोल पड़े– यही था, इसकी आँखें तो देखो! यही था चोर। सब लोग उन महात्मा को चारो ओर से घेरा बनाकर उस घर के समीप ले गये। उन कन्याओं ने कहा– इन्हीं महात्मा ने तो हमलोगों की रक्षा की है। अब गाँवभर उन महात्मा को प्रणाम करने लगा। लोगों ने पूछा– महाराजजी! वे किधर गये? उन महात्मा ने कहा– इस झोपड़ी में देखो। चारों लस्त-पस्त वहीं पड़े थे, भागने लायक रही ही नहीं गये थे।

इधर उन महात्मा ने अपने झण्डे को देखा तो झण्डा सफेद था। वह दौड़ते हुए गुरु महाराज के पास पहुँचे और बोले– महाराज! देखिये, झण्डा सफेद हो गया। गुरु महाराज ने कहा– हूँ, बेटा! देखा, भगवान के नाम में और साधना में कितनी शक्ति है कि काला झण्डा भी सफेद हो गया। उस शिष्य ने कहा– नहीं गुरु महाराज! यह नाम के शक्तिमात्र से सफेद नहीं हुआ है। हमें भी पूरी ताकत से बाँस चलाना पड़ा तब जाकर यह झण्डा सफेद हुआ है।

यही है– गुरु डालि दिहलें मुँगरा हलल करे चेला। गुरु जो मंत्र दे देता है, हलल करे– उसमें प्रवेश करना, उसे कार्यरूप देना साधक का दायित्व होता है। गुरु महाराज कहा करते थे– हो! गुरु कुछ देता नहीं है। वह साधक को उसका गड़ा हुआ धन बता देता है। वह प्रेरणा देता है कि बेटा! वह प्रकाश दिखाई दे रहा है, पहुँच जाओ। वहाँ तक चलना साधक को ही पड़ता है।

जैसा अभी आपने इस दृष्टान्त को सुना, आप सबका झण्डा काला है, अन्त:करण अविद्या से आवृत्त है। जब भी आपके मन-मस्तिष्क में विचारों की लहर उठेगी, अविद्या की कालिमा लेकर उठेगी। यही काले झण्डे का फहरना है। आपके मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार– ये चतुष्टय अन्त:करण दस्युओं से आक्रान्त हैं। सद्गुरु के आदेश का पालन और नाम के सतत् जप से चारों सुरक्षित हो जाते हैं, अन्त:करण में दैवी सम्पद् का प्रवाह आ जाता है। इससे शुभ, पारदर्शी कल्याणकारी लहरें उठने लगती हैं। गुरु महाराज के आदेश का पालन होने लगा तो श्वेत झण्डा फहरने लगता है।

ऐसे ही महापुरुष के लिए इस पद में कहा गया कि प्यास बुझावै बिनु पानी, कोइ पण्डित ज्ञानी। पहले तो विषयरूपी वारि है जिसमें संसार निमग्न है। सद्गुरु की कृपा से संयम सध गया तो ब्रह्मपीयूष रूपी वारि प्राप्त होने लगता है और दर्शन-स्पर्श-स्थिति मिलने पर वह परमात्मा भी अलग नहीं रह जाता, तो वह है पूर्ण पण्डित, ज्ञानी! वह प्यास से मुक्त हो गये, अन्य की प्यास भी ऐसे महापुरुष ही मिटा सकते हैं।

सद्गुरु परमात्मा में ऐसी स्थिति का नाम है। जब तक वृत्तियों का निरोध नहीं हो जाता, काला झण्डा श्वेत होकर लहराने न लगे, तब तक साधक को सदैव लक्ष्य पर दृष्टि रखनी चाहिए।

।। ॐ श्री सद्गुरुदेव भगवान की जय ।।

(अमृतवाणी भाग-7’ से उद्धृत)

Q & A
×