अमृत कुम्भ
पूर्वकाल में देवासुर संग्राम हुआ था। असुर वास्तव में विजेता हो गये। देवताओं को अपनी देवपुरी, इन्द्रपुरी छोड़कर भागना पड़ा। वे मारे-मारे फिर रहे थे। भगवान की शरण में गये। भगवान ने कहा– देखो, असुरों के गुरु शुक्राचार्य ने संजीवनी प्राप्त कर लिया है। कोई असुर मरता है तो वे संजीवनी दे देते हैं और फिर वे उसी शक्ति से लड़ने लगते हैं। तुमलोग भी अमृत प्राप्त करो और फिर लड़ो तो विजय होगी। तो अमृत कैसे प्राप्त करें?
भगवान ने बताया कि समुद्र-मंथन करो। देवताओं ने कहा– भगवन्! समुद्र-मंथन कैसे होगा? भगवान ने बताया कि असुरों से मित्रता कर लो, फिर दोनों मिलकर समुद्र-मंथन करो। बहुत से रत्नों में अमृत निकलेगा। देवता बोले– असुर बलवान हैं। वह अमृत लेकर भाग जायेंगे। भगवान बोले– चिन्ता मत करो, मैं सब सम्भाल लूँगा।
देवता लोग बिना शस्त्र लिए सीधे असुर साम्राज्य में पहुँच गये। बलि ने कहा– आने दो! आज तुमलोगों ने कैसे आने का साहस किया? उन्होंने कहा– राजन्! हमलोग एक योजना लाये हैं। उससे हम सबका कल्याण होगा। अमृत-प्राप्ति की योजना! यदि आप उचित समझें तो भाग लें। असुर बोले– अमृत हमें भी चाहिए। देवताओं ने कहा– अमृत तो समुद्र-मंथन से निकलेगा। हम दोनों को मिलकर प्रयास करना होगा तभी सम्भव है। मन्दराचल की मथानी, वासुकी की रस्सी बनाकर समुद्र-मंथन करना होगा।
मन्दराचल को समुद्र में डाला गया। वह समुद्र में डूबने लगा, तब भगवान ने कच्छप-रूप धारण करके उसे अपनी पीठ पर थाम लिया। कच्छप की पीठ बहुत मजबूत होती है। उस पर घर्र-घर्र मथानी चलने लगी। समुद्र-मंथन से चौदह रत्न निकले – श्री, मणि, रम्भा, वारुणी, शंख, गजराज, कामधेनु, कल्पद्रुम, चन्द्रमा, धन्वन्तरि, धनुष, वाजि, विष और अमृत। समुद्र मथा गया था जिसमें एक हाथी निकला, घोड़ा निकला, एक अप्सरा निकली, श्री (लक्ष्मी) निकलीं। यह सब उदाहरण हैं, प्रतीकात्मक हैं। संसार एक समुद्र है। यह समुद्र अपनी जगह है, यह पृथ्वी अपनी जगह है। इसको उदाहरण के रूप में देकर पूर्व देवासुर संग्राम में समुद्र का मंथन हुआ बताया गया है।
अचल मन ही मन्दराचल है। मन अचल होकर कभी नहीं टिकेगा बल्कि संसाररूपी समुद्र में डूबता ही चला जायेगा। भगवान अपनी पीठ अर्थात् सहारा दे दें तभी टिकेगा। जिस प्रकार खतरे का आहट पाते ही कछुआ अपने अंगों को समेट लेता है उसी प्रकार जब संयम सध जाता है, वृत्तियाँ, मनसहित इन्द्रियाँ अन्तर्मुखी हो जाती हैं, उस समय भगवान की मदद मिलती है। मन स्थायित्व ले लेता है। फिर नहीं डूबता, ऊपर ही टिका रहता है। श्वास-प्रश्वास का यजन, जिसमें भगवान वासुकी नाग हैं, इसी से मंथन किया गया। अभ्यास सूक्ष्म होता गया, रत्न निकलते गये। पहले तो यह समझना आवश्यक है कि संसार में है क्या? धन-धान्य, इज्जत-प्रतिष्ठा, श्री, मणि, रम्भा…..। जब लोग बहुत धनी हो जाते हैं तो उनके पास काम नहीं होता। दस हजार नौकर होते हैं तो वे करेंगे क्या? दिनभर नाच-गाना देखेंगे! दिन कैसे काटेंगे?
