प्रश्न– प्रायः लोग आपसे प्रश्न किया करें कि, ‘महाराजजी! क्या गाँजा पीने से ध्यान में मदद मिलती है?’
उत्तर– आप हँसते हुए उत्तर दें कि गाँजा तो मैं भी पीता हूँ परन्तु औषधि के रूप में। भजन से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। एक बार मुझे अस्वस्थ देख उत्तराखण्ड के एक स्वामीजी ने कहा कि पहाड़ी पानी बहुत लगता है। महाराजजी, आप दो-चार चिलम गाँजा पीया करें जिससे पहाड़ी पानी का असर न पड़े। तब से मैं भी पीने लगा परन्तु इसका भजन से कोई सम्बन्ध नहीं है। जैसा कि-
गाँजा पीकर धरे ध्यान, गृहस्थ होकर छाँटे ज्ञान।
साधू होके कूटे भग, कहै कबीर तीनों ठग।।
अमल-गाँजा, भाँग, चरस आदि का सेवन करने और भजन, ध्यान करने से कोई सम्बन्ध नहीं है। यदि इनके माध्यम से ध्यान लग जाय तो सभी औषधि खाकर अचेतावस्था में ध्यान करने लगें। साधना के प्रशस्त पथ में पहुँचकर हमारा अभ्यास एवं लगन ही ध्यान के रूप में परिणत हो जाते हैं।
‘इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।’ (गीता, 3/34) इन्द्रियों और उनके भोगों में आसक्त, अनन्त जिम्मेदारियों से ग्रसित गृहस्थ कहता है कि मैं ज्ञानी हूँ तो यह असंभव है क्योंकि ज्ञान एक जागृति है। गीता में है- ‘अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्। एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा।’ (गीता, 13/11) आत्मा के आधिपत्य में निरन्तर चलना और चलते हुए परमतत्त्व परमात्मा के प्रत्यक्ष दर्शन के साथ मिलनेवाली जानकारी ज्ञान है। इसके विपरीत जो कुछ है अज्ञान है। हृदय से आत्मा की जागृति, प्रभु का रथी होना ज्ञान की निम्नतम सीमा है और क्रमश: उनके निर्देशन में चलकर परमात्मा का प्रत्यक्ष दर्शन ज्ञान की अधिकतम सीमा है।
इसी प्रकार साधु यदि इन्द्रिय-संयम से च्युत है, विषयासक्त है, वह भी साधु नहीं है। साधना चरित्र का नाम है। लक्ष्य से रंचमात्र की दूरी है तब तक माया विघ्न डाल सकती है। अस्तु, गाँजा पीनेवाला ध्यानी, गृहासक्त ज्ञानी तथा असंयमी साधु – तीनों पक्के ठग हैं।
***
(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)