अवतार

अवतार

प्रश्न- महाराजजी!बिप्र धेनु सुर सन्त हित लीन्ह मनुज अवतार।’ (मानस, 1/192) सन्त तो विरले होते हैं। सामान्य मनुष्यों में अवतार केवल ब्राह्मण के लिए होता है। क्या और किसी की पुकार भगवान नहीं सुनते?

उत्तर- ठीक कहते हो! सुनो, हिन्दू धर्मशास्त्रों में चौबीस अवतार बताये गये हैं। मुसलमानों में भी चौबीस ही नबी और जैन विचारधारा में चौबीस ही तीर्थंकर हैं। न तेईस और न पचीस। विलक्षण समानता तो यह है कि लगभग सब-के-सब अवतार महात्मा ही हैं जिन्होंने हमारी-आपकी तरह जन्म लिया। कोई परिस्थितियों से प्रेरित हुआ तो कोई पूर्व पुण्य-पुरुषार्थ से। वे सब उस तत्त्व की तलाश में निकल पड़े, चिन्तन किया, चिन्मय अविनाशी की स्थिति प्राप्त की और अवतार (नबी) कहलाये।

सनातनी मनीषा में अवतार के बारे में प्रायः यह भावना है कि अवतार कोई चमत्कार है जो भक्तों की आर्त पुकार पर अचानक कहीं प्रकट होगा, खलों का विनाश और हम सज्जन लोगों की रक्षा करेगा; किन्तु मूल शास्त्रों में ऐसा उल्लेख नहीं मिलता। हिन्दू-शास्त्रों के चौबीस अवतारों में अठारह महात्मा निकले और कच्छप, मत्स्य, शूकर, नृसिंह, हंस इत्यादि पशु-पक्षी अवतार भी रूपक हैं जिनमें प्रभु के अवतरण की एक-जैसी विधि-विशेष का चित्रण मात्र है। रहे भगवान राम और श्रीकृष्ण, तो उनमें भगवान श्रीकृष्ण के ही शब्दों में वे योगेश्वर हैं।

श्रीरामचरितमानस की कुछेक पंक्तियों से लगता है कि अवतार मनुष्यों में केवल ब्राह्मण के लिए होता है। अवतार पर सीधा प्रकाश डालते हुए गोस्वामी तुलसीदासजी ने कहा है-

जब जब होइ धरम कै हानी।

बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी।।

करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी।

सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी।।

तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा।

हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा।। (मानस, 1/120/6-8)

विप्र, गाय, सुर और धरती- ये जब कष्ट पाते हैं, तब-तब विविध शरीरों में प्रभु प्रकट होते हैं। प्रथम धरती को लें। उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव तक की धरती! भगवान के आविर्भाव से जो दुःख-सुख मिलेगा इसे तो वही जाने। देवता का दुःख-सुख भी वही जानें। रही पशु-श्रेणी की गाय, तो हम गाय तो हैं नहीं कि हमें भी भगवान का कुछ अंश मिलता। मनुष्य में यदि किसी के लिए अवतार होता है तो केवल वर्ग-विशेष ब्राह्मण के लिए होता है। सीदहिं बिप्र’- जब विप्र कष्ट पाता है तब निवारण के लिए होता है, अन्य किसी के लिए नहीं।

विश्व के लगभग पौने चार सौ देशों में से एक देश भारत! विश्व की असंख्य जातियाँ। उनमें भी प्रचलित चार वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र में से केवल ब्राह्मण वर्ण के लिए भगवान प्रकट होते हैं। तब तो यह भगवान एक कबीले का हो गया, विश्वव्यापी कैसे? अवतार लेकर भगवान करते क्या हैं?- असुर मारि थापहिं सुरन्ह, राखहिं निज श्रुति सेतु।’ (मानस, 1/121) असुरों को मारते हैं। जो विप्र और धेनु को सताते हैं, वे ही असुर हैं। विप्र तो विप्र को सतायेगा नहीं। जब भी कोई सतायेगा तो विजातीय ही। भगवान उन्हें मारने के लिए ही आते हैं, तो भला ऐसे भगवान को कोई क्यों भजेगा? जिसकी वह रक्षा करता है वे भजें! शेष दुनिया वाले यदि भज ही लेंगे तो वह उठकर गर्दन ही तो काटेगा। ऐसे सोते शेर को कौन जगाये? अन्त में कहते हैं, राखहिं निज श्रुति सेतु’- अपने वैदिक मर्यादा की रक्षा करते हैं। वास्तव में यही वेदोक्त तरने का तरीका है।

पूरी रामचरितमानस में निज इच्छाँ प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि।’ (मानस, 4/26) और आगे चलकर भगवान केवल गो द्विज हितकारी जय असुरारी’ (मानस, 1/185 छन्द)- मात्र गो और द्विज के हितैषी रह जाते हैं। मनुष्य में भगवान केवल ब्राह्मण वर्ण की पुकार सुनते हैं जो केवल भारत में पाया जाता है। ऐसे भगवान से विश्व के अन्य मानवों को क्या लेना-देना? अन्य वर्ण और मजहब उसके लिए क्यों आँसू बहायें? फिर भारत विश्वगुरु कैसा? अतः विचारणीय है कि वह द्विज है कौन, जिसके लिए भगवान अवतार लेते हैं?