पूर्वज लोग तपस्या करते थे जिससे उनका समय अच्छा कट जाता था। लेकिन जिनका भजन में मन नहीं लगता, उनको शराब, नाच-गाना, श्री, मणि, रम्भा, वारुणी, कल्पद्रुम आदि ही अच्छा लगता है। कल्पद्रुम अर्थात् वृक्षावलि भी एक रत्न है। वृक्ष न रहे तो ऑक्सीजन नहीं मिलेगा। कामधेनु अर्थात् गाय भी एक रत्न है। धन्वन्तरि अर्थात् वैद्य! शरीर है तो वैद्य की जरूरत पड़ती ही है। धनुष, विष, घोड़ा, हाथी और अन्त में अमृत भी निकला। पूरी सृष्टि विष से जल रही थी। शंकरजी ने विष का पान कर लिया। विष न तो पेट में रखा और न ही बाहर दुनिया में रखा, उन्होंने अपने गले में धारण कर लिया।
शंकारि स शंकर! जो शंकाओं से अतीत हैं वह महापुरुष होते हैं, शिव तत्त्वनिष्ठ होते हैं। उनके लिए संसार का विषयरूपी विष होता ही नहीं। न उनके भीतर हृदय या पेट में होता है और न सृष्टि में होता है जो संग-दोष से खींचकर पटक दे। प्रकृति पुरुषोत्तम में परिवर्तित हो जाती है। महापुरुषों के लिए कण्ठ में अवश्य रहता है। व्यावहारिक बातें जरूर करते हैं लेकिन असर नहीं होता। न भीतर और न बाहर! उनके द्वारा जब भी होगा, कल्याण होगा; अनिष्ट कभी नहीं। अमृत निकला तो भगदड़ मच गयी। तो संसार में ये रत्न हैं और संसार के जीवन में ही हमें अमृत प्राप्त करना है।
मृत्यु से परे एक अमृत तत्त्व परमात्मा है। अर्जुन! आत्मा ही सत्य है, परम तत्त्व है, सनातन पुरुष है, काल से अतीत अकाल पुरुष है, अपरिवर्तनशील, अजर, अमर और शाश्वत सत्य है। आत्मा, परमात्मा, ईश्वर, ब्रह्म पर्यायवाची शब्द हैं। विविध दृष्टिकोणों से सम्बोधन हैं। अन्त:करण के अन्तराल में सदा निवास करते हैं तो आत्मा; सबमें रहते हुए भी सबसे परे हैं तो परमात्मा…..। सैकड़ों नाम गिनते चले जाओ। पूरा नाम भगवान का एक भी नहीं। विविध दृष्टिकोण से उनकी विभूतियों का ही सम्बोधन है, उनके कारनामों के सम्बोधन हैं। जब उस सार तत्त्व, अमृत तत्त्व का साक्षात्कार हुआ; दर्शन, स्पर्श, स्थिति मिल गयी, अमर हो गये। ये तो है पराकाष्ठा! लेकिन यह अमरत्व दैवी सम्पद् में सदा विद्यमान रहता है। संसार में दो ही प्रकार के पुरुष होते हैं– देवता और असुर; क्योंकि प्रकृति में दो ही वृत्तियाँ हैं– आसुरी सम्पद् और दैवी सम्पद्। जिस हृदय में दैवी सम्पद् कार्य करती है वह देवता और जिस हृदय में आसुरी सम्पद् कार्य करती है वह असुर होता है। एक सगा भाई देवता और दूसरा सगा भाई असुर हो सकता है।
यह तो वृत्ति है। कोई भगवान के प्रति समर्पण के साथ जीवनयापन में लगा है तो कोई वासनाओं में बहक रहा है। और कुछ नहीं है। अर्जुन! तू शोक मत कर। तू दैवी सम्पद् को प्राप्त हुआ है, मुझे प्राप्त होगा। दैवी सम्पद् ‘विमोक्षाय’– परम कल्याण के लिए और आसुरी सम्पद् अधोगति नीच योनियों के लिए है। जब हम भगवान से प्रेरणा पाकर भजन में प्रवृत्त होते हैं तो दैवी सम्पद् हमें परमात्मा की ओर और आसुरी सम्पद् अधोगति नीच योनियों में खींचती रहती है। श्वास का चिन्तन चलता जाता है और जब इन्द्रियाँ कछुए की तरह सिमट कर अन्तर्मुखी हो जाती हैं। वाह्य चिन्तन जिस क्षण शान्त हुआ, भगवान की मदद मिल जाती है, मन स्थायित्व ले लेता है।
मंथन में पहले संसार की विभूतियाँ निकलती हैं। ‘छोरत ग्रन्थि जानि खगराया। बिघ्न अनेक करइ तब माया।।’ माया अनेक विघ्न उपस्थित करती है। ‘रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई। बुद्धिहि लोभ दिखाविंह आई।।’- वह रिद्धियाँ प्रदान करेगी, सिद्ध बना देगी। यदि कोई मरणासन्न है तो जी उठेगा। भले ही जी जाये, उसकी अवस्था वही है। बाबाजी ने सोचा, हमने कर दिया। उसी में उलझ गया। माया कामयाब हो गयी। तो पहले इस प्रकार ये विभूतियाँ मिलती हैं। कहीं उनमें (विभूतियों में) नहीं उलझा तो वह अमृत प्राप्त करता है। आत्मा ही अमृत तत्त्व है। उसका साक्षात्कार हो जाता है। दर्शन, स्पर्श और स्थिति मिल जाती है। यही अमृत की प्राप्ति है। इस मंथन में जब अमृत मिला तो असुरों ने देवताओं को धक्का दिया। देवता सब-के-सब गिर पड़े। असुर अमृत लेकर भाग गये और देवता लोग हाय, हाय करने लगे। प्रभु बचाओ, बचाओ! भगवान ने तुरन्त एक मोहिनी का रूप धारण किया और मोहिनी अपनी मुस्कान की छटा बिखेरते हुए आगे बढ़ी। मुस्कान देखकर असुर लोग ठिठक गये। असुर लोग बोले– ‘‘तुम्हीं अमृत घड़ा ले लो, फैसला कर दो।’’ वह बोली– ‘‘मैं जो चाहूँगी करूँगी। विश्वास है?’’ ‘‘पूरा विश्वास है, तुम पर पूरा विश्वास है।’’ उसने आहिस्ता से सारा अमृत देवताओं को पिला दिया और मदिरा असुरों को। एक असुर समझ गया और धोखे से जाकर देवता बनकर बैठा और अमृत पी लिया। सूर्य और चन्द्रमा ने कहा, ‘‘प्रभो! देखो, असुर अमृत पी रहा है।’’ गले के अन्दर अमृत गया ही था कि गला कट गया। धड़ से अमृत छू गया इसलिए धड़ भी जिन्दा और सिर भी जिन्दा। देवासुर संग्राम छिड़ गया। देवता विजयी हुए। असुर रसातल में चले गये।
भगवान ने अमृत देवताओं को ही दिया, असुरों को नहीं दिया। वस्तुत: संसार में मनुष्य मात्र दो प्रकार के होते हैं– देवताओं जैसे या असुरों जैसे; क्योंकि अंत:करण की वृत्ति दो प्रकार की होती है– दैवी सम्पद् से आप्लावित दैवी वृत्ति और आसुरी वृत्ति से संचालित है तो असुर। दोनों प्रकार के लोग अमृत चाहते हैं। कौन मौत चाहेगा! अमृत के लिए जितना देवता लालायित हैं, उतना ही असुर भी लालायित हैं। उनकी आकांक्षा में कमी नहीं है किन्तु आसुरी वृत्ति होने से वे भगवान की उस छवि में मुग्ध हो जाते हैं जो मोहिनी रूप है।
वैसे तो भगवान निर्लेप हैं किन्तु उन्हीं के तेज के अंशमात्र से सृष्टि का सृजन, पालन और परिवर्तन होता है। जिस छवि से वे पालन करते हैं, अणु-अणु में व्याप्त होकर सर्वत्र से देखते, सुनते, समझते हैं, उसी प्रशक्ति में मोहिनी रूप भी है जिसमें ऐश्वर्य, ऐशो-इशरत, सुरा-सुन्दरी इत्यादि भोग-सामग्रियाँ भी हैं। आसुरी वृत्ति होने से असुरों की निगाहें इन्हीं में उलझ जाती हैं। चाहकर भी वे अमृत नहीं पाते, नहीं प्राप्त कर सकते! भगवान कंजूस नहीं हैं, पर आसुरी वृत्तिवाले इस अमृत को ले कब रहे हैं? भगवान की मोहिनी छवि पर ही, इनकी दृष्टि विभूति और ऐश्वर्य में ही रहती है इसलिए वे मदिरा पी जाते हैं। ‘जिन्ह कृत महा मोह मद पाना।’– मोहरूपी मदिरा में डूबे रहते हैं। किन्तु जो दैवी सम्पद् से युक्त हैं, इन्द्रियों का दमन, मन का शमन, त्याग, तितिक्षा, ब्रह्मचर्य, धारणा, ध्यान, समाधि, अपरिग्रह, श्रद्धा-समर्पण के साथ जो नाम जप करते हैं, ‘जागत सोवत सरन तुम्हारी’– जो अहर्निश दैवी सम्पद् में अनुरक्त हैं, भगवान उन्हें एक दिन मृत्यु से परे अमृत तत्त्व आत्मा के आलोक में खड़ा कर देते हैं। उन्हें अमृत विदित हो जाता है। भगवान के प्रत्यक्ष दर्शन के साथ जो जानकारी, अनुभूति मिलती है, उसका नाम है ज्ञानामृत! वह ज्ञानामृत पा जाते हैं और असुर इसी आसुरी स्वभाव के कारण अमृत नहीं पाते।
परमात्मा न स्त्री है, न पुरुष, न उभयिंलगि। वह तो अरूप, अनाम और अमूर्त है लेकिन सृष्टि में जो कुछ है, सब उनका है। दैवी सम्पद्वालों की दृष्टि उनके ज्योतिर्मय स्वरूप पर रहती है इसलिए वह भगवान के वरदहस्त के नीचे चलकर उनका साक्षात् कर अमृत प्राप्त कर लेते हैं। भगवान तो अमृत-घट लेकर खड़े हैं। तुम्हारे हृदयरूपी घट में वह अमृत है। वह उसे थोड़ा आगे बढ़ा देते हैं, विदित करा देते हैं। भगवान की मोहिनी छवि पर जिनकी दृष्टि है कि जरा मुस्करा कर पिलाओ, जरा झूमकर पिलाओ, उन्हें प्रकृति की मादकता ही मिलती है, अमृत कदापि नहीं।
कुम्भ-जैसे आयोजनों में सन्तों के सत्संग से, सान्निध्य से आसुरी वृत्ति बदल जाती है। भगवत्-कथा कान में पड़ते ही इन आयोजनों में आनेवालों के भाव बदल जाते हैं इसलिए सबके सब अमृत के भागी हो जाते हैं, उसका बीजारोपण हो जाता है जो निश्चित ही कल्याण प्रदान करके छोड़ता है।
