प्रश्न – क्या धर्म का लक्ष्य नरक के भय और स्वर्ग के प्रलोभनों तक ही सीमित है?
उत्तर :- नरक का भय दिखाने की कौन जरूरत है, हर व्यक्ति नरक भोग रहा है। न चाहते हुए भी परिवार में एक लुंज लड़का पैदा हो जाता है। धन-वैभव की कमी नहीं है फिर भी चिन्ता है। व्यस्तता इतनी कि खाने-सोने का समय ही नहीं है। नींद नहीं आती। न चाहते हुए भी कैन्सर हो गया, लड़के का एक्सीडेन्ट हो गया। न चाहते हुए भी पता नहीं कौन ब्लेम लग गया, आरोपों के घेरे में हैं। सृष्टि ‘दुखालयं अशाश्वतम्’– संसार दुःख का समुद्र है, अशाश्वत है, नश्वर है। अतः नरक का भय दिखाने की क्या आवश्यकता है?
बच्चे माँ की गोद तक तो सुखी माने जा सकते हैं किन्तु जब से होश सँभाला, समझ आयी तो दुःख ही दुःख है। अतः अलग से भय दिखाने का बहुत औचित्य नहीं है। सुखमय जीवन स्वर्ग और दुःखमय जीवन नरक है। स्वर्ग और नरक संसार की ही दो सीमाएँ हैं। मानस में है-
कहँहिं बेद इतिहास पुराना।
विधि प्रपंचु गुन अवगुन साना।।
दानव देव ऊँच अरु नीचू।
अमिय सुजीवनु माहुरु मीचू।।
सरग नरक अनुराग बिरागा।
निगमागम गुन दोष बिभागा।।
(मानस, १/५/२-५)
अर्थात् यह स्वर्ग है, यह नरक है, देव है, दानव है, सुख-दुःख, पाप-पुण्य, दिन-रात ये सभी विधाता के प्रपंच के नाम हैं। एक गुणों की नामावली है तो दूसरी दुर्गुणों की नामावली है; किन्तु हैं सभी प्रपंच। स्वर्ग मिल भी गया तो उसका अंत दु:खद होता है। सभी देवता अंत में च्युत होकर यहीं आये। ‘क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति’– पुण्य क्षीण हुआ तो मृत्युलोक की यात्रा पुनः प्रारम्भ हो जाती है।
कुरान में आता है कि इबलिस देवता था, फरिश्ता था। जरा-सी भूल करने पर अल्लाह ने उसे जन्नत से निकाल कर मृत्युलोक में भेज दिया।
जब देवताओं का इतना ही अस्तित्व है तो आप स्वर्ग के लिए क्यों लालायित हैं? बाइबिल में है कि आदि मानव आदम थे। स्वर्ग में ही जन्मे और वहीं रहते थे। एक फल खा लिया, तो ईश्वर ने कहा- जाओ मृत्युलोक में। बड़ा कड़ा शासन है। रिस्टीकेशन तो पलभर में हो जाता है। एक फल क्या खाया कि निष्कासन। हमारे यहाँ खा लेता तो दस हम उसे और बाँध देते कि ले जाओ घर पर भी खा लेना। यह स्वर्ग-नरक कुछ नहीं, संसार की ही व्यवस्थाएँ हैं।
इस संसार में जो शाश्वत सत्य है, वह है एक परमात्मा। उसका दर्शन, स्पर्श और उसमें स्थिति मिलने से पूर्व जीव को कभी विश्राम नहीं है, दुःखों से मुक्ति असम्भव है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप।। (गीता, ११/५४)
परंतप अर्जुन! अनन्य भक्ति के द्वारा, अनन्य अर्थात् अन्य किसी देवी-देवता, भूत-भवानी का चिन्तन न करते हुए, पूर्ण श्रद्धा से युक्त होकर जो मुझे भजता है उसके लिये तो मैं प्रत्यक्ष देखने के लिये (जैसा तूने देखा), स्पर्श करने के लिए और स्थिति प्राप्त करने के लिये भी सुलभ हूँ। वह स्थिति मिलेगी जो शाश्वत है, वह स्वरूप मिलेगा जो शाश्वत है, उस धाम को प्राप्त कर लोगे जो शाश्वत है।
गीता आपको परमात्म-स्वरूप में स्थिति दिलाती है, स्वर्ग का प्रलोभन और नरक का भय दिखाकर ही नहीं छोड़ देती। गीता आपको ऐसा जन्म देती है जिसके पीछे मृत्यु नहीं, ऐसी शान्ति देती है जिसके पीछे अशान्ति नहीं है।
स्वर्ग और नरक संसार के ही दो छोर हैं। आरंभिक साधकों को सचेत करने के लिये तथा प्रोत्साहित करने के लिए ही पुरस्कार और दण्डस्वरूप स्वर्ग या नरक की परिकल्पनाएँ हैं; किन्तु साधना प्रशस्त होते ही इनकी आवश्यकता नहीं रह जाती। भगवान स्वयं उस साधक की उँगली पकड़कर चलाने लगते हैं और जैसा कि मानस में है- ‘उमा राम सुभाउ जिन्ह जाना। ताहि भजन तजि भाव न आना।।’- जब भगवान का प्रभाव, उनकी महिमा, उनका स्वभाव देखने को मिलने लगता है तो भजन छोड़कर दूसरा कुछ भी रुचिकर नहीं लगता। सृष्टि में कोई जन्मा ही नहीं जो उसे भजन से अलग कर दे। जब तक भजन की ऐसी जागृति नहीं हो जाती, सुख-दुःख प्रभावित करते ही हैं। अभी समझाना पड़ता है कि साधना ऐसे करो, यह मत करो; जहाँ जागृति हो गई, समझाना नहीं पड़ता। जागृति के साथ ही जो साधक के हृदय में भगवान हैं, स्वयं समझाने लगते हैं। स्वर्ग और नरक का उसके लिए कोई अर्थ नहीं रह जाता।
(‘प्रश्न समाज के – उत्तर गीता से’ से उद्धृत) * * *