वास्तव में शास्त्रों का यह कथन अक्षरशः सत्य है कि भगवान गो द्विज हितकारी’ हैं; किन्तु जिस विप्र के लिए वे अवतरित होते हैं वह संसार में प्रचलित कोई जाति नहीं अपितु एक स्थिति है, जैसा कि मानस की ही पंक्तियों में अभी आपने सुना, यत्र-तत्र सर्वत्र है। राजर्षि जनक जैसे कुलीन घराने में सम्बन्ध तथा विश्वविश्रुत सीता-जैसी वधू की प्राप्ति से महाराज दशरथ की प्रसन्नता का पारावार न था। उन्होंने तुरन्त गुरु वशिष्ठ से निवेदन किया, अब सब बिप्र बोलाइ गोसाईं। देहु धेनु सब भाँति बनाई।।’ (मानस, 1/329/7) विप्रों को बुलाइये, उन्हें गाय दान दें। गुरुदेव ने राजा की सराहना की और मुनियों के समूह के लिए बुलावा भेज दिया- पुनि पठए मुनि वृंद बोलाई।’ आया कौन? बामदेउ अरु देवरिषि बालमीकि जाबालि। आए मुनिबर निकर तब कौसिकादि तपसालि।।’ (मानस, 1/330) एक तो वामदेव (यथा नामो तथा गुणः), देवर्षि नारद (दासी पुत्र), वाल्मीकि (कोल-किरात), कौशिक (विश्वरथ नामक नरेश) इत्यादि। राजा ने चार लाख गायें मँगायी, उन्हें सजाया और मुदित महिप महिदेवन्ह दीन्हीं।’ प्रसन्नता के साथ महिदेवों को दान दिया।

उल्लेखनीय है कि राजा ने अनुरोध किया था, ‘‘विप्रों को बुलायें’’, मुनियों को बुलावा चला गया। मुनि भी आये तो कोई दासी पुत्र, कोई क्षत्रिय तो कोई कोल-किरात, विविध वंशों के जन्मे और जब दान दिया तो महिदेव कहकर सम्बोधित किया। अस्तु मुनि, विप्र, महिदेव तथा ब्राह्मण इत्यादि मानस के अनुसार पर्यायवाची हैं। ब्रह्मनिष्ठता की क्रमोन्नत अवस्थाएँ हैं। इसी की पुष्टि आर्षग्रन्थों में यत्र-तत्र सर्वत्र है। उदाहरण के लिए महाराज अत्रि की वाणी देखें, गीता देखें- सबमें आप यही पायेंगे। महर्षि अत्रि कहते हैं-

जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद् द्विज उच्यते।

वेदाध्यायी भवेद् विप्र ब्रह्म जानाति ब्राह्मणः।।

अर्थात् जन्म लेनेवाला प्रत्येक व्यक्ति शूद्र है, अल्पज्ञ है। संस्कार से (सः अंश आकार) सः माने वह परमात्मा- उस परमात्मा का आंशिक संचार, आकार जब प्राप्त होने लगता है, तब वही द्विज है, दूसरा जन्म पाया है जो गर्भवास के यातनाग्रस्त जन्म से भिन्न अजर, अमर, निर्दोष आत्मस्थिति है, शाश्वत सत्य का प्रवेश है। साधना जब और सूक्ष्म हुई तो वेदाध्यायी भवेद् विप्र’- जो तत्त्व विदित नहीं था वही परमात्मा अपनी अनुभूति देने लगता है। उस अनुभूति का अध्ययन करनेवाला, उन निर्देशों पर चलनेवाला ही वास्तविक वेदाध्यायी है, विप्र है। यदि वेद नामक ग्रन्थ पढ़ने से कोई विप्र बनता तो आज अनेक पाश्चात्य एवं भारतीय अध्येता विप्र हो जाते क्योंकि पहले सबको पढ़ने का अधिकार नहीं था, आज है; किन्तु ऐसा कुछ नहीं है। वस्तुतः जो भली प्रकार ब्रह्म के परायण है, वही विप्र है। साधना और सूक्ष्म हुई, तो ब्रह्म जानाति ब्राह्मणः’- जहाँ से वह ब्रह्म अनुभूति देता है, उस मूल का स्पर्श पानेवाला ब्राह्मण है। ब्राह्मण एक स्थिति-विशेष है।