पहले अमृत यहीं प्रयाग में प्रकट हुआ था। असुर जब अमृत-कुम्भ लेकर भागे तो अमृत की कुछ बूँदें प्रयाग में टपक गयीं। वहाँ से लेकर भागे तो अमृत की कुछ बूँदें नासिक में टपक गयीं। फिर भागे तो कुछ बूँदें उज्जैन में टपक गयीं, छीना-झपटी में। फिर भागे तो कुछ बूँदें टपक गयीं हरिद्वार में! बाकी भगवान लेकर बाँट दिये। तो अमृत की बूँदें अमर ही रहेंगी। वह मिट नहीं सकतीं। पृथ्वी नहीं खा सकती। जहाँ-जहाँ वे बूँदें गिरीं, उन्हीं जगहों पर ये कुम्भ के पर्व लगते हैं। प्रयागराज, उज्जैन, नासिक और हरिद्वार में कुम्भ का आयोजन होता है। जहाँ परम का यज्ञ हुआ था, वहाँ अमृत की बूँदें हैं। प्रयागराज! प्र और याग – परम तत्त्व परमात्मा के लिए यज्ञ हुआ था। ‘यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि’– यज्ञों में सर्वोपरि जप-यज्ञ। ‘जहँ जपयोग यज्ञ मुनि करहीं।’ जप-यज्ञ, योग-यज्ञ जहाँ हुआ, वही प्रयाग है।
दूसरा उज्जैन में महाकालेश्वर! भगवान शिव, जो काल के भी काल हैं, वह केवल परमात्मा हैं। वह जिस स्थान पर प्राप्त हुआ, वहाँ अमृत प्राप्त करें। वहाँ अवश्य अमृत मिलेगा। नासिक – जहाँ प्रकृति के नाक-कान कट गये, वहाँ फिर अमृत ही शेष बच रहता है। हरिद्वार – हरि का द्वार! जिसने हरि का द्वार पाया, उसके पास भी अमृत की बूँदें हैं। वह सबको बाँट सकता है। शनै:-शनै: बूँद-बूँद सबको मिलने लगती है। एक दिन लबालब भर जाता है। इसलिए चार स्थानों पर कुम्भ का आयोजन होता है।
जो उस ब्रह्म को प्राप्त कर लेगा, उसके पास है अमृत! क्योंकि मृत्यु से परे वही एक परमात्मा है। ये चार स्थान हैं, जहाँ अनादिकाल से यज्ञ होते आये हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने भी प्रयाग में यज्ञ किया। यहाँ पर जब से अमृत टपका, कुम्भ लगने लगा; क्योंकि ‘यह तन कच्चा कुम्भ है, लिये फिर तू साथ। ढबका लागा फूट गया, बहुरि न देवे साथ।।’ यह शरीर एक कच्चा घड़ा है। जब कभी किसी ने प्राप्त किया है तो इसी हृदय-देश में; क्योंकि ‘सब घट मेरा साइयाँ’। प्रभु सबसे हृदय में रहते हैं– ‘अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी।’ (मानस); ‘ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।’ (गीता) शरीर कच्चा घड़ा है। हृदय-देश में अमृत की बूँदें टपकीं, वहाँ अमृत है। वहाँ मृत्यु से परे प्रभु निवास करता है इसलिए यही पर मंथन हुआ। यहीं मन का निरोध होता है, यहीं वस्तु की प्राप्ति होती है इसलिए अमृत एक प्रश्न है।
चार स्थलों पर अनादिकाल से यज्ञ होते रहे हैं और वहीं पर कुम्भ लगता है। महात्मा ही चलते-फिरते तीर्थराज प्रयाग हैं। इसमें सारे महात्मा पहुँच जाते हैं। आप उन महात्माजनों का दर्शन करें, वाणी सुनें, उनका प्रवचन सुनें, साधना की विधि समझें और साधना में लगें, अमृत अवश्य मिल जायेगा। लोग कहते हैं कि ढोंगी भी बहुत हो गये हैं। ढोंगी कब नहीं थे? सतयुग की घटना है। तीनों लोकों में एकछत्र सम्राट प्रतापभानु था। एक राजा ने कपटी मुनि का वेश बनाया और प्रतापभानु का सर्वनाश करवा दिया। जब देवासुर संग्राम चल रहा था तब इन्द्र ने साधु बनकर प्रह्लाद के लड़के विरोचन का वध कर दिया। अपना मतलब या स्वार्थ साधने के लिए लोग कपट करते ही रहते हैं।
धृतराष्ट्र ने चार्वाक सिद्धान्त के ज्ञाता एक कपटी मंत्री (वाकमंत्री अर्थात् खाओ-पीओ, मस्ती करो) को बुलाया और उससे कहा, मेरे अनुज पाण्डु के पुत्र प्रकाशित हो रहे हैं। मेरे लड़के सौ हैं तब भी बुझते चले जा रहे हैं। मुझे क्या करना चाहिए? मंत्री बोला– राजन्! उनको मार डालो, मृत्युदण्ड दो। इसके लिए सन्तों-जैसी भाषा बोलो। ‘संसार झूठा है।’, ‘संसार नश्वर है।’, ‘मैं तो विरक्त हो जाऊँगा।’….सन्न्यासियों जैसी भाषा बोलो और जब तुम्हारे विश्वास में आ जायें तो उन्हें समाप्त कर दो। आग में जला डालो। लाक्षागृह की योजना भी उसकी की दी हुई थी।
भगवान राम का व्यवहार –
