प्रश्न – क्या जातियाँ भगवान द्वारा बनायी गयी हैं? वर्ण क्या है?
उत्तर :- वर्ण साधना के सोपान हैं। कर्म गीता के अनुसार आराधना है, चिन्तन है। एक ही कर्म को उन प्रभु ने चार भागों में बाँटा है। ‘चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्म विभागशः।’ (४/१३)- चार वर्णों की संरचना मैंने की। इतनी-सी अर्धाली को लेकर भारत सहस्रों जातियों, उपजातियों में बँट गया, गुलाम हो गया। लोगों ने मान लिया कि चार वर्ण भगवान ने बनाये। यह नहीं देखा कि भगवान ने क्या बाँटा? क्या मनुष्यों को बाँटा? भगवान कहते हैं, ‘गुणकर्म विभागशः’– गुणों के माध्यम से कर्म को चार भागों में बाँट दिया। यदि कर्म समझ में आ जाय तो बँटवारा भी समझ में आ जायेगा।
गीता के अनुसार, ‘यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।’ (३/९) अर्जुन! यज्ञ को कार्यरूप देना कर्म है। यज्ञ एक निश्चित विधि है। इसके अतिरिक्त अन्यत्र जो कुछ किया जाता है, वह इसी लोक का एक बन्धन है, न कि कर्म। योग-विधि, साधन-पद्धति को कार्यरूप देना कर्म है। कर्म माने चिन्तन। अर्जुन! इस कर्म को करके ‘मोक्ष्यसेऽशुभात्’ (४/१६)- अशुभ अर्थात् संसार-बन्धन से भली प्रकार मुक्त हो जाओगे।
एक ही कर्म-पथ को चार भागों में बाँटा है। गुणों के दबाव के अनुसार आप चिन्तन करते हैं तो आरंभ में आपका मन नहीं लगता। उस समय आप अल्पज्ञ हैं, क्षुद्र हैं, शूद्र हैं; क्योंकि तामसी गुणों का बाहुल्य है। ऐसी दशा में ‘परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्।’ (१८/४४)- सत्पुरुषों की सेवा और शरण-सान्निध्य से विधि जागृत हो जायेगी, साधना हृदय से जागृत हो जायेगी।
विधि जागृत होने के पश्चात् दैवी सम्पद् का अर्जन वैश्य श्रेणी, साधना उन्नत होने पर संघर्ष झेलने की क्षमता आते ही क्षत्रिय श्रेणी में प्रोन्नति हो जाती है। भगवान मन की लगाम पकड़कर साधक को चलाने लगते हैं। उनके संरक्षण में संघर्षशील होना क्षत्रिय है। यहाँ से आज्ञा पालन ही भजन कहलाता है। अंतिम विकार भी समाप्त हो गया, अब कोई शत्रु है ही नहीं, काटें किसे? तब ब्रह्म में विलय की योग्यता आ जाती है। उस समय-
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्।। (१८/४२)
अर्जुन! मन का शमन, इन्द्रियों का दमन, मनसहित इन्द्रियों को इष्ट के अनुरूप तपाना, सरलता, धारणा, ध्यान, समाधि, वास्तविक जानकारी, अनुभवी उपलब्धि जब स्वभाव में ढल जाती है, वह ब्राह्मण है; यद्यपि अभी वह भी पूर्ण नहीं है, सात्त्विक गुण अभी उसमें जीवित है। प्रभु का दर्शन, स्पर्श, प्रवेश और स्थिति पा गया तो वही व्यक्ति ‘न ब्राह्मणो न क्षत्रियः न वैश्यो न शूद्रः चिदानन्दरूपो शिवोऽहं शिवोऽहम्।’– वह किसी श्रेणी का कर्त्ता नहीं है, वह परम आनन्दस्वरूप है। कैवल्यस्वरूप शिव मात्र शेष है।
गीता के समापन पर भगवान कहते हैं-