भगवान वास्तव में गो-द्विज हितकारी हैं क्योंकि जिसने भी उधर सिर झुकाया, समर्पण किया, उसका गो-संयम कर आत्मिक जागृति को सुरक्षित रखते हैं, सहायता करते हैं; इसलिए हितकारी हैं और जो उधर झुकाव नहीं लेता, उसके लिए भगवान की वह महिमा नहीं है जो अवतारजन्य है। कृपासिंधु जन हित तन धरही।’ (मानस,1/121/1), सो केवल भगतन हित लागी।’ (मानस,1/12/5)- वह केवल भक्तों के हितकारी हैं।

वास्तव में ब्राह्मण चिन्तन-पथ की एक योग्यता है। जो शाश्वत ब्रह्म के लिए विकल है, वही विप्र है। आइये देखें वेद, उपनिषद् और शास्त्रों के सारांश गीता में अवतार के सम्बन्ध में क्या कहा गया है? अर्जुन ने पूछा- भगवन्! आपका जन्म तो अब हुआ है और सूर्य का जन्म तो बहुत पुराना है। आपने इस अविनाशी योग को कल्प के आदि में सूर्य के प्रति कहा, यह मैं कैसे मान लूँ? योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया-

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।

प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवामि आत्ममायया।। (गीता, 4/6)

अर्जुन! मैं अजन्मा, अव्यक्तात्मा तथा सभी भूत-प्राणियों के स्वर में संचारित (ईश्वर) होते हुए भी अपनी त्रिगुणमयी प्रकृति को आत्ममायया’- आत्मिक प्रक्रिया के द्वारा स्वाधीन करके प्रकट होता हूँ। आत्ममाया, योगमाया पर्याय हैं। आत्ममाया वह है जो आत्मा तक की स्थिति तय करा दे। योगमाया वह है जो परमात्मा से मिलन करा दे, इसी को मानस में राममाया या विद्यामाया कहा गया, जो हरिप्रेरित होती है किन्तु प्रकृति का ही एक पहलू है। इस आत्मिक माया द्वारा तीनों गुणों के संयत होते ही भगवान प्रकट हो जाते हैं। आगे कहते हैं-

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।। (गीता, 4/7)

धर्मस्य ग्लानिः’- धर्म एकमात्र परमात्मा है। धर्म शाश्वत है, धर्म सनातन है और इधर यान्ति ब्रह्म सनातनम्’- ब्रह्म सनातन है। ब्रह्म, आत्मा, परमात्मा एक ही परमपुरुष के पर्यायवाची शब्द हैं। वह सनातन परमपुरुष परमात्मा ही धर्म है। हम कौन हैं? सनातनधर्मी! उस सनातन के पिपासु! तो जब उस धर्म मे लिए हृदय ग्लानि से भर जाता है, अधर्म की वृद्धि देखकर विकल हो जाता है तब मैं अपने रूप को रचता हूँ। जो उसके लिए विकल है वह ब्राह्मण है, उसी के लिए अवतार है।

उस अविनाशी तत्त्व को पाने के लिए विरह किसी में भी हो सकता है, ग्लानि से किसी का भी हृदय भर सकता है, ब्रह्मपरायण कोई भी हो सकता है, बस उसी के लिए प्रकट हो जायेंगे। ऐसी ही ग्लानि महाराज मनु को हुई कि-

होइ बिषय बिराग भवन बसत भा चौथपन।

हृदयँ बहुत दुख लाग जनम गयउ हरि भगति बिनु।। (मानस, 1/142)

विषयों से वैराग्य नहीं हो रहा है। बिना भजन के जीवन बीत जाना चाहता है। ग्लानि से हृदय भरा तो तुरन्त भगवान ने सन्देश देना शुरू किया और मनु पा गये।

योगेश्वर कहते हैं कि जन्मकर्म मे दिव्यम्’- मेरा वह जन्म और जन्म लेकर करनेवाला कर्म दोनों ही दिव्य हैं। एवं यो वेत्ति तत्त्वतः’ (गीता, 4/9)- इस प्रकार का मेरा स्वरूप जो देखता है, वह तत्त्वदर्शी है। केवल तत्त्वदर्शी ही जान पाता है। फिर सबलोग क्यों झुण्ड-के-झुण्ड दौड़ पड़ते हैं कि कहीं अवतार हो तो देख लें?

वस्तुतः उस अवतार की व्यवस्था सबके अन्दर है। अतः हर परिस्थिति में आपको सँभालने के लिए वह सदैव तैयार है चाहे आप कहीं जन्मे हों। जो कोई भी उस ब्रह्म को पाने के लिए भली प्रकार तत्पर है, चिन्तनरत है, जिस किसी ने भी आत्म-संयम के लिए समय दिया है, अवस्था-भेद से उसी को द्विज तथा ब्राह्मण कहते हैं। अतः विप्र के पवित्र स्वरूप को धूमिल करनेवाले अन्ध-बन्धनों को तोड़कर विप्र के उद्गम की खोज करें, चिन्तन करें और विप्रत्व अर्जित करें।

।। ओम् ।।

(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)

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