रावण मर चुका था। राज्याभिषेक हो चुका था। एक वाटिका में भगवान राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, हनुमान आदि प्रमुख सेवक अमराई में बैठे थे। इतने में सनकादि ऋषि दिखाई पड़ गये। सब सेवकों के होते हुए भी रामजी स्वयं उठ खड़े हो गये। अपना पीताम्बर बिछा दिया बैठने के लिए। ‘कर गहि प्रभु मुनिबर बैठारे। परम मनोहर बचन उचारे।।’ हाथ पकड़कर मुनिवरों को बैठाया। भगवान बहुत मनोहर वचन बोले– ‘आजु धन्य मैं सुनहु मुनीसा। तुम्हरें दरस जाहिं अघ खीसा।।’ आज मैं धन्य हुआ। आपके दर्शन मात्र से समूल पाप नष्ट हो जाते हैं। ‘बड़े भाग पाइब सतसंगा। बिनिंह प्रयास होहिं भव भंगा।।’ बड़े भाग्य से आप संतों का संग मिलता है। अन्य किसी प्रयास के बिना ही आवागमन का अन्त हो जाता है। ‘सन्त संग अपबर्ग कर कामी भव कर पंथ। कहहिं संत कबि कोबिद श्रुति पुरान सदग्रन्थ।।’ सत्संग कल्याण का मार्ग है, कामी भव का मार्ग है। अहोभाग्य जो सत्संग मिला।
जब तक सनकादि ऋषि रहे, रामजी सब सेवकों के रहते हुए स्वयं सेवा में लगे रहे। जब सनकादि ऋषि विदा हो गये तो भरत चिन्तित हो गये। इसी साधुवेश ने माता जानकी का अपहरण किया और कैद में रखा। लक्ष्मण भैया की मृत्यु के लिए साधुवेश ने कोई कसर नहीं छोड़ा। वह कालनेमि छद्मवेश में बैठा हुआ था और हनुमान को भटका रहा था कि संजीवनी जड़ी न पहुँचे, लक्ष्मण मर जायें। हमारे कुल का सबसे बड़ा हत्यारा है ताे संतवेश! इतनी बड़ी-बड़ी घटनाओं के बाद भी भैया राम की श्रद्धा कम नहीं हुई। क्या बात है! अन्त में हनुमान ने कहा– ‘‘प्रभु! भरतजी कुछ पूछना चाहते हैं।’’ रामजी ने कहा– ‘‘पूछो भाई!’’ तो ‘संतन्ह कै महिमा रघुराई। बहु बिधि बेद पुरानन्ह गाई।। श्रीमुख तुम्ह पुनि कीन्हि बड़ाई। तिन्ह पर प्रभुहि प्रीति अधिकाई।।’ उन पर आपकी अति प्रीति है, तो ‘सुना चहउँ प्रभु तिन्हकर लच्छन। कृपासिन्धु गुन ग्यान बिचच्छन।।’– मैं उन सन्तों का लक्षण जानना चाहता हूँ। पूछा भरतजी ने और बताया रामजी ने। कपटी संतवेश में धूर्त! कपटी संतवेश में ये ढोंगी! ये तो सदैव थे। वे रामजी से टकराये भी। फिर भी संत तो संत हैं। रामजी की श्रद्धा उन पर कभी कम नहीं हुई।
कुम्भमेले में संसार भर के सन्त पहुँचेंगे और कालनेमि व रावण भी पहुँचेंगे। फिर भी वहाँ मंथन होगा। मन स्थिर करके दर्शन हो ही जायेंगे। यही कुम्भमेला है। माघ के महीने में मकर राशि पर जब सूर्य आ जाता है तो सभी तीर्थराज प्रयाग आ जाते हैं। इसे ही मकर संक्रान्ति कहते हैं। ‘एक बार भरि मकर नहाये।’ महीना भर प्रयाग में स्नान किया। फिर महात्मा लोग अपने-अपने गन्तव्य को जाने लगे तो ‘जागबलिक मुनि परम बिबेकी। भरद्वाज राखे पद टेकी।।’ याज्ञवल्क्य मुनि थे, बाकी सब प्रत्याशी भिक्षुक थे। लेकिन एक विवेकी सन्त निकल आये। भरद्वाज ने चरण पकड़कर रोका, प्रभु अज्ञान में जीवन बीत जाना चाहता है। कृपया हमें रामकथा सुनावें। वहीं से रामकथा निकली। याज्ञवल्क्य इस कथा के प्रणेता रहे। भगवान शिव, लोमश, कागभुसुण्डि, बाल्मीकि, नरहर्यानन्द, तुलसी आदि रामकथा जानते थे।
सम्राट कनिष्क एवं हर्षवर्धन, आदिशंकराचार्य इत्यादि ने कुम्भमेले में भाग लिया। चारों तीर्थ अनादि हैं। भगवान शिव आदि योगेश्वर हैं जिनका धाम उज्जैन है, महाकालेश्वर! चक्रवर्ती कनिष्क, हर्ष कुम्भ के अवसर पर प्रतियोगिता का आयोजन करवाते थे, शास्त्रार्थ होता था। कूड़ा-करकट, झूठ-मूठ का धर्म बतानेवाले को बन्द कर दिया जाता था और धर्म की सही परिभाषा महापुरुषों के आदेश से राजकीय स्तर पर प्रसारित कर दी जाती थी। शंकराचार्य के शिष्य पूरे भारत में फैले हुए थे। जो पहाड़ की ऊँचाइयों पर भजन करते थे वे गिरी; नगरों में भजन और प्रसारण करते थे वे पुरी; पूरे भारतवर्ष का विवरण लेकर कुम्भ में पहुँचते थे वे भारती। गिरि, पुरी, भारती, सागर (समुद्र किनारे वहाँ की जनता से मिलना और उनको सही दिशा देना), अरण्य (वनखण्डों में जो भ्रमण करते थे, वहाँ की जनता का हालचाल लेना और सही दिशा देना) इस तरह की सर्वत्र एक जैसी सीख, आराधना, साधना की परिभाषा सबको सुलभ हो जाती थी। अच्छी व्यवस्था थी। आजकल भी मंच लगता है लेकिन उस पर अधिकांशत: वैसे ही लोग (कुछ न जानने वाले) बैठते हैं, कुछ होता नहीं; क्योंकि आज राजतंत्र रहा नहीं। आज के नेता लोगों को इस परम्परा का आभास ही नहीं है तो इस प्रकार के आयोजन करें भी तो कैसे? उन्हें इस पर विचार करना चाहिए।