ब्राह्मण क्षत्रिय विशां शूद्राणां च परंतप।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः।। (१८/४१)
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इनके कर्मों को मैंने विभक्त किया है, ‘स्वभाव प्रभवैर्गुणैः’- स्वभाव से उत्पन्न हुए गुणों के अनुसार इन्हें प्रवृत्त किया है। तामसी गुणों का बाहुल्य है, आलस्य, निद्रा, प्रमाद है; दस घंटे भजन में बैठते हैं, जिस मन को बैठना चाहिए भाग रहा है, दस मिनट भी भजन नहीं करता- ऐसी अवस्था में वह अल्पज्ञ है, शूद्र है। उसके लिये परिचर्या ही कर्म है। सेवा, शरण-सान्निध्य से तामसी गुण क्षीण हो जायेंगे, विधि जागृत हो गई, राजसी गुणों का संचार हो गया तो क्रमशः उन्नत सोपानों पर वही अल्पज्ञ शूद्र अग्रसर हो जाता है।
स्वभाव परिवर्तनशील है। एक बार जघन्य अपराधी रत्नाकर सप्तर्षियों से टकरा गया। उसने ललकारा, ‘खबरदार! जो कुछ है, रख दो।’ महात्माओं ने कहा, ‘वत्स! जंगल में अकेले क्या कर रहे हो?’ रत्नाकर बोला, ‘चालाकी न दिखाओ। जो कुछ तुम्हारे पास है मुझे दे दो।’ ऋषियों ने पूछा- ‘इतना जघन्य अपराध किसलिये कर रहे हो?’ उसने कहा- ‘परिवार के उदर-पोषण के लिए।’ ऋषियों ने कहा- ‘जो तुम कर रहे हो, इससे तुम्हें रौरव नरक की यातना मिल सकती है। क्या तुम्हारा परिवार भी तुम्हारे इस कृत्य में हिस्सा बँटायेगा?’ रत्नाकर बोला- ‘अवश्य भागीदार होंगे।’ ऋषियों ने कहा- ‘उनसे कभी पूछा भी है?’
उन ऋषियों को बाँधकर रत्नाकर अपने परिवार से पूछने गया तो सबने टका का उत्तर दिया कि ‘अपनी करनी पार उतरनी।’ हमें क्या पता तुम क्या करते हो? हमने कब कहा कि डाका डालो? उदास खिन्न दस्यु ऋषियों की शरण में आया और अपने उद्धार का उपाय पूछा।
ऋषियों ने उसे सान्त्वना दी- ‘वत्स! तुम अपराधी नहीं हो। तुमने जो कुछ किया है अनजान में किया है। अज्ञान में तो सर्प पर भी पाँव पड़ जाता है, लोग कभी शेर से टकरा जाते हैं, दुर्घटनाएँ हो जाती हैं। तुम अनभिज्ञ हो। कोई बात नहीं, बोलो- ‘राम!’
वह जन्म का पातकी, उसके मुख से यह पवित्र नाम निकलता ही न था, बोला- ‘म’। ऋषियों ने कहा- और प्रयत्न करो, तो बोला- ‘रा’। मिलाकर पढ़ो, तो बोला- मरा! ऋषियों ने कहा- तुम ‘मरा’ ही पढ़ो। जब तक हम लौटकर न आयें तब तक यही पढ़ते रहना। यहाँ से जल पी लेना, यहाँ से फल खा लेना, नाम पढ़ते रहना, किसी से बोलना नहीं और कुछ देखना नहीं। हठी तो था ही, आदेश के पालन में लग गया।
बारह वर्ष पश्चात् महापुरुष लौटे तो रत्नाकर की समाधि लग गयी थी। उसके चारों ओर दीमकों ने बाँवी बना लिया था, मिट्टी के ढेर खड़े हो गये थे। उनके बीच में होने से उसका नाम वाल्मीकि पड़ गया। ऋषियों ने उसे सचेत किया।
उलटा नामु जपत जगु जाना।
बालमीकि भये ब्रह्म समाना।।
(मानस, २/१९३/४)
जान आदिकवि नाम प्रतापू।
भयउ सुद्ध करि उलटा जापू।।
(मानस, १/१८/३)