अनादिकाल से कुम्भमेले की व्यवस्था है। सबको कुम्भमेले में जाना चाहिए; क्योंकि ‘तीरथ किये एक फल, संत मिले फल चार। सदगुरु मिले अनन्त फल, कहे कबीर विचार।।’ तीरथ करने से एक फल अर्थात् पुण्य और पुरुषार्थ बढ़ेगा। संत मिल गये तो चार फल – अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष! और सद्गुरु मिल गये तो अनन्त फल। जिसका अन्त न हो, अनन्त है, असीम है। वह एक परमात्मा है। वह भी सुलभ हो जायेगा। रामचरितमानस में अमृत का बड़ा लम्बा विवरण है। ‘जियत बारि बिनु जे तनु त्यागा। मुए करइ का सुधा तड़ागा।।’ दो घूँट पानी के बिना प्राण त्याग दिया तो मरने के बाद अमृत का तालाब भी क्या कर लेगा! मरने के बाद अमृत के तालाब में डुबो दो तब भी नहीं जियेगा।
जब रावण ने राम को बार-बार मनुष्य-मनुष्य कहकर सम्बोधित किया, तब अंगद से सहन नहीं हुआ। वह बोला– मूर्ख रावण! ‘राम मनुज कस रे सठ बंगा। धन्वी कामु नदी पुनि गंगा।।’ रे बागड़ रावण! राम मनुष्य किस प्रकार? कामदेव क्या कोई धनुषधारी योद्धा है? गंगा केवल नदी नहीं! एक पुष्प का बाण लग जाये तो क्या चोट लगेगी? काम एक फूल की तरह नाजुक विकार है और चराचर जगत् को नचाये पड़ा है। यही संज्ञा पुष्प की उपमा दी गयी है। काम कोई धनुर्धारी योद्धा नहीं है। वह विकार का नाम है, सम्बोधन है। ‘धन्वी कामु नदी पुनि गंगा।’ ‘सुनु मतिमंद लोक बैकुण्ठा। लाभ कि रघुपति भगति अकुण्ठा।।’ रे बुद्धिहीन रावण! बैकुण्ठ क्या कहीं नगरी बसी है कि जाकर आसन लगा होने! एक भगवान की भक्ति कोई साधारण लाभ है? लाभ के पीछे हानि लगी रहती है। किन्तु भक्ति? वह तो श्रेय पद की प्राप्ति है, भगवत्स्वरूप में विलय है। पूर्ण स्थिति जहाँ आई तो हम खो गये। भगवान ही शेष रह गये। लाभ कोई लेकर कहाँ रखेगा!
‘जानत तुम्हहिं तुम्हइ होइ जाई।’– उन्हें जानकर वही हो जाता है। सेवक सदा के लिए खो जाता है। वह लाभ-हानि से परे हो जाता है। ‘अन्नदान अरु रस पीयूषा। पसु सुरधेनु कल्पतरु रूखा।।’– कामधेनु क्या किसी पशु का नाम है? कल्पवृक्ष क्या किसी पेड़ का नाम है? पशु नहीं, पेड़ नहीं है तो आखिर क्या है? यह एक यौगिक शब्दकोष है। अन्नदान एक जीवन है। अमृत कोई घोल पदार्थ नहीं है कि पी लोगे या छिड़क लोगे। अमृत जब घोल पदार्थ नहीं है, रस भी नहीं है तब फिर है क्या?
भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं– संसार मरणधर्मा है। काल पाकर विधाता भी अपने लोकसमेत मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। दिति, अदिति की सन्तानें, देव-दानव-मानव सब पुनरावृत्ति स्वभाववाले दु:खों की खान और क्षणभंगुर हैं। किन्तु मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता। वह अविनाशी, सदा रहनेवाला जीवन और शान्ति प्राप्त कर लेता है।
आत्मा ही अविनाशी है, अमृत तत्त्व है। ‘अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेऽद्योऽशोष्य एव च। नित्य: सर्वगत: स्थाणुरचलोऽयं सनातन:।।’ (गीता, २/२४) – यह आत्मा अच्छेद्य है, इसे छेदा नहीं जा सकता। यह अदाह्य है, इसे जलाया नहीं जा सकता। आकाश इसे अपने में समाहित नहीं कर सकता। यह आत्मा नि:सन्देह अशोष्य, सर्वव्यापक, अचल और स्थिर रहनेवाला और सनातन है। मृत्यु से परे इस अमृत तत्त्व की जानकारी ही अमृत का पान करना है।
राम-रावण युद्ध में जब सब मर गये तब रावण दुर्ग से अपार सेना लेकर निकला। जब सब मर ही गये थे तो अपार सेना कहाँ से आयी? वास्तव में मोहरूपी रावण! ‘मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला।।’ सम्पूर्ण व्याधियों का मूल मोह है। इससे अनन्त शूलों की सृष्टि होती है। किसी पेड़ को काट डालो। आप पायेंगे कि साल भर में तमाम शाखाएँ निकल आयेंगी। जड़ में मूल बचा है, मूल विद्यमान है तो शाखाएँ अवश्य निकल आयेंगी। मोह सम्पूर्ण व्याधियों का मूल है। मूल विद्यमान है। कामरूपी मेघनाद, क्रोधरूपी कुम्भकर्ण, प्रकृतिरूपी सूपनखा सब समाप्त हो गये, लेकिन मूल विद्यमान है तो अंकुर फूटेगा, पेड़ होगा, शाखाएँ होंगी, फूलेगा, फलेगा, फिर वही संसार ज्यों का त्यों!
पेड़ की प्रक्रियाएँ यथावत बढ़ती रहेंगी। बीज गिरेंगे, फिर पेड़ जमेंगे। मोह सकल व्याधियों का मूल है। मोहरूपी रावण यही सम्राट है। सब मर गये लेकिन वह विद्यमान है तो उसके अन्तराल में सबका सूक्ष्म स्वरूप है इसलिए वह अपार सेना लेकर आया। किन्तु जब रावण मरा तो ‘रहा न कुल कोइ रोवनिहारा।’ मूल ही कट गया तो अंकुर किसमें फूटेगा? कोई अश्रु बहाता और जलदाता नहीं रहा। सब शान्त हो गये। जब मूल ही खत्म हो गया तहाँ योग पूर्ण; तहाँ मृत्यु से परे अमृत तत्त्व परमात्मा और उसका संचार हो जाता है। योगाग्नि से परम पराकाष्ठावाली परम शान्ति प्राप्त हो जाती है।
अग्नि में गयी सीताजी की छाया और असली सीताजी लौट आयीं। पहले सबके अन्दर छाया के रूप में ईश्वरीय शक्ति होती है। वह सम्पूर्ण नहीं रहती। जब तक मोह जीवित है, मोह से आवृत्त है, उसका आवरण पड़ा है। मोह का आवरण हटा तो परमात्मा से मिलन का नाम योग है। योग पूर्ण हुआ। अग्नि से शान्तिरूपी सीता निकल आयीं। अग्निदेव ने कहा– यह अविनाशी हैं, चिन्मय हैं, ये शाश्वत सत्य हैं, आह्लादिनी शक्ति हैं। राम! यह सदा तुमसे अभिन्न हैं। सीता प्रकट हो गयीं। इसके साथ देवता आकर चरणों में गिरे और बोले– प्रभो! हमलोगों ने बहुत दु:ख पाया है। आपने हमलोगों को मुक्ति दिला दी। प्रभो! कोई सेवा बोलें! भगवान ने कहा– देवेन्द्र! इन वानरों ने हमारे लिए शरीर त्यागा है। इन पर अमृत छिड़क दो। ‘सुधाबृष्टि भै दुहु दल ऊपर। जिये भालु कपि निंह रजनीचर।।’ अमृत की वृष्टि दोनों सेनाओं पर समान रूप से हुई लेकिन वानर और भालु जी गये और राक्षस एक भी नहीं जिया। यह कैसा अमृत था? इसने राम के दल को जिला दिया। रावण के दलवाले मरे पड़े हैं सब! वास्तव में मृत कहते हैं नाशवान् को, मरणधर्मा को। अमृत कहते हैं अविनाशी को। जहाँ मृत्यु का समावेश न हो, वह है आत्मा। जब उस आत्मतत्त्व का संचार होता है तो आसुरी सम्पद् सदा के लिए शान्त हो जाती है और दैवी सम्पद् सदा के लिए विकसित हो जाती है।
क्रमश: ब्रह्म आचरणमयी प्रवृत्ति परिपक्व हो जाती है। वानर जी उठे। आगे प्राप्त होनेवाली सत्ता अप्राप्त नहीं रह गयी। एक भी नाम और जपें, इसकी जरूरत नहीं रह गयी। आगे जपोगे तो उत्तर कौन देगा? आसुरी सम्पद् के साथ ही यह प्रकृति पुरुषोत्तम में परिवर्तित हो जाती है। ‘रामाकार भये तिन्हके मन। मुक्त भये छूटे भव बंधन।।’ राम के आकार में सभी परिवर्तित हो गये, मुक्त हो गये, भव-बन्धन से छूट गये। यदि अमृत-वर्षा से षड्विकार कामरूपी मेघनाद, क्रोधरूपी कुम्भकर्ण….ये सभी जी गये तो संसार ज्यों-का-त्यों! अमृत कैसा? यही तो मृत्यु के कारण थे। मृत्यु का कारण ज्यों-का-त्यों तो अमृत कैसा! जन्म-मृत्यु का क्रम यथावत है इसलिए अमृत-संचार होता है तो आसुरी सम्पद् सदा के लिए शान्त हो जाती है और दैवी सम्पद् पूर्णतया विकसित हो जाती है। एक पल भी ध्यान धरें, इसकी जरूरत नहीं रह जाती; क्योंकि प्राप्त होनेवाली वस्तु प्राप्त नहीं। पूर्वजों ने शोध किया कि ‘अमृतस्य पुत्रा:’– तुम अमृत की संतान हो। पूरे विश्व को आर्य बना डालो। उस अस्तित्व का उपासक बना डालो। भगवान की चर्चा (अमृत की ओर) मृत्यु से परे परमात्मा की ओर है।
गुजरात में कच्छ भुज समुद्र के किनारे एक स्थान है। वहाँ एक व्यक्ति उत्कण्ठा से गया। एक संत मिल गये तो बोला– महाराज! कल्याण कैसे होगा? सन्त बोले– हरिद्वार जाओ। उस समय साधन वगैरह नहीं थे। सन्त ने कहा– तुम रात्रि में विश्राम उस घर के पास करना जिस घर का कोई व्यक्ति हरिद्वार गया हो। उसे एक गाँव में कोई नहीं मिला, दूसरे में भी नहीं मिला। तीसरे गाँव में मिला तो वहाँ विश्राम किया। दूसरे दिन भी वैसे ढूँढ़कर विश्राम किया। काफी दिन बाद हरिद्वार पहुँच गया।