वाल्मीकि ब्रह्म के समानान्तर स्थिति पा गये। क्या बदल गया था? शरीर तो वही था। स्वभाव परिवर्तनशील है। तामसी गुणों का दबाव था तो वही व्यक्ति डाकू, लुटेरा, हत्यारा, अनभिज्ञ जीव था। महापुरुषों की शरण, साधना और सान्निध्य से, साधना की टूटी-फूटी लड़ी-कड़ी में अल्पज्ञ स्तर मरा-मरा से आरंभ किया और ब्रह्म के समानान्तर स्थितिवाले हो गये।
भगवान श्रीकृष्ण आश्वस्त करते हैं, अर्जुन! ऐसा कोई पाप नहीं जो मेरी शरण में आने से समूल नष्ट न हो जाय। आप एक ही जन्म में यह प्रगति कर सकते हैं। वाल्मीकि उसी शरीर से दस्यु थे, ब्रह्मर्षि हो गये।
वर्ण साधना के क्रमोन्नत सोपान हैं। समाज में प्रचलित जातियाँ तो कबीलों के नाम हैं। किसी के कई लड़के हैं, पुकारने के लिए अलग-अलग नाम तो रखना ही पड़ता है। जातियाँ कुल-गोत्र के सम्बोधन हैं, इनसे धर्म का कुछ भी लेना-देना नहीं है। जातियाँ बदलती रहेंगी। कोई अपना गाँव छोड़कर कहीं अन्यत्र गया तो गाँव के नाम पर, प्रदेश के नाम पर भी जातियाँ बन जाती हैं। वंश में कोई वरिष्ठ पुरुष हो गया तो उसके नाम पर भी जातियाँ बनती हैं। इसी तरह व्यवसाय भी जाति की संज्ञा पा लेता है। यह तो हमारे पूर्वजों के कीर्तिमान हैं, गौरव-गाथाएँ हैं। धर्म से इनका सम्बन्ध नहीं है।
गीता के अनुसार मनुष्य या तो आस्तिक या नास्तिक, देव-प्रधान या प्रकृति-प्रधान, देवता या असुर इन दो जातियों में विभक्त है और वर्ण साधना के चार क्रमोन्नत सोपान हैं।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- ‘या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।’ (२/६९) अर्जुन! संसार एक रात्रितुल्य है। इसमें हर प्राणी अचेत है लेकिन संयमी पुरुष जाग जाता है। जहाँ गीतोक्त साधन समझा, जहाँ पहला चरण रखा, जाग गया। ‘जानिय तबहिं जीव जग जागा। जब सब बिषय बिलास बिरागा।।’ (मानस, २/९२/४) जागृति के पश्चात् साधना एक, एक ही कर्म के क्रमोन्नत सोपानों में प्रवेश मिलता जाता है।
अल्पज्ञ शूद्र अवस्था में पहले समर्पण से आरंभ है। विधि जागृत हुई तो प्रकृति के द्वन्द्व से शनैः-शनैः आत्मिक सम्पत्ति अर्जित की जाती है जो निज सम्पत्ति है, निश्चित कल्याण करनेवाली है, साथ ही गो-संयम, इन्द्रिय-संयम यही वैश्य श्रेणी है। भगवान के हाथों का यंत्र बनकर चलने की क्षमता आने पर संघर्ष झेलने की क्षमता आ जाती है यही क्षत्रिय वर्ण है और जब विकार समाप्त हो गये, ब्रह्म में विलय की योग्यता आ गयी तो वही ब्राह्मण वर्ण है। प्रभु का दर्शन, स्पर्श और प्रवेश मिल गया तो श्रेणियाँ समाप्त। अब कर्म करने से न लाभ है और न छोड़ देने से कोई क्षति। न प्राप्त होने योग्य कोई वस्तु शेष रह जाती है, न ही कोई भगवान अलग है जिसे वह ढूँढ़े।
यही गीता-शास्त्रोक्त वर्ण हैं, साधन-विधि है। शास्त्र-विधि छोड़कर भजने से भजन ही क्या है? वह अनभिज्ञ अवस्था है, अन्य कुछ भी नहीं।
(‘प्रश्न समाज के – उत्तर गीता से’ से उद्धृत) * * *