गंगा के किनारे एक महात्मा की कुटी थी। वह व्यक्ति बोला– आज यहीं विश्राम करूँगा। महात्मा नियमित गंगा-स्थान करने जाते ही हैं। वह वहीं बैठकर भजन कर रहा था। इतने में तीन औरतें आयीं। काली-कलूटी, धब्बा वगैरह गालों पर था। कोढ़ी की तरह तीनों औरतों ने उस आश्रम की सफाई शुरू कर दिया। बर्तन साफ कर चमका दिया, तरतीबवार कर दिया। महात्मा लोगों से मतलब नहीं था और सेवा करके खड़ी होकर निकल रही थीं। निकलते समय वह सभी एकदम दमक रही थीं। उस भोले भगत ने पूछा– ‘‘माई, अभी तो आप कोढ़ी जैसी रहीं, अभी गोरी-गोरी हो गयीं? बात क्या है? आप कौन हैं?’’ औरतें बोलीं– मैं गंगा हूँ, मैं यमुना हूँ और मैं सरस्वती हूँ। ‘‘आप कैसे काली हो गयीं और कैसे गोरी हो गयीं?’’ तब उन्होंने बताया– ‘‘कुम्भमेले में पापियों का पाप धोते-धोते सब पापियों का पाप चढ़ गया इसलिए हम काली, बदरंग, कोढ़ी-जैसी हो गयीं। यह महापुरुष संत नारायणस्वरूप में स्थित भगवत्स्वरूप हैं, शिवस्वरूप हैं। इनके यहाँ सेवा करने से हमारा पाप भी धुल गया इसलिए हम निर्मल हो गयीं। अब हम फिर कल्याण करने लायक हो गयीं। आज दिन में फिर जो लोग नहायेंगे, मैं धोऊँगी।’’ बस! वह भगत पा गया अमृत। महात्मा की सेवा पा गया। गुरु पा गया जिनसे अमृत तत्त्व की विधि जागृत होती है, पूर्तिपर्यन्त दूरी तय होती है।
गंगाजी ने भगवान ने कहा– प्रभो! मैं मृत्युलोक जा अवश्य रही हूँ, मुझ पर पाप चढ़ेगा तो वह कैसे धुलेगा? वह कैसे साफ होगा? भगवान बोले– जिन भक्तों के हृदय में मैं निवास करूँगा वे भक्त जब तुम्हारे जल में चरण डालेंगे तो मेरा चरण भी पड़ जायेगा और तुम पवित्र हो जाओगी। अनुसुइया आश्रम में गंगाजी में एक बार बाढ़ आयी तो धूना डूबने से छ: इंच बाकी रह गया। पहाड़ पर आश्रम है। धूने में आग जलती रहती है, तो महाराज बोले– ‘‘भगवान ने हमें इस जंगल में इस जगह पर बैठाया है। भगवान बोले तुम्हरी यही जगह है। ई गंगिया हमार धूना बुझा देई का!’’ तो भगत बोले– ‘‘महाराज! आपका चरण छूने गंगा आ रही है।’’ गुरु महाराज बोले– ‘‘हम गोड़ नहीं डलिहौं, ससुरी हमार पुण्य ले लेई।’’ इतने में बाढ़ का पानी जोर से पहाड़ से टकराया, बौछारें उठीं और पानी की बूँदें महाराज के चरणों पर पड़ गयीं। लोग बोले– ‘‘महाराज! गंगा ने चरण तो छू लिया।’’ महाराज बोले– ‘‘छू लिया! तब ला रे नारियल, चार फूल ला और सवा पैसा ला।’’ गंगाजी को भेंट चढ़ा दिया। जो गंगा लगातार बढ़ रहीं थीं, जहाँ की तहाँ रुक गयीं। दो घण्टे तक वहीं टिकी रह गयीं। एक इञ्च ऊपर नहीं बढ़ीं और लौट गयीं। उस समय हम गुरु महाराज की सेवा में थे।
यह गंगाजी भी उन संतों के दर्शन से पवित्र होती हैं। वह भगत भी गंगा ही गंगा करते गया, गंगा पा गया। गोस्वामीजी ने चलता-फिरता तीर्थराज प्रयाग कहा है सन्तों को। कुम्भमेले में उन समस्त संतों का सम्मेलन है। उस सम्मेलन में सीता चुरानेवाले भी जाते हैं, लक्ष्मण की मौतवाले भी वहाँ जाते हैं, पाकेटमार भी वहाँ जाते हैं और संत भी अवश्य जाते हैं। सारी घटनाओं के बाद भी संतों पर रामजी की श्रद्धा कम नहीं हुई। इन कुम्भ के आयोजनों में आप सबको अवश्य जाना चाहिए। संतों के दर्शन, संतों के प्रवचन एवं सत्संग सुनकर, साधना की विधि समझकर चिन्तन करने से कुम्भमेले के अमृत कुम्भ से अमृत अवश्य मिलेगा।
अन्तत: सागर-मंथन के परिणाम में निकले अमृत-घट से कुछ बूँदें उक्त चार स्थलों पर टपक गयी थीं जहाँ मेले के आयोजनों का इतिहास है। ये आयोजन इसलिए होते हैं कि अमृत तत्त्व के शोध की विधि मिल जाय। यह नहीं कि मेले में आये, स्नान किया, दृश्य देखा और लौट गये। ये जो कुम्भ लगते हैं, मात्र इतने के लिए लगते हैं कि धर्म के विषय में, इष्ट के विषय में, अपने कल्याण के रास्ते में हमारी जो भ्रान्तियाँ हैं, मिट जायँ।
।। ॐ शान्ति: ।।
सती अनुसुइया आश्रम चित्रकूट के पूज्य श्री परमानन्दजी परमहंसजी महाराज का घनघोर जंगल में निवास था। वह सिद्धपुरुष थे जैसा कि अनादिकाल से तत्त्वदर्शी महापुरुष होते आये हैं। जैसा होना चाहिये, योगेश्वर के सभी लक्षण आपमें विद्यमान थे। आपके आशीर्वाद से विलक्षण घटनायें घटित हुआ ही करती थीं। उनकी समग्र जीवनी ‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ तथा उन्हीं की प्रेरणा से प्रकाशित श्रीमद्भगवद्गीता की यथावत व्याख्या ‘यथार्थ गीता’ इसी कुम्भ परिसर में उपलब्ध है, अवश्य प्राप्त